Input,Context,Output "गुमानी कु स्वर में बोली--गुर्राते क्या हो, खाने को तो घुलाने भाई हूं ।",क्या पड़ा भी न रहने देगी या और पानी चाहिए ।,"गुमानी कटु स्वर में बोली- गुर्राते क्या हो, खाने को तो बुलाने आयी हूँ ।" यद्दी घर है जहा आज के दस साल पहले उसका कितना आदइर-सत्कार होता था ।,"मैं इनका कुत्ता हूँ, जिसे खाने के बाद एक टुकड़ा रोटी डाल दी जाती है ।",यही घर है जहाँ आज से दस साल पहले उसका कितना आदर-सत्कार होता था । स्री पूजा करती थी ।,सास मुँह जोहती रहती थी ।,स्त्री पूजा करती थी । मुझे उल्ल इनाकर यह सब अब निकाल देना चाइते हैं ।,"यह मेरी स्त्री है, जिसके लिए मैंने अपना सर्वस्व मिट्टी में मिला दिया ।",मुझे उल्लू बनाकर यह सब अब निकाल देना चाहते हैं । "अब द्रिद्र हूँ, तुम क्यों प्रात पूछोगी ।",जब मेरे पास भी धन था तब सब कुछ आता था ।,"अब दरिद्र हूँ, तुम क्यों बात पूछोगी ।" उन्होंने प्रकाश को इगलेंह जाकर विद्याभ्याप करने के लिए सरकारी वज़ोफे की मंजूरी की सूचना दी थो ।,4 विद्यालय खुलते ही प्रकाश के नाम रजिस्ट्रार का पत्र पहुँचा ।,उन्होंने प्रकाश को इंग्लैंड जाकर विद्याभ्यास करने के लिए सरकारी वजीफे की मंजूरी की सूचना दी थी । "प्रकाश --भगर मेजिस्ट्रेट के हृदय में परोपकार का भाव है, तो वह नरमी से बी काम करता है, जो दूसरे गोलियाँ चलाकर भी नहीं कर सकते ।","करूणा ने आपत्ति के भाव से कहा— लेकिन यही मजिस्ट्रेट तो जाति के सेवकों को सजाएँ देते हें, उन पर गोलियाँ चलाते हैं ?","प्रकाश— अगर मजिस्ट्रेट के हृदय में परोपकार का भाव है, तो वह नरमी से वही काम करता है, जो दूसरे गोलियाँ चलाकर भी नहीं कर सकते ।" "मानी ने बढ़ी-बड़ी यातनाएँ सह्दी थीं, पर आज की वह फिढ़की उसके हृदय में बाण की तरह चुभ गई ।","सहसा उसकी चाची ने झिड़ककर कहा- तुझे यहाँ किसने बुलाया था, निकल जा यहाँ से ।","मानी ने बड़ी-बड़ी यातनाएँ सही थीं, पर आज की वह झिड़की उसके हृदय में बाण की तरह चुभ गयी ।" इस वक्त गोइल को खोजने के लिए ऊपर आया था ।,वह भी न्यौते में आया हुआ था ।,इस वक्त गोकुल को खोजने के लिये ऊपर आया था । रूघू ने मन में ठाव लिया था कि इस विपत्ति को घर में न आने दूं गा; सगर होनद्वार के सामने उसकी एक न चली ।,"फिर उनमें वही नाता रह जाता है, जो गाँव के और आदमियों में ।",रग्घू ने मन में ठान लिया था कि इस विपत्ति को घर में न आने दूँगा; मगर होनहार के सामने उसकी एक न चली । कामतनाथ को इसकी कोई ज़रूरत न म लूम हुईं ।,दयानाथ ने आपत्ति की- अम्माँ से भी पूछ तो लेना चाहिए ।,कामतानाथ को इसकी कोई जरूरत न मालूम हुई । उछ वक्त तक छुमुद के विवाह की चर्चा करके फूलमती को भड़कादा उचित नहों ।,कोई कौशल रचकर माता से सारे गहने ले लेगा ।,उस वक्त तक कुमुद के विवाह की चर्चा करके फूलमती को भड़काना उचित नहीं । "कामतानाथ ने सिर हिलाकर झहा - भाई, में इन चारों को पसन्द नहीं करता ।",उस वक्त तक कुमुद के विवाह की चर्चा करके फूलमती को भड़काना उचित नहीं ।,"कामतानाथ ने सिर हिलाकर कहा- भाई, मैं इन चालों को पसंद नहीं करता ।" किनारों के वृक्षों को केवछ फुनगियाँ पानी के ऊपर रह गड्के थीं ।,क्षितिज के सामने के कूल से मिला हुआ था ।,किनारों के वृक्षों की केवल फुनगियाँ पानी के ऊपर रह गयी थीं । घाट ऊपर तक पानी में हब गये थे ।,किनारों के वृक्षों की केवल फुनगियाँ पानी के ऊपर रह गयी थीं ।,घाट ऊपर तक पानी में डूब गये थे । ' “उनके तो कई लड़के बढ़े-बढ़े हैं और सब कमाते हैं |,"’ ‘हाँ थे तो, पर इसके भाग्य में ठोकर खाना लिखा था ।",‘ ‘उनके तो कई लड़के बड़े-बड़े हैं और सब कमाते हैं ? "भोजन के लिए तो ठिद्ताना दो नहीं, दंड कहाँ से दें ?",' 'बात तो उन्होंने ठीक ही कही!' 'हम तो मिट जायेंगे!' 'हम तो यों ही मिटे हुए हैं!' 'रुपये कहाँ से आवेंगे ।,"भोजन के लिए तो ठिकाना ही नहीं, दंड कहाँ से दें ?" और अब विलायती कपड़े भूलकर भी न बेचना ।,इसे रेहन रख दो ।,और अब विलायती कपड़े भूलकर भी न बेचना । मेरी दवा-दारू की चिन्ता न करो ।,तुमने सील तोड़कर यह आफत सिर ली ।,मेरी दवा-दारू की चिंता न करो । "ईइवर को जो इच्छा होगी, वह होगा ।",मेरी दवा-दारू की चिंता न करो ।,"ईश्वर की जो इच्छा होगी, वह होगा ।" "देश में'करोड़ों आदमी ऐसे हैं, जिनकी दशा इमारी दशा से भी खोब है ।","बाल-बच्चे भूखों मरते हैं, मरने दो ।","देश में करोड़ों आदमी ऐसे हैं, जिनकी दशा हमारी दशा से भी खराब है ।" लड़कों के साथ ताश खेलने बेठा करते हैं ।,कभी-कभी आप सींग कटाकर बछड़े बन जाते हैं ।,लड़कों के साथ ताश खेलने बैठा करते हैं । एक दिन वेतन लेकर बार बजे रात को लौठा ; मगर देखा तो आधे दर्जन मित्र उस्त वक्त भी डटे हुए थे ।,"पहली तारीख को वेतन मिलता है, तो चोरों की तरह दबे पाँव घर आता हूँ कि कहीं कोई महाशय रुपयों की प्रतीक्षा में द्वार पर धरना जमाये न बैठे हों ! मालूम नहीं, उनकी सारी आवश्यकताएँ पहली ही तारीख की बाट क्यों जोहती रहती हैं ।",एक दिन वेतन लेकर बारह बजे रात को लौटा; मगर देखा तो आधे दर्जन मित्र उस वक्त भी डटे हुए थे । "कितने ही बहाने करूँ, उनके सामने एक नदों चलतो ।",माथा ठोंक लिया ।,"कितने ही बहाने करूँ, उनके सामने एक नहीं चलती ।" "में कहता हूँ; घर से पत्र आया है, माताजी बहुत बोमार हैं ।","कितने ही बहाने करूँ, उनके सामने एक नहीं चलती ।","मैं कहता हूँ, घर से पत्र आया है, माताजी बहुत बीमार हैं ।" "रविश पर कितने आदमी चद्॑लकद्मी कर रहे हैं, बूढ़े भी, जवान भी, सभो एक क्षण के लिए वहाँ ठिठऋ जाते हैं, एक तजर वह हक््य देखते हैं और तब चले जाते हैं ।","सुंदरियाँ पार्कों में हवा खाने आती हैं, हँसती हैं, दौड़ती हैं, फूल-पौधों से खेलती हैं, किसी का इधर ध्यान नहीं जाता; लेकिन कोई युवती रविश के किनारे वाले बेंच पर बेखबर सोये, यह बिलकुल गैर मामूली बात है, अपनी ओर बल-पूर्वक आकर्षित करने वाली ।","रविश पर कितने आदमी चहलकदमी कर रहे हैं, बूढ़े भी, जवान भी, सभी एक क्षण के लिए वहाँ ठिठक जाते हैं, एक नजर वह दृश्य देखते हैं और तब चले जाते हैं ।" "जिस केशव को उसने अपने अन्तःकरण से वर लिया था, वद्द इतना निष्ठुर हो जायगा, इसकी उसको रत्ती-भर भी आशा न थी ।",उसकी आँखों से अश्रुधार बहने लगी ।,"जिस केशव को उसने अपने अन्त:करण से वर लिया था , वह इतना निष्ठुर हो जायगा , इसकी उसको रत्ती भर भी आशा न थी ।" "मदारोलाल ने अपनी सजनता दिखाई, तो मुझे भी तो अपनी नाक रखनी है |","मैं मरूँ या जीऊँ मुझे यह संतोष तो होगा कि सुन्नी के लिए उसका बाप जो कर सकता था, वह मैंने कर दिया ।","मदारीलाल ने अपनी सज्जनता दिखाई, तो मुझे भी तो अपनी नाक रखनी है ।" "तुम्दें व माँ बनने का अवसर मिला, न पन्नो बनने का |","बोली- भैया, तुम ये बातें न समझोगे ।","तुम्हें न माँ बनने का अवसर मिला, न पत्नी बनने का ।" "शायद अब वह खुद समकने लगे थे कि मुम्के डॉटने का अधिकार उन्हें नहीं रहा, या रहा, तो बहुत कम् ।",कई बार मुझे डाँटने का अवसर पाकर भी उन्होंने धीरज से काम लिया ।,शायद अब वह खुद समझने लगे थे कि मुझे डाँटने का अधिकार उन्हें नहीं रहा; या रहा तो बहुत कम । में उनकी सहिष्णुता का अनुचित छाभ उठाने लगा ।,मेरी स्वच्छंदता भी बढ़ी ।,मैं उनकि सहिष्णुता का अनुचित लाभ उठाने लगा । "मेरे-जेंसे लुटेरे हमेशा पेदा द्ोते रहेंगे , लेकिन खुदा न करे, तुम्दारे दु्मनों को कुछ हो गया, तो यह सल्तनत खाक में मिल जायगी, और तब मुझे भो सीने में खंजर छुभा छेने के सिवा और कोई रास्ता न रहेगा ।","मेरे मर जाने पर दुनिया मेरे नाम को रोयेगी नहीं, यकीन मानो ।","मेरे जैसे लुटेरे हमेशा पैदा होते रहेंगे , लेकिन खुदा न करे, तुम्हारे दुश्मनों को कुछ हो गया, तो यह सल्तनत खाक में मिल जायगी, और तब मुझे भी सीने में खंजर चुभा लेने के सिवा और कोई रास्ता न रहेगा ।" "वहीं, उन ओठों पर एक स्फूर्ति से मरी हुई मनोद्वारिणी, ओजर्वी मुस्कान थी ।","ग्लानि, विषाद या शोक की छाया भी न थी ।","नहीं, उन ओठों पर एक स्फूर्ति से भरी हुई मनोहारिणी, ओजस्वी मुस्कान थी ।" मेरी आत्मा में इतवी शक्ति कहाँ से आ गईं; नहीं कद सकती ।,"और संध्या समय मैं पहली बार कांग्रेस के जलसे में शरीक हुई- शरीक ही नहीं हुई, मंच पर जाकर बोली, और सत्याग्रह की प्रतिज्ञा ले ली ।","मेरी आत्मा में इतनी शक्ति कहाँ से आ गयी, नहीं कह सकती ।" "ए4 पिताजी को, दूसरा ससुरणी झो ।",2 दूसरे दिन मैंने दो तार दिये ।,"एक पिताजी को, दूसरा ससुरजी को ।" कांग्रस ने पीढ़ितों के लिए एक मिशन तेयार किया ।,प्रजा मक्खियों की तरह मरने लगी ।,कांग्रेस ने पीड़ितो के लिए एक मिशन तैयार किया । माता को प्रसन्न करने के लिए ठसमे दो-चार शब्द जाति-सेवा के विषय में भी लिखे-- अब में आपकी आज्ञा फा पालन करने को तेयार हूँ ।,"जब परीक्षा-फल निकला और प्रकाश प्रथम आया, तब उसे घर की याद आयी! उसने तुरन्त करूणा को पत्र लिखा और अपने आने की सूचना दी ।",माता को प्रसन्न करने के लिए उसने दो-चार शब्द जाति-सेवा के विषय में भी लिखे— अब मै आपकी आज्ञा का पालन करने को तैयार हूँ । लढ़कोरी न होकर भी वह बच्चों के लालन-पालन में दुलारी से फुशल थी ।,"दूसरे को कई दिन से दस्त आ रहे थे, उन दोनों की औषधियों को पीसना-कूटना आदि सैकड़ों ही काम व्यस्त किए हुए थे ।",लड़कोरी न होकर भी वह बच्चों के लालन-पोषण में दुलारी से कुशल थी । "जो तुम चाद्दो कि हम आराम से पढ़े रहें और बच्चे चुपचाप बैठे रहें, हथ-पेर न हिलायें, तो यह हो नहीं सकता ।",बच्चों के साथ आदमी को बच्चा बन जाना पड़ता है ।,"जो तुम चाहो कि हम आराम से पड़े रहें और बच्चे चुपचाप बैठे रहें, हाथ-पैर न हिलायें, तो यह हो नहीं सकता ।" वह स्वभाव से बढ़े अध्ययनशील थे ।,और मेरी शालीनता इसी में थी कि उनके हुक्म को कानून समझूँ ।,वह स्वभाव से बड़े अघ्ययनशील थे । कभो-कभी एक दी नाम था शब्द या वाक्य दूस-बोस बार लिख डालते ।,"हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिड़ियों, कुत्तों, बिल्लियों की तस्वीरें बनाया करते थे ।",कभी-कभी एक ही नाम या शब्द या वाक्य दस-बीस बार लिख डालते । "दोनों ऐसा मुँह पनाये हुए थे, मानों कोई सारी विपत्ति आ पढ़ी है ।",3 फूलमती रात को भोजन करके लेटी थी कि उमा और दया उसके पास जा कर बैठ गये ।,"दोनों ऐसा मुँह बनाए हुए थे, मानो कोई भारी विपत्ति आ पड़ी है ।" "फूलमती ने चारपाई से उठते हुए कह्ा--चलो, में ऋइती हूँ, देगा केपे नहीं ?",दयानाथ ने समर्थन किया- मैंने तो उनसे इसका जिक्र ही नहीं किया ।,"फूलमती ने चारपाई से उठते हुए कहा- चलो, मैं कहती हूँ, देगा कैसे नहीं ?" "अगर किसौ संस्कार का पद्दाना करता हूँ, तो फरमाते हैं, तुम भो विचित्र जोव हो ।",लगान देने की जरूरत ही नहीं रही ।,"अगर किसी संस्कार का बहाना करता हूँ, तो फरमाते हैं, तुम भी विचित्र जीव हो ।" इन कुप्रधाओं की लब्हीर पीटना तुम्हारी शान के खिलाफ़ है ।,"अगर किसी संस्कार का बहाना करता हूँ, तो फरमाते हैं, तुम भी विचित्र जीव हो ।",इन कुप्रथाओं की लकीर पीटना तुम्हारी शान के खिलाफ है । "यहाँ के मकान हैं कि चिह्षियों के पिंजरे, न हवा, न रोशनी ।",तब मैंने चौथा हीला सोचा ।,"यहाँ के मकान हैं कि चिड़ियों के पिंजरे, न हवा, न रोशनी ।" "एक मेरे बेतकल्लफ दोष्त हैं, स्नेवहश मेरे पास बहुत देर तक बेठे रहते हैं |",लोग दरवाजों पर मोटे-मोटे लकड़ी के फट्टे या जूते या चिमटे लिये खड़े रहते हैं; फिर भी चोर इतने कुशल हैं कि आँख बचाकर अंदर पहुँच ही जाते हैं ।,"एक मेरे बेतकल्लुफ दोस्त हैं, स्नेहवश मेरे पास बहुत देर तक बैठे रहते हैं ।" "जब तक समाण की यह व्यवस्था छायम है, और युवतो कन्या का अविवाहित रहना निन्दास्पद है, तब तर यह प्रधा मिटने की नहीं ।","समाज के नेताओं का छल-प्रपंच आये दिन देखते रहते हैं, फिर भी आपकी आँखें नहीं खुलतीं ।","जब तक समाज की यह व्यवस्था कायम है और युवती कन्या का अविवाहित रहना निंदास्पद है, तब तक यह प्रथा मिटने की नहीं ।" पति के प्रगाढ़ आलिंगन में वह्द सब कुछ हँसकर छल लेगी ।,आज उन सारी विपत्तियों का अंत हो जाएगा ।,पति के प्रगाढ़ आलिंगन में वह सब कुछ हँसकर झेल लेगी । स्वागत या दुःख का एक शब्द भी उसके सुँदद से न निकछा ।,"वह फटी हुई आँखों से स्वामी की ओर टकटकी बाँधे खड़ी थी, मानो उसे अपनी आँखों पर अब भी विश्वास न आता हो ।",स्वागत या दु:ख का एक शब्द भी उसके मुँह से न निकला । "में बार-बार क्यों इनकी बातों में आ जातो हैं, इसका मुझे स्वयं आश्वय है ।","खैर, मैंने उसे रख लिया ।","मैं बार-बार क्यों इनकी बातों में आ जाती हूँ, इसका मुझे स्वयं आश्चर्य है ।" "एक रुपण देकर बाज़ार भेजूँ, तो संध्या तक हिसाब न समणा सके ।",दस तक की गिनती उसे न आती थी ।,एक रुपया देकर बाजार भेजूँ तो संध्या तक हिसाब न समझा सके । आप नद्गा-घोकर घोती छाँट रहे हैं और वह दर बैठा तमाशा देख रहा है ।,"रक्त खौलने लगता था कि दुष्ट के कान उखाड़ लूँ, मगर इन महाशय को उसे कभी कुछ कहते नहीं देखा, डाँटना तो दूर की बात है ।",आप नहा-धोकर धोती छाँट रहे हैं और वह दूर बैठा तमाशा देख रहा है । "लोग खा-पीकर चले गये, तो प्यारी दिन-भर को थकी-माँदी आँगन में एक टाढ का दुकढ़ा बिछाकर कमर सोधी करने छगी ।",बरही के दिन सारी बिरादरी का भोज हुआ ।,"लोग खा-पीकर चले गये, प्यारी दिन-भर की थकी-माँदी आँगन में एक टाट का टुकड़ा बिछाकर कमर सीधी करने लगी ।" दुलारी सौर-गृद से निकछ चुकी थो ।,नवजात पुत्र को देखने के लिए उसका चित्त व्याकुल हो रहा था ।,दुलारी सौर-गृह से निकल चुकी थी । "चलो हैं कविता करने, और कविता भो केसी ?",उस चुड़ैल के साथ रहकर तो जीवन ही नरक हो जायेगा ।,"चली हैं कविता करने, और कविता भी कैसी ?" "नशे हें प्रेम कितता सजीव हों जाता है,' इसकी परीक्षा कर लो ।",फिर हम दोनों लिपटकर सोवेंगे ।,"नशे में प्रेम कितना सजीव हो जाता है, इसकी परीक्षा कर लो ।" "न भूलता हूँ, न भूल सकता हैूँ ।","यद्यपि मेरी स्मरण-शक्ति पृथ्वी के इतिहास की सारी स्मरणीय तारीखें भूल गयीं, वह तारीखें जिन्हें रातों को जागकर और मस्तिष्क को खपाकर याद किया था; मगर विवाह की तिथि समतल भूमि में एक स्तंभ की भाँति अटल है ।","न भूलता हूँ, न भूल सकता हूँ ।" क्योंकि चित्न का दूसरा पक्ष भी तो देखता हूँ ।,"मैं उस गर्व और आनंद और महत्व का अनुभव कर सकता हूँ, जो मेरे अन्य भाइयों की भाँति मेरे हृदय में भी आंदोलित होगा, लेकिन मेरे भाग्य में वह खुशियाँ वह रंगरेलियाँ नहीं हैं ।",क्योंकि चित्र का दूसरा पक्ष भी तो देखता हूँ । "जब कोई न सुनेगा, तो हम भी कोई और राह- निकालेंगे ।","' 'हाँ, मेरे कहने से जाओ ।","जब कोई न सुनेगा, तो हम भी कोई और राह निकालेंगे ।" और बहुत भच्छा किया ।,कदाचित् उसने इस मुआमले को मेरे विवेक पर छोड़ दिया ।,और बहुत अच्छा किया । "शायद मेरे पिता को जो वेतन मिलता है, उससे ज़्यादा इन खानसाम्मों को इनाम-इकराम में मिल जाता हो ।",पैसे ईश्वरी की जेब से गये ।,"शायद मेरे पिता को जो वेतन मिलता है, उससे ज्यादा इन खानसामों को इनाम- इकराम में मिल जाता हो ।" दुर्गन्ध आ रही थो ।,उसने मुन्नी के पास जाकर नाँद में झाँका ।,दुर्गन्ध आ रही थी । खाने को डेढ़ छेर ; काम करते नानी मरती है ।,मजूर रखा है वह भी तीन कौड़ी का ।,खाने को डेढ़ सेर; काम करते नानी मरती है । भोजन पहले से अच्छा मिलता है और समय पर पिलता है ।,प्यारी ने गृहयंत्र की ऐसी चाभी कस दी थी कि सभी पुरजे ठीक-ठाक चलने लगे थे ।,भोजन पहले से अच्छा मिलता है और समय पर मिलता है । घुलिया के इन कठोर शब्दों ने घाव पर नमक छिड़क दिया ।,रग्घू को इस समय मर्मान्तक पीड़ा हो रही थी ।,मुलिया के इन कठोर शब्दों ने घाव पर नमक छिड़क दिया । चेन से गाँव में गुल्ली-डडा खेलता फिरता था ।,रग्घू की उम्र उस समय केवल दस वर्ष की थी ।,चैन से गाँव में गुल्ली-डंडा खेलता फिरता था । यहाँ तक कि आठ साल गुज़र गये और एक दिन भोला के नाम भी मृत्यु छा सन्देश आ पहुँचा ।,"सबल की शिकायतें सब सुनते हैं, निर्बल की फरियाद भी कोई नहीं सुनता! रग्घू का हृदय माँ की ओर से दिन-दिन फटता जाता था ।",यहाँ तक कि आठ साल गुजर गये और एक दिन भोला के नाम भी मृत्यु का संदेश आ पहुँचा । यह मानी हुईं बात थी ।,रग्घू अब क्यों बात पूछने लगा ?,यह मानी हुई बात थी । "जिस घर में उसने राज किया, उसमें अब लोंडी न बनेगी ।","पर कुछ भी हो, वह रग्घू की आसरैत बनकर घर में न रहेगी ।","जिस घर में उसने राज किया, उसमें अब लौंडी न बनेगी ।" गोकु ने शायद यह पत्र लिखा होगा ।,"वंशीधर ने लपककर बुढ़िया के हाथ से पत्र ले लिया, उनकी छाती आशा से धक-धक करने लगी ।",गोकुल ने शायद यह पत्र लिखा होगा । मुँद से एक शब्द भी न निकला ।,मारे भय के थर-थर काँपने लगी ।,मुँह से एक शब्द भी न निकला । दीपक को बुमते हुए देख रहा हूँ ।,जीवन की लीला समाप्त हो रही है ।,दीपक को बुझते हुए देख रहा हूँ । प्रकाश के मित्रों ने आज उसे बिदाई का भोज दिया था ।,उसे कौन समझाये कि आदित्य भी इस अवसर पर पछताने के सिवा और कुछ न कर सकते ।,प्रकाश के मित्रों ने आज उसे विदाई का भोज दिया था । "देखा, सामने कोई वहीं है ।",तब करूणा की समाधि टूटी ।,"देखा, सामने कोई नहीं है ।" करुणा पछाड़ खाकर गिर पड़ी ।,उसने देखा कि आदित्य अपनी गोद में प्रकाश की निर्जीव देह लिए खड़े हो रहे हैं ।,करूणा पछाड़ खाकर गिर पड़ी । प्रकृति में मोहिनी भरो हुई थी ।,केवट का वह सूना झोपड़ा भी आज कितना सुहावना लग रहा था ।,प्रकृति में मोहिनी भरी हुई थी । मन्दिर के सामने मुनिया राजकुमारों को खिशा रही थी ।,प्रकृति में मोहिनी भरी हुई थी ।,मन्दिर के सामने मुनिया राजकुमारों को खिला रही थी । उसने पूजा के सामान मेंगवाये और पूजा करने चली ।,"वसुधा के मन में आज कुलदेव के प्रति श्रद्धा जागृत हुई , जो बरसों से पड़ी सो रही थी ।",उसने पूजा के सामान मँगवाये और पूजा करने चली । गाँव में कितनी इलचल है ।,"आज का सूर्य देखो, कितना प्यारा, कितना शीतल है, यानी संसार को ईद की बधाई दे रहा है ।",गाँव में कितनी हलचल है । "अब इन्हीं को देखो, सारे दिन मझे जलाया करते हैं ।","इसी तरह जो लोग बाहरवालों के लिए मरते हैं, उनकी प्रशंसा घरवाले क्यों करने लगे ?","अब इन्हीं को देखो, सारे दिन मुझे जलाया करते हैं ।" शायद दुनिया को दिखाता है कि में अपने भाइयों को कितना चाहता हैँ और मन में छुरी रखो हुईं है ।,आज तो यह नयी बात है ।,शायद दुनिया को दिखाता है कि मैं अपने भाइयों को कितना चाहता हूँ और मन में छुरी रखी हुई है । लेखिकाएँ अनुराग-मय प्रोत्साहन से भरे हुए पत्र पाकर फूली न समाती ।,"जिसने ऐसी कविता की सृष्टि की है, उसके दर्शन का सौभाग्य मुझे मिला, तो अपने को धन्य मानूँगा ।",लेखिकाएँ अनुरागमय प्रोत्साहन से भरे हुए पत्र पाकर फूली न समातीं । वह तो कही कि सरकार इन्हें पूछती नहीं ।,संपादकों को कहीं सरकारी पद मिल जाय तो अंधेर मचा दें ।,वह तो कहो कि सरकार इन्हें पूछती नहीं । दोनो' मित्र निकल गये ।,' अक्टूबर की धूप तेज हो चली थी ।,दोनों मित्र निकल गये । चारों लड़के आँगन में लज्वित खड़े थे ।,पत्तलों पर खाना ज्यों-का-त्यों पड़ा हुआ था ।,चारों लड़के आँगन में लज्जित खड़े थे । कुमु३ खड़ी रो रही थी ।,देवरानियाँ सारा दोष कुमुद के सिर डालती थी ।,कुमुद खड़ी रो रही थी । "आत्मा तो उनकी रो रही है, जिन्होंने अपनी ज़िन्दगो घर को मरजाद बनाने में खराब कर दी ।",किसी को शर्म-हया तो है नहीं ।,"आत्मा तो उनकी रो रही है, जिन्होंने अपनी जिन्दगी घर की मरजाद बनाने में खराब कर दी ।" पिंजरे का द्वार खुलकर क्या उसछा स्वागत न करेगा ?,"उसमें कितना आग्रह था , कितनी लालसा थी ! अपनी उड़ान के आनन्द में डूबी हुई ; अब वह पिंजरे के द्वार पर आकर पंख फड़फड़ा रही थी ।",पिंजरे का द्वार खुलकर क्या उसका स्वागत न करेगा ? यहाँ से मोटर भेजः दी जाती ।,आराम से रेलगाड़ी से आ सकती थीं ।,यहाँ से मोटर भेज दी जाती । जंगल में मगल हो गया ।,"दोनों बालक , मुनिया, नौकर-चाकर, सभी आ गये ।",जंगल में मंगल हो गया । एक तपस्या सी कर रहे थे ।,"जरा देर के लिए स्नान और भोजन करते जाते , फिर आकर बैठ जाते ।",एक तपस्या-सी कर रहे थे । अब वह अपने को घोखा न दे सका ।,फिर खेत के चरे जाने की आहट मिली ।,अब वह अपने को धोखा न दे सका । मेरे हमजोलियों में एक रड़का गया चाम का था ।,"गुल्ली है तो जरा-सी, पर उसमें दुनिया-भर की मिठाइयों की मिठास और तमाशों का आनंद भरा हुआ है ।",मेरे हमजोलियों में एक लड़का गया नाम का था । "जिसकी तरफ़ वह आ जाय, उसकी जीत निश्चित थी ।","मालूम नहीं, उसके माँ-बाप थे या नहीं, कहाँ रहता था, क्या खाता था; पर था हमारे गुल्ली- क्लब का चैम्पियन ।","जिसकी तरफ वह आ जाए, उसकी जीत निश्चित थी ।" में रहस्य का पता लगाना चाहता था ।,"मैंने गोपा से उस वक्त कुछ न कहा, लेकिन अवसर पाते ही लाला मदारीलाल से मिला ।",मैं रहस्य का पता लगाना चाहता था । अब जाकर ज़रा शांति मिली है ।,मेरा सारा जीवन संघर्ष में कटा ।,अब जाकर जरा शांति मिली है । प्यारी का मुख लज्ञा से आरक्त हो गया ।,"बस, ऐसी औरत मिलेगी, तो करूँगा, नहीं इसी तरह पड़ा रहूँगा ।",प्यारी का मुख लज्जा से आरक्त हो गया । चारों तरफ सन्नाठा छा गया ।,"इस्लाम की यही तालीम है कि तू उन बहादुरों का इस बेदर्दी से खून बहाये, जिन्होंने इसके सिवा कोई गुनाह नहीं किया कि अपने खलीफा और मुल्क की हिमायत की ।",चारों तरफ सन्नाटा छा गया । बेचारा साहित्य को कुटिया का तपस्वी है ।,"हम तो इतना ही जानते हैं कि जो देवियाँ एकबार यहाँ आ जातीं, वह शर्माजी की अनन्य भक्त हो जातीं ।",बेचारा साहित्य की कुटिया का तपस्वी है । "चीनी में चींटे और भटे में घुन, यह नहीं देखे जाते ।","' कामतानाथ ने नि:संकोच होकर कहा- 'शरमाऊँ क्यों, किसी की चोरी की हैं ?","चीनी में चींटे और आटे में घुन, यह नहीं देखे जाते ।" "जब कोई जबाब न मिला, तो उन्होंने धीरे से उसके माथे पर हाथ रखा ।","' 'बस, चुप रहो !' यों झल्लाते हुए कुँवर साहब वसुधा के पास गये और आहिस्ता से पुकारा ।",जब कोई जवाब न मिला तो उन्होंने धीरे से उसके माथे पर हाथ रखा । वह दो साल में सिविऊ सरविस पास करके आ जायगा ।,"’ ‘ क्यों नहीं उस लडक़े से विवाह कर देते , उसमें क्या बुराई है ?",वह दो साल में सिविल सरविस पास करके आ जायगा । दो सौ ही तो साल मर के हुए ।,दस साल में दो हजार होते ही क्या हैं ।,दो सौ ही तो साल भर के हुए । घर से निकलते तो जैसे इनके प्रात निकलते दैं ।,"दस साल हो गये, एक पीतल का छल्ला नहीं बना ।",घर से निकलते तो जैसे इनके प्रान निकलते हैं । "सबका डूब जायगा, तो मेरा भी ड्ब जायगा ।","जोखू ने अपने विशाल कंधे पर फावड़ा रखते हुए कहा- जब सबका होगा, तो मेरा भी होगा ।","सबका डूब जायगा, तो मेरा भी डूब जायगा ।" "बाधा के जमाने में पाँच बीचे से कम नहीं रोपा जाता था, बिरजू भेया ने. उसमें एक-दो बीघे और बढ़ा दिये ।",मैं क्यों किसी से पीछे रहूँ ?,"बाबा के जमाने में पाँच बीघा से कम नहीं रोपा जाता था, बिरजू भैया ने उसमें एक-दो बीघे और बढ़ा दिये ।" "पहले तो दोनों सारे दिन, सुभागी के मना करने पर भी, कुछ-न-कुछ करते द्वी रहते थे ; पर अब उन्हें पूरा विश्राम था ।",4 बँटवारा होते ही महतो और लक्ष्मी को मानों पेंशन मिल गयी ।,"पहले तो दोनों सारे दिन, सुभागी के मना करने पर भी कुछ-न-कुछ करते ही रहते थे; पर अब उन्हें पूरा विश्राम था ।" सुभागी ने कुछ रुपये बचाकर एक जैंस के ली ।,पहले दोनों दूध-घी को तरसते थे ।,सुभागी ने कुछ रुपये बचाकर एक भैंस ले ली । दकान खोलना व्यर्थ था ।,"उसकी जबान से जो धमकी निकल गयी, उस पर उसे घोर पश्चात्ताप हुआ; लेकिन तीर कमान से निकल चुका था ।",दुकान खोलना व्यर्थ था । "चौधरी के घर में इस समय एक रुपया भी नहीं है, यह विश्वास करने की बात न थी ।",झुनिया चकरा गयी ।,"चौधरी के घर में इस समय एक रूपया भी नहीं है, यह विश्वास करने की बात न थी ।" हम दोनों में परस्पर बहसें होती रहतो थीं ।,"ईश्वरी एक बड़े जमींदार का लड़का था और मैं एक गरीब क्लर्क का, जिसके पास मेहनत-मजूरी के सिवा और कोई जायदाद न थी ।",हम दोनों में परस्पर बहसें होती रहती थीं । इसी को उसने अपनी जीविका का साधन घनाया ।,"वह कृषक की बेटी थी, और गो-पालन उसके लिए कोई नया व्यवसाय न था ।",इसी को उसने अपनी जीविका का साधन बनाया । वह सदेव उनकी उपस्थिति का अनुभव किया करतो है ।,निरंतर पति-चिन्तन ने आदित्य को उसकी आँखों में प्रत्यक्ष कर दिया है ।,वह सदैव उनकी उपस्थिति का अनुभव किया करती है । एक भिखारिन द्वार पर आकर भोख माँगने लगो ।,संध्या हो गयी थी ।,एक भिखारिन द्वार पर आकर भीख माँगने लगी । "गरीबी आदमी से जो चाहे, करावे ।",उसी बाँह गहे की लाज तो निभा रहे हो ।,गरीबी आदमी से जो चाहे करावे । एकाएक युवक चेनसिंह सामने से आता हुआ दिखाई दिया ।,"मुलिया सिर पर झौआ रक्खे घास छीलने चली, तो उसका गेहुआँ रंग प्रभात की सुनहरी किरणों से कुंदन की तरह दमक उठा ।",एकाएक युवक चैनसिंह सामने से आता हुआ दिखाई दिया । चेनसिंह को आज जीवन में एक नया जनुभव हुआ ।,"वह जरा भी नहीं डरी, जरा भी न झिझकी, झौआ जमीन पर गिरा दिया, और बोली- मुझे छोड़ दो, नहीं मैं चिल्लाती हूँ ।",चैनसिंह को आज जीवन में एक नया अनुभव हुआ । वस्ुधा ने आज सुबह से उन्हें प्यार न किया था ।,"यह नहीं कि हलवाई की दुकान देखी और दादे का फातिहा पढ़ने बैठ गये ! वह चली, तो दोनों बच्चे कुनमुनाये, मगर जब मालूम हुआ, कि अम्माँ बड़ी दूर हौआ को मारने जा रही हैं तो उनका यात्रा-प्रेम ठण्डा पड़ा ।",वसुधा ने आज सुबह से उन्हें प्यार न किया था । अच्छे बालकों से भगवान्‌ को भी तो प्रेम है ।,"सुभागी ग्यारह साल की बालिका होकर भी घर के काम में इतनी चतुर, और खेती-बारी के काम में इतनी निपुण थी कि उसकी माँ लक्ष्मी दिल में डरती रहती कि कहीं लड़की पर देवताओं की आँख न पड़ जाय ।",अच्छे बालकों से भगवान को भी तो प्रेम है । उन्हें रोते देखकर सुभागी भी रोती थो ।,तुलसी सिर पीटते थे ।,उन्हें रोते देखकर सुभागी भी रोती थी । ऐसा तो पागल काते हैं ।,"वह सोचती थी ईश्वर तुम्हारी यही लीला है ! जो खेल खेलते हो, वह दूसरों को दु:ख देकर ।",ऐसा तो पागल करते हैं । ऐपा खेल किस काम का कि दूसरे रोये और तुम हँसो ।,"आदमी पागलपन करे तो उसे पागलखाने भेजते हैं; मगर तुम जो पागलपन करते हो, उसका कोई दंड नहीं ।",ऐसा खेल किस काम का कि दूसरे रोयें और तुम हँसो । गाँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ छा रहे हैं |,अमीना का दिल कचोट रहा है ।,गाँव के बच्चे अपने-अपने बाप के साथ जा रहे हैं । आठ आने पेसे मिले थे ।,उस दिन फहीमन के कपड़े सिले थे ।,आठ आने पैसे मिले थे । फिर अब पौरुख भी तो थक रहा है ।,"मथुरा- इतने दिन खेती करते हो गये, जब अब तक न बनी, तो अब क्या बन जायगी! इस तरह एक दिन चल देंगे, मन-की-मन में रह जायगी ।",फिर अब पौरूख भी तो थक रहा है । यह खेती कौन सेभालेगा ।,फिर अब पौरूख भी तो थक रहा है ।,यह खेती कौन संभालेगा । तुम्दारे लिए इम बराबर खरच-बरच भेजते रहेंगे ।,"भगवान ने चाहा, तो घर फिर संभल जायगा ।",तुम्हारे लिए हम बराबर खरच-बरच भेजते रहेंगे । बच्चों के बिना इनका जी भरी चहाँ न लगेगा ।,"दुलारी बोली- यह कैसे हो सकता है बहन, यहाँ देहात में लड़के क्या पढ़े-लिखेंगे ।",बच्चों के बिना इनका जी भी वहाँ न लगेगा । "परदेश में अकेले जितना खरच होगा, उतने में सारा घर जआाराम से रहेगा ।",दौड़-दौड़कर घर आयेंगे और सारी कमाई रेल खा जायगी ।,"परदेश में अकेले जितना खरचा होगा, उतने में सारा घर आराम से रहेगा ।" तुम तो कुछ-न-कुछ देख-भाल करतो ही रहोगी ।,"बोली- बहन, तुम चलतीं तो क्या बात थी, लेकिन फिर यहाँ का कारोबार तो चौपट हो जायगा ।",तुम तो कुछ-न-कुछ देखभाल करती ही रहोगी । पत्तल एक-पर- एक रखे हुए हैं ।,किसी तरह यह बला सिर से टले और चैन से सोयें! लोग कितने सटकर बैठे हुए हैं कि किसी को हिलने की भी जगह नहीं ।,पत्तल एक-पर-एक रखे हुए हैं । "सहया शोर मचा, तरकारियों में नमक नहीं ।",यही सब बातें नाक काटने की हैं ।,"सहसा शोर मचा, तरकारियों में नमक नहीं ।" मेहमानों को वही नल का गरम पानी पीना पढ़ा ।,आदमी खाली हाथ लौट आया ।,मेहमानों को वही नल का गरम पानी पीना पड़ा । "फूलमती का बस चलता, तो लड़कों का मुँइ नोच लेती ।",मेहमानों को वही नल का गरम पानी पीना पड़ा ।,"फूलमती का बस चलता, तो लड़कों का मुँह नोच लेती ।" उस पर सब मालिक बनने के लिए मरते हैं |,ऐसी छीछालेदर उसके घर में कभी न हुई थी ।,उस पर सब मालिक बनने के लिए मरते हैं । छोटे-बढ़े सब बराबर ।,एक महाशय बोले- ऐसा न्याय तो किसी राज्य में नहीं देखा ।,छोटे-बड़े सब बराबर । इस परेशानी में कोई काम नहीं हो रहा ऐ ।,"गाड़ी नौ बजे आती है, अभी साढ़े आठ हैं, साढ़े नौ बजे तक यहाँ आ जायेगी ।",इस परेशानी में कोई काम नहीं हो रहा है । तुलवी चिलम के भक्त थे ।,"रात को कभी माँ के सिर में तेल डालती, कभी उसकी देह दबाती ।",तुलसी चिलम के भक्त थे । उन्हें बार- बार चिलम पिलाती ।,तुलसी चिलम के भक्त थे ।,उन्हें बार-बार चिलम पिलाती । "दाँ, भाई को न रोकती ।","जहाँ तक अपना बस चलता, माँ-बाप को कोई काम न करने देती ।","हाँ, भाई को न रोकती ।" मेरे प्राण सूखते जाते ये ।,खुफिया ने पिंड न छोड़ा ।,मेरे प्राण सूखते जाते थे । "एक दिन शाम को ज्ञान बाबू आये, तो घबढ़ाये हुए थे ।",ऐसी दशा में यहाँ रहना मुझे अनुचित मालूम होता था; पर देवीजी से कुछ कह न सकती थी ।,"एक दिन शाम को ज्ञान बाबू आये, तो घबड़ाये हुए थे ।" कुआँ दूर था; बार-बार जाना मुश्किल था ।,गला सूखा जा रहा है और तू सड़ा पानी पिलाये देती है ! गंगी प्रतिदिन शाम पानी भर लिया करती थी ।,"कुआँ दूर था, बार-बार जाना मुश्किल था ।" क्या कोई तुम्दारे मुँह में कौर ढाल देता ?,बड़े- तुम खुद खाने नहीं गये ।,क्या कोई तुम्हारे मुँह में कौर डाल देता ? "पहले खुद मरज़ पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए; तो दिसी डाक्टर को चुलायेंगे ।","दादा को तार देने के सिवा तुम्हें और कुछ न सूझेगा; लेकिन तुम्हारी जगह पर दादा हों, तो किसी को तार न दें, न घबरायें, न बदहवास हों ।","पहले खुद मरज पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डाक्टर को बुलायेंगे ।" मांता के स्नेह पर उसे विश्वास था ।,वह गुप्त रूप से प्रेमा से विवाह कर लेना चाहता था! बाप हमेशा तो बैठे न रहेंगे ।,माता के स्नेह पर उसे विश्वास था । उसका जोवन ही नष्ट हो जायगा ।,"अगर वह अपनी जिद पर अड़ा और पिता ने भी अपनी टेक रखी , तो उसका कहाँ ठिकाना लगेगा ?",उसका जीवन ही नष्ट हो जायगा । उनका भोग-विलास जीवन के इस कठोर व्रत में जेसे बुत गया ।,"वसुधा के पास बैठने , उससे कुछ बातें करके उसका मन बहलाने, दवा और पथ्य बनाने में ही उन्हें आनन्द मिलता था ।",उनका भोग-विलास जीवन के इस कठोर व्रत में जैसे बुझ गया । फिर वसुधा को हथेली पर रेखाएं बनाने लगे ।,शायद कुछ बोला ही न गया ।,फिर वसुधा की हथेली पर रेखाएँ बनाने लगे । बहाने सत करने लगना ।,मैं मानूँगी नहीं ।,बहाने मत करने लगना । शिकार में वही सूट पदनते थे ।,ओढ़ना और बिछौना भी खालों ही का था ! बाघम्बरों के कई सूट बनवा रखे थे ।,शिकार में वही सूट पहनते थे । "मानी एक सुफेद साड़ी पहनकर ताँगे पर बेठी, तो उसका हृदय काप रहा था और बार-बार आँखों में आँसू भर आते थे ।","गोकुल की माँ ने कहा- चली क्यों नहीं जाती, क्यार वहाँ कोई पहाड़ खोदना है ?","मानी एक सफेद साड़ी पहनकर ताँगे पर बैठी, तो उसका हृदय काँप रहा था और बार-बार आँखों में आँसू भर आते थे ।" गोकुल ने कहा--तू पागल है ।,"घर चलो, तुम्हारे पैर पड़ती हूँ ।",गोकुल ने कहा- तू पागल है । "केशव नये विचारों का युवक था, जात-पाँत के बन्धर्नों का विरोधी ।",दोनों एक ही कालेज के और एक ही क्लास के विद्यार्थी थे ।,"केशव नये विचारों का युवक था , जात-पाँत के बन्धनों का विरोधी ।" "प्रेमा पुराने संस्कारों छी क़ायल थो, पुरानी मर्यादाओं और प्रथाओं में पूरा विध्वास रखनेवाली ; लेकिन फिर भी दोनों में गाढ़ा प्रेम हो गया था ।","केशव नये विचारों का युवक था , जात-पाँत के बन्धनों का विरोधी ।","प्रेमा पुराने संस्कारों की कायल थी , पुरानी मर्यादाओं और प्रथाओं में पूरा विश्वास रखनेवाली ; लेकिन फिर भी दोनों में गाढ़ा प्रेम हो गया था ।" उसे अपने साता-पिता की परवाह न थी ।,केशव ब्राह्मण होकर भी वैश्य कन्या प्रेमा से विवाह करके अपना जीवन सार्थक करना चाहता था ।,उसे अपने माता-पिता की परवाह न थी । और अब उसके जीवन छा कोई आधार न था ।,"उसके वसंत का सुनहरा स्वप्न ही उसका जीवन था उसमें कोपलें निकलेंगी, फूल खिलेंगे, फल लगेंगे, चिड़िया उसकी डाली पर बैठकर अपने सुहाने राग गावेंगी, किन्तु आज निष्ठुर नियति ने उस जीवन सूत्र को उखा्ड़कर फेंक दिया ।",और अब उसके जीवन का कोई आधार न था । तो इसे यह शोद-समाचार मिल चुका है ।,मैं विस्मय से गोपा का मुँह देखने लगा ।,तो इसे यह शोक-समाचार मिल चुका है । मेरा मौन कद्द देता था कि मुम्के अपना अपराध स्वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि स्नेह और रोष से मिल्ठे हुए शब्दों में मेरा सत्कार करें ।,न जाने मुँह से यह बात क्यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा था ।,मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि स्नेह और रोष से मिले हुए शब्दों में मेरा सत्कार करें । "और में कहता हूँ, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नहीं छेते ।","बड़े-बड़े विद्वान भी शुद्ध अंग्रेजी नहीं लिख सकते, बोलना तो दूर रहा ।","और मैं कहता हूँ, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नहीं लेते ।" में पास नहीं फटकता ।,"इतने मेले-तमाशे होते है, मुझे तुमने कभी देखने जाते देखा है, रोज ही क्रिकेट और हाकी मैच होते हैं ।",मैं पास नहीं फटकता । "अगर तुम्हें इस तरह उम्र गँवानी है, तो बेहतर है, घर चले जाओ और मजे पे गुल्ली-डंडा खेलों ।","मुझे तो दो-ही-तीन साल लगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पड़े सड़ते रहोगे ।","अगर तुम्हें इस तरह उम्र गँवानी है, तो बेहतर है, घर चले जाओ और मजे से गुल्ली-डंडा खेलो ।" रामप्यारी और रामदुलारी दो सगो बहने थीं ।,"बिरजू गया, तो अभी बैठा ही हुआ हूँ ।",रामप्यारी और रामदुलारी दो सगी बहनें थीं । "आप भी अपमान करते हैं, वह भो अपमान करते -हैं ।",नतीजा एक है ।,"आप भी अपमान करते हैं, वह भी अपमान करते हैं ।" "अगर मेरा काम संतोष के लायक न ही, तो एक महीने के बाद घुझे निकाल दोजिएगा ।",इससे ज्यादा अपनी गरीबी का और क्या प्रमाण दूँ ।,"अगर मेरा काम संतोष के लायक न हो, तो एक महीने के बाद मुझे निकाल दीजिएगा ।" एक बाग एक गहना बनवाने को दिया ।,एक चुप सौ बाधाओं को हराती है ?,एक बार एक गहना बनवाने को दिया । "खर, सूखा जवाब न दो ।",आपसे मित्रों को सूखा जवाब नहीं दिया जाता ।,"खैर, सूखा जवाब न दो ।" तेरे सिवा कोह और उसे भाती ही नहीं ।,पन्ना— वह तुझी पर दाँत लगाये बैठा है ।,तेरे सिवा कोई और उसे भाती ही नहीं । "बाप से ज़िद भो करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता ।",घर पहुँचने की जल्दी हो रही है ।,"बाप से जिद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता ।" "वह भजेय है, घातक है ।","एक ओर मिट्टी है, दूसरी ओर लोहा, जो इस वक्त अपने को फौलाद कह रहा है ।","वह अजेय है, घातक है ।" "जब वह रात को लेटती, तो चारों बारी-बारी से उसके पाँव दबातों, वह स्नान करके उठती, तो उसकी साढ़ी छांटतीं |","चारों लड़के एक-से-एक सुशील,चारों बहुएँ एक-से-एक बढ़कर आज्ञाकारिणी ।","जब वह रात को लेटती, तो चारों बारी-बारी से उसके पाँव दबातीं; वह स्नान करके उठती, तो उसकी साड़ी छाँटतीं ।" उसी की तेयारियाँ हो रही थीं ।,बिरादरी के लोग निमंत्रित होंगे ।,उसी की तैयारियाँ हो रही थीं । "शाक-भाजी के टोकरे, शक्कर की बोरियाँ, दह्दी के मठके चले आ रहे हैं ।",घी के टिन आ रहे हैं ।,"शाक-भाजी के टोकरे, शक्कर की बोरियाँ, दही के मटके चले आ रहे हैं ।" कोई दिलेर आदमो बेरहम नहीं हो सकता ।,"वह दिलेर है, मगर बेरहम नहीं ।",कोई दिलेर आदमी बेरहम नहीं हो सकता । उसके सामोप्य में उसे स्वर्ग का-सा सुख मिलता है ।,"वह चाहता है, हबीब आठों पहर उसके पास रहे ।",उसके सामीप्य में उसे स्वर्ग का-सा सुख मिलता है । "सुन्बी ने वही किया, जो उसे करना चाहिए था ।","मैंने तुम्हारी चारपाई बिछा दी है, मगर देखो, अकेले पड़े-पड़े रोना नहीं ।","सुन्नी ने वही किया, जो उसे करना चाहिए था ।" अभी तक उ्तके द्वार पर स्यापा हो रहा था ।,5 छकौड़ी घर पहुँचा तो अंधेरा हो गया था ।,अभी तक उसके द्वार पर स्यापा हो रहा था । "रात-भर मच्छरों से लता हूँ, दिन-भर मक्खियों से ।",बस यही समझ लो कि मौत हरदम सिर पर खेलती रहती है ।,"रात-भर मच्छरों से लड़ता हूँ, दिन-भर मक्खियों से ।" * यह कहता हुआ वह आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियाँ न सुने ।,‘ हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा- तीन पैसे लोगे ?,यह कहता हुआ वह आगे बढ़ गया कि दुकानदार की घुड़कियाँ न सुने । "दो लड़के भगवान के दिये हैं, और क्या चाहिए ।","जब भैया जैसे आदमी का मिजाज बदल गया, तो फिर दूसरों की क्या गिनती ?",दो लड़के भगवान के दिये हैं और क्या चाहिए । "छड़के का दिल मुलिया पर आया हुआ है , पर सकोच और भय के मारे कुछ नहीं कहता ।",पन्ना केदार के मन की बात समझ गयी ।,"लड़के का दिल मुलिया पर आया हुआ है, पर संकोच और भय के मारे कुछ नहीं कहता ।" एक न-एक मेहमान रोज़ यमराज की भाँति सिर पर सवार रहते हैं ।,मेरी तो नाक में दम आ गया ।,एक-न-एक मेहमान रोज यमराज की भाँति सिर पर सवार रहते हैं । ईश्वर की दया से इनके सभी मित्र इसो श्रेणी के हैं ।,"इन्हें इतनी समझ भी नहीं, कि जब घर की यह दशा है; तो क्यों ऐसों को मेहमान बनायें, जिनके पास कपड़े-लत्ते तक नहीं ।",ईश्वर की दया से इनके सभी मित्र इसी श्रेणी के हैं । "दोस्ती गाँठगे ऐसों से, जिनके घर में खाने का ठिकाना नहीं ।",उनके पास जाते इनकी आत्मा दुखती है ।,"दोस्ती गाँठेंगे ऐसों से, जिनके घर में खाने का ठिकाना नहीं ।" इधर मिस खुरशेद और युवक में बातें दोने लगीं ।,जुगनू तो यहाँ से सीधे मिसेज टंडन के घर पहुँची ।,इधर मिस खुरशेद और युवक में बातें होने लगीं । दोनों में पहले से कुछ बातचीत रही दोगी ।,"एक देवी ने पूछा- यह युवक है कौन ! मिसेज टंडन- सुना तो, उनके साथ का पढ़ा हुआ है ।",दोनों में पहले से कुछ बातचीत रही होगी । "न भूख थो, न प्यास ।","दोपहर हुआ, करुणा ने सिर न उठाया ।","न भूख थी, न प्यास ।" तुम्दीं ने मेरी कोख से नहीं जन्म लिय है ।,अपनी इच्छा से खर्च करूँगी ।,तुम्हीं ने मेरी कोख से नहीं जन्म लिया है । में कुरसी पर पाँव लटकाये बैठा था ।,"ज्यों ही स्वराज्य हुआ, अपने इलाके असामियों के नाम हिब्बा कर देंगे ।",मैं कुरसी पर पाँव लटकाये बैठा था । गाँव के बहुत-से लोग इम लोगों को पहुँचाने आये ।,5 छुट्टी इस तरह तमाम हुई और हम फिर प्रयाग चले ।,गाँव के बहुत-से लोग हम लोगों को पहुँचाने आये । "जी तो चाहता था, हरेक नौकर को अच्छा इनाम दूँ; लेकिन वह सामर्थ्य कहाँ थी ?",मैनें भी अपना पार्ट खूब सफाई से खेला और अपनी कुबेरोचित विनय और देवत्व की मुहर हरेक हृदय पर लगा दी ।,"जी तो चाहता था, हरेक नौकर को अच्छा इनाम दूँ, लेकिन वह सामर्थ्य कहाँ थी ?" यद आखिरी गाड़ी थी ।,इंटर क्लास की हालत उससे भी बदतर ।,यह आखिरी गाड़ी थी । "कोई चौज़ इतनी कम बमेगी कि किसी पत्तल पर पहुँचेगी, किसी पर नहीं ।",कोई चीज तो इतनी बन जायेगी कि मारी-मारी फिरेगी ।,"कोई चीज इतनी कम बनेगी कि किसी पत्तल पर पहुँचेगी, किसी पर नहीं ।" इस वक्त विगड़ने का अवसर न था ।,"जाकर मरदों से पूछो! मुझे हुक्म मिला, रूपये लाकर दे दो, रूपये लिये जाती हूँ!’ फूलमती खून का घूँट पीकर रह गयी ।",इस वक्त बिगड़ने का अवसर न था । इनकी सारी चौकढ़ी भुला देगी ।,"तब देखेगी, कौन उसके सामने आता है और क्या कहता है ।",इनकी सारी चौकड़ी भुला देगी । "सारी परिस्थिति को गिद्ध-दृष्टि से देख रही थो, कहाँ सत्कार का कौन-सा नियम भग होता है, कहाँ मर्या- दाओं की उपेक्षा की जाती है ।",किन्तु कोठरी के एकांत में भी वह निश्चिंत न बैठी थी ।,"सारी परिस्थिति को गिद्घ दृष्टि से देख रही थी, कहाँ सत्कार का कौन-सा नियम भंग होता है, कहाँ मर्यादाओं की उपेक्षा की जाती है ।" आँगन में मुश्किल से दो सौ आदमी बंठ सकते हैं ।,सारी बिरादरी एक साथ पंगत में बैठा दी गयी ।,आँगन में मुश्किल से दो सौ आदमी बैठ सकते हैं । ये पाँच सौ आदमी इतनी-सी जगह में केसे बेठ जायेंगे ?,आँगन में मुश्किल से दो सौ आदमी बैठ सकते हैं ।,ये पाँच सौ आदमी इतनी-सी जगह में कैसे बैठ जायेंगे ? "मथुरा मज़दूर तो अच्छा था, संचालक अच्छा न था ।",खेती का काम मजदूरों पर आ पड़ा ।,"मथुरा मजदूर तो अच्छा था, संचालक अच्छा न था ।" खुद पहले भाई कौ निगरानी में काम 'करता रहा ।,उसे स्वतंत्र रूप से काम लेने का कभी अवसर न मिला ।,खुद पहले भाई की निगरानी में काम करता रहा । खेती का तार भो न जानता था ।,बाद को बाप की निगरानी में काम करने लगा ।,खेती का तार भी न जानता था । स्वामित्व का गौरव इन सारे जख्मों पर मरहम का काम करता या ।,"तीस वर्ष की अवस्था में उसके बाल पक गये, कमर झुक गयी, आँखों की जोत कम हो गयी; मगर वह प्रसन्न थी ।",स्वामित्व का गौरव इन सारे जख्मों पर मरहम का काम करता था । एक दिन पन्ना ने महुए का सुखाबन डाला ।,बकरे की माँ कब तक खैर मनायेगी ?,एक दिन पन्ना ने महुए का सुखावन डाला । युलिया का वार खाली गया ।,"पन्ना ने साड़ी उतारकर रख दी, नहाने न गयी ।",मुलिया का वार खाली गया । "बह्दादुर वह है, जो अपने बल पर काम करे ।",दूसरों के बल पर वाहवाही लेना आसान है ।,"बहादुर वह है, जो अपने बल पर काम करे ।" बेचारी का घर में रहता मुर्किल कर दिया ।,मेरे पीछे जो चाहे करना ।,बेचारी का घर में रहना मुश्किल कर दिया । "तुम चाहे छूट जाव, छुभागी नहीं छूट सकतो ।",मैं कल गाँव के आदमियों को बुलाकर बँटवारा कर दूँगा ।,"तुम चाहे छूट जाव, सुभागी नहीं छूट सकती ।" "वह रोने लगा, फूट फूटकर रोने लगा ।",ऐसा जान पड़ा मानो माता ने उसे छाती से लगा लिया है और उसके सिर पर हाथ फेर रही है ।,"वह रोने लगा, फूट-फूटकर रोने लगा ।" कोई उसे पानी को भी नहों पूछता ।,"देखो, तुम्हारे प्यारे लाल की क्या दशा हो रही है ?",कोई उसे पानी को भी नहीं पूछता । "थके-माँदे मज़दूर तो सो चुके थे, ठाकुर के दरवाज़े पर दस-पाँच बेफिक्र जमा थे ।",2 रात के नौ बजे थे ।,"थके-माँदे मजदूर तो सो चुके थे, ठाकुर के दरवाजे पर दस-पाँच बेफिक्रे जमा थे ।" "चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकश्मे ये करें ।","यहाँ तो जितने है, एक- से-एक छँटे हैं ।","चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें ।" "काम करा लेते हैं, मजूरी देते नानो मरती है ।",यही साहू जी तो घी में तेल मिलाकर बेचते है ।,"काम करा लेते हैं, मजूरी देते नानी मरती है ।" इसे अपने कमरे में लठकाने को रखे हुए थे ।,कुँवर साहब की यह सबसे बहुमूल्य वस्तु थी ।,उसे अपने कमरे में लटकाने को रखे हुए थे । प्रात काल केशव का जवाब आया ।,"इतने प्रमाणों के होते हुए निराशा के लिए कहाँ स्थान था , मगर फिर भी सारी रात उसका मन जैसे सूली पर टँगा रहा ।",प्रात:काल केशव का जवाब आया । प्रेम्रा ने काँपते हुए हाथों से पत्र लेकर पढ़ा ।,प्रात:काल केशव का जवाब आया ।,प्रेमा ने काँपते हुए हाथों से पत्र लेकर पढ़ा । जोखू अब कुछ दिनों से काम में मन लगाने छगा था ।,कल का झंझट कौन रखे ?,जोखू अब कुछ दिनों से काम में मन लगाने लगा था । सुभागी अब क्या करे ! ठाकुर स्ाइब के रुपये चकाने के लिए दिलोजान से काम करने की ज़रूरत थी ।,दुर्बलता ने जल्द ही खाट पर डाल दिया ।,सुभागी अब क्या करे ! ठाकुर साहब के रुपये चुकाने के लिए दिलोजान से काम करने की जरूरत थी । शेर के और उसके बीच में दो हाथ से ज़्यादा अन्तर न था ।,उसने अपनी बन्दूक सॅभाली ।,शेर के और उसके बीच में दो हाथ से ज्यादा अन्तर न था । उसकी मूर्च्छा दी चेतना का काम कर रही थी ।,"इस वक्त कोई उसकी देह में भाला भी चुभा देता , तो उसे खबर न होती ! वह अपने होश में न थी ।",उसकी मूर्च्छा ही चेतना का काम कर रही थी । इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुईं ।,"मोहसिन की छोटी बहन ने दौड़कर भिश्ती उसके हाथ से छीन लिया और मारे खुशी के जा उछली, तो मियाँ भिश्ती नीचे आ रहे और सुरलोक सिधारे ।",इस पर भाई-बहन में मार-पीट हुई । अदालतों में खत की टट्टियाँ और बिजली के पंखे रहते हैँ ।,नूरे ने उन्हें पंखा झलना शुरू किया ।,अदालतों में खस की टट्टियाँ और बिजली के पंखे रहते हैं । नूरे ने यह टोकरी उठाई और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे ।,"एक टोकरी आयी, उसमें कुछ लाल रंग के फटे-पुराने चिथड़े बिछाये गये, जिसमें सिपाही साहब आराम से लेटे ।",नूरे ने यह टोकरी उठायी और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे । "वही घर जिससे वह एक दिन विरफ्त हो गया था, अब गोद फंलाये उसे आश्रय देने को तेयार था ।","बीमारी का जोर कम हो चला था; अब उस पर मामूली दवा भी असर कर सकती थी, किले की दीवारें छिद चुकी थीं, अब उसमें घुस जाना असह्य न था ।","वही घर जिससे वह एक दिन विरक्त हो गया था, अब गोद फैलाये उसे आश्रय देने को तैयार था ।" तुम्दारी अम्माँ से मेरा बहन का गाता है ।,"मुझे एक रोटी दे देना, खाकर एक कोने में पड़ी रहूँगी ।",तुम्हारी अम्माँ से मेरा बहन का नाता है । यह लोग क्यों इतना घीरे-धीरे चल रहे हैं ।,फिर किसी पेड़ के नीचे खड़े होकर साथ वालों का इंतज़ार करते ।,यह लोग क्यों इतना धीरे-धीरे चल रहे हैं ? माली को केसा उल्लू बनाया है ।,खूब हँस रहे हैं ।,माली को कैसा उल्लू बनाया है । इस जगह भो उसी तरह के लोग होंगे और क्या ।,"रोज मार खाते हैं, काम से जी चुराने वाले ।",इस जगह भी उसी तरह के लोग होंगे ओर क्या । पाँच घड़े तो तेरी भैस पी जाती है ।,"ज़रा-सा बैट पकड़ लेंगी, तो हाथ काँपने लगेंगे! सैकड़ों घड़े पानी रोज निकालती हैं ।",पाँच घड़े तो तेरी भैंस पी जाती है । तरह-तरद् के कुत्सित भाव मन में आ रहे थे ।,क्या जानता था कि यह विपत्ति झेलनी पड़ेगी नहीं विवाह का नाम ही न लेता ।,तरह-तरह के कुत्सित भाव मन में आ रहे थे । "बहू उनके पाँव नहीं दबातौ, उनके सिर में तेल नहीं डालती, तो इसमें मेरा क्या दोष ?","कोई बात नहीं, अम्माँ मुझे परेशान करना चाहती हैं ।","बहू उनके पाँव नहीं दबाती, उनके सिर में तेल नहीं डालती, तो इसमें मेरा क्या दोष ?" इससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं हो जाता ।,कभी-कभी गुल्ली-डंडे में भी अंधा-चोट निशाना पड़ जाता है ।,उससे कोई सफल खिलाड़ी नहीं हो जाता । "पूछिए, इपसे प्रयोजन ?","इस रेखा पर वह लंब गिरा दो, तो आधार लंब से दुगुना होगा ।","पूछिए, इससे प्रयोजन ?" "आज यदि विधाता इनके बदले मुझे कोई विद्या और बुद्धि का पुतछा, रूप और घन का देवता भो दे, तो में उसको ओर आँखें उठाछर न देखूँ ।","वह जरा मामूली सी देर में घर आते हैं, तो प्राण नहों में समा जाते हैं ।","आज यदि विधाता इनके बदले मुझे कोई विद्या और बुद्धि का पुतला, रूप और धन का देवता भी दे, तो मैं उसकी ओर आँखें उठाकर न देखूँ ।" मुझे तो इस बात से खुशी हो रही है कि सला इममें कोई तो त्याग करने योग्य है ।,दयानाथ बोल उठे- तो इसमें आप लोगों का क्या नुकसान है ?,"मुझे तो इस बात से खुशी हो रही है कि भला, हममें कोई तो त्याग करने योग्य है ।" वह केवल इसलिए जीती थी छि मौत न आती थी ।,"घर के किसी प्राणी, किसी वस्तु, किसी प्रसंग से उसे प्रयोजन न था ।",वह केवल इसलिए जीती थी कि मौत न आती थी । "दयानाथ का प्रेस खुला, फिर जलता हुआ ।","उमानाथ का औषधालय खुला, मित्रों की दावत हुई, नाच-तमाशा हुआ ।","दयानाथ का प्रेस खुला, फिर जलसा हुआ ।" आसमान की ओर टकडकी लगी थी और आंखों से आँसू बह रहे थे ।,रग्घू वहीं मूर्ति की तरह बैठा रहा ।,आसमान की ओर टकटकी लगी थी और आँखों से आँसू बह रहे थे । और फिए अपने कमरे में जाकर विचारों में डूब गये ।,लाला जी ने दृढ़ता से कहा — आने दो ।,और फिर अपने कमरे में जाकर विचारों में डूब गये । ऐसो दशा में हमारे लिए और क्या उपाय है ।,"तुमने भी समझाया , मैंने भी समझाया , दूसरों ने भी समझाया ; पर उस पर कोई असर ही नहीं होता ।",ऐसी दशा में हमारे लिए और क्या उपाय है । जिनको गोद में खेलाया वही अब मेरे पट्टीदार होंगे ।,मैंने ही तो इसे मर-मर जोड़ा ।,"जिनको गोद में खेलाया, वहीं अब मेरे पट्टीदार होंगे ।" "रग्घू- देख, अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है ।","मुलिया— मैं कसम रखा दूँगी, नहीं चुपके से चले चलो ।","रग्घू— देख, अब भी कुछ नहीं बिगड़ा है ।" लोग आपस में गले मिल रहे हैँ ।,2 नमाज खत्म हो गयी है ।,लोग आपस में गले मिल रहे हैं । इधर दुकानों की कतार लगी हुई है ।,अब खिलौने लेंगे ।,इधर दूकानों की कतार लगी हुई है । भम्माँ खुद समझदार हैं ।,"अम्माँ ने मेरी बहन के घर तीजा भेजन के लिए जिन सामानों की सूची लिखायी, वह पत्नी जी को घर की स्थिति देखते हुए अधिक मालूम हुई ।",अम्माँ खुद समझदार हैं । दोनों लड़के तो बचपन में ही दया दे गये थे ।,"पहले एक लड़की हुई थी, इसके बाद दो लड़के हुए ।",दोनों लड़के तो बचपन में ही दगा दे गये थे । दो-तीन साल में लड़की का विवाह सी करना होगा ।,जिस तरह का इनका जीवन था उसको देखते इस छोटे से परिवार के लिए दो सौ रूपये महीने की जरूरत थी ।,दो-तीन साल में लड़की का विवाह भी करना होगा । विदेश से लौटकर में सीधा दिल्लो पहुँचा ।,मुझे पीछे ज्ञात हुआ कि गोपा ने मुझे भी गैर समझा और वास्तविक स्थिति छिपाती रही ।,विदेश से लौटकर मैं सीधा दिल्ली पहुँचा । यह नहीं कि हरदम छाती पर सवार |,"एक ने कहा- मालिक इस तरह रहे, तो काम करने में जी लगता है ।",यह नहीं कि हरदम छाती पर सवार । पहला-- तुम तो हो गोबर-गनेस ।,चौथा- साँझ को पूरी मजूरी मिले तो कहना ।,पहला- तुम तो हो गोबर-गनेस । "जिम्न मेहतर को आपने अपना कोट दिया, उसे मेंने कई बार रात को शराब के नशे में मस्त झूमते देखा है और आपको दिखा भी दिया है ।","मैं इन्हें परोपकारी नहीं समझती, न विनीत ही समझती हूँ, यह जड़ता है, सीधी-सादी निरीहता ।","जिस मेहतर को आपने अपना कोट दिया, उसे मैंने कई बार रात को शराब के नशे में मस्त झूमता देखा है और आपको दिखा भी दिया है ।" "इस सल्तनत का मालिक हबीब है, तेमूर उसका अदना ,गुलाम है ।","यह गलत है, झूठ है ।","इस सल्तनत का मालिक हबीब है, तैमूर उसका अदना गुलाम है ।" कुछ बताते क्यों नहीं ।,आग बना लाऊँ ?,कुछ बताते क्यों नहीं ? कोई चीज गायब व थी ।,ताले भी सब बंद थे ।,कोई चीज गायब न थी । "रात को इससे ,ज्यादा और क्या किया जा सकता था ।",मानी का कोई निशान न मिला ।,रात को इससे ज्यादा और क्या किया जा सकता था ? "माताजी कभी इसका मुँह देखतीं, कभी उसका ।",विपत्ति में हम परमुखापेक्षी हो जाते हैं ।,"माताजी कभी इसका मुँह देखती, कभी उसका ।" किसी मे स्वागत न किया ।,मिस खुरशेद ने कमरे में कदम रक्खा ।,किसी ने स्वागत न किया । मिस्टर किंग आयेंगे और आपको उनका बयान -छुनना होगा ।,"मिसेज टंडन ने टालने के लिए कहा- यहाँ कोई मुकदमा थोड़े ही पेश है ! मिस खुरशेद- वाह ! मेरी इज्जत में बट्टा लगा जा रहा है, और आप कहती हैं, कोई मुकदमा नहीं है ?",मिस्टर किंग आयेंगे और आपको उनका बयान सुनना होगा । स्टेशन पर कई आदमी इमारा स्वागत करने के लिए खड़े थे ।,भोर होते-होते हम लोग मुरादाबाद पहुँचे ।,स्टेशन पर कई आदमी हमारा स्वागत करने के लिए खड़े थे । किसी को पहर रात-रहे उठना अच्छा नहीं लगता ।,यहाँ तक कि बूढ़े शिवदास भी कभी-कभी उसकी बदगोई करते हैं ।,किसी को पहर रात रहे उठना अच्छा नहीं लगता । "सास ने जब आपत्ति की, तो उनको अपशब्द कहे |",उसने उसी दिन अपनी चूडियाँ तोड़ डाली थीं और माँग का सिंदूर पोंछ डाला था ।,"सास ने जब आपत्ति की, तो उनको अपशब्द कहे ।" घर की मिल्कियत उन्ही छी निगरानी में है ।,इनके एक भाई साहब आजकल तहसीलदार हैं ।,घर की मिल्कियत उन्हीं की निगरानी में है । "शहद के जितने चोर-डाकू हैं, सब इनसे मिले रहते हैँ ।","तभी तुम बहुत जानते हो अजी हजरत, यह चोरी करते हैं ।","शहर के जितने चोर-डाकू हैं, सब इनसे मिले रहते हैं ।" "कोई इक्करे-ताँगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी धत्र में बसे, सभी के दिलों मे उमग ।",एक से एक भड़कीले वस्त्र पहने हुए ।,"कोई इक्के-ताँगे पर सवार, कोई मोटर पर, सभी इत्र में बसे, सभी के दिलों में उमंग ।" बच्चों के लिए नगर की सभी चीज़ें अनोखी थीं ।,"ग्रामीणों का यह छोटा-सा दल अपनी विपन्नता से बेखबर, सन्तोष ओर धैर्य में मगन चला जा रहा था ।",बच्चों के लिए नगर की सभी चीजें अनोखी थीं । आदित्य की त्योरियों पर बल पढ़ गये ।,"तुम कहते थे, राजनैतिक आदमियों के साथ बड़ा अच्छा व्यवहार किया जाता है और वह तुम्हारे साथी क्या हो गये जो तुम्हें आठों पहर घेरे रहते थे और तुम्हारे पसीने की जगह खून बहाने को तैयार रहते थे ?",आदित्य की त्योरियों पर बल पड़ गये । सेवा स्वयं अपना पुरस्कार है ।,लेकिन मुझे किसी से शिकायत नहीं ।,सेवा स्वयं अपना पुरस्कार हैं । मेरी भूल थी कि में इसके लिए यश और नाम चाहता था ।,सेवा स्वयं अपना पुरस्कार हैं ।,मेरी भूल थी कि मैं इसके लिए यश और नाम चाहता था । "आदित्य ने आँसू-सरी आँखों से बालक को देखा, और उनका एक-एक रोम उनका तिरस्कार करने छगा ।","इनकी गोद में जाओ, तुम्हें प्यार करेंगे ।",आदित्य ने आँसू-भरी आँखों से बालक को देखा और उनका एक-एक रोम उनका तिरस्कार करने लगा । माता-पिता फूछे न समाये ।,लड़की को संतोष हुआ; लेकिन उसने इस्लाम और जरथुश्ते धर्म- दोनों ही का तुलनात्मक अध्ययन आरंभ किया और पूरे दो साल के अन्वेषण और परीक्षण के बाद उसने भी इस्लाम की दीक्षा ले ली ।,माता-पिता फूले न समाये । में न्याय का गला घोटनेवालों में नहीं हूँ ।,"हम छोटे-छोटे कामों के लिये तजुर्बेकार आदमी खोजते हैं, जिसके साथ हमें जीवन-यात्रा करनी है, उसमें तजुर्बे का होना ऐब समझते हैं ।",मैं न्याय का गला घोटनेवालों में नहीं हूँ । चाहती तो सगाई करके चेन से रहती ।,"अभी उम्र ही क्या है, लेकिन सारे घर को सँभाले हुए है ।",चाहती तो सगाई करके चैन से रहती । चटपट कड़े पहने और दौड़ो हुई बरीठे में जाकर मथुरा को दिखाने लगो ।,दुलारी निहाल हो गयी ।,चटपट कड़े पहने और दौड़ी हुई बरौठे में जाकर मथुरा को दिखाने लगी । प्यारी बरौठे के द्वार पर छिपी खढ़ी यह दृश्य देखने लगो ।,चटपट कड़े पहने और दौड़ी हुई बरौठे में जाकर मथुरा को दिखाने लगी ।,प्यारी बरौठे के द्वार पर छिपी खड़ी यह दृश्य देखने लगी । अब तक उसे कभी-कभी घर की याद आ जातो थी ।,उसने अपनी सारी संपत्ति सास के चरणों पर अर्पण करके अपने जीवन को सार्थक कर दिया ।,अब तक उसे कभी-कभी घर की याद आ जाती थी । आपके हुक्म को केसे इनकार कर सकती हूँ ।,"आप जो कुछ करेंगे, मेरे भले ही के लिए करेंगे ।",आपके हुक्म को कैसे इनकार कर सकती हूँ । तुमने मेरी बात रख लो ।,"सजनसिंह ने उसके माथे पर हाथ रखकर कहा- बेटी, तुम्हारा सोहाग अमर हो ।",तुमने मेरी बात रख ली । बिलकुल स्वाधीन हैं ।,संसार में अनेकों राष्ट़्र अंग्रेजों का आधिपत्य स्वीकार नहीं करते ।,बिल्कुल स्वाधीन हैं । "जिससे खुश हो गये, उसे ठोकरों जवाहरात डे दिये ।","लोहे के दरवाजे तक उन्हें नहीं रोक सकते जनाब, आप हैं किस फेर में! हीरे-जवाहरात तक उनके पास रहते हैं ।","जिससे खुश हो गये, उसे टोकरों जवाहरात दे दिये ।" अमीना उसकी आवाज़ सुनते ही दौढ़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी ।,अब मियाँ हामिद का हाल सुनिए ।,अमीना उसकी आवाज सुनते ही दौड़ी और उसे गोद में उठाकर प्यार करने लगी । "ब॒ुढ़िया का क्रोध तुरन्त स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगत्म होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में विखेर देता है ।","हामिद ने अपराधी भाव से कहा—तुम्हारी उँगलियाँ तवे से जल जाती थीं, इसलिए मैने इसे लिया ।","बुढ़िया का क्रोध तुरन्त स्नेह में बदल गया, और स्नेह भी वह नहीं, जो प्रगल्भ होता है और अपनी सारी कसक शब्दों में बिखेर देता है ।" तुम इन चोजों को अपने पास रखो ।,"लेकिन कुमुद को पहले ही इस कौशल की टोह मिल चुकी थी; उसने गहने और रूपये आँचल से निकालकर माता के चरणों में रख दिये और बोली- अम्माँ, मेरे लिए तुम्हारा आशीर्वाद लाखों रूपयों के बराबर है ।",तुम इन चीजों को अपने पास रखो । शँखों से ऐनक उतारते हुए बोे-- मेरा विचार भी एक पत्र निकालने का है ।,' दयानाथ एक समाचार-पत्र देख रहे थे ।,आँखों से ऐनक उतारते हुए बोले- मेरा विचार भी एक पत्र निकालने का है । "वह उसी रुखाई से बोला-- मुलिया, मुझसे यह न होगा ।",मुलिया की ये रसीली बातें रग्घू पर कोई असर न डाल सकीं ।,"वह उसी रुखाई से बोला— मुलिया, मुझसे यह न होगा ।" में तो समझती थी कि तुममें भी कुछ कछ-बल है ।,मुलिया ने परिहास करके कहा— तो चूड़ियाँ पहनकर अन्दर बैठो न! लाओ मैं मूँछें लगा लूँ ।,मैं तो समझती थी कि तुममें भी कुछ कस-बल है । सरकार अपने चौकरों को इतनी स्वाधीवता नहीं देती ।,करूणा— मैं यह नहीं मानूँगी ।,सरकार अपने नौकरों को इतनी स्वाधीनता नहीं देती । यह सब दो-दो पंसे के खिलौने हैं ।,"मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किये चले आ रहे हैं ।",यह सब दो-दो पैसे के खिलौने हैं । सम्मी---और मेरी धोबिन रोज कपड़े धोयेगी ।,नूरे— और मेरा वकील खूब मुकदमा लड़ेगा ।,सम्मी- और मेरी धोबिन रोज कपड़े धोयेगी । "महमूद, नूरे और सम्मी खूब तालियाँ बजा-बजाकर हँसते है ।",मोहसिन रेवड़ी अपने मुँह में रख लेता है ।,"महमूद, नूरे और सम्मी खूब तालियाँ बजा-बजाकर हँसते हैं ।" प्यारी के कण्ठ में आसुओं का ऐसा वेग उठा कि उसे रोकने में सारी देह काँप उठी ।,"भैया होते, तो अब तक दो-तीन बच्चों की माँ हो गयी होती ।",प्यारी के कंठ में आँसुओं का ऐसा वेग उठा कि उसे रोकने में सारी देह काँप उठी । "तुम तो जानतो हो, मेरो आदत सबेरे सो जाने की है ।",मुझे तुमने जगा क्यों न लिया ?,"तुम तो जानती हो, मेरी आदत सबेरे सो जाने की है ।" आप इनमें से जो चाहें; रख लें ।,आपके प्रोत्साहन का यह शुभ फल है कि मैंने इतनी कविताएँ रच डालीं ।,आप इनमें से जो चाहें रख लें । जेब से एक पत्र निकालकर माता के सामने रखता हुआ बोला -उनके सदूक में यही पत्र मिला है ।,आँसुओं के वेग ने गला बंद कर दिया ।,जेब से एक पत्र निकालकर माता के सामने रखता हुआ बोला- उसके संदूक में यही पत्र मिला है । खेल कूद का कोई अवसर हाथ से न जाने देता |,"कैसे स्कूल छोड़कर घर नहीं भागा, यही ताज्जुब है; लेकिन इतने तिरस्कार पर भी पुस्तकों में मेरी अरुचि ज्यों -की-त्यों बनी रही ।",खेल-कूद का कोई अवसर हाथ से न जाने देता । कौन उसके दस-पाँच लड़कियाँ बेठी हुई हैं |,"मदारीलाल सज्जन हैं, यह सत्य है, लेकिन गोपा का अपनी कन्या के प्रति भी कुछ धर्म है ।",कौन उसके दस-पाँच लड़कियाँ बैठी हुई हैं । "कहते हैं, एक घार मारवाड़ का एक भिखारी उनके द्वार पर डट गया कि सिक्षा छेकर ही जाऊँ गा ।",उनके मक्खीचूसपने की सैकड़ों ही दंतकथाएँ नगर में प्रचलित हैं ।,"कहते हैं, एक बार मारवाड़ का एक भिखारी उनके द्वार पर डट गया कि भिक्षा लेकर ही जाऊँगा ।" "अगर यह डर लगा रहे, कि घर न जाने कब गिर पड़ेगा, तो ऐसे घर में कौन रहेगा ।","अपने घर को आदमी इसलिए तो छाता-छोपता है , कि उससे बर्खा-बूँदी में बचाव हो ।","अगर यह डर लगा रहे, कि घर न जाने कब गिर पड़ेगा, तो ऐसे घर में कौन रहेगा ।" वही दोनों बदमाश दोंगे ।,कलेजा धक्-धक् करने लगा ।,वही दोनों बदमाश होंगे । पूछा--यह लौंडा कौन है ?,खानसामा खड़ा था ।,पूछा- यह लौंडा कौन है ? "बच्चे नये-तये कुरते पहने, नवाब बने घूम रहे थे ।","पानी तेल में कितना ही मिले, पिर भी अलग ही रहेगा ।","बच्चे नये-नये कुरते पहने, नवाब बने घूम रहे थे ।" गाँव के कितने स्त्री-पुरुष मिलने आये ।,लड़के पहले ही से उस पर जा बैठे ।,गाँव के कितने स्त्री-पुरूष मिलने आये । "फल काँटेदार वृक्ष से भी मिलें, तो क्‍या उन्हें छोड़ दिया जाता है ?",उसे उस समय सहानुभूति की भूख थी ।,फल काँटेदार वृक्ष से भी मिलें तो क्या उन्हें छोड़ दिया जाता है ? "हरिधन ने देखा, उसके दोनों साले और बड़े साले के दोनों लड़के भोजन किये चले आ रहे थे ।","गुमानी कटु स्वर में बोली- गुर्राते क्या हो, खाने को तो बुलाने आयी हूँ ।","हरिधन ने देखा, उसके दोनों साले और बड़े साले के दोनों लड़के भोजन किये चले आ रहे थे ।" हरिधव का क्रोध आँसू बन गया ।,"गुमानी ने कहा- न खाओगे मेरी बला से, हाँ नहीं तो ! खाओगे, तुम्हारे ही पेट में जायगा, कुछ मेरे पेट में थोड़े ही चला जायगा ।",हरिधन का क्रोध आँसू बन गया । मावी भी मेहमानों को देख-देखकर खुश हो रही है ।,गहनों की झनकार से घर गूँज रहा है ।,मानी भी मेहमानों को देख-देखकर खुश हो रही है । "उसे अपना स्थिर जोवन, जिसमें ऊपर उठने की स्फृति ही न रही थी, इस विफल उद्योग के सामने तुच्छ जान पड़ा ।","तैमूर की उस कठोर विकृत शुष्क हिंसात्मक मुद्रा में उसे एक स्निग्ध मधुर ज्योति दिखाई दी, मानो उसका जाग्रत विवेक भीतर से झाँक रहा हो ।","उसे अपना स्थिर जीवन, जिसमें ऊपर उठने की स्मृति ही न रही थी, इस विफल उद्योग के सामने तुच्छ जान पड़ा ।" फिर किससे अलग हो जाऊँ ।,"आह! मेरे मुँह में कालिख लगेगी, दुनिया यही कहेगी कि बाप के मर जाने पर दस साल भी एक में निबाह न हो सका ।",फिर किससे अलग हो जाऊँ ? "कहते हैं, अगर आपके साथ रिआयत करूँ, तो फिर कोई शासन ही न रह जायगा ।",प्रधानजी बेचारे बड़े असमंजस में पड़े हुए हैं ।,"कहते हैं, अगर आपके साथ रियायत करूँ, तो फिर कोई शासन ही न रह जायगा ।" इल्कू एक क्षण अनिश्चित दशा में खड़ा रह! ।,अभी नहीं ।,हल्कू एक क्षण अनिश्चित दशा में खड़ा रहा । बाकी चुकाने के लिए हो तो हमारा जनम हुआ है ।,"मर-मर काम करो, उपज हो तो बाकी दे दो, चलो छुट्टी हुई ।",बाकी चुकाने के लिए ही तो हमारा जनम हुआ है । "फिर वह सोचने लगी, वह भो कोई शेर मारेगी और उसकी खाल पतिदेव को सेंट करेगी ।","वसुधा ने थकान से पलंग पर लेटते हुए कहा , अब मैं भी शिकार खेलने चलूँगी ।","फिर वह सोचने लगी , वह भी कोई शेर मारेगी और उसकी खाल पतिदेव को भेंट करेगी ।" गोपा को इज्ज़त सबकी इज्ज़त है और गोपा के लिए तो नींद और आराम हराम था ।,सुन्नी अब मुहल्ले की लड़की थी ।,गोपा की इज्जत सबकी इज्जत है और गोपा के लिए तो नींद और आराम हराम था । अकेली औरत और वह भो आधी जान की ।,"कितनी वात्सल्य से भरी आकांक्षा थी, जो कि देखने वालों में श्रद्धा उत्पन्न कर देती थी ।",अकेली औरत और वह भी आधी जान की । गोपा का मुरमाया हुआ मुख प्रमुदित हो ठठा ।,मुझे भय है कि तुम उसके पहले ही न चल दो ।,गोपा का मुरझाया हुआ मुख प्रमुदित हो उठा । करुणा उससे खिंची-खिंची रही ।,सीलोन से लौटकर प्रकाश छुट्टियों में घर गया ।,करुणा उससे खिंची-खिंची रहीं । लेकिन यहाँ आते ही फिर परीक्षा की फिक्र सवार हो गईं ।,यह निश्चय करके वह विद्यालय लौटा ।,लेकिन यहाँ आते ही फिर परीक्षा की फिक्र सवार हो गयी । इस तरद्द तो गाय रद्द चुछी |,"ठीक! मालूम होता है, महीनों से पानी ही नहीं बदला गया ।",इस तरह तो गाय रह चुकी । आखिर उप्तस्ते न रद्द गया |,चारों ओर तो लोग मारे-मारे फिर रहे हैं ।,आखिर उससे न रहा गया । "घर में कुछ प्रो बरकत भा गे है कि जो चीज़ माँग, घर द्वी में निकल आतो है' ।","प्यारी न खुद विश्राम लेती है, न दूसरों को विश्राम लेने देती है ।","घर में ऐसी बरकत आ गयी है कि जो चीज माँगो, घर ही में निकल आती है ।" आम के बाय में धावि के लड़के-लड़- कियाँ दवा से गिरे हुए आम छुन रहे थे ।,लू चलने लगी थी ।,आम के बाग में गाँव के लड़के-लड़कियाँ हवा से गिरे हुए आम चुन रहे थे । "मैने कुछ उदास होकर कद्दा--छेकिन मुझे तो बरोबेर: रा थी, र्भातो थी ।",भाग में आपके साथ कुछ दिन खेलना बदा था; नहीं मेरी क्या गिनती ?,"मैंने कुछ उदास होकर कहा-लेकिन मुझे तो बराबर, तुम्हारी याद आती थी ।" "बढ़ा ज़िद्दो लड़का है, पन्ना को तो छुछ समझता द्ो नहों ; बिचारी उसका दुलार करतो है, खिलातो- पिछाती है ।","बाप ही नहीं, सारा गाँव उसका दुश्मन था ।","बड़ा जिद्दी लड़का है, पन्ना को तो कुछ समझता ही नहीं; बेचारी उसका दुलार करती है, खिलाती-पिलाती है यह उसी का फल है ।" यद्ट उसौ का फछ है ।,और स्त्रियों से द्वेष करो ।,यह उसी का दंड है । "बुढ़िया ने कद्ा--वदी जो बाबू हुपेतगंज में रहते हैं, जो बम्पई में नोकर हैं, उन्हीं को बहू ने भेजा दै ।",पूछा- कहाँ से आयी है ?,"बुढ़िया ने कहा- वह जो बाबू हुसनेगंज में रहते हैं, जो बंबई में नौकर हैं, उन्हीं की बहू ने भेजा है ।" में इसो नो बजे वालो गाढ़ो से धबई जा रद्दो हू ।,"मेरे कारण आपको इतना शोक हुआ, इसका मुझे बहुत दु:ख है, मगर भैया आवेंगे अवश्य, इसका मुझे विश्वास है ।",मैं इसी नौ बजे वाली गाड़ी से बंबई जा रही हूँ । ऐंकाएक ठप्षने लाला वशीधर को भाते देखा ।,"भगवान की इच्छा होगी, तो अबकी जब यहाँ आऊँगी, तो जरूर उनके दर्शन करूँगी ।",एकाएक उसने लाला वंशीधर को आते देखा । उत्त बक्त क्या परिस्थिति द्ोगो में नहीं कहता ।,"यजदानी ने प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा– मैं अपनी तरफ से कुछ नहीं कहना चाहता , लेकिन यदि मुझे सलाह देने का अधिकार है, तो मैं स्पष्ट कहता हूँ कि तुम्हें इस प्रस्ता व को कभी स्वीकार न करना चाहिए , तैमूर से यह बात बहुत दिन तक छिपी नहीं रह सकती कि तुम क्या हो ।","उस वक्त क्या परिस्थिति होगी , मैं नहीं कह सकता ।" "ह इसी तरद्द स्रो पुरुष बढ़ी देर तर ऊँच-नोच सुम्काते और तरह-तरह को शकाएँ करते रहे , लेडिन इबोब मौन पाघे बेठों हुईं थी ।",यों ही हँसनेवाले क्या कम हैं ?,इसी तरह स्त्री-पुरूष बड़ी देर तक ऊँच–नीच सुझाते और तरह-तरह की शंकाएँ करते रहे लेकिन हबीब मौन साधे बैठी हुई थी । मेंने अब तर सलतनत को अपनों ज़िन्दगों की सइस्ते प्यारो चोज़ सप्रका है ।,"’ ‘नहीं, तुम मेरे मालिक हो, मेरी जिंदगी की रोशनी हो, तुमसे मैंने जितना फैज पाया है, उसका अंदाजा नहीं कर सकता ।",मैंने अब तक सल्तनत को अपनी जिंदगी की सबसे प्यारी चीज समझा था । "' बसुधा ने विरक्त-स्बर में कहा-- बढ जायगा, बढ़ जाय; सुझे इसको चिन्ता नहीं है ! वृद्ध डाक्टर परदा उठाकर अन्दर आा गया और वसुधा के चेहरे कौ ओर ताकता हुआ बोला--लाइए में ठेम्परेचर छे लूँ ।",इस दशा में मैं आपको जाने की सलाह न दूँगा ।,""" वसुधा ने विरक्त स्वर में कहा , "" बढ़ जायगा, बढ़ जाय; मुझे इसकी चिन्ता नहीं है ! वृद्ध डाक्टर परदा उठाकर आ गया और वसुधा के चेहरे की ओर ताकता हुआ बोला लाइए मैं टेम्परेचर ले लूँ ।" "इन्हीं भवगिनती पेसों में अनगिनतों घीज़ लायेंगे-- खिलौने, सिठाइयाँ, बिगुल, गंद और जाने क्या-क्या ! और सबसे ज़्यादा प्रसन्न है हमिद ।","मोहसिन के पास एक, दो, तीन, आठ, नौ, पंद्रह पैसे हैं ।","इन्हीं अनगिनती पैसों में अनगिनती चीजें लायेंगें— खिलौने, मिठाइयाँ, बिगुल, गेंद और जाने क्या-क्या ।" बार बार सतके आंखों से इधर-उघर ताछ्ती जआातो थो ।,आज उसने कल का रास्ता छोड़ दिया और खेतों की मेड़ों से होती हुई चली ।,बार-बार सतर्क आँखो से इधर-उधार ताकती जाती थी । खेतों को मेरा पर इरो हरा घाद जम हुईं थो ।,दूर के कुएँ पर पुर चल रहा था ।,खेतों की मेड़ों पर हरी-हरी घास जमी हुई थी । "दुनिया से भलग, तातार के ऊपर मेदानों में, त्याग और त्रत की उपासना की जा सकती है, और न भयरस्र हेनेवाऊे पदार्थों' का बद्धिप्कार किया जा सकता दे ; पर णट्टां खुदा ने * ज्ेमतों ढी दर्षा की हो, वहाँ उन नेमते का भोग न करना नाशुक्री है |",यजदानी ने उसकी सूरत देखी और जैसे अपनी खींची हुई तलवार म्यान में कर ली और खून के घूँट पीकर बोला- जहाँपनाह इस वक्त फतहमंद हैं लेकिन अपराध क्षमा हो तो कह दूँ कि अपने जीवन के विषय में तुर्कों को तातारियों से उपदेश लेने की जरूरत नहीं ।,"दुनिया से अलग, तातार के ऊसर मैदानों में न त्याग और व्रत की उपासना की जा सकती है और न मयस्सर होने वाले पदार्थों का बहिष्कार किया जा सकता है; पर जहाँ खुदा ने नेमतों की वर्षा की हो, वहाँ उन नेमतों का भोग न करना नाशुक्री है ।" आज तो यद्द नह बात है |,पन्ना को अपनी आँखों पर विश्वास न आया ।,आज तो यह नयी बात है । "'ओ हो, भाष तो मंदौ-रलंड का नाम सुनते द्ौ जवान दो गये |",' 'अगर आप इस इरादे से आयें तो मैं आपका दुश्मन हो जाऊँ ।,"' 'ओ हो, आप तो मंकी ग्लैंड का नाम सुनते ही जवान हो गये ।" "'अच्छा कदम बढ़ाइए, मुदकिक आदर बठे होंगे ।",न सौ मंकी ग्लैंड न एक रमणी का बाहु-पाश ।,"' 'अच्छा कदम बढ़ाइये, मुवक्किल आकर बैठे होंगे ।" एश्व दूधरे दो इलज़ाम दे रद्दा था ।,चारों लड़के आँगन में लज्जित खड़े थे ।,एक दूसरे को इलजाम दे रहा था । कानूत का फौलादी कवच उनकी रक्षा कर रद्दा था ।,चारों युवकों पर माता के इस क्रोध और आतंक का कोई असर न हुआ ।,कानून का फौलादी कवच उनकी रक्षा कर रहा था । सन्ध्या हो गई थी ।,"उसके लिए सत्य कोई वस्तु थी , तो प्रेम थी ; किन्तु प्रेमा के लिए माता-पिता और कुल-परिवार के आदेश के विरुद्ध एक कदम बढ़ाना भी असम्भव था ।",सन्ध्या का समय है । "ईइबर की यही इच्छा है, अपने बेटों की बातें और लातें ग्रेराँ की बातों ओर लातों की अपेक्षा फिर भी ग्रनौमत हैं ।",ईश्वर की यही इच्छा है ।,अपने बेटों की बातें और लातें गैरों की बातों और लातों की अपेक्षा फिर भी गनीमत हैं । "बूढ़े पण्डितजी जमीन ,पर पाँच पटकते हुए गरज उठे-झआप क्या कहते हैं, साहब |",मुझे भय है कि कहीं ये दोनों निराश होकर अपनी जान पर न खेल जायँ ।,"बूढ़े पण्डित जी जमीन पर पाँव पटकते हुए गरज उठे — आप क्या कहते हैं , साहब! आपको शरम नहीं आती ?" "इसप्रक्ोः पूस को रात पथज उसने दिल में कद्दा--नहीं, जबरा के दोते कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता |",उनके चबाने की आवाज चर-चर सुनाई देने लगी ।,"उसने दिल में कहा- नहीं, जबरा के होते कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता ।" तुम्र य्दाँ जाकर रप्त गये और उधर सास खेत चौपट दो गया ।,"सबेरे जब उसकी नींद खुली, तब चारों तरफ धूप फैल गयी थी और मुन्नी कह रही थी- क्या आज सोते ही रहोगे ?",तुम यहाँ आकर रम गए और उधर सारा खेत चौपट हो गया । मुम्तपते दो-तोन साल बढ़ा द्वोगा ।,मेरे हमजोलियों में एक लड़का गया नाम का था ।,मुझसे दो-तीन साल बड़ा होगा । "हम सब उप्ते दूर से भाते देख, उप्षद्षा दोइऋर स्वागत करदे थे और ठठ्ले अपना गोइ्याँ बना छेते थे ।","जिसकी तरफ वह आ जाए, उसकी जीत निश्चित थी ।","हम सब उसे दूर से आते देख, उसका दौड़कर स्वागत करते थे और अपना गोइयाँ बना लेते थे ।" "“है, मेरे शुराम दो ।",‘ ‘मैं तुम्हारा गुला म हूँ ?,"’ ‘हाँ, मेरे गुलाम हो ।" इन चीज़ों से जेसे उप्ते घ्रणा हो गई है ।,यह सब कपड़े उठाती लायी ।,इन चीजों से उसे घृणा हो गयी है । मानों जायदाद इसी लिए होती है कि उसकी कमाई उसी में खच हो जाय ।,और कहाँ से लावें जो हमारे पास भेजें ?,वाह री बुद्धि ! मानो जायदाद इसीलिए होती है कि उसकी कमाई उसी में खर्च हो जाय । तक्द'र ठोककर बेंठ रद्दी ।,आपको सूझी भी तो लचर-सी बात ।,तकदीर ठोंककर बैठ रही । "एक काले-कलटे कोचवाव ने कद्दा--मूला, घास तो उछके छः आने की है ।","कोई उससे दिल्लगी करता था, कोई घूरता था, कोई हँसता था ।","एक काले-कलूटे कोचवान ने कहा- मूला, घास तो उड़के अधिक से अधिक छ: आने की है ।" अब देर नहीं है ।,नये आने वाले आकर पीछे की कतार में खड़े हो जाते हैं ।,आगे जगह नहीं है । "वहो मूल्या, जो शेरती को तरद तड़य उठो थो ।","कैसा मुसकिरा-मुसकिराकर, रसीली आँखो से देख-देखकर, सिर का अंचल खिसका- खिसकाकर, मुँह मोड़-मोड़कर बातें कर रही है ।","वही मुलिया, जो शेरनी की तरह तड़प उठी थी ।" कोचवार्नो नेभी लटपट घेडढ़े जोते ।,वकील-मुख्तार इन सवारियों की ओर चले ।,कोचवानों ने भी चटपट घोड़े जोते । गावूजी फिए थोड़े दो आदेंगे ।,"सुभागी बोली- बाबूजी का काम तो धूम-धाम से ही होगा अम्माँ, चाहे घर रहे या जाय ।",बाबूजी फिर थोड़े ही आवेंगे । उनका यह घमढ तेढ़ दगौ ।,वह समझते होंगे इन दोनों के किये कुछ न होगा ।,उनका यह घमंड तोड़ दूँगी । "लछमन ने दसरी गाड़ो में वेठकर कह्ा--दादा, खींचो ।",चर-चर शोर हुआ मानो गाड़ी भी इस खेल में लड़कों के साथ शरीक है ।,"लछमन ने दूसरी गाड़ी में बैठकर कहा- दादा, खींचो ।" मेरी यह मोहरर नहीं है ।,फूलमती ने लाचार होकर कहा- तो फिर जमानत का क्या प्रबन्ध करोगे ?,मेरे पास तो कुछ नहीं है । झुहर पहनवा मुझे अच्छा भी नहीं; ।,"रग्घू दार्शनिक भाव से बोला- बच्चों के खाने-पीने के यही दिन हैं काकी! इस उम्र में न खाया, तो फिर क्या खायेंगे ।",मुहर पहनना मुझे अच्छा भी नहीं मालूम होता । ज्या अपने घमे को छाज छोड़ देने ह्वी से साबित होगा दि इम्र बहुत फार्यडे हैं ?,"मैं किसी युवती को सड़क पर सिगरेट पीते देखती हूँ, तो मेरे बदन में आग लग जाती है, उसी तरह आधी छाती का जंफर भी मुझे नहीं सोहाता ।",क्या अपने धर्म की लाज छोड़ देने से ही साबित होगा कि हम बहुत फार्वर्ड हैं ? इतने झादमी था-जा.रहे हैं और यह निर्लज्णा टॉप फेनाये पढ़ी है ।,' 'अब मुँह न खुलवाओ मीनू ! इस छोकरी को जगाकर कह दो जाकर घर पर सोये ।,इतने आदमी आ-जा रहे हैं और निर्लज्ज टाँग फैलाये पड़ी है । "पढ़ना-लिखवा तो दूर रद्या, विस को इच्छा बहतों गहँ ।",उनकी प्रसन्नता ही हमारे जीवन का स्वर्ग थी ।,"पढ़ना-लिखना तो दूर रहा, विलास की इच्छा बढ़ती गयी ।" बढ में ये गुण नहीं हैं ।,लड़कियाँ स्वभाव से ही सुशील होती हैं और अपनी जिम्मेदारी समझती हैं ।,उसमें ये गुण ही नहीं । मद्ावीर मे समल भर्खों से देखकर कह्ा--मालिह. आप हो का तो खाता हूँ ।,बोलो मंजूर है ?,"महावीर ने सजल आँखो से देखकर कहा- मालिक, आप ही का तो खाता हूँ ।" तुम्दारी क्ावत मेरी भावह है ।,घास लेकर घरवाली को बाजार मत भेजा करो ।,तुम्हारी आबरू मेरी आबरू है । "आर लडक़े के पास जाते हैं, मगर छड़ी जमाने के बदले आहिस्ते से उस के कन्छे पर द्वाथ रखकर बनावटी क्रोध से कहते हैँ--तुम कहाँ गये थे जो १","हाथ में छड़ी है ही, मैं भी वह क्रोधोन्मत्त आकृति देखकर पछताने लगती हूँ, कि कहाँ से इनसे शिकायत की ?","आप लड़के के पास जाते हैं, मगर छड़ी जमाने के बदले आहिस्ते से उसके कंधों पर हाथ रखकर बनावटी क्रोध से कहते हैं- तुम कहाँ गये थे जी ?" "तृद्धा ने छुब्घ दोकर कद्दा--जब तुम्दारी यद्दी इच्छा है, तो मुमरूपे क्या पूछते हो ?","अगर विवाह का उद्देश्य स्त्री और पुरुष का सुखमय जीवन है , तो हम प्रेमा की उपेक्षा नहीं कर सकते हैं ।","वृद्धा ने क्षुब्ध होकर कहा — जब तुम्हारी यही इच्छा है , तो मुझसे क्या पूछते हैं ?" "ठीक है, गुल्ली से आँख फूट जाने का भय रहता है, तो कया क्रिकेट से सिर हट जाने, तिल्ो फूट जाने, ,टॉँय ट्ट: जाने का भय नहीं रहता 2 थार इमारे माथे में गृढो का दाग्र भाज तक'बना हुआ है, तो इमारे.कई दोस्त ऐसे भो हैं, जो थापी को बैसाखी से बदल बेठे ।",गरीब लड़कों के सिर क्यों यह व्यसन मढ़ते हो ?,"ठीक है, गुल्ली से आँ ख फूट जाने का भय रहता है, तो क्या क्रिकेट से सिर फूट जाने, तिल्ली फट जाने, टाँग टूट जाने का भय नहीं रहता! अगर हमारे माथे में गुल्ली का दाग आज तक बना हुआ है, तो हमारे कई दोस्त ऐसे भी हैं, जो थापी को बैसाखी से बदल बैठे ।" फिर ऐद्ा माद्ठम हुआंकि नह केत में चर रहो हैं ।,उनके कूदने-दौड़ने की आवाजें साफ कान में आ रही थी ।,फिर ऐसा मालूम हुआ कि खेत में चर रहीं हैं । गुप्तानों भी हां में दा मिलातो छातो थी ।,"3 हरिधन तो उधर भूखा -प्यासा,चिंता-दाह में जल रहा था, इधर घर में सास जी और दोनों सालों में बातें हो रही थीं ।",गुमानी भी हाँ-में-हाँ मिलाती जाती थी । "कहते थे, दो सेर खाता हूँ, चार सेर खाता हूँ ।","‘चल, झूठा कहीं का ।","कहते थे, दो सेर खाता हूँ, चार सेर खाता हूँ ।" "प्यारी ने द्वारकर कद्दा--अच्छा, कल से जाना, आज बेठो ।",बातों में देर हो रही है और बादल घिरे आते हैं ।,"प्यारी ने कहा- अच्छा, कल से जाना, आज बैठो ।" में कुछः नहीं जानता ।,मानी ने मुँह फेरकर कहा- यही बात कहने के लिये मुझे बुलाया था ?,मैं कुछ नहीं जानती । "बंद जानता या, उप्क्ौं थेछे की भी बिक्की नद्दोगी ।",दुकान खोलना व्यर्थ था ।,"वह जानता था, उसकी धेले की भी बिक्री न होगी ।" "जब वह उस कोटरी से निकलौ, तो उसके सन के संस्कार बदल गये थे, , मानों किसी ने उस पर भन्त्र ढाल दिया हो ' उसी समय द्वार पर किसी ने आवाज़ दी ।",प्रतिक्षण उसके हृदय पर ममत्व का नशा-सा छाया जा रहा था ।,"जब वह उस कोठरी से निकली, तो उसके मन के संस्कार बदल गये थे, मानो किसी ने उस पर मंत्र डाल दिया हो ।" "इसमें क्या रहस्य है, यह मोहन कौ सम में न आया ।",इंद्रनाथ के शब्दों ने उसके मन में एक तूफान-सा उठा दिया ।,"उसका क्या आशय है, यह उसकी समझ में न आया ।" यह सोचकर उसने अलग चूल्हा जलाया और खाना बनाने छगी ।,"केदार— वह पड़ी सो रही है, कुछ नहीं खाया ।",पन्ना ने उसी वक्त चूल्हा जलाया और खाना बनाने बैठ गयी । - : उठते न जाने कब नोंद आ गई ।,"उसका भविष्य एक अन्धेरी खाई की तरह उसके सामने मुँह खोले खड़ा था , मानों उसे निगल जायगा ।",उसे न जाने कब नींद आ गयी । जोर के ऋकि चल रहे थे ; पर उप्ते ऐश मालम क्षे रद्दा था कि या लेने के लिए हवा बहीं है ।,यह कहता हुआ वह घर से निकल पड़ा और उन्मत्तों की तरह एक तरफ चल खड़ा हुआ ।,"जोर के झोंके चल रहे थे, पर उसे ऐसा मालूम हो रहा था कि साँस लेने के लिये हवा नहीं है ।" "दिन भर दौढ़- धुप रर शास्र को घर भाते तो ञ्री को आइ़े-द्वार्थों लेते --भौर कोसो लड़के को, पानो पौ-पोकर कोसो ।","जितने मिलने वाले, मित्र, स्नेही, संबंधी थे, सभी के घर गये, पर सब जगह से साफ जवाब पाया ।","दिन-भर दौड़-धूप कर शाम को घर आते, तो स्त्री को आड़े हाथों लेते- और कोसो लड़के को, पानी पी-पीकर कोसो ।" बढ भभागिवों सारी रात उच पुरजों को जोदने में लगी रही ।,"जब सारे पुरजे जमा हो गये, तो करूणा दीपक के सामने बैठकर उसे जोड़ने लगी, जैसे कोई वियोगी हृदय प्रेम के टूटे हुए तारों को जोड़ रहा हो ।",हाय री ममता! वह अभागिन सारी रात उन पुरजों को जोड़ने में लगी रही । सध्या हो गई थी ।,"उसकी देह पर कोई आभूषण नहीं है और न उसे सुंदर कपड़े ही दिये गये हैं, फिर भी उसका मुख प्रसन्न है ।",आधी रात हो गयी थी । तेमूर ने मुस्कराकर पूछा--तुम सुकप्ते लढ्ने को तेयार थे ?,वह क्या तजवीज है; उसके मन में खलबली पड़ गयी ।,तैमूर ने मूस्कराकर पूछा- तुम मुझसे लड़ने को तैयार थे ? दप्त चजते-बजते दोनों मोटर आई ।,वसुधा ने उसी से जाने का निश्चय किया ।,दस बजते-बजते दोनों मोटरें आयीं । "मोहसिन ने ऋद्धा--ज्ञरा अपवा चिप्रठा दो, हम भी देखे |",संधि की शर्तें तय होने लगीं ।,"मोहसिन ने कहा— जरा अपना चिमटा दो, हम भी देखें ।" सिक्का खूब बेठ गया है ।,लेकिन मोहसिन की पार्टी को इस दिलासे से संतोष नहीं होता ।,चिमटे का सिक्का खूब बैठ गया है । यह उच्च 'चिमदठे का असाद था ।,उसके अन्य मित्र मुँह ताकते रह गये ।,यह उस चिमटे का प्रसाद था । इन्हें कोन खायेगा ! रसोइये को कड़ाव पर से न जाने वर्यों उठा दिया गया ?,इन्हें कौन खायेगा ?,रसोइये को कढ़ाव पर से न जाने क्यों उठा दिया गया ? सुधि कहाँ से रहे ।,खानसामा ने मुस्कराकर कहा- इनकी तो अभी शादी ही नहीं हुई ।,साहब कहाँ से होंगे । फूल्मतो झु म्हलाकर रह एईं ।,वहाँ से खिसक गया ।,फूलमती झुँझलाकर रह गयी । "अगर इतने वाजुक-पमरिजान हो, त्तो अव्वल दर्ज पें दर्या नहीं बठे ?",चारों ओर से मुझ पर बौछार पड़ने लगी ।,"‘अगर इतने नाजुक मिजाज हो, तो अव्वल दर्जे में क्यों नहीं बैठे ।" तुम्दारे दादा ऐपे कोई बढ़े घन्नासेठ न थे ।,मैं ऐसे कानून को नहीं जानती ।,तुम्हारे दादा ऐसे कोई धन्नासेठ नहीं थे । अच्छी बात है ।,मुझसे तो नहीं सहा जाता ।,तुलसी- अच्छी बात है । "देबोजो डरते ढरते समोम भा गई, तब शर्माजी ने चौंककर प्िर उठाया, मार्तों - समाधि से जाग पढ़े हों, और खड़े होकर देवीजी का स्वागत किया ; मगर यद्द वह मूर्ति न यो, जिसकी उन्होंने कल्पना कर रखी थी |",शर्माजी को उनके आने की खबर न हुई ।,"देवीजी डरते-डरते समीप आ गयीं, तब शर्माजी ने चौंककर सिर उठाया, मानो समाधि से जाग पड़े हों, और खड़े होकर देवीजी का स्वागत किया; मगर यह वह मूर्ति न थी, जिसकी उन्होंने कल्पना कर रखी थी ।" भाभो के रग-ढप देखेंका चारो स्थिति प्र रहा था ।,केदार का चौदहवाँ साल था ।,भाभी के रंग-ढंग देखकर सारी स्थित समझ रहा था । "सुलिया से कभो बोलोगे, तो समम्त छेता, ज़दर खा लगो ।","रग्घू तुम्हारा भाई नहीं, तुम्हारा बाप है ।","मुलिया से कभी बोलोगे तो समझ लेना, जहर खा लूँगी ।" "श्ड्८ट माचसरोवर तुल्सी ने कद्दा--भाई, में तो तेयार हैँ; केकित जब सुभागी भौ माने ।","जब हमारी बिरादरी में इसकी कोई निंदा नहीं है, तो क्यों सोच-विचार करते हो ?",तुलसी ने कहा- भाई मैं तो तैयार हूँ; लेकिन जब सुभागी भी माने । तुप्र इस तरदद कब तू चेठो रहोगी ?,"माँ-बाप अब बूढ़े हुए, उनका क्या भरोसा ।",तुम इस तरह कब तक बैठी रहोगी ? और कोई छुआ गाँव में है नहीं ।,"साहू का कुआँ गाँव के उस सिरे पर है, परंतु वहाँ भी कौन पानी भरने देगा ?",कोई तीसरा कुआँ गाँव में है नहीं । हेडमास्टर वादन को डिओ यहाँ बेकार दो गई ।,उनकी बूढी माँ ।,हेडमास्टर साहब की डिग्री यहाँ आकर बेकार हो गयी । "मेरा जी भो ललूचता है; लेकित करे क्‍या, खुद बेराह चल, तो मुम्दारी रक्ष ।",भाई साहब ने मुझे गले लगा लिया और बोले- मैं कनकौए उड़ाने को मना नहीं करता ।,"मेरा जी भी ललचाता है, लेकिन क्या करूँ, खुद बेराह चलूँ तो तुम्हारी रक्षा कैसे करूँ ?" में सो आँख की पुतलो समम्मतो थी ।,बाप भी उस पर जान देता था ।,मैं आँख की पुतली समझती थी । भेने कद्दा--लेकिन तुमने सन्नी को समम्काया नहीं ?,"उसके लिए सुन्नी की जगह मुन्नी है, सुन्नी के लिए उसकी उपेक्षा है और रूदन है ।",’ मैंने कहा- लेकिन तुमने सुन्नी को समझाया नहीं । "सुन्तों फूडढ़ दहोतो, कट्ध-भाषिणी द्ोती, आरामतलव द्वोतो, तो सम्रकाती भी ।","बस यही जी चाहता है कि इसे अपने कलेजे में ऐसे रख लूँ, कि इसे कोई कड़ी आँख से देख भी न सके ।","सुन्नी फूहड़ होती, कटु- भाषिणी होती, आरामतलब होती, तो समझाती भी ।" उनके पीछे सद्दोनों मारो-मारी फिये थी ।,ये वे गहने हैं जो मैंने न जाने कितना कष्ट सहकर बनवाये थे ।,इसके पीछे महीनों मारी मारी फिरी थी । द्वार में चांरों तरफ दौढ़-दौदकर भवता रहा |,"हल्कू ने उसे कई बार चुमकारकर बुलाया, पर वह उसके पास न आया ।",हार में चारों तरफ दौड़-दौड़कर भूँकता रहा । केशव ने अनजान बनकर पूछा--आपसे किसने कट्दा “किसी ने कहा ।,यह खबर कहाँ तक सही है ?,केशव ने अनजान बनकर पूछा — आपसे किसने कहा ? "उसने दी ज़बान से कद्दा-- जिसने आपसे यद्द कद्दा ऐ, बिलकुल मूठ कहा है ।",उसका जीवन ही नष्ट हो जायगा ।,"उसने दबी जबान से कहा — जिसने आपसे यह कहा है , बिल्कुल झूठ कहा है ।" इधर वह्द अपने शिकार के खज्त पर कर बार पछत ।,वसुधा ने साधारण-सी बात कही थी ; पर कुँवर साहब के ह्रदय पर वह चिनगारी के समान लगी ।,इधर वह अपने शिकार के खब्त पर कई बार पछता चुके थे । सेकड़ों ही स्राले -जमा कर रखो थों ।,अपने शिकारी तोहफे दिखाने का कुँवर साहब को मरज था ।,सैकड़ों ही खालें जमा कर रखी थीं । "मानो ने आपत्ति कौ--मेरा जी अच्छा नहीं हैं, में न जाऊँपी ।","गोकुल ने मानी से कहा- कपड़े पहनकर तैयार हो जाओ, तुम्हें इंद्रनाथ के घर चलना है ।","मानी ने आपत्ति की- मेरा जी अच्छा नहीं है, मैं न जाऊँगी ।" उनमें एक ऐसा अप छिठ़ा हुना है; थो छिस्ों तरद्द सप्माप्त वहीँ होता ।,सैर करने वाले एक-एक करके विदा हो गये ; किन्तु ये दोनों अभी वहीं बैठे हुए हैं ।,"उनमें एक ऐसा प्रसंग छिड़ा हुआ है , जो किसी तरह समाप्त नहीं होता ।" उस्ते वद्द हृदय- रक्त से सींच-प्रीचकर पाल रद्दी थो ।,उस दुखिया के उद्‌यान में यही पौधा बच रहा था ।,उसे वह हृदय रक्त से सींच-सींचकर पाल रही थी । "दिल को दोनों द्वार्थां से थामे, मेने ज़ज्जीर खटखठाई ।","वह बिन्दु ही मिट गया था, जिस पर जीवन की सारी रेखाएँ आकर एकत्र हो जाती थीं ।","दिल को दोनों हाथों से थामे, मैंने जंजीर खटखटायी ।" "गेती तो यहाँ भी ; केकिन तुमतते सच कद्ठतो हूं, दिल से नहीं रोई ।","‘हाँ, और क्या ?","रोयी यहाँ भी, लेकिन तुमसे सच कहती हूँ, दिल से नहीं रोयी ।" "हमेशा यही सवाल, इसी ध्वनि में हमेशा पुछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था ।",उनका पहला सवाल होता- ‘कहाँ थे ?,"‘ हमेशा यही सवाल, इसी ध्वनि में पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था ।" "बिरजू गया, तो में तो अभी बेठा हो हुआ हैं ।",तुम किसी बात का सोच मत किया करो ।,"बिरजू गया, तो अभी बैठा ही हुआ हूँ ।" "दय-पैच साल की क्रेद हो तो होगो, मेल लगा ।","दयानाथ कानों पर हाथ रखकर बोला- यह तो नहीं हो सकता अम्माँ, कि तुम्हारे जेवर लेकर मैं अपनी जान बचाऊँ ।","दस-पाँच साल की कैद ही तो होगी, झेल लूँगा ।" तुम्ते देखकर आपं-द्ो- क्ाप हाथ बढ़ गये |,"ईश्वर जानता है, कल भी तुझे सताने के लिए मैंने तेरा हाथ नहीं पकड़ा था ।",तुझे देखकर आप-ही-आप हाथ बढ़ गये । "में भी नहीं कंइती कि -दोस्तों ऐ बेधुरौवती घरों ; मगर चिकनी- चुपढ़ी पाते तो बना सकते हो, बढाने तो कर सकते हो ।","खैर, सूखा जवाब न दो ।","मैं भी नहीं कहती कि दोस्तों से बेमुरौवती करो; मगर चिकनी-चुपड़ी बातें तो बना सकते हो, बहाने तो कर सकते हो ।" "मगर आठ दिन गुजरे थे, छि एक दिन मेंने उन्हों दोनों खुफियों को नीचे बेठे जि अल कु र्मा जज |",मुझे यहाँ बस यही एक तकलीफ थी ।,मगर आठ ही दिन गुजरे थे कि एक दिन मैंने उन्हीं दोनों खुफियों को नीचे बैठा देखा । "महापात्र के लिए दान को चीजें लाई गई'--बर्तन, कपड़े, पलग, बिछावन, छाते; जूते, छढ़ियाँ, लालटेन आदि ; किन्तु फूलमती को कोई चीज़ नहीं दिखायी गयी।","शाक-भाजी के टोकरे, शक्कर की बोरियाँ, दही के मटके चले आ रहे हैं ।","महापात्र के लिए दान की चीजें लायी गयीं- बर्तन, कपड़े,पलंग,बिछावन,छाते,जूते, छड़ियाँ, लालटेनें आदि; किन्तु फूलमती को कोई चीज नहीं दिखायी गयी ।" युवक इबोब तमर का वज़ोर है ; लेकिन वास्त॑व में वही आदक्षाद दे ।,5 कई महीने गुजर गये ।,"युवक हबीब तैमूर का वजीर है, लेकिन वास्तव में वही बादशाह है ।" "णब में तुम्दारे संग्रार को छोड़मे पर तेयार हूँ, तो में तुमसे भी यही आशा करता हैं ।",’ ‘ मैं तो समझता था कि ये ढकोसले मूर्खों के लिए ही हैं ; लेकिन अब मालूम हुआ कि तुम-जैसी विदुषियाँ भी उनकी पूजा करती हैं ।,जब मैं तुम्हारे लिए संसार को छोडऩे को तैयार हूँ तो तुमसे भी यही आशा करता हूँ । जो ऐटो दशा में मेरा कतेव्य था और जो दर एक भछ्ठे आदमो को करना चादिए ।,"अगर मैंने कोई अनुचित कर्म किया होता, तो आ पकी जूतियाँ खाकर भी सिर न उठाता, मगर मैंने कोई अनुचित कर्म नहीं किया ।",मैंने वही किया जो ऐसी दशा में मेरा कर्तव्य था और जो हर एक भले आदमी को करना चाहिए । इप्तो लिए अब तद् मैंने घेये के साथ तुम्दारी गालियाँ सुर्वों ।,"तुम मूर्खा हो, तुम्हें नहीं मालूम कि समय की क्या प्रगति है ।",इसीलिये अब तक मैंने धैर्य के साथ तुम्हारी गालियाँ सुनी । तुप्रने ठग ऐप्री-ऐपो ताइनाएँ दो जो झोई अपने शत्रु को भो च देगा ।,"तुमने, और मुझे दु:ख के साथ कहना पड़ता है कि पिताजी ने भी, मानी के जीवन को नारकीय बना रखा था ।","तुमने उसे ऐसी-ऐसी ताड़नाएँ दी, जो कोई अपने शत्रु को भी न देगा ।" इप्ो लिए न॑ द्वि वह चुम्दारी भाश्रित थी ?,"तुमने उसे ऐसी-ऐसी ताड़नाएँ दी, जो कोई अपने शत्रु को भी न देगा ।",इसीलिये न कि वह तुम्हारी आश्रित थी ? ऐसा हँसंता है कि तुमसे क्या कहूँ ।,कभी-कभी आकर कुशल- समाचार पूछ जाते हैं ।,लड़का ऐसा होनहार है कि मैं तुमसे क्या कहूँ । तुम तो पहले द्वो द्वाथ मे हुच गये ।,‘एक दाँव और खेल लो ।,तुम तो पहले ही हाथ में हुच गए । क्या कभी खेलते बहीं ९ ?,‘ ‘तुम्हारा अभ्यास छूट गया ।,कभी खेलते नहीं ? "छल कौ-सी वह शिफक ; वह द्विचक्धिया- इठ, वह बेदिली आज न थी ।","टाँ ड़ लगाता, तो गुल्ली आसमान से बातें करती ।","कल की-सी वह झिझक, वह हिचकिचाहट, वह बेदिली आज न थी ।" गया का तमतमाया हुआ चेहरा देख- बेटॉवाली विधवा |,युवक दब गया ।,गया का तमतमाया हुआ चेहरा देखकर डर गया । अपनो त्लियों को भो सम्रकाते रहते थे क्लि उप्तका दिल न दुखाय ।,माँ के गहनों पर हाथ साफ करके चारों भाई उसकी दिलजोई करने लगे थे ।,अपनी स्त्रियों को भी समझाते थे कि उसका दिल न दुखायें । "शिवदास ने समम्माया--बेटा, देवगति से तो किसो का बस नहीं, रोने-घोने से इलकानी के विवा और द्षया द्वाथ आयेगा १",बैठे-बैठे तो रोने के सिवा और कुछ न होगा ।,"शिवदास ने समझाया- बेटा, दैवगति में तो किसी का बस नहीं, रोने-धोने से हलकानी के सिवा और क्या हाथ आयेगा ?" दब भार काँपते हुए हाथों से ताला खोला ।,"इस निर्दय संसार में कोई उससे ऐसे विनती भी कर सकता है, इसकी उसने स्वप्न में भी कल्पना न की थी ।",मानी ने काँपते हुए हाथों से द्वार खोल दिया । "कोठरो में ए६ विभूति-सो छाई यो, मार्या लक््मो भज्ात हाय से विताज रही हों ।",एक आले पर मालगुजारी की रसीदें और लेन-देन के पुरजे बंधे हुए रखे थे ।,"कोठरी में एक विभूति-सी छायी थी, मानो लक्ष्मी अज्ञात रूप से विराज रही हों ।" "हमेशा सिर पर एक तग्रौ तलवार-सौ छट्ृुकत्तौ , माझूम द्ोती ।",उनकी नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले ।,हमेशा सिर पर एक नंगी तलवार-सी लटकती मालूम होती । "प्रधाव ज्यादा गददराई से बोढे--उकोड़ीलालजी, मुझे पहले तो इसका विश्वात्र नहीं आता कि आपकी हालत इतनी खराब है, और अगर विज्ास आ भी जाय, तो: में कुछ कर नहीं सकता ।",' 'तुम मोटे हो ही!' 'मुझ पर जरा भी दया न कीजिएगा ?,"' प्रधान ज्यादा गहराई से बोले- छकौड़ीलालजी, मुझे पहले तो इसका विश्वास नहीं आता कि आपकी हालत इतनी खराब है और अगर विश्वास आ भी जाय, तो भी मैं कुछ कर नहीं सकता ।" ह इस क्षम्ति-कुण्ड के सापने छझ्ौड़ी को गर्मी शान्त हो गई ।,"मैं दिखा दूँगी, जनता तुम्हारे साथ नहीं, मेरे साथ है ।",इस अग्निकुंड के सामने छकौड़ी की गर्मी शांत हो गयी । पहले बीमारियों के भई हैं ।,तब मैंने दूसरा बहाना सोचा ।,शहर बीमारियों के अड्डे हैं । "अगर शाम को साज्नो- पानज्न घर आ जाय, तो उसे भाग्यवान्‌ समम्तो ।","घर से सैर को निकले, मोटर से टकराकर सुरपुर की राह ली ।","अगर कोई शाम को सांगोपांग घर आ जाय, तो उसे भाग्यवान समझो ।" ", दूसरे पन्न में भो वद्दो भारजू थौ ।",देवीजी को फिर भी मुझ पर विश्वास न आया ।,दूसरे पत्र में भी वही आरजू थी । कितना अच्छा लड़का है ।,"मुझसे दया माँगते हो, इसलिए न कि मैं चमारिन हूँ, नीच जाति हूँ और नीच जाति की औरत जरा-सी घुड़की-धमकी वा जरा-सी लालच से तुम्हारी मुट्ठी में आ जायगी ।",कितना सस्ता सौदा है । मेरे पास पेसे नहीं हैं ।,‘खाना खाने चले और हुक्म हुआ कि ताजा पानी भर लाओ ।,घड़े के लिए पैसे नहीं हैं । ", में' गशेव सद्दी, किसी से कुछ माँगने तो वद्दीं जाता ।","मै नहीं खेलता खिलौने, किसी का मिजाज क्यों सहूँ ?","मैं गरीब सही, किसी से कुछ माँगने तो नहीं जाता ।" मुलिया-- वह तो करने द्वी नद्टों कहते ।,"केदार का घर भी बस जाता, तो मैं निश्चिन्त हो जाती ।",मुलिया— वह तो करने को ही नहीं कहते । पन्‍ना--मेने तो हेंढ लिया है ।,कहीं ढूँढ़ो ।,पन्ना— मैंने तो ढूँढ़ लिया है । "ठपका मुँद्द ऐसा सूख गया था, मानों मद्दोर्ना की बोमारों से उठा द्वो ।",चैनसिंह मारे शर्म के जमीन में गड़ा जाता था ।,"उसका मुँह ऐसा सूख गया था, मानो महीनों की बीमारी से उठा हो ।" बढ़े-बढ़े घर्तो का दाल जानतो हूँ ।,मुलिया फिर बोली- मैं भी रोज बाजार जाती हूँ ।,बड़े-बड़े घरों का हाल जानती हूँ । उसके भाते द्वी मद्दरी अलग कर दो गई ।,"वह घर का सारा काम करती, इशारों पर नाचती, सबको खुश रखने की कोशिश करती पर न जाने क्यों चचा और चची दोनों उससे जलते रहते ।",उसके आते ही महरी अलग कर दी गयी । उ्ती को बातों में कुछ आत्मोयता कुछ स्मेह का परिचय मिलता था ।,घर-भर में केवल उसके चचेरे भाई गोकुल ही को उससे सहानुभूति थी ।,उसी की बातों में कुछ स्नेह का परिचय मिलता था । ज्ञान बाबू एक स्कूल में मास्टर हैं ।,औरतों तक नहीं जाने पाती ।,दोनों जने ऊपर आये! ज्ञान बाबू एक स्कूल में मास्टर हैं । मिस्र ख़रशेद-- मुम्के अभिनय में मज़ा आता है बहन |,लीला- तुम भी तो जान-बूझकर दलदल में पाँव रख रही हो ।,मिस खुरशेद- मुझे अभिनय में मजा आता है । "वही तो में कहती थी कि इतनी ठम्त हो गईं, यद्द करी केठे श्रट्ी हैं ?",दोनों में पहले से कुछ बातचीत रही होगी ।,"वही तो मैं कहती थी कि इतनी उम्र हो गयी, यह क्वाँरी कैसे बैठी है ?" "इसने यद्द इथ्ता, यह अविनय कहाँ साख ।","बुढ़िया को तो उसने आटा-दाल देकर विदा किया, किन्तु प्रकाश का कुतर्क उसके हृदय में फोड़े के समान टीसता रहा ।","उसने यह धृष्टता, यह अविनय कहाँ सीखी ?" "तुम्हें सोलह हज़ार का एक बाग्र मिला, पदच्चीस इज़ार का एक मकान ।",फूलमती ने कहा- माँ-बाप की कमाई में बेटी का हिस्सा भी है ।,"तुम्हें सोलह हजार का एक बाग मिला, पच्चीस हजार का एक मकान ।" "काम्रतानाथ ने नम्नता से कह्टा --भरम्माँ, कुम्रुद भाषकी लड़को ढे, तो इमारी बहिः है ।",बीस हजार नकद में क्या पाँच हजार भी कुमुद का हिस्सा नहीं है ?,"कामता ने नम्रता से कहा- अम्माँ, कुमुद आपकी लड़की है, तो हमारी बहन है ।" उम्रानाथ ने सुधारा--पाँच दृक्ार क्यों दप इज़ार कट्ठिए ।,"जो काम हजार में हो जाये, उसके लिए पाँच हजार खर्च करना कहाँ की बुद्धिमानी है ?","उमानाथ से सुधारा- पाँच हजार क्यों, दस हजार कहिए ।" "इमारे ऐसे ने वहाँ अपना रम जमा लिया , मगर सुर्क उप्तमें बेठवा घुरा लग रद्दा था ।",बड़ी मुश्किल से तीसरे दरजे में जगह मिली ।,"हमारे ऐश्वर्य ने वहाँ अपना रंग जमा लिया, मगर मुझे उसमें बैठना बुरा लग रहा था ।" "वह ममककर उठो और बड़ी बहू के पास जाकर कठोर खर में वोली -- तिजोरी क्यों खोलती हो ब्हू, मेने तो खोलने को नहीं कहा ?","आज तो इस तरह खोल रही है, मानो मैं कुछ हूँ ही नहीं ।","यह मुझसे न बर्दाश्त होगा! वह झमककर उठी और बहू के पास जाकर कठोर स्वर में बोली- तिजोरी क्यों खोलती हो बहू, मैंने तो खोलने को नहीं कहा ?" प्यारी यह प्रस्ताव सुनकर अवाक्‌ रह गई उनका मुंह ताकने लगी ।,"हमारी तो किसी तरह कट गयी, लड़कों को तो आदमी बनाना है ।",प्यारी यह प्रस्ताव सुनकर अवाक् रह गयी । "बंलो' में तो जने को न, कहेंगी, आगे जैसी ठुम्दारो इच्छा दो ।","उसे संदेह हुआ, शायद मेरे कारण यह भावना उत्पन्न हुई ।","बोली- मैं तो जाने को न कहूँगी, आगे जैसी इच्छा हो ।" भोनू मे हँसफर कहा--पतम्त- लाल भी तो अयोी इधर से गये हैं ।,' युवती ने शर्म से सिर झुकाकर स्वीकार किया ।,मीनू ने हँसकर कहा- वसंतलाल तो अभी इधर से गये हैं ? "वसन्तलाक सी वह खट् है, उप्चे बुला दूं. ?","' 'जी नहीं, मैं थोड़ी देर में बिलकुल अच्छी हो जाऊँगी ।","' 'वसंतलाल भी वह खड़ा है, उसे बुला दूँ ।" "नबेगमगण, म्ि० जयरामदास के घर १ ?",' 'किस मुहल्ले में ?,"' 'बेगमगंज, मि. जयरामदास के घर ।" "बस, यही जाशा है छि इसकों शीतल करनेवाली सुधा भो वहीं मिलेगी, जहाँ से यह तृष्णा मिलो है ।","नहीं जानता, इसे कैसे शांत करूँ ?","बस, यही आशा है कि इसको शीतल करने वाली सुधा भी वहीं मिलेगी, जहाँ से यह तृष्णा मिली है ।" "इव शब्दों में मुक्े एक ऐसा य छिपा हुआ ज्ञात होता है, जिसने प्रेम की वेदवा सही है, जो लालबा को शाग' मावसरोवर मुल्या--दुनिया जो चाहे कहे ।",आपने एक गरीब की फूस की झोपड़ी में आग लगा दी है; लेकिन मन यह स्वीकार नहीं करता कि यह केवल विनोद-क्रीड़ा है ।,"इन शब्दों में मुझे एक ऐसा हृदय छिपा हुआ ज्ञात होता है, जिसने प्रेम की वेदना सही है, जो लालसा की आग में तपा है ।" "उसप्ते निम्र बात का भय था, वद्ध इतनी जरुद सिर पर आ पढ़ी ।",रग्घू ने कुछ जवाब न दिया ।,"उसे जिस बात का भय था, वह इतनी जल्द सिर आ पड़ी ।" सुभागो ने तो कुछ जवाब न दिया ।,"फिर तुम अपने भाइयों के लिए मरो, मै क्यों मरुँ ?",रग्घू ने कुछ जवाब न दिया । यह! वेपसे-छौड़ो तक़ल उड़ा दो ।,"कोई पचास माँगता, कोई सौ ।",यहाँ बेपैसे- कौड़ी नकल उड़ा दी । "क॒ष इन ल,गों को दया आतो है किये पर ! बेदारे महँगू को इतता मारा कि महोनों ्द्ठू |",उसने घड़ा और रस्सी उठा ली और झुककर चलती हुई एक वृक्ष के अंधेरे साये मे जा खड़ी हुई ।,कब इन लोगों को दया आती है किसी पर ! बेचारे महँगू को इतना मारा कि महीनो लहू थूकता रहा । उच्च पर ये लोग ऊँ बनते है |,इसीलिए तो कि उसने बेगार न दी थी ।,इस पर ये लोग ऊँचे बनते हैं ? "शत्रु-भाव जेपे मत से मिट गया हो, जिन- जिन प्राणियों से मेरा वेर-भाव था, जिनसे गालो-गलौज, मार-पौट, सुक्रदमेब्ाज़ो सई कुछ दो चुडी थी, वह सभी जेसे मेरे गछे में लिगट-लिसटऋर हँ8 रहे थे ।","मुझे इस भाई के प्रति कभी इतनी ममता न हुई थी, फिर तो मन की वह दशा हो गयी, जिसे विह्वलता कह सकते हैं! शत्रु-भाव जैसे मन से मिट गया था ।","जिन-जिन प्राणियों से मेरा बैर-भाव था, जिनसे गाली-गलौज, मार-पीट मुकदमाबाजी सब कुछ हो चुकी थी, वह सभी जैसे मेरे गले में लिपट-लिपटकर हँस रहे थे ।" में कत्पना-खागर में हो हबा बेठा रद्दा ।,सब लोग उठ-उठकर जाने लगे ।,मैं कल्पना-सागर में ही डूबा रहा । पतक्ड़ शुरू हो गई थौ ।,हल्कू के खेत से कोई एक गोली के टप्पे पर आमों का एक बाग था ।,पतझड़ शुरु हो गयी थी । इत्कू ने कद्या--अब तो नहों रहा जाता जबरू |,जबरा ने उसे आते देखा तो पास आया और दुम हिलाने लगा ।,हल्कू ने कहा- अब तो नहीं रहा जाता जबरू । जबरा को कहीं ज्प्तोन पर एक .हृडडों पी मिल गई थो ।,हल्कू ने कहा- कैसी अच्छी महक आई जबरू ! तुम्हारी नाक में भी तो सुगंध आ रही है ?,जबरा को कहीं जमीन पर एक हडडी पड़ी मिल गयी थी । उप्रको माता आर-शर पूछती थो--केशव भये नहीं ?,तुम्हारी — प्रेमा! सन्ध्या हो गयी और इस पत्र का कोई जवाब न आया ।,उसकी माता बार-बार पूछती थी — केशव आये नहीं ? मद्दवों को भो तो यद्दी ज्वर था |,माँ की दशा देखकर सुभागी समझ गयी कि इनका परवाना भी आ पहुँचा ।,महतो को भी तो यही ज्वर था । "मर्द बाहर काम करता है, तो इम भी घर में काम करतौ हैं कि घर के राम में कुछ लगता दही नहीं ।","बोली, बैठाकर कोई क्या खिलायेगा सरकार ?","मर्द बाहर काम करता है, तो हम भी घर में काम करती हैं कि घर के काम में कुछ लगता ही नहीं ?" "बाहर दरा-भरा बाय था, जिसके रंग-विरगे फूल यहाँ से स |","वसुधा ने थकी हुई, रुआँसी आँखो से खिड़की की ओर देखा ।","बाहर हरा-भरा बाग था, जिसके रंग-बिरंगे फूल यहाँ से साफ नजर आ रहे थे ।" पति-प्रेम गौण-सौ वस्तु थी पर उसका लोभी मन सम्पत्ति पर सम्तृष्ट न रह सका ।,उस समय सम्पत्ति ही उसकी आँखो में सब कुछ थी ।,"पति-प्रेम गौण-सी वस्तु थी; पर उसका लोभी मन सम्पत्ति पर सन्तुष्ट न रह सका, पति-प्रेम के लिए हाथ फैलाने लगा ।" दौवार में दो खूं टिया गाढ़ी गईं ।,उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा ।,दीवार में खूँटियाँ गाड़ी गयी । "अगर अम्माँ ने अपनी सास को साढ़ी घोई है, उनके पाँव दबाये हैं, उनको घुढ़कियाँ खाई हैं, तो आज वह पुराना हिसाब बहू ' से वयों चुकाना चाहती हैं ।","मैंने उसे मना तो नहीं कर दिया है! मुझे तो सच्चा आनंद होगा, यदि सास-बहू में इतना प्रेम हो जाय; लेकिन यह मेरे वश की बात नहीं कि दोनों में प्रेम डाल दूँ ।","अगर अम्माँ ने अपनी सास की साड़ी धोयी है, उनके पाँव दबाये हैं, उनकी घुड़कियाँ खायी हैं, तो आज वह पुराना हिसाब बहू से क्यों चुकाना चाहती हैं ?" मनटूद्वत छाड हुईं थी ।,संध्या हो गयी थी; पर घर अंधेरा पड़ा था ।,मनहूसियत छायी हुई थी । "इससे आदमी के जीवन में सयप्त भा जाता है, दूपरों का उप पर स्नेह होने लगता है और उसझे कारोबार में उन्नति होती है; लेकिव इस ज़रा-छी बात पर चार पन्ने कप्रे लिखे ।",कौन नहीं जानता कि समय की पाबंदी बहुत अच्छी बात है ।,"इससे आदमी के जीवन में संयम आ जाता है, दूसरों का उस पर स्नेह होने लगता है और उसके कारोबार में उन्नति होती है; लेकिन इस जरा-सी बात पर चार पन्ने कैसे लिखें ?" मेंने भापत्ति कों--मदारीछाछ तो बढ़ा हो दुभेन मनुष्य है ।,"गोपा ने घर भी वह छाँटा, जहाँ उसकी रसाई कठिन थी ।",मैंने आपत्ति की- मदारीलाल तो बड़ा दुर्जन मनुष्य है । "भाघ तो जिधर जाथो, हुस्‍्व-द्वी-हुत्न के जलवे हैं ।",हमारे वक्तों में तो कहीं कोई सूरत ही नजर न आती थी ।,"आज तो जिधर जाओ, हुस्न-ही-हुस्न के जलवे ।" "में तेयार हैँ हाँ, यह सेरा जिम्मा , मगर भाई हमारा हिए्सा सी रहेगा ?",मैं तैयार हूँ ।,"' 'हाँ, यह मेरा जिम्मा, मगर भाई हमारा हिस्सा भी रहेगा ।" तो भाप जेसा उचित सबमे ।,’ ‘कभी-कभी सिफारिशें धरी रह जाती हैं और बिना सिफारिश वाले बाजी मार ले जाते हैं ।,’ ‘तो आप जैसा उचित समझें । कोई जवाब न मिला ।,"जिस आदमी ने कभी जबान नहीं खोली, हमेशा गुलामों की तरह हाथ बाँध हाजिर रहा, वह आज एकाएक इतना आत्माभिमानी हो जाय, यह उनको चौंका देने के लिए काफी था ।",कुछ जवाब न सूझा । . उसका हृदय घक-घक्‌ करने छा ।,वह आँखें मलकर उठ बैठीं और पुकारा- बहू ! बहू ! कोई जवाब न मिला ।,उनका हृदय धक-धक करने लगा । "जाकर एक लड़के से पूछा--क्यों बेटे, यहां कोई गया नाम का आदमी रहता है ९","भूल गया कि मैं एक ऊँचा अफसर हूँ, साहबी ठाठ में, रौब और अधिकार के आवरण में ।","जाकर एक लड़के से पूछा-क्यों बेटे, यहाँ कोई गया नाम का आदमी रहता है ?" "वोला--कह्दो गया, मुझ्ते पहचानते हो १ ईंदगाह ।","उसकी ओर लपकना चाहता था कि उसके गले लिपट जाऊँ, पर कुछ सोचकर रह गया ।","बोला-कहो गया, मुझे पहचानते हो ?" द्वाप्रिइ दूर खड़ा है ।,महमूद और मोहसिन ओर नूरे ओर सम्मी इन घोड़ों ओर ऊँटों पर बैठते हैं ।,हामिद दूर खड़ा है । "छोटी लड़की फभी मेरे पाप्त आाकए खड़ी 'हो जाती, कभी माता के पास, कभी दादी के पास; पर कहीँ उसके लिए प्यार कीज़ातें न थीं ।",बच्चों को भी आज भूख न थी ।,"छोटी लड़की कभी मेरे पास आकर खड़ी हो जाती, कभी माता के पास, कभी दादी के पास; पर कहीं उसके लिए प्यार की बातें न थीं ।" "खिलने,इतने क्या होंगे, इतनी मिठाई को क्या ज़रूरत ] उनका कहना था--जच रोज़गार में कुछ मिलता नहीं,. देनिक कार्यों में खींच-तान 'करनो पह़तो है, 'दूध-घी के,बजट/में तखफीण. दो गई, तो. फिर तोजे में क्यों इतनी उदारता की जाय ।","पाँच साड़ियों की जगह तीन रहें, तो क्या बुराई है ।","खिलौने इतने क्या होंगे, इतनी मिठाई की क्या जरुरत! उनका कहना था- जब रोजगार में कुछ मिलता नही; दैनिक कार्यो में खींचतान करनी पड़ती है, दूध-घी के बजट में तख़लीफ हो गयी, तो फिर तीजे में क्यों इतनी उदारता की जाय ?" चाल धौमी पढ़ गई ।,"दोनों समझ गये कि आज डाँट पड़ी, शायद मजूरी भी कट जाय ।",चाल धीमी पड़ गयी । "जब उन्होंने दमारे ऊपर छोड़ दिया, तो इमारा भी धरम है कि कोई कसर न छोड़ ।",दूसरा- अब खूब दिल लगाकर काम करेंगे ।,"तीसरा- और क्या! जब उन्होंने हमारे ऊपर छोड़ दिया, तो हमारा भी धरम है कि कोई कसर न छोड़ें ।" मुझे कोई मजाज़ नही है कि दूसरे मज़हबबालो से उनके इमाव का तावान ।,बेशक जजिया मुआफ होना चाहिए ।,मुझे मजाज नहीं कि दूसरे मजहब वालों से उनके ईमान का तावान लूँ । कदणा सशक दो गईं ।,"जानता था कि कई दिनों के उपवास के बाद और आरोग्य की इस गयी-गुजरी दशा में उसे जबान को काबू में रखना चाहिए पर सब्र न कर सका, थाली पर टूट पड़ा और देखते-देखते थाली साफ कर दी ।",करूणा सशंक हो गयी । अब किसी से कोई आशा नहीं है ।,"महाजन ने इतनी ही दया क्या कम की, कि मुझे घर से निकाल न दिया ।",इधर से तो अब कोई आशा नहीं है । आदइ ! करुणा ने हृदय को दृढ़ करके कहा--तुम्हें कहोँ दर्द तो नहीं हो रहा है ! आय चना लाऊ ।,केवल सोहाग का दाग लगाकर और एक बालक के पालन का भार छोड़कर चला जा रहा हूँ ।,आह! करूणा ने हृदय को दृढ़ करके कहा— तुम्हें कहीं दर्द तो नहीं है ? "उनको गाढे को चादर, खहर के कुरते और पाजासे और लिद्दाफ अभी तर सदृझ में सचित थे ।",करूणा स्वामी के पुराने कपड़ों को बाहर निकाल रही थी ।,"उनकी गाढ़े की चादरें, खद्दर के कुरते, पाजामें और लिहाफ अभी तक सन्दूक में संचित थे ।" "तुम्दारे घर में आज विवाह का उत्सव है, में तुम्दारे माता-पिता पे कुछ बातवोत नद्दों कर खद्चता , छेकित तुमप्ते कहने में कोई सझोच नहों है कि में मानो को अपनों जीव-त-सदृचरो बनाकर आपने को धन्य समझूँगा ।",तुम इस इल्जाम से नहीं बच सकते ।,"तुम्हारे घर में आज उत्स व है, मैं तुम्हारे माता-पिता से कुछ बातचीत नहीं कर सकता, लेकिन तुमसे कहने में संकोच नहीं है कि मानी को को मैं अपनी जीवन सहचरी बनाकर अपने को धन्य समझूँगा ।" मेरा कहना न म्रावा ।,"कहती थी, बहू मरदानी गाड़ी में बैठें ।",पर मेरा कहना न माना । "कद्दने लगी, अम्माँजी, आपको सोने की तकलोफ होगी यहौ भाराम दे गई ।",पर मेरा कहना न माना ।,"कहने लगी, अम्माँ जी, आपको सोने की तकलीफ होगी ।" आपस में द्वाप्त-परिद्ास दो रद्दा था ।,संध्या समय इंद्रनाथ दो-तीन मित्रों के साथ अपने घर की छत पर बैठा हुआ था ।,आपस में हास-परिहास हो रहा था । "एकतरफ़ा फेप्ला आप क्यों करतो हैं मिसेज़ टडन ने टालने के लिए कद्दा--यहाँ कोई मुक्रदमा-थोड़े हो पेश है ! मिस खुरशोद- बाद .] मेरी इज्ज़त में बट्ा लगा जा रद्द है, भौर आप कहदतो है, कोई मक़दमा नहों है ।",एकतरफा फैसला आप क्यों करती हैं ?,"मिसेज टंडन ने टालने के लिए कहा- यहाँ कोई मुकदमा थोड़े ही पेश है ! मिस खुरशेद- वाह ! मेरी इज्जत में बट्टा लगा जा रहा है, और आप कहती हैं, कोई मुकदमा नहीं है ?" "हार्लँकि में जानता था कि सुन्दी किसी तरद्द न आयगी, मगर वहाँ पहुचा, तो देखा-- कुद्दराम मचा हुआ है ।",’ ‘मैं उन्हीं पैरों लाला मदारीलाल के घर चला ।,"हालाँकि मैं जानता था कि सुन्नी किसी तरह न आयेगी, मगर वहाँ पहुँचा तो देखा कुहराम मचा हुआ है ।" "लढ़का भी गया, बहू भौ गईं, ज़िदगी द्वी सारत हो गई ।","मदारीलाल मुझे देखते ही मुझसे उन्मत की भाँति लिपट गये और बोले- ‘भाई साहब, मैं तो लुट गया ।","लड़का भी गया, बहू भी गयी, जिन्दगी ही गारत हो गयी ।" एक बार हर्मे रुपये को बड़ो तगो हुईं ।,मोटर रख ली है; कई नौकर-चाकर हैं मगर यहाँ भूले से भी पत्र नहीं लिखते ।,एक बार हमें रुपये की बड़ी तंगी हुई । मेंबे कद्दा--अपने आताजी ऐे क्यों नहीं माँग केते ?,एक बार हमें रुपये की बड़ी तंगी हुई ।,"मैंने कहा, अपने भ्राताजी से क्यों नहीं माँग लेते ?" भ्त्र भाषदा यह द्वाल है कि मम्के कुछ बातचोत इरने का भवतर दो नही देते ।,"एक सप्ताह और गुजरा, मगर जवाब नदारद ।",अब आपका यह हाल है कि मुझे कुछ बातचीत करने का अवसर ही नहीं देते । इतने प्रमन्‍्त-चित्त नजुर आते हैं कि बय ।,अब आपका यह हाल है कि मुझे कुछ बातचीत करने का अवसर ही नहीं देते ।,इतने प्रसन्न-चित्त नजर आते हैं कि क्या कहूँ । "मगर घोड़ा इतना दुब॒ला हो रहा था, एक्क्रे को गद्दो इतनो भेको और फट, हुईं, सार सामाम इतना रहो कि चनप्विद्ठ को उस पर बेठते शर्म आई ।",चटपट एक्के पर बैठ गया ।,"मगर घोड़ा इतना दुबला हो रहा था, एक्के की गद्दी इतनी मैली और फटी हुई, सारा सामान इतना रद्दी कि चैनसिंह को उस पर बैठते शर्म आई ।" मुन्तो के सुख पर ठदाप्ती छाई थी; पर इत्कू अपन्न था ।,दोनों खेत की दशा देख रहे थे ।,"मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था ।" "रू ने 5प्ठी साँस खीचदर कद्दा-- मुलिया, घाव पर नोन न छि्क ।",मैं तो किसी को तुम्हारी तरह बिसूरते नहीं देखती ।,"रग्घू ने ठंडी साँस खींचकर कहा— मुलिया, घाव पर नोन न छिड़क ।" कया वर्दहा भर पेट भोजन भी नहीं मिलता |,करूणा— छी! सूखकर काँटा हो गये ।,क्या वहाँ भरपेट भोजन नहीं मिलता ? "बस, यददों ग़गीमत समम्तो कि जीता लौट भाया ।","आदित्य— यह न पूछो करूणा, बड़ी करूण कथा है ।","बस, यही गनीमत समझो कि जीता लौट आया ।" में ज़रा छेटगा ।,"तुम्हारे दर्शन बदे थे, नहीं कष्ट तो ऐसे-ऐसे उठाए कि अब तक मुझे प्रस्थान कर जाना चाहिए था ।",मैं जरा लेटूँगा । तू सममाता है में कुफ़ बक्च रद्दा हैं ?,"वह हमसे और तुमसे ज्याकदा खुदापरस्त है, जो मस्जिद में खुदा को बंद समझते हैं ।","तू समझता है, मैं कुफ्र बक रहा हूँ ?" किसी को काफिए घम्मना दो कु है ।,"तू समझता है, मैं कुफ्र बक रहा हूँ ?",किसी को काफिर समझना ही कुफ्र है । "जिन बोर तुकों के प्रखर प्रताप से ईसाईं-दुनिया काँप रहो: थी, उन्हीं का रत जाज $स्वुस्तुनिया को गलियों में बद रद्दा है ।","वह बड़ा हो गया है, मैं छोटा हो गया हूँ ।","जिन वीर तुर्कों के प्रखर प्रताप से ईसाई-दुनिया काँप रही थी, उन्हीं का रक्त आज कुस्तुन्तुनिया की गलियों में बह रहा है ।" "चृद आने शब्दों में घिक्कर भरघर बोल[--जिप_े तुम्र इज्ज़त को जितद्द रो कहते डो, वह गुनाह और जहन्नुम को ज़िन्दपों है ।","तैमूर हिंसक पशु नहीं है, जो यह दृश्य देखने के लिये अपने जीवन की बाजी लगा दे ।","वह अपने शब्दों में धिक्कार भरकर बोला- जिसे तुम इज्जत की जिंदगी कहते हो, वह गुनाह और जहन्नुम की जिंदगी है ।" में जीकर ही घर का क्या उपकार रद्द रद्दों 6ै ।,"बचना होगा बच जाऊँगी, मरना होगा मर जाऊँगी, बेआबरुई तो न होगी ।",मैं जीकर ही घर का क्या उपकार कर रही हूँ । "देश को स्वराज्य भिले, लोग सुखी हाँ, बला से में मर जाऊँगो ) दजारों आदमो जेल जा रहे हैं, कितने चर तवाद्द हो गये, तो क्या सबसे ज्यादा प्यारी मेरी द्वी जान है ।",और सबको दिक कर रही हूँ ।,"देश को स्वराज्य मिले लोग सुखी हों, बला से मैं मर जाऊँगी! हजारों आदमी जेल जा रहे हैं, कितने घर तबाह हो गये, तो क्या सबसे ज्यादा प्यारी मेरी ही जान है ?" अबकी सुक्षे मुभाफो दीजिए ।,"जब वह पान खाकर कुरसी पर बैठीं, तो उसने अपने अपराध के लिए क्षमा माँगी! बोला बहनजी, बेशक मुझसे यह अपराध हुआ है; लेकिन मैंने मजबूर होकर मुहर तोड़ी ।",अबकी मुझे मुआफी दीजिए । दुल्री निद्वाल हो गई ।,प्यारी ने नये कड़े दुलारी को दिये ।,दुलारी निहाल हो गयी । सदसा शिवदास ने पुझारा--बड़ी बहू |,"उसकी आँखें मानों उस दृश्य पर जम गयीं, दम्पति का वह सरल आनंद, उनका प्रेमालिंगन, उनकी मुग्ध मुद्रा- प्यारी की टकटकी-सी बँध गयी, यहाँ तक कि दीपक के धुँधले प्रकाश में वे दोनों उसकी नजरों से गायब हो गये और अपने ही अतीत जीवन की एक लीला आँखों के सामने बार-बार नये-नये रूप में आने लगी ।",सहसा शिवदास ने पुकारा- बड़ी बहू! एक पैसा दो । प्यारो की सम्राधि दृट गई ।,तमाखू मॅंगवाऊँ ।,प्यारी की समाधि टूट गयी । आतक्ित हों जाने दो चेश करते हुए जान पढ़े |,दोनों सज्जनों ने मेरी ओर चकित नेत्रों से देखा ।,आतंकित हो जाने की चेष्टा करते जान पड़े । "प्यारी उसकी सरलता पर हँसकर बोलौ--भरे, तो में तुझे कुछ कद्द थोड़ी रही हूँ, पायल |",तक तक तो सारी उख बिदा हो जाती ।,"प्यारी उसकी सरलता पर हॅंसकर बोली- अरे, तो मैं तुझे कुछ कह थोड़ी रही हूँ, पागल ।" में न ऋहँगा तो सत्र चौपट डों जायगा |,"अब तो जानता हूँ, मेरे ही माथे हैं ।",मैं न करूँगा तो सब चौपट हो जायगा । "मिप्र ,खुशेद ने धन्यवाद देकर कहा--जी नहीं, कोई विशेष काम नहीं है |","कोई काम हो, तो बुलाऊँ ?","मिस खुरशेद ने धन्यवाद देकर कहा- जी नहीं, कोई विशेष काम नहीं है ।" "यह भी देख रहो छू कि यहाँ को वद सेविद्ा नहों, स्वामिनों है ।",मुझे चालबाज मालूम होती है ।,"यह भी देख रही हूँ, कि वह सेविका नहीं स्वामिनी है ।" शेतान का द्वाल भी पढ़ा दी द्वोगा ।,अभिमान किया और दीन-दुनिया से गया ।,शैतान का हाल भी पढ़ा ही होगा । "गह सूमम लो कि ठुम ७पनी मेहनत से नद्दी पार हुए, »न्धे के द्वाथ बटेर लग शई ।","तुमने तो अभी केवल एक दरजा पास किया है और अभी से तुम्हारा सिर फिर गया, तब तो तुम आगे बढ़ चुके ।","यह समझ लो कि तुम अपनी मेहनत से नहीं पास हुए, अंधे के हाथ बटेर लग गयी ।" कु अर साहव ने दंसकर कद्दा--शेर कर का ठण्डा हो गया ।,""" वसुधा ने उनकी रक्षा के लिए दोनों हाथों का घेरा बनाते हुए कहा , ""वहाँ से हट जाओ ! ऐसा न हो, झपट पड़े ।",""" कुँवर साहब ने हँसकर कहा , ""शेर कब का ठंडा हो गया ।" "तुम जीतो केप्ते बचों, यह आश्वये है ।",पैरों में बड़ी चोट आयी होगी ।,"तुम जीती कैसे बचीं , यह आश्चर्य है ।" बन्दुक द्वाथ से छटकर दूसरों तरफ्र गिर गईं थो ।,मेरे पास तो छुरी भी न थी ।,बन्दूक हाथ से छूटकर दूसरी तरफ गिर गयी थी । मेने भाराम को साँस छो ।,जयदेव चले गये ।,मैंने आराम की साँस ली । "ला, मंहाबीरजीं को लद॒डू चढ़ा थआर्ज ।","हरिधन ने कहा- नहीं काकी, बहुत अच्छा हुआ ।","ला, महाबीरजी को लडडू चढ़ा आऊँ ।" भमीना का सन बढगद हो गया ।,वहाँ भी इसे अपनी बुढ़िया दादी की याद बनी रही ।,अमीना का मन गद्‌गद्‌ हो गया । "में कहता हुँ, वेश्या है ।",जब वह उठकर जाने लगे; तो उसके पीछे चलें ।,मैं कहता हूँ वेश्या है । "जब लड़कों की तरद्द लड़डियों को शिक्षा और जीविका की सुविधाएँ निकल आयेगी, तो यद्द प्रथा भो विंदा हो जायगों ।","पैसों की तो कमी नहीं है, दहेज की बुराइयों पर लेक्चर दे सकते हैं; लेकिन मिलते हुए दहेज को छोड़ देनेवाला मैंने आज तक न देखा ।","जब लड़कों की तरह लड़कियों की शिक्षा और जीविका की सुविधाएँ निकल आयेंगी, तो यह प्रथा भी विदा हो जायगी ।" मार्क मारकर मुम्शे को मनाना पढ़ा ।,विवाह के पश्चात् महीनों बोलचाल न रही ।,झक मारकर मुझी को मानना पड़ा । "उससे कोई सलाह भी ली गई तो यद्दी कहा--बेटा, तुम छोग जो करते हो, अच्छा ही करते हो, सुमसे क्या पूछते हो ।","कुमुद को क्या दिया गया, मेहमानों का कैसा सत्कार किया गया, किसके यहाँ से नेवते में क्या आया,किसी बात से भी उसे सरोकार न था ।","उससे कोई सलाह भी ली गयी तो यही कहा- बेटा, तुम लोग जो करते हो, अच्छा ही करते हो ।" फूलप्रतो कुछ कद्दवा द्वी चाहती थी कि उप्ानाथ ने आश्वर कहा--क्या कर रही है कुमुद १,न जाने अभी तुम्हें किन विपत्तियों का सामना करना पड़े ।,फूलमती कुछ कहना ही चाहती थी कि उमानाथ ने आकर कहा- क्या कर रही है कुमुद ? एक साल बीत गया ।,श्रृद्धा की नजरों में भगतराम एक देवता थे और भगतराम के समक्ष श्रृद्धा मानवी रूप में देवी थी ।,एक साल बीत गया । पाँच दक्षार मेरे रहेंगे तो कोई-व-कोई सामेदार पाँच इज़ार का मिल जायगा ।,प्रेस और पत्र में कम-से-कम दस हजार का कैपिटल चाहिए ।,पाँच हजार मेरे रहेंगे तो कोई-न-कोई साझेदार भी मिल जायेगा । २२ मानसरोवर “ आती भी तो घन न लगाती ; सगर अब तो मन तुमसे छग गया ।,"मैं जानती, ऐसे निर्मोहिए से पाला पड़ेगा, तो इस घर में भूल से न आती ।","आती भी तो मन न लगाती, मगर अब तो मन तुमसे लग गया ।" पूरे वाक्य को ज़रूरत ही नहीं रहती ।,"कहता हूँ, लगान का बड़ा तकाजा हो रहा है ! जवाब मिलता है, आजकल लगान तो बंद हो ही रहा है ।",लगान देने की जरूरत ही नहीं रही । तुमे मौत नहीं आतो |,मुँह में कालिख लगाकर मुझे पत्र लिखती है ।,तुझे मौत भी नहीं आती । "मुँद्द ल्टकाये भ तर णाता, और फिर बाइर चल जाता; यहाँ दक कि एक महीना शुज्ञर गया ।","विरक्त और विमन अपने कमरें में पड़ा रहता, न कहीं घूमने जाता, न किसी से मिलता ।","मुँह लटकाये भीतर आता और फिर बाहर चला जाता, यहाँ तक महीना गुजर गया ।" "यज़दानी पहले भातशपरस्त था, पीछे मुफ़्ल्माव हो गया था; पर अभी तक कभो कभो ठसके मन में शकाएं उठतो रहती थीं कि उसने क्यों इस्लाम कबूल किया ।",क्या मैं उसका नाम पूछ सकता हूँ ।,"यजदानी पहले आतशपरस्त था, पीछे मुसलमान हो गया था; पर अभी तक कभी-कभी उसके मन में शंकाएँ उठती रहती थीं कि उसने क्यों इस्लाम कबूल किया ।" उत्त औरत की उच्च दिन को पूरी मजूगे काट लेता और पुर चल नेवार्ला फो घुड़कियाँ जमाता ; पर आज उठते क्रोध नहों आया |,पहले यह दशा देखकर चैनसिंह आपे से बाहर हो जाता ।,"उस औरत की उस दिन मजूरी काट लेता और पुर चलानेवालों को घुड़कियाँ जमाता, पर आज उसे क्रोध नहीं आया ।" उसने पिट्टो छेऋर चाछी बाँव दो भौर खेत में जाकर घुढ़िया मे वोला--तू यहां बेठ' है और पावो सब पद्दा जा रद्द है ।,"उस औरत की उस दिन मजूरी काट लेता और पुर चलानेवालों को घुड़कियाँ जमाता, पर आज उसे क्रोध नहीं आया ।",उसने मिट्टी लेकर नाली बांध दी और खेत में जाकर बुढ़िया से बोला- तू यहाँ बैठी है और पानी सब बहा जा रहा है । "उनके हाथ से स्लाडू, छोनकर घूरे के घिर पर जप्ता दी |",मेरी आँखो में खून उतर आया ।,उनके हाथ से झाड़ू छीन कर घूरे के सिर जमा दी । मेने एक छौड़ो भो न दो ।,उस पर पूरी मजूरी भी चुका दूँ ।,मैंने एक कौड़ी भी न दी । यश के छोम ने जेसे 'छुद्धि द्वो इर ली |,आपको इसकी जरा भी चिंता न हुई कि पहनेंगे क्या ?,यश के लोभ ने जैसे बुद्धि ही हर ली । दामिद उनकी बिरादरी से एपक्‌ है ।,मजे से खा रहे हैं ।,हामिद बिरादरी से पृथक है । "भेया दोते, तो अब तह्न दो तोन बचा को माँ द्दो गई होती ।",हमीं लोगों के लिए मरती है ।,"भैया होते, तो अब तक दो-तीन बच्चों की माँ हो गयी होती ।" "में सिर पर पवि रखकर न भागतो, तो चमढ़ी ठघेड़ डालता ।","जब तक मैं निकलूँ, तब तक हंटर खींचकर दौड़ ही तो पड़ा ।",मैं सिर पर पाँव रखकर न भागती तो चमड़ा उधोड़ डालता । इसपे उनझों चाह कड जायगों(; इसलिए अब इसका विणेय ठुम्दारे दो ऊर है ।,"वह तुम्हें घुड़कियाँ दे-देकर जला-जलाकर चाहे मार डालें, पर विवाह करने की सम्मति कभी नहीं देंगे ।","इससे उनकी नाक कट जायेगी, इसलिये अब इसका निर्णय तुम्हारे ही ऊपर है ।" में वही अमापिनी हूँ ।,"फिर पत्र उठाकर पढ़ने लगी- ‘स्वामी’ जब यह पत्र आपके हाथों में पहुँचेगा, तब तक मैं इस संसार से विदा हो जाऊँगी ।",मैं बड़ी अभागिन हूँ । है उल्टी बात या नहीं 2 बालक भी इतनी-' सौ बात समस्त सकता है ; लेकिन इन अध्यापकों को इतनौ तमौज़ भी नहीं ।,है उल्टी बात या नहीं ?,"बालक भी इतनी-सी बात समझ सकता है, लेकिन इन अध्यापकों को इतनी तमीज भी नहीं ।" ु हल्कू ने रपये लिये और इध तरद बाहर चला मानों शुपओ हेडूंगेट निकालकर देने छा रह ।,"अच्छी खेती है ! मजूरी करके लाओ, वह भी उसी में झोंक दो, उस पर धौंस ।",हल्कू ने रुपये लिये और इस तरह बाहर चला मानो अपना हृदय निकालकर देने जा रहा हो । मह रॉड पछुवा न जाने कहाँ से दरफ बह्िये झा रहो है ।,"हल्कू ने हाथ निकालकर जबरा की ठंडी पीठ सहलाते हुए कहा- कल से मत आना मेरे साथ, नहीं तो ठंडे हो जाओगे ।",यह राँड पछुआ न जाने कहाँ से बरफ लिए आ रही है । जडरा ने उप्रके मुंह छो ओर प्रेत से छछतो हुई जाते से देखा ।,"हल्कू ने चिलम पीते हुए कहा- पियेगा चिलम, जाड़ा तो क्या जाता है, जरा मन बदल जाता है ।",जबरा ने उसके मुँह की ओर प्रेम से छलकती हुई आँखों से देखा । "रावी वसुधा ने गम्भोर बिनोद के भाव से कहा --क्या, वह कहेगा नहाँ, तू मेरे बोच में बोलमेवालो कौन है ।",ऐसी-ऐसी गालियाँ सुनाऊँ कि छठी का दूध याद आ जाय ।,"रानी वसुधा ने गम्भीर विनोद के भाव से कहा , क्यों, वह कहेगा नहीं, तू मेरे बीच में बोलनेवाली कौन है ?" "क़रा-सा पत्ता भो-खढ़कता, तो वह चौंक पढ़तो और बन्दृक सीधो फरने के बदले चोकरर कु भर साहब से चिम्ट जाती ।",कुँवर साहब शान्त थे ; पर वसुधा की छाती धड़क रही थी ।,"जरा-सा भी पत्ता खड़कता , तो वह चौंक पड़ती और बन्दूक सीधी करने के बदले में चौंककर कुँवर साहब से चिपक जाती ।" तोनों बन्दुर्क तो भरो ते्रार रखो हैं ।,'तो फिर दूसरी गोली चलेगी ।,तीनों बन्दूकें तो भरी तैयार रखी हैं । अपने घर में द्वानि-लाभ को जिम्मेदार वह आप है ।,इस वाक्य का आशय उसकी समझ में न आया ।,अपना हानि-लाभ! अपने घर में हानि-लाभ की जिम्मेदार वह आप है । "पुझ्ले अख्तियार है, थो उचित सप्रझूँ वद्द कं ।",उसने तमतमाये हुए मुख से कहा- मेरे हानि-लाभ के जिम्मेदार तुम नहीं हो ।,"मुझे अख्तियार है, जो उचित समझूँ, वह करूँ ।" "अँगारे की-सी लाल भाँखों से देखकर बोलौ--अच्छा, तो काको ने यह सलाद दी है, यह मन्त्र पढ़ाया है १","दाँत निकल आये थे, आँखें फट गयी थीं और नथुने फड़क रहे थे ।","अंगारे की-सी लाल आँखों से देखकर बोली— अच्छा, तो काकी ने यह सलाह दी है, यह मंत्र पढ़ाया है ?" "पल-भर द्वाथ-पाँद चलाये, फिर लद्टरं उप्ते नीचे खोँच ले गई! |",पानी में गिर पड़ी ।,"पल-भर हाथ-पाँव चलाये, फिर लहरें उसे नीचे खींच ले गयीं ।" "बहुत स्लँकियाँ देखी दोंगी तुमने; छेकित यद्द भौर,दी चोज़-है ।",सीधे तुम्हारे पास दौड़ा चला आ रहा हूँ ।,"बहुत झाँकियाँ देखी होंगी तुमने, लेकिन यह और ही चीज है ।" इसी मारे में चुपचाप पढ़ा था कि किसी तरद यह बला टछे ; लेकिन तुम प्विर पर सवार दो दी गये ।,"’ ‘तुम तो यार, बहुत दिक करते हो ।",इसी मारे मैं चुपचाप पड़ा था कि किसी तरह यह बला टले; लेकिन तुम सिर पर सवार हो गये । "अच्छा खाओ मेरे सिर की क्रतम, कि यह सबसे सुन्दर खाल नहीं है ?",' 'चकमा कौन देता था ?,"' 'अच्छा, खाओ मेरे सिर की कसम, कि यह सबसे सुन्दर खाल नहीं है ?" केशव की निष्ठुरठा और बेवफ़ाई का समाचार कहकर छज्ित होने का साहस उसमें न था ।,"प्रेमा ने भूमि की ओर ताकते हुए कहा — हाँ , उनकी तबीयत अच्छी नहीं है — इसके सिवा वह और क्या कहे ?",केशव की निष्ठुरता और बेवफाई का समाचार कहकर लज्जित होने का साहस उसमें न था । "दर्द से सिर फ्टा जा रद्दा है, भाधी रात दो गई ; मगर वद्द बेठो कुछ-न- कुछ सी रहो है, या 'इस कोठी का घाव उस कोटी कर रही है ?",गोपा की इज्जत सबकी इज्जत है और गोपा के लिए तो नींद और आराम हराम था ।,"दर्द से सिर फटा जा रहा है, आधी रात हो गयी मगर वह बैठी कुछ-न-कुछ सी रही है, या इस कोठी का धान उस कोठी कर रही है ।" मेरी यद् भालोचवा उप्ते बुरी छगे ।,गोपा ने व्यथित नेत्रों से मेरी ओर देखा ।,मेरी यह आलोचना उसे बुरीलगी । बालों को एक पूरी सेना छमगे और माइदार बाँध लिये हनद्ना स्वागत करने को दौढ़ी प्र रद्दो थो ।,"आँखें आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानो कोई आत्मा स्वर्ग से निकलकर विरक्त मन से नये संस्कार ग्रहण करने जा रही हो ।",बालकों की एक पूरी सेना लग गयी; और झाड़दार बाँस लिये उनका स्वागत करने को दौड़ी आ रही थी । यद लेह में डा हुआ विवय मानों के छिए अभूनपूर्वे था ।,"इंद्रनाथ ने ग द्ग द् स्वर में कहा- तुम्हारे पैरों पड़ता हूँ मानी, खोल दो ।",यह स्नेह में डूबा हुआ हुआ विनय मानी के लिये अभूतपूर्व था । "हाँ, मेरे गदने हैं, इन्हे छे जाव, छही गिर्रों रखकर ज़मानत दे दो |",मेरे पास तो कुछ नहीं है ।,"हाँ, मेरे गहने हैं, इन्हें ले जाओ, कहीं गिरों रखकर जमानत दे दो ।" काम-कोढ़ाएँ हुई दोगो ।,रात-भर प्याले के दौर चले होंगे ।,काम-क्रीड़ाएँ हुई होंगी । उप्तेत्ते सौनन्य और सट्टायंता में इथो हुई जातें करेंगे ।,' 'झिड़कने की कोई बात भी हो ।,उससे सौजन्य और सदयता में डूबी हुई बातें करेंगे । वद्द दुर्गन्ध उढ़तो है कि खोपड़ो भन्‍ना जातो है ।,"यहाँ के मकान हैं कि चिड़ियों के पिंजरे, न हवा, न रोशनी ।",वह दुर्गंध उड़ती है कि खोपड़ी भन्ना जाती है । "आपझो इसको क्षरा भो परवा नहीं दि चोठ- 'दपेठ था गई, तो क्‍या द्ोगा |","कोई लड़का मैच में जीतकर आ जाता है, तो ऐसे फूल उठते हैं, मानो किला जीतकर आया हो ।","आपको इसकी जरा भी परवाह नहीं कि चोट-चपेट आ गयी, तो क्या होगा ।" "अमोर समर- ऋ#ंगे, में फ़लूप्त से ज्यादा बढ़ा जा रद्द हूं ।","नहीं, उसे सत्य का पालन करना होगा, चाहे इसका नतीजा कुछ भी हो ।",अमीर समझेगें मैं जरूरत से ज्यादा बढ़ा जा रहा हूँ । शादी फ़ौजें मुसलमानों से जा पलों |,पाँसा पलट गया ।,शाही फौज मुसलमानों से जा मिली । "जब आपझ्ठी मर्जी ६ छि गांविन्याँव की साक छाबता फिर, तो वहों सद्दी ।",कोई दूसरा लड़का चुन लिया होगा और फिर करना ही क्या है ?,"जब आपकी मर्जी है कि गाँव-गाँव की खाक छानता फिरूँ, तो वही सही ।" "* करुणा--ठुमने अपर झुद्द सब से यह इशदा किया दोता, तो यों व शहुते ।",मैने तय कर लिया है कि जीवन को आपकी इच्छा के अनुकूल बनाऊँगा ।,"करूणा— तुमने अगर शुद्ध मन से यह इरादा किया होता, तो यों न रहते ।" गाँव छा कया! रण ढग है ?,"' हरिधन ने मुस्किराकर कहा- मँगरू, इन आमों में जो स्वाद है, वह और कहीं के आमों में नहीं है ।",गाँव का क्या रंग-ढंग है ? "मोहसिन--अच्छा, अवको ज़हर देंगे हमिद, भक्लाकपम;:लें जा ।",हामिद खिसिया जाता है ।,"मोहसिन— अच्छा, अबकी जरूर देंगे हामिद, अल्लाह कसम, ले जाव ।" "मैंने समझता, खेर, दुष् ने कम-से-कम एक काम तो सलीके से दिया ।",मैंने समझा ।,"खैर, दुष्ट ने कम-से-कम एक काम तो सलीके से किया ।" "गुस्सा उसकी नाक पर था, बात-बात पर मक़दूरों को गालियाँ देना, डॉटना और पीटना उसको आदत थीं ।",चैनसिंह उस दिन से दूसरा ही आदमी हो गया ।,"गुस्सा उसकी नाक पर रहता था, बात-बात पर मजदूरों को गालियाँ देना, डाँटना और पीटना उसकी आदत थी ।" शाम हुईं और आप बढ- नसीब बच्चे को गोद में लिये तेल या ई'घनवाले को दुकान पर खड़े हैं ।,"एक पक्ष जितना ही मोहक और आकर्षक है, दूसरा उतना ही हृदयविदारक और भयंकर ।",शाम हुई और आप बदनसीब बच्चे को गोद में लिये तेल या ईंधन की दुकान पर खड़े हैं । उसी दित तीसरे पहर छक्कौड़ो के घर की पिकेटिंग शुरू दो गई ।,चौथे ही दिन गोइंदों ने काँग्रेस को खबर पहुँचा दी ।,उसी दिन तीसरे पहर छकौड़ी के घर की पिकेटिंग शुरू हो गयी । पचि-8ः स्वय- सेविकाएं और इतने ही स्वयसेव द्वार पर स्थापा करने लगे ।,"अबकी सिर्फ पिकेटिंग शुरू न थी, स्यापा भी था ।",पाँच-छ: स्वयंसेविकाएँ और इतने ही स्वयंसेवक द्वार पर स्यापा करने लगे । * छकौड़ी आँगन में प्विर झुझाये खड़ा था ।,पाँच-छ: स्वयंसेविकाएँ और इतने ही स्वयंसेवक द्वार पर स्यापा करने लगे ।,छकौड़ी आँगन में सिर झुकाये खड़ा था । "” 'नुप्त जाओ भी, या यहीं से कानूत बघारने लगे |",' 'वहाँ भी कोई न सुनेगा ।,"' 'तुम जाओगे भी, या यहीं से कानून बघारने लगे ?" _ 'तो खड़े-खड़े यह गालियाँ सुबते रहोगे 2 ?,"यहाँ तो जिसने दुकान खोली, उसे दुनिया लखपती ही समझने लगती है ।",' 'तो खड़े-खड़े ये गालियाँ सुनते रहोगे ? नुम्दरे कहने से कहो चला जाऊँ ; मगर वहाँ ठठोडी के सिवा और छुछ नद्दोगा ।,' 'तो खड़े-खड़े ये गालियाँ सुनते रहोगे ?,' 'तुम्हारे कहने से चला जाऊँ; मगर वहाँ ठिठोली के सिवा और कुछ न होगा । "! “ई, मेरे कहने से जाओ ।",' 'तुम्हारे कहने से चला जाऊँ; मगर वहाँ ठिठोली के सिवा और कुछ न होगा ।,"' 'हाँ, मेरे कहने से जाओ ।" ईश्वरी के साथ परीक्षा की तेयारी ज्र्च हो भायबी ।,"इसलिए जब ईश्वरी ने मुझे अपने घर का नेवता दिया, तो मैं बिना आग्रह के राजी हो गया ।",ईश्वरी के साथ परीक्षा की तैयारी खूब हो जायगी । असामो भी यही पममरता ॥ है ।,वह लोग तो असामियों पर इसी दावे से शासन करते हैं कि ईश्वर ने असामियों को उनकी सेवा के लिए ही पैदा किया है ।,असामी भी यही समझता है । पेसे ईजरी के जेब से गये ।,मेरी वेश-भूषा और रंग-ढंग से पारखी खानसामों को यह पहचानने में देर न लगी कि मालिक कौन है और पिछलग्गू कौन; लेकिन न जाने क्यों मुझे उनकी गुस्ताखी बुरी लग रही थी ।,पैसे ईश्वरी की जेब से गये । प्यारी ने कद्दा--्ाँद का पानो ड़ गया है ।,इसमें पानी भरा हुआ है ।,प्यारी ने कहा- नाँद का पानी सड़ गया है । मुन्नों भूसे में मुंह नहों ढालतो ।,प्यारी ने कहा- नाँद का पानी सड़ गया है ।,मुन्नी भूसे में मुँह नहीं डालती । शझ्षिवदास सामिक साव से मुस्कराये ओर आर घहू के हाथ से घड़ा छे लिया ।,"देखते नहीं हो, कोस-भर पर खड़ी है ।",शिवदास मार्मिक भाव से मुसकराये और आकर बहू के हाथ से घड़ा ले लिया । "अब वह पहले की-सो दशा नहीं दै 'के कोई चोगड़े लपेटे घूम रद्द दे, करियों को पहने की धुन सवार है ।",आदमी से लेकर जानवर तक सभी स्वस्थ दिखाई देते हैं ।,"अब वह पहले की-सी दशा नहीं है कि कोई चिथड़े लपेटे घूम रहा है, किसी को गहने की धुन सवार है ।" "बाइर आरुर बोलो->भश्या ने तो नहीं डाटा, अब तुब आकर डांटो ।",मुलिया अपनी कोठरी में पड़ी सुन रही थी ।,बाहर आकर बोली— भइया ने तो नहीं डाँटा अब तुम आकर डाँटों । केदार-- वह तो थब अलग द्वो गये ।,"लछमन— मैं न जाऊँगा, दादा घुड़केंगे ।",केदार— वह तो अब अलग हो गये । "दुःखित नेतन्नों से देखकर बोला-तेरी जो मी थी, चद्दो तो हुआ ।",मुलिया के इन कठोर शब्दों ने घाव पर नमक छिड़क दिया ।,"दु:खित नेत्रों से देखकर बोला— तेरी जो मर्जी थी, वही तो हुआ ।" इतनी देर में दम बस्ती से कोई तीन मील निकल थाये है ।,"तुम्हारे उस डंडे में जो रस था, वह तो अब न आदर-सम्मान में पाता हूँ, न धन में ।",‘ इतनी देर में हम बस्ती से कोई तीन मील निकल आये । मेंने गुच्चो में गुछ्को रखइर उछाली ।,खेल शुरू हो गया ।,मैंने गुच्ची में गुल्ली रखकर उछाली । "उसने दाथ ऊपकाया, न से मछलो पकड़ रहा द्वो ।",गुल्ली गया के सामने से निकल गई ।,"उसने हाथ लपकाया, जैसे मछली पकड़ रहा हो ।" शुल्ली ठप्तके पीछे जाकर गिरो ।,"उसने हाथ लपकाया, जैसे मछली पकड़ रहा हो ।",गुल्ली उसके पीछे जाकर गिरी । जेपे गुलियों पर वशोकरण ढाल देता हो ।,"वह दा हि ने-बा एँ कहीं हो, गुल्ली उसकी हथेली में ही प हुँ चती थी ।",जैसे गुल्लियों पर वशीकरण डाल देता हो । "नई गुश्ने, पुरानो गुछ्के, छोटी गुल्लो, बड़ो गुल्लो, नोकदार शुल्ली, सपाट गुल्छी, सभो उससे मिल जाती थों ।",जैसे गुल्लियों पर वशीकरण डाल देता हो ।,"नयी गुल्ली, पुरानी गुल्ली, छोटी गुल्ली, बड़ी गुल्ली, नोकदार गुल्ली, सपाट गुल्ली सभी उससे मिल जाती थी ।" "जेसे उसके द्वा्थों में कोई चुम्बक दो, जो शुल्लियों को स्लींच लेता हो ; लेकिन आज शगुह्लो को उपप्ते वह प्रेम नहीं रहा ।","नयी गुल्ली, पुरानी गुल्ली, छोटी गुल्ली, बड़ी गुल्ली, नोकदार गुल्ली, सपाट गुल्ली सभी उससे मिल जाती थी ।","जैसे उसके हाथों में कोई चुम्बक हो, गुल्लियों को खींच लेता हो; लेकिन आज गुल्ली को उससे वह प्रेम नहीं रहा ।" "शुछ्लो पर ओछो चोट पढ़ती और वद्द ज़रा दुर पर धिर पढ़तो, तो में कपटकर उसे छाद उठा लेता और दोबारा टांड़ लगाता ।",हा लाँ कि शास्त्र के अनुसार गया की बारी आनी चाहिए थी ।,"गुल्ली पर ओछी चोट पड़ती और वह जरा दूर पर गिर पड़ती, तो मैं झपटकर उसे खुद उठा लेता और दोबारा टाँ ड़ लगाता ।" "गया यद्द सारी बे-कायदरगियाँ देख रद्दा या ; पर कुछ बोलता था, जे उसे वह सब क्रायदे-क्रानून भूल गये ।","गुल्ली पर ओछी चोट पड़ती और वह जरा दूर पर गिर पड़ती, तो मैं झपटकर उसे खुद उठा लेता और दोबारा टाँ ड़ लगाता ।","गया यह सारी बे-कायदगियाँ देख रहा था; पर कुछ न बोलता था, जैसे उसे वह सब कायदे-कानून भूल गए ।" उसका निशाना द्वितवा अचुकू था ।,"गया यह सारी बे-कायदगियाँ देख रहा था; पर कुछ न बोलता था, जैसे उसे वह सब कायदे-कानून भूल गए ।",उसका निशाना कितना अचूक था । ", अलग्योमा भोला महतो ने पहली स्त्री के मर जाने के बाद दूसरी सगाई को, तो उसके लड़के रू के लिए बुरे दिन आ गये ।",रग्घू की उम्र उस समय केवल दस वर्ष की थी ।,भोला महतो ने पहली स्त्री के मर जाने बाद दूसरी सगाई की तो उसके लड़के रग्घू के लिये बुरे दिन आ गये । वह अपने ह्वार्थों से कोई मोटा काम न करती ।,पन्ना रुपवती स्त्री थी और रुप और गर्व में चोली-दामन का नाता है ।,वह अपने हाथों से कोई काम न करती । भोला की आँखें कुछ ऐसी फिरों कि उसे अब रघ्घू में सब घुराइयाँ-द्वो-बुराश्याँ नक़र भातीं ।,रग्घू ही जूठे बरतन माँजता ।,भोला की आँखें कुछ ऐसी फिरीं कि उसे अब रग्घू में सब बुराइयाँ-ही- बुराइयाँ नजर आतीं । रुघू को शिकायतों को ज़रा भो परवाद् न करता ।,पन्ना की बातों को वह प्राचीन मर्यादानुसार आँखें बंद करके मान लेता था ।,रग्घू की शिकायतों की जरा परवाह न करता । "दसरो औरत द्वोतो, तो निबाद व होता ।","बड़ा जिद्दी लड़का है, पन्ना को तो कुछ समझता ही नहीं; बेचारी उसका दुलार करती है, खिलाती-पिलाती है यह उसी का फल है ।","दूसरी औरत होती, तो निबाह न होता ।" पन्‍ता के चार लड़के ये--तीन बेटे और एक बेटी ।,यहाँ तक कि आठ साल गुजर गये और एक दिन भोला के नाम भी मृत्यु का संदेश आ पहुँचा ।,पन्ना के चार बच्चे थे- तीन बेटे और एक बेटी । इतता बढ़ा खचे और फमानेवाला कोई नहीं |,पन्ना के चार बच्चे थे- तीन बेटे और एक बेटी ।,इतना बड़ा खर्च और कमानेवाला कोई नहीं । रूघ्‌ अब क्यों बात पूछने लगा ।,इतना बड़ा खर्च और कमानेवाला कोई नहीं ।,रग्घू अब क्यों बात पूछने लगा ? अपनो स्री छायेगा और अलग रहेगा ।,यह मानी हुई बात थी ।,अपनी स्त्री लाएगा और अलग रहेगा । शधेरे में कुछ न सूका |,गोकुल ने शायद यह पत्र लिखा होगा ।,अंधेरे में कुछ न सुझा । में हो ध्यका कारण हूँ ।,मुझे यह सुनकर अत्यंत दु:ख हुआ कि गोकुल भैया कहीं चले गये और अब तक उनका पता नहीं है ।,मैं ही इसका कारण हूँ । "मेरे कारण भापको इतता शोक हुआ इस्त॒ड्ा मुझे बहुत दुन्‍छ है ; मगर भेया आविंगे अवश्य, इसका मुझे विश्वास है ।",यह कलंक मेरे ही मुख पर लगना था वह भी लग गया ।,"मेरे कारण आपको इतना शोक हुआ, इसका मुझे बहुत दु:ख है, मगर भैया आवेंगे अवश्य, इसका मुझे विश्वास है ।" घड़ा में देखा तो भाठ बन रहे थे |,’ वंशीधर ने पत्र को फाड़कर पुर्जे-पुर्जे कर डाला ।,घड़ी में देखा तो आठ बज रहे थे । मुप्ताकिएों में सगदड़ मचो हुईं थो ।,8 बंबई मेल प्लेटफार्म पर खड़ी थी ।,मुसाफिरों में भगदड़ मची हुई थी । खोँचे- वार्लो को चोख-पुकार से कान में पही आवाज न सुनाई देतो थी ।,मुसाफिरों में भगदड़ मची हुई थी ।,खोमचे वालों की चीख-पुकार से कान में पड़ी आवाज न सुनाई देती थी । गाड़ो छूट+ में थोड़ी द्वो देर थी ।,खोमचे वालों की चीख-पुकार से कान में पड़ी आवाज न सुनाई देती थी ।,गाड़ी छूटने में थोड़ी ही देर थी । मानी और उत्तकी सास एक छनाने करे में धैठो हुईं थों ।,गाड़ी छूटने में थोड़ी ही देर थी ।,मानी और उसकी सास एक जनाने कमरे में बैठी हुई थीं । "भतीत' चाहे दुःखद हो क्यों न हो, उम्र धो स्मृतियाँ मधुर द्वोती हैं ।",मानी सजल नेत्रों से सामने ताक रही थी ।,"अतीत चाहे दुःखद ही क्यों न हो, उसकी स्मृतियाँ मधुर होती हैं ।" मानो आज उतर बुरे दिनों को दंमरण करके छुखो दो रहो थो ।,"अतीत चाहे दुःखद ही क्यों न हो, उसकी स्मृतियाँ मधुर होती हैं ।",मानी आज बुरे दिनों को स्मरण करके दु:खी हो रही थी । कभी-कभी बिएढ़ते थे तो क्या उत्तके सछे हो के लिए तो डाटते थे |,चाचाजी आ जाते तो उनके दर्शन कर लेती ।,"कभी-कभी बिगड़ते थे तो क्या, उसके भले ही के लिये तो डाँटते थे ।" "केप्ते आवे, समाज में इलूचल न मच जायगो ।",अब तो गाड़ी छूटने में थोड़ी ही देर है ।,"कैसे आवें, समाज में हलचल न मच जायगी ।" "भगवान्‌ की इच्छा दोगो, तो थब की जब यहाँ आाऊँगो तो जहर उनके दशन करू गी ।","कैसे आवें, समाज में हलचल न मच जायगी ।","भगवान की इच्छा होगी, तो अबकी जब यहाँ आऊँगी, तो जरूर उनके दर्शन करूँगी ।" "प्रेम्ा मत में सोच रद्दो शी माना, यह - देह माता-पिता शी है ; किन्तु आत्मा तो मेरी दे ।",वही मन्द वायु प्रबल वेग से पर्वत के मस्तक पर चढ़ जाती है और उसे कुचलती हुई दूसरी तरफ जा पहुँचती है ।,"प्रेमा मन में सोच रही थी — मानो , यह देह माता-पिता की है ; किन्तु आत्मा तो मेरी है ।" ॥ ह ग्रेम्ा ने सरल भाव से कहा -आप तो यों हो कहा करते हैं ।,"वह अभी नाश्ता करके कुछ पढऩे जा रही थी कि उसके पिता ने प्यार से पुकारा — मैं कल तुम्हारे प्रिन्सिपल के पास गया था , वे तुम्हारी बड़ी तारीफ कर रहे थे ।",प्रेमा ने सरल भाव से कहा — आप तो यों ही कहा करते हैं । "नहीं, सच ४ यह छदते हुए उन्होंने अपनों मेज़ को दराज़ खोली और मखप्डी चौखटों में जड़ी हुईं एक तथवीर निकालकर उसे दिखाते हुए बोछे-- यह लड़का आईं० सो० एस० के इम्तद्ान में प्रथम भाया है |","‘ नहीं , सच ।","’ यह कहते हुए उन्होंने अपनी मेज की दराज खोली , और मखमली चौखटों में जड़ी हुई एक तस्वीर निकालकर उसे दिखाते हुए बोले — यह लडक़ा आयी०सी०एस० के इम्तहान में प्रथम आया है ।" इसका नाम्र तो तुबने छुवा होपा ?,"’ यह कहते हुए उन्होंने अपनी मेज की दराज खोली , और मखमली चौखटों में जड़ी हुई एक तस्वीर निकालकर उसे दिखाते हुए बोले — यह लडक़ा आयी०सी०एस० के इम्तहान में प्रथम आया है ।",इसका नाम तो तुमने सुना होगा ? आज के देनिक-पत्न में उप्व्य चित्र और जोवन-इत्तान्त छपा है ।,पिता ने बनावटी आश्चर्य से कहा — क्या! तुमने उसका नाम ही नहीं सुना ?,आज के दैनिक पत्र में उसका चित्र और जीवन-वृत्तान्त छपा है । "आखिर उन उद्द भय इसके सिद्रा औौर कया होता है कि अपने य्रीब, निर्धत, दलित भाइयों पर शायव करें, और घूब घन सचय करें ।","मैं तो समझती हूँ , जो लोग इस परीक्षा में बैठते हैं वे पल्ले सिर के स्वार्थी होते हैं ।","आखिर उनका उद्देश्य इसके सिवा और क्या होता है कि अपने गरीब , निर्धन , दलित भाइयों पर शासन करें और खूब धन संचय करें ।" "और यहाँ इस विषय में जो कुछ टोकाएं होगो, बह तुम मुम्हपे ज्यादा जानती द्वो |","उस वक्त क्या परिस्थिति होगी , मैं नहीं कह सकता ।","और यहाँ इस विषय में जो कुछ टीकाएँ होंगी, वह तुम मुझसे ज्यादा जानती हो ।" योंद्दो हँयनेवाले क्या कमर हैं ?,कोई बात हो जाय तो सारी दुनिया हँसे ।,यों ही हँसनेवाले क्या कम हैं ? इस: मौके को द्वाथ से खो देने का अफ्रप्तोस मु्के उम्र भर रहेगा ।,"आपको पूरा अख्तियार है, मुझे जाने दें या न दें लेकिन मुल्क की खिदमत का ऐसा मौका शायद मुझे जिंदगी में फिर न मिले ।",इस मौके को हाथ से खो देने का अफसोस मुझे उम्र-भर रहेगा । "सदसा तेसूर ने कद्टा--इनोब, मेने आज तर तुम्हारो हरेक बात मानों है ।","वह कई बार तैमूर से शोखियाँ कर चुका है, कई बार हँसी कर चुका है, उसकी युवती चेतना, पद और अधिकार को भूलकर चहकती फिरती है ।","सहसा तैमूर ने कहा- हबीब, मैंने आज तक तुम्हारी हरेक बात मानी है ।" "अपनों के खून से भी इब द्वारथों को दायदार किया, ग्रेरों के खून से भो ।",इसके लिये मैंने वह सब कुछ किया जो मुझे न करना चाहिए था ।,अपनों के खून से भी इन हाथों को दागदार किया गैरों के खून से भी । मेरा काम्र भव खत्म दो चुछा ।,अपनों के खून से भी इन हाथों को दागदार किया गैरों के खून से भी ।,मेरा काम अब खत्म हो चुका । हबोब ने आकाश में उद़ते हुए कहा- इतना बढ़ा बोन्द् |,"मेरी यही इल्तजा है कि आज से तुम इस बादशाहत के अमीर हो जाओ, मेरी जिंदगी में भी और मरने के बाद भी ।",हबीब ने आकाश में उड़ते हुए कहा- इतना बड़ा बोझ । मेरे कन्पे इतने मज़- बूत नहीं हैं ।,हबीब ने आकाश में उड़ते हुए कहा- इतना बड़ा बोझ ।,मेरे कंधे इतने मजबूत नहीं हैं । "तेमूर ने दीन आम्रह के स्वर में छह्ा--नदों, मेरे प्यारे दोस्त, मेरो यह इल्तजा तुम्दें मानती पड़ेगी ।",मेरे कंधे इतने मजबूत नहीं हैं ।,"तैमूर ने दीन आग्रह के स्वर में कहा- नहीं मेरे प्यारे दोस्त , मेरी यह इल्तजा माननी पड़ेगी ।" उसने आहिस्ता से छद्दा-+ मजूर है ।,"हबीब की आँखों में हँसी थी, अधरों पर संकोच ।",उसने आहिस्ता से कहा- मंजूर है । "मेरे एक प्रइत का लवाब दोगी, पूछे ?","जो कुछ कहना है, वह कह डालना चाहता हूँ, क्यों वह लालसा ले जाऊँ ।","मेरे एक प्रश्न का जवाब दोगी, पूछूँ ?" करुणा ने पति के सिर पर द्वाथ रखते हुए कद्दा--पूछते क्‍यों तहीं प्यारे ! आदित्य ने करुणा के हाथों के कोमल स्पश का अनुभव करते हुए कद्दा--- म्द्रे विचार में मेशा जीवन कसा था ?,"क्रोध जैसे तलवार को बाहर खींच लेता है, विज्ञान जैसे जल-शक्ति का उद्घाटन कर लेता है, वैसे ही प्रेम रमणी के साहस और धैर्य को प्रदीप्त कर देता है ।",करूणा ने पति के सिर पर हाथ रखते हुए कहा— पूछते क्यों नहीं प्यारे! आदित्य ने करूणा के हाथों के कोमल स्पर्श का अनुभव करते हुए कहा— तुम्हारे विचार में मेरा जीवन कैसा था ? इस समय भी रुपष्ट ही कहता ।,"देखो, तुमने मुझसे कभी पर्दा नहीं रखा ।",इस समय भी स्पष्ट कहना । झुम्ते विद्धास है कि जीवन का यद ऊँ चा और पवित्र आदश सदेव तुम्दारे सामने रहेगा ।,"आदित्य ने सगर्व नेत्रों से करूणा को देखकर कहा बस, अब मुझे संतोष हो गया, करूणा, इस बच्चे की ओर से मुझे कोई शंका नहीं है, मैं उसे इससे अधिक कुशल हाथों में नहीं छोड़ सकता ।",मुझे विश्वास है कि जीवन-भर यह ऊँचा और पवित्र आदर्श सदैव तुम्हारे सामने रहेगा । किसे अपनी छाती चौरदूर दिखाये ?,वह किससे अपनी व्यथा कहे ?,किसे अपनी छाती चीरकर दिखाए ? करुणा पाधाण-मृति की भाँति खड़ी थी ।,"प्रकाश ने उसके चरण छुए, अश्रु-जल से माता के चरणों को पखारा, फिर बाहर चला ।",करूणा पाषाण मूर्ति की भाँति खड़ी थी । "सदसा गवाले ने आकर फट्ठा- पहूजी, भइया चले गये |",करूणा पाषाण मूर्ति की भाँति खड़ी थी ।,"सहसा ग्वाले ने आकर कहा— बहूजी, भइया चले गये ।" तब दरुणा की समाधि हटी ।,बहुत रोते थे ।,तब करूणा की समाधि टूटी । मेंने एक भनौतो मान रखी है ।,मैं भी वहीं जा रहा था ।,मैंने एक मनौती मान रक्खी है । २३६ मानसरोबर “उन दोनों साहबों के पास हमेशा मोटरें भेजी जाती रहो हैं; इसलिए मेंने भेज दो ।,मैं आज जरूर जाऊँगी ।,""" 'उन दोनों साहबों के पास हमेशा मोटरें भेजी जाती रही हैं; इसलिए मैंने भेज दीं ।" परित्यक्ता कौ भांति पड़ो रहकर वद्द जीवन को समाप्त न करना चाहतो भी ।,उसने उसी आवेश में आकर अपना भाग्य-निर्णय करने का निश्चय कर लिया था ।,परित्यक्ता की भाँति पड़ी रहकर जीवन को समाप्त न करना चाहती थी । "वह जाद्वर फुँअर साइब से कहेगी--अगर आप यद्द सममते हैं कि में आपको सम्पत्ति कौ लोंही बनकर रहूँ, तो यद्द मुझसे न दोगा ।",परित्यक्ता की भाँति पड़ी रहकर जीवन को समाप्त न करना चाहती थी ।,"वह जाकर कुँवर साहब से कहेगी अगर आप समझते हैं कि मैं आपकी सम्पत्ति की लौंडी बनकर रहूँ, तो यह मुझसे न होगा ।" आण्कौ सम्पत्ति आपको मुबारक हो |,"वह जाकर कुँवर साहब से कहेगी अगर आप समझते हैं कि मैं आपकी सम्पत्ति की लौंडी बनकर रहूँ, तो यह मुझसे न होगा ।",आपकी सम्पत्ति आपको मुबारक हो । . डाक्टर ने आश्वये से कहा--आप पौलोभीत जा रहौ हैं ! आपका ज्वर बढ जायगा ।,""" वसुधा ने नम्रता से कहा , ""आज क्षमा कीजिए, मैं जरा पीलीभीत जा रही हूँ ।",""" डाक्टर ने आश्चर्य से कहा , ""आप पीलीभीत जा रही हैं ! आपका ज्वर चढ़ जायगा ।" ईैदगाह से लीटते-लीटते दोपद्दर हो जायेगा |,जल्दी-जल्दी बैलों को सानी-पानी दे दें ।,ईदगाह से लौटते-लौटते दोपहर हो जायगी । रोज़ बढ़े-बूढ़ों के लिए द्वोंगे ।,"किसी ने एक रोजा रखा है, वह भी दोपहर तक, किसी ने वह भी नहीं, लेकिन ईदगाह जाने की खुशी उनके हिस्से की चीज है ।",रोजे बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे । "उन्हें क्या खबर कि चौधरी आज आँखें घदल लें, तो यद्द सारी ईद सुदरंम दो जाय ।",वह क्या जानें कि अब्बाजान क्यों बदहवास चौधरी कायमअली के घर दौड़े जा रहे हैं ।,"उन्हें क्या खबर कि चौधरी आँखें बदल लें, तो यह सारी ईद मुहर्रम हो जाय ।" "सहमद गिनता है, एक-दो, दक्ष-आरह, ! उसके पास बारह पेसे हैं ।",बार-बार जेब से अपना खजाना निकालकर गिनते हैं और खुश होकर फिर रख लेते हैं ।,"महमूद गिनता है, एक-दो, दस,-बारह, उसके पास बारह पैसे हैं ।" "किसौ को पता न चला, क्या बीमारी है ।","वह चार-पाँच साल का गरीब- सूरत, दुबला-पतला लड़का, जिसका बाप गत वर्ष हैजे की भेंट हो गया और माँ न जाने क्यों पीली होती-होती एक दिन मर गयी ।",किसी को पता क्या बीमारी है । पक़ेंगे क्या बेचारे ! मोहित को एक नई चोट सूक गई--तुम्दारे चिम्रटे का सुद्द रोज़ आग सें जलेया ।,इसकी सूरत देखकर दूर से भागेंगे ।,पकड़ेंगे क्या बेचारे! मोहसिन को एक नयी चोट सूझ गयी— तुम्हारे चिमटे का मुँह रोज आग में जलेगा । "महमूद ने एक ज़ोर लगाया--वक्कील साइव कुरसी-मेज पर बठेंगे, तुम्दारा' चिप्रटा तो बावरचीखाने में ज़प्तीच पर पढ़ा रहेगा ।","आग में कूदना वह काम है, जो यह रूस्तमे-हिन्द ही कर सकता है ।","महमूद ने एक जोर लगाया— वकील साहब कुरसी-मेज पर बैठेंगे, तुम्हारा चिमटा तो बावरचीखाने में जमीन पर पड़ा रहेगा ।" "ऐसी छा गईं कि तीनों सूरमा मुंद्द ताकते रह गये, मार्वा कोई घेलवा कंकौआ किसी गण्डेवाले ककौए को काट बया हो ।",खासी गाली-गलौज थी; लेकिन कानून को पेट में डालने वाली बात छा गयी ।,ऐसी छा गयी कि तीनों सूरमा मुँह ताकते रह गये मानो कोई धेलचा कनकौआ किसी गंडेवाले कनकौए को काट गया हो । द्वामिद मे मेदान मार लिया ।,उसको पेट के अंदर डाल दिया जाना बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती है ।,हामिद ने मैदान मार लिया । "साम ने डाटा, न तू औरों के खाथ जायगी, न अकेली जायपी, तो फिर जायगो केसे ; साफ़-साफ़ यद्द क्यों नहों छाती रि में न जाऊँगी ।",मुलिया ने और भी सिर झुका लिया और दबी हुई आवाज से बोली- सब मुझे छेड़ते हैं ।,"सास ने डाँटा- न तू औरों के साथ जायगी, न अकेली जायगी, तो फिर जायगी कैसे! वह साफ-साफ क्यों नहीं कहती कि मैं न जाऊँगी ।" "छिस्रो को चाम नहीं प्यारा द्ोता, काम प्यारा दोता दे ।",तो यहाँ मेरे घर में रानी बन के निबाह न होगा ।,"किसी को चाम नहीं प्यारा होता, काम प्यारा होता है ।" उपने मुल्या को रोनी सूत बताये जात देखा ; पर छुछ बोल न घक्का ।,उठा झाबा और घास ला! द्वार पर नीम के दरख्त के साये में महावीर खड़ा घोड़े को मल रहा था ।,उसने मुलिया को रोनी सूरत बनाये जाते देखा; पर कुछ बोल न सका । ऐशी सज़दूरो ही कौन होतो है ।,"घास मोल लेकर खिलाये, तो बारह आने रोज से कम न पड़े ।",ऐसी मजदूरी ही कौन होती है । "जब से यद्द सत्याताशा लारियाँ चलने लगो हैं, इश्करेता्लों दो बधिया वठ गई है |","मुश्किल से डेढ़-दो रुपये मिलते हैं, वह भी कभी मिले, कभी न मिले ।",जब से यह सत्यानाशी लारियाँ चलने लगी हैं; एक्केवालों की बधिया बैठ गयी है । मद्ाजन से डेढ़ सौ सय्ये उबार छेकर इक! और घोड़ा खरोदा था ; मगर लारियां के भागे इक्के को कौन पूछता है ।,कोई सेंत भी नहीं पूछता ।,महाजन से डेढ़-सौ रुपये उधार लेकर एक्का और घोड़ा खरीदा था; मगर लारियों के आगे एक्के को कौन पूछता है । इस इिलिजोई से मुलिया निद्वाल हो गई ।,"महाजन का सूद भी तो न पहुँच सकता था, मूल का कहना ही क्या! ऊपरी मन से बोला- न मन हो, तो रहने दो, देखी जायगी ।",इस दिलजोई से मुलिया निहाल हो गयी । दोनों तरक्न ऊब के खेत खड़े थे ।,बार-बार सतर्क आँखो से इधर-उधार ताकती जाती थी ।,दोनों तरफ ऊख के खेत खड़े थे । "काई चिह्ायेगा, तो चलो जाऊं यो ।","यहाँ आधा घंटे में जितनी घास छिल सकती है, सूखे मैदान में दोपहर तक न छिल सकेगी! यहाँ देखता ही कौन है ।","कोई चिल्लायेगा, तो चली जाऊँगी ।" "इसो तरद्द जो छोग बाहरवालों के लिए मरते हैं, उतझो प्रशसा घरवाले वर्यो करने लगे |","वह तो उनकी दृष्टि में स्वार्थी है, कृपण है, संकीर्ण हृदय है, आचार-भ्रष्ट है ।","इसी तरह जो लोग बाहरवालों के लिए मरते हैं, उनकी प्रशंसा घरवाले क्यों करने लगे ?" "यह दोष न होते, तो वह दुद्यय परदनाम ही क्यों दोती; पर इन्हें ऐसो द्वो गई-पीती दुकानों से चीज़ें लाने का मरज़ है ।","ऐसी दुकान पर न तो चीज अच्छी मिलती है, न तौल ठीक होती है, न दाम ही उचित होते हैं ।","यह दोष न होते, तो वह दुकान बदनाम ही क्यों होती; पर इन्हें ऐसी ही गयी-बीती दुकानों की चीजें लाने का मरज है ।" "मेरा भनुभव तो यद्द है, कि नोची दुकान पर द्वो घड़े पकवान भिलते हैं ।",शायद ऊँची दुकान और फीके पकवान के कायल हैं ।,"मेरा अनुभव तो यह है, कि नीची दुकान पर ही सड़े पकवान मिलते हैं ।" यज़दानी ने उसकी सूरत देखी और ७ णप्नो खीचो हुई तल्वार ग्यान में कर ली और खून के घूँ 2 पीकर बोछ-- जहाँपनाह एस वक्त फ्रतहमन्द हैं ; लेकिन भपराध क्षमा दो तो कह्ट दे कि अपने वन के दिष्य में तुर्का' को तातारियों पे उपदेश लेने छो ज़रूरत नहीं ।,"सान पर चढ़े हुए, इस्पात के समान उसके अंग-अंग से अतुल क्रोध की चिनगारियाँ निकल रही थीं ।",यजदानी ने उसकी सूरत देखी और जैसे अपनी खींची हुई तलवार म्यान में कर ली और खून के घूँट पीकर बोला- जहाँपनाह इस वक्त फतहमंद हैं लेकिन अपराध क्षमा हो तो कह दूँ कि अपने जीवन के विषय में तुर्कों को तातारियों से उपदेश लेने की जरूरत नहीं । "तंमर का खहाका मौत का ठह्दाका था, या मिरनेवाले बज का तढ़ाका ।",तैमूर जोर से हँसा और उसके सिपाहियों ने तलवारों पर हाथ रख लिये ।,तैमूर का ठहाका मौत का ठहाका था या गिरनेवा ले वज्र का तड़ाका । "बुम कहते हो, खदा ने तुम्हें ऐश करने के लिए पेढा किया दे ।",’ ‘मैं यह नहीं कहता ।,"’ तुम कहते हो, खुदा ने तुम्हें ऐश करने के लिये पैदा किया है ।" में कद्ठता हूँ यह धफ्र है ।,"’ तुम कहते हो, खुदा ने तुम्हें ऐश करने के लिये पैदा किया है ।","मैं कहता हूँ, यह कुफ्र है ।" "रसूले- पाक के बदमोँ को क्रम, मे बेरइम नहीं हूँ; ज़ालिम नहीं हूँ, खूंख्वार नहीं हूं ; शेकिन कुफ की रुज़ा मेरे ईमान में मौत के सिवा कुछ नहीं है ।",तैमूर दुनिया को इस कुफ्र से पाक कर देने का बीड़ा उठा चुका है ।,"रसूलेपाक के कदमों की कसम, मैं बेरहम नहीं हूँ जालिम नहीं हूँ, खूँख्वार नहीं हूँ, लेकिन कुफ्र की सजा मेरे ईमान में मौत के सिवा कुछ नहीं है ।" तातारी सेना भी तल्वारें खीच-खीचकर तुर्की सेना पर टूट पढ़े और दम-के-दम में कितनी दो लाश छमौन बर फड़कने ढूगों ।,उसने तातारी सिपहसालार की तरफ कातिल नजरों से देखा और तत्क्षण एक देव-सा आदमी तलवार सौंतकर यजदानी के सिर पर आ पहुँचा ।,तातारी सेना भी त लवारें खींच-खींचकर तुर्की सेना पर टूट पड़ी और दम-के-दम में कितनी ही लाशें जमीन पर फड़कने लगीं । स्या हो गई थी ।,"पर हाय रे दुर्दैव ! कहाँ तो विवाह की तैयारी हो रही थी, द्वार पर दरजी, सुनार, हलवाई सब अपना-अपना काम कर रहे थे, कहाँ निर्दय विधता ने और ही लीला रच दी ! विवाह के एक सप्ताह पहले मंगला अनायास बीमार पड़ी, तीन ही दिन में अपने सारे अरमान लिये हुए परलोक सिधार गयी ।",सन्ध्या हो गयी थी । "घर-चर का शोर हुआ, मार्तों गोंढ़ी भी इस खेल में लड़कों के साथ शरीक है ।",केदार खींचने लगा ।,चर-चर शोर हुआ मानो गाड़ी भी इस खेल में लड़कों के साथ शरीक है । भाये क्यों नहों ?,कहाँ रहा इतने दिन ! तब से सैकड़ों मन्नतें मान डालीं ।,आया क्यों नहीं ? पवोखिलालजो के पत्र कौ आहक-संख्या बढ़े वेग से बढ़ने लगी |,'नवरस' सब पत्रों में राजा है ।,चोखेलालजी के पत्र की ग्राहक-संख्या बड़े वेग से बढ़ने लगी । "“अगर आप इस इरादे से आये, तो आपका दुश्मन हो जाके ।",' 'अर्थात् यह कि कभी-कभी मैं आपके घर आकर अपनी आँखें ठंडी कर लिया करूँगा ।,' 'अगर आप इस इरादे से आयें तो मैं आपका दुश्मन हो जाऊँ । "में तो समरूता हूँ, यद भी डावटर्रों ने लूटने का एक लटका निकाला है ।","' 'ओ हो, आप तो मंकी ग्लैंड का नाम सुनते ही जवान हो गये ।","' 'मैं तो समझता हूँ, यह भी डाक्टरों ने लूटने का एक लटका निकाला है ।" पफर आपने याद दिला दो ।,' 'यह सूरत याद रहेगी ।,' 'फिर आपने याद दिला दी । आपकी जातों से दिल में गुदगुद्दे हो गई ।,यहाँ नि:स्वार्थ भाव से आत्म-समर्पण करते हैं ।,' 'आपकी बातों से दिल में गुदगुदी हो गयी । . - मेहमान उठ चुके थे ।,सैकड़ों रूपये पर पानी फिर गया! बदनामी हुई वह अलग ।,मेहमान उठ चुके थे । उनझो पवित्र आत्मा को तुमने यों छलड्वित किया ।,"आत्मा तो उनकी रो रही है, जिन्होंने अपनी जिन्दगी घर की मरजाद बनाने में खराब कर दी ।",उनकी पवित्र आत्मा को तुमने यों कलंकित किया ? "जिस मातृत्व को उसने जीवन को विभूति पम्रक्ा था, जिम्के चरणों पर वह सदेव अपनी समस्त अमिलाषा्ों और छामनाओं को अर्पित करके अपने को धन्य मानती थी, वद्दो मातृत्व आन उसे उप्त अग्तिकुण्ड-सा जान पढ़ा, जिसमें उतका जीवन जलझर भस्म दो रहा था ।",आज जीवन में पहली बार उसका वात्सल्य मग्न मातृत्व अभिशाप बनकर उसे धिक्कारने लगा ।,"जिस मातृत्व को उसने जीवन की विभूति समझा था, जिसके चरणों पर वह सदैव अपनी समस्त अभिलाषाओं और कामनाओं को अर्पित करके अपने को धन्य मानती थी, वही मातृत्व आज उसे अग्निकुंड-सा जान पड़ा, जिसमें उसका जीवन जलकर भस्म हो गया ।" "द्वार पर नीम का वक्ष सिर झुछाये निःस्तब्ध खढ़ा था, 'सारनों संसार की गति पर छ्षब्प द्ो रह्य हो ।",संध्या हो गयी थी ।,"द्वार पर नीम का वृक्ष सिर झुकाए, निस्तब्ध खड़ा था, मानो संसार की गति पर क्षुब्ध हो रहा हो ।" ॥ वह बड़ी देर तरू सुँद्द ढाँपे अपनी दशा पर रोतो रद्दी |,अपने बेटों की बातें और लातें गैरों की बातों और लातों की अपेक्षा फिर भी गनीमत हैं ।,वह बड़ी देर तक मुँह ढाँपे अपनी दशा पर रोती रही । सारी रात इस्ो भात्म- चेदना में कट गई ।,वह बड़ी देर तक मुँह ढाँपे अपनी दशा पर रोती रही ।,सारी रात इसी आत्म-वेदना में कट गयी । "कल केशव &' चुलाकर देखो, क्या कदता दे ।","जब नाक ही कट रही है , तो तेज छुरी से क्यों न कटे ।","कल केशव को बुलाकर देखो , क्या कहता है ।" किप्तों के मवोभावों का सम्मात न कर सकते थे |,कल्पना-शक्ति का अभाव था ।,किसी के मनोभावों का सम्मान न कर सकते थे । "नवयुग को बढतो हुई लद्टदर को वे सवेनाश कहदले थे, और कम-से-कप्त अपने घर को दोनों हाथों और दोनों पेरों का जोर छगाकर उप्से बचाया रखना चाहते थे ; इप्तलिए जब एक दिल प्रेप्ता के पिता उनके पास पहुँचे, और केशव से भ्रेम्ता के विवाद का अस्ताव दिया, तो बूढ़े पण्डितजी अपने भापे में न रद्द सके ।","वे अब भी उस संसार में रहते थे , जिसमें उन्होंने अपने बचपन और जवानी के दिन काटे थे ।","नवयुग की बढ़ती हुई लहर को वे सर्वनाश कहते थे , और कम-से-कम अपने घर को दोनों हाथों और दोनों पैरों का जोर लगाकर उससे बचाए रखना चाहते थे ; इसलिए जब एक दिन प्रेमा के पिता उसके पास पहुँचे और केशव से प्रेमा के विवाह का प्रस्ताव किया , तो बूढ़े पण्डित जी अपने आप में न रह सके ।" "मालम द्ोता है, आपको भी वये जमाने कौ दवा छूग गई ।","इस तरह का सम्बन्ध और चाहे जो कुछ हो , विवाह नहीं है ।","मालूम होता है , आपको भी नये जमाने की हवा लग गयी ।" "इस विषय में मेरे भो वह्दी विचार हैं, जो आपके , पर बात ऐपो था पढ़ो है. छि मुद्ते विवश होकर भाषकों सेवा में आना पढ़ा ।",बूढ़े बाबू जी ने नम्रता से कहा — मैं खुद ऐसा सम्बन्ध नहीं पसन्द करता ।,"इस विषय में मेरे भी वही विचार हैं , जो आपके ; पर बात ऐसी आ पड़ी है कि मुझे विवश होकर आपकी सेवा में आना पड़ा ।" रखोइये ने पूछा-- क्या सरकार भकेले भाई हैं ?,पिंजरे का द्वार खुलकर क्या उसका स्वागत न करेगा ?,"रसोइये ने पूछा, क्या सरकार अकेले आयी हैं ?" णाराम से रेलुगाढ़ो से आ सकती थीं ।,"इतने आदमी हैं , किसी को साथ न लिया ।",आराम से रेलगाड़ी से आ सकती थीं । वसुधा झाट पर पढ़े-पढ़े कुअर साइब को शुश्रुषाओं में अलोकिक आनन्द और सम्तोष छा अनुभव किया करती ।,जंगल में मंगल हो गया ।,वसुधा खाट पर पड़ी-पड़ी कुँवर साहब की सुश्रुषाओं में अलौकिक आनन्द और सन्तोष का अनुभव किया करती । "वह णो पहदर दिन चढ़े तन्न सोने के भादो ये, कितने सवेरे उठते, उसके पथ्य और आराम कौ ज्ञरा-ज़रा-सी बातों का कितना खयाल रखते ।",वसुधा खाट पर पड़ी-पड़ी कुँवर साहब की सुश्रुषाओं में अलौकिक आनन्द और सन्तोष का अनुभव किया करती ।,"वह दोपहर दिन चढ़े तक सोने के आदी थे , कितने सबेरे उठते, उसके पथ्य और आराम की जरा-जरा सी बातों का कितना खयाल रखते ।" मुझ्ते भ्रम दो रदा है ।,नोच ही डाले ।,मुझे भ्रम हो रहा है । कहाँ |,उपन्यास |,कहानी | अब तो कुछ नहीं चुनाई देता ।,मुझे भ्रम हो रहा है ।,कहाँ! अब तो कुछ नहीं सुनाई देता । ] ० जबरा भूंकता रहा ।,"मुझे भी कैसा धोखा हुआ! उसने जोर से आवाज लगायी- जबरा, जबरा ।",जबरा भूँकता रहा । उछ्ते अपनी जगह से दिलना ज़हर छा रद्दा था ।,अब वह अपने को धोखा न दे सका ।,उसे अपनी जगह से हिलना जहर लग रहा था । वह अपनी लागद से न दिला ।,"इस जाड़े-पाले में खेत में जाना, जानवरों के पीछे दौड़ना असह्य जान पड़ा ।",वह अपनी जगह से न हिला । अक्र्नेण्पता ने रप्तिसियों को भाँति उस्ते चारों तरफ़ से जकड़ रखता था ।,"जबरा अपना गला फाड़ डालता था, नीलगायें खेत का सफाया किए डालती थीं और हल्कू गर्म राख के पास शांत बैठा हुआ था ।",अकर्मण्यता ने रस्सियों की भाँति उसे चारों तरफ से जकड़ रखा था । हत्कू ने उठऋर कह्ा--क्या तु खेत से होरूर आ रहो है ?,तुम यहाँ आकर रम गए और उधर सारा खेत चौपट हो गया ।,हल्कू ने उठकर कहा- क्या तू खेत से होकर आ रही है ? "गुल्लो कृप्ती दो दो, उठ पर इस तरद् लपदता था, जसे छिपकली कौड़ों पर लपकती है ।","दुबला, बंदरों की-सी लम्बी-लम्बी, पतली-पतली उँगलि याँ , बंदरों की-सी चपलता, वही झल्लाहट ।","गुल्ली कैसी ही हो, पर इस तरह लपकता था, जैसे छिपकली कीड़ों पर लपकती है ।" एक दिन इम और गया दो द्वो खेल रहे ये ।,"हम सब उसे दूर से आते देख, उसका दौड़कर स्वागत करते थे और अपना गोइयाँ बना लेते थे ।",एक दिन मैं और गया दो ही खेल रहे थे । "वह पदा रद्द था, में पद रहा था; मगर कुछ विचित्र बात है कि पदाने में हम दिव-भर मस्त रद्द सकते हैं, पटना एक मिनट का भी अखरता है ।",वह पदा रहा था ।,"मैं पद रहा था, मगर कुछ विचित्र बात है कि पदाने में हम दिन-भर मस्त रह सकते है; पदना एक मिनट का भी अखरता है ।" "मेंने गला छुद्ने के लिए वह सब चालें चलीं, जो ऐसे अवसर पर शात्नन-विद्वित न होने पर भी क्षम्य हैं; लेकिव गया अपना दाँव लिये व्ग्रेर मेरा पिण्ड न छोड़ता था ।","मैं पद रहा था, मगर कुछ विचित्र बात है कि पदाने में हम दिन-भर मस्त रह सकते है; पदना एक मिनट का भी अखरता है ।","मैंने गला छुड़ाने के लिए सब चालें चलीं, जो ऐसे अवसर पर शास्त्र-विहित न होने पर भी क्षम्य हैं, लेकिन गया अपना दाँव लिए बगैर मेरा पिंड न छोड़ता था ।" "“अच्छा, कऊ मेने अमरुद खिलाया था ।","दाँव दिया है, दाँव लेंगे ।","‘ ‘अच्छा, कल मैंने अमरूद खिलाया था ।" में पीछे-पीछे दौढ़ रद्दा था ।,"भाई साहब लंबे हैं ही, उछलकर उसकी डोर पकड़ ली और बेतहाशा होस्टल की तरफ दौड़े ।",मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था । "बस, कलाई में दो काँच कौ चूढ़ियाँ और एक उन्नली साढ़ी, यही उस्रका सिंगार है ।",इन चीजों से उसे घृणा हो गयी है ।,"बस, कलाई में दो चूडियाँ और एक उजली साड़ी; यही उसका सिंगार है ।" मेंने गोपा को सांतना दी--में जाकर ज़रा केदारनाथ से मिलँगा ।,"बस, कलाई में दो चूडियाँ और एक उजली साड़ी; यही उसका सिंगार है ।",मैंने गोपा को सांत्वना दी- मैं जाकर केदारनाथ से मिलूँगा । "गोपा ने द्वाथ जोड़कर फद्दा--नहीं भेया, भूलकर भी न जाना ; सुन्वो सुनेगी तो प्राण ही दे देगी ।","देखूँ तो, वह किस रंग ढंग का आदमी है ।","गोपा ने हाथ जोड़कर कहा- नहीं, भूलकर भी न जाना; सुन्नी सुनेगी तो प्राण ही दे देगी ।" "सयोग से पिता और पुत्र, दोनों एक द्वी जगद्ट मिल गये ।",मैं रहस्य का पता लगाना चाहता था ।,"संयोग से पिता और पुत्र, दोनों ही एक जगह पर मिल गये ।" "जब तक रहा, सिर झुकाये वेठा रद्दा ।",यह भावना ही न हो सकती थी कि इसके भीतर और बाहर में कोई अंतर हो सकता है ।,जब तक रहा सिर झुकाये बैठा रहा । उच्छुद्लता तो उसे छू भी नहों गई थी ।,जब तक रहा सिर झुकाये बैठा रहा ।,उच्छृंखलता तो उसे छू भी नहीं गयी थी । सनक सवार हों गई ।,नतीजा यह हुआ कि इन महाशय को मुफ्त का धन मिला ।,सनक सवार हो गयी । में इन मद्ाशय की चाल सम रही थी ।,"मेरी खुशामद भी खूब हो रही है, मेरे मैके वालों की प्रशंसा भी हो रही है, मेरे गृह-प्रबंध का बखान भी असाधारण रीति से किया जा रहा है ।",मैं इस महाशय की चाल समझ रही थी । केवल इसलिए कि मुझे बन्द प्रध्म उठाने का अवसर न मिले ; लेकिन में भर्ती कंब चूकमेवाली थी ।,"सारे राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, आचारिक प्रश्नों की मुझसे व्याख्या की जाती थी, इतने विस्तार और गवेषणा के साथ, कि विशेषज्ञ भी लोहा मान जायें ।",केवल इसलिए कि मुझे वह प्रसंग उठाने का अवसर न मिले; लेकिन मैं भला कब चूकनेवाली थी । अब तो एक इज़ार से कम न॑ द्वोगा; पर हमें कभी एक मंसौ कौंढ़ी भी नहीं मिली |,पाँच सौ रुपये साल का नफा तो दस साल पहले था ।,"अब तो एक हजार से कम न होगा, पर हमें कभी एक कानी कौड़ी भी नहीं मिली ।" "दो इंजार न हो, एक हजार हो, पाँच सौ हो, ढाई सौ दो, ऊुँछ न हो, तो बीमा के प्रोमियम- भर फो तो हो ।",मोटे हिसाब से हमें दो हजार मिलना चाहिए ।,"दो हजार न हों, एक हजार हों, पाँच सौ हों, ढाई सौ हों, कुछ न हों, तो बीमा के प्रीमियम भर के तो हों ।" थआप हें-हैं हाँ-ाँ करने लगे ।,"तहसीलदार साहब की आमदनी हमारी आमदनी की चौगुनी है, रिश्वतें भी लेते हैं; तो फिर हमारे रुपये क्यों नहीं देते ?","आप हें-हें, हाँ-हाँ, करने लगे ।" "ममसे पूछते, में एक नहीं, दजार बता देती, एक-से-एक बढ़कर--कह देते, घर में * ज्याग लग गई, सब कुछ घ्वाद्दा हो गया, या चोरी दो गई, तिनका तक न बचा, या दस हार का भनाज भरा था, ठठ्यें घाटा रद्दा, था किसो से फौजदारी हो गईं, उसमें दिचाला पिट गया |",इस भले आदमी को बहाने गढ़ने भी नहीं आते ।,"मुझसे पूछते मैं एक नहीं, हजार बता देती, एक-से-एक बढ़कर कह देते घर में आग लग गयी, सब कुछ स्वाहा हो गया था, या चोरी हो गयी, तिनका तक न बचा या दस हजार का अनाज भरा था, उसमें घाटा रहा, या किसी से फौजदारी हो गयी, उसमें दिवाला पिट गया ।" "प्लेस की एक महिला से रुपये के लिये, तग जाकर काम चलों ।",तकदीर ठोंककर बैठ रही ।,"पड़ोस की एक महिला से रुपये कर्ज लिए, तब जाकर काम चला ।" ३०० मानसरोवर कोई चार बजे चेनथिंदह कचहरी से फुरसत पाकर बाहर निकले ।,चैनसिंह ने उसे पाँच बजे आने को कह दिया ।,कोई चार बजे चैनसिंह कचहरी से फुरसत पाकर बाहर निकले । घोड़े खोल दिये गये थे ।,"हाते में पान की दुकान थी, जरा और आगे बढ़कर एक घना बरगद का पेड़ था, उसकी छाँह में बीसों ही ताँगे; एक्के, फिटनें खड़ी थीं ।",घोड़े खोल दिए गये थे । सिर पर घापध का ऋषा रखे साईंसों से मोल-भाव कर रही थी |,"चैनसिंह ने पानी पिया, पान खाया और सोचने लगा कोई लारी मिल जाय, तो जरा शहर चला जाऊँ कि उसकी निगाह एक घासवाली पर पड़ गयी ।",सिर पर घास का झाबा रक्खे साईसों से मोल-भाव कर रही थी । "सब-के-सब छेपे उसकी ओर 2कटको लगाये ताक रहे हैं, मार्ना आँखों से पी जायेंगे ।","एक ताँगेवाले ने, जो गुलाबी पगड़ी बांधे हुए था, बोला- बुढ़ऊ के मुँह में पानी भर आया, अब मुलिया काहे को किसी की ओर देखेगी! चैनसिंह को ऐसा क्रोध आ रहा था कि इन दुष्टों को जूते से पीटे ।","सब-के-सब कैसे उसकी ओर टकटकी लगाये ताक रहे हैं, आँखो से पी जायेंगे ।" "केसा मुघ्र- किरा-मुसकिराकर, रसोली आंखों से देख-देखऋूर, सिर का भश्वल खिसका-खिसक्राकर, मुँह मोढ़-मोरकर बातें कर रद्दो है ।","न लजाती है, न झिझकती है, न दबती है ।","कैसा मुसकिरा-मुसकिराकर, रसीली आँखो से देख-देखकर, सिर का अंचल खिसका- खिसकाकर, मुँह मोड़-मोड़कर बातें कर रही है ।" अमक्े भोर वकोल-सुख्तारों का एक मेला-सा निकल पढ़ा ।,इतने में चार बजे ।,अमले और वकील-मुख्तारों का एक मेला-सा निकल पड़ा । कई महाशर्यों गे मुल्या को रक्षिऋ नेत्रों से देखा और अपनी गाढ़ियोँ पर जा बेठे ।,कोचवानों ने भी चटपट घोड़े जोते ।,कई महाशयों ने मुलिया को रसिक नेत्रों से देखा और अपनी-अपनी गाड़ियों पर जा बैठे । एकाएक मुल्या घास का म्लाबा लिये उस फिडन के पिठे दौढ़ी ।,कई महाशयों ने मुलिया को रसिक नेत्रों से देखा और अपनी-अपनी गाड़ियों पर जा बैठे ।,एकाएक मुलिया घास का झाबा लिये उस फिटन के पीछे दौड़ी । अकेली मरतों हैँ ।,"प्यारी ने विनोद करते हुए पूछा- कहना क्या हे, मैं तुमसे पूछती हूँ, अपनी सगाई क्यों नही कर लेते ?",अकेले मरती हूँ । तब एक से दो द्वो जाऊंगी ।,अकेले मरती हूँ ।,तब एक से दो हो जाऊँगी । "में ऐसी मेदरिया केकर क्या कहँगा, जो गइनों के लिए मेरी जाव खातो रहे ।","जोखू शरमाता हुआ बोला- तुमने फिर वही बेबात की बात छेड़ दी, मालकिन! किससे सगाई कर लूँ यहाँ ?","ऐसी मेहरिया लेकर क्या करूँगा, जो गहनों के लिए मेरी जान खाती रहे ।" प्यारी के कपोर्लों पर इल्का-पा रम भा गया ।,"तुमने तो कभी गहनों के लिए हठ न किया, बल्कि अपने सारे गहने दूसरों के ऊपर लगा दिये ।",प्यारी के कपोलों पर हल्का-सा रंग आ गया । "प्यारी ने उस्ते पीछे की ओर ढकेलते हुए छद्दा--कहोगे केसे नदीं, में कहलाके छोड़ गी ।",जोखू- तो मैं न कहूँगा ।,"प्यारी ने उसे पीछे की ओर ठेलते हुए कहा- कहोगे कैसे नहीं, मैं कहला के छोड़ूँगी ।" "श जोखू-में चाहता हूँ कि वह तुम्दारों तरद हो, ऐसो ही गंभीर हो, ऐसी हौ बातचीत में चतुर द्ो, ऐसा ही अच्छा खाना पकातो हो, ऐसौो ही क्रिफायती हो, ऐसी दी इंसप्ुख दो ।","प्यारी ने उसे पीछे की ओर ठेलते हुए कहा- कहोगे कैसे नहीं, मैं कहला के छोड़ूँगी ।","जोखू- मैं चाहता हूँ कि वह तुम्हारी तरह हो, ऐसी गंभीर हो, ऐसी ही बातचीत में चतुर हो, ऐसा ही अच्छा पकाती हो, ऐसी ही किफायती हो, ऐसी ही हँसमुख हो ।" बहू दो पहले सछुराल जाती दे दो उसका क्वितना मद्दातम होता है ।,"यह नहीं सोचते कि पहले और बात थी, अब और बात है ।",बहू तो पहले ससुराल जाती है तो उसका कितना महातम होता है । "मद्दीनों उसे घर-भर से अच्छा"" ख,ने को मिलता है, अच्छा पहनने को, कोई छाम्र नहीं लिया लाता ; लेकिन छ महीनों के बाद कोई उसकी बात भी नहीं पूछता, वह घर-मर की लौंडी हो जाती ६"" उनके घर में मेरी भी तो वद्दो मति होती ।","उसके डोली से उतरते ही बाजे बजते हैं, गाँव-मुहल्ले की औरतें उसका मुँह देखने आती हैं और रुपये देती हैं ।","महीनों उसे घर भर से अच्छा खाने को मिलता है, अच्छा पहनने को, कोई काम नहीं लिया जाता; लेकिन छ: महीनों के बाद कोई उसकी बात भी नहीं पूछता, वह घर-भर की लौंडी हो जाती है ।" किए काहे का रोबा ।,उनके घर में मेरी भी तो वही गति होती ।,फिर काहे का रोना । फपदर काम लेता है ।,"उसे आदमी डाँटता भी है, मारता भी है, जब चाहता है, रखता है, जब चाहता है, निकाल देता है ।",कसकर काम लेता है । "किस आादमों ने कभो जवान नदों लोछो, इमेशा गुलामों की तरद द्वाथ बाँधे द्वाक्षिर रद्द, वद्द भाज एक्ाएक इतना आत्माभिमानी हो जाय, यह उनकी चौंका देने के छिए काफी था ।",दोनों साले हक्का-बक्का हो गये ।,"जिस आदमी ने कभी जबान नहीं खोली, हमेशा गुलामों की तरह हाथ बाँध हाजिर रहा, वह आज एकाएक इतना आत्माभिमानी हो जाय, यह उनको चौंका देने के लिए काफी था ।" "कुछ जवाब व सूम्का दरिधन ने देखा, इन दोनों के कदम उखढ़ गये हैं, तो एक घकाा और देने की प्रघकत इच्छा को न रोछ सका ।",कुछ जवाब न सूझा ।,"हरिधन ने देखा, इन दोनों के कदम उखड़ गये हैं, तो एक धक्का और देने की प्रबल इच्छा को न रोक सका ।" उसी ढग से बोला-- मेरे भी णांखें हैँ ।,"हरिधन ने देखा, इन दोनों के कदम उखड़ गये हैं, तो एक धक्का और देने की प्रबल इच्छा को न रोक सका ।",उसी ढंग से बोला- मेरी भी आँखें हैं । “अबको हरिघत लाजवाब हुआ |,छाती फाड़कर काम करूँ और उस पर भी कुत्ता समझा जाऊँ; ऐसे गधे और कहीं होंगे ! अब बड़े साले भी गर्म पड़े- तुम्हें किसी ने यहाँ बाधँ तो नहीं रक्खा है ।,अबकी हरिधन लाजवाब हुआ । "बातन, कपड़े, घो, शकर, सभी सामाव इफ़्तत हे जप्ता हो गये ।",इन थोड़े से दिनों में सुभागी ने न जाने कैसे रुपये जमा कर लिये थे कि जब तेरही का सामान आने लगा तो गाँववालों की आँखें खुल गयीं ।,"बरतन, कपड़े, घी, शक्कर, सभी सामान इफरात से जमा हो गये ।" में सेया छो दिखा देना चाहती हूँ कि अग्रक्या क्या कर सकती है ।,बाबूजी फिर थोड़े ही आवेंगे ।,मैं भैया को दिखा देना चाहती हूँ कि अबला क्या कर सकती है । "वद्द समरूते होंगे, इन दोनों के किये कुछ न द्वोगा ।",मैं भैया को दिखा देना चाहती हूँ कि अबला क्या कर सकती है ।,वह समझते होंगे इन दोनों के किये कुछ न होगा । तेरदवीं के दिव भाठ गाँव के ब्राह्मणों का भोश्न हुआ ।,लक्ष्मी चुप हो रही ।,तेरही के दिन आठ गाँव के ब्राह्मणों का भोज हुआ । लक्ष्मी थककर यों शई थी ।,पिछले पहर का समय था; लोग भोजन करके चले गये थे ।,लक्ष्मी थक कर सो गयी थी । "खुम्मू मे छह्ा--काकी, सब पेढ़ दौड़ रहे थे ।","कितने खुश थे सब, मानों हवाई जहाज पर बैठ आये हों ।",खुन्नू ने कहा- काकी सब पेड़ दौड़ रहे थे । उम्रद्दी व्यज्ञवाशक्ति उछल-कूद और नेत्रों तक परि- मित थी--तालियं बजा-षज्ाकर नाच रही थी ।,झुनिया सबसे छोटी थी ।,उसकी व्यंजना-शक्ति उछल-कूद और नेत्रों तक परिमित थी-तालियाँ बजा-बजाकर नाच रही थी । पन्‍्ना सन्‍्माटे में आ गई ।,"इसके पच्चीस रुपये मिल रहे हैं, पाँच रुपये बछिया के मुजरा दे दूँगा! बस, गाय अपनी हो जायगी ।",पन्ना सन्नाटे में आ गयी । अब उसछा अवेशायों मन सो रू के प्रेम और सज्जनता को अत्वोकार न कर सत् ।,पन्ना सन्नाटे में आ गयी ।,अब उसका अविश्वासी मन भी रग्घू के प्रेम और सज्जनता को अस्वीकार न कर सका । बोलो--मोदर को क्यों बेंच देते दो ?,अब उसका अविश्वासी मन भी रग्घू के प्रेम और सज्जनता को अस्वीकार न कर सका ।,बोली- मुहर को क्यों बेचे देते हो ? गाय की अभी कोन जल्दों दे ।,बोली- मुहर को क्यों बेचे देते हो ?,गाय की अभी कौन जल्दी है ? "हाथ में पेंसे दो जाये, तो के लेता |",गाय की अभी कौन जल्दी है ?,"हाथ में पैसे हो जायँ, तो ले लेना ।" "सुने तुर्को ,के खूत के बहते दरिया में अपने धोंड़ों के सम नहीं भिगोये हैं, बल्कि हसलाम को जढ़ से खोदकर फेछ दिया दे ।","क्या इसी कत्ल, खून और बहते दरिया से तू दुनिया में अपना नाम रोशन करेगा ?","तूने तुर्कों के खून बहते दरिया में अपने घोड़ों के सुम नहीं भिगाये हैं, बल्कि इस्लाम को जड़ से खोदकर फेंक दिया है ।" "यह वोर तुककों' का द्वी आत्मोत्सये है, जिसने यूरोप में इसलाम की तौद्दोद फेलाई ।","तूने तुर्कों के खून बहते दरिया में अपने घोड़ों के सुम नहीं भिगाये हैं, बल्कि इस्लाम को जड़ से खोदकर फेंक दिया है ।","यह वीर तुर्कों का ही आत्मोत्सर्ग है, जिसने यूरोप में इस्लाम की तौहीद फैलाई ।" इसों से मर्द रइते हैं--रि्रियों को आजादी न मिलना चाहिए ।,वृद्धा ने कहा- बड़ी बेशर्म है ! नवयौवना ने तिरस्कार-भाव से उसकी ओर देखकर कहा- ठाट तो भले घर की देवियों के हैं ! 'बस ठाट ही देख लो ।,इसी से मर्द कहते हैं स्त्रियों को आजादी न मिलनी चाहिए । बलुक्ते तो कोई वेश्या मालम होती है ।,इसी से मर्द कहते हैं स्त्रियों को आजादी न मिलनी चाहिए ।,' 'मुझे तो कोई वेश्या मालूम होती है । वेश्या दो सही ; पर ठसे इतती बेश्मी फरके स्त्री-एमाज को ऊबज्जित करने का क्या अधिकार है ।,' 'मुझे तो कोई वेश्या मालूम होती है ।,"' 'वेश्या ही सही, पर उसे इतनी बेशर्मी करके स्त्री-समाज को लज्जित करने का क्या अधिकार है ?" "'बेहयाई है, में परदा नहीं न्यद्वती, पुरुषों की गुलामी नहों चाइतो, लेकिन औरतों में जो गौरवशीलता और सलूजता है, उप्ते नहीं छोड़ना चाइती ।",' 'बेहयाई है ।,"मैं परदा नहीं चाहती, पुरुषों की गुलामी नहीं चाहती; लेकिन औरतों में जो गौरवशीलता और सलज्जता है, उसे नहीं छोड़ना चाहती ।" स्त्री अपने दिल में समम्स्ती रदती है कि चह स्वाधोन नहीं है ; इसलिए बह अपनी श्वाघीनता का ढोग फरती है |,वह स्वाधीनता का स्वाँग नहीं भरता ।,"स्त्री अपने दिल में समझती है कि वह स्वाधीन नहीं है, इसलिए वह अपनी स्वाधीनता का ढोंग करती है ।" "जो दुघल हैं, वद्दी अकए दिखाते हैं ।","जो बलवान् हैं, वे अकड़ते नहीं ।","जो दुर्बल हैं, वही अकड़ दिखाते हैं ।" क्या भाप उन्हें अपने जाँसू पहने के ल्ए इतना शधिव्गर भी नहीं देना चाहती १ ?,"जो दुर्बल हैं, वही अकड़ दिखाते हैं ।",क्या आप उन्हें अपने आँसू पोंछने के लिए इतना अधिकार भी नहीं देना चाहतीं ? भर महीने में दत्न-पाँच मदिलाएँ उन्हें डर्यत भी दे छातीं ।,"कोई आशीर्वाद माँगती, कोई उनके मुख से सांत्वना के दो शब्द सुनने की अभिलाषा करती, कोई उनसे घरेलू संकटों में परामर्श पूछती ।",और महीने में दस-पाँच महिलाएँ उन्हें दर्शन भी दे जातीं । "कोई देवो पाश्यल से अचार भेज देती, कोई लड़दड्ू , एक मे पूजा का ऊत्तो आसन अपने द्वार्थों बवाकर भेज दिया ।","उनके भरे हुए भंडार में से अगर एक क्षुधित प्राणी को थोड़ी-सी मिठाई दी जा सके, तो उससे भंडार की शोभा ही है ।","कोई देवी पारसल से अचार भेज देती, कोई लड्डू; एक ने पूजा का ऊनी आसन अपने हाथों बनाकर भेज दिया ।" दूसरी देवों अद्दीने में दो-तीव षार आकर उन्हें अच्छी-अच्छो घोज़े बनाकर खिला जातो था ।,एक देवी महीने में एक बार आकर उनके कपड़ों की मरम्मत कर देती थीं ।,दूसरी देवी महीने में दो-तीन बार आकर उन्हें अच्छी-अच्छी चीजें बनाकर खिला जाती थीं । द्वलियोँ के अधिकारों का उनसे कड़ा रक्षझ शायद द्वो कोई मिले ।,अब वह किसी एक के न होकर सबके हो गये थे ।,स्त्रियों के अधिकारों का उनसे बड़ा रक्षक शायद ही कोई मिले । "फूलमतो अपने नियम ओविरुद: आज सढ़के दी उठी, रात-भर में उसका मानसिक परिवतंन दो चुछा था ।","शरद का प्रभाव डरता-डरता उषा की गोद से निकला,जैसे कोई कैदी छिपकर जेल से भाग आया हो ।","फूलमती अपने नियम के विरूद्ध आज तड़के ही उठी, रात-भर मे उसका मानसिक परिवर्तन हो चुका था ।" "छँचे कुछ की कन्या, मुँह कत्ते खोलती ।","तिथि नियत हुई, बारात आयी, विवाह हुआ और कुमुद बिदा कर दी गयी फूलमती के दिल पर क्या गुजर रही थी, इसे कौन जान सकता है; पर चारों भाई बहुत प्रसन्न थे, मानो उनके हृदय का काँटा निकल गया हो ।","ऊँचे कुल की कन्या, मुँह कैसे खोलती ?" "नहीं, चुपके-प्े चुद्दिया निकालकर फेंद् देते ।","पहले हमारी निगाह न पड़ी, बस, यहीं बात बिगड़ गयी ।","नहीं, चुपके से चुहिया निकालकर फेंक देते ।" "जज पढ़े-लिखे भादम्रियाँ के सन में ऐसे अधामिक भाव आने लगे, तो फिर घर्म को भग- वान्‌ ही रक्षा करें ।",जरा-सी चुहिया में क्या रखा था!' फूलमती को ऐसा प्रतीत हुआ कि अब प्रलय आने में बहुत देर नहीं है ।,"जब पढे-लिखे आदमियों के मन मे ऐसे अधार्मिक भाव आने लगे, तो फिर धर्म की भगवान ही रक्षा करें ।" बड़ो बहू भो षड़यत्र में शतेच हैं ।,चारों भाई दिन के काम से छुट्टी पाकर कमरे में बैठे गप-शप कर रहे हैं ।,बड़ी बहू भी षड्यंत्र में शरीक है । उद्ते बताभो घता और छिसो दूसरे वर की तलाश करो ।,"ऐसे नीच आदमी के लड़के से हम कुमुद का विवाह सेंत में भी न करेंगे, पाँच हजार तो दूर की बात है ।",उसे बताओ धता और किसी दूसरे वर की तलाश करो । एक'एक हिस्से में पांच-पाँच हज़ार भाते हैं ।,हमारे पास कुल बीस हजार ही तो हैं ।,एक-एक के हिस्से में पाँच-पाँच हजार आते हैं । उमानाथ बोले--मुझ्ले अपना औषधायल खोलने के लिए कम-से-झम्र पाँच हज़ार की ज़रूरत है ।,"पाँच हजार दहेज में दे दें, और पाँच हजार नेग-न्योछावर, बाजे-गाजे में उड़ा दें, तो फिर हमारी बधिया ही बैठ जायेगी ।",' उमानाथ बोले- 'मुझे अपना औषधालय खोलने के लिए कम-से-कम पाँच हजार की जरूरत है । "सोचा, ज्याद कर दूँ, ठोक द्वो जायगा ।",मैंने यह रंग देखा तो मुझे चिंता हुई ।,"सोचा, ब्याह कर दूँ, ठीक हो जायेगा ।" "सोचा, ऐप्ती रुपवती पत्ो पाकर इसका मन स्थिर हो जायगा, पर वह भी लछाडलो लडकों धौ--हटठीलों, अदेध, आदशेवादिनी ।",मैं सुन्नी को देख चुका था ।,"सोचा, ऐसी रूपवती पत्नी पाकर इनका मन स्थिर हो जायेगा, पर वह भी लाड़ली लड़की थी-हठीली, अबोध, आदर्शवादिनी ।" "समम्हौते का जीवन में क्या मूल्य है, इसझी उप्ते खबर द्वी नहों |",सहिष्णुता तो उसने सीखी ही न थी ।,"समझौते का जीवन में क्या मूल्य है, इसकी उसे खबर ही नहीं ।" लड़के तो प्रायः मकचले होते ही हैं ।,और साहब मैं तो बहू को ही अधिक दोषी समझता हूँ ।,लड़के प्राय मनचले होते हैं । "ढॉगा केसे पार होगा, ईंखर हो जाने ।",उसमें ये गुण ही नहीं ।,डोंगा कैसे पार होगा ईश्वर ही जाने । "बिलकुल अपने चित्र छी रेखा-सी, मार्नों मनो- दर समोत को ग्रतिघनि हो ।",सहसा सुन्नी अंदर से आ गयी ।,"बिल्कुल अपने चित्र की रेखा सी, मानो मनोहर संगीत की प्रतिध्वनि हो ।" "उलाहना देती हुईं बोली--भाषप न जाने कब से बैठे हुए हैं, मुम्के खबर तऋ नहीं, भौर शायद.आप बाहर-हो-बाहर चढ़े भी जाते ।",मिटी हुई आशाओं का इससे अच्छा चित्र नहीं हो सकता ।,"उलाहना देती हुई बोली- आप न जाने कब से बैठे हुए हैं, मुझे खबर तक नहीं और शायद आप बाहर ही बाहर चले भी जाते ?" शायद मुझ्ठे बुनन्‍्बी से बातचीत करने का अवसर देना चाहते थे ।,मदारीलाल कमरे के बाहर अपनी कार की सफाई करने लगे ।,शायद मुझे सुन्नी से बात करने का अवसर देना चाहते थे । तुम्र लोगों में यह कया अनबत हे ?,’ ‘यह बात क्या है ?,तुम लोगों में यह क्या अनबन है । तुम ख़ुद मरने की तैयारी कर रद्दी दो |,गोपा देवी प्राण दिये डालती हैं ।,तुम खुद मरने की तैयारी कर रही हो । चेनसिद्द पनवाले को एकान पर विस्मृति को दशा में खड़ा रह्दा |,एक क्षण में मुलिया प्रसन्न-मुख घर की ओर चली ।,चैनसिंह पानवाले की दुकान पर विस्मृति की दशा में खड़ा रहा । चेनविंद ने छड़ी संभालो भौर फाटक को भोर चला हि महावीर छा एफा सामने से आता दिखाई दिया ।,"यह बुरी बीमारी है, जल्दी दवा कर डालो ।",चैनसिंह ने छड़ी सँभाली और फाटक की ओर चला कि महावीर का एक्का सामने से आता दिखाई दिया । किसों मे बेगार में भी न पकड़ा ।,"महावीर ने हँसकर कहा- आज तो मालिक, दिन भर खड़ा ही रह गया ।",किसी ने बेगार में भी न पकड़ा । छपर से चार पंस्ते को बीड़ियाँ पी गया ।,किसी ने बेगार में भी न पकड़ा ।,ऊपर से चार पैसे की बीड़ियाँ पी गया । पघमविंद ने ज़रा देर के बाद कद्ठा - सेरी एक सलाह है ।,ऊपर से चार पैसे की बीड़ियाँ पी गया ।,चैनसिंह ने जरा देर के बाद कहा- मेरी एक सलाह है । तब तो तुम्दारों घरवालों छो घास लेकर बाज़ार न भाना पड़ेगा ।,"बस, जब मैं बुलाऊँ तो एक्का लेकर चले आया करो ।",तब तो तुम्हारी घरवाली को घास लेकर बाजार न जाना पड़ेगा । "जब मरजी हो, पकहतवा मेंगवाइए ।",आपकी परजा हूँ ।,"जब मरजी हो, पकड़ मँगवाइए ।" "आपसे झुयये'** चेनशिंह ने बात काटकर कद्दा-रहीं, में तुमसे चेगार नहीं छेवा चाहता |","जब मरजी हो, पकड़ मँगवाइए ।","आपसे रुपये… चैनसिंह ने बात काटकर कहा- नहीं, मैं तुमसे बेगार नहीं लेना चाहता ।" तुम मुम्तसे एक रुपया रोज ले ज्ञाया फरो ।,चैनसिंह ने जरा देर के बाद कहा- मेरी एक सलाह है ।,तुम मुझसे एक रुपया रोज लिया करो । "ईेंइगर को दया कहूँ, या फोप कहूँ, ।","ईश्वर की दया से आपके दो बच्चे हैं, दो बच्चियां भी हैं ।",ईश्वर की दया कहूँ; या कोप कहूँ । "में घबरा रद्ी हूँ, आप निशिचिन्त बेठे अक्- यार पढ रहे हैं ।","सब-के-सब उधमी हो गये हैं कि खुदा की पनाह ! मगर क्या मजाल है कि यह भोंदू किसी को कड़ी आँखो से देखें ! रात के आठ बजे गये हैं, युवराज अभी घूमकर नहीं आये ।","मैं घबरा रही हूँ, आप निश्चिंत बैठे अखबार पढ़ रहे हैं ।" "ऋाछाई हुई छातो ई ओर अखबार छोनझइर कहतो हूं, जाकर क्षरा देखते वर्यों नहीं, छोंडा कदाँ रह गया ?","मैं घबरा रही हूँ, आप निश्चिंत बैठे अखबार पढ़ रहे हैं ।","झल्लाई हुई जाती हूँ और अखबार छीनकर कहती हूँ, जाकर जरा देखते क्यों नहीं, लौंडा कहाँ रह गया ?" मारे हटरों के खाल उघेडकूर रख दंगा ।,"आज बचा आते हैं, तो कान उखाड़ लेता हूँ ।",मारे हंटरों के खाल उधेड़कर रख दूँगा । यो दिड़कर तेश के साथ आप उप्ते खोजने निऊलते हैं ।,मारे हंटरों के खाल उधेड़कर रख दूँगा ।,यों बिगड़कर तैश के साथ आप उसे खोजने निकलते हैं । "यह भादत ,द्ो छूट जायगी ।","देखना, आज कैसी मरम्मत होती है ।",यह आदत ही छूट जायगी । लड़ा सदम जाता है और लम्प जलाकर पढ़ने बेठ जाता है ।,तुम इतने मन के हो गये हो कि बात नहीं सुनते ! आज आटे-दाल का भाव मालूम होगा ।,लड़का सहम जाता है और लैंप जलाकर पढ़ने बैठ जाता है । द्वो्ों वच्चियाँ चर में छिए जातो हैं छि कोई बढ़ा सयंरर काण्ड होनेवाढा है ।,लड़का थरथर काँपता हुआ आकर आँगन में खड़ा हो जाता है ।,दोनों बच्चियाँ घर में छिप जाती हैं कि कोई बड़ा भयंकर कांड होनेवाला है । छोटा बच्चा खिटई! से चूहे की तरद मल रहा है ।,दोनों बच्चियाँ घर में छिप जाती हैं कि कोई बड़ा भयंकर कांड होनेवाला है ।,छोटा बच्चा खिड़की से चूहे की तरह झाँक रहा है । भाप क्रोघ परे बौखछाये हुए हैं ।,छोटा बच्चा खिड़की से चूहे की तरह झाँक रहा है ।,आप क्रोध से बौखलाये हुए हैं । बेद्दोश पढ़ी हुई हैं ।,""" शोफर ने समीप आकर कहा , ""रानी साहब आयी हैं हुजूर ! रास्ते में बुखार हो आया ।",बेहोश पड़ी हुई हैं । कु अर साहब ने वहीं खड़े कठोर सर में पूछा--तो दुछ उन्हें वापस क्‍यों न छे गये ?,बेहोश पड़ी हुई हैं ।,"कुँवर साहब ने वहीं खड़े कठोर स्वर में पूछा, तो तुम उन्हें वापस क्यों न ले गये ?" तुमने वापप्त चलने को कहा द्वी न होगा ।,"तुमने समझा होगा , शिकार की बहार देखेंगे और पड़े-पड़े सोयेंगे ।","तुमने वापस चलने को कहा , ही न होगा ।" सिर गये तवा हो रद्दा था ।,जब कोई जवाब न मिला तो उन्होंने धीरे से उसके माथे पर हाथ रखा ।,सिर गर्म तवा हो रहा था । "लेकिन में कह्दे देती हूँ कि में इप विवाह के नजदोक न जाऊँगी, न कभी इस छोकरी का मुँह देखूँ बी, समझ लेगी, जेसे और सब लड़के मर गये, वेसे यह भौ 'मर गई ।","वृद्धा ने क्षुब्ध होकर कहा — जब तुम्हारी यही इच्छा है , तो मुझसे क्या पूछते हैं ?","लेकिन मैं कहे देती हूँ , कि मैं इस विवाह के नजदीक न जाऊँगी , न कभी इस छोकरी का मुँह देखूँगी , समझ लूँगी , जैसे और सब लडक़े मर गये वैसे यह भी मर गयी ।" "केशव के पास क्‍या रखा है, बहुत द्वोगा, छिसी दफ्तर में ककक हो ,जायगा ।",वह दो साल में सिविल सरविस पास करके आ जायगा ।,"केशव के पास क्या रखा है , बहुत होगा किसी दफ्तर में क्लर्क हो जायगा ।" "“और अपर प्रेप्ता प्राण-हत्या कर ले, तो ?","केशव के पास क्या रखा है , बहुत होगा किसी दफ्तर में क्लर्क हो जायगा ।","’ ‘ और अगर प्रेमा प्राण-हत्या कर ले , तो ?" "जिस तरह आज उसे प्रेम है, उप्रो तरद्द कल दसरे से दो सकता दे ।","जब उसके मन का यह हाल है , तो कौन कहे , केशव के साथ ही जिन्दगी भर निबाह करेगी ।","जिस तरह आज उससे प्रेम है , उसी तरह कल दूसरे से हो सकता है ।" "चाहे वह संकोच वश, या दम लोगों के लिट्वाज से, योद्दी बंठी रहे ; पर यदि जिद पर अमर बाँध छे, तो हम तुम कुछ नहीं कर सकते ।",फिर तुम्हारी कितनी इज्जत रह जायगी ।,"वह चाहे संकोच-वश , या हम लोगों के लिहाज से यों ही बैठी रहे ; पर यदि जिद पर कमर बाँध ले , हम-तुम कुछ नहीं कर सकते ।" "एक क्षण तक वह अवाक बेठो रद्द गई, मानों इस आघात ने उसको बुद्धि की धज्जियाँ उड़ा दी ह ।",यह प्रश्न बम के गोले की तरह उसके मस्तक पर गिरा ।,"एक क्षण तक वह अवाक् ï बैठी रह गयी , मानों इस आघात ने उसकी बुद्धि की धज्जियाँ उड़ा दी हों ।" "यहाँ गुल्ी उण्डा है कि बिना हर-फिटकरी के चोखा रंग देता है; पर हम, अंग्रेज़ो चोज़ों के पीछे ऐसे दीवाने हों रदे हैं कि अपनी सभी चीज़ों से अरुचि हो गईं दहै ।","जब तक कम-से-कम एक सैकड़ा न खर्च कीजिए, खिलाड़ियों में शुमार ही नहीं हो पाता ।",य हाँ गुल्ली-डंडा है कि बना हर्र-फिटकरी के चोखा रंग देता है; पर हम अँगरेजी चीजों के पीछे ऐसे दीवाने हो रहे हैं कि अपनी सभी चीजों से अरूचि हो गई । मुझे गुद्द हो सब खेलों से अच्छो लगती है और बचपत्त की मीठी स्मृतियों-में गुछो द्वी सबहे मीठी है ।,यह अपनी-अपनी रूचि है ।,मुझे गुल्ली ही सब खेलों से अच्छी लगती है और बचपन की मीठी स्मृतियों में गुल्ली ही सबसे मीठी है । "कगर जल गये बचा, तो में दवा न करूँगा ।","देखें, कौन निकल जाता है ।","अगर जल गए बच्चा, तो मैं दवा न करूँगा ।" बद्चीचे में फिर झघेरा छाया था ।,4 पत्तियाँ जल चुकी थीं ।,बगीचे में फिर अंधेरा छा गया था । "ठंसके बदन में गर्मी आ गई थी ; पर ज्यॉ-ण्यों शोत बढ़ती जाती भी, उसे क्राल्श्य दबाये लेता था ।","राख के नीचे कुछ-कुछ आग बाकी थी, जो हवा का झोंका आ जाने पर जरा जाग उठती थी, पर एक क्षण में फिर आँखें बंद कर लेती थी ! हल्कू ने फिर चादर ओढ़ ली और गर्म राख के पास बैठा हुआ एक गीत गुनगुनाने लगा ।","उसके बदन में गर्मी आ गयी थी, पर ज्यों-ज्यों शीत बढ़ती जाती थी, उसे आलस्य दबाये लेता था ।" * .. जबरा जोर से. भूककर खेत को और भागा ।,"उसके बदन में गर्मी आ गयी थी, पर ज्यों-ज्यों शीत बढ़ती जाती थी, उसे आलस्य दबाये लेता था ।",जबरा जोर से भूँककर खेत की ओर भागा । बनके जशने को आवाज़ चर-घर सुनाई देने हगी ।,फिर ऐसा मालूम हुआ कि खेत में चर रहीं हैं ।,उनके चबाने की आवाज चर-चर सुनाई देने लगी । बढ़े साले ले वहा--एम लोगों की बराबरों करते हैं ।,गुमानी भी हाँ-में-हाँ मिलाती जाती थी ।,बड़े साले ने कहा- हम लोगों की बराबरी करते हैं । छष्म सेर तो एक जून को चादिए ।,यह नहीं समझते कि उनके दो हजार कब के उड़ चुके ।,सवा सेर तो एक जून को चाहिए । बे खाने दो कोई बात नहीं दे ।,सुलगते हुए हृदय से बोली- निकम्मे आदमी को खाने के सिवा और काम ही क्या रहता है ?,बड़े- खाने की कोई बात नहीं है । गुप्तानी को मतोबृत्तियाँ भी तक बिलइछ बालपव को-सी थीं ।,"न जाने क्यों, कहीं बाहर जाकर कमाते उसकी नानी मरती है ।",गुमानी की मनोवृत्तियाँ अभी तक बिलकुल बालपन की-सी थीं । उसका कषपतरा कोई घर न भा ।,गुमानी की मनोवृत्तियाँ अभी तक बिलकुल बालपन की-सी थीं ।,उसका अपना कोई घर न था । उसी घर का दित-अद्दित उसके लिए भी पान था ।,उसका अपना कोई घर न था ।,उसी घर का हित-अहित उसके लिए भी प्रधान था । क्‍या दो आदमी प्रालभा में दो सौ भी न खाबेंगे ?,दो सौ ही तो साल भर के हुए ।,क्या दो आदमी साल भर में दो सौ भी न खायेंगे । "' . प्यारों ने कह्ा-में कहती हूं, ' धान रोपने को कोई जरूरत नद्ों ।",7 जोखू और प्यारी में ठनी हुई थी ।,"प्यारी ने कहा- मैं कहती हूँ, धान रोपने की कोई जरूरत नहीं ।" जोखू को जी ऊबने दा अचुभव न था ।,"‘ प्यारी ने उसके कंधे पर से फावड़ा ले लिया और बोली- तुम पहर रात से पहर रात तक ताल में रहोगे, अकेले मेरा जी ऊबेगा ।",जोखू को ऊबने का अनुभव न था । मैं खाली बेठता हूँ; ' तो बार-बार खाने की सूमतों है ।,मैं घर रहूँगा तब तो और जी ऊबेगा ।,मैं खाली बैठता हूँ तो बार- बार खाने की सूझती है । "जोखू ने मार्नों बन्धन में पढ़कर कद्दा--अच्छा, बेठ गया, कह्दी, क्या कहती हो ?","प्यारी ने कहा- अच्छा, कल से जाना, आज बैठो ।","जोखू ने मानों बंधन में पड़कर कहा- अच्छा, बैठ गया, कहो क्या कहती हो ?" यद्द कद्दता हुआ रासू वहां से चलता बना ।,बस मैं और कुछ नहीं जानता ।,यह कहता हुआ रामू वहाँ से चलता बना । "“लड़के से लड़की भली, णो कुलबतो होय ।",जहाँ रहता वहीं कमाता खाता ! भगवान ऐसा बेटा सातवें बैरी को भी न दें ।,"'लड़के से लड़की भली, जो कुलवंती होय ।" ( बंटवारा होते हो महतो और लक्ष्मी फो मार्नों पंशव मिल गई ।,"महतो दाँत पीसते हुए उठे कि बहू को मारें, मगर लोगों ने पकड़ लिया ।",4 बँटवारा होते ही महतो और लक्ष्मी को मानों पेंशन मिल गयी । ऊजा और अपमान से उसकी गरदन झुक गई और मुंद्द ज़रसा निकल आया ।,छकौड़ी को भी मालूम हो गया कि पुलिस की धमकी देकर उसने बहुत बड़ा अविवेक किया है ।,लज्जा और अपमान से उसकी गरदन झुक गयी और मुँह जरा-सा निकल आया । सारा दिन गुज़र गया और घेले को भी बिक्को न हुईं ।,फिर उसने गरदन नहीं उठाई ।,सारा दिन गुजर गया और धोले की बिक्री न हुई । "लोछावतो--भाप छोग भी तो जो वह कहती है, उम्त पर विश्वास कर छेती हैं |",मिसेज बाँगड़ा- इसी तरह सबको बदनाम करती है ।,"लीलावती- आप लोग भी तो जो यह कहती है, उस पर विश्वास कर लेती हैं ।" !इस इरबॉय में जुगनू को दिसो में जाते न देखा ।,"लीलावती- आप लोग भी तो जो यह कहती है, उस पर विश्वास कर लेती हैं ।",इस हरबोंग में जुगनू को किसी ने जाते न देखा । प्यादा द्वार पर खड़ा बक-सक रहा ह्ठै ।,बाकी का एक रूपया देना है ।,प्यादा द्वार पर खड़ा बकझक कर रहा है । "रुपया दे दो, तो किसी तरद्द थद्द विपत्ति ले ।",प्यादा द्वार पर खड़ा बकझक कर रहा है ।,"रूपया दे दो, तो किसी तरह यह विपत्ति टले ।" "नशा ' इंख़री एक बढ़े ज़मीदार का लड़का था और में एक शरीब कलके का, जिसके पास मेहर्त-सजूरी के सिवा भौर कोई जायदाद न थी ।","’ मैं ऊपर जाकर लेटा, तो मेरे दिल का बोझ बहुत हल्का हो गया था, किन्तु रह-रहकर यह संदेह हो जाता था कि गोपा की यह शांति उसकी अपार व्यथा का ही रूप तो नहीं है ?","ईश्वरी एक बड़े जमींदार का लड़का था और मैं एक गरीब क्लर्क का, जिसके पास मेहनत-मजूरी के सिवा और कोई जायदाद न थी ।" "में ज़मीदारों को बुराई करता, उन्हें हिसक पशु और खूब चूसने- वाली जॉक और वृक्षों की चोटी पर फूलनेबाजा बस्ता कहता ।",हम दोनों में परस्पर बहसें होती रहती थीं ।,"मैं जमींदारी की बुराई करता, उन्हें हिंसक पशु और खून चूसने वाली जोंक और वृक्षों की चोटी पर फूलने वाला बंझा कहता ।" "बढ ज़्मीदारों दा पक्ष टेता ; पर स्वभावतः उसका पहल कुछ कमफ़ोर द्ोता था , क्योंकि दसके पास ज़र्मी- दारों के अनुकूल कोई दलील व थी ।","मैं जमींदारी की बुराई करता, उन्हें हिंसक पशु और खून चूसने वाली जोंक और वृक्षों की चोटी पर फूलने वाला बंझा कहता ।","वह जमींदारों का पक्ष लेता, पर स्वभावत: उसका पहलू कुछ कमजोर होता था, क्योंकि उसके पास जमींदारों के अनुकूल कोई दलील न थी ।" में इस वाद-विवाद को गर्मा रर्मी में अबरूर ठेफ़ हो जाता और लगनेचाली बात कट्ट जाता; छेफिन ईंश्वरो हारकर भी सुस्कराता रहता था ।,किसी मानुषीय या नैतिक नियम से इस व्यवस्था का औचित्य सिद्ध करना कठिन था ।,"मैं इस वाद-विवाद की गर्मी-गर्मी में अक्स र तेज हो जाता और लगने वाली बात कह जाता, लेकिन ईश्वरी हारकर भी मुस्कराता रहता था ।" "तू बेठऋर खा, तुम्फे इन बातों से क्‍या भतलबघ ।","पन्ना— जब उनका जी चाहेगा, खायेंगे ।","तू बैठकर खा, तुझे इन बातों से क्या मतलब ?" "खुन्नू ने दरवाज़े पर आकर फ्लँका, सामने फूस की सहॉपढ़ी थी, वहीं साठ पर पढ़ा रमघू नारियल पी रद्दा था ।","पन्ना— उनका जी चाहे, एक घर में रहें, जी चाहे आँगन में दीवार डाल लें ।","खुन्नू ने दरवाजे पर आकर झाँका, सामने फूस की झोपड़ी थी, वहीं खाट पर पड़ा रग्घू नारियल पी रहा था ।" "पन्‍्ना--जब जो चाहेगा, खायेंगे ।",खुन्नू— भइया तो अभी नारियल लिये बैठे हैं ।,"पन्ना— जब जी चाहेगा, खायेंगे ।" "माता ने विष्मय के साथ पूछा-क्या हिन्दुओं में ऐसा हुआ है ! फिर ठछने आप-दहो-आग उठच् प्रतत्त का जवाब'भो दिया --अगर दो चार जगद ऐपा हो भी पया, तो उसपे क्या दोता है ?",प्रेमा डरते-डरते बोली — कहीं-कहीं तो बिरादरी के बाहर भी विवाह होने लगे हैं! उसने कहने को कह दिया ; लेकिन उसका हृदय काँप रहा था कि माता जी कुछ भाँप न जायँ ।,"माता ने विस्मय के साथ पूछा — क्या हिन्दुओं में ऐसा हुआ है! फिर उसने आप-ही-आप उस प्रश्न का जवाब भी दिया — और दो-चार जगह ऐसा हो भी गया , तो उससे क्या होता है ?" "जितने मिलमेवाले, मित्र, स्नेद्दी, झम्बन्धी ये, सभी के घर गये ; पर सब जगद् से साफ जवाब पाया ।","वंशीधर को पहले संदेह हुआ कि गोकुल इंद्रनाथ के घर छिपा होगा, पर जब वहाँ पता न चला तो उन्होंने सारे शहर में खोज-पूछ शुरू की ।","जितने मिलने वाले, मित्र, स्नेही, संबंधी थे, सभी के घर गये, पर सब जगह से साफ जवाब पाया ।" न जाने तुम्हें कप्ती बुद्धि आयेगी भो या चढ्ों ।,"दिन-भर दौड़-धूप कर शाम को घर आते, तो स्त्री को आड़े हाथों लेते- और कोसो लड़के को, पानी पी-पीकर कोसो ।",न जाने तुम्हें कभी बुद्धि आयेगी भी या नहीं । एक बोम्द सिर से टढा ।,"गयी थी चुड़ैल, जाने देती ।",एक बोझ सिर से टला । एक मदर रख को काम्र चल जायगा ।,एक बोझ सिर से टला ।,"एक महरी रख लो, काम चल जायगा ।" "विघवाओं के पुतविद्वाद्द चारों जोर तो हो रहे हैं, यद्द कोई अनद्दोनो बात नहीं है ।","जब वह न थी, तो घर क्या भूखों मरता था ?","विधवाओं के पुनर्विवाह चारों ओर तो हो रहे हैं, यह कोई अनहोनी बात नहीं है ।" फिए तुमसे इतना भो न द्वो सका कि मुम्प्ते तो पूछ छेती ।,"हमारे बस की बात होती, तो विधवा-विवाह के पक्षपातियों को देश से निकाल देते, शाप देकर जला देते, लेकिन यह हमारे बस की बात नहीं ।",फिर तुमसे इतना भी न हो सका कि मुझसे तो पूछ लेतीं । बध छड़के पर दृट पढ़ीं ।,"क्या तुमने समझा था, मैं दफ्तर से लौटकर आऊँगा ही नहीं, वहीं मेरी अंत्येष्टि हो जायगी ।","बस, लड़के पर टूट पड़ीं ।" वश्चीधर स्नी को फटकारें छुनाकर द्वार पर उद्धग कौ दशा में खुल श्हे थे ।,संध्या हो गयी थी ।,वंशीधर स्त्री को फटकारें सुनाकर द्वार पर उद्वेग की दशा में टहल रहे थे । "एकाएक एक बुढ़िया उनके समीप भाई और बोली--बाबू साहब, यह खत छाई हूँ छे लीजिए ।",न जाने कहाँ गया ?,"एकाएक एक बुढ़िया उनके समीप आयी और बोली- बाबू साहब, यह खत लायी हूँ ।" किन्तु एक द्वो सप्ताह में करुणा के जोवन मे फिर रह्न बदला ।,करूणा ने अपने छोटे-से संसार को अपने ही अंदर समेट लिया था ।,किन्तु एक ही सप्ताह में करूणा के जीवन ने फिर रंग बदला । अग् यद्दी उप्का नित्य छा नियम दो गया ।,फिर भाँति-भाँति के पकवान बनाती और कुत्तों को खिलाती ।,अब यही उसका नित्य का नियम हो गया । ग्रे दवा वह द्वार भव किय्ली के लिए बन्द व था ।,"चिड़ियाँ, कुत्ते, बिल्लियाँ चींटे-चीटियाँ सब अपने हो गये ।",प्रेम का वह द्वार अब किसी के लिए बन्द न था । "करुणा उच्त पत्र के दे को जमा झरने लगी, मानों उसके आण बिखर गये हों ।","वह तेरा प्राण है, तेरे जीवन-दीपक का प्रकाश, तेरी वंचित कामनाओं का माधुर्य, तेरे अश्रु-जल में विहार करने वाला करने वाला हँस ।","करूणा उस पत्र के टुकड़ों को जमा करने लगी, माना उसके प्राण बिखर गये हों ।" एक्न-ए% टुछड़ा उसे अपने खोये हुए प्रेम का एक-एक पदचिह शा माल्स देता था ।,"करूणा उस पत्र के टुकड़ों को जमा करने लगी, माना उसके प्राण बिखर गये हों ।",एक-एक टुकड़ा उसे अपने खोये हुए प्रेम का एक पदचिन्ह-सा मालूम होता था । "जब सारे पुरद्धे जमा हो गये, तो करुणा दीपक के सामने बठदर उन्हें जोढ़ने लगी, जे छोई वियोगी हृदय अमर के इटे हुए तार को जोढ़ रह्य हो ।",एक-एक टुकड़ा उसे अपने खोये हुए प्रेम का एक पदचिन्ह-सा मालूम होता था ।,"जब सारे पुरजे जमा हो गये, तो करूणा दीपक के सामने बैठकर उसे जोड़ने लगी, जैसे कोई वियोगी हृदय प्रेम के टूटे हुए तारों को जोड़ रहा हो ।" "घालक प्रद्मरा अब दस साल का रुपवान्‌, बलिछ, प्रपन्नतुख कुमार था, बला छा तेज, साहयों और मनस्व्ों ।",2 सात वर्ष बीत गये ।,"बालक प्रकाश अब दस साल का रूपवान, बलिष्ठ, प्रसन्नमुख कुमार था, बल का तेज, साहसी और मनस्वी ।" भय तो उठते छू भो वहों बया था ।,"बालक प्रकाश अब दस साल का रूपवान, बलिष्ठ, प्रसन्नमुख कुमार था, बल का तेज, साहसी और मनस्वी ।",भय तो उसे छू भी नहीं गया था । ससार करुणा को अभागिवी ओर दोन समम्े ।,करूणा का संतप्त हृदय उसे देखकर शीतल हो जाता ।,संसार करूणा को अभागिनी और दीन समझे । समर दूध द्वार्थों हाथ बिक जाता ।,विशुद्ध दूध कहाँ मयस्सर होता है ?,सब दूध हाथों-हाथ बिक जाता । "वह प्रद्याश को माँ द्वी नहीं, मां-बाप दोनों है ।","नहीं, वह उसके चरित्र की बड़ी कठोरता से देख-भाल करती है ।","वह प्रकाश की माँ नहीं, माँ-बाप दोनों हैं ।" उसकी यही हादिक अभिलाषा है कि प्रश्मश जवान द्वोकर पिता का पदगामों हो ।,उसे ऐसा जान पड़ता है कि आदित्य की आत्मा सदैव उसकी रक्षा करती रहती है ।,उसकी यही हार्दिक अभिलाषा है कि प्रकाश जवान होकर पिता का पथगामी हो । करुणा उप्त समस गउओं को सानो दे रद्दी थी ।,एक भिखारिन द्वार पर आकर भीख माँगने लगी ।,करूणा उस समय गउओं को पानी दे रही थी । बाल हो तो ! शरारत सूफी ।,प्रकाश बाहर खेल रहा था ।,बालक ही तो ठहरा! शरारत सूझी । हबोब ने शरमाते हुए कद्दा-इक के सामने अमोर तेमूर को भो कोई इक्कोकत नहीं ।,तैमूर ने मूस्कराकर पूछा- तुम मुझसे लड़ने को तैयार थे ?,हबीब ने शरमाते हुए कहा- हक के सामने अमीर तैमूर की भी कोई हकीकत नहीं । ! दोनों क्रिे में दाखिल हुए ।,"यह तुम्हारी जात है, जिसने मुझे बतलाया है कि सल्तनत किसी आदमी की जायदाद नहीं बल्कि एक ऐसा दरख्त है, जिसकी हरेक शाख और पत्ती एक-सी खुराक पाती है ।",दोनों किले में दाखिल हुए । "तेमर ने उसो सिलम्विके में कह्दा--दोस्‍्तो, में इस दुआ का हकदार नहीं हूँ ।",चारों तरफ से आवाज आयी- खुदा हमारे शाहंशाह की उम्र दराज करे ।,"तैमूर ने उसी सिलसिले में कहा- दोस्तों , मैं इस दुआ का हकदार नहीं हूँ ।" भाज से आप अपने भादशाद हैं ।,"चारों तरफ से आवाज आयी- मरहबा ! मरहबा ! ! ‘दोस्तों, उन हकों के साथ-साथ मैं आपकी सल्तनत भी आपको वापस करता हूँ क्योंकि खुदा की निगाह में सभी इन्सान बराबर है और किसी कौम या शख्स को दूसरी कौम पर हुकूमत करने का अख्तियार नहीं है ।",आज से आप अपने बादशाह है । "सामने गई दार कुर्सों पर यज़- दानी था--सौम्य, विशाल और तेजस्वी ।",रात को तैमूर के प्रस्ताव पर विचार होने लगा ।,"सामने गद्देदार कुर्सी पर यजदानी था- सौम्य, विशाल और तेजस्वी ।" "बाई तरफ उम्मुतुल हृबोब थी, जो इस सप्तय रमणी-वेष में सोदिती बनी हुई थी, बहाचर्य के सेज से दीप ।","उसकी दाहिनी तरफ उसकी पत्नी थी, ईरानी लिबास में, आँखों में दया और विश्वास की ज्योति भरे हुए ।","बायीं तरफ उम्मुतुल हबीब थी, जो इस समय रमणी-वेष में मोहिनी बनी हुई थी, ब्रह्मचर्य के तेज से दीप्त ।" "चेवर्सिद असामियाँ से माल्युजारी वसुल करके घर को ओर लपका जा रहा था कि उसी जगह जहाँ"" उसने मुलिया को बाँद पकड़ी थी, मुलिया छो आवाज़ कानों में भाई ।",क्या फायदा! कई दिनों के बाद संध्या समय मुलिया चैनसिंह से मिली ।,"चैनसिंह असामियों से मालगुजारी वसूल करके घर की ओर लपका जा रहा था कि उसी जगह जहाँ उसने मुलिया की बाँह पकड़ी थी, मुलिया की आवाज कानों में आयी ।" "उपने उिठककर पीछे देखा, तो मुल्या दौड़ी चली आ रही थी ।","चैनसिंह असामियों से मालगुजारी वसूल करके घर की ओर लपका जा रहा था कि उसी जगह जहाँ उसने मुलिया की बाँह पकड़ी थी, मुलिया की आवाज कानों में आयी ।","उसने ठिठककर पीछे देखा, तो मुलिया दौड़ी आ रही थी ।" "बोला--व्या है, मूला ! क्‍यों दौढ़ती दो, में तो खड़ा हूँ ?","उसने ठिठककर पीछे देखा, तो मुलिया दौड़ी आ रही थी ।","बोला- क्या है मूला! क्यों दौड़ती हो, मैं तो खड़ा हूँ ?" ै मुल्या ने हॉफते हुए कद्दा--कई दिन से तुमसे मिलना चाइती थी ।,"बोला- क्या है मूला! क्यों दौड़ती हो, मैं तो खड़ा हूँ ?",मुलिया ने हाँफते हुए कहा- कई दिन से तुमसे मिलना चाहती थी । प्यतसिह्द ने कहा-- बहुत अच्छी बात है ।,अब मैं घास बेचने नहीं जाती ।,चैनसिंह ने कहा- बहुत अच्छी बात है । एकाएक सुलिया ने मुसकिराकर कह्ा- यहों तुमने मेरी बाँद्द पकड़ी थी ।,किसी को कोई बात न सूझती थी ।,एकाएक मुलिया ने मुस्कराकर कहा- यहाँ तुमने मेरी बाँह पकड़ी थी । चेनसिद ने ऊज्जित दोकर कह्ा--उसके भूछ जाओ मूला |,एकाएक मुलिया ने मुस्कराकर कहा- यहाँ तुमने मेरी बाँह पकड़ी थी ।,चैनसिंह ने लज्जित होकर कहा- उसको भूल जाओ मूला । मुक्त पर न जाने सछोन भूत सवार था ।,चैनसिंह ने लज्जित होकर कहा- उसको भूल जाओ मूला ।,मुझ पर जाने कौन भूत सवार था । "ही * ज़रा देर' के बाद मुलिया ने फिर कद्दा--तुमने समझा होगा, में हँसने-बोलने में मगन दो रही थी १ |",फिर दोनों चुप हो गये ।,"जरा देर के बाद मुलिया ने फिर कहा- तुमने समझा होगा, मैं हँसने-बोलने में मगन हो रही थी ?" "चैनसिंद ने बलपूर्दक कद्दा--नहीं मुल्या, मेंने एक क्षण के लिए भी यह्द नहीं समम्ता ।","जरा देर के बाद मुलिया ने फिर कहा- तुमने समझा होगा, मैं हँसने-बोलने में मगन हो रही थी ?","चैनसिंह ने बलपूर्वक कहा- नहीं मुलिया, मैंने एक क्षण के लिए भी नहीं समझा ।" "मुलिया ने चाद्दा कि कत्तराकर निकल जाय; सबर चेतसिंद ने उसका हाथ पकह लिया और बोछ-- मुलिया, 'तुक्षे क्या मुक्त पर चरा भी दया नहीं आतो ?",एकाएक युवक चैनसिंह सामने से आता हुआ दिखाई दिया ।,"मुलिया ने चाहा कि कतराकर निकल जाय; मगर चैनसिंह ने उसका हाथ पकड़ लिया और बोला- मुलिया, तुझे क्या मुझ पर जरा भी दया नहीं आती ?" "वह ज़रा भी नहीं उरी, ज़रा भौ न मिम्ूकी, महौआ ज़मोत पर मिरा दिया; और बोलो-- मुझे छोड़ दो, नहीं में चिह्लाती हूँ ।",मुलिया का वह फूल-सा खिला हुआ चेहरा ज्वाला की तरह दहक उठा ।,"वह जरा भी नहीं डरी, जरा भी न झिझकी, झौआ जमीन पर गिरा दिया, और बोली- मुझे छोड़ दो, नहीं मैं चिल्लाती हूँ ।" "उसने लज्जित द्वोकर उच्का , द्वाथ छोड दिया ।","ऐसे कितने ही मार्क उसने जीते थे; पर आज मुलिया के चेहरे का वह रंग, उसका वह क्रोध, वह अभिमान देखकर उसके छक्के छूट गये ।",उसने लज्जित होकर उसका हाथ छोड़ दिया । सुलिया वेग से आगे बढ़ गई ।,उसने लज्जित होकर उसका हाथ छोड़ दिया ।,मुलिया वेग से आगे बढ़ गयी । "उसने कुछ देर ज़ब्त किया ; ,फिर' सिसर-सितऋष्र रोने ऊगी ।","मुलिया जब कुछ दूर निकल गयी, तो क्रोध और भय तथा अपनी बेकसी को अनुभव करके उसकी आँखो में आँसू भर आये ।","उसने कुछ देर जब्त किया, फिर सिसक-सिसक कर रोने लगी ।" इंप्रोलिए उसने मद्दावीर के प्रद्तों का कोई उत्तर न दिया ।,फिर न जाने क्या हो! इस खयाल से उसके रोएँ खड़े हो गये ।,इसीलिए उसने महावीर के प्रश्नों का कोई उत्तर न दिया । मुल्या ने प्िर झुकाकर कद्दा--मं अकेलो न.जाऊंगो ।,और सब तो चली गयीं ?,मुलिया ने सिर झुकाकर कहा- मैं अकेली न जाऊँगी । "सारो देह थक छर घूर-चूर दो रद्दी थी, ज्वर भो दो आया था, सिर पीड़ा से फटा पढ़ता था , पर वह सकलल्‍प से सारी बाघाओं को दबाये आगे बढ़तो जाती थो |",जी चाहे आवें या न आवें; लेकिन एक बार पति से मिलकर उनसे खरी-खरी बात करने के प्रलोभन को वह न रोक सकी ।,"सारी देह थककर चूर-चूर हो रही थी, ज्वर भी हो आया था, सिर पीड़ा से फटा पड़ता था; पर वह संकल्प से सारी बाधाओं को दबाये आगे बढ़ती जाती थी ।" "सुभागी ओर लोगों के यहाँ चाहे जो होता द्वो, तुलछी महतो अपनी लड़छो सुभागो को लड़के राम से जौ-भर भी कम प्यार न करते थे ।","कुँवर साहब ने हँसकर कहा , ""यह न बताऊँगा ।","और लोगों के यहाँ चाहे जो होता हो, तुलसी महतो अपनी लड़की सुभागी को लड़के रामू से जौ-भर भी कम प्यार न करते थे ।" लए्ष्मी पछाढ़े खाती थी |,घर में कुहराम मचा हुआ था ।,लक्ष्मी पछाड़ें खाती थी । "जब हमारो बिरादरो में इसकी कोई निदा नहीं है, तो क्यों सोच-विचार करवे द्वो १ हिन्द दे ।",जवान लड़की का यों फिरना ठीक नहीं ।,"जब हमारी बिरादरी में इसकी कोई निंदा नहीं है, तो क्यों सोच-विचार करते हो ?" "अब इसमें मोहित, सदसूर, नरे, सम्मी, झिसो को भो आपत्ति नहीं हो सक्ती ।",उसका चिमटा रूस्तमे-हिन्द है ।,"अब इसमें मोहसिन, महमूद नूरे, सम्मी किसी को भी आपत्ति नहीं हो सकती ।" चिप्रठ्ा वारो-आारो से सबके हाथ में गया ; औौर उनके खिलौने थारो-वारों से द्वामिद के द्वाथ में आये ।,हामिद को इन शर्तों को मानने में कोई आपत्ति न थी ।,"चिमटा बारी-बारी से सबके हाथ में गया, और उनके खिलौने बारी-बारी से हामिद के हाथ में आये ।" उलठे मार न पढ़े ।,महमूद— दुआ को लिये फिरते हो ।,उल्टे मार न पड़े । "तोन पंसों ही में तो उप्ते सत्र कुछ करना धा, और उन पर्तों के इश्त उपयोग पर पछ़तावे को ब्रिलकुल ज़हर्त न थी ।","हामिद को स्वीकार करना पड़ा कि खिलौनों को देखकर किसी की माँ इतनी खुश न होंगी, जितनी दादी चिमटे को देखकर होंगी ।",तीन पैसों ही में तो उसे सब कुछ करना था ओर उन पैसों के इस उपयोग पर पछतावे की बिल्कुल जरूरत न थी । फिर अब तो चिम्रठा रुस्तमे-दिन्द है और सभो बिलोनों का बादशाह ।,तीन पैसों ही में तो उसे सब कुछ करना था ओर उन पैसों के इस उपयोग पर पछतावे की बिल्कुल जरूरत न थी ।,फिर अब तो चिमटा रूस्तमें-हिन्द है ओर सभी खिलौनों का बादशाह । मदसद ने फेपल हामिद को सामी बवावा |,उसके बाप ने केले खाने को दिये ।,महमूद ने केवल हामिद को साझी बनाया । उप्रके अन्य मित्र सुन्दर ताछते रह गये ।,महमूद ने केवल हामिद को साझी बनाया ।,उसके अन्य मित्र मुँह ताकते रह गये । तब देखेगा महमूद और मोहसिन और नरे और सम्सी कहाँ से उतने पेसे निकालेंगे ।,"जब उसके अब्बाजान थैलियाँ और अम्मीजान नियामतें लेकर आयेंगी, तो वह दिल से अरमान निकाल लेगा ।","तब देखेगा, मोहसिन, नूरे और सम्मी कहाँ से उतने पैसे निकालेंगे ।" उस सीड़भाढ़ में बच्चा कद्दीं खो जाय तो क्या द्ो ।,हामिद का बाप अमीना के सिवा और कौन है! उसे कैसे अकेले मेले जाने दे ?,उस भीड़-भाड़ से बच्चा कहीं खो जाय तो क्या हो ? माँगे द्वो का तो भरोसा /ठहरा ।,यहाँ तो घंटों चीजें जमा करते लगेंगे ।,माँगे का ही तो भरोसा ठहरा । भगवान्‌ ने चाह तो घर फिर सेमल जायगा ।,हम लोगों को जाने दो ।,"भगवान ने चाहा, तो घर फिर संभल जायगा ।" अस्थान को तिथि के एक दिन पहले हो रामप्यारी ने रात-सर जागकर हलवा और पूरियाँ पद्ाई' |,तुम तो कुछ-न-कुछ देखभाल करती ही रहोगी ।,प्रस्थान की तिथि के एक दिन पहले ही रामप्यारी ने रात-भर जागकर हलुआ और पूरियाँ पकायीं । "जब से इस घर' में आई, कभो एक दिन के लिए भी भकेले- रदने का भवसर नहीं आया ।",प्रस्थान की तिथि के एक दिन पहले ही रामप्यारी ने रात-भर जागकर हलुआ और पूरियाँ पकायीं ।,"जब से इस घर में आयी, कभी एक दिन के लिए अकेले रहने का अवसर नहीं आया ।" दोनों बहने सदेव साथ रद्दी ।,"जब से इस घर में आयी, कभी एक दिन के लिए अकेले रहने का अवसर नहीं आया ।",दोनों बहनें सदा साथ रहीं । फूल्मती क्रोघ के भारे ओठ चवा रद्दी थी ; पर इस अवसर पर मुँद्द न खोल सकतो थी ।,बड़ी बहू जल्दी-जल्दी नमक पीसने लगी ।,"फूलमती क्रोध के मारे ओठ चबा रही थी, पर इस अवसर पर मुँह न खोल सकती थी ।" बारे नमक पिसा और पत्तर्लों पर डाला गया ।,"फूलमती क्रोध के मारे ओठ चबा रही थी, पर इस अवसर पर मुँह न खोल सकती थी ।",नमक पिसा और पत्तलों पर डाला गया । कोठरी से निद्चलकर बशमदे में आई और कामतानाथ से पूछा--वया बात दो गईं लक्का ?,फूलमती उदासीन न रह सकी ।,कोठरी से निकलकर बरामदे में आयी और कामतानाथ से पूछा- 'क्या बात हो गयी लल्ला ? फूलमती ने उससे भी वद्दी प्रशव किया ।,सहसा कहारिन मिल गयी ।,फूलमती ने उससे भी यह प्रश्न किया । फूज्मतो चिन्न-लिखित-सी वहीं खड़ी रद गई ।,"मालूम हुआ, किसी के शोरबे में मरी हुई चुहिया निकल आयी ।",फूलमती चित्रलिखित-सी वहीं खड़ी रह गयी । "हु दुसरे सजन ने समर्थन किया--णरे साहब, भाव ख़ुद बादशाह पर दावा कर सकते हैं ।","राजा भी किसी पर अन्याय करे, तो अदालत उसकी गर्दन दबा देती है ।","दूसरे सज्जन ने समर्थन किया- अरे साहब, आप खुद बादशाह पर दावा कर सकते हैं ।" "एक आदमी, जिसको पीठ पर बड़ा-छा यद्गर बेचा था, कलकत्ते जा रहा था |",अदालत में बादशाह पर डिग्री हो जाती है ।,"एक आदमी, जिसकी पीठ पर बड़ा गट्ठर बँधा था, कलकत्ते जा रहा था ।" इसप्रे बेचंन द्योकर बार-बार द्वार पर खड़ा हो जाता |,पीठ पर बाँधे हुए था ।,इससे बेचैन होकर बार-बार द्वार पर खड़ा हो जाता । "एक तो इवा योहो झम थी, दूसरे ठप्त गंवार का भाकर मेरे मुंह पर खड़ा हों जाता मार्ना मेरा गला दबाता था ।",उसका बार-बार आकर मेरे मुँह को अपनी गठरी से रगड़ना मुझे बहुत बुरा लग रहा था ।,"एक तो हवा यों ही कम थी, दूसरे उस गँवार का आकर मेरे मुँह पर खड़ा हो जाना, मानो मेरा गला दबाना था ।" एचाएक मुझे कोष था गया ।,मैं कुछ देर तक जब्त किये बैठा रहा ।,एकाएक मुझे क्रोध आ गया । कोई बढ़ा आदमी होगा तो अपने घर का द्वाया ।,"‘अगर इतने नाजुक मिजाज हो, तो अव्वल दर्जे में क्यों नहीं बैठे ।","‘ ‘कोई बड़ा आदमी होगा, तो अपने घर का होगा ।" फूलमती क्रोध-विहुल द्वोबर बोली -भाड़ में जाय तुम्दारा कामून ।,"‘ ‘नहीं, दादा के मरते ही हमारे हो गये!’ उमानाथ ने बेहयाई से कहा- अम्माँ, कानून-कायदा तो जानतीं नहीं, नाहक उछलती हैं ।",फूलमती क्रोध - वि ह्व ल रोकर बोली- भाड़ में जाये तुम्हारा कानून । वह्दी मे कुमुद के विवाह में भो ख्चे ऋरूँगी ।,मैंने तीन भाइयों के विवाह में दस-दस हजार खर्च किये हैं ।,वही मैं कुमुद के विवाह में भी खर्च करूँगी । कामतानाय भो गर्म पढ़--आपको कुछ भो छ़चे करने छा अधिशद्ार नहीं है ।,वही मैं कुमुद के विवाह में भी खर्च करूँगी ।,कामतानाथ भी गर्म पड़ा- आपको कुछ भी खर्च करने का अधिकार नहीं है । "बस, छुट्रो हुईं ।",उमानाथ ने बड़े भाई को डाँटा- आप खामख्वाह अम्माँ के मुँह लगते हैं भाई साहब! मुरारीलाल को पत्र लिख दीजिए कि तुम्हारे यहाँ कुमुद का विवाह न होगा ।,"बस, छुट्टी हुई ।" "यद्द क्रायदा-चानूव तो जादतीं नह, व्यर्थ को बहस कर्ती हैं ।","बस, छुट्टी हुई ।","कायदा-कानून तो जानतीं नहीं, व्यर्थ की बहस करती हैं ।" मुझे तुम्दारी आश्रचिता बनऋर रहना स्वोच्चार नहीं ।,अपना घर-द्‌वार लो ।,मुझे तुम्हारी आश्रिता बनकर रहता स्वीकार नहीं । यह कुंटिया अनुराग को सेंट लिये आपदा स्वागत झरने के लिए तब्प रह्दी है ।,"मैं इसे अपना परम सौभाग्य समझूँगा, यदि आपके दर्शनों का सौभाग्य पा सका ।",यह कुटिया अनुराग की भेंट लिये आपका स्वागत करने को तड़प रही है । दफ्तर को भी खब सफ़ाई ढरा दो गई थी ।,"इस ठाठ से आकर कार्यालय में बैठे, तो सारा दफ्तर गमक उठा ।",दफ्तर की भी खूब सफाई करा दी गयी थी । "गाडी नो बजे जातो है; अभी साढे आठ हैं, साढ़े नौ बजे तक यहा आ जायेंगी ।",मेज पर गुलदस्ते सजा दिये गये थे ।,"गाड़ी नौ बजे आती है, अभी साढ़े आठ हैं, साढ़े नौ बजे तक यहाँ आ जायेगी ।" "सूँछो"" में दो-चार बाल पके हुए नर भा रहे हैं ; पर उन्हें उखाडु फेंकने का इस समय झोई सावन नहों है ।","बार-बार घड़ी की ओर ताकते हैं, फिर आईने में अपनी सूरत देखकर कमरे में टहलने लगते हैं ।","मूँछों में दो-चार बाल पके हुए नजर आ रहे हैं, उन्हें उखाड़ फेंकने का इस समय कोई साधन नहीं है ।" कोई दरणज नहों ।,"मूँछों में दो-चार बाल पके हुए नजर आ रहे हैं, उन्हें उखाड़ फेंकने का इस समय कोई साधन नहीं है ।",कोई हरज नहीं । इप़से रग कुछ और ज़्यादा जमेगा |,कोई हरज नहीं ।,इससे रंग कुछ और ज्यादा जमेगा । "प्रेम जय- श्रद्धा के साथ भाता है तो वद्द ऐसा मेहमान हो जाता है, णो उपद्धार ले आया हो ।",इससे रंग कुछ और ज्यादा जमेगा ।,"प्रेम जब श्रद्धा के साथ आता है तब वह ऐसा मेहमान हो जाता है, जो उपहार लेकर आता हो ।" "युवक जो रंग बहुमुल्य उउद्वारों, से जमाता है, ये मद्दात्मा या भद्ध महात्मा छोग केवल आशोर्वाद से जमा छेते हैं ।","युवकों का प्रेम खर्चीली वस्तु है, लेकिन महात्माओं या महात्मापन के समीप पहुँचे हुए लोगों को प्रेम- उलटे और कुछ ले आता है ।","युवक, जो रंग बहुमूल्य उपहारों से जमाता है, यह महात्मा या अर्ध्द-महात्मा लोग केवल आशीर्वाद से जमा लेते हैं ।" ", ठीक साढ़े नो बजे चपरासी ने आकर एक छाडे दिया ।","युवक, जो रंग बहुमूल्य उपहारों से जमाता है, यह महात्मा या अर्ध्द-महात्मा लोग केवल आशीर्वाद से जमा लेते हैं ।",ठीक साढ़े नौ बजे चपरासी ने आकर एक कार्ड दिया । "रुखू ने आकर मुलिया से कहा--छहके मेले जा रहे हैं, सभों को दो-दो आने पैसे दे दे ।",कुंजी तो मुलिया के पास थी ।,"रग्घू ने आकर मुलिया से कहा— लड़के मेले जा रहे हैं, सबों को दो-दो पैसे दे दो ।" मुलिया ने त्यौरियाँ चढ़ादर कद्दा--पेसे घर में नहों हैं ।,"रग्घू ने आकर मुलिया से कहा— लड़के मेले जा रहे हैं, सबों को दो-दो पैसे दे दो ।",मुलिया ने त्योरियाँ चढ़ाकर कहा— पैसे घर में नहीं हैं । हमारी कप्ताई इप॒लिए नहीं है कि दूपरे खाये और अछों पर ताव दें ।,"खाने- पहनने को भी चाहिए, कागज-किताब को भी चाहिए, उस पर मेला देखने को भी चाहिए ।",हमारी कमाई इसलिए नहीं है कि दूसरे खायें और मूँछों पर ताव दें । वह तो किसी तरह राफ़ो नहीं होती ।,तुलसी ने कहा- भाई मैं तो तैयार हूँ; लेकिन जब सुभागी भी माने ।,वह किसी तरह राजी नहीं होती । जब मेरो चाल-कुचारू देखना तो मेरा प्रिर काठ हेना ।,"और जो काम तुम कहो, वह सिर-आँखो के बल करूँगी; मगर घर बसाने को मुझसे न कहो ।",जब मेरा चाल-कुचाल देखना तो मेरा सिर काट लेना । राम को दुल्दन राम से भो दो अंगुल ऊ चो थी ।,यहाँ किसी ने जनम भर का ठीका नहीं लिया है ।,रामू की दुल्हन रामू से भी दो अंगुल ऊँची थी । मटककर बोलौ-- हमने किय्ों का करज थोड़े दो खाया है कि जनम-भर बठे भरा करें ।,रामू की दुल्हन रामू से भी दो अंगुल ऊँची थी ।,मटककर बोली- हमने किसी का करज थोड़े ही खाया कि जनम भर बैठे भरा करें । "यहाँ तो खाने फो भी मदहदौन चाहिए, पहनने को भी मद्दीव चाहिए, यह इसारे बूते को बात नहीं है ।",मटककर बोली- हमने किसी का करज थोड़े ही खाया कि जनम भर बैठे भरा करें ।,"यहाँ तो खाने को भी महीन चाहिए, पहनने को भी महीन चाहिए, यह हमारे बूते की बात नहीं ।" दोपद्वर को आकर जल्दी-ऊठदी खाना पेकाकर सबकों खिलाती ।,फिर खेत में काम करने चली जाती ।,दोपहर को आकर जल्दी-जल्दी खाना पकाकर सबको खिलाती । मगर राम्‌ को बद बुरा छृगता ।,"सोचती, यह तो जवान आदमी हैं, यह काम न करेंगे तो गृहस्थी कैसे चलेगी ।",मगर रामू को यह बुरा लगता । यद असागे यहां थो मेरे पीछे पढ़े हैं ।,मेरा माथा ठनका ।,यह अभागे यहाँ भी मेरे पीछे पड़े हैं । में विन्तित दोकर बोलो--होरई स्वांग न खढ़ा करें ।,फिरने दो ।,मैं चिंतित होकर बोली- कोई स्वाँग न खड़ा करें । क्‍या यद्ध सब इस तरह मुस्ते य्दाँ से भगाने पर तुडे हैं ।,मेरी सामर्थ्य ही क्या है ?,क्या यह सब इस तरह से मुझे यहाँ से भगाने पर तुले हैं । एबच्च इफता और गुजर गया ।,यही तो कि मैं मारी-मारी फिरूँ! कितनी नीची तबियत है ?,एक हफ्ता और गुजर गया । खुफियों ने पिंड न छोड़ा ।,एक हफ्ता और गुजर गया ।,खुफिया ने पिंड न छोड़ा । हुए से में एसरा पानी लाये देती हूं ।,न जाने कौन जानवर मरा है ।,कुएँ से मैं दूसरा पानी लाये देती हूँ । ! नयाथ-पाँव तुढ़वा आयेगी भौर कुछ न होगा ।,क्या एक लोटा पानी न भरने देंगे ?,‘हाथ-पाँव तुड़वा आयेगी और कुछ न होगा । गयी कया जवाब देतो ; किन्तु उसने वह बदबू- - द्वार पानी पीने को न दिया ।,’ इन शब्दों में कड़वा सत्य था ।,"गंगी क्या जवाब देती, किन्तु उसने वह बदबूदार पानी पीने को न दिया ।" बुढ़िया ने एक हो वाष्प्रद्वार में उप्रक्ना काम तमाम कर दिया ।,हरिधन परास्त हो गया ।,बुढ़िया ने एक ही वाक्-प्रहार में उसका काम तमाम कर दिया । "उसको तनी हुई भें ढोलो पढ़ गई', आंखों की आग बुक गईं, फढ़कते हुए नथने शांत हो गये ।",बुढ़िया ने एक ही वाक्-प्रहार में उसका काम तमाम कर दिया ।,"उसकी तनी हुई भवें ढीली पड़ गयीं, आँखों की आग बुझ गयी, फड़कते हुए नथुने शांत हो गये ।" बौमारी तो खेर बढ़ी चीज़ है ।,"पहले खुद मरज पहचानकर इलाज करेंगे, उसमें सफल न हुए, तो किसी डाक्टर को बुलायेंगे ।",बीमारी तो खैर बड़ी चीज है । बनी बूढ़ी माँ ।,"एक हजार रूपये पाते हैं, लेकिन उनके घर इंतजाम कौन करता है ?",उनकी बूढी माँ । खचे पूरा न पढ़ता था ।,पहले खुद घर का इंतजाम करते थे ।,खर्च पूरा न पड़ता था । "तो भाई जान, यह ग्रहर दिल से निकाल डालो कि घुम् मेरे समीप जा गये द्वो और अब स्ततत्न दो ।","जब से उनकी माताजी ने प्रबंध अपने हाथ में ले लिया है, जैसे घर में लक्ष्मी आ गयी हैं ।","तो भाईजान, यह गरूर दिल से निकाल डालो कि तुम मेरे समीप आ गये हो और अब स्वतंत्र हो ।" मेंने सजल भाँखों से कहा--हरविज़ नहीं ।,मुझे आज सचमुच अपनी लघुता का अनुभव हुआ और भाई साहब के प्रति मेरे मन में श्रद्धा उत्पन्न हुई ।,मैंने सजल आँखों से कहा- हरगिज नहीं । "वद्द उत झ्षियाँ में नहों है, जो पति को देवता समस्तती हैं और उसझा दुर्व्यवद्वार सहतो रहती हैं ।","उसे तो तुम जानते हो, कितनी अभिमानी है ।","वह उन स्त्रियों में नहीं है, जो पति को देवता समझती हैं और उसका दुर्व्यवहार सहती रहती है ।" "उप्तके लिए सुन्ती की जगह मुन्ती है, खुन्तो के लिए उसकी उपेक्षा है--ओऔर रुदव है ।","न सुन्नी की परवाह करता है, न सुन्नी उसकी परवाह करती है, मगर वह तो अपने रंग में मस्त है, सुन्नी प्राण दिये देती है ।","उसके लिए सुन्नी की जगह मुन्नी है, सुन्नी के लिए उसकी उपेक्षा है और रूदन है ।" उस लॉंडे का क्‍या बिग- देगा |,’ मैंने कहा- लेकिन तुमने सुन्नी को समझाया नहीं ।,उस लौंडे का क्या बिगड़ेगा ? "बस, यद्दो जी चाहता है दि इते अपने कलेजे में रख छू, कि इसे कोई कड़ी आँख से देख मी व सके ।",सुन्नी को देखकर तो मेर छाती फटने लगती है ।,"बस यही जी चाहता है कि इसे अपने कलेजे में ऐसे रख लूँ, कि इसे कोई कड़ी आँख से देख भी न सके ।" खरो-पुरुष में विवाह को पहली शर्द यद्द है कवि दोनों सोलदों आने एक दूसरे के हो जाये ।,मैं तो खुद यह अपमान न सह सकती ।,स्त्री पुरूष में विवाह की पहली शर्त यह है कि दोनों सोलहों आने एक-दूसरे के हो जायें । "ऐसे पुरुष तो कम हैं, जो स्रा को जौ-भर भी विचलित द्वोते देखकर शात रद्द सके , पर ऐसी ख्त्रियां बहुत हैं, जो पति को खच्छन्द सम्रमती हैं ।",स्त्री पुरूष में विवाह की पहली शर्त यह है कि दोनों सोलहों आने एक-दूसरे के हो जायें ।,"ऐसे पुरूष तो कम हैं, जो स्त्री को जौ-भर विचलित होते देखकर शांत रह सकें, पर ऐसी स्त्रियाँ बहुत हैं, जो पति को स्वच्छंद समझती हैं ।" कपड़े सोते-सोते मेरी आंखें फूट पई ।,पाँच संदूक कपड़ों के दिये थे ।,कपड़े सीते-सीते मेरी आँखें फूट गयी । कल से में यंदं पुभाले बिछा दूँगा ।,हल्कू- आज और जाड़ा खा ले ।,कल से मैं यहाँ पुआल बिछा दूँगा । ' हैः जबरी 'ने' अगर पंजे उसको घुटनियाँ पर रख दिये और उंसके मुँह के पाप अपना मुह ले गया ।,"उसी में घुसकर बैठना, तब जाड़ा न लगेगा ।",जबरा ने अपने पंजे उसकी घुटनियों पर रख दिये और उसके मुँह के पास अपना मुँह ले गया । "..' जब किसी तरह न रहा गया, तो उसने जबरां को घोरे से 'ठठाया और ठप्तके प्रिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया ।","कभी इस करवट लेटता, कभी उस करवट, पर जाड़ा किसी पिशाच की भाँति उसकी छाती को दबाये हुए था ।",जब किसी तरह न रहा गया तो उसने जबरा को धीरे से उठाया और उसक सिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया । जर्बरा शायद समस्त रद्दा था कि स्वर्ग यही है; और इल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस कुत्ते के ग्रति ध्णा को गनन्‍्ष तक न थौं' ।,"कुत्ते की देह से जाने कैसी दुर्गंध आ रही थी, पर वह उसे अपनी गोद मे चिपटाये हुए ऐसे सुख का अनुभव कर रहा था, जो इधर महीनों से उसे न मिला था ।","जबरा शायद यह समझ रहा था कि स्वर्ग यहीं है, और हल्कू की पवित्र आत्मा में तो उस कुत्ते के प्रति घृणा की गंध तक न थी ।" ' संहसा जंबरा ने किसी जानवर को आइट पाई ।,"नहीं, इस अनोखी मैत्री ने जैसे उसकी आत्मा के सब द्वा र खोल दिये थे और उनका एक-एक अणु प्रकाश से चमक रहा था ।",सहसा जबरा ने किसी जानवर की आहट पायी । "ऐसा जान पढ़ता था, सारा रक्त जम गया है, धेमनियाँ मैं रक्त बी जगह द्िम गह रद्द है ।","हल्कू उठ बैठा और दोनों घुटनों को छाती से मिलाकर सिर को उसमें छिपा लिया, फिर भी ठंड कम न हुई |","ऐसा जान पड़ता था, सारा रक्त जम गया है, धमनियों मे रक्त की जगह हिम बह रहा है ।" केलकरजौ अपने गन्धर्षविद्याल्य के कई शिष्यों के साथ तंबूरा किये बेठे थे ।,मंदिर के आँगन में संगीत-मंडली बैठी हुई थी ।,केलकर जी अपने गंधर्व-विद्यालय के शिष्यों के साथ तम्बूरा लिये बैठे थे । कोई गत बजाने को तेयारो द्वो रही थी ।,"पखावज, सितार, सरोद, वीणा और जाने कौन-कौन बाजे, जिनके नाम भी मैं नहीं जानता, उनके शिष्यों के पास थे ।",कोई गीत बजाने की तैयारी हो रही थी । सम्रा बंध गया ।,एक क्षण में गीत शुरु हुआ ।,समाँ बँध गया । "जो जहाँ था, वहीं मन्न-मुम्ध-छा सढ़ा था |","जहाँ इतना शोर-गुल था कि तोप की आवाज भी न सुनायी देती, वहाँ जैसे माधुर्य के उस प्रवाह ने सब किसी को अपने में डुबा लिया ।","जो जहाँ था, वहीं मंत्र- मुग्ध-सा खड़ा था ।" "जरे सामने चद्दी यमुना का तट था, गुह्मलताओं का घूँघट मेँ पर ढाहे हुए ।","मेरे सामने न वह बिजली की चकाचौंध थी, न वह रत्नों की जगमगाहट, न वह भौतिक विभूतियों का समारोह ।","मेरे सामने वही यमुना का तट था, गुल्म-लताओं का घूँघट मुँह पर डाले हुए ।" "वही मोदिनौ गठए थीं, वद्दी गोषियों की जल-क्रोढ़, वह्दौ वशी कौ मधुर लनि, बहो शीतल चाँदनीं और वद्दी प्यारा ननन्‍्दकिशोर ! जिसको मुश्च-छवि में प्रेम और चात्सल्य की ज्योर्ति भी, लिम्के दशनों हो से दृश्य निर्मल दो जाते थे ।","मेरे सामने वही यमुना का तट था, गुल्म-लताओं का घूँघट मुँह पर डाले हुए ।","वही मोहिनी गउएँ थीं, वही गोपियों की जल-क्रीड़ा, वहीं वंशी की मधुर ध्वनि, वही शीतल चाँदनी और वहीं प्यारा नंदकिशोर! जिसकी मुख-छवि में प्रेम और वात्सल्य की ज्योति थी, जिसके दर्शनों ही से हृदय निर्मल हो जाते थे ।" यह खबर कहाँ तक सदी है १ ४ ।,"पण्डित जी ने तुरन्त उसे बुलाकर कठोर कण्ठ से कहा — मैंने सुना है , तुमने किसी बनिये की लडक़ी से अपना विवाह कर लिया है ।",यह खबर कहाँ तक सही है ? "उस प्रेम्त कौ तरप्न में वह सारे क्डों को म्लेलने के लिए तेयार मालम होता था ; लेकिव णेप्रे कोई कायर सिपादह्दी बन्दूक के सामने जाकर हिम्मत खो बेठता है, और फ़दम पीछे इटा लेता है, वद्दी दशा केशब को हुईं ।",माता के स्नेह पर उसे विश्वास था ।,"उस प्रेम की तरंग में वह सारे कष्टों को झेलने के लिए तैयार मालूम होता था ; लेकिन जैसे कोई कायर सिपाही बन्दूक के सामने जाकर हिम्मत खो बैठता है और कदम पीछे हटा लेता है , वही दशा केशव की हुई ।" "नतो तुम आज द्वी इस वक्त उस बनिए को खत लिख दो, और याद रप्तो कि अगर इस तरह छो चर्चा फिर कभी उठी, तो में तुम्दारा सबसे बढ़ा शन्ु टूँगा ।","‘ जी हाँ , बिलकुल गलत ।","’ ‘ तो तुम आज ही इसी वक्त उस बनिये को खत लिख दो और याद रखो कि अगर इस तरह की चर्चा फिर कभी उठी , तो तुम्हारा सबसे बड़ा शत्रु होऊँगा ।" "शिकार' की बात किसो और के मंद से सुनो होती, तो फिर उच्ची आउनेय नेत्रों से देखते |",वसुधा की एक हथेली पर अँगुलियों से रेखा खींचने में मग्न थे ।,"शिकार की बात किसी और के मुँह से सुनी होती , तो फिर उसी आग्नेय नेत्रों से देखते ।" वहुघा के मूं ह - से यह चर्चा सुनकर उन्हें दुःख हुआ ।,"शिकार की बात किसी और के मुँह से सुनी होती , तो फिर उसी आग्नेय नेत्रों से देखते ।",वसुधा के मुँह से यह चर्चा सुनकर उन्हें दु:ख हुआ । बसुधा ने तो साधारण-सी बात कद्दी थी ; पर कु अर साहब के हृदय पर वह चिनगारी के सप्तान लगी ।,बीमार के पास बैठने से आदमी सचमुच बीमार हो जाता है ।,वसुधा ने साधारण-सी बात कही थी ; पर कुँवर साहब के ह्रदय पर वह चिनगारी के समान लगी । "' बसुधा ने उसी सरल भाव से कद्दा -भब कौ त्॒मने क्या-क्या तोहफे ज़मा - किये, ज़रा भेंगाओ, देखूँ ।",फिर वसुधा की हथेली पर रेखाएँ बनाने लगे ।,"वसुधा ने उसी सरल भाव से कहा , अबकी तुमने क्या-क्या तोहफे जमा किये , जरा मँगाओ, देखूँ ।" "उतमें जो सबसे अच्छा द्वोगा, उसे में छे लेगी ।","वसुधा ने उसी सरल भाव से कहा , अबकी तुमने क्या-क्या तोहफे जमा किये , जरा मँगाओ, देखूँ ।","उनमें से जो सबसे अच्छा होगा, उसे मैं ले लूँगी ।" "बोलो, मुझे के चलोगे न ! |",अबकी मैं भी तुम्हारे साथ शिकार खेलने चलूँगी ।,"बोलो , मुझे ले चलोगे न ?" - मानूँगी नहीं |,"बोलो , मुझे ले चलोगे न ?",मैं मानूँगी नहीं । "उत्के कई कमरों में फर्श, गदह्टे, कोच, कुर्वियाँ; मोढ़े, सब खालों ही के थे ।",सैकड़ों ही खालें जमा कर रखी थीं ।,"उनके कई कमरों में फर्श-गद्दे , कोच, कुर्सियाँ, मोढ़े सब खालों ही के थे ।" "भत्र की भी बहुत से सींग, सिर, पंजे, खाल क्षमा रर रखो थीं ।",शिकार में वही सूट पहनते थे ।,"अबकी भी बहुत से सींग , सिर, पंजे, खालें जमा कर रखी थीं ।" "उसछा हृदय बेठा जाता था, मार्नों नदी में डूबने जा रद्दी दो |","मानी एक सफेद साड़ी पहनकर ताँगे पर बैठी, तो उसका हृदय काँप रहा था और बार-बार आँखों में आँसू भर आते थे ।","उसका हृदय बैठा जाता था, मानों नदी में डुबने जा रही हो ।" ह ै मानी “मेशा मन कद्दता है कोई अनिष्ट होनेवाला है ।,वहाँ सब लोग तेरी राह देख रहे हैं और तू कहती है लौट चलो ।,"मानी- मेरा मन कहता है, कोई अनिष्ट होने वाला है ।" ' शोकुछ--पागरलों कौ-सी बातें न करो ।,"कह देना, मानी बीमार है ।",गोकुल- पागलों की-सी बातें न करो । उसने निश्वय किया चलकर दब साफ-बाफ़ कह दूं ।,"एक ओर तो शुभ कार्य के पूरा करने का आनंद था, दूसरी ओर भय था कि कल मानी न जायगी, तो लोगों को क्या जवाब दूँगा ।","उसने निश्चय किया, चलकर साफ-साफ कह दूँ ।" भाज दी क्यों न कट्द दूँ ।,"आज नहीं कल, कल नहीं परसों तो सब-कुछ कहना ही पड़ेगा ।",आज ही क्यों न कह दूँ । "लेकिन, मेंने सोचा--जब सुन्ती दी न रहो, तो उसको लाश में क्‍या रखा है |",मेरे जी में भी आया कि चलकर सुन्नी के अंतिम दर्शन कर लूँ ।,"लेकिन मैंने सोचा, जब सुन्नी ही न रही, तो उसकी लाश में क्या रखा है! न गयी ।" न जाने केसे आंसू निकझ आये ।,"रोयी यहाँ भी, लेकिन तुमसे सच कहती हूँ, दिल से नहीं रोयी ।",न जाने कैसे आँसू निकल आए । न जाने मेरे मुंह से यद बात क्यों न निक- लती कि करा बाहर खेल रद्दा था ।,"‘ हमेशा यही सवाल, इसी ध्वनि में पूछा जाता था और इसका जवाब मेरे पास केवल मौन था ।",न जाने मुँह से यह बात क्यों न निकलती कि जरा बाहर खेल रहा था । "अंग्रेज़ी पड़ना कोई हँसो-खेल नहीं है कि जो चाहे, पढ़ ले ; नहीं ऐरा गेरा नत्यू-खरा सभी अंग्रेज़ी के विद्वान्‌ दो जाते ।","‘इस तरह अंग्रेजी पढ़ोगे, तो जिंदगी-भर पढ़ते रहोगे और एक हर्फ़ न आयेगा ।","अंग्रेजी पढ़ना कोई हँसी-खेल नहीं है कि जो चाहे पढ़ ले, नहीं, ऐरा-गैरा नत्थू-खैरा सभी अंग्रेजी कि विद्वान हो जाते ।" "बढ़े बढ़े विद्वान भी शुद्ध अंग्रेज़ी नद्दों लिख सकते, बोलना हो दूर रह्य ।","और आती क्या है, हाँ, कहने को आ जाती है ।","बड़े-बड़े विद्वान भी शुद्ध अंग्रेजी नहीं लिख सकते, बोलना तो दूर रहा ।" "झझ्े तो दो-दही-तीन श्लाल छाते हैं, तुम उम्न-भर इसो दरजे में पढ़े सड़ते रहौोंगे ।","हमेशा पढ़ता रहता हूँ, उस पर भी एक-एक दरजे में दो-दो, तीन-तीन साल पड़ा रहता हूँ फिर तुम कैसे आशा करते हो कि तुम यों खेल-कुद में वक्त, गँवाकर पास हो जाओगे ?","मुझे तो दो-ही-तीन साल लगते हैं, तुम उम्र-भर इसी दरजे में पड़े सड़ते रहोगे ।" में यह लताड़ सुनकर आँसू बद्दाने लगता ।,दादा की गाढ़ी कमाई के रूपये क्यों बरबाद करते हो ?,’ मैं यह लताड़ सुनकर आँसू बहाने लगता । "मु दया ने उम्रा छी ओर जेसे फ़रियाद की शांखों से देखा, और बोला--शआपको क्या राव है भाई साहब ?","गहने इसी दिन के लिए हैं या और किसी दिन के लिए! जब तुम्हीं न रहोगे, तो गहने लेकर क्या आग में झोकूँगीं! उसने पिटारी लाकर उसके सामने रख दी ।",दया ने उमा की ओर जैसे फरियाद की आँखों से देखा और बोला- आपकी क्या राय है भाई साहब ? "दया ने हृढ़ता परे कध--भर्म्माँ, तुम्हारे गहने तो न छया, चाद्दे मुक्त पर कुछ दी कर्यों घ आ पढ़े ।","मैं तो प्राण तक तुम्हारे ऊपर न्योछावर कर दूँ, गहनों की बिसात ही क्या है ।","दया ने दृढ़ता से कहा- अम्माँ, तुम्हारे गहने तो न लूँगा, चाहे मुझ पर कुछ ही क्यों न आ पड़े ।" मुक्त-जसे कपूत को ते तुम्दारी कोख से जन्म हौ ना लेना वाहिए था ।,"जब आज तक तुम्हारी कुछ सेवा न कर सका, तो किस मुँह से तुम्हारे गहने उठा ले जाऊँ ?",मुझ जैसे कपूत को तो तुम्हारी कोख से जन्म ही न लेना चाहिए था । इस जाल में पक्षियाँ को तढ़पते और फइफड़ाते देखता हैँ और फिर डाली पर णा बेठता हूँ ।,"जानता हूँ कि जाल के नीचे जाना है, मगर जाल जितना ही रंगीन और ग्राहक है, दाना उतना ही घातक और विषैला ।",इस जाल में पक्षियों को तड़पते और फड़फड़ाते देखता हूँ और फिर भी जाल पर जा बैठता हूँ । ब्वारे दिन गली गली ठोकर खानी पड़ती हैं |,"कभी बारह बजे रात को सोना नसीब होता है, कभी रतजगा करना पड़ जाता है ।",सारे दिन गली-गली ठोकरें खानी पड़ती हैं । न जाने कब गिगफ़्तार दो जाऊं) कंव जमानत तलब दो जाय ।,इस पर तुर्रा यह है कि हमेशा सिर पर नंगी तलवार लटकती रहती है ।,"न जाने कब गिरफ्तार हो जाऊँ, कब जमानत तलब हो जाय ।" .छ॒फिया पुकौस की एक फ़ौज इमेशा पीछे पढ़ी रहती है ।,"न जाने कब गिरफ्तार हो जाऊँ, कब जमानत तलब हो जाय ।",खुफिया पुलिस की एक फौज हमेशा पीछे पड़ी रहती है । प्रधानजों ने गम्भीर-समाव से कहा--तावान तो देता ही पड़ेगा ।,उसने देख लिया कि यहाँ कोई उस पर विचार करनेवाला नहीं है ।,प्रधान जी ने गम्भीर भाव से कह- तावान तो देना ही पड़ेगा । इसपे ज्यादा अपनो ग्ररोबी का और क्या प्रप्माण-दूँ ।,25/- महीने दीजिएगा ।,इससे ज्यादा अपनी गरीबी का और क्या प्रमाण दूँ । "यद्द समम्छ लीजिए कि जब में आपकौ गुलामी करने को तेयार हुआ हूँ, तो इसी किए कि मुम्तें दूधश कोई आधार नहीं है ।","अगर मेरा काम संतोष के लायक न हो, तो एक महीने के बाद मुझे निकाल दीजिएगा ।","यह समझ लीजिए कि जब मैं आपकी गुलामी करने को तैयार हुआ हूँ, तो इसीलिए कि मुझे दूसरा कोई आधार नहीं है ।" "जी में आया, भाग जाय, माबा उलट दे और खाली म्ाबा लेकर चली जाय; पर चनधिंह ने कई गज़ के फासछे से द्वी रुक- फर कहा-- डर मत, ढर मत, भगवान्‌ जानता है, में तुकप्ते कुछ न बोलगा ।",मुलिया की छाती धक् से हो गयी ।,"जी में आया भाग जाय, झाबा उलट दे और खाली झाबा लेकर चली जाय; पर चैनसिंह ने कई गज के फासले से ही रुककर कहा- डर मत, डर मत, भगवान जानता है! मैं तुझसे कुछ न बोलूँगा ।" मुझे कुछ सुध द्वो न रहो ।,तुझे देखकर आप-ही-आप हाथ बढ़ गये ।,मुझे कुछ सुध ही न रही । "जी में आता था, द्वाथ काठ डालूँ |","तू चली गयी, तो मैं वहीं बैठकर घंटों रोता रहा ।","जी में आता था, हाथ काट डालूँ ।" "तभी से तुमे हँढ़ रहा है! आज तू इस रास्ते से चली, आईं ।","कभी जी चाहता था, जहर खा लूँ ।",तभी से तुझे ढूँढ़ रहा हूँ आज तू इस रास्ते से चली आयी । "में झोददा था, छा था ; लेकिन जब से तुमे शेख! है, मेरे मन की सारो खोट मिठ गई है ।","अगर तू मेरा सिर भी काट ले, तो गर्दन न हिलाऊँगा ।","मैं शोहदा था, लुच्चा था, लेकिन जब से तुझे देखा है, मेरे मन से सारी खोट मिट गयी है ।" "ज्षरा इन्हें बुला लिया और खुशामद के दो-चार शब्द छुना दिये, थोड़ो-सो स्तुति कर दी, बस व्यपका मिज्ञाज आसम्राव पर जा पहुँचा ।",वाह क्या कहना है ! कितनी दूर की बात कही है ।,"जरा इन्हें बुला लिया और खुशामद के दो शब्द सुना दिये, थोड़ी-सी स्तुति कर दी, बस आपका मिजाज आसमान पर जा पहुँचा ।" एक चुप सौ बाधाओं को दरती दे ।,इसका कोई जवाब नहीं ?,एक चुप सौ बाधाओं को हराती है ? में तो मद्दाशय फो जावती थो ।,एक बार एक गहना बनवाने को दिया ।,मैं तो महाशय को जानती थी । सयोग पे आप भी विराजप्रान थे |,अपने पहचान के एक सुनार को बुला रही थी ।,संयोग से आप भी विराजमान थे । "इन भछेमावस मे बह भाभूषण और रुपये न जाने किस बेई मान के दे दिये कि बसों के कम्हट के बाद जब चोज़ बतकर भाई, तो आठ आने तांवा और इतनी भद्दो कि देखकर घिव लगतो थो ।",सोने का एक आभूषण और सौ रुपये इनके हवाले किये ।,"इस भलेमानस ने वह आभूषण और रुपये न जाने किस बेईमान को दे दिये कि बरसों के झंझट के बाद जब चीज बनकर आयी, तो आठ आने ताँबा और इतनी भद्दी कि देखकर घिन लगती थी ।" "ऐसप्ते-ऐसे वक्ादार तो इनके मित्र हैं, शिन्‍्हें मिन्न की गरदन पर छुरी फेरने में भी सकेच नहीं ।",रो-पीटकर बैठ रही ।,ऐसे-ऐसे वफादार तो इनके मित्र हैं; जिन्हें मित्र की गरदन पर छुरी फेरने पर भी संकोच नहीं । तेरे द्वी ऊपर है ।,"पन्ना— तू चाहे, तो उसे मना ले ।",तेरे ही ऊपर है । "पन्‍ता--गाली कसी, देवर ही तो है ! मुलिया--सुरू-जैसी बुढ़िया को वह क्‍यों पूछेंगे ।","पन्ना— बता दूँ, वह तू ही है! मुलिया लजाकर बोली— तुम तो अम्माँजी, गाली देती हो ।","पन्ना— गाली कैसी, देवर ही तो है! मुलिया— मुझ जैसी बुढ़िया को वह क्यों पूछेंगे ?" पन्‍ता--वह तुम्ो पर दाँत लगाये बेठा है ।,"पन्ना— गाली कैसी, देवर ही तो है! मुलिया— मुझ जैसी बुढ़िया को वह क्यों पूछेंगे ?",पन्ना— वह तुझी पर दाँत लगाये बैठा है । इंदगाह डरे द्ामिद ने चिमटे को ज़मीन पर पटकर कहा--ज़रा अपना भिद्ती ज़मीन पर गिरा दो |,"जरा सुनें, सबके सब क्या-क्या आलोचनाएँ करते हैं! मोहसिन ने हँसकर कहा— यह चिमटा क्यों लाया पगले, इसे क्या करेगा ?",हामिद ने चिमटे को जमीन पर पटककर कहा— जरा अपना भिश्ती जमीन पर गिरा दो । सारो पसलियाँ चूर-चुर दो जाये बचा की ।,हामिद ने चिमटे को जमीन पर पटककर कहा— जरा अपना भिश्ती जमीन पर गिरा दो ।,सारी पसलियाँ चूर-चूर हो जायँ बच्चू की । मेरा बद्दादुर शेर है--चिमटा ।,"तुम्हारे खिलौने कितना ही जोर लगायें, मेरे चिमटे का बाल भी बाँका नही कर सकते ।",मेरा बहादुर शेर है चिमटा । कल हामिद ने खेजरी की ओर उपेक्षा परे देखा जजेश चिम्रदा चाहे तो तुम्दारो खँजरी का पेट फाड़ डाढे ।,दो आने की है ।,हामिद ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा- मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खँजरी का पेट फाड़ डाले । चिमटे ने भी सभी को मोहित कर लिया ; लेकित अब पेसे किसके पास घरे हैं |,"मेरा बहादुर चिमटा आग में, पानी में, आँधी में, तूफान में बराबर डटा खड़ा रहेगा ।","चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया, अब पैसे किसके पास धरे हैं ?" द्वाम्िद है पढ़ा चालाक ।,"बाप से जिद भी करें, तो चिमटा नहीं मिल सकता ।",हामिद है बड़ा चालाक । "दुसरे पक्ष से जा मिला ; लेकिन मोहसित, महमूद और नूरे भी, हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े द्वोने पर भी द्वामिद-के आघोतों से आतंकित हो उठें हैं ।",शास्त्रार्थ हो रहा है ।,"सम्मी तो विधर्मी हो गया! दूसरे पक्ष से जा मिला, लेकिन मोहसिन, महमूद और नूरे भी हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं ।" टंडन --यह हमारी विद्वान्‌ बहनों का द्वाल है ।,"जुगनू- और कुछ हो या न हो, जवान तो बाँका है ।",टंडन- यह हमारी विद्वान बहनों का हाल है । जुगनू - में तो उसकी सूरत देखते द्वी ताए गईं थी ।,टंडन- यह हमारी विद्वान बहनों का हाल है ।,जुगनू- मैं तो उसकी सूरत देखते ही ताड़ गयी थी । "मि० ख़रशेद-मेंने तो तुमसे कहा था, उप्के पेट में पानो व पचेगा ।","संयोग से लीलावती उस वक्त मौजूद थी; बोली, बुढ़िया तो बेतरह पीछे पड़ गयी ।","मिस खुरशेद- मैंने तुमसे कहा, था, उसके पेट में पानी न पचेगा ।" तुम जाकर रय भर आभओो ।,"मिस खुरशेद- मैंने तुमसे कहा, था, उसके पेट में पानी न पचेगा ।",तुम जाकर रूप भर जाओ । तब तक इसे में बातों में लगातों हूँ ।,तुम जाकर रूप भर जाओ ।,तब तक मैं बातों में लगाती हूँ । वह चली गई तो प्ि० खुशशेद ने जुगनू को घुलाया ।,उसका बँगला भी पास ही था ।,"वह चली गयी, तो मिस खुरशेद ने जुगनू को बुलाया ।" जुगनू ने एक पुरजा उनकी देकर कद्ा--मिसेद्भ टडन ने यद्ट किताब माँगो है ।,"वह चली गयी, तो मिस खुरशेद ने जुगनू को बुलाया ।",जुगनू ने एक पुरजा उसको देकर कहा- मिसेज टंडन ने यह किताब माँगी है । "बेढो, मैं अभी आतो हू ।",तुमसे कुछ बातें करनी हैं ।,"बैठो, मैं अभी आती हूँ ।" "जुगनू को नोति में ह्र्ियों के श्क्वार का केवछ एक उश्श्य था, पति को छुभाना ।","नहीं, सोने के समय क्वाँरियों को बनाव-सँवार की क्या जरूरत ?","जुगनू की नीति में स्त्रियों के ऋंगार का केवल एक उद्देश्य था, पति को लुभाना ।" “-- मास्टर साहब टरते-४रते बोडे ।,' 'तो दो लेता आऊँगा ।,'- मास्टर साहब डरते-डरते बोले । "मेने प्कुचाते हुए कहा -- घहन, तुम्दें मेरे जाने से ६४ होगा और ------ देवोजी ने तीक्ष्ण स्वर में कद्दा--हाँ, होगा तो अवश्य ।","' मैं कुछ कहने न पायी थी, कि ज्ञान बाबू चल दिये ।","मैंने सकुचाते हुए कहा- बहन, तुम्हें मेरे जाने से कष्ट होगा और... देवीजी ने तीक्ष्ण स्वर में कहा- हाँ, होगा तो अवश्य ।" "तुम दोनों जून में दो- तोब पाव भाठा खाभोगो, कमरे के एल्‍ छोने में अड्डा जमा छोगी, <प्रिर में जात्रे का तेल डालोगौ ।","मैंने सकुचाते हुए कहा- बहन, तुम्हें मेरे जाने से कष्ट होगा और... देवीजी ने तीक्ष्ण स्वर में कहा- हाँ, होगा तो अवश्य ।","तुम दोनों जून में दो-तीन पाव भर आटा खाओगी, कमरे के एक कोने में अड्डा जमा लोगी, सिर में आने का तेल डालोगी ।" "देवोजी ने सहृदय भाव से मेरा कथा पकड़कर कद्दा--जब तुम्दारे बावूजी लौट भाव, तो मुझे भो अपने घर मेहमाव रख लेना ।",यह क्या थोड़ा कष्ट है!' मैंने झेंपते हुए कहा- आप तो बना रही हैं ।,"' देवीजी ने सहृदय भाव से मेरा कंधा पकड़कर कहा- जब तुम्हारे बाबूजी, लौट आवें; तो मुझे भी अपने घर मेहमान रख लेना ।" "इतना कम खाकर और इतनी मेहनत करके वह कंसे इतनी हृ८-पुष्ठ थाँ, में नहों कद्ट सझृतो ।",भीतर का सारा काम खुद करतीं ।,"इतना कम खाकर और इतनी मेहनत करके वह कैसे इतनी ह्रष्ट-पुष्ट थीं, मैं नहीं कह सकती ।" सुमे यहाँ घस यदहदो एक तकलीफ थो ।,"जेठ की दुपहरी में भी न लेटती थीं! हाँ, मुझे कुछ न करने देतीं, उस पर जब देखो कुछ खिलाने को सिर पर सवार ।",मुझे यहाँ बस यही एक तकलीफ थी । "उठ बेठा और बोला--भरम्माँ, अभी तुम सोई नहीं ?",लालटेन जल रही है और करुणा बैठी रो रही है ।,"उठ बैठा और बोला— अम्माँ, अभी तुम सोयी नहीं ?" प्रछाश --मैने आज़ बुढ़िया के साथ बड़ी चटखटी की ।,"मुझसे आज बड़ा अपराध हुआ, अम्माँ ! करूणा ने उसके मुख की ओर स्नेह के नेत्रों से देखा ।",प्रकाश— मैंने आज बुढ़िया के साथ बड़ी नटखट की । "यह कद्कर रोने लगा ! करुणा ने स्नेह्ाद होकर उसे गछे लगा लिया, और उप्के कपोलों का चुम्बन करके बोलो--चैटा, मुझे खुश करने के लिए यह कह रहे दो, या तुम्दारे मत में सचमुच पछतावा दो रहा है ?",यह कहकर रोने लगा ।,"करूणा ने स्नेहार्द्र होकर उसे गले लगा लिया और उसके कपोलों का चुम्बन करके बोली— बेटा, मुझे खुश करने के लिए यह कह रहे हो या तुम्हारे मन में सचमुच पछतावा हो रहा है ?" "प्रद्नाश ने सिप्रकते हुए कशा--नहीं अम्माँ, मुझे दिल से अफसोस हो रद्दा है ।","करूणा ने स्नेहार्द्र होकर उसे गले लगा लिया और उसके कपोलों का चुम्बन करके बोली— बेटा, मुझे खुश करने के लिए यह कह रहे हो या तुम्हारे मन में सचमुच पछतावा हो रहा है ?","प्रकाश ने सिसकते हुए कहा— नहीं अम्माँ, मुझे दिल से अफसोस हो रहा है ।" "ज़द्दीन था द्वी, विश्वियालय से उप्ते वज्ञीफे मिलते थे, करुणा भो उप्तक्की ययेष्ट सहायता करतो थी, फिर भी उप्तका खर्चे पूरा न परता था ।",3 लेकिन प्रकाश के कर्म और वचन में मेल न था और दिनों के साथ उसके चरित्र का अंग प्रत्यक्ष होता जाता था ।,"जहीन था ही, विश्वविद्यालय से उसे वजीफे मिलते थे, करूणा भी उसकी यथेष्ट सहायता करती थी, फिर भी उसका खर्च पूरा न पड़ता था ।" प्रदर्शव को धुत ठप्ते हमेशा सवार रइतो थी ।,"वह मितव्ययता और सरल जीवन पर विद्वत्ता से भरे हुए व्याख्यान दे सकता था, पर उसका रहन-सहन फैशन के अंधभक्तों से जौ-भर घटकर न था ।",प्रदर्शन की धुन उसे हमेशा सवार रहती थी । उसके मन भऔरीवबुद्धि में मिरन्तर इन्द्र दोता रहता धा ।,प्रदर्शन की धुन उसे हमेशा सवार रहती थी ।,उसके मन और बुद्धि में निरंतर द्वन्द्व होता रहता था । "एक पक्का मकाच, दो वय्योचे, कई इज़ार के गहने और बीस हज़ार नक़॒द |",संपत्ति भी काफी छोड़ी थी ।,"एक पक्का मकान, दो बगीचे, कई हजार के गहने और बीस हजार नकद ।" कल तेरद्दी है ।,पंडित को मरे आज बारहवाँ दिन था ।,कल तेरही है । "उप्तने अब तक जो फुछ किया है,; मजद॒ब के अन्ये जोश में किया है ।",कोई दिलेर आदमी बेरहम नहीं हो सकता ।,"उसने अब तक जो कुछ किया है, मजहब के अंधे जोश में किया है ।" "आज छुदा ने मुम्के वह मौका या है कि में उप्ते दिखा दा कि मज़दब खिदसत का नाम है, छट भौर कत्ल का नद्दीं ।","उसने अब तक जो कुछ किया है, मजहब के अंधे जोश में किया है ।","आज खुदा ने मुझे वह मौका दिया है कि मैं उसे दिखा दूँ कि मजहब खिदमत का नाम है, लूट और कत्ल का नहीं ।" मेरी तलवार मेरो डिफ़ाज़त कर सझती है |,"तैमूर पर मेरी हकीकत खुल भी जाय, तो क्या खौफ ।",मेरी तलवार मेरी हिफाजत कर सकती है । उप्रको स्त्रो इतनो जल्द -आश्वस्त न द्वो सको ।,यजदानी ने खुश होकर बेटी को गले लगा लिया ।,उसकी स्त्री इतनी जल्द आश्वस्त न हो सकी । वद्द किप्ती तरद बेटी को अकेली न छोढ़ेगो ।,उसकी स्त्री इतनी जल्द आश्वस्त न हो सकी ।,वह किसी तरह बेटी को अकेली न छोड़ेगी । कई महीने गुज़र गये |,मैंने पटरे से उतर कर पतिदेव के चरणों पर सिर झुकाया और उन्हें साथ लिये हुए अपने मकान चली आयी ।,कई महीने गुजर गये । "वह चाइता है, इबोष आठों पदर उप्रके पास रहे ।","तैमूर उसी की आँखों से देखता है, उसी के कानों से सुनता है और उसी की अक्ल से सोचता है ।","वह चाहता है, हबीब आठों पहर उसके पास रहे ।" "केशव ने कठोर भाव से कद्दा+- इन दाशनिक विचारों से तुत्र मुझे पागल कर दोगी, प्रेप्ता) बस इतना हो समर लो कि में निराश द्दोकर जिन्दा नहों रह सछता ।",मैं तो आत्मा का बन्धन समझती हूँ ।,"केशव ने कठोर भाव से कहा — इन दार्शनिक विचारों से तुम मुझे पागल कर दोगी , प्रेमा! बस , इतना ही समझ लो मैं निराश होकर जिन्दा नहीं रह सकता ।" "एक क्षण तह वद्द मन सारे बेठा रद्दा, फिर उठकर निराशा-भरे स्वर में- बोला--'जेसो तुम्दारी इच्छा! और आाहिस्ता-आइिस्ता कदम उठाता हुआ वहाँ से चछा गया ।",केशव को अगर प्रेमा ने कठोर शब्द कहे होते तो भी उसे इतना दु:ख न हुआ होता ।,"एक क्षण तक वह मन मारे बैठा रहा , फिर उठकर निराशा भरे स्वर में बोला —‘ जैसी तुम्हारी इच्छा! अहिस्ता-अहिस्ता कदम-सा उठाता हुआ वहाँ से चला गया ।" "केशव ने उसे एक ऐसी षात छट्द दो थों, जो चचल पानी में पढ़नेवादी छाया की तरह उसके दिल पर छाई हुईं थी ।","२ रात को भोजन करके प्रेमा जब अपनी माँ के साथ लेटी , तो उसकी आँखों में नींद न थी ।","केशव ने उसे एक ऐसी बात कह दी थी , जो चंचल पानी में पडऩे वाली छाया की तरह उसके दिल पर छायी हुई थी ।" "माता ने भाँखें फाइकर कद्ठा-क्या बहता है, भला वह वहाँ केप्े रहेगो ?","गोकुल ने सिर झुकाकर कहा- वह तो अब शायद लौटकर न आये अम्माँ, उसके वहीं रहने का प्रबंध हो गया है ।","माता ने आँखें फाड़कर कहा -क्या बकता है, भला वह वहाँ कैसे रहेगी ?" माता सार्नों आकाश से गिर पढ़ीं |,गोकुल- इंद्रनाथ से उसका विवाह हो गया है ।,माता मानो आकाश से गिर पड़ी । यहाँ तह कि गोकुछ का घेये चरम सीमा को उल्लंघन कर गया ।,"उन्हें कुछ सुध न रही कि मेरे मुँह से क्या निकल रहा है, कुलांगार, भड़वा, हरामजादा, न जाने क्या -क्या कहा ।",यहाँ तक कि गोकुल का धैर्य चरमसीमा का उल्लंघन कर गया । "तुम मुख हो, तुम्हें कुछ नहों मालम द्वि समय को क्या प्रगति है ।",मैंने वही किया जो ऐसी दशा में मेरा कर्तव्य था और जो हर एक भले आदमी को करना चाहिए ।,"तुम मूर्खा हो, तुम्हें नहीं मालूम कि समय की क्या प्रगति है ।" फिर तुम्दारों चाँदो हो जायगो ।,कुछ दिन में मुझे ले जाकर किसी के गले में बांध आना ।,फिर तुम्हारी चाँदी हो जायगी । "25 “नहीं, नहीं ।","मैंने सोचा, कल बहुत-सा समय होगा, यह न जाने कितनी देर पदाए, इसलिए इसी वक्त मुआमला साफ कर लेना अच्छा होगा ।","‘नहीं, नहीं ।" तुम भी भाभोगे ?,सभी पुराने खिलाड़ी खेलेंगे ।,तुम भी आओगे ? "आज गया छा खेल, उप्तका वह नेपुण्य देखकर में चकित हो गया ।",मैं मोटर पर बैठा-बैठा तमाशा देखने लगा ।,"आज गया का खेल, उसका नैपुण्य देखकर मैं चकित हो गया ।" उसने अपने विचार में गृह्ो छोक लो थी ।,पदने वालों में एक युवक ने कुछ धाँ धली की ।,उसने अपने विचार में गुल्ली लपक ली थी । इस पर दोनों में ताल ठोंकने को नौबत भाई ।,गया का कहना था-गुल्ली जमीन मे लगकर उछली थी ।,इस पर दोनों में ताल ठोकने की नौबत आई है । आज छरई महोने के बाद उप्के मम्त मातृ-हृदय को अपवा सर्वेत्ष अपंण करके जप्ते आनन्द की विभूति मिलो ।,माता वात्सल्य-भरी आँखों से उनकी ओर देख रही थी और उसकी संपूर्ण आत्मा का आशीर्वाद जैसे उन्हें अपनी गोद में समेट लेने के लिए व्याकुल हो रहा था ।,आज कई महीने के बाद उसके भग्न मातृ-हृदय को अपना सर्वस्व अर्पण करके जैसे आनन्द की विभूति मिली । "उपकी स्वरामिनो-कत्पवा इप्नो-त्याग के लिए, -इसो आता-प्र्पण के लिए जेसे कोई मार्ग हँढ़ती रहतों“थी |",आज कई महीने के बाद उसके भग्न मातृ-हृदय को अपना सर्वस्व अर्पण करके जैसे आनन्द की विभूति मिली ।,"उसकी स्वामिनी कल्पना इसी त्याग के लिए, इसी आत्मसमर्पण के लिए जैसे कोई मार्ग ढूँढ़ती रहती थी ।" "माँ १० मुरारीछाल पर णमो हुईं थो, लड़के दोनदगाल पर णड़े हुए थे ।","बाग को बेचना उसे बहुत बुरा लगता था;लेकिन चारों ने ऐसी माया रची कि वह उसे बेचने पर राजी हो गयी, किन्तु कुमुद के विवाह के विषय में मतैक्य न हो सका ।","माँ पं. मुरारीलाल पर जमी हुई थी, लड़के दीनदयाल पर अड़े हुए थे ।" फूलप्रती ने कद्दा--माँ-बाप को कप्ताई में जेटी छा हिस्सा सो है ।,एक दिन आपस में कलह हो गयी ।,फूलमती ने कहा- माँ-बाप की कमाई में बेटी का हिस्सा भी है । "कोई चाघु-सन्‍्त आ जायें, कोई पाहुना दो आ पहुँचे, उनके सेवा-सत्कार के लिए किसो को तो घर पर रहना द्वी पढ़ेगां ।",घर में भी तो बीसों काम हैं ।,"कोई साधु-संत आ जायँ, कोई पाहुना ही आ पहुँचे, तो उनके सेवा-सत्कार के लिए किसी को घर पर रहना ही पड़ेगा ।" रामप्यारी कभो-कभो द्वार को दराजों से भीतर म्लाँकतों थो; पर अँपेरे में कुछ न दिखाई देता था ।,फिर उसे बंदकर वह ताली अपनी कमर में रख लेता था ।,"रामप्यारी कभी-कभी द्वार की दरारों से भीतर झाँकती थी, पर अंधेरे में कुछ न दिखाई देता ।" "सारे घर के लिए दद् करोठ्रों कोई ,तिलिस्म या रहस्य था जिक्षके विषय में भांति-साँति की कल्पताएँ होतो रहतो थीं ।","रामप्यारी कभी-कभी द्वार की दरारों से भीतर झाँकती थी, पर अंधेरे में कुछ न दिखाई देता ।","सारे घर के लिए वह कोठरी तिलिस्म या रहस्य था, जिसके विषय में भाँति-भाँति की कल्पनाएँ होती रहती थीं ।" "मठरों में शुई, शक्कर, गेहूँ, जो भादि चोज़ें रखी हुई थों ।","अंदर पाँव रखा तो उसे कुछ उसी प्रकार का, लेकिन उससे कहीं तीव्र आनंद हुआ, जो उसे अपने गहने-कपड़े की पिटारी खोलने में होता था ।","मटकों में गुड़, शक्कर, गेहूँ, जौ आदि चीजें रखी हुई थीं ।" एक जाले पर मालपुजारी को रखोदें और लेव-देव के पुरजे वेंघे हुए रखे थे ।,"एक किनारे बड़े-बड़े बरतन धरे थे, जो शादी-ब्याह के अवसर पर निकाले जाते थे, या माँगे दिये जाते थे ।",एक आले पर मालगुजारी की रसीदें और लेन-देन के पुरजे बंधे हुए रखे थे । "बिना पहले से नकुशा बनाये, कोई स्कोम तेयार किये काम केसे झुरू करूँ ।",चटपट एक टाइम-टेबिल बना डालता ।,"बिना पहले से नक्शा बनाये, बिना कोई स्कीम तैयार किये काम कैसे शुरू करूँ ?" "प्रातःछाल उठना, छः बजे मुँह-द्वाथ घो, नाइ्ता कर, पढ़ने भेठ जाना ।","टाइम-टेबिल में, खेल-कूद की मद बिलकुल उड़ जाती ।","प्रात:काल उठना, छ: बजे मुँह-हाथ धो, नाश्ता कर पढ़ने बैठ जाना ।" उनकौ नज़र मेरो ओर उठी और मेरे आ्रण विकछे ।,कमरे मे इस तरह दबे पाँव आता कि उन्हें खबर न हो ।,उनकी नजर मेरी ओर उठी और मेरे प्राण निकले । इतने मद्दान्‌ आन्दोलव में कितने हो घर तवाह हुए ओर होंगे ।,"' प्रधान ज्यादा गहराई से बोले- छकौड़ीलालजी, मुझे पहले तो इसका विश्वास नहीं आता कि आपकी हालत इतनी खराब है और अगर विश्वास आ भी जाय, तो भी मैं कुछ कर नहीं सकता ।",इतने महान् आंदोलन में कितने ही घर तबाह हुए और होंगे । "भाप सम्रकते हैं, हमारे घिर कितनी णढ़ी ज़िम्मेदारी है ।",हम लोग सभी तबाह हो रहे हैं ।,आप समझते हैं; हमारे सिर कितनी बड़ी जिम्मेदारी है । "ईखर घाद्देगा, तो वद्द दिन भो आयेगा जब आपका जुक्धान पूरा होगा ।","इसलिए जाइए, किसी तरह रुपये का प्रबंध कीजिए और दुकान खोलकर कारबार कीजिए ।","ईश्वर चाहेगा, तो वह दिन भी आयेगा जब आपका नुकसान पूरा होगा ।" ज्रौ का सुरकाया हुआ वदन उत्तेजित हो उठा ।,प्रधानजी को मेरी बातों पर विश्वास ही नहीं आया ।,स्त्री का मुरझाया हुआ बदन उत्तेजित हो उठा । "उठ खड्टो हुईं और शोलो--- अच्छो बात है, दम उन्हें विश्वास दिला देंगे ।",स्त्री का मुरझाया हुआ बदन उत्तेजित हो उठा ।,"उठ खड़ी हुई और बोली- अच्छी बात है, हम उन्हें विश्वास दिला देंगे ।" में अब कांग्रेस दफ्तर के सामने ही - मशझूगी ।,"उठ खड़ी हुई और बोली- अच्छी बात है, हम उन्हें विश्वास दिला देंगे ।",मैं अब काँग्रेस दफ्तर के सामने ही मरूँगी । मेरे बच्चे उसी दफ़्तर के सामने भूख से विकल हो होकर तढ़पेंगे ।,मैं अब काँग्रेस दफ्तर के सामने ही मरूँगी ।,मेरे बच्चे उसी दफ्तर के सामने विकल हो-होकर तड़पेंगे । में इस मरो हुई दशा में मो का््रेस को तोड़ ढालूँगो ।,"काँग्रेस हमारे साथ सत्याग्रह करती है, तो हम भी उसके साथ सत्याग्रह करके दिखा दें ।",मैं इसी मरी हुई दशा में भी काँग्रेस को तोड़ डालूँगी । वहीं सड़क-क्षिनारे भेरी जान निकलेगो ।,"एक इक्का बुला लो, खाट की जरूरत नहीं ।",वहीं सड़क किनारे मेरी जान निकलेगी । "में दिखा दूं गो, जाक्ता तुम्दारे साय नहीं, मेरे साथ है ।",जनता ही के बल पर तो वह कूद रहे हैं ।,"मैं दिखा दूँगी, जनता तुम्हारे साथ नहीं, मेरे साथ है ।" कांग्रेस के साथ इस * रूप में सत्यामद करने को कल्पना द्वी से चह छाँप उठा ।,इस अग्निकुंड के सामने छकौड़ी की गर्मी शांत हो गयी ।,काँग्रेस के साथ इस रूप में सत्याग्रह करने की कल्पना ही से वह काँप उठा । यदद उसी बातें इतनी भयकर थीं कि छक्ौड़ो का मत कातर हो गया ।,"सम्भव है, कोई हंगामा ही हो जाय ।",यह सभी बातें इतनी भयंकर थीं कि छकौड़ी का मन कातर हो गया । "द्वार्लांडि में वह चर्चा झरता, तो देवीजी दो दया का अवश्य पात्र बन जाता ।","मैंने देवीजी से अपनी आर्थिक कठिनाइयों की कभी चर्चा नहीं की, क्योंकि मैं रमणियों के सामने यह जिक्र करना अपनी मर्यादा के विरुद्ध समझता हूँ ।","हालाँकि मैं वह चर्चा करता, तो देवीजी की दया का अवश्य पात्र बन जाता ।" मंगर यह मेरा अ्रप्त था ।,मुझे विश्वास था कि श्रीमतीजी फिर यहाँ आने का नाम न लेंगी ।,मगर यह मेरा भ्रम था । "मच्छर की आवाज़ कान में भाई, दिल अठा, मबखी नज़र आई आर हाथ-पाँव कूंछे ।","अगर कोई शाम को सांगोपांग घर आ जाय, तो उसे भाग्यवान समझो ।","मच्छर की आवाज कान में आयी, दिल बैठा, मक्खी नजर आयी और हाथ-पाँव फूले ।" "जिधर देखिए, यप्रराज को अप्तलदारी है ।",चूहा बिल से निकला और जान निकल गयी ।,जिधर देखिए यमराज की अमलदारी है । "बस, यही समम्क छो & मोत हर दम पिर पर सेलतो रहतो है ।","अगर मोटर और ट्राम से बचकर आ गये, तब मच्छर और मक्खी के शिकार हुए ।",बस यही समझ लो कि मौत हरदम सिर पर खेलती रहती है । “नन्‍्दीं-सी जान को किन-दिन दुइ्मर्नों परे बचाऊ ।,"रात-भर मच्छरों से लड़ता हूँ, दिन-भर मक्खियों से ।",नन्ही-सी जान को किन-किन दुश्मनों से बचाऊँ । साँस भी सुझिझिल से छेता हूँ कि कहाँ क्षय के कीटाणु फेफड़े » न पहुच जाये ।,नन्ही-सी जान को किन-किन दुश्मनों से बचाऊँ ।,साँस भी मुश्किल से लेता हूँ कि कहीं क्षय के कीटाणु फेफड़े में न पहुँच जायँ । देवोजी को फिर भी घुकछ पर विश्वाप़र-न भाया ।,साँस भी मुश्किल से लेता हूँ कि कहीं क्षय के कीटाणु फेफड़े में न पहुँच जायँ ।,देवीजी को फिर भी मुझ पर विश्वास न आया । “बिकाऊ क्यों नहीं है ।,दुकानदार ने उसकी ओर देखा और कोई आदमी साथ न देखकर कहा— तुम्हारे काम का नहीं है जी! ‘बिकाऊ है कि नहीं ?,’ ‘बिकाऊ क्यों नहीं है ? ” द्ामिद का दिल बेठ गया ।,’ ‘छ: पैसे लगेंगे ।,‘ हामिद का दिल बैठ गया । ” : द्वामिद ने कछेजा मजबूत करके कद्दा-तीन पेसे छोगे ?,"‘ठीक-ठीक पाँच पैसे लगेंगे, लेना हो लो, नहीं चलते बनो ।",‘ हामिद ने कलेजा मजबूत करके कहा- तीन पैसे लोगे ? "लिसे अपना समझो, वह अपना है, जिसे गर धमस्की, वह ग्रेर है ।","बिना ब्याह किए दो बेटे मिल गये, इससे बढ़कर और क्या होगा ?","जिसे अपना समझो वह अपना है; जिसे गैर समझो, वह गैर है ।" पन्‍ना केदार के मत्त की बात सम गई ।,"केदार— मैं नहीं जानता, जो चाहे कर ।",पन्ना केदार के मन की बात समझ गयी । उस्री दिन उसने मुलिया से कहा--क्या कझे बहू स्तर को लालझा मन में ही रही जाती है |,"लड़के का दिल मुलिया पर आया हुआ है, पर संकोच और भय के मारे कुछ नहीं कहता ।","उसी दिन उसने मुलिया से कहा— क्या करुँ बहू, मन की लालसा मन में ही रह जाती है ।" "केदार का घर भी बस जाता, तो में निरिचन्त द्वो जातो ।","उसी दिन उसने मुलिया से कहा— क्या करुँ बहू, मन की लालसा मन में ही रह जाती है ।","केदार का घर भी बस जाता, तो मैं निश्चिन्त हो जाती ।" "पन्‍्ता--कद्दता है . ऐसी औरत मिले, जो घर में मेल से रहे, तो कर छू ।",मुलिया— वह तो करने को ही नहीं कहते ।,"पन्ना— कहता है, ऐसी औरत मिले, जो घर में मेल से रहे, तो कर लूँ ।" एक वार हमारा कद्दार छोड़कर चछा गया और कई दिन कोई दूधरा कहर न मिला ।,"दोस्ती गाँठेंगे ऐसों से, जिनके घर में खाने का ठिकाना नहीं ।","एक बार हमारा कहार, छोड़कर चला गया और कई दिन कोई दूसरा कहार, न मिला ।" घर के सारे काम पृर्वबत चहल रहे घे ; पर आपक्नो सालठुम दो रद्या था कि गाड़ो रुकी हुई है ।,किसी चतुर और कुशल कहार की तलाश में थी; किंतु आपको जल्द-से-जल्द कोई आदमी रख लेने की धुन सवार हो गयी ।,"घर के सारे काम पूर्ववत् चल रहे थे, पर आपको मालूम हो रहा था कि गाड़ी रुकी हुई है ।" उसझी लज्ञा न जाने कर्श ग्रायब हो गई ।,मुलिया ने सिर उठाकर उसकी ओर देखा ।,उसकी लज्जा न जाने कहाँ गायब हो गयी । "मयर वहाँ तुम न जाओगे , क्योंकि चदाँ जाते दुम्दारों छातो दहलतो है ।",तुम उसमें से किसी से क्यों नहीं दया माँगते! क्या उनके पास दया नहीं है ?,मगर वहाँ तुम न जाओगे; क्योंकि वहाँ जाते तुम्हारी छाती दहलती है । "जाऋुए किसो खतरानी के चरणों पर सिर रखो, तो मालृप् दो कि चरणों पर प्रिर रखने का क्‍या फल मिलता है |","मुलिया- इसीलिए न कि जानते हो, मैं कुछ कर नहीं सकती ।","जाकर किसी खतरानी के चरणों पर सिर रक्खो, तो मालूम हो कि चरणों पर सिर रखने का क्या फल मिलता है ।" "मुछिया इतनी वाफुपद्ध है, इसका उसे गुप्ताव भो न था ।",मुँह से बात न निकलती थी ।,"मुलिया इतनी वाक्-पटु है, इसका उसे गुमान भी न था ।" पुलिया फिर बोही-में भो रोज़ बाज़ार जातो हूँ ।,"मुलिया इतनी वाक्-पटु है, इसका उसे गुमान भी न था ।",मुलिया फिर बोली- मैं भी रोज बाजार जाती हूँ । "वह गरालो, म्िल्की, मार-पोट सम्र सह छेगो, छोई उप्र पर सन्देद्द तो ८ करेगा, उस पर मिथ्या लाउन तो न लगेवा, शोहदों और लर्चों से तो उसका रक्षा होगी |","वंशीधर ने अब तक जो व्यवहार किया था, उससे यह आशा न हो सकती थी कि वहाँ वह शांति के साथ रह सकेगी पर वह सब कुछ सहने और सब कुछ करने को तैयार थी ।","वह गाली, झिड़की, मारपीट सब सह लेगी, कोई उस पर संदेह तो न करेगा, उस पर मिथ्या लांछन तो न लगेगा, शोहदों और लुच्चों से तो उसकी रक्षा होगी ।" "नहाने घुलाने के लिए एक लोंडा था, उसे भी जबाब दिया गया , पर मानों से इतना उबार होने पर भौ चचा भौर चची न जाने क्‍यों उससे सुँह फुलाये रहते ।",उसके आते ही महरी अलग कर दी गयी ।,नहलाने-धुलाने के लिये एक लौंडा था उसे भी जवाब दे दिया गया पर मानी से इतना उबार होने पर भी चचा और चची न जाने क्यो उससे मुँह फुलाये रहते । "आग बह उप्ते समम्छाने की चेश करता, या खुललप-छुल्का मानी का पक्ष छेता, तो मावी को ए४ घढ़ो घर में रहता कठिन दो जाता; इसलिए उम्रकी सहानुभूति मानो द्वी को दिलापा देने तऊ रह जाती थो ।",वह उपनी माता का स्वभाव जानता था ।,"अगर वह उसे समझाने की चेष्टा करता, या खुल्लमखुल्ला मानी का पक्ष लेता, तो मानी को एक घड़ी घर में रहना कठिन हो जाता, इसलिये उसकी सहानु भू ति मानी ही को दिलासा देने तक रह जाती थी ।" "हथोब सी उठने दी को था कि चोबदार ने खबर दौ-हुजूर, जहापनाइ तशरीफ़ छा रहे हैं ।",अगर की सुगंध से सारा दीवानखाना महक रहा था ।,हबीब उठने ही को था कि चोबदार ने खबर दी- हुजूर जहाँपनाह तशरीफ ला रहे हैं । वद् हमेशा तेमूर से दूर रददने को चेश करता है ।,अन्य मंत्रियों की भाँति वह तैमूर की सोहबत का भूखा नहीं है ।,वह हमेशा तैमूर से दूर रहने की चेष्टा करता है । शेसा शायद दो कभी हुआ द्वो कि उसमे छाद्दी दस्तरखान पर भोजन किया हो ।,वह हमेशा तैमूर से दूर रहने की चेष्टा करता है ।,ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि उसने शाही दस्तरखान पर भोजन किया हो । - उसने द्वार पर जाक्षर तेमर का स्वागत द्धिया ।,"उसे जब शांति मिलती है, तब एकांत में अपनी माता के पास बैठकर दिन-भर का माजरा उससे कहता है और वह उस पर अपनी पसंद की मुहर लगा देती है ।",उसने द्वार पर जाकर तैमूर का स्वागत किया । "खुदा ने तुम्हें वह हुस्‍्त दिया है कि इृप्तोन-से-हधोन चाज़वीन भी तुम्दारी माशुझ् बनकर अपने को, खुशतसीब समझ्षेगी ।",तैमूर ने मसनद पर बैठते हुए कहा- मुझे ताज्जुब होता है कि तुम इस जवानी में जाहिदों की-सी जिंदगी कैसे बसर करते हो हबीब ।,खुदा ने तुम्हें वह हुस्न दिया है कि हसीन-से-हसीन नाजनीन भी तुम्हारी माशूक बनकर अपने को खुशनसीब समझेगी । "मालुप नहीं, तुम्हें सबर है या नहों, जब तुत्र अपने मुइकी घोड़े पर सवार द्ोकर निकलते द्वो, तो समरकन्द दी सि़कियों पर इलज़ारों आंखें तुम्शरी एक भालऋ देखने के लिए मुन्तज़िर बेठों रहती हैं , पर तुम्हें किप्ती व किसी तरफ आँखें उठाते नहीं देखा ।",खुदा ने तुम्हें वह हुस्न दिया है कि हसीन-से-हसीन नाजनीन भी तुम्हारी माशूक बनकर अपने को खुशनसीब समझेगी ।,"मालूम नहीं तुम्हें खबर है या नहीं, जब तुम अपने मुश्की घोड़े पर सवार होकर निकलते हो तो समरकंद की खिड़कियों पर हजारों आँखें तुम्हारी एक झलक देखने के लिये मुंतजिर बैठी रहती हैं, पर तुम्हें किसी तरफ आँखें उठाते नहीं देखा ।" "मेरा खुदा गवादद है, में कितना चाहता हूँ. फि तुम्दारे क़दर्मों के नक्शा, पर चले ; पर दुनिया मेरी गर्देन नहीं छोड़ती ।","मालूम नहीं तुम्हें खबर है या नहीं, जब तुम अपने मुश्की घोड़े पर सवार होकर निकलते हो तो समरकंद की खिड़कियों पर हजारों आँखें तुम्हारी एक झलक देखने के लिये मुंतजिर बैठी रहती हैं, पर तुम्हें किसी तरफ आँखें उठाते नहीं देखा ।","मेरा खुदा गवाह है, मै कितना चाहता हूँ कि तुम्हारे कदमों के नक् शे पर चलूँ; पर दुनिया मेरी गर्दन नहीं छोड़ती ।" दुनिया में बच यद्दी एक जगद है; जहाँ मुझे आफियत मिलतो है ।,जिसे मेरा दोस्त होना चाहिए वह भी मेरा दुश्मन है ।,"दुनिया में बस एक ही जगह है, जहाँ मुझे आफियत मिलती है ।" मेने द्वार खोला और छज्जे पर खढ़ो होकर ज़ोर से बोलो -कौन कुण्ही खड़खढ़ा रद्दा है ।,मुझे झुँझलाहट आ गयी ।,"मैंने द्वार खोला और छज्जे पर खड़ी होकर जोर से बोली, कौन कुंडी खड़खड़ा रहा है ?" देखा तो एक ज्री भी थी |,मैंने नीचे जाकर द्वार खोल दिया ।,देखा तो एक स्त्री भी थी । हमारे यहाँ मित्रता मर्दों ह्वी तद्ध रइतों है ।,मैंने उनके चरण स्पर्श किये ।,हमारे वहाँ मित्रता मर्दों ही तक रहती है । औरतों तद्ध नहों जाने पातो ।,हमारे वहाँ मित्रता मर्दों ही तक रहती है ।,औरतों तक नहीं जाने पाती । "बढ़े हो ठदार, विद्वान, निष्कपट ; पर आज मुझे माल हुआ कि उनकी पथ-प्रदर्शिका उनको च्नो हैं ।",दोनों जने ऊपर आये! ज्ञान बाबू एक स्कूल में मास्टर हैं ।,"बड़े ही उदार, विद्वान, निष्कपट, पर आज मुझे मालूम हुआ कि उनकी पथ-प्रदर्शिका उनकी स्त्री हैं ।" "चेहरे पर ऐसा रोब था, मार्तों कोई रानी दा ।","वह दोहरे बदन की, प्रतिभाशाली महिला थीं ।","चेहरे पर ऐसा रोब था, मानो कोई रानी हों ।" "गये को सजीव प्रतिमा थीं ; पर बाइर जितनी कठोर, भीतर उत्तनी हो दयाल ।",शायद मैं उन्हें कहीं और देखती; तो मुँह फेर लेती ।,"गर्व की सजीव प्रतिमा थीं; वह बाहर जितनी कठोर, भीतर उतनी ही दयालु ।" "मेंने कह्ा-दाँ, लिखा था ।",' यह प्रश्न उन्होंने कुछ हिचकते हुए किया ।,"मैंने कहा- हाँ, लिखा था ।" “खुफिया के दो आादमों इस वक्त भो डटे हुए हैं ।,अकेले तो इस घर में मैं न रहने दूँगी ।,' 'खुफिया के दो आदमी इस वक्त भी डटे हुए हैं । "में पहले दी समस्त गई थी, दोनों खुफ़िया के आदमी होंगे ।",' 'खुफिया के दो आदमी इस वक्त भी डटे हुए हैं ।,"' 'मैं पहले ही समझ गयी थी, दोनों खुफिया के आदमी होंगे ।" ' ८हरो'--देवीणी बोलों- 'के ताँगे लाओगे १ ?,मास्टर साहब चुपके से द्वार की ओर चले ।,'ठहरो'- देवीजी बोलीं- कै ताँगे लाओगे ? दिलछगो रहेगी ।,मिस खुरशेद- मुझे अभिनय में मजा आता है ।,दिल्लगी रहेगी । फ़रा उसे सबक देना चाहतो छूँं ।,बुढ़िया ने बड़ा जुल्म कर रखा है ।,जरा उसे सबक देना चाहती हूँ । ( ५ ) आश्रम में उत्त दिन जुगनू को दम मारने की फुलेत न मिली ।,"बस, तुम छैला बनी हुई पहुँच जाना ।",5 आश्रम में उस दिन जुगनू को दम मारने की फुर्सत न मिली । दर एड रिटर्सक में कुछ-कुछ रंग भौर चढ़ जाता ।,"जो महिला आती, वह जुगनू के मुँह से यह कथा सुनती ।",हर एक रिहर्सल में कुछ-कुछ रंग और चढ़ जाता । "एक देवो ने पूछा--यद्द युवक है कौत १ ,्रि० टंडन--सुना तो, उनके साथ का पढ़ा हुआ है ।",यहाँ तक कि दोपहर होते-होते सारे शहर के सभ्य समाज में वह खबर गूँज उठी ।,"एक देवी ने पूछा- यह युवक है कौन ! मिसेज टंडन- सुना तो, उनके साथ का पढ़ा हुआ है ।" करुणा पुत्र की लेखनों से निरुछे हुए ए%-एक शब्द को पढ़ता और उप्ते अपने हृदय पर अकित झर लेना चाइती थी ।,"क्या उठा हुआ है, यह करुणा न सोच सकी ?",करूणा पुत्र की लेखनी से निकले हुए एक-एक शब्द को पढ़ना और उसे हृदय पर अंकित कर लेना चाहती थी । इप्त भाँदि तीन दिन शुक्र गये ।,करूणा पुत्र की लेखनी से निकले हुए एक-एक शब्द को पढ़ना और उसे हृदय पर अंकित कर लेना चाहती थी ।,इस भाँति तीन दिन गुजर गये । तीन दिव को जागो आँखें ज़रा रूपक गई ।,संध्या हो गयी थी ।,तीन दिन की जागी आँखें जरा झपक गयी । "करुणा मे ध्यान से देखा, वह प्रद्यश था ।","करूणा ने देखा, एक लम्बा-चौड़ा कमरा है, उसमें मेजें और कुर्सियाँ लगी हुई हैं, बीच में ऊँचे मंच पर कोई आदमी बैठा हुआ है ।","करूणा ने ध्यान से देखा, प्रकाश था ।" "एक क्षण में एक केदो उसके सामने छाया गया, उसके हाथ-पाँव में ज़जोर थी, फमर झुद्नी हुईं |","करूणा ने ध्यान से देखा, प्रकाश था ।","एक क्षण में एक कैदी उसके सामने लाया गया, उसके हाथ-पाँव में जंजीर थी, कमर झुकी हुई, यह आदित्य थे ।" कदणा की भाँखें खुल गईं ।,"एक क्षण में एक कैदी उसके सामने लाया गया, उसके हाथ-पाँव में जंजीर थी, कमर झुकी हुई, यह आदित्य थे ।",करूणा की आँखें खुल गयीं । भंसू बहने छगे ।,करूणा की आँखें खुल गयीं ।,आँसू बहने लगे । "इसी एक चुटको राख में उसका शुद्धियोवाला दचयन, उप्रक्ता सतप्त यौवव और उसका तृप्णामय बेधव्य सब समा गया ।","राख की एक चुटकी के सिवा वहाँ कुछ न रहा, जो उसके हृदय में विदीर्ण किए डालती थी ।","इसी एक चुटकी राख में उसका गुड़ियोंवाला बचपन, उसका संतप्त यौवन और उसका तृष्णामय वैधव्य सब समा गया ।" बह भमग्व हृदय पति को स्नेह-स्ट्ति हैं विश्राम कर रह्य था भौर प्रक्राश का णद्दाज़ योरप चला णा रहा था |,"प्रात:काल लोगों ने देखा, पक्षी पिंजड़े से उड़ चुका था! आदित्य का चित्र अब भी उसके शून्य हृदय से चिपटा हुआ था ।",भग्नहृदय पति की स्नेह-स्मृति में विश्राम कर रहा था और प्रकाश का जहाज योरप चला जा रहा था । "चुटकौ-भर भाठा था, वह भी पट्टी में मिल गया |","देखो, कटोरे में भूसा भरकर मेरी झोली में डाल गया है ।","चुटकी-भर आटा था, वह भी मिट्टी में मिल गया ।" कश्णा ने कठोर ध्वर में पुकारा--प्रक्ाश |,सबके दिन एक-से नहीं रहते! आदमी को घमंड न करना चाहिए ।,करूणा ने कठोर स्वर में पुकारा— प्रकाश ? यह बहों कि उलटे सिखमर्गों को और शहद दिया जाय ।,"दूसरे मुल्कों में अगर कोई भीख माँगे, तो कैद कर लिया जाय ।",यह नहीं कि उल्टे भिखमंगो को और शह दी जाय । रात को सी उसे दार-बार यद्दी खयाल सताता रहद्दा है ।,"उसने यह धृष्टता, यह अविनय कहाँ सीखी ?",रात को भी उसे बार-बार यही ख्याल सताता रहा । जो क्राम एक इज़ार में हो जाय उसके लिए पाँच इज़ार खर्च करना कहाँ क बुद्धिमानो है ?,कोई उनका हाथ न पकड़ सकता था; लेकिन अब तो हमें एक-एक पैसे की किफायत करनी पड़ेगी ।,"जो काम हजार में हो जाये, उसके लिए पाँच हजार खर्च करना कहाँ की बुद्धिमानी है ?" "फलमती ने ज़िद पकड़झर कद्ा-- विवाह तो मुरारोछाल के पुत्र से द्वो होगा पाँच इज़ार खर्च हाँ, चाहे दस हज़ार ।","कामता ने भवें सिकोड़कर कहा- नहीं, मैं पाँच हजार ही कहूँगा; एक विवाह में पाँच हजार खर्च करने की हमारी हैसियत नहीं है ।","फूलमती ने जिद पकड़कर कहा- विवाह तो मुरारीलाल के पुत्र से ही होगा, पाँच हजार खर्च हों, चाहे दस हजार ।" अपनी इच्छा से खर्च कष्ट पी ।,मैंने मर-मरकर जोड़ा है ।,अपनी इच्छा से खर्च करूँगी । कुछुद भी उस्ती कोख पे भाई है ।,तुम्हीं ने मेरी कोख से नहीं जन्म लिया है ।,कुमुद भी उसी कोख से आयी है । "बोला-- भग्माँ, तुम घरबस बात ब्ढ़ाती द्ो ।",कामतानाथ को अब कड़वे सत्य की शरण लेने के सिवा और मार्ग न रहा ।,"बोला- अम्माँ, तुम बरबस बात बढ़ाती हो ।" थो छोग खुशी से न देंगे उनकी ज़मीन छीवनी द्वी पढ़ेगी ।,मैंनें कहा- बहुत-से लोग तो खुशी से दे देंगे ।,"जो लोग खुशी से न देंगे, उनकी जमीन छीननी ही पड़ेगी ।" "ज्योददो ख्व॒राज्य हुआ, अपने सारे इलाके असामियों के नाप द्वि्रा कर देंगे ।",हम लोग तो तैयार बैठे हुए हैं ।,"ज्यों ही स्वराज्य हुआ, अपने इलाके असामियों के नाम हिब्बा कर देंगे ।" ज्‌ छुट्टी इस तरद तमाम हुईं और हम फिर श्रयाग चक्ठे ।,"सुना, उस दिन ठाकुर ने खूब भंग पी और अपनी स्त्री को खूब पीटा और गाँव के महाजन से लड़ने पर तैयार हो गया ।",5 छुट्टी इस तरह तमाम हुई और हम फिर प्रयाग चले । "वापस्ती टिकट या द्वी, केवल गाढ़ी में बंठदा था + पर गाडी भाई तो ठसाठन्न भरी हुईं ।","जी तो चाहता था, हरेक नौकर को अच्छा इनाम दूँ, लेकिन वह सामर्थ्य कहाँ थी ?","वापसी टिकट था ही, केवल गाड़ी में बैठना था; पर गाड़ी आयी तो ठसाठस भरी हुई ।" इण्टर क्लास को द्वालत उम्रसे भी बदतर ।,सेकेंड क्लास में तिल रखने की जगह नहीं ।,इंटर क्लास की हालत उससे भी बदतर । पहल बदकने की भी जगद्द न थी ।,"आये थे आराम से लेटे-लेटे, जा रहे थे सिकुड़े हुए ।",पहलू बदलने की भी जगह न थी । उछ्ते धवतन्त्र रूप से काम डेने का कभो भवसर न मिला था ।,"मथुरा मजदूर तो अच्छा था, संचालक अच्छा न था ।",उसे स्वतंत्र रूप से काम लेने का कभी अवसर न मिला । "कहने को तो वद्द »ब भी मालकिन थी, पर वास्त० में घर-भर कौ सेविद्या थी ।","वही मजूर उसके यहाँ टिकते थे, जो मेहनत नहीं, खुशामद करने में कुशल होते थे, इसलिए प्यारी को अब दिन में दो-चार चक्कर हार के भी लगाना पड़ता ।","कहने को वह अब भी मालकिन थी, पर वास्तव में घर-भर की सेविका थी ।" यहाँ तो कमाई में बोई बरक्कत नहीं ।,"एक दिन मथुरा ने कहा- भाभी, अब तो कहीं परदेश जाने का जी होता है ।",यहाँ तो कमाई में बरकत नहीं । "मेंने समक्ता, शायद दवा से फुछ लाभ हो ।",मेरे सिर में चक्कर आ जाया करता है ।,मैंने समझा शायद हवा से कुछ लाभ हो । "यहाँ थाई ; पर ऐपा चक्कर आया कि में इस वेद्व पर णेठ गई, फिर सुझ्षे कुछ दोश न रहा ।",मैंने समझा शायद हवा से कुछ लाभ हो ।,"यहाँ आयी; पर ऐसा चक्कर आया कि मैं इस बेंच पर बैठ गयी, फिर मुझे कुछ होश न रहा ।" "जाप डावठर श्याम्रवाय को जानती होंगी, वह भेरे ससुर हैं ।",बहुत दवा की; पर कोई फायदा नहीं होता ।,"आप डाक्टर श्यामनाथ को जानती होंगी, वह मेरे ससुर हैं ।" लेकिन मुझे पहचाव कते सकते हैं ?,युवती ने आश्चर्य से कहा- अच्छा ! वह तो अभी इधर ही से गये हैं ।,'सच ! लेकिन मुझे पहचान कैसे सकते हैं ? मेश उबसे युविवसिटों का परिचय है ।,मीनू ने हँसकर कहा- वसंतलाल तो अभी इधर से गये हैं ?,मेरा उनसे युनिवर्सिटी का परिचय है । लेकिन सुझे उन्होंने देखा कहाँ है ।,मेरा उनसे युनिवर्सिटी का परिचय है ।,'अच्छा ! लेकिन मुझे उन्होंने देखा कहाँ है ? "उन्देंने उप्रो श्षण काम्ाक्षी देवी के नाम यद्द पत्र छिखा--- “आपको कविता पढ़रर में नदों कद सकता, मेरे चित्त को क्‍या दशा हुईं ।",-'कामाक्षी' शर्माजी को हर बार इस कविता में एक नया रस मिलता था ।,"उन्होंने उसी क्षण कामाक्षी देवी के नाम यह पत्र लिखा- 'आपकी कविता पढ़कर मैं नहीं कह सकता, मेरे चित्त की क्या दशा हुई ।" आपने एक यरोब की फूस की म्होपडो में आग लगा दौ है ; लेकित मत यह स्वोकार नदों करता छि यह केवल विनोद क्रोडा है ।,"मैं आपसे सत्य कहता हूँ, ऐसी कविता मैंने आज तक नहीं पढ़ी थी और इसने मेरे अंदर जो तूफान उठा दिया है, वह मेरी विधुर शांति को छिन्न-भिन्न किये डालता है ।",आपने एक गरीब की फूस की झोपड़ी में आग लगा दी है; लेकिन मन यह स्वीकार नहीं करता कि यह केवल विनोद-क्रीड़ा है । "बस, आगे यह डॉगा चलता बज़र वहीँ आता ।","अब अगर उसने बहुत तत्थो-थंभो किया, तो साल-छ:महीने और काम चलेगा ।","बस, आगे यह डोंगा चलता नजर नहीं आता ।" बकरे की मा कब तक खेर -सनायेगी ।,"बस, आगे यह डोंगा चलता नजर नहीं आता ।",बकरे की माँ कब तक खैर मनायेगी ? बरसात शुरू दो गई थी ।,एक दिन पन्ना ने महुए का सुखावन डाला ।,बरसात शुरु हो गयी थी । "मुलिया ने लापरवाही से छह्दा --मुझे नोंद आ रहो है, तुप्र बेढकर देखो ।","मुलिया से बोली- बहू, जरा देखती रहना, मैं तालाब से नहा आऊँ ?","मुलिया ने लापरवाही से कहा-मुझे नींद आ रही है, तुम बैठकर देखो ।" एक दिन व चह्ाओगो तो क्‍या होगा ।,"मुलिया ने लापरवाही से कहा-मुझे नींद आ रही है, तुम बैठकर देखो ।",एक दिन न नहाओगी तो क्या होगा ? "पन्ना ने साड़ी उठाकर रख दो, बहाने व गई ।",एक दिन न नहाओगी तो क्या होगा ?,"पन्ना ने साड़ी उतारकर रख दी, नहाने न गयी ।" सुलिया से जआहिस्ते से पूछा--भाज भभी चूल्हा चहों जला ?,"आशा थी, बहू ने रोटी बना रखी होगी, मगर देखा तो यहाँ चूल्हा ठंडा पड़ा हुआ था, और बच्चे मारे भूख के तड़प रहे थे ।",पन्ना ने आहिस्ते से पूछा- आज अभी चूल्हा नहीं जला ? आठा गूंधतोी थी और सोती थी ।,पन्ना ने उसी वक्त चूल्हा जलाया और खाना बनाने बैठ गयी ।,आटा गूँथती थी और रोती थी । "बोले--क्या है रामू, उस शरोबित से क्‍यों छक्ष्ते हो ?",महतो से न रहा गया ।,"बोले- क्या है रामू, उस गरीबिन से क्यों लड़ते हो ?" भुरूसे तो नहीं सद्दा जाता ।,"रामू- आपको बेटी बहुत प्यारी है, तो उसे गले बाँध कर रखिए ।",मुझसे तो नहीं सहा जाता । में फल गाँव के भादमियाँ को घुलाबर बटवारा कर दूँगा ।,"अगर तुम्हारी यह मरजी है, तो यही होगा ।",मैं कल गाँव के आदमियों को बुलाकर बँटवारा कर दूँगा । वह रट्व छ्ितना कठोर निकला और वह दण्छ कितना अगलप्य |,"पुत्र को रत्न समझा था, पुत्री को पूर्व-जन्म के पापों का दंड ।",वह रत्न कितना कठोर निकला और यह दंड कितना मंगलमय । "वह भपता छोठा-सा घर, वद्द आम का बाग जहाँ वह केरियाँ चुना करता था, वद्द मेंदान जद्दाँ वह कबड्डी खेला करता था, सब उप्ते याद आने लगे ।",उसकी बाल-स्मृतियाँ उन्हीं चमकीले तारों की भाँति प्रज्वलित हो गयी ।,"वह अपना छोटा – सा घर, वह आम के बाग, जहाँ वह केरियाँ चुना करता था, वह मैदान जहाँ वह कबड्डी खेला करता था, सब उसे याद आने लगे ।" "उसी आत्य सम्माहित दशा ' में उत्तके मुँह से यह शब्द निकडे --भग्साँ, तुभने मुझे इतना भुला दिया ।","वह रोने लगा, फूट-फूटकर रोने लगा ।","उसी आत्म-सम्मोहित दशा में उसके मुँह से यह शब्द निकला, अम्मा, तुमने मुझे इतना भुला दिया ।" "देखों, तुम्हारे प्यारे लाल को क्‍या दशा दो रहो दे |","उसी आत्म-सम्मोहित दशा में उसके मुँह से यह शब्द निकला, अम्मा, तुमने मुझे इतना भुला दिया ।","देखो, तुम्हारे प्यारे लाल की क्या दशा हो रही है ?" हृरिघन उस कल्पना जगत्‌ से ऋर प्रत्यक्ष मे जा गया ।,कब तक कोई तुम्हारे लिए बैठा रहे ?,हरिधन उस कल्पना-जगत् से क्रूर प्रत्यक्ष में आ गया । "वही कुएँ को जगत थी, वद्दी फटा हुआ टाठ और शुमानी सामने खड़ी कह रद्दो थी--कप तक कोई तुम्हारे लिए बेठा रहे ! इरिघन उठ बेठा भौर मानों तलवार ग्याव से निकालकर बोला--भला, पुम्हें मेरी सुध तो आई |",हरिधन उस कल्पना-जगत् से क्रूर प्रत्यक्ष में आ गया ।,"वही कुएँ की जगत थी, वही फटा हुआ टाट और गुमानी सामने खड़ी कह रही थी, कब तक कोई तुम्हारे लिए बैठा रहे ! हरिधन उठ बैठा और मानो तलवार म्यान से निकालकर बोला- भला तुम्हें मेरी सुध तो आयी ।" "मेदानी बहाटुरी का तो न अत्र माना रहा है, न मौक़ा ।","थके-माँदे मजदूर तो सो चुके थे, ठाकुर के दरवाजे पर दस-पाँच बेफिक्रे जमा थे ।","मैदानी बहादुरी का तो अब न जमाना रहा है, न मौका ।" कितनो द्योशियारी से ठाकुर ने थानेदार रो एक खास झुकदमे में रिद्गतत दे दो और साफ निद्नक् घये ।,कानूनी बहादुरी की बातें हो रही थीं ।,कितनी होशियारी से ठाकुर ने थानेदार को एक खास मुकदमे में रिश्वत दी और साफ निकल गये । क्ितवी भकलमदी से ए% मार्क के सुक्रदमे कौ नकल ले आये ।,कितनी होशियारी से ठाकुर ने थानेदार को एक खास मुकदमे में रिश्वत दी और साफ निकल गये ।,कितनी अक्लमंदी से एक मार्के के मुकदमे की नकल ले आये । "वाजिर और घोहतम्तिम, सभी छहते थे, वकहछ चहीं मिल सकतो ।",कितनी अक्लमंदी से एक मार्के के मुकदमे की नकल ले आये ।,"नाजिर और मोहतमिम, सभी कहते थे, नकल नहीं मिल सकती ।" कुपी को छु धलो रोशनी कुएं पर आ रही थी |,इसी समय गंगी कुएँ से पानी लेने पहुँची ।,कुप्पी की धुँधली रोशनी कुएँ पर आ रही थी । "किसों के लिए रोक वहों , सिर्फ ये बदतसोद नहों सर सहते ।",इस कुएँ का पानी सारा गाँव पीता है ।,"किसी के लिए रोका नहीं, सिर्फ ये बदनसीब नहीं भर सकते ।" इसलिए दि ये छोग पह्ठे में तागा डाल छेते हैं |,गंगी का विद्रोही दिल रिवाजी पाबंदियों और मजबूरियों पर चोटें करने लगा- हम क्यों नीच हैं और ये लोग क्यों ऊँच हैं ?,इसलिए कि ये लोग गले में तागा डाल लेते हैं ? "यद्दां तो जितने हैं, एऋ-से-ए% छठे हैं ।",इसलिए कि ये लोग गले में तागा डाल लेते हैं ?,"यहाँ तो जितने है, एक- से-एक छँटे हैं ।" अभी इसी ठाकुर ने तो उत्त दिव वेचारे गढ़रिये को एक भेर चुरा लो थी और बाद को मारकर खा गया ।,"चोरी ये करें, जाल-फरेब ये करें, झूठे मुकदमे ये करें ।",अभी इस ठाकुर ने तो उस दिन बेचारे गड़रिये की भेड़ चुरा ली थी और बाद मे मारकर खा गया । कभो याँव में था जाती हैं; तो रस-भरो भाँखों से देखने लगते हैं ।,"किस-किस बात में हमसे ऊँचे हैं, हम गली-गली चिल्लाते नहीं कि हम ऊँचे है, हम ऊँचे ।","कभी गाँव में आ जाती हूँ, तो रस-भरी आँख से देखने लगते हैं ।" "उप्ते जीता पाजाता, तो शायद ठखका छून पी जाता , पर इस समय उप स्मृत्ि-मृति को देखऋर मेरा मन जप मुन्नरित हो उठा ।",उसके पाशविक व्यवहारों को याद करके मैं उन्मत्त हो उठता था ।,"उसे जीता पा जाता तो शायद उसका खून पी जाता, पर इस समय स्मृति-मूर्ति को देखकर मेरा मन जैसे मुखरित हो उठा ।" मन में केवल यहो भावना थो--मेरा भेया छितना दुद्धी है |,"उसने मेरे साथ, मेरी स्त्री के साथ, माता के साथ, मेरे बच्चे के साथ, जो-जो कटु, नीच और घृणास्पद व्यवहार किये थे, वह सब मुझे भूल गये ।",मन में केवल यही भावना थी- मेरा भैया कितना दु:खी है । "फिर विद्या ( पत्नी ) की मूर्ति मेरे सामने आ खड़ो हुई -वह मूर्ति जिछ्ते दव साल पहले मैंने देखा था--उन भराँखों में वद्दी विइल कम्पन था, वही सम्दिग्ध विल्वास, कपोलो पर वही शजा-लालिमा, जेसे प्रेपत के सरीवर से निद्ला हुआ कोई कप्रह-पुप्प हो ।","जिन-जिन प्राणियों से मेरा बैर-भाव था, जिनसे गाली-गलौज, मार-पीट मुकदमाबाजी सब कुछ हो चुकी थी, वह सभी जैसे मेरे गले में लिपट-लिपटकर हँस रहे थे ।","फिर विद्या (पत्नी) की मूर्ति मेरे सामने आ खड़ी हुई- वह मूर्ति जिसे दस साल पहले मैंने देखा था- उन आँखों में वही विकल कंपन था, वहीं संदिग्ध विश्वास, कपोलों पर वही लज्जा- लालिमा, जैसे प्रेम सरोवर से निकला हुआ कोई कमल पुष्प हो ।" जो ऐसा तढ़पा कि इपी समय जाकर विदा के 'वर्णो पर सिर रगइकर रोऊँ और रोते-रोते बेधुप्र दो जाऊँ ।,मधुर स्मृतियों का जैसे स्रोत-सा खुल गया ।,जी ऐसा तड़पा कि इसी समय जाकर विद्या के चरणों पर सिर रगड़कर रोऊँ और रोते-रोते बेसुध हो जाऊँ । मेरी भाँखें सभल हो गई ।,जी ऐसा तड़पा कि इसी समय जाकर विद्या के चरणों पर सिर रगड़कर रोऊँ और रोते-रोते बेसुध हो जाऊँ ।,मेरी आँखें सजल हो गयीं । "टंटे द्वो जायेंगे, तो फिर आहुर सोयेंगे ।",चलो बगीचे में पत्तियाँ बटोरकर तापें ।,"टाँठे हो जायेंगे, तो फिर आकर सोयेंगें ।" धर्क्षो से ओस को बू दें ट+-टप तोचे टपक रही-थीं ।,बगीचे में खूब अँधेरा छाया हुआ था और अंधकार में निर्दय पवन पत्तियों को कुचलता हुआ चला जाता था ।,वृक्षों से ओस की बूँदे टप-टप नीचे टपक रही थीं । एकाएक एक हक मेंहदी के फूलों क्री खुशबू लिये हुए आया ।,वृक्षों से ओस की बूँदे टप-टप नीचे टपक रही थीं ।,एकाएक एक झोंका मेहँदी के फूलों की खूशबू लिए हुए आया । उस्ते चियोड़ रहा था ।,जबरा को कहीं जमीन पर एक हडडी पड़ी मिल गयी थी ।,उसे चिंचोड़ रहा था । हाथ ठिदधुर जाते घे ।,जरा देर में पत्तियों का ढेर लग गया ।,हाथ ठिठुरे जाते थे । नगे पाँद पछे जाते थे |,हाथ ठिठुरे जाते थे ।,नंगे पाँव गले जाते थे । - और बह पत्तियों छा पहाड़ खड़ा कर रद्दा था ।,नंगे पाँव गले जाते थे ।,और वह पत्तियों का पहाड़ खड़ा कर रहा था । "चोर्तों को खालें थीं, जार्घो की, म्र्गों की, शेरों की ।",वुसधा जैसे उल्लास की गोद में खेलने लगी ।,"चीतों की खालें थीं , बाघों की, मृगों की, शेरों की ।" कुँअर साहब * एक-एढू तोहफ़ का इतिद्यास सुनाने लगे ।,"वसुधा हरेक खाल नयी उमंग से देखती , जैसे बायस्कोप के एक चित्र के बाद दूसरा चित्र आ रहा हो ।",कुँवर साहब एक-एक तोहफे का इतिहास सुनाने लगे । वसुधा दरेक को कथा भांखें फाइ-फ्राइकर सुन रही थी ।,"यह जानवर कैसे मारा गया , उसके मारने में क्या-क्या बाधाएँ पड़ीं, क्या-क्या उपाय करने पड़े , पहले कहाँ गोली लगी आदि ।",वसुधा हरेक की कथा आँखें फाड़-फाड़कर सुन रही थी । बोले--तुम्र बाघग्बरों में-से कोई के छो ।,उसे अपने कमरे में लटकाने को रखे हुए थे ।,बोले तुम बाघम्बरों में से कोई ले लो । में खराब दी छूगी ।,"वसुधा ने खाल को अपनी ओर खींचकर कहा , रहने दीजिए अपनी सलाह ।",मैं खराब ही लूँगी । में तुम्दारे खाथ हर तरद्द का कष्ट मेलने को तेयार हूँ ।,"शायद उन्होंने तुम्हें भी डाँट-फटकार बतायी होगी , ऐसी दशा में मैं तुम्हारा निश्चय सुनने के लिए विकल हो रही हूँ ।",तुम्हारे साथ हर तरह का कष्ट झेलने को तैयार हूँ । "में वह स्वप्न देखने में मरन हूँ, जब हम दोनों उच्र सूत्र में बंध जायेंगे, जो द्गना नहों जानता |",दादा और माँ दोनों तुमसे मिलने के लिए बहुत इच्छुक हैं ।,"मैं वह स्वप्न देखने में मग्न हूँ जब हम दोनों उस सूत्र में बँध जायँगे , जो टूटना नहीं जानता ।" जो बड़ो से-बढ़ो आपत्ति में मी भट्ट रहता है ।,"मैं वह स्वप्न देखने में मग्न हूँ जब हम दोनों उस सूत्र में बँध जायँगे , जो टूटना नहीं जानता ।",जो बड़ी-से-बड़ी आपत्ति में भी अटूट रहता है । ", प्रेप्ता के मन में भाँति-धाँति के सकल्प-विक्ृत्प उठ रहे थे; कद्माचित्‌ उन्हें पत्र छिखने का अवकाश न पिला द्ोगा, या आज आने को फुर्तत न मिलो द्ोगी, कल अवश्य आ जायेंगे ।","यहाँ तक कि रात के नौ बज गये , पर न तो केशव ही आये , न उनका पत्र ।","प्रेमा के मन में भाँति-भाँति के संकल्प-विकल्प उठ रहे थे , कदाचित उन्हें पत्र लिखने का अवकाश न मिला होगा , या आज आने की फुरसत न मिली होगी , कल अवश्य आ जाएँगे ।" "भाज सुनन्‍्ती के पिता होते, तो न जाने क्‍या करते |","गोपा ने बहुत कुछ दिया और अपनी हैसियत से बहुत ज्यादा दिया, लेकिन फिर भी, उसे संतोष न हुआ ।",आज सुन्नी के पिता होते तो न जाने क्या करते । ह उाड़ों में में फिर दिल्लो पया ।,बराबर रोती रही ।,जाड़ों में मैं फिर दिल्ली गया । "मेंने समम्छा था, अब गोपा सुखी होगी ।",जाड़ों में मैं फिर दिल्ली गया ।,मैंने समझा कि अब गोपा सुखी होगी । "ु में अभी कपड़े भी न उतारने पाया था कि उसने अपना दुखड़ा शुरू कर दिया -- जैया, पर-द्वार सत्र अच्छा है, सास-ससुर भो अच्छे हैं; छेकित जमाई निकम्मा तिकला ।",लेकिन सुख उसके भाग्य में ही न था ।,"अभी कपड़े भी न उतारने पाया था कि उसने अपना दुखड़ा शुरू कर दिया- भैया, घर द्‌वार सब अच्छा है, सास-ससुर भी अच्छे हैं, लेकिन जमाई निकम्मा निकला ।" घुम्ती बेचएी रो-रंकर दिन काट रहो है ।,"अभी कपड़े भी न उतारने पाया था कि उसने अपना दुखड़ा शुरू कर दिया- भैया, घर द्‌वार सब अच्छा है, सास-ससुर भी अच्छे हैं, लेकिन जमाई निकम्मा निकला ।",सुन्नी बेचारी रो-रोकर दिन काट रही है । दसदी परछाईं मात्र रह गई है ।,"तुम उसे देखो, तो पहचान न सको ।",उसकी परछायी मात्र रह गयी है । "न तन-बदन की छुध है, न कपड़े-लत्ते को ।",जैसे जीवन में अपना पथ खो बैठी हो ।,न तन बदन की सुध है न कपड़े-लते की । "मेरी सुन्‍्दी कौ यह दुर्गेति होगी, यह तो स्त्रप् में भी व सोचा श ।",न तन बदन की सुध है न कपड़े-लते की ।,"मेरी सुन्नी की दुर्गत होगी, यह तो स्वप्न में भी न सोचा था ।" बिलकुल गुम-छुम हो मई है ।,"मेरी सुन्नी की दुर्गत होगी, यह तो स्वप्न में भी न सोचा था ।",बिल्कुल गुमसुम हो गयी है । "तुम ज़द्दीन दो, इसमें शक्कर बहीं ; लेड्िन वह ,जेदन किस काम का, जो हमारे आत्म-गौरव ढ़ो हत्या कर डाछे ।",मुझे तुम्हारी इस कमअकली पर दु:ख होता है ।,"तुम जहीन हो, इसमें शक नहीं; लेकिन वह जेहन किस काम का, जो हमारे आत्मलगौरव की हत्या कर डाले ?" खबू ज़े घोये थे ।,"घर में तो अब विशेष काम रहा नहीं, प्यारी सारे दिन खेती-बारी के कामों में लगी रहती ।",खरबूजे बोये थे । "मेंने सोचा, दस मोट भौर खींच दे ।",जोखू ने कहा- चार क्यारियाँ बच रही थी ।,"मैंने सोचा, दस मोट और खींच दूँ ।" कल का संम्ट कौन रखे ।,"मैंने सोचा, दस मोट और खींच दूँ ।",कल का झंझट कौन रखे ? "प्यारी सारे दिन द्वार में थोढ़े दी रह सकतो थी , इसलिए अब उसमें ज़िम्मेवारी आ शई थी ।",अब सब-कुछ उसके हाथ में था ।,"प्यारी सारे दिन हार में थोड़ी ही रह सकती थी, इसलिए अब उसमें जिम्मेदारी आ गयी थी ।" ".... जोखू ने समम्झा, प्यारी बिगढ़ रहो है ।","खेत आज न होते, कल होते, क्या जल्दी थी ।","जोखू ने समझा, प्यारी बिगड़ रही है ।" "उसने तो अपनी सम्रक में कारथुज़ारो को थी और समम्का था, तारीफ़ होगी ।","जोखू ने समझा, प्यारी बिगड़ रही है ।","उसने तो अपनी समझ में कारगुजारी की थी और समझा था, तारीफ होगी ।" "चिढ़कर बोला--माल- किन, तुम दादने-बारये दोनों ओर चलती द्वी ।",यहाँ आलोचना हुई ।,"चिढ़कर बोला- मालकिन, दाहने-बायें दोनो ओर चलती हो ।" आज बढ़ी मुस॒किल से कुआं खाली हुआ ।,कल के लिए तो उंचवा के खेत पड़े सूख रहे हैं ।,आज बड़ी मुश्किल से कुआँ खाली हुआ था । "उसे भब ज्ञात हुआ कि मेरी बुद्धि, मेरा बल, मेरो सुम्रति, मानों सबसे में वंचित द्टोगई ।",पचास वर्ष के चिर-सहवास के बाद अब यह एकांत जीवन उसके लिए पहाड़ हो गया ।,"उसे अब ज्ञात हुआ कि मेरी बुद्धि, मेरा बल, मेरी सुमति मानो सबसे मैं वंचित हो गयी ।" "न उसने कितनी बार ईंखबर से विवतो को थी, मुझे स्वामो के सामने उ्च छेना ; मगर उसने यद्द विनती स्वीकार न की ।","उसे अब ज्ञात हुआ कि मेरी बुद्धि, मेरा बल, मेरी सुमति मानो सबसे मैं वंचित हो गयी ।","उसने कितनी बार ईश्वर से विनती की थी, मुझे स्वामी के सामने उठा लेना; मगर उसने यह विनती स्वीकार न की ।" दु्छवता ने जल्द दो खाट पर ढाल दिया ।,आखिर उसे खाँसी आने लगी ।,दुर्बलता ने जल्द ही खाट पर डाल दिया । यहाँ माँ बीमार पढ़ गई ।,सुभागी अब क्या करे ! ठाकुर साहब के रुपये चुकाने के लिए दिलोजान से काम करने की जरूरत थी ।,यहाँ माँ बीमार पड़ गयी । माँ को दशा देखऊर सुभागी समम्छक गई कि इनका परवाना भो भा पहुँचा ।,उनके पास बैठे तो बाहर का काम कौन करे ।,माँ की दशा देखकर सुभागी समझ गयी कि इनका परवाना भी आ पहुँचा । गाँव में और दिप्ते फुरसत थो कि दौड़ धूप करता ।,महतो को भी तो यही ज्वर था ।,गाँव में और किसे फुरसत थी कि दौड़-धूप करता । यहाँ तक कि पद दिन वह भो ससार से सिधार गईं ।,"सजनसिंह दोनों वक्त आते, लक्ष्मी को देखते, दवा पिलाते, सुभागी को समझाते, और चले जाते; मगर लक्ष्मी की दशा बिगड़ती जाती थी ।",यहाँ तक कि पंद्रहवें दिन वह भी संसार से सिधार गयी । मेरी संग- वान्‌ से यही भरजी है कि उप्त जन्मर में भो तुम मेरी कोख पत्रित्र करो ।,मेरा क्रिया-कर्म तुम्हीं करना ।,मेरी भगवान से यही अरजी है कि उस जन्म में भी तुम मेरी कोख पवित्र करो । ह ( ७ ) ह माता के देहान्त के बाद सुभांगों के जोवत का केवछ एक लक्ष्य रह गया-- सजनसिंद के रुपये चुकाना |,मेरी भगवान से यही अरजी है कि उस जन्म में भी तुम मेरी कोख पवित्र करो ।,माता के देहांत के बाद सुभागी के जीवन का केवल एक लक्ष्य रह गया सजनसिंह के रुपये चुकाना । "उसका ऐसा आतंक था, कि ज्योंद्दी वद्द कमरे में कदम रखतो, ओठों पर खेलती हुई इंझो 'जेसे रो पढ़तो थी ।","उसका काम था, महिला-आश्रम में महिलाओं की सेवा-टहल करना; पर महिलाएँ उसकी सूरत से काँपती थीं ।","उसका आतंक था, कि ज्यों ही वह कमरे में कदम रखती, ओठों पर खेलती हुई हँसी जैसे रो पड़ती थी ।" "ज़ियाँ रंग-विरंगे वच्नाभषण पहने ,पूजन करने भा रही थीं ।","और पीछे एक विशाल मंदिर आकाश में अपना सुनहला मस्तक उठाये, सूर्य से आँखें मिला रहा था ।",स्त्रियाँ रंग-बिरंगे वस्त्राभूषण पहने पूजन करने आ रही थीं । उसे जान पड़ा--५कृति उसझ्ी दशा पर व्यग्य से मुसकिरा रदी है ।,मन्दिर की दाहिनी तरफ तालाब में कमल प्रभात के सुनहले आनन्द से मुस्करा रहे थे और कार्तिक की शीत रवि-छवि-जीवन-ज्योति लुटाती फिरती थी; पर प्रकृति की यह सुरम्य शोभा वसुधा को कोई हर्ष न प्रदान कर सकी ।,उसे जान पड़ा प्रक़ृति उसकी दशा पर व्यंग्य से मुसकिरा रही है । "बसुधा ने लजित होकर कहा--नहीं-नहीं, में डरतो नहीं ज़रा चौंक पढ़ी थो ।","कुँवर साहब ने उसकी गर्दन में हाथ डालकर कहा , दिल मजबूत करो प्रिये ।","वसुधा ने लज्जित होकर कहा , नहीं-नहीं, मैं डरती नहीं, जरा चौंक पड़ी थी ।" क्रोध से पायल द्वोकर इतने ज़ोर से गरजा कि बह्च॒धा का कछेजा दहक उठा ।,चीता जख्मी तो हुआ ; पर गिरा नहीं ।,क्रोध से पागल होकर इतनी जोर से गरजा कि वसुधा का कलेजा दहल उठा । वह ठउचककर आया द्वी चाहता था दि चसुधा ने बन्दुक को नली उसको आँखो' में ड/छक्कर बन्दृक छोड़ी ।,शेर के और उसके बीच में दो हाथ से ज्यादा अन्तर न था ।,वह उचककर आना ही चाहता था कि वसुधा ने बन्दूक की नली उसकी आँखो में डालकर बन्दूक छोड़ी । धार्य ! शेर के पजे ढीले पड़े ।,वह उचककर आना ही चाहता था कि वसुधा ने बन्दूक की नली उसकी आँखो में डालकर बन्दूक छोड़ी ।,धायें ! शेर के पंजे ढीले पड़े । वद्युधा के प्राण अँखाँ में थे और कला- इयो' में ।,"शेर में अगर अभी दम है , तो वह उन पर जरूर वार करेगा ।",वसुधा के प्राण आँखो में थे और बल कलाइयों में । "कु अर साहब समलकर खड़े हो, पये ।",वसुधा ने उसके मुँह के सामने रिवाल्वर खाली कर दिया ।,कुँवर साहब सॅभलकर खड़े हो गये । वच्युधा बेहोश थी ।,अरे ! यह क्या ।,वसुधा बेहोश थी । भय के शान्त होते द्वी मूर्च्छा आ गई ।,भय उसके प्राणों को मुट्ठी में लिये उसकी आत्म-रक्षा कर रहा था ।,भय के शांत होते ही मूर्च्छा आ गयी । वकौल ज़ाप्तीन पर या ताक़ पर तो नहीं बेठ सकता ।,मियाँ नूरे के वकील का अंत उनके प्रतिष्ठानुकूल इससे ज्यादा गौरवमय हुआ ।,वकील जमीन पर या ताक पर तो नहीं बैठ सकता । उपक्ली मर्यादा का विचार तो करना द्वी द्ोगा ।,वकील जमीन पर या ताक पर तो नहीं बैठ सकता ।,उसकी मर्यादा का विचार तो करना ही होगा । "उनके दोनों छोटे भाई सिपाद्दी को तरफ से छोने- चीले, जागते लद्दो' पुकारते चलते हँ ।",नूरे ने यह टोकरी उठायी और अपने द्वार का चक्कर लगाने लगे ।,"उनके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरह ‘छोनेवाले, जागते लहो’ पुकारते चलते हैं ।" मगर रात तो अंघेरी होनो चाहिए ।,"उनके दोनों छोटे भाई सिपाही की तरह ‘छोनेवाले, जागते लहो’ पुकारते चलते हैं ।",मगर रात तो अँधेरी ही होनी चाहिये । अबदी ऐसो मेहरिया ला दूँगा कि उप्तके पर धो-घो पिभोगे ; लेकिन कहीं पहली भी आ गईं तो ?,मँगरू- तो दूसरी सगाई हो जायगी ।,अबकी ऐसी मेहरिया ला दूँगा कि उसके पैर धो-धोकर पिओगे; लेकिन कहीं पहली भी आ गयी तो ? दृरिघन का विरवलम्ब प्न यह जाश्रय पाकर मानों तृप्त शे गया ।,"वही घर जिससे वह एक दिन विरक्त हो गया था, अब गोद फैलाये उसे आश्रय देने को तैयार था ।",हरिधन का निरवलंबन मन यह आश्रय पाकर मानो तृप्त हो गया । उसके मुख पर उद्यान था और भांखो' में गये ।,दूसरे दिन हरिधन फिर कंधे पर हल रखकर खेत को चला ।,उसके मुख पर उल्लास था और आँखों में गर्व । "तोच पैसे द्वामिद की जेव में, पाँच अमोवा के चटने में |",अब तो कुल दो आने पैसे बच रहे हैं ।,"तीन पैसे हामिद की जेब में, पाँच अमीना के बटवे में ।" "यही तो बिसात है और ईद का द्यौद्दार, अल्लाह द्वी बेढ़ा पार लगाये |","तीन पैसे हामिद की जेब में, पाँच अमीना के बटवे में ।","यही तो बिसात है और ईद का त्यौहार, अल्लाह ही बेड़ा पार लगावे ।" "धोबन, और नाइन और मेहतशानी और चूड़िद्दारर सभी तो आयेंगी ।","यही तो बिसात है और ईद का त्यौहार, अल्लाह ही बेड़ा पार लगावे ।",धोबन और नाइन ओर मेहतरानी और चुड़िहारिन सभी तो आयेंगी । द्वामिद के परों में तो जेसे पर लग गये हैँ ।,यह लोग क्यों इतना धीरे-धीरे चल रहे हैं ?,हामिद के पैरो में तो जैसे पर लग गए हैं । "यद्द अदालत है, यह कालेज है, यह कलबघघर ४ |",बड़ी-बड़ी इमारतें आने लगीं ।,"यह अदालत है, यह कालेज है, यह क्लब- घर है ।" घुमाते ही छुढक जायें ।,"और मेमें भी खेलती हैं, सच! हमारी अम्माँ को यह दे दो, क्या नाम है, बैट, तो उसे पकड़ ही न सकें ।",घुमाते ही लुढ़क जायँ । "अगर अम्माँ कौ तरफ़ से कुछ क्द॑ता हूँ; तो पत्मोओो रोना-घोन! शुरू बरतो हैं, अपने नसौनों को कोसने लगती हैं, पत्नो कौ-सो कहता हूं, तो ज़न-मुरौद की उपाधि मिलती है ।",मैं बड़े संकट में था ।,"अगर अम्माँ की तरफ से कुछ कहता हूँ, तो पत्नी जी रोना-धोना शुरु करती हैं, अपने नसीबों को कोसने लगती हैं; पत्नी की-सी कहता हूँ तो जन-मुरीद की उपाधि मिलती है ।" ' ' सारे शइर में अम्माश्मौ का उत्सव दो रहा था ।,"प्रेम से चाहे उनके सिर के बाल नोच लो, लेकिन जो रोब दिखाकर उन पर शासन करना चाहो, तो वह दिन लद गये ।",सारे शहर में जन्माष्टमी का उत्सव हो रहा था । "रढइती हो, लड़ो ; छेकिन भर में अंधेरा क्यों कर रख! है ।",मुझे अपनी पत्नी पर क्रोध आया ।,"लड़ती हो, लड़ो; लेकिन घर में अंधेरा क्यों रखा है ?" आठ-आठ हेनरी द्वो गुजरे हैं |,जब अलजबरा और जामेट्री के लोहे के चने चबाने पड़ेंगे और इंगलिस्तान का इतिहास पढ़ना पड़ेगा! बादशाहों के नाम याद रखना आसान नहीं ।,आठ-आठ हेनरी ही गुजरे है । "कौन-सा काण्ड किस हेवरी के समय में हुआ, क्या यह याद कर छेता भासान, सममते हो ?",आठ-आठ हेनरी ही गुजरे है ।,"कौन-सा कांड किस हेनरी के समय हुआ, क्या यह याद कर लेना आसान समझते हो ?" "एऋ% हो नाम के पोछे दोयम, सेयम, चह्ारम, पचम लगाते चड्ठे गये ।",इन अभागों को नाम भी न जुड़ते थे ।,"एक ही नाम के पीछे दोयम, सोयम, चहारुम, पंजुम लगाते चले गये ।" "कि कपलनी गोपा बोली--में नहीं करने देती या तू ,ख़द किसी काम के नगीच नहीं जातो ?",‘अम्माँ जब करने भी दें ।,’ गोपा बोली- मैं नहीं करने देती या खुद किसी काम के नगीच नहीं जाती ? माँ कौ दुलारो लड़की थी ।,सुन्नी मुँह फेरकर हँसती हुई चली गयी ।,माँ की दुलारी लड़की थी । "लड़कों को थद्व सोच ने का अवसर क्यों मिले कि दादा होते, तो शायद मेरे लिए इसप्ते भच्छा घर-वर ढ़, ढ़ते ।","लड़के तो बहुत मिलते हैं, लेकिन कुछ हैसियत भी तो हो ।",लड़की को यह सोचने का अवसर क्यों मिले कि दादा होते तो शायद मेरे लिए इससे अच्छा घर वर ढूँढते । "गोपा ने घर भो वह्द छोटा, जदाँ उप्तकों रसाई कठिन थो ।","लाखों रूपया जमा कर लिये थे, पर अब तक उनके लोभ की भूख न बुझी थी ।","गोपा ने घर भी वह छाँटा, जहाँ उसकी रसाई कठिन थी ।" तुम शायद भपता सर्वेत्त भपण करके भो उनका मुँह सीधा न कर सझो ।,"मैंने अर्ध सहमत होकर कहा- मगर यह तो सोचो, उनमें और तुममे कितना अंतर है ।",शायद अपना सर्वस्व अर्पण करके भी उनका मुँह सीधा न कर सको । "प्रधागत पतित्रत भो नहीं ; णल्कि हम दोनों रो प्रकृति में छुछ ऐपी क्षमताएँ, कुछ व्यवस्थाएं उतपन्न हो गई हैं, मार्तों किपो मशोन के कछल-पुरजे घिश्न-घिवाकर फिठड हो गये दो, ओर एक पुरजे को जगह दूसरा पुरणा राम न दे सके, चाहे वह पहले से दितना द्वी सुडौल भोर नया भीर सुदृढ़ क्‍यों न दो ।","यह धर्म की बेड़ी नहीं है, कदापि नहीं ।","प्रथागत पतिव्रत भी नहीं; बल्कि हम दोनों की प्रकृति में कुछ ऐसी क्षमताएँ, कुछ व्यवस्थाएँ उत्पन्न हो गयी हैं, मानो किसी मशीन के कल-पुरजे घिस-घिसाकर फिट हो गये हों, और एक पुरजे की जगह दूसरा पुरजा काम न दे सके, चाहे वह पहले से कितना ही सुडौल, नया और सुदृढ़ क्यों न हो ।" भवजान राघ्ते पर चलना कितना कष्ट-प्रद द्वोगा ।,"जाने हुए रास्ते से हम नि:शंक आँखें बंद किये जाते हैं, उसके ऊँच-नीच, मोड़ और घुमाव सब हमारी आँखो में समाये हुए हैं ।",अनजान रास्ते पर चलना कितना कष्टप्रद होगा । जितके सिर आयेगो वह स्केलेंगे |,' 'हम लोगों की तो बुरी-भली कट गयी ।,"जिनके सिर आयेगी, वह झेलेंगे ।" "” “सुता, युवतियों को दुनिया में जिस चोज से सपसे ज़्यादा नफ्ररत है,बद बूढे बद हैं ।","आज तो जिधर जाओ, हुस्न-ही-हुस्न के जलवे ।","' 'सुना, युवतियों को दुनिया में जिस चीज से सबसे ज्यादा नफरत है, वह बूढ़े मर्द हैं ।" ” में इसझा कायल नहीं ।,"' 'सुना, युवतियों को दुनिया में जिस चीज से सबसे ज्यादा नफरत है, वह बूढ़े मर्द हैं ।",' 'मैं इसका कायल नहीं । छितने हो बूढे जवानों ऐे ज़्यादा भड्यल होते हैं ।,"पुरुष का जौहर उसकी जवानी नहीं, उसका शक्तिसंपन्न होना है ।",कितने ही बूढ़े जवानों से ज्यादा कड़ियल होते हैं । घु्े तो आये दिन इसके तनरते द्ोोते हैं ।,कितने ही बूढ़े जवानों से ज्यादा कड़ियल होते हैं ।,मुझे तो आये दिन इसके तजरबे होते हैं । 'यह सब सह्दी है ; पर बूढ़ी छा दिल कमजोर हो जाता है ।,मैं ही अपने को किसी जवान से कम नहीं समझता ।,' 'यही सब सही है; पर बूढ़ों का दिल कमजोर हो जाता है । में तो झँखों भर देख भी त सझा ।,अगर यह बात न होती तो इस रमणी को इस तरह देखकर हम लोग यों न चले जाते ।,मैं तो आँखो भर देख भी न सका । "थअजी, रहने भी दो ।",' 'खुश होती कि बूढ़े पर भी उसका जादू चल गया ।,' 'अजी रहने भी दो । पआप छुछ दिनों 'लोछासा' का सेवव दोजिए ।,' 'अजी रहने भी दो ।,' 'आप कुछ दिनों 'ओकासा' का सेवन कीजिए । पास द्ोने पर कहों-न-कहों जगह मिल जायगो |,सरकार से वजीफा पाते ही हैं ।,पास होने पर कहीं-न-कहीं जगह मिल जायेगी । छामतावाथ ने दूरदर्शिता का परिचय दिया--लुक्क प्राव की एक ही कही ।,हम लोगों की हालत तो ऐसी नहीं है ।,कामतानाथ ने दूरदर्शिता का परिचय दिया- नुकसान की एक ही कही । "कौन जानता है, कलछ इन्हें विलायत जाकर पढ़ने के सरकारी लिए वज़ेफा मिल जाप, या प्िविल सर्विस में 5 आ जायें ।","यह अभी लड़के हैं,इन्हें क्या मालूम, समय पर एक रूपया एक लाख का काम करता है ।","कौन जानता है, कल इन्हें विलायत जाकर पढ़ने के लिए सरकारी वजीफा मिल जाये या सिविल सर्विस में आ जायें ।" उच्च वक्त सफ़र की तंपारियां में चार-पाँच हज़ार ऊूप जायेंगे ।,"कौन जानता है, कल इन्हें विलायत जाकर पढ़ने के लिए सरकारी वजीफा मिल जाये या सिविल सर्विस में आ जायें ।",उस वक्त सफर की तैयारियों में चार-पाँच हजार लग जाएँगे । "सक्षवाता हुआ बोला--हाँ, यदि ऐसा हुआ तो बेशू मुझे रुपये की ज़हरत द्वोगी ।",इस तर्क ने सीतानाथ को भी तोड़ लिया ।,"सकुचाता हुआ बोला- हाँ, यदि ऐसा हुआ तो बेशक मुझे रूपये की जरूरत होगी ।" ! भौ-कभी प्रिफारिशें घरी रह जातो हैं और बिना पिफारिशवाले बाज़ो मार के जाते हैं ।,"वजीफे उन्हें मिलते हैं, जिनके पास सिफारिशें होती हैं, मुझे कौन पूछता है ।",’ ‘कभी-कभी सिफारिशें धरी रह जाती हैं और बिना सिफारिश वाले बाजी मार ले जाते हैं । मुर्ते या तक मजूर है कि चाहे में विलायत व जाऊ $ पर छुमुद अच्छे घर जाय ।,’ ‘तो आप जैसा उचित समझें ।,मुझे यहाँ तक मंजूर है कि चाहे मैं विलायत न जाऊँ; पर कुमुद अच्छे घर जाये । इप्त विवाह में में एड इज़ार से ज़्यादा नहों खबे कर सता ।,"मैं तो चाहता हूँ कि मुरारीलाल को जवाब दे दिया जाये और कोई ऐसा घर खोजा जाये, जो थोड़े में राजी हो जाये ।",इस विवाह में मैं एक हजार से ज्यादा नहीं खर्च कर सकता । "उम्रानाथ ने एक फौजदारी के घामले में रिख्वित छेछर यलत रिपोर्ट लिखी और उनकी सनद्‌ छीन ली गईं , पर फूल- बती के चेद्वरे पर रख की परछाई तक न पड़ी ।",दयानाथ ने अबकी अपने पत्र का प्रचार बढ़ाने के लिए वास्तव में एक आपत्तिजनक लेख लिखा और छ: महीने की सजा पायी ।,उमानाथ ने एक फौजदारी के मामले में रिश्वत लेकर गलत रिपोर्ट लिखी और उसकी सनद छीन ली गयी; पर फूलमती के चेहरे पर रंज की परछायीं तक न पड़ी । मलेरिया फेल रद्दा था ।,सावन की झड़ी लगी हुई थी ।,मलेरिया फैल रहा था । थाद्र वायु शात्-ज्वर और खास का वितरण करती फिरतो थी ।,"आकाश में मटियाले बादल थे, जमीन पर मटियाला पानी ।",आर्द्र वायु शीत-ज्वर और श्वास का वितरण करती फिरती थी । रू्घू वहीं मृत्ति को तरद खड़ा रहा ।,यह कहकर पन्ना रोती हुई वहाँ से चली गयी ।,रग्घू वहीं मूर्ति की तरह बैठा रहा । एक ने पूछा--भाज तो तुम्दारी बुढ़िया बहुत रो-धो रदह्दी थी ।,मुलिया को कुएँ पर दो-तीन बहुएँ मिल गयी ।,एक से पूछा—आज तो तुम्हारी बुढ़िया बहुत रो-धो रही थी । सारी क्षिन्दगी रोते द्वी कट जाय ।,"अभी उनके पीछे मरो, फिर बाल-बच्चे हो जायँ, उनके पीछे मरो ।",सारी जिन्दगी रोते ही कट जाय । मोठा- मोटा खाये और पढ़ी रहें ।,एक बहू- बुढ़िया यही चाहती है कि यह सब जन्म-भर लौंडी बनी रहें ।,मोटा-झोटा खाएँ और पड़ी रहें । इस युत्रक के प्रति प्रेप्ता के मन में क्‍या भाव थे यहद्द उनसे छिपा न रहा ।,"वे उसी गुस्से में दरवाजे तक आये , लेकिन प्रेमा को रोते देखकर नम्र हो गये ।","इस युवक के प्रति प्रेमा के मन में क्या भाव थे , यह उनसे छिपा न रहा ।" इस्रऐे बढ़ा अपप्तान वे सोच ही न सकते थे ।,अपनी ही जाति के सुयोग्य वर के लिए अपना सर्वस्व अर्पण कर सकते थे ; लेकिन उस क्षेत्र के बाहर कुलीन से कुलीन और योग्य से योग्य वर की कल्पना भी उनके लिए असह्य थी ।,इससे बड़ा अपमान वे सोच ही न सकते थे । "उन्होंने कठोर स्वर में कद्दा--आज से काछेज जाना बन्द कर दो; अगर शिक्षा कुल-मर्यादा को डुबाना ही सिखातो है, तो कुशिक्षा है ।",इससे बड़ा अपमान वे सोच ही न सकते थे ।,"उन्होंने कठोर स्वर में कहा — आज से कालेज जाना बन्द कर दो , अगर शिक्षा कुल-मर्यादा को डुबोना ही सिखाती है , तो कु-शिक्षा है ।" "लालाजी ने घर में आकर पत्नो को एक्ान्त में बुलाया, और बोले--जदाँ तक मुम्के माल्म हुआ है, जेशव बहुत हो छुशील और प्रतिभाशीली युवक हैं ।",४ छ: महीने गुजर गये ।,"लाला जी ने घर में आकर पत्नी को एकान्त में बुलाया और बोले — जहाँ तक मुझे मालूम है , केशव बहुत ही सुशील और प्रतिभाशाली युवक है ।" "तुमने भो समस्ताया, मेंने भी समस्काया, दूपरों ने भी समम्काया ; पर उम्र पर कोई अपर हो नहीं होता ।",मैं तो समझता हूँ प्रेमा इस शोक में घुल-घुलकर प्राण दे देगी ।,"तुमने भी समझाया , मैंने भी समझाया , दूसरों ने भी समझाया ; पर उस पर कोई असर ही नहीं होता ।" "मेने इस प्रह्न पर ठण्डे दिल से विचार किया है, और इध नतोजे पर पहुचा हूँ कि हमें इप्त आपदम को स्वोकार कर छेनगा हो चाहिए ।",चिडिय़ा का पर खोलकर यह आशा करना कि वह तुम्हारे आँगन में ही फुदकती रहेगी भ्रम है ।,मैंने इस पर पर ठण्डे दिल से विचार किया है और इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि हमें इस आपद्धर्म को स्वीकार कर लेना ही चाहिए । कछुल-मर्यादा के नाम पर मे पप्रेष्ना को हत्या नहों कर प्रकता ।,मैंने इस पर पर ठण्डे दिल से विचार किया है और इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि हमें इस आपद्धर्म को स्वीकार कर लेना ही चाहिए ।,कुल-मर्यादा के नाम पर मैं प्रेमा की हत्या नहीं कर सकता । गाड़ी अन्धकार को चोरतो चछो जा रहो यो ।,"न दिखाऊँगी, जिस मुँह पर ऐसी कालिमा लगी हुई है, उसे किसी को दिखाने की इच्छा भी नहीं है ।",गाड़ी अंधकार को चीरती चली जा रही थी । दरवाज्ञा खुलने ही आदइट से माताजी का आँखें खुछ गई' ।,10 न जाने कितनी रात गुजर चुकी थी ।,दरवाजा खुलने की आहट से माता जी की आँखें खुल गयीं । "जा, सुफे छोढ़ दे, अभी सुमूपे कुछ न खाया जायगा ।","मैं उनके भले के लिए भी कोई बात करुँ, तो दुनिया यही कहेगी कि यह अपने भाइयों को लूटे लेता है ।","जा मुझे छोड़ दे, अभी मुझसे कुछ न खाया जायगा ।" "मुल्या--हमारा द्वी लठ्ठ पिये, जो खाने व उठे ।",अपना हठ छोड़ दे ।,"मुलिया— हमारा ही लहू पिये, जो खाने न उठे ।" पहले सबझो ऐसा द्वी लगता दे ।,मुलिया— दाग-साग सब मिट जायगा ।,पहले सबको ऐसा ही लगता है । रम्घू ने आहत स्वर में कद्ा--इसी बात का तो मुझे ग्रम्न है ।,"अब वह पहले की-सी चाँदी तो नहीं है कि जो कुछ घर में आवे, सब गायब! अब क्यों हमारे साथ रहने लगीं ?",रग्घू ने आहत स्वर में कहा— इसी बात का तो मुझे गम है । बोस साल गुज़र गये ।,हमें तो इसी ऊजड़ ग्राम में जीना भी है और मरना भी ।,बीस साल गुजर गए । मेंने इछ्नो नियरो पास को और उसो जिले का दौरा करता हुआ उठी कस्बे में पहुंचा और डाऋदंगले में ठह॒रा |,बीस साल गुजर गए ।,मैंने इंजीनियरी पास की और उसी जिले का दौरा करता हुआ उसी कस्बे में प हुँ चा और डाकबँगले में ठहरा । में दूर द्वो पे पहचान गया ।,’ लड़का दौड़ता हुआ गया और एक क्षण में एक पाँ च हाथ के काले देव को साथ लिए आता दिखाई दिया ।,मैं दूर से ही पहचान गया । ( सहसा ईदगाह नज़र आया ।,हामिद तो मोटर के नीचे जाते-जाते बचा ।,सहसा ईदगाह नजर आयी । "और रोज़ेंदारों'को पैक्तियाँ एक के ' पोछे एक न जाने कहाँ तह चछो पड हैँ, पक्क्ो जगत के नीचे:तंक) जहाँ जाजिम भी नद्दों है ।","नीचे पक्का फर्श है, जिस पर जाजम बिछा हुआ है ।","और रोजेदारों की पंक्तियाँ एक के पीछे एक न जाने कहाँ तक चली गयी हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहाँ जाजम भी नहीं है ।" इन प्रामोणों ने भो वज्ञू दिया और पिछलो पक्ति में खड़े दो गये ।,इस्लाम की निगाह में सब बराबर हैं ।,इन ग्रामीणों ने भी वजू किया ओर पिछली पंक्ति में खड़े हो गये । "कई बार यहो क्रिया होती है, जेसे बिजली को लाखों बत्तियाँ एच साथ ग्रदोतत हाँ और एक साथ बुम्कत जायें, और यद्दी क्रम चलता रहे ।","कितना सुन्दर संचालन है, कितनी सुन्दर व्यवस्था! लाखों सिर एक साथ सिजदे में झुक जाते हैं, फिर सबके सब एक साथ खड़े हो जाते हैं, एक साथ झुकते हैं, और एक साथ घुटनों के बल बैठ जाते हैं ।","कई बार यही क्रिया होती है, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जायँ, और यही क्रम चलता रहा ।" "यह चर्खी है, लकड़ी के द्वाथी, घोढ़े, झट छड़ी से लठके हुए हैं |","कभी आसमान पर जाते हुए मालूम होगें, कभी जमीन पर गिरते हुए ।","यह चर्खी है, लकड़ी के हाथी, घोड़े, ऊँट, छड़ों में लटके हुए हैं ।" अपने कोप रा एक तिद्ाई ज्ञात सा चक्क! खाने के लिए नहों दे सकता ।,तीन ही पैसे तो उसके पास हैं ।,अपने कोष का एक तिहाई जरा-सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता । सब चलियों से उत्तरते हैं ।,अपने कोष का एक तिहाई जरा-सा चक्कर खाने के लिए नहीं दे सकता ।,सब चर्खियों से उतरते हैं । "तरह-तरह के खिजीने हैं--ठिपाहदी और गुजरिया, राजा और वकील और भिद्ती और घोडिव और साधू ।",इधर दूकानों की कतार लगी हुई है ।,"तरह-तरह के खिलौने हैं—सिपाही और गुजरिया, राजा और वकील, भिश्ती और धोबिन और साधु ।" कितने सुन्दर खिलौने हैं |,"तरह-तरह के खिलौने हैं—सिपाही और गुजरिया, राजा और वकील, भिश्ती और धोबिन और साधु ।",वाह! कितने सुन्दर खिलौने हैं । "अपर झुछी हुईं है, ऊपर मशह रखे/हुए दै ।",मोहसिन को भिश्ती पसंद आया ।,"कमर झुकी हुई है, ऊपर मशक रखे हुए है ।" "माँ अलग मु ह-फुलाये बठो थीं, स्रो अलग ।",कई दिनों से घर में कलह मचा हुआ था ।,"माँ अलग मुँह फुलाये बैठी थी, स्त्री अलग ।" "कोई उसे गोद में न उठाता था, मार्नों ठंसने भो कोई अपराध किया दो ।","छोटी लड़की कभी मेरे पास आकर खड़ी हो जाती, कभी माता के पास, कभी दादी के पास; पर कहीं उसके लिए प्यार की बातें न थीं ।","कोई उसे गोद में न उठाता था, मानों उसने भी अपराध किया हो ।" "भाई-बहन दिन में कितनी द्वी बार लड़ते, हैं, रोता- पौटना भी कई बार द्वो जाता है $ पर ऐसा, कभो, नहों होता कि घर -में खाता न पके था कोई किसी से बोले नहीं |",दोनों बरामदे में मन मारे बैठे हुए थे और शायद सोच रहे थे- घर में आज क्यों लोगों के हृदय उनसे इतने फिर गये हैं ।,"भाई-बहिन दिन में कितनी बार लड़ते हैं, रोना-पीटना भी कई बार हो जाता है; पर ऐसा कभी नहीं होता कि घर में खाना न पके या कोई किसी से बोले नहीं ।" ",,- भगड़े को जढ़ कुछ न थी ।","यह कैसा झगड़ा है कि चौबीस घंटे गुजर जाने पर भी शांत नहीं होता, यह शायद उनकी समझ में न आता था ।",झगड़े की जड़ कुछ न थी । "पाँच साढ़ियों को जगद्द तोन रहें, तो क्या घुराई दे ।",उन्होंने थोड़ी-बहुत काट-छाँट कर दी थी; लेकिन पत्नी जी के विचार से और काट-छाँट होनी चाहिए थी ।,"पाँच साड़ियों की जगह तीन रहें, तो क्या बुराई है ।" "“नहीं चाचाजो, इस विषय में अब कुछ न कह्ठिए, नहीं तो में चलो जादँगी ।",नतीजे की मैं परवाह नहीं करती ।,"‘लेकिन...’ ‘नहीं चाचाजी, इस विषय में अब कुछ न कहिए, नहीं तो मैं चली जाऊँगी ।" * आखिर सोचो तो ---* में सब सोच चुकी और तय कर चुकौ ।,"‘लेकिन...’ ‘नहीं चाचाजी, इस विषय में अब कुछ न कहिए, नहीं तो मैं चली जाऊँगी ।",’ ‘आखिर सोचो तो...’ ‘मैं सब सोच चुकी और तय कर चुकी । मई का महीना था ।,"हाँ, अपने बाबू साहब के संबंध में तरह-तरह की बातें कीं, जिनसे मुझे दो-चार गल्प लिखने की सामग्री मिल गई ।",मई का महीना था । ” 'तुमने तार दिया और छद्दती हों-- कुछ तो नहीं ।,’ ‘कुछ तो नहीं ।,’ ‘तुमने तार दिया और कहती हो- कुछ तो नहीं ? "लड़की बच रद्दी थी, और यही इस चाटक का सबसे करुण €रय था ।",दोनों लड़के तो बचपन में ही दगा दे गये थे ।,"लड़की बच रही थी, और यही इस नाटक का सबसे करूण दृश्य था ।" द्वार पर पहुँचते द्ौ मुझे रोना आ गया ।,विदेश से लौटकर मैं सीधा दिल्ली पहुँचा ।,द्‌वार पर पहुँचते ही मुझे भी रोना आ गया । स॒त्यु को अ्तिध्वनि-सी छाई हुईं थी ।,द्‌वार पर पहुँचते ही मुझे भी रोना आ गया ।,मृत्यु की प्रतिध्वनि-सी छायी हुई थी । देववाथ के साथ “बह श्री भी छप्त हो गई थो ।,"जिस कमरे में मित्रों के जमघट रहते थे उनके द्वार बंद थे, मकडियों ने चारों ओर जाले तान रखे थे ।",देवनाथ के साथ वह श्री लुप्त हो गयी थी । पहली नज़र में तो मुझे ऐसा अम हुआ कि देवताथ द्वार पर खड़े मेरी ओर देखकर मुस्करा रहे हैं ।,देवनाथ के साथ वह श्री लुप्त हो गयी थी ।,पहली नजर में मुझे तो ऐसा भ्रम हुआ कि देवनाथ द्‌वार पर खड़े मेरी ओर देखकर मुस्करा रहे हैं । "दोनों एम्रक गये कि आज डॉट पड़ी, शायद मजूरी भी कट ज्ञाय ।","अब न आते बनता है, न जाते ।","दोनों समझ गये कि आज डाँट पड़ी, शायद मजूरी भी कट जाय ।" "' चैनसिह ने फिर कह्दा- जद्दी से आओ छौ, पक्षी-पक्षो सब में ले रूँगा ।",बेचारे और भी सिकुड़ गये ।,"चैनसिंह ने फिर कहा- जल्दी से आओ जी, पक्की-पक्की सब मैं ले लूँगा ।" "सर्बो ने आकर सभ बेर चेनसिंद के आगे डाल दिये, और पके-पछ्के छाँटकर उसे देने लगे ।",अब दोनों भगोड़ों को कुछ ढारस हुआ ।,सभी ने जाकर सब बेर चैनसिंह के आगे डाल दिए और पक्के-पक्के छाँटकर उसे देने लगे । "जछ सब बेर उड़ गये, और ठाकुर चलने छे. ते दोनों अपराधियों ने हाथ जोड़कर दह्य--*याजी, आज णजानवकंसी छो जाय; बही भूख लगी थी, नहीं तो कभी न जाते ।",आधा घंटे तक चारों पुर बंद रहे ।,"जब सब बेर उड़ गये और ठाकुर चलने लगे, तो दोनों अपराधियों ने हाथ जोड़कर कहा- भैयाजी, आज जान बकसी हो जाय, बड़ी भूख लगी थी, नहीं तो कभी न जाते ।" "तौसरा--कई दिन से देखता हूँ, मिजाण बहुत नरम दो घया दे ।","दूसरा- मैंने तो समझा, आज कच्चा ही खा जायेंगे ।","तीसरा- कई दिन से देखता हूँ, मिजाज नरम हो गया है ।" इन्हें खुद कभी यद्द उम्रम नहीं होती ।,"बेशक मैं जो चीज बाजार से मँगवाऊँ; उसे लाने में इन्हें जरा भी आपत्ति नहीं, बिलकुल उज्र नहीं, मगर रुपये मैं दे दूँ, यह शर्त है ।",इन्हें खुद कभी यह उमंग नहीं होती । यहाँ सज व्यवद्दार का निषेध है |,"अन्य पुरुषों को देखती हूँ, स्त्री के लिए तरह-तरह के गहने, भाँति-भाँति के कपड़े, शौक-सिंगार की वस्तुएँ लाते रहते हैं ।",यहाँ इस व्यवहार का निषेध है । "शप्थ-यों खा ली है; इप्लिए में तो इन्हें कृपण कहूँगी, भरधिक कहूँगी, हृदय-श॒म्य कहूँगो, उदार नदों कह सझती ।","बच्चों के लिए भी मिठाइयाँ, खिलौने, बाजे शायद जीवन में एक बार भी न लाये हों ।","शपथ भी खा ली है; इसलिए मैं तो इन्हें कृपण कहूँगी, अरसिक कहूँगी, हृदय-शून्य कहूँगी, उदार नहीं कह सकती ।" "इसका खमियाज़ा भाप न ठ्ठाएँ, तो कौन उठाये ।","और तो और, कभी किसी अफसर के घर नहीं जाते ।","इसका खामियाजा आप न उठायें, तो कौन उठाये ।" आपने मुझे राद्द दिखाई दे तो मज्जिल पर पहु चाइए ।,अंत में उसने हबीब से कहा- मेरे जवान दोस्त अब मेरा बेड़ा आप ही पार लगा सकते हैं ।,आपने मुझे राह दिखाई है तो मंजिल पर पहुँचाइए । मेरी आप से यद्दी इल्तमास ( प्रार्थना ) है कि आप उसको वल्नारत क़बूल झरे ।,मुझे अब मालूम हो गया कि मैं उसे तबाही के रास्ते पर लिये जाता था ।,मेरी आपसे यही इल्त ज़ा (प्रार्थना) है कि आप उसकी वजारत कबूल करें । "यज़दानी मे अरज़ को-- हुज्लु र, इतनी क्रदरदानी फरमाते हैं, यह आपडी इता- यत है ; लेकिन अभो इस लड़के को उम्र ही क्या है ।","देखिये , खुदा के लिये इंकार न कीजिएगा, वरना मैं कहीं का नहीं रहूँगा ।","यजदानी ने अरज की- हुजूर इतनी कदरदानी फरमाते हैं, तो आपकी इनायत है, लेकिन अभी इस लड़के की उम्र ही क्या है ।" दरगारवार्लों में षढ्यन्त्र होते दो रहते हैँ |,"उन्हें हबीब की लियाकत पर भरोसा था, फिर भी जी डरता था कि बिराने देश में न जाने कैसी पड़े, कैसी न पड़े ।",दरबारवालों में षड्यंत्र होते ही रहते हैं । ! “उन्हीं के साथ इबीब को भी ।,’ ‘हमने ईसाइयों को किले में घेर लिया है ।,’ ‘उन्हींस के साथ हबीब को भी ? "“हाँ हुजूर, वह हुजूर, से बागी हो गये हैं ।",’ ‘उन्हींस के साथ हबीब को भी ?,"’ ‘हाँ हुजूर , वह हुजूर से बागी हो गये ।" बदफ़ात दूर द्वो जा मेरे सामने से ।,"मुमकिन है, मेरे पहुँचते-पहुँचते उन्हें कत्ल भी कर दें ।","बदजात, दूर हो जा मेरे सामने से ।" "यह ग्रलत है, मठ है |","मुसलमान समझते है, हबीब मेरा नौकर है और मै उसका आका हूँ ।","यह गलत है, झूठ है ।" बेशक जज़िया झुआफ द्ोना चाहिए |,उसके फैसले में तैमूर दस्तंदाजी नहीं कर सकता ।,बेशक जजिया मुआफ होना चाहिए । "आदित्य ने छघा-पूण नेन्नों से थालो को ओर देखा, मार्नों आज बहुत दिनों के बाद कोई खाने को चीज़ सामने आई है ।",करूणा बालक को लिये हुए उठी और थाली में कुछ भोजन निकालकर लायी ।,"आदित्य ने क्षुधापूर्ण, नेत्रों से थाली की ओर देखा, मानो आज बहुत दिनों के बाद कोई खाने की चीज सामने आयी है ।" "थालो उठाद्वर चली गई, पर उसका दिल कह रह था--इतना तो यह कभी न खाते थे ।",उसने दोबारा किसी चीज के लिए न पूछा ।,"थाली उठाकर चली गयी, पर उसका दिल कह रहा था- इतना तो कभी न खाते थे ।" करुणा उबको यह हालत देखकर घड़ा गई ।,हाथों के सहारे वहीं टाट पर लेट गये थे ।,करूणा उनकी यह हालत देखकर घबरा गयी । करुणा ने सिसकियों को दबाते हुए कद्धा--में वेधज्रो को लेकर अभी थातो हूँ ।,"देखो प्रिये, रोओ मत ।",करूणा ने सिसकियों को दबाते हुए कहा— मैं वैद्य को लेकर अभी आती हूँ । न जाने कौन-पो दवो शक्ति मुम्े वहाँ से खाँच लाई ।,मुझे तो यह आश्चर्य है कि यहाँ पहुँच कैसे गया ।,न जाने कौन दैवी शक्ति मुझे वहाँ से खींच लायी । मेंने तुम्हारे साथ चढ़ा अन्याय किया ।,कदाचित् यह इस बुझते हुए दीपक की अन्तिम झलक थी ।,आह! मैंने तुम्हारे साथ बड़ा अन्याय किया । "नये सूड बने, सूउक्रेख लिये गये ।",कुछ ऋण भी लेना पड़ा ।,"नये सूट बने, सूटकेस लिए गये ।" "रूभी किप्री चीज़ फी फप्माइश केछर आता, कभी किसी चोज़ की ।",प्रकाश अपनी धुन में मस्त था ।,"कभी किसी चीज की फरमाइश लेकर आता, कभी किसी चीज की ।" "करुणा इस एक सप्ताह में दितवो दुबेल हो गई है, उप्रके वालों पर कितनी सफेदी आ गई है, चेहरे पर कितनो छुर्पियाँ पढ़ गई हैं, यद उप्ते कुछ न नज़र आता ।","कभी किसी चीज की फरमाइश लेकर आता, कभी किसी चीज की ।","करूणा इस एक सप्ताह में इतनी दुर्बल हो गयी है, उसके बालों पर कितनी सफेदी आ गयी है, चेहरे पर कितनी झुर्रियाँ पड़ गयी हैं, यह उसे कुछ न नजर आता ।" आज कई दिनों के बाद धुत नि्चछो थो ।,प्रस्थान का दिन आया ।,आज कई दिनों के बाद धूप निकली थी । कहंणा स्वामी के पुराने करी को बाहर निकाल रह्दो थो ।,आज कई दिनों के बाद धूप निकली थी ।,करूणा स्वामी के पुराने कपड़ों को बाहर निकाल रही थी । "करुणा ने आज फिर उन ऋर्पढ़ों को निकाला , सगर सुखकर रखने के लिए नहों, ग्रतेत्रों को बाँद देने के छिए |",प्रतिवर्ष वे धूप में सुखाये जाते और झाड़-पोंछकर रख दिये जाते थे ।,"करूणा ने आज फिर उन कपड़ो को निकाला, मगर सुखाकर रखने के लिए नहीं गरीबों में बाँट देने के लिए ।" कौन उपचा अयना है ?,उसका अंत:करण शोक और निराशा से विदीर्ण हो गया है और पति के सिवा वह किस पर क्रोध उतारे ?,कौन उसका अपना हैं ? में नहों चाहता था 6 इप वक्त तुप्रपे ये बातें कहूँ ।,"मुझे तुम्हारे सामने अपनी सफाई देने की जरूरत नहीं है, लेकिन मानी मेरे लिये उससे कहीं पवित्र है, जितनी तुम समझते हो ।",मैं नहीं चाहता था कि इस वक्त तुमसे ये बातें कहूँ । "में यद्द तो जानता था कि मावों का तुम्दारे घर में कोई आदर नहीं; लेकिन तुम लोग ढठसे इतना नोच और त्याज्य सम के हो, यह भाज छुम्द्दारो माताजी को बातें छुनऋर माल्म हुआ |","इसके लिये और अनूकूल परि स्थि तियों की राह देख रहा था, लेकिन मुआमला आ पड़ने पर कहना ही पड़ रहा है ।","मैं यह तो जानता था कि मानी का तुम्हारे घर में कोई आदर नहीं, लेकिन तुम लोग उसे इतना नीच और त्याज्य समझते हो, यह आज तुम्हारी माताजी की बातें सुनकर मालूम हुआ ।" "केवह इतवो-पो बात के लिए कि वह चढ़ावे के यहने देखने चली गई थो, तुम्हारी माता ने उप्ते इप बुरी तरह मिदक्रा, जैसे कोई कुत्ते को सो न मिएकेगा ।","मैं यह तो जानता था कि मानी का तुम्हारे घर में कोई आदर नहीं, लेकिन तुम लोग उसे इतना नीच और त्याज्य समझते हो, यह आज तुम्हारी माताजी की बातें सुनकर मालूम हुआ ।","केवल इतनी-सी बात के लिये वह चढ़ावे के गहने देखने चली गयी थी, तुम्हा्री माता ने उसे इस बुरी तरह झिड़का, जैसे कोई कुत्ते को भी न झिड़केगा ।" ठुम इप इलजास से नहों बच सझते |,"अगर तुमने अपनी माता को पहले ही दिन समझा दिया होता, तो आज यह नौबत न आती ।",तुम इस इल्जाम से नहीं बच सकते । उप्र पर ऐपा सन्देद्द करके वह बहुत ही लजित हुआ ।,गोकुल के हृदय में इंद्रनाथ के प्रति ऐसी श्रद्धा कभी न हुई थी ।,उस पर ऐसा संदेह करके वह बहुत ही लज्जित हुआ । "कहती थी, बहु मरदानों गाड़ी में बंठ ।",डाकगाड़ी अब न जाने कितनी देर में रूकेगी ।,"कहती थी, बहू मरदानी गाड़ी में बैठें ।" उसने प्रोर-ज़ोर से कई बार जजौर खींची ।,सहसा उसे खतरे की जंजीर याद आई ।,उसने जोर-जोर से कई बार जंजीर खींची । कई मिनट के बाद गाड़ी रुद्दो ।,उसने जोर-जोर से कई बार जंजीर खींची ।,कई मिनट के बाद गाड़ी रूकी । भत्बाब की जाँच की |,रक्त का कोई चिह्न न था ।,असबाब की जाँच की । "बिस्तर, सदूक, संदृक़ची बतेन, सब मौजूद थे ।",असबाब की जाँच की ।,"बिस्तर, संदूक, संदुकची, बरतन सब मौजूद थे ।" "सब छोग इन लक्षणों स्रे इसों नतीजे पर पहुँचे कि मानों द्वार खोलकर, बाहर भाँकने लगी 'दोगो और मुठिया हाथ से छूट जाने के कारण गिर पढ़ी होगी ! गा भरा आदमी था ।",एक स्त्री को लेकर गाड़ी से कूद जाना असंभव था ।,सब लोग इन लक्षणों से इसी नतीजे पर पहुँचे कि मानी द्वार खोलकर बाहर झाँकने लगी होगी और मुठिया हाथ से छूट जाने के कारण गिर पड़ी होगी । माताजी को कुछ लोग भाम्रद् पूवेंक एक मरदाने डब्नरे में ले ' गये |,रात को इससे ज्यादा और क्या किया जा सकता था ?,माताजी को कुछ लोग आग्रहपूर्वक एक मरदाने डिब्बे में ले गये । द्वाय ] भभो तो बेचारी की चू दरी भी नहीं मेली हुई ।,उनकी याचना से भरी हुई आँखें मानो सबसे कह रही थीं- कोई मेरी बच्ची को खोज क्यों नहीं लाता ?,"हाय, अभी तो बेचारी की चुंदरी भी नहीं मैली हुई ।" "कोई उस दु्द वशौधर'से जाध्र कद्दता क्यों बद्टों - छो तेरी मनो भिलाषा पूरी दो गई जो तू चाइता था, वह पूरा दो गया ।",कैसे-कैसे साधों और अरमानों से भरी पति के पास जा रही थी ।,"कोई उस दुष्ट वंशीधर से जाकर कहता क्यों नहीं- ले तेरी मनोभिलाषा पूरी हो गयी- जो तू चाहता था, वह पूरा हो गया ।" मातरी का भागमन इस परिहास' को विषय था ।,आपस में हास-परिहास हो रहा था ।,मानी का आगमन इस परिहास का विषय था । रात वदद नहीं में थे ।,खुरशेद- वह इस वक्त तुमसे अपना अपराध क्षमा कराने आये हैं ।,रात वह नशे में थे । "जुगनू ने मिसेज़ टंडन को भोर देखकर कद्दा--और, आप भी तो कुछ कमर “नही में नहीं थीं ।",रात वह नशे में थे ।,जुगनू ने मिसेज टंडन की ओर देखकर कहा- और आप भी तो कुछ कम नशे में नहीं थीं । "खुरदोद ने व्यंग्य समझकर कद्दा--मेंने आज तक कभौ नहीं पी, मुक्त पर झूठा “इलक़ाम मत लगाओ |",जुगनू ने मिसेज टंडन की ओर देखकर कहा- और आप भी तो कुछ कम नशे में नहीं थीं ।,"खुरशेद ने व्यंग्य समझकर कहा- मैंने आज तक कभी नहीं पी, मुझ पर झूठा इलजाम मत लगाओ ।" तावान छकोड़ीलाल ने दूकान खोलौ और कपड़े के थातों को निकाल-निकाल रखने छगा कि एक महिला दो छयंसेवर्कों के साथ उप्को दृकान को छेकने भा पहुँची ।,"क्या जानता था, अपना तमाचा अपने ही मुँह पर पड़ेगा ।","छकौड़ीलाल ने दुकान खोली और कपड़े के थानों को निकाल-निकाल रखने लगा कि एक महिला, दो स्वयंसेवकों के साथ उसकी दुकान छेकने आ पहुँची ।" "इसी पर दद्धा माता, रोगिणी ञ्नो और पाँच बेटे-बेटियों का निर्वाह होता था ।",लेहने पर कपड़े लाकर बेचा करता था ।,"यही जीविका थी, इसी पर वृद्धा माता, रोगिणी स्त्री और पाँच बेटे-बेटियों का निर्वाह होता था ।" ढघर ज्री का रोग भव्ाष्य होता जाता था ।,"यहाँ तक कि अब घरों में कोई ऐसी चीज न बची, जिससे दो-चार महीने पेट का भूत सिर से टल जाता ।",उधार स्त्री का रोग असाध्य होता जाता था । "गाई, आईं, हम दोनों वार हुए ।",यह भेद मेरे ध्यान को संपूर्ण रूप से अपनी ओर खींचे हुए था ।,"गाड़ी आयी, हम दोनों सवार हुए ।" ईंइबरी ने छहा--कितने तमीक्ष॒दार हैं ये सन |,मेरी ओर देखा भी नहीं ।,ईश्वरी ने कहा- कितने तमीजदार हैं ये सब । मेंत खट्टे सन से कद्दा - इसी तरह अगर तुम अपने नौऊरों को भी आठ भाने रोज़ इनाम दिया करो तो शायद इससे ज़्यादा तमोज़दार दो जाये ।,एक हमारे नौकर हैं कि कोई काम करने का ढंग नहीं ।,"मैंने खट्टे मन से कहा- इसी तरह अगर तुम अपने नौकरों को भी आठ आने रोज इनाम दिया करो, तो शायद इनसे ज्यादा तमीजदार हो जायें ।" अबकी में इन्हे घास्तीठट छाया ।,"यों कहिए कि आप ही की बदौलत मैं इलाहाबाद पड़ा हुआ हूँ, नहीं कब का लखनऊ चला आया होता ।",अबकी मैं इन्हें घसीट लाया । "आखिरी तार तो अजन्ट था, जिसको 'फ़रीस चार आने प्रति गब्द है; पर यहाँ से भी उप्तका जवाब इन्झ्ारी दी गया ।","इनके घर से कई तार आ चुके थे, मगर मैंने इनकारी-जवाब दिलवा दिये ।","आखिरी तार तो अर्जेंट था, जिसकी फीस चार आने प्रति शब्द है, पर यहाँ से भी उसका जवाब इन्कारी ही गया ।" अभी तो ऐसा घिस नहीं गया है कि आज द्वी उतारकर पक दिया जाय ।,"प्यारी ने कड़े उठा लिये और कोमल स्वर से कहा- कह तो दिया, हाथ में रूपये आने दे, बनवा दूँगी ।",अभी ऐसा घिस नहीं गया है कि आज ही उतारकर फेंक दिया जाय । "दुलारी--तुम न खाभो-पहनो, जय तो पाती दो ।",मेरा अनंत कब का टूटा पड़ा है ।,"दुलारी- तुम न खाओ-न पहनो, जस तो पाती हो ।" "में तो कड़े चादती हू इसी तरद्द घर के सब आदमी अपने-अपने अवसर पर प्यारी को दो-चार खोटो खरी सुना जाते थे, और वह गरीब सबको धोंस हंसकर सद्ती थी ।",मैं तो कड़े चाहती हूँ ।,"इसी तरह घर के सब आदमी अपने-अपने अवसर पर प्यारी को दो-चार खोटी-खरी सुना जाते थे, और वह गरीब सबकी धौंस हँसकर सहती थी ।" "इससे छुट्टी पा जाऊँ, फिर मुझे ज़िंदगी को परवाद्द न रहेगी ।",बस सुन्नी के ब्याह की चिंता है ।,इससे छुटटी पा जाऊँ; मुझे जिन्दगी की परवाह न रहेगी । "इतने दिलों इन बेचारों का निर्वाद केसे हुआ, यह ऋत्पना द्वी दु'खद थी ।",मेरे हृदय में बरछी-सी चुभ गयी ।,"इतने दिन इन बेचारों का निर्वाह कैसे हुआ, यह कल्पना ही दुःखद थी ।" मेंने-विरकत मन से कट्टा --लेकिन तुमने मुझे सूचना क्‍यों न दो ?,"इतने दिन इन बेचारों का निर्वाह कैसे हुआ, यह कल्पना ही दुःखद थी ।",मैंने विरक्त मन से कहा- लेकिन तुमने मुझे सूचना क्यों न दी ? मुइल्छे के सेंक़ों आदमी जमा थे ।,वहाँ तो अर्थी सज रही थी ।,मुहल्ले के सैकड़ों आदमी जमा थे । यह उुन्वो का छाव था ।,घर में से ‘हाय! हाय!’ की क्रंदन-ध्वनि आ रही थी ।,यह सुन्नी का शव था । "मदारोछाल मुझे देखते हो मुकपे उन्मत्त को भाँति छिपट गये और बोढे -भाई साहब, में तो छुट गया ।",यह सुन्नी का शव था ।,"मदारीलाल मुझे देखते ही मुझसे उन्मत की भाँति लिपट गये और बोले- ‘भाई साहब, मैं तो लुट गया ।" "मदारोलाल ने समम्काना चाह्दा, तो उन्हें भो जली-कटी सुनाई ।","सास ने जब आपत्ति की, तो उनको अपशब्द कहे ।",मदारीलाल ने समझाना चाहा तो उन्हें भी जली-कटी सुनायी । ऐसा भज्ुमाव होता था --उन्त्ांद्‌ हो गया है ।,मदारीलाल ने समझाना चाहा तो उन्हें भी जली-कटी सुनायी ।,ऐसा अनुमान होता था-उन्माद हो गया है । वहाँ उसको काश मिक्की ।,लोग उधर भागे ।,वहाँ उसकी लाश मिली । "पुलिस भाई, हाव को परीक्षा हुईं ।",वहाँ उसकी लाश मिली ।,"पुलिस आयी, शव की परीक्षा हुई ।" में छडेजा थामकर बेठ गया ।,अब जाकर शव मिला है ।,मैं कलेजा थामकर बैठ गया । "माट्स नहीं, यद्ध खबर पाकर गोपा की क्‍या दशा द्वोगी ।",मेरे पाँव काँप रहे थे ।,"मालूम नहीं, यह खबर पाकर गोपा की क्या दशा होगी ।" "आणान्त न हो जाय, मुझे यद्दी भय हो रहा था ।","मालूम नहीं, यह खबर पाकर गोपा की क्या दशा होगी ।","प्राणांत न हो जाये, मुझे यही भय हो रहा था ।" "दफ्तर में इन्हे 'घिस्सु-पिप्स! आदि उपा घियाँ प्िल्लों हुई हैं , मगर पढाव कितता ही ऊड़ा मारे, इनके भाग्य में वह्दी सुखो घास लिखी है ।","बेचारे जी तोड़कर काम करते हैं, कोई बड़ा कठिन काम आ जाता है, तो इन्हीं के सिर मढ़ा जाता है, इन्हें जरा भी आपत्ति नहीं ।","दफ्तर में इन्हें 'घिस्सू', 'पिस्सू' आदि उपाधियाँ मिली हुई हैं, मगर पड़ाव कितना ही बड़ा मारें इनके भाग्य में वही सूखी घास लिखी है ।" "यद्द विनय नहों है; स्वाधोन-मनोश्त्ति भी वहीं है, में तो इसे समय- चातुरी का अभाव कद्दतो हूँ, व्यावद्धारिक ज्ञान की क्षति कहतो हु ।","दफ्तर में इन्हें 'घिस्सू', 'पिस्सू' आदि उपाधियाँ मिली हुई हैं, मगर पड़ाव कितना ही बड़ा मारें इनके भाग्य में वही सूखी घास लिखी है ।","यह विनय नहीं है, स्वाधीन मनोवृत्ति भी नहीं है, मैं तो इसे समय-चातुरी का अभाव कहती हूँ, व्यावहारिक ज्ञान की क्षति कहती हूँ ।" "फिर जम्र मत में क्षेम द्वोता है, तो बह दफ््तरों व्यवद्दरों में भो प्रररट हो दी जाता है ।","दुनिया का काम मुरौवत और रवादारी से चलता है ! अगर हम किसी से खिंचे रहें, तो कोई कारण नहीं कि वह भी हमसे न खिंचा रहे ।","फिर जब मन में क्षोभ होता है, तो वह दफ्तरी व्यवहारों में भी प्रकट हो ही जाता है ।" "जो मातदत भफ़पर को प्रसन्त रखने सो चेश करता दे, जिसकी जात से अफपर का फोई व्यक्तिगत उपफार होता है, जिम पर वह विज्वास कर सकता दे, उसका लिट्वाण वह स्वभावत, करता है ।","फिर जब मन में क्षोभ होता है, तो वह दफ्तरी व्यवहारों में भी प्रकट हो ही जाता है ।","जो मातहत अफसर को प्रसन्न रखने की चेष्टा करता है, जिसकी जात से अफसर का कोई व्यक्तिगत उपकार होता है, जिस पर वह विश्वास कर सकता है, उसका लिहाज वह स्वभावत: करता है ।" कभी किय्नो दफ्तर में दो तोन साल पे ज़्यादा न ठिके ।,"आपने जहाँ नौकरी की, वहाँ से निकाले गये ।",कभी किसी दफ्तर में दो-तीन साल से ज्यादा न टिके । "आपके करे भाई-गतोजे द्वोते हैं, वह छमो इनकी बात भी नही पूछते, आप बराबर उनका मुंह ताढूते रहते हैं. ।",आपको कुटुंब-सेवा का दावा है ।,"आपके कई भाई-भतीजे होते हैं, वह कभी इनकी बात भी नहीं पूछते; आप बराबर उनका मुँह ताकते रहते हैं ।" इनके एक भाई घादव आानकल तद॒सीलदार हैं ।,"आपके कई भाई-भतीजे होते हैं, वह कभी इनकी बात भी नहीं पूछते; आप बराबर उनका मुँह ताकते रहते हैं ।",इनके एक भाई साहब आजकल तहसीलदार हैं । "मोटर रख लो हे, कई नौकर-चाइर हैं ; मगर यहां भूले पे भो पन्न नहीं लिखते ।",वह ठाट से रहते हैं ।,मोटर रख ली है; कई नौकर-चाकर हैं मगर यहाँ भूले से भी पत्र नहीं लिखते । "साछूप्र नहीं, पत्र में क्या लिखा, पत्र लिखा या सु चढप्ा-दे दिया ; पर रुपये न आने थे, न आये ।",जब मैंने बहुत मजबूर किया; तो आपने पत्र लिखा ।,"मालूम नहीं पत्र में क्या लिखा, पत्र लिखा या मुझे चकमा दे दिया; रुपये न आने थे, न आये ।" एक धप्ताद सौर शुजरा ; मगर जवाब नदारद्‌ ।,"आपने रुष्ट होकर कहा, अभी केवल एक सप्ताह तो खत पहुँचे हुए, अभी क्या जवाब आ सकता है ।","एक सप्ताह और गुजरा, मगर जवाब नदारद ।" "यों तो वह बराबर अपने घोड़े पर जाया करता था ; पर आज घप बढ़ो तेज़ दा दही थी, सोचा, एक्के पर चला चल ।",पाँच मील का सफर था ।,"यों तो वह बराबर अपने घोड़े पर जाया करता था; पर आज धूप बड़ी तेज हो रही थी, सोचा एक्के पर चला चलूँ ।" "महावीर को कद्दज भेजा, मुझे केते जावा ।","यों तो वह बराबर अपने घोड़े पर जाया करता था; पर आज धूप बड़ी तेज हो रही थी, सोचा एक्के पर चला चलूँ ।",महावीर को कहला भेजा मुझे लेते जाना । कौई नौ बजे परद्दाबीर ने पुकारा ।,महावीर को कहला भेजा मुझे लेते जाना ।,कोई नौ बजे महावीर ने पुकारा । "सोचता हूँ, एक्ड्रा-घोरा वेच-बाचझर आप लोगों को मजुरो कर लू, पर कोई गाइफ नहीं लगता ।",बड़ी विपत्ति में पड़ा हूँ ।,"सोचता हूँ एक्का-घोड़ा बेच-बाचकर आप लोगों की मजूरी कर लूँ, पर कोई गाहक नहीं लगता ।" आजष्ल सास-पतोद्ू दोनों घाख छोलती हैं ।,"महावीर सिर झुकाकर बोला- खेती के लिए बड़ा पौरुख चाहिए मालिक! मैंने तो यही सोचा है कि कोई गाहक लग जाय, तो एक्के को औने-पौने निकाल दूँ, फिर घास छीलकर बाजार ले जाया करूँ ।",आजकल सास-पतोहू दोनों छीलती हैं । वद्दां से घड़ी रात गये लौढतो है ।,"दोपहर तक घास छीलती है, तीसरे पहर बाजार जाती है ।",वहाँ से घड़ी रात गये लौटती है । ५ + मुन्नी ने चिंतित होकर कद्दा--अब मजूरों करके मालगण॒जारी भरवो. पढ़ेगो ।,"मुन्नी के मुख पर उदासी छायी थी, पर हल्कू प्रसन्न था ।",मुन्नी ने चिंतित होकर कहा- अब मजूरी करके मालगुजारी भरनी पड़ेगी । मोहन ने ्रतिवाद किया--यद् कामिसटिबिल पहरा देते हैं |,"रैटन! फाय फो! रात को बेचारे घूम-घूमकर पहरा देते हैं, नहीं चोरियाँ हो जायँ ।",मोहसिन ने प्रतिवाद किया—यह कानिसटिबिल पहरा देते हैं ? बीस रुपया मद्दीना पाते हैं ; लेद्वचित पचास रुपये घर भेजते हैं ।,मेरे मामू एक थाने में कानिसटिबिल हैं ।,"बीस रूपया महीना पाते हैं, लेकिन पचास रूपये घर भेजते हैं ।" अब बस्तो घनी दोने लगी थी ।,सौ तो दो थैलियों में भी न आऍं ?,अब बस्ती घनी होने लगी । ईदगाह जानेवालों कौ दोलियाँ चज़र थाने लगीं ।,अब बस्ती घनी होने लगी ।,ईदगाह जानेवालों की टोलियाँ नजर आने लगी । यह बढ़ी आमदनी की जगद्ट थी ।,पिताजी दु:खी थे ।,वह बड़ी आमदनी की जगह थी । "लड़कों से ज्ञीट उड़ा रह्दा था, वहाँ ऐसे च्र्‌ थोड़े ही होते हैं. ।","अम्माँजी भी दु:खी थीं यहाँ सब चीज सस्ती थीं, और मुहल्ले की स्त्रियों से घराव-सा हो गया था, लेकिन मैं सारे खुशी के फूला न समाता था ।","लड़कों में जीट उड़ा रहा था, वहाँ ऐसे घर थोड़े ही होते हैं ।" इतने से पन्‍ता भी भीतर से निकल आई ।,"तुम्हें सौ बार गरज हो, जाकर पूछो ।",इतने में पन्ना भी भीतर से निकल आयी । "रखू ने दांत पीसकर कट्दा- मुझे जला मत सुलिया, वहीं अच्छा न दोगा ।","मुलिया ऐंठकर बोली— हाँ, भूख क्यों लगेगी! भाइयों ने खाया, वह तुम्हारे पेट में पहुँच ही गया होगा ।","रग्घू ने दाँत पीसकर कहा— मुझे जला मत मुलिया, नहीं अच्छा न होगा ।" साँति-साँति को शकाएं मन में ठठने छगीं ।,प्रकाश सारी रात द्वार पर बैठा रहा ।,भाँति-भाँति की शंकाएँ मन में उठने लगीं । यहद्द बातें प्रकाश को उस समय क्‍यों न नज़र आई |,"उसे अब याद आया, चलते समय करूणा कितनी उदास थी; उसकी आँखें कितनी लाल थी ।",यह बातें प्रकाश को उस समय क्यों न नजर आयी ? एक अनिष्ठ के भय से श्रच्चाश रोने लगा ।,किससे पूछे ?,अनिष्ट के भय से प्रकाश रोने लगा । "उप्ने निश्चय किया, सवेरा द्ोते ही माँ को खोजने चलेगा कौर अगर**- छिी ने द्वार खटखठाया ।","प्रकाश रह-रहकर आकाश की ओर देखता था, मानो करूणा उन्हीं मेघमालाओं में छिपी बैठी हो ।","उसने निश्चय किया, सवेरा होते ही माँ को खोजने चलूँगा और अगर.... किसी ने द्वार खटखटाया ।" "प्रक्षाश् ने अधीर होकर पूछा--भम्माँ, कद्दीं चली गईं थीं ?","उसका मुख-मंडल इतना खोया हुआ, इतना करूण था, जैसे आज ही उसका सोहाग उठ गया है, जैसे संसार में अब उसके लिए कुछ नहीं रहा, जैसे वह नदी के किनारे खड़ी अपनी लदी हुई नाव को डूबते देख रही है और कुछ कर नहीं सकती ।",प्रकाश ने अधीर होकर पूछा— अम्माँ कहाँ चली गयी थीं ? इलको-सो छालिमा चेहरे पर दौढ़ गई ।,तुरन्त ही लिफाफा खोलकर पढ़ा ।,हलकी-सी लालिमा चेहरे पर दौड़ गयी । द्वार्थों में शक्ति हो न थी ।,"’ उनकी सारी कामना, सारा प्यार बालक को हृदय से लगा देने के लिए अधीर हो उठा, पर हाथ फैल न सके ।",हाथों में शक्ति ही न थी । "काफ़िर वह है, जो दुसरों का इक्क छोन के, जो गरोबों को सताये, दग्राबाज़ दो, बुदयरज़ हो ।",घंटे की आवाज में कुफ्र नहीं है ।,"काफिर वह है, जा दूसरों का हक छीन ले जो गरीबों को सताये, दगाबाज हो, खुदगरज हो ।" क्रापिद इत-बुद्धि सा खड़ा हो था कि पाहर खतरे छा बिगुद बड़ ठठा और फ्रोर्जे किसो समर-यात्रा को तेयारी करने लगों ।,"बस जा और उन बागी मुसलमानों से कह दे, अगर फौरन मुहासरा न उठा लिया गया, तो तैमूर कयामत की तरह आ पहुँचेगा ।",कासिद हतबुद्धि–सा खड़ा ही था कि बाहर खतरे का बिगुल बज उठा और फौजें किसी समर-यात्रा की तैयारी करने लगीं । "तेम्र अगर तलवार से फाम छेता चाहता है, तो उपका जवाब तब्त्रार से दिया छायगा ।",इस मुआमले पर किसी तरह का समझौता नहीं हो सकता ।,"तैमूर अगर तलवार से काम लेना चाहता है, तो उसका जवाब तलवार से दिया जायगा ।" तेमर लड़ने नहों सुरूह करने जाया है |,शाही फौज सफेद झंडा दिखा रही है ।,तैमूर लड़ने नहीं सुलह करने आया है । उधद्चा स्वागत दुघरो तरह का होगा ।,तैमूर लड़ने नहीं सुलह करने आया है ।,उसका स्वागत दूसरी तरह का होगा । हबोब घोड़े के उतरऋूर आदाव बच लाया ।,तैमूर अकेला घोड़े पर सवार चला आ रहा था ।,हबीब घोड़े से उतरकर आदाब बजा लाया । तेमर सी घोड़े पे उत्तर पढ़ा और दशोब का साथा चुम लिया और बोला--में सइ सुन चुदा हूं हरोब |,हबीब घोड़े से उतरकर आदाब बजा लाया ।,तैमूर घोड़े से उतर पड़ा और हबीब का माथा चूम लिया और बोला- मैं सब सुन चुका हूँ हबीब । तुप्ने बहुत अच्छा किया और चहो दिया जो तुम्दारे सित्रा दूसरा नद्ों कर सकता था ।,तैमूर घोड़े से उतर पड़ा और हबीब का माथा चूम लिया और बोला- मैं सब सुन चुका हूँ हबीब ।,तुमने बहुत अच्छा किया और वही किया जो तुम्हारे सिवा दूसरा नहीं कर सकता था । मुछ्ते जज़िया ेने का या इसाइयों के मज़हशे दक्त छोवमे का कोई मजाज़ न था ।,तुमने बहुत अच्छा किया और वही किया जो तुम्हारे सिवा दूसरा नहीं कर सकता था ।,मुझे जजिया लेने का या ईसाइयों से मजहबी हक छीनने का कोई मजाज न था । "में भाजञ्ञ दतबार करके इन बातों को तधदोक़ कर दंगा और तब में एक ऐवों तमबोक रख गा, को कई दिन से मेरे ज़ेहन में भा रद्दी है और मुझे उम्मोद है कि तुम उप्े सजूर कर छोगे ।",मुझे जजिया लेने का या ईसाइयों से मजहबी हक छीनने का कोई मजाज न था ।,मै आज दरबार करके इन बातों की तसदीक कर दूँगा और तब मैं एक ऐसी तजवीज बताऊँगा जो कई दिन से मेरे जेहन में आ रही है और मुझे उम्मीद है कि तुम उसे मंजूर कर लोगे । "दो साल तद उन्हें जो एक शच्य घेरे रहतौ थी, वह मिट गईं ।","लड़की उनके दबाव से मुसलमान नहीं हुई है, बल्कि स्वेच्छा से, स्वाध्याय से और ईमान से ।","दो साल तक उन्हें जो शंका घेरे रहती थी , वह मिट गयी ।" शख्र-विया और सेना सश्चालन-कलछ में वह इतनी निपुण थी और खलीफा वायज्ञीद उसके चरित्र परे इतना प्रसन्न था कि पहले द्वो पहल उसे एक- हज़ारी मन्सब मिल गया ।,यहाँ तक कि सोलहवें वर्ष में वह फौजी विद्यालय में दाखिल हो गयी और दो साल के अंदर वहाँ की सबसे ऊँची परीक्षा पास करके फौज में नौकर हो गयी ।,शस्त्र -विद्या और सेना-संचालन कला में इतनी निपुण थी और खलीफा बायजीद उसके चरित्र से इतना प्रसन्न था कि पहले ही पहल उसे एक हजारी मनसब मिल गया । उन्हें वद्द एक क्षण में मल समता है ।,इन एक लाख आदमियों की जान उसकी मुट्ठी में है ।,इन्हें वह एक क्षण में मसल सकता है । यज़दावों को तेमूर है दया या क्षमता छो आशा न थी ।,"वह अपने शब्दों में धिक्कार भरकर बोला- जिसे तुम इज्जत की जिंदगी कहते हो, वह गुनाह और जहन्नुम की जिंदगी है ।",यजदानी को तैमूर से दया या क्षमा की आशा न थी । श्रीमतीजी तो भाज रात को गाड़ी से आ रहौ हैं १ ?,"और जो हर महीने सूट बनवाते हो, तब शायद साल-भर में भी न बनवा सको ।","‘श्रीमतीजी, तो आज रात की गाड़ी से आ रही हैं ?" मेरे प्राथ चथ्कर उन्हें रिसीव करोगे न १ ?,"’ ‘हाँ, मेल से ।",मेरे साथ चलकर उन्हें रिसीव करोगे न ? "आ्धों दो रोशनी लुप्त हो गई, जेमे विश्व पर काला परदा पढ़ गया दो ।","एक बार पढ़ते ही उसका हृदय धक हो गया, साँस रूक गयी, सिर घूमने लगा ।","आँखों की रोशनी लुप्त हो गयी, जैसे विश्व पर काला परदा पड़ गया हो ।" "१- दुसरे मित्र बोले--हा, रभो-कसो लोग ऐसो दरारतें करते हैं ।",एक मित्र ने कहा- किसी शत्रु ने झूठी खबर न भेज दी हो ?,"दूसरे मित्र बोले- हाँ, कभी-कभी लोग ऐसी शरारतें करते हैं ।" ऐसी ज्री अत्याचार नहीं ' सद्द सकती ।,मुझे आज मालूम हुआ कि वह गर्विणी प्रकृति की स्त्री है और सच पूछो तो मैं उसके स्वभाव पर मुग्ध हो गया हूँ ।,ऐसी स्त्री अत्याचार नहीं सह सकती । जब दम किसी के हाथों अपना अध्षाघारण द्वित द्वोते देखते हैं. तो दम अपनों” सारी बुराइयाँ उसके सामने खोलकर रख देते हूँ ।,"गोकुल ने डरते-डरते कहा- लेकिन तुम्हें मालूम है, वह विधवा है ?","जब हम किसी के हाथों अपना असाधारण हित होते देखते हैं, तो हम अपनी सारी बुराइयाँ उसके सामने खोलकर रख देते हैं ।" "मानी विधवा द्वो नहीं, भछूत हो, उससे भी गई बीती अगर कुछ दो सकती है वह भो द्वो, फिर भो मेरे लिये वह रमणो-रल है ।",लेकिन न जानता तो भी इसका मेरे निश्चय पर कोई असर न पड़ता ।,"मानी विधवा ही नहीं, अछूत हो, उससे भी गयी-बीती अगर कुछ हो सकती है, वह भी हो, फिर भी मेरे लिये वह रमणी-रत्न, है ।" गोकुल ने कुछ शकित होकर कद्दा--और अगर म्वानी न मजूर करे ।,मैं इस गर्व का आनंद उठाना चाहता हूँ कि मैं स्वयं अपने जीवन का निर्माता हूँ ।,गोकुल ने कुछ शंकित होकर कहा- और अगर मानी न मंजूर करे ? ज्लो से क्या परदा रखता ।,अब डाक्टर को कैसे ले जाय ।,स्त्री से क्या परदा रखता । पफ्ेश्व के दुकानदार ने काग्रेस-कमेटी में जाइर चुगली खाई थो ।,उसी वक्त पिकेट करने वाले आ पहुँचे और उसे फटकारना शुरू कर दिया ।,पड़ोस के दुकानदार ने काँग्रेस कमेटी में जाकर चुगली खाई थी । देशऐे विका ने थानेदारों के रोब के साथ कद्ठा--याँ अपराध क्षप्ता नहीं दो सकता ।,फिर ऐसी खता न होगी ।,देशसेविका ने थानेदारों के रोब के साथ कहा- यों अपराध क्षमा नहीं हो सकता । ( लीलावती को गौर से देखकर ) और मरदों को साढ़ी पहनाकर भराँखों में धूछ कोक रहो हो |,जुगनू- मैं यह तिरिया-चरित्तर क्या जानूँ ।,(लीलावती को गौर से देखकर) और मरदों को साड़ी पहनाकर आँखो में धूल झोंक रही हो । "जुगनू--( उंगली चम्रकाकर ) चलिए-चलिए, छीलावती हैं |","मिसेज टंडन- क्या पागलों-सी बातें करती हो जुगनू, यह तो डाक्टर लीलावती हैं ।","जुगनू- (उँगली चमकाकर) चलिए-चलिए, लीलावती हैं ।" चारों तरफ क्रकक्रहे पढ़ने लगे ।,इसमें बात ही क्या है ! देवियों को अब यथार्थ की लालिमा दिखाई दी ।,चारों तरफ कहकहे पड़ने लगे । कई मिनट तक ह-इक् मचता रह्दा ।,"कोई तालियाँ बजाती थीं, कोई डाक्टर लीलावती की गरदन से लिपट जाती थीं; कोई मिस खुरशेद की पीठ पर थपकियाँ देती थीं ।",कई मिनट तक हू-हक मचता रहा । प्यारी खुद सुनार के घर दोइ- दौढ़ गई ।,कई दिन बाद दुलारी के कड़े बनकर आ गये ।,प्यारी खुद सुनार के घर दौड़-दौड़ गयी । "अगए गाँव सें हेठी दो गई, तो क्या ब्रात रही लोग उसी का ब्राप्र तो धरेंगे ।","वह चाहती, तो इनमें से कितने ही खर्चों को टाल जाती; पर जहाँ इज्जत की बात आ पड़ती थी, वह दिल खोलकर खर्च करती ।","अगर गाँव में हेठी हो गयी, तो क्या बात रही! लोग उसी का नाम तो धरेंगे ।" "दो-एक चोज़ों, मथुरा के पास सो थीं ; लेकिन प्यारी उनकी चौज़ें न छूतो |",दुलारी के पास भी गहने थे ।,"दो-एक चीजें मथुरा के पास भी थीं, लेकिन प्यारी उनकी चीजें न छूती ।" यो कट्दो कि राजा हैं ।,पुराने सारे कपड़े जला डाले ।,यों कहो कि राजा हैं । "दा, लड़झुपन में कई बार लह घोढ़ों पर सवार हुआ हूं ।",मैं शहसवार नहीं हूँ ।,"हाँ, लड़कपन में कई बार लद्दू घोड़ों पर सवार हुआ हूँ ।" मेंने चेहरे पर 'शिक्रव न पढ़ने दिया ।,"सवार तो हुआ, पर बोटियाँ काँप रही थीं ।",मैंने चेहरे पर शिकन न पड़ने दिया । "खेरियत यहद्द हुई कि इेख़री ने घोढ़े को तेज़ न दिया, वन्‍्ना शायद में हाथ-पाँव तुड़वाकर लौट ।",घोड़े को ईश्वरी के पीछे डाल दिया ।,"खैरियत यह हुई कि ईश्वरी ने घोड़े को तेज न किया, वरना शायद मैं हाथ-पैर तुड़वाकर लौटता ।" उसकी भंखों से जाँसू को एक बूंद भी न णाई ।,"जिस दिन उसके पिता के देहांत की सूचना मिली, उसे एक प्रकार का ईर्ष्यामय हर्ष हुआ ।",उसकी आँखों से आँसू की एक बूँद भी न आयी । "बाप के मरते डी वह घर गया कौर अपने द्विस्ते को खायशद को कूद करके, रुथ्यों की थेलो लिये हुए फिर आा गया ।","वह दिल में समझता था, सासजी मुझे अपने बेटों से भी ज्यादा चाहती हैं ।","बाप के मरते ही वह घर गया और अपने हिस्से की जायदाद को कूड़ा करके, रुपयों की थैली लिए हुए आ गया ।" "अब सूलकऋर भो उसको याद न जाती, मानों वह उप्के जीवत का कोई भीषण काढ था, लिछे भूछ जाना ही उप्के लिए धच्छा था ।",अब तक उसे कभी-कभी घर की याद आ जाती थी ।,"अब भूलकर भी उसकी याद न आती, मानो वह उसके जीवन का कोई भीषण कांड था, जिसे भूल जाना ही उसके लिए अच्छा था ।" "घह सबसे पहले उठता, सबसे ज्यादा काम करता, उसका सनोयोग, उसका परिश्रम देखकर गाँव के लोग दाँतों उँगली दबाते थे , उप्के सछुर का भाग बख ।","अब भूलकर भी उसकी याद न आती, मानो वह उसके जीवन का कोई भीषण कांड था, जिसे भूल जाना ही उसके लिए अच्छा था ।","वह सबसे पहले उठता, सबसे ज्यादा काम करता, उसका मनोयोग, उसका परिश्रम देखकर गाँव के लोग दाँतों तले उँगली दबाते थे ।" "और तो जौर, उसको स्रो ने भो आँखें फेर लीं |",इतनी उम्र इस घर में कैसे गुजरेगी ?,"और तो और, उसकी स्त्री ने भी आँखें फेर लीं ।" यह उस विपत्ति का सबसे फ र दृश्य भा |,"और तो और, उसकी स्त्री ने भी आँखें फेर लीं ।",यह उस विपत्ति का सबसे क्रूर दृश्य था । में तो यद्द रूददती हूँ कि जान रखकर काम कर ।,"प्यारी उसकी सरलता पर हॅंसकर बोली- अरे, तो मैं तुझे कुछ कह थोड़ी रही हूँ, पागल ।",मैं तो कहती हूँ कि जान रखकर काम कर । "कहीं बोधार पढ़ गया, तो लेने के देने पढ़ श्वायंगे ।",मैं तो कहती हूँ कि जान रखकर काम कर ।,"कहीं बीमार पड़ गया, तो लेने के देने पड़ जायेंगे ।" "सारे दिव तुम वहां बेठो , नहीं रह सकती ।","जोखू- तुम बहुत करोगी, दो बेर चली जाओगी ।",सारे दिन तुम वहाँ बैठी नहीं रह सकतीं । प्यारी को उम्तके निष्च्रपट व्यवद्वार ने मुग्ध कर दिय ।,सारे दिन तुम वहाँ बैठी नहीं रह सकतीं ।,प्यारी को उसके निष्कपट व्यवहार ने मुग्ध कर दिया । उतको ए% झड़ो निगाह अच्छे-अच्छें को दहला देतो थी; मगर यह बात न थो कि ज़ियाँ उप्तप्ते घृणा करतो दों ।,"जहाँ किसी महिला ने दून की ली, या शान दिखायी, वहाँ जुगनू की त्योरियाँ बदलीं ।",उसकी एक कड़ी निगाह अच्छे- अच्छे को दहला देती थी; मगर यह बात न थी कि स्त्रियाँ उससे घृणा करती हों । "नहीं, सभो बढ़े चाव से उपसे प्िलती और उसका आदर-सटकार करतों ।",उसकी एक कड़ी निगाह अच्छे- अच्छे को दहला देती थी; मगर यह बात न थी कि स्त्रियाँ उससे घृणा करती हों ।,"नहीं, सभी बड़े चाव से उससे मिलतीं और उसका आदर-सत्कार करतीं ।" अजने पढ़ोप्ियों दो निन्‍्दा सवातन से मनुष्य के लिए मनोरजन का विषय रदो है भौर जुगनू के पाप इसेझा काफी साम्तान था ।,"नहीं, सभी बड़े चाव से उससे मिलतीं और उसका आदर-सत्कार करतीं ।",अपने पड़ोसियों की निंदा सनातन से मनुष्य के लिए मनोरंजन का विषय रही है और जुगनू के पास इसका काफी सामान था । ", दील में मिस ,ख॒रशेद उप्रकी हेड भिस्ट्रेस होकर भाई थों ।",2 नगर में इंदुमती-महिला-पाठशाला नाम का एक लड़कियों का हाईस्कूल था ।,हाल में मिस खुरशेद उसकी हेड मिस्ट्रेस होकर आयी थीं । "कुछ इस तएद्ू दिल खोलकर दरेक से मिलों, कुछ ऐपा दिलवस्प बातें की कि सभो देवियाँ मुग्ध हो गई ।","पहले ही दिन मालूम हो गया, मिस खुरशेद के आने से आश्रम में एक नये जीवन का संचार होगा ।","कुछ इस तरह दिल खोलकर हरेक से मिलीं, कुछ ऐसी दिलचस्प बातें कीं, कि सभी देवियाँ मुग्ध हो गयीं ।" गाने मे भी चतुर थों ।,"कुछ इस तरह दिल खोलकर हरेक से मिलीं, कुछ ऐसी दिलचस्प बातें कीं, कि सभी देवियाँ मुग्ध हो गयीं ।",गाने में चतुर थीं । "शुहांदों गोरा रण, कोमल गाल, मइभरी भँखें, नये फशन फे कटे हुए केश, एच-ए अग संंचे में ढझा हुआ, माइकता को इससे अच्छी प्रतिमा वन बन सकतौ थी ।",ऐसी सर्वगुण-संपन्न देवी का आना आश्रम का सौभाग्य था ।,"गुलाबी गोरा रंग, कोमल गाल, मदभरी आँखें, नये फैशन के कटे हुए केश, एक-एक अंग साँचे में ढला हुआ; मादकता की इससे अच्छी प्रतिमा न बन सकती थी ।" मिसेज़ टढत ने सुधकिराकर कह्दा-यदाँ ऊपर का 'काम करने के लिए नौकर है ।,"जुगनू कई बार कमरे में आकर मिस खुरशेद को अन्वेषण की आँखों से देख चुकी थी, मानो कोई शहसवार किसी नयी घोड़ी को देख रहा हो ।",मिसेज टंडन ने मुस्कराकर कहा- यहाँ ऊपर का काम करने के लिए नौकर है । मुझे चालबाज़ भालम द्ोतो है ।,"मिस खुरशेद ने धन्यवाद देकर कहा- जी नहीं, कोई विशेष काम नहीं है ।",मुझे चालबाज मालूम होती है । इपमें कभी तरगा न पढ़ता ।,तीसवें दिन 15/- लेकर वह सजनसिंह के पास पहुँच जाती ।,इसमें कभी नागा न पड़ता । अब चारों ओर से ठस्तकों सगाई के पेय्राम आमने छगे ।,यह मानो प्रकृति का अटल नियम था ।,अब चारों ओर से उसकी सगाई के पैगाम आने लगे । सुभागी प्रही जवाब देती--अभो बह दिन नहों आया ।,"जिसके घर सुभागी जायगी, उसके भाग्य फिर जायेंगे ।","सुभागी यही जवाब देती, अभी वह दिन नहीं आया ।" "सजन०--अगर तुम्दारे मन से यह भाव है, तो में न कहूँगा ।",मेरा तो रोयाँ-रोयाँ आपका गुलाम है ।,"सजनसिंह - अगर तुम्हारे मन में यह भाव है, तो मैं न कहूँगा ।" मेंने अब तक तुमत्ते इसोलिए नहीं कद्दा झि तुम अपने को मेरा देनदार समस्त रही थीं ।,"सजनसिंह - अगर तुम्हारे मन में यह भाव है, तो मैं न कहूँगा ।","मैंने अब तक तुमसे इसलिए नहीं कहा, कि तुम अपने को मेरा देनदार समझ रही थीं ।" "सजत०-- देखो, इतकार न करना, नहीं में फिर तुम्दें अपना मुंह न दिखारँँगा ।",सुभागी - आपकी जो आज्ञा हो ।,"सजनसिंह- देखो इनकार न करना, नहीं मैं फिर तुम्हें अपना मुँह न दिखाऊँगा ।" मेरा लड़का तुम्द्दारे त्ाम का पुजारी है ।,"मैं जात-पाँत का कायल हूँ, मगर तुमने मेरे सारे बंधन तोड़ दिये ।",मेरा लड़का तुम्हारे नाम का पुजारी है । सुभागी--में तौ आपको अपना पिता समम्तती हैँ ।,सजनसिंह- तुम्हारा सम्मान भगवान कर रहे हैं बेटी ! तुम साक्षात् भगवती का अवतार हो ।,सुभागी - मैं तो आपको अपना पिता समझती हूँ । "सणनप्तिंद्द ने उसके माथे पर हाथ रखकर कद्दा--बेटी, तुम्हारा सोहाग मर हो ।",आपके हुक्म को कैसे इनकार कर सकती हूँ ।,"सजनसिंह ने उसके माथे पर हाथ रखकर कहा- बेटी, तुम्हारा सोहाग अमर हो ।" अत्र आप कपड़े उतारिए और आराम से बेठिए ।,"लेकिन मैं भी इतनी मतलबी हूँ, न तुम्हें हाथ मुँह धोने को पानी दिया, न कुछ जलपान लायी और अपना दुखड़ा ले बैठी ।",अब आप कपड़े उतारिये और आराम से बैठिये । "मुझ्ते ऐसा जान पढ़ा, उप्के मुख को शुर्रियाँ मिंट गई हैं ।","गोपा ने मुझे तिरस्कार-भरी आँखों से देखा, पर उस तिरस्कार की आड़ में घनिष्ठ आत्मीयता बैठी झाँक रही थी ।","मुझे ऐसा जान पड़ा, उसके मुख की झुर्रियाँ मिट गयी हैं ।" उपने कद्ठा--इसका फल यह द्ोगा कि तुम्दारी देवीजो तुम्दें कभो यहाँ न आने देंगो ।,पीछे मुख पर हल्की-सी लाली दौड़ गयी ।,उसने कहा-इसका फल यह होगा कि तुम्हारी देवीजी तुम्हें कभी यहाँ न आने देंगी । <८ मानसरोवर और ददास थे कि मुझे उनसे दिल्ली हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नप्रक छिद्कने का विचार ही लजास्पद जान पड़ा ।,"मुझे देखिए, मजे से खेलता भी रहा और दरजे में अव्वल भी हूँ ।",लेकिन वह इतने दु:खी और उदास थे कि मुझे उनसे दिली हमदर्दी हुई और उनके घाव पर नमक छिड़कने का विचार ही लज्जास्पद जान पड़ा । भाज़ादों से खेल-कूद में शरीक दोने लगा ।,भाई साहब का वह रोब मुझ पर न रहा ।,आजादी से खेल–कूद में शरीक होने लगा । आज-कल अग्न्नों के राज्य का विस्तार बहुत बढ़ा हुआ है ; पर इन्हें चक्रवर्ती नहीं कद्ट सकते |,ऐसे राजाओं को चक्रवर्ती कहते हैं ।,"आजकल अंग्रेजों के राज्य का विस्तार बहुत बढ़ा हुआ है, पर इन्हे चक्रवर्ती नहीं कह सकते ।" "भादमी और जो कुक चाहे करे; १र अभिम्तान न करे, इतराये नहीं ।","घमंड ने उसका नाम-निशान तक मिटा दिया, कोई उसे एक चिल्लू पानी देनेवाला भी न बचा ।","आदमी जो कुकर्म चाहे करे; पर अभिमान न करे, इतराये नहीं ।" "अभिन्मान किया, भौर दीन-दुनिया दोनों से गया ।","आदमी जो कुकर्म चाहे करे; पर अभिमान न करे, इतराये नहीं ।",अभिमान किया और दीन-दुनिया से गया । भौर् मांग-मॉगकर मर गया ।,शाहेरूम ने भी एक बार अहंकार किया था ।,भीख माँग-माँगकर मर गया । कुँभर साहब ने पूछा- केसा जो है भ्रिये |,उसने धीरे से डरते-डरते आँखें खोलीं ।,"कुँवर साहब ने पूछा,"" क़ैसा जी है प्रिये ?" में तो इतनो ऊँचाई पे ऋमो न कूइ सझ्ता ।,"तुम जीती कैसे बचीं , यह आश्चर्य है ।",मैं तो इतनी ऊँचाई से कभी न कूद सकता । घेरे में कुछ सुक्ाई न देता था ।,बन्दूक हाथ से छूटकर दूसरी तरफ गिर गयी थी ।,अँधेरे में कुछ सुझाई न देता था । "जो घर वसुधा को फाड़े खाता था, उप्र्में आाज स्राकर ऐसा धानन्द थाया, जेपे किसी डिछुड़े मित्र से मिली हो ।",दूसरे दिन प्रात:काल यहाँ से कूच हुआ ।,"जो घर वसुधा को फाड़े खाता था , उसमें आज जाकर ऐसा आनन्द आया, जैसे किसी बिछुड़े मित्र से मिली हो ।" सोचा--यद भाज कहाँ से आकर प्रिर पर सवार हो गये ।,मैंने कोई जवाब न दिया ।,"सोचा, यह आज कहाँ से आकर सिर पर सवार हो गये ।" "मोहसित--हाँ, उछल-कूद नहों सकृतों , ऊेकिन उस दिन भेरो, गाय खुल गई थी और चौधरो के खेत में जा पढ़ो थी, तो अम्माँ इतवा तेज' दोंढ़ी कि में उन्हें 5 पा सक्का, सच ।","महमूद— लेकिन दौड़ती तो नहीं, उछल-कूद तो नहीं सकतीं ।","मोहसिन— हाँ, उछल-कूद तो नहीं सकतीं; लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गयी थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी, अम्माँ इतना तेज दौड़ीं कि मैं उन्हें न पा सका, सच ।" हलवाइयों को दृकान शुरू हुईं' ।,आगे चले ।,हलवाइयों की दुकानें शुरू हुईं । हामिद ने फिर पूछा--जिन्‍्वात बहुत वढ़े-बढ़े होते होंगे ?,"अभी यहीं बैठे हैं, पाँच मिनट में कलकत्ता पहुँच जायँ ।",हामिद ने फिर पूछा— जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते हैं ? मोहत्िव--एक-एक आसप्ताव के बराबर होता है जी ! ज़मीन पर खड़ा हो जाय तो उसका सिर आप्रमाव से जा लगे ; मगर चाहे तो एक छोटे में घुस जाय ।,हामिद ने फिर पूछा— जिन्नात बहुत बड़े-बड़े होते हैं ?,"मोहसिन— एक-एक सिर आसमान के बराबर होता है जी! जमीन पर खड़ा हो जाय तो उसका सिर आसमान से जा लगे, मगर चाहे तो एक लोटे में घुस जाय ।" द्वमिद--लोग उन्हें केप्ते खुश करते होंगे ?,"मोहसिन— एक-एक सिर आसमान के बराबर होता है जी! जमीन पर खड़ा हो जाय तो उसका सिर आसमान से जा लगे, मगर चाहे तो एक लोटे में घुस जाय ।",हामिद— लोग उन्हें कैसे खुश करते होंगे ? "कोई चीज़ चोरों जाय, चौधरी साइन उप्क्ा पता लगा देंगे और चोर छा नाप भो बता देंगे ।","मोहसिन— अब यह तो मै नहीं जानता, लेकिन चौधरी साहब के काबू में बहुत-से जिन्नात हैं ।",कोई चीज चोरी जाय चौधरी साहब उसका पता लगा देंगे ओर चोर का नाम बता देंगे । भगवान्‌ ने मेरी खुन छी ।,"मैं तो डर रहा था, कहीं मेरे गले न आ पड़े ।",भगवान ने मेरी सुन ली । अब वह पिपाद्दी सम्यासी हो गया है ।,"एक टाँग से तो न चल सकता था, न बैठ सकता था ।",अब वह सिपाही संन्यासी हो गया है । अपनी जगद्ट पर बेठा-वेठा पहरा देता है ।,अब वह सिपाही संन्यासी हो गया है ।,अपनी जगह पर बैठा-बैठा पहरा देता है । 'तीन पेसे दिये ।,‘कै पैसे में ?,’ ‘तीन पैसे दिये । इतना ज़ब्त इससे हुआ कप्ते |,"बच्चे में कितना त्याग, कितना सद्‌भाव और कितना विवेक है! दूसरों को खिलौने लेते और मिठाई खाते देखकर इसका मन कितना ललचाया होगा ?",इतना जब्त इससे हुआ कैसे ? द्वासिद के इस चिसटे से भी विचिन्न ।,और अब एक बड़ी विचित्र बात हुई ।,हामिद के इस चिमटे से भी विचित्र । बुढ़िया अम्रीना बालिड़ा अमीना बन गई ।,बच्चे हामिद ने बूढ़े हामिद का पार्ट खेला था ।,बुढ़िया अमीना बालिका अमीना बन गयी । दामन फेलाइर दामिद को दुआएं देती जाती थी और भांतू को बढ़ी-बढ़ी वूं ५ गिराती जाती थी ।,वह रोने लगी ।,दामन फैलाकर हामिद को दुआएं देती जाती थी और आँसू की बड़ी-बड़ी बूँदें गिराती जाती थी । """में तो फिर भों यद्दी कहता हूँ कि कोई वेश्या है ?",' 'मेरे हृदय पर तो यह रूप अब जीवन-पर्यंत के लिए अंकित हो गया ! शायद कभी न भूल सकूँ ।,' 'मैं तो फिर यही कहता हूँ कि कोई वेश्या है । "'तो चलो, फिर दौद लगायें ।","' 'हाँ, लेकिन है कुलवधू, कुलवधू से किसी तरह की बातचीत करना मैं बेहूदगी समझता हूँ ।",' 'तो चलो फिर दौड़ लगावें । "दोनों के दांत टूटे ; पर नकढछो दांत लगाये, दोनों को आंखों पर ऐनरू ।","एक की कमर झुकी, बाल काले, शरीर स्थूल; दूसरे के बाल पके हुए, पर कमर सीधी, इकहरा शरीर ।","दोनों के दाँत टूटे; पर नकली दाँत लगाये, दोनों की आँखो पर ऐनक ।" "मेंने जद्ाँ-जहाँ प्रन्देशा भेजा, दहेज का प्रधव उठ खड़ा हुआ ओर आपने प्रत्येक अवयर पर टाँग अढ़ाई ।",उसके पहले संभव नहीं ।,मैंने जहाँ-जहाँ संदेश भेजा दहेज का प्रश्न उठ खड़ा हुआ और आपने प्रत्येक अवसर पर टाँग अड़ाई । भाप इसे निखिद समभते हैं ।,आप सदैव से इस प्रथा के विरोधी हैं ।,आप इसे निषिद्ध समझते हैं । और मज़ा यद्द है कि आपने द्वो तो यद्द अनर्थ किया और आप॑ दी मुझसे रूठ गये ।,"हाथ जोड़ती हूँ, पैरों पड़ती हूँ, गिड़गिड़ाती हूँ, लेकिन मंडप के नीचे न गये ।",और मजा यह है कि आपने ही तो यह अनर्थ किया और आप ही मुझसे रूठ गये । विवाह के परचात्‌ मद्ोनों बोल-चाल/न रहो ।,और मजा यह है कि आपने ही तो यह अनर्थ किया और आप ही मुझसे रूठ गये ।,विवाह के पश्चात् महीनों बोलचाल न रही । "वह लोग द्वाय-दहाय कर रहे हैं, फिर तो दो-चार मद्दीने में आयेपो ही, जो कुछ लेना-देता द्वो, छे लेवा ।",साइत टली जाती है ।,"वह लोग हाय-हाय कर रहे हैं, फिर तो दो-चार महीने में आयेगी ही, जो कुछ लेना-देना हो, ले लेना ।" "फामतावाथ ने सिर द्विलाते हुए कहा- भज्ी, राम भणो, संत में कोई लेख छापता नहीं, रुपये कोन दिये देता है ।",पत्रों में लेख लिखकर मेरा निर्वाह नहीं हो सकता ।,"कामतानाथ ने सिर हिलाते हुए कहा- 'अजी, राम भजो, सेंत में कोई लेख छापता नहीं, रूपये कौन देता है ।" "में जब तक किसी घन्धे से न लव जाऊं गा, विवाह का नाम भी न लगा, और सच पूछिए तो में विवाह करना द्वो चद्दीं चाइता |",अपना नाम सुनते ही बोला- 'मेरे विवाह की आप लोग चिन्ता न करें ।,"मैं जब तक किसी धंधे में न लग जाऊँगा, विवाह का नाम भी न लूँगा; और सच पूछिये तो मैं विवाह करना ही नहीं चाहता ।" भब उसे न रद्दा गया ।,पन्ना दालान में खड़ी दोनों की बातचीत सुन रही थी ।,अब उससे न रहा गया । "मानी पाषाण-मृत्ति के समान खड़ी थो, भावों वहों जम्त गई द्ो ।","किसी की समझ में न आता था, क्या माजरा है, पर मन से सब लाला को धिक्कार रहे थे ।","मानी पाषाण-मूर्ति के सामान खड़ी थी, मानो वहीं जम गयी हो ।" "माता फिर बोलौ--न जाने इन सद़ियकों को कब बुद्धि आयेगो, अब तो मरने के दिन भौ आ गये ।",मानी ने सिर ऊपर न उठाया ।,"माता फिर बोली- न जाने इन सड़ियलों को बुद्धि कब आयेगी, अब तो मरने के दिन भी आ गये ।" "यह जवाब सुनकर तीखे स्वर में बोले--तू तो(ऐसी बातें कर रद्दी है, जेपे तेरे लिए घत और अधिध्र का कोई मुल्य दो नहों ।","पिता जी ने समझा था , प्रेमा यह बखान सुनकर लट्टू हो जायगी ।",यह जवाब सुनकर तीखे स्वर में बोले — तू तो ऐसी बातें कर रही है जैसे तेरे लिए धन और अधिकार का कोई मूल्य ही नहीं । "शायद किसो दूधरे अवपर पर ये शब्द सुनझर श्रेष्ता लज्जा से सिए झुछा छैती ; - पर इस समय की दशा उस सिफद्दी की-सी थो, जिपके पीछे महरी खाई हो ।",मैं तो उसकी पूजा करूँगा ।,"शायद किसी दूसरे अवसर पर ये शब्द सुनकर प्रेमा लज्जा से सिर झुका लेती ; पर इस समय उसकी दशा उस सिपाही की सी थी , जिसके पीछे गहरी खाई हो ।" "शुमावी पुछारतो रहौ-- “खुन लो, सुत लो” ; पर उसने पीछ फिरकर भी न देखा ।",' यह कहकर वह उठा और अपने घर की ओर चला ।,"गुमानी पुकारती रही, 'सुन लो', 'सुन लो'; पर उसने पीछे फिर कर भी न देखा ।" 'उब वृक्षों को देखकर उप्तका विहल हृदय नाचमे लगा ।,"जब वह अपने गाँव की अमराइयों के सामने पहुँचा, तो उसकी मातृ-भावना उषा की सुनहरी गोद में खेल रही थी ।",उन वृक्षों को देखकर उसका विह्वल हृदय नाचने लगा । सन्दिर का घह छुनहरा छलश देखकर वह इस तरह डौढ़ा मानों एक छल्लाँग थे उप्के ऊपर जा पहुँचेगा ।,उन वृक्षों को देखकर उसका विह्वल हृदय नाचने लगा ।,मंदिर का वह सुनहरा कलश देखकर वह इस तरह दौड़ा मानो एक छलाँग में उसके ऊपर जा पहुँचेगा । वह एम पेड़ पर चढ़ गया और अघर मे भाम तोढ़-तोढ़कर खाने छगा ।,इस वायु और इस आकाश में न जाने कौन-सी संजीवनी थी जिसने उसके शोर्कात्त हृदय को बालोत्साह से भर दिया ।,वह एक पेड़ पर चढ़ गया और अधर से आम तोड़-तोड़कर खाने लगा । "साध्त के बह कठोर दब्एू, स्री का वह भिष्ठुर आघात, वह सारा अपमान उसे भल गया ।",वह एक पेड़ पर चढ़ गया और अधर से आम तोड़-तोड़कर खाने लगा ।,"सास के वह कठोर शब्द, स्त्री का वह निष्ठुर आघात, वह सारा अपमान वह भूल गया ।" "बार-बार बच्चे को गले लगाती, और गधन्न दोतो ।","पति के लिए धोतियों का नया जोड़ा लायी थी, नये कुरते बनवाये थे, बच्चे के लिए नये कोट और टोपी की आयोजना की थी ।",बार-बार बच्चे को गले लगाती ओर प्रसन्न होती । "कंड के खरे कष्ट बालक को तोतलो वातों में सूल जायेगे, उसड्नो एछ सरल, पवित्र, मोद्दक दृष्टि हृदय की सारो व्यवाओं को घो ढालेगी |","वह सोचती— जब मैं बालक को उनके सामने ले जाऊँगी, तो वह कितने प्रसन्न होंगे! उसे देखकर पहले तो चकित हो जायेंगे, फिर गोद में उठा लेंगे और कहेंगे— करूणा, तुमने यह रत्न देकर मुझे निहाल कर दिया ।","कैद के सारे कष्ट बालक की तोतली बातों में भूल जायेंगे, उनकी एक सरल, पवित्र, मोहक दृष्टि दृदय की सारी व्यथाओं को धो डालेगी ।" "जिस समय वह द्वार पर पहुंचेंगे, 'जग्र-जयझ्ार' को ध्वनि से आक्राश गूँज उठेगा ।",वह सोच रही थी— आदित्य के साथ बहुत—से आदमी होंगे ।,"जिस समय वह द्वार पर पहुँचेगे, जय—जयकार’ की ध्वनि से आकाश गूँज उठेगा ।" "“हाँ, यद्द तो न हुभा द्धि कलसिया उठाकर भर लाते ।",’ ‘हम लोगों को आराम से बैठे देखकर जैसे मरदों को जलन होती है ।,"’ ‘हाँ, यह तो न हुआ कि कलसिया उठाकर भर लाते ।" द्ष-पाँच रुपये भी छौन-मपटदूर के दी लेतो हों ।,रोटी-कपड़ा नहीं पातीं ?,दस-पाँच रुपये भी छीन- झपटकर ले ही लेती हो । बेफ़िकर चले गये थे ।,"’ दोनों पानी भरकर चली गयीं, तो गंगी वृक्ष की छाया से निकली और कुएँ की जगत के पास आयी ।",बेफिक्रे चले गऐ थे । "द्ाय-बाये चौकन्नी दृष्टि से देखा, जेसे कोई स्रिपाद्दी रात को झजन्न्‌ के किले में सूराख कर रहा हो ।",उसने रस्सी का फंदा घड़े में डाला ।,दायें-बायें चौकन्नी दृष्टि से देखा जैसे कोई सिपाही रात को शत्रु के किले में सुराख कर रहा हो । घड़ा कुएँ के मुंद्ठ त्त भा पहुँचा ।,गंगी ने दो- चार हाथ जल्दी-जल्दी मारे ।,घड़ा कुएँ के मुँह तक आ पहुँचा । कोई बढ़ा शादफ़ोर पहलवान भी इतती तेज़ो से उसे न खींच सकता था ।,घड़ा कुएँ के मुँह तक आ पहुँचा ।,कोई बड़ा शहजोर पहलवान भी इतनी तेजी से न खींच सकता था । "वह हिन्दुस्तानी मैजिस्ट्रेट था, जिसने तुम्हारे बाबूजी को ज़रा-पी ब्रात पर तीन साल की सज़ा दे दी ।","इसके लिए स्वाधीनता के भावों का दमन करना जरूरी है; अगर कोई मजिस्ट्रेट इस नीति के विरूद्ध काम करता है, तो वह मजिस्ट्रेट न रहेगा ।","वह हिन्दुस्तानी था, जिसने तुम्हारे बाबूजी को जरा-सी बात पर तीन साल की सजा दे दी ।" "यद्ट समस्त लो कि जिस दिन तुम द्वाक्मि की कुरसी पर बेठोंगे, उच्च दिन मे तुम्हारा दिमाय द्वाकिमों का-स्ा द्वो छायमा ।","मुझे यह मंजूर है कि तुम मोटा खाकर और मोटा पहनकर देश की कुछ सेवा करो, इसके बदले कि तुम हाकिम बन जाओ और शान से जीवन बिताओ ।","यह समझ लो कि जिस दिन तुम हाकिम की कुरसी पर बैठोगे, उस दिन से तुम्हारा दिमाग हाकिमों का-सा हो जाएगा ।" "जो केदी फांसी के तझ्ते पर खड़ा सूखा जा रद्दा था कि एक क्षण में रस्घो उसको गर्देन में पढ़ेगी और वह लटकता रद्द जायगा, उसे जेसे किप्ती फ़रिइते ने गोद में ले लिया |","यजदानी पहले आतशपरस्त था, पीछे मुसलमान हो गया था; पर अभी तक कभी-कभी उसके मन में शंकाएँ उठती रहती थीं कि उसने क्यों इस्लाम कबूल किया ।","जो कैदी फाँसी के तख्ते पर खड़ा सूखा जा रहा था कि एक क्षण में रस्सी उसकी गर्दन में पड़ेगी और वह लटकता रह जायगा, उसे जैसे किसी फरिश्ते ने गोद में ले लिया ।" आज मुझे मालुम हुआ कि मेरे द्वा्ों इम्लाम को कितना लुक्कप्तान पहुँचा |,"तैमूर ने युवक के सामने जाकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसे आँखों से लगाता हुआ बोला- मेरे जवान दोस्त, तुम सचमुच खुदा के हबीब हो, मैं वह गुनाहगार हूँ, जिसने अपनी जहालत में हमेशा अपने गुनाहों को सवाब समझा, इसलिये कि मुझसे कहा जाता था, तेरी जात बेऐब है ।",आज मूझे यह मालूम हुआ कि मेरे हाथों इस्लाम को कितना नुकसान पहुँचा । तेतृए को दो दिनों से इस्तखर की कोई खबर न प्रिलो थो ।,8 आधी रात गुजर चुकी थी ।,तैमूर को दो दिनों से इस्तखर की कोई खबर न मिली थी । वहाँ के इंसाईं दला के सरकश हैं ।,और बगावत यकीनन जोर पकड़ेगी ।,वहाँ के ईसाई बला के सरकश है । "इबौब बह्दों दुआमनों में घिर गया, तो बढ़ा गजब दो जायगा ।","जब उन्हें मा लू म होगा कि तैमूर की तलवार में जंग लग गया और उसे अब महलों की जिंदगी पसंद है, तो उनकी हिम्मत दूनी हो जायगी ।","हबीब कहीं दुश्मनों से घिर गया, तो बड़ा गजब हो जायगा ।" "उस वक्त तो उसी को जोत होती है, जो इन्सानौ झून का रंग खेछे, खेता-खलिद्वानों की दोली जलाये, जड्नलों को बसाये और बर्तियों को वोराव करे ।","अमन के दिनों में तो ये बातें कौम और मुल्क को तरक्की के रास्ते पर ले जाती हैं पर जंग में , जबकि शैतानी जोश का तू्फान उठता है इन खुशियों की गुंजाइश नहीं ।","उस वक्त तो उसी की जीत होती है , जो इन्सानी खून का रंग खेले, खेतों-खलिहानों को जलाये , जंगलों को बसाये और बस्तियों को वीरान करे ।" "चेनघिद पर निगाह पड़ो, तो दोनों के प्रण सूख गये ।",खुश-खुश बात करते चले आ रहे थे ।,"चैनसिंह पर निगाह पड़ी, तो दोनों के प्राण सूख गये ।" दरामखोर को उस्तो दम तिल बाहर क्षिया ।,उनके हाथ से झाड़ू छीन कर घूरे के सिर जमा दी ।,हरामखोर को उसी दम निकाल बाहर किया । आप फरमाने रंगे “उसका अददोना तो चुछआ दो |,हरामखोर को उसी दम निकाल बाहर किया ।,आप फरमाने लगे उसका महीना तो चुका दो । "में न होतो, तो शायद इन्हें अब तन किसी ने बाज़ार में बेच लिया होता |",ऐसे-ऐसे भोंदू भी संसार में पड़े हुए हैं ।,"मैं न होती, तो शायद अब तक इन्हें किसी ने बाजार में बेच दिया होता ।" फिर इस साल जाड़ों के छपड़े बनवाने को नौबत न आई ।,"आपका वस्त्रालय एक बकची में आ जायगा, जो डाक के पारसल से कहीं भेजा जा सकता है ।",फिर इस साल जाड़ों के कपड़े बनवाने की नौबत न आयी । "जब तक सम्ताज का यह संशव्न रहेगा, ऐपो शिकायतें पेदा दोतो रहेंगी |",लेकिन मेरे या आपके पास खेद के सिवा इसका और क्या इलाज है ।,"जब तक समाज का यह संगठन रहेगा, ऐसी शिकायतें पैदा होती रहेंगी ।" "में इतनी <इनष्यील नहीं हूँ कि दूसरों को खिलाकर आप सो १६, देवता के पास यही एक कोट था ।",मेरी देह में आग लग गयी ।,"इतनी दानशील नहीं हूँ कि दूसरों को खिलाकर आप सो रहूँ, देवता के पास यही एक कोट था ।" "छोई हँसता है, तो छेऐे, आपको बला से |","फटे-पुराने कपड़े पहनते आपको जरा भी संकोच नहीं होता; मैं तो मारे लाज के गड़ जाती हूँ, पर आपको जरा फिक्र नहीं ।","कोई हँसता है, तो हँसे, आपकी बला से ।" "समझता आप द्वों-आप अच्छा द्वो जायगा ; मगर कमजोरी बढ़ने लगो, तो दवा को फिक्र हुईं ।",पहले कुछ परवाह न की ।,"समझा आप ही आप अच्छा हो जायगा, मगर कमजोरी बढ़ने लगी, तो दवा की फिक्र हुई ।" "उनके मुख पर, काला चुगा, नीचे सफेद अचकन, अचकन के सामने फी जेब में घड़ी को सुनहरी ज़ज्जीर, एक हाथ में कानून का पोथा लिये हुए ।",नूरे को वकील से प्रेम है ।,"कैसी विद्वमता है उसके मुख पर! काला चोगा, नीचे सफेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में कानून का पोथा लिये हुए ।" "मालम होता है, अभी किसी अक्षल्द से जिरद था बद्दस किये चले आ रहे हैं ।","कैसी विद्वमता है उसके मुख पर! काला चोगा, नीचे सफेद अचकन, अचकन के सामने की जेब में घड़ी, सुनहरी जंजीर, एक हाथ में कानून का पोथा लिये हुए ।","मालूम होता है, अभी किसी अदालत से जिरह या बहस किये चले आ रहे हैं ।" ज़रा पानी पढ़े तो सारा रग धुछू जाय ।,खिलौना कहीं हाथ से छूट पड़े तो चूर-चूर हो जाय ।,जरा पानी पड़े तो सारा रंग घुल जाय । "ऐसे खिलीने हेकर बह क्या करेगा, किस काम के ] मोहप्रिन कद्दता ह-- मेरा भिश्ती रोज़ पानी ठे जायगा ; साँम्क-सवेरे ।",जरा पानी पड़े तो सारा रंग घुल जाय ।,ऐसे खिलौने लेकर वह क्या करेगा; किस काम के! मोहसिन कहता है— मेरा भिश्ती रोज पानी दे जायगा साँझ-सबेरे । "उसके हाथ भनायात्र ही लपकते हैं ; छेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते, विशेषक्षर जब अभी नया शौक दे ।","हामिद खिलौनों की निंदा करता है— मिट्टी ही के तो हैं, गिरें तो चकनाचूर हो जायँ, लेकिन ललचाई हुई आँखों से खिलौनों को देख रहा है और चाहता है कि जरा देर के लिए उन्हें हाथ में ले सकता ।","उसके हाथ अनायास ही लपकते हैं, लेकिन लड़के इतने त्यागी नहीं होते हैं, विशेषकर जब अभी नया शौक है ।" "मोहसिन कद्ता है-- दामिद, यह रेठढ़ी छे जा, कितनों .खुशबूदार है ! द्वामिद को सन्देह हुआ, यह कैवल कर विनोद है, मोहसिन इतना उदार नहीं है; कछेकिन यद्द जानकर भी वह उसके पास जाता है ।",ललचायी आँखों से सबकी ओर देखता है ।,"मोहसिन कहता है— हामिद रेवड़ी ले जा, कितनी खुशबूदार है! हामिद को संदेह हुआ, ये केवल क्रूर विनोद है, मोहसिन इतना उदार नहीं है, लेकिन यह जानकर भी वह उसके पास जाता है ।" "बाएते में जता भो देर त होने पाये, कहों कुचर साहब वाराज़ न हो भाये, बिछावव ठीक समय पर लग जाय, कु वर साइव के सोने का समय था गया ।",भीतर से बाहर तक मेरी धाक थी ।,"नाश्ते में जरा भी देर न होने पाये, कहीं कुँवर साहब नाराज न हो जायें; बिछावन ठीक समय पर लग जाय, कुँवर साहब के सोने का समय आ गया ।" कोई साढ़े ग्यारद्द पजे महरा थाया ।,कुँवर जो ठहरा ।,कोई साढ़े ग्यारह बजे महरा आया । बढ़ा मुँइ-लगा नौदझर था ।,कोई साढ़े ग्यारह बजे महरा आया ।,बड़ा मुँहलगा नौकर था । "अब जो याद आई, तो यागा हुवा आाया ।",घर के धंधों में मेरा बिस्तर लगाने की उसे सुधि ही न रही ।,"अब जो याद आयी, तो भागा हुआ आया ।" "देवयोग से उस्ची वक्त मुन्शी रियासत अलो था निऊले, ।","जी उधर लगा हुआ था, पर लैम्प नदारद ।",दैवयोग से उसी वक्त मुंशी रियासत अली आ निकले । रियासत अलो ने छांपते हुए द्वार्थों ऐे लेम्प 'लला दिया ।,मेरे यहाँ घंटे-भर निर्वाह न हो ।,रियासत अली ने काँपते हुए हाथों से लैम्प जला दिया । "जेपे लगाम से मुखबद्ध, बोक्त से लदा हुआ, दाँकनेवाले को चाबुऋ से पोड़ित, दौड़ते-दौढते बेदम तुरंग द्विनद्विनाने की आवाज़ सुनकर कनौतियाँ खही कर लेता है और परिस्थिति को भूलकर एक दद्वी हुई ह्विनद्विताइट से उसछा जवाब देता है कुछ वहो दशा प्यारौ को हुई ।",कितना स्वर्गीय आनंद था! प्यारी की तृषित लालसा एक क्षण के लिए स्वामिनी को भूल गयी ।,"जैसे लगाम से मुखबद्ध, बोझ से लदा हुआ, हाँकने वाले के चाबुक से पीड़ित, दौड़ते-दौड़ते बेदम तुरंग हिनहिनाने की आवाज सुनकर कनौतियाँ खड़ी कर लेता है और परिस्थिति को भूलकर एक दबी हुई हिनहिनाहट से उसका जवाब देता है, कुछ वही दशा प्यारी की हुई ।" मथधुरा--बातों- में तुमप्ते कोई न जौतेगा ।,"उपज बनिये की नहीं होती, किसान की होती है ।",मथुरा- बातों में तुमसे कोई न जीतेगा । "- दुलारी- मेरा लड़छा पढे-लिखेगा, कोई बढ़ा हु पायेगा ।","मेरा लड़का बड़ा हो जायगा, तो मैं द्वार पर बैठकर मजे से हुक्का पिया करूँगा ।","दुलारी- मेरा लड़का पढ़े-लिखेगा, कोई बड़ा हुद्दा पाएगा ।" कु्भां थोड़े दो प्यासे के पास आता हैं ।,जुगनू ने विरक्त भाव से कहा- प्यासा ही तो कुएँ के पास जाता है ।,कुआँ थोड़े ही प्यासे के पास आता है । मुझे आग में मकर आप दूर हट गईं ।,कुआँ थोड़े ही प्यासे के पास आता है ।,मुझे आग में झोंककर आप दूर हट गयीं । "म्रि० टंडन ने उत्छुछता से छह्ा--क्या हुआ क्‍या, कुछ कह्दो तो ?","भगवान ने मेरी रक्षा की, नहीं कल जान ही गयी थी ।","मिसेज टंडन ने उत्सुकता से कहा- क्या, हुआ क्या, कुछ कहो तो ?" मुम्हे तुमने छग! क्यों न ल्या ?,"मिसेज टंडन ने उत्सुकता से कहा- क्या, हुआ क्या, कुछ कहो तो ?",मुझे तुमने जगा क्यों न लिया ? लाल आँखें निकाछे आया और मुझसे कद्दा--निरूछ जा ।,"' 'वह नहीं मारने दौड़ीं, उनका वह खसम है, वह मारने दौड़ा ।","लाल आँखें निकाले आया और मुझसे कहा, निकल जा ।" "जब तक में निकल-निदले, तब तक इंटर खाँचकर दौठ़ ही तो पढ़ा ।","लाल आँखें निकाले आया और मुझसे कहा, निकल जा ।","जब तक मैं निकलूँ, तब तक हंटर खींचकर दौड़ ही तो पड़ा ।" और चह्द राढ़ बंठी तमाशा देखतो रहदो ।,मैं सिर पर पाँव रखकर न भागती तो चमड़ा उधोड़ डालता ।,और वह राँड बैठी तमाशा देखती रही । मि्तेज़ पण्ड्या ने समर्थन किया--दम आश्रय को आदर्श से ग्रिराना नहों चाहते ।,आप लोग इस प्रश्न पर विचार करें ।,मिसेज पांडया ने समर्थन किया- हम आश्रम को आदर्श से गिराना नहीं चाहते । "उनसे साफ़ कह देना चाहिए, आप यहाँ तशरीफ्र न छायगे ।","मिसेज बाँगड़ा ने फरमाया- जुगनूबाई ने ठीक कहा था, ऐसी औरत का मुँह देखना भी पाप है ।","उससे साफ कह देना चाहिए, आप यहाँ तशरीफ न लावें ।" अभी यही ख्िचढ़ी १७ रही थी कि आश्रम्त के सामने एक मोटर आकर यहो ।,"उससे साफ कह देना चाहिए, आप यहाँ तशरीफ न लावें ।",अभी यह खिचड़ी पक रही थी कि आश्रम के सामने एक मोटर आकर रुकी । "महिलाओं ने सिर उठा-उठाकर देखा, गाह़ी में मिस ख़रहोद और विलियम किक” घठे हैं ।",अभी यह खिचड़ी पक रही थी कि आश्रम के सामने एक मोटर आकर रुकी ।,"महिलाओं ने सिर उठा-उठाकर देखा, गाड़ी में मिस खुरशेद और विलियम किंग बैठे हुए थे ।" "हं सज-धज, नित्य नई अदा, और चचल तो इस गजब ढो हैं, मानों अगों में रक्त को जगह पारा भर दिया हो ।",इन महरियों को तो बनाव-सिंगार के सिवा दूसरा काम ही नहीं ।,"नित्य नयी सज-धाज, नित्य नयी अदा और चंचल तो इस गजब की हैं; मानो अंगों में रक्त की जगह पारा भर दिया हो ।" उनका चम्कना और मटकना और मुस्ध्राना देखकर 'ग्रद्विणियाँ लज्जित दो जातो हैं और ऐसो दोदादिलेर हैं कि ज़बरदस्तो घरों में घुप्त पढ़ती हैं ।,"नित्य नयी सज-धाज, नित्य नयी अदा और चंचल तो इस गजब की हैं; मानो अंगों में रक्त की जगह पारा भर दिया हो ।",उनका चमकना और मटकना और मुस्कराना देखकर गृहिणियाँ लज्जित हो जाती हैं और ऐसी दीदा-दिलेर हैं कि जबरदस्ती घरों में घुस पड़ती हैं । इध्तौलिए शरीफ़ज़ादियाँ बहुत कम शहरों में जाती हैं ।,असली बात तो यह है कि गृहदेवियों का रंग फीका करने में इन्हें आनंद आता है ।,इसलिए शरीफजादियाँ बहुत कम शहरों में आती हैं । "क्या जानता था, अपना तम्नावा अपने द्वी सुँद्द पर पढ़ेगा ।",मैंने सिर पीट लिया ।,"क्या जानता था, अपना तमाचा अपने ही मुँह पर पड़ेगा ।" "आपके पुँह पर तो आपको प्रशात्ता करना ,खुशामद होगी ; पर जो सजनता मैंने आप में देखो, वद फह्दीं नहों पाई ।",' 'इसकी कोई आवश्यकता नहीं है देवीजी ।,"' 'आपके मुँह पर तो आपकी प्रशंसा करना खुशामद होगी, पर जो सज्जनता मैंने आप में देखी, वह कहीं नहीं पायी ।" उठ्ठे भी शोप्र हो जापकी सेवा में भैजूंगी ।,मैंने एक ड्रामा भी लिखना शुरू कर दिया है ।,उसे भी शीघ्र ही आपकी सेवा में भेजूँगी । "कई बार उन्हें मतलो आ गई, जेसे एक दज़ार गधे कार्नों के पास खड़े अपना चर अलाप रहे हाँ ।","शर्माजी को ऐसा मालूम होने लगा, जैसे कोई भिगो-भिगोकर जूते मार रहा है ।","कई बार उन्हें मतली आ गयी, जैसे एक हजार गधे कानों के पास खड़े अपना स्वर अलाप रहे हों ।" "बोढे-- आपकी रचनाओं का वया कहना, आप यह सभ्ह यहाँ छोड़ जायें ।",आखिर न रहा गया ।,"बोले- आपकी रचनाओं का क्या कहना, आप यह संग्रह यहीं छोड़ जायें ।" "में अवकाश में पढ़, गा ।","बोले- आपकी रचनाओं का क्या कहना, आप यह संग्रह यहीं छोड़ जायें ।",मैं अवकाश में पढ़ूँगा । कामाक्षी ने दयाद्र होकर ऋद्धा--आप इतना दु्बेर स्वास्थ्य दोने पर भो इतने - व्यस्त रहते हैं ?,इस समय तो बहुत-सा काम है ।,कामाक्षी ने दयार्द्र होकर कहा- आप इतना दुर्बल स्वास्थ्य होने पर भी इतने व्यस्त रहते हैं ? मानी की गदत शर्म से झुछ गई ।,तुम्हें स्वीकार है ?,मानी की गर्दन शर्म से झुक गयी । "गोकुल ने अवद्ो खीकचइर कहा --देखो, मानी यह चुप रहने छा समय नहीं है ।","मानी के हृदय में एक वेग उठ रहा था, मगर मुँह से आवाज न निकली ।","गोकुल ने अबकी खीझकर कहा- देखो मानी, यह चुप रहने का समय नहीं है ।" 'और था छहाँ इतना दिन 2 ?,"इंद्रनाथ ने हाथ-मुँह धोते हुए कहा- मैंने तो कहा था, चलो, लेकिन डर के मारे नहीं आते ।",‘और था कहाँ इतने दिन ? "“कहते थे, देह्वातों में घूमता रद्दा ।",‘और था कहाँ इतने दिन ?,"’ ‘कहते थे, देहातों में घूमता रहा ।" ” ' (तो क्या तुम छकेछे बंबई से जाये हो १ ?,"’ ‘कहते थे, देहातों में घूमता रहा ।",‘ ‘तो क्या तुम अकेले बंबई से आये हो ? भत्र मेरा अपराध क्षप्रा कोजिए ।,आज घर चला आया ।,अब मेरा अपराध क्षमा कीजिए । फिर पतन्न उञाकर पढ़ने लगी --- ध्पाप्ती जब यह पत्र आपके हाथों में पहुँचेगा तब तद में 'इस ससार पे बिदा हो जाऊंगी ।,गोकुल की माता कई मिनट तक मर्माहत-सी बैठी जमीन की ओर ताकती रही ! शोक और उससे अधिक पश्चाताप ने सिर को दबा रखा था ।,"फिर पत्र उठाकर पढ़ने लगी- ‘स्वामी’ जब यह पत्र आपके हाथों में पहुँचेगा, तब तक मैं इस संसार से विदा हो जाऊँगी ।" बरामदे में बंशोधर निस्पद खड़े थे भौर मानी लण्णानत उनके सामने खहीं थी ।,‘ माताजी ने पत्र रख दिया और आँखों से आँसू बहने लगे ।,बरामदे में वंशीधर निस्पंद खड़े थे और जैसे मानी लज्जानत उनके सामने खड़ी थी । और पन्ने भौ पूरे फुल्धकेप के -भाकर के ।,"मगर नहीं, आपको चार पन्ने रंगने पड़ेंगे, चाहे जैसे लिखिए ।","और पन्ने, भी पूरे फुलस्केप आकार के ।" संक्षेप में तो चार पन्ने हुए; नहीं शायद सौ-दो-सौ पन्ने लिख- वाते |,"समय की पाबंदी पर संक्षेप में एक निबंध लिखो, जो चार पन्नों से कम न हो ।","ठीक! संक्षेप में चार पन्ने हुए, नहीं शायद सौ-दो सौ पन्ने लिखवाते ।" "जो कुछ कद्दता हूँ, उसे गिरह बाँघिए, नहीं पछताइएगा ।","लाख फेल हो गया हूँ, लेकिन तुमसे बड़ा हूँ, संसार का मुझे तुमसे ज्यादा अनुभव है ।","जो कुछ कहता हूँ, उसे गिरह बाँधिए नहीं पछताइयेगा ।" भोजन आज पुरे निरस्वाद-सा लग रद्दा था ।,"स्कूल का समय निकट था, नहीं ईश्वर जाने, यह उपदेश-माला कब समाप्त होती ।",भोजन आज मुझे निःस्वाद-सा लग रहा था । "सुन्नो को वह ऐसे घर में ब्याहना चादतो थी, जदाँ वह रानी बनकर रहे ।",लेकिन गोपा के मन में बात जम गयी थी ।,"सुन्नी को वह ऐसे घर में चाहती थी, जहाँ वह रानी बनकर रहे ।" "बोले--भाई साहब, में देव- नाथजीसे परिचित हूँ ।","किसी समय वह लोभी रहे होंगे, इस समय तो मैंने उन्हें बहुत ही सहृदय उदार और विनयशील पाया ।","बोले भाई साहब, मैं देवनाथ जी से परिचित हूँ ।" पगली इस अम में पढ़ी हुईं थी कि उसका यद्द ठत्साद्द नगर में अपनी यादगार छोड़ जायगा |,गोपा ने अपनी कुल मर्यादा का न जाने कितना महान आदर्श अपने सामने रख लिया था ।,पगली इस भ्रम में पड़ी हुई थी कि उसका उत्साह नगर में अपनी यादगार छोड़ जायेगा । वद्द इसे कर्ज़ सम कती थी; पर देनेवाके दान सम्रकर देते थे ।,"मुहल्ले में ऐसा बिरला ही कोई संपन्न मनुष्य होगा, जिससे उसने कुछ कर्ज न लिया हो ।","वह इसे कर्ज समझती थी, पर देने वाले दान समझकर देते थे ।" उपने मजूरो ने एऊ-एप पता काट -कपटकर तने क्पमे-शुम्भल के लिए जमा छिये थे ।,हल्कू ने रुपये लिये और इस तरह बाहर चला मानो अपना हृदय निकालकर देने जा रहा हो ।,उसने मजूरी से एक-एक पैसा काट-कपटकर तीन रुपये कम्मल के लिए जमा किये थे । हल्कू अरे खेत के किनारे ऊच्च के पत्तों को एक छतरी के नीचे बॉस के खटोह़ै पर पतन पुरानी याढ़े को चादर ओोढे पढ़ा काँप रह्दा था ।,2 पूस की अंधेरी रात ! आकाश पर तारे भी ठिठुरते हुए मालूम होते थे ।,हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पतों की एक छतरी के नीचे बाँस के खटोले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर ओढ़े पड़ा काँप रहा था । खाट के नीचे उप्तद़ा संगी कुत्ता जबरा ऐट में मुँह ढाछे सदी से कू-कूँ कर रहा था ।,हल्कू अपने खेत के किनारे ऊख के पतों की एक छतरी के नीचे बाँस के खटोले पर अपनी पुरानी गाढ़े की चादर ओढ़े पड़ा काँप रहा था ।,खाट के नीचे उसका संगी कुत्ता जबरा पेट मे मुँह डाले सर्दी से कूँ-कूँ कर रहा था । "जानते ये, में यहाँ दलरशा-पूरे खाने आ रहा हूँ, दोड़े-दौरे सागे-आगे चले भाये ।","अब खाओ ठंड, मैं क्या करूँ ?","जानते थे, मै यहाँ हलुवा-पूरी खाने आ रहा हूँ, दौड़े-दौड़े आगे-आगे चले आये ।" जबरा ने पढ़े-पढ़े दुम दिलाई और अपनो कूँ-कूँ को दोघे बनाता हुआ एक बार जम्हाद लेशऋर सुपर दो गया ।,अब रोओ नानी के नाम को ।,जबरा ने पड़े-पड़े दुम हिलायी और अपनी कूँ-कूँ को दीर्घ बनाता हुआ एक बार जम्हाई लेकर चुप हो गया । "उपडो शान-बुद्धि ने शायद ताह लिया, स्वाप्ती को मेरी कु-कूँ से नींद नहों भा रद्दो है ।",जबरा ने पड़े-पड़े दुम हिलायी और अपनी कूँ-कूँ को दीर्घ बनाता हुआ एक बार जम्हाई लेकर चुप हो गया ।,"उसकी श्वान-बुध्दि ने शायद ताड़ लिया, स्वामी को मेरी कूँ-कूँ से नींद नहीं आ रही है ।" "हूँ, फिर एक चिलप भरक्ष ।",यह राँड पछुआ न जाने कहाँ से बरफ लिए आ रही है ।,"उठूँ, फिर एक चिलम भरूँ ।" "मोटे-मोटे गदह, लिदाफ, कम्मेक ।","यह खेती का मजा है ! और एक-एक भगवान ऐसे पड़े हैं, जिनके पास जाड़ा जाय तो गरमी से घबड़ाकर भागे ।","मोटे-मोटे गद्दे, लिहाफ- कम्मल ।" जयदेव ने वीं जुस्खा आज़॒माया और उसकी जोत दो गई |,मैं हाथ जोड़ने लगता हूँ घिघियाने लगता हूँ और कभी-कभी रोने भी लगता हूँ ।,जयदेव ने वही नुस्खा आजमाया और उसकी जीत हो गयी । 'उंतके मक्खोचूसपने को सकढ़ों दो दन्‍्तकथाएँ नमर में “प्रचलित हैं ।,"संधि की वही शर्त ठहरी कि मैं चुपके से झाँकी देखने चला चलूँ 3 सेठ घूरेलाल उन आदमियों में हैं, जिनका प्रात: को नाम ले लो, तो दिन-भर भोजन न मिले ।",उनके मक्खीचूसपने की सैकड़ों ही दंतकथाएँ नगर में प्रचलित हैं । मारवादी उन्‍्दीं के देश का था ।,"सेठ जी भी अड़ गये कि भिक्षा न दूँगा, चाहे कुछ हो ।",मारवाड़ी उन्हीं के देश का था । तब सेठणी पसोजे और उप्तको क्रिया इतनों धूम-धाम से की कि बहुत कम्र किसी ने की दोगो ।,सारा दिन द्वार पर बे-दाना-पानी पड़ा रहा और अंत में वहीं मर गया ।,तब सेठ जी पसीजे और उसकी क्रिया इतनी धूम-धाम से की कि बहुत कम किसी ने की होगी । "अपने घर हो आदमो इप्रीडिए तो छाता-छोपता दे, कि उससे वर्खा-वूं दी में बचाव हो ।","जब मैं उसके लिए इतना करती हूँ , तो मजाल है, कि वह मुझे आँख दिखाये ।","अपने घर को आदमी इसलिए तो छाता-छोपता है , कि उससे बर्खा-बूँदी में बचाव हो ।" क्यों किप्रो को धौंध सहूँ सरकार |,"फिर किसी दिन झगड़ा किया , तो या वही रहेगा, या मैं ही रहूँगी ।",क्यों किसी की धौंस सहूँ सरकार ? उसको चालाढड़ो पर लोग दांतों अंगुली दबाते थे ।,अभी पिछली रात को वह एक सोते हुए आदमी को खेत में मचान पर से खींचकर ले भागा था ।,उसकी चालाकी पर लोग दाँतों तले अँगुली दबाये थे । इपो मानुष-सक्षो चोते की घात में दोनों शिकारी षेठे हुए घे ।,एक झटके में वह अभागा आदमी नीचे आ रहा ।,इसी मानस-भक्षी चीते की घात में दोनों शिकारी बैठे हुए थे । तुम्हारी गोलो को नौबत दो न आने पावेसों ।,"'ज्यों ही भैसे पर आया, मैं उसका काम तमाम कर दूँगा ।",तुम्हारी गोली की नौबत ही न आने पावेगी । तोसरे दिन दोनों महाश्ञर्यों के पत्र भाये ।,"पिताजी जंगल के महकमे में अच्छे पद पर थे; पर सारा दिन गुजर गया, तार का जवाब नदारद! दूसरे दिन भी कोई जवाब नहीं ।",तीसरे दिन दोनों महाशयों के पत्र आये । "ससुरबी ने लिछा---आश्ा थो, तुम छोग छुढ़ापे में मेरा पालन करोगे ।",दोनों जामे से बाहर थे ।,"ससुरजी ने लिखा - आशा थी, तुम लोग बुढ़ापे में मेरा पालन करोगे ।" मेरे परों में तो नारीत्व को बेढ़ियाँ पढ़ो हुईं थीं ।,"अगर कोई मर्द होती, तो कांग्रेस के आश्रम में चली जाती, या कोई मजूरी कर लेती ।",मेरे पैरों में नारीत्व की बेड़ियाँ पड़ी हुई थीं । "भपनी जाव कौ फिक्र न थी , पर चारौट को ओर किसो की आँख भी न उठनी चाद्विए ।","अपनी रक्षा की इतनी चिंता न थी, जितनी अपने नारीत्व की रक्षा की ।",अपनी जान की फिक्र न थी; पर नारीत्व की ओर किसी की आँख भी न उठनी चाहिए । "जिषका जी चाहे, खड़ा हो |",आम रास्ता है ।,जिसका जी चाहे खड़ा हो । "जुगनू एक कुर्सी का तकिया पशड़छर खड़ो-खढ़ी बोदो--कुशल है मिस साहब [ मेंने छद्य, आपको आसिखाद दे आऊँ ।",आपके आश्रम में तो सब कुशल है ?,"जुगनू एक कुरसी का तकिया पकड़कर खड़ी-खड़ी बोली- कुशल है मिस साहब ! मैंने कहा, आपको आसीरबाद दे आऊँ ।" ; जुगनू में मातृ-भाव से प्िर दिलाकर कद्धा-यह ठौक है मिस साहब ; पर अपना अपवा द्वो है ।,"मिस खुरशेद- मुझे अपने स्कूल की लड़कियों के साथ बड़ा आनंद मिलता है, वह सब मेरी ही लड़कियाँ हैं ।","जुगनू ने मातृ-भाव से सिर हिलाकर कहा- यह ठीक है मिस साहब, पर अपना, अपना ही है ।" "म्िष्ठ ख॒रशेद ने इस तरह दौद़कर प्रेम से उसका असभिवादन दिया, मार्नों जमे में फूलो न समातों हों ।","दूसरा अपना हो जाय, तो अपनों के लिए कोई क्यों रोये ! सहसा एक सुंदर सजीला युवक रेशमी सूट धारण किये जूते चरमर करता हुआ अंदर आया ।","मिस खुरशेद ने इस तरह दौड़कर प्रेम से उसका अभिवादन किया, मानो जामे में फूली न समाती हों ।" "( जुगनू से ) माँगो, भाप जायें, फिर कभो आना ।",जुगनू उसे देखकर कोने में दुबक गयी ! खुरशेद ने युवक से गले मिलकर कहा- प्यारे ! मैं कब से तुम्हारी राह देख रही हूँ ।,"(जुगनू से) माँजी, आप जायें फिर कभी आना ।" डप्तो चूमा-चाटी तो जोरू-खपम में नदों दोतो ।,जुगनू- दोनों इस तरह टूटकर गले मिले हैं कि मैं तो लाज के मारे गड़ गयी ।,ऐसा चूमा-चाटी तो जोरू-खसम में नहीं होती । लड़के पहले हो से उस पर जा घेठे ।,दस बजते-बजते द्वार पर बैलगाड़ी आ गयी ।,लड़के पहले ही से उस पर जा बैठे । "उसका हलवाद्दा जोख्य्‌ बार-बार आकर कद्दता -'मालकिम, उठो, मुँद-हाय घोओ, कुछ खाभो-पियो ।","न घर से निकली, न चूल्हा जलाया, न हाथ-मुँह धोया ।","उसका हलवाहा जोखू बार-बार आकर कहता - ‘मालकिन, उठो, मुँह-हाथ धोओ, कुछ खाओ-पियो ।" कब तक इस तरह पढ़ी गहोगी ४ ?,"उसका हलवाहा जोखू बार-बार आकर कहता - ‘मालकिन, उठो, मुँह-हाथ धोओ, कुछ खाओ-पियो ।",कब तक इस तरह पड़ी रहोगी । उस्ते इस समय सहानुभूति को भूख वो ।,"यहाँ मेरे पीछे क्यों पड़ा हुआ है, मगर उसे झिड़क देने को जी न चाहता था ।",उसे उस समय सहानुभूति की भूख थी । बढ़ो बहू इन वस्तुर्भा को स्वामिनी-साव से सँभाल-सेभालकर रख रद्दो थी ।,"संबंधियों के यहाँ के नेवते में शक्कर, मिठाई, दही, अचार आदि आ रहे थे ।",बड़ी बहू इन वस्तुओं को स्वामिनी-भाव से सँभाल-सँभालकर रख रही थी । दआा पढ़ा भो न रहने देगी या और पानी चाहिए ?,हरिधन ने पड़े-पड़े कहा- क्या है ?,क्या पड़ा भी न रहने देगी या और पानी चाहिए । "इरिधित ने ममद्वित दोकर छहा--हाँ अम्माँ, मेरी भूछ थी कि में यद्ी समस्त रहा था ।","तुमसे बेटी ब्याही है, कुछ तुम्हारी जिंदगी का ठीका नहीं लिखा है ।","हरिधन ने मर्माहत होकर कहा- हाँ अम्माँ, मेरी भूल थी कि मैं यही समझ रहा था ।" ") २२३७ 8) दच्चों के लिए बाप एक फ़ालतू-यो चीज़--एक विलास की वस्तु--है, णेप्ते घोड़े के लिए चने या बाबुरओ के लिए मोहनभोग ।",बूढ़ी सास भी मुँह फुलाकर भीतर चली गयी ।,"2 बच्चों के लिए बाप एक फालतू-सी चीज - एक विलास की वस्तु है, जैसे घोड़े के लिए चने या बाबुओं के लिए मोहनभोग ।" "में इगलेड से आकर भो तो छेवा काये कर सकञ्ता हूँ, और भम्माँ, सच पूछो, तो एक मेजिस्टेट अपने देश का जितवा उपचार कर सकता है, उतना एक दज़ार स्वय- सेवछ मिलकर भी नहों कर सछते ।","प्रकाश— तो आप समझती हैं, स्वयंसेवक बन जाना ही जाति-सेवा है ?","मैं इंग्लैंड से आकर भी तो सेवा-कार्य कर सकता हूँ और अम्माँ, सच पूछो, तो एक मजिस्ट्रेट अपने देश का जितना उपकार कर सकता है, उतना एक हजार स्वयंसेवक मिलकर भी नहीं कर सकते ।" "में तो सिविछ सर्विस की परीक्षा में घेढ गा, और झुझे विश्वास है कि सफल द्वो जाऊंगा ।","मैं इंग्लैंड से आकर भी तो सेवा-कार्य कर सकता हूँ और अम्माँ, सच पूछो, तो एक मजिस्ट्रेट अपने देश का जितना उपकार कर सकता है, उतना एक हजार स्वयंसेवक मिलकर भी नहीं कर सकते ।",मैं तो सिविल सर्विस की परीक्षा में बैठूँगा और मुझे विश्वास है कि सफल हो जाऊँगा । गइना की मनकार से घर गूंज रद्दा है ।,सबेरे से ही मेहमानों का आना शुरू हो गया है ।,गहनों की झनकार से घर गूँज रहा है । वद्द मुसक्रिती हुई कमरे में घुसी ।,"अभी कल जो बालिका थी, उसे आज वधू वेश में देखने की इच्छा न रोक सकी ।",वह मुस्कराती हुई कमरे में घुसी । "निप्चके नाम से दुनिया कॉपतो है, वद उसके सामने एक दयनोयं प्रार्थी बना हुआ उससे गअ्रक्राश को भिक्षा माँग रहा है |",उसका कोमल हृ दय तैमूर की इस करूण आत्मग्लानि पर द्रवित हो गया ।,"जिसके नाम से दुनिया काँपती है, वह उसके सामने एक दयनीय प्राणी बना हुआ उससे प्रकाश की भी क्षा माँग रहा है ।" "' तेमूर ने पूछा--क्यों १ ह “इसलिए कि जहाँ दौलत फ़्यादा दोतौ है, वहाँ डाके पढ़ते हैं और जहां क्रद्र ज्यादा द्ोती है, वहाँ दुश्मन भो ज़्यादा होते हैं |","उसने मुग्ध कंठ से कहा- हजूर इस गुलाम की इतनी कद्र करते है, यह मेरी खुशनसीबी है, लेकिन मेरा शाही महल में रहना मुनासिब नहीं ।","तैमूर ने पूछा– क्यों ‘इसलिये कि जहाँ दौलत ज्यादा होती है, वहाँ डाके पड़ते हैं और जहाँ कद्र ज्यादा होती है , वहाँ दुश्मन भी ज्यादा होते है ।" "'आदमो का घबसे बढ़ा दुइ्सन ग्रहर' है, इस वाक्य को मन-द्ो मन दोहराकर रखने कद्ा--तुम मेरे क्राबू में कमी न आओगे हबोब ।",उसे अपनी मनःतुष्टि का आभास हुआ ।,आदमी का सबसे बड़ा दुश्मन गरूर है इस वाक्य को मन-ही-मन दोहरा कर उसने कहा- तुम मेरे काबू में कभी न आओगे हबीब । "रूघू कभी इसे मताता, कभी उसे ; पर न यद्द उठती, न वह ।",मुलिया ने कुछ नहीं खाया और पन्ना भी भूखी रही ।,"रग्घू कभी इसे मनाता, कभी उसे;पर न यह उठती, न वह ।" "आखिर रूखू ने हैरान दोकर मुलिया से पूछा--कुछ सह से तो कह, तू चाहती कया है ?","रग्घू कभी इसे मनाता, कभी उसे;पर न यह उठती, न वह ।","आखिर रग्घू ने हैरान होकर मुलिया से पूछा— कुछ मुँह से तो कह, चाहती क्या है ?" "रखू-- अच्छा उठ, बना-खा ।","मुलिया ने धरती को सम्बोधित करके कहा— मैं कुछ नहीं चाहती, मुझे मेरे घर पहुँचा दो ।","रग्घू— अच्छा उठ, बना-खा ।" मुल्या ने रु्घू की ओर भाँखें उठाई' ।,पहुँचा दूँगा ।,मुलिया ने रग्घू की ओर आँखें उठायी । "एम्र० ए०, बी० ए० न सही, यज- मानों से अच्छो आमदनी है ।",उमा ने प्रसन्न होकर कहा- बहुत अच्छे ।,"एम.ए., बी.ए. न सही, यजमानों से अच्छी आमदनी है ।" बीस इज़ार में तो चार-दिस्तेदार हों और दस इफ्तार के गदने अम्माँ के पास रद्द जायेँ ।,स्त्रीधन पर उनका पूरा अधिकार है!’ ‘यह कानूनी गोरखधंधे हैं ।,बीस हजार में तो चार हिस्सेदार हों और दस हजार के गहने अम्माँ के पास रह जायें । उसानाथ ने खिसियकर कद्दा--गद्ने दस हज़ार से कम के न दोंगे ।,"कामतानाथ ने सिर हिलाकर कहा- भाई, मैं इन चालों को पसंद नहीं करता ।",उमानाथ ने खिसियाकर कहा- गहने दस हजार से कम के न होंगे । कहों बोघार न पड़ जाव ।,लू में सब मारे-मारे फिरेंगे ।,कहीं बीमार न पड़ जायँ । फूलमतो निर्मम भाव से बोली--में बोमार न पढ़ें गी ।,कहीं बीमार न पड़ जाओ ।,फूलमती निर्मम भाव से बोली- मैं बीमार न पडूँगी । ह ह उम्रानाथ भी वहीं बेठा हुआ था ।,मुझे भगवान् ने अमर कर दिया है ।,उमानाथ भी वहीं बैठा हुआ था । "गद्ठा बढ़ी हुईं थी, जेसे समुद्र दो |","बोला- जाने भी दो भैया! बहुत दिनों बहुओं पर राज कर चुकी हैं, उसका प्रायश्चित तो करने दो ।","गंगा बढ़ी हुई थी, जैसे समुद्र हो ।" "दो-चार भादमो दौढ़े भी; लेकिन फूलमती लहरों में समा गई थी, उन बल खातो हुईं छद्रों में, जिन्हें देखकर हो द्वदय काँफ उठता था ।","किनारे पर दो-चार पंडे चिल्लाए- ‘अरे दौड़ो, बुढ़िया डूबी जाती है ।","’ दो-चार आदमी दौड़े भी लेकिन फूलमती लहरों में समा गयी थी, उन बल खाती हुई लहरों में, जिन्हें देखकर ही हृदय काँप उठता था ।" - ४ ' उसने छड्ौढ़ी से कहा--सुमने आकर यह बातु न कही थी ।,प्रधान जी के कथन में कितना सत्य था; यह उससे छिपा न रहा ।,उसने छकौड़ी से कहा- तुमने आकर यह बात न कही थी । तुमने घील तोड़रूर यद्ट आफ़त सिर ली ।,"सड़ जायें, कोई परवाह नहीं ।",तुमने सील तोड़कर यह आफत सिर ली । ”' ' है आपने एक नथ सिद्धान्त निकाल दे कि दण्ड देने से लड़के खराब दो जाते हैं ।,"लाओ, तुम्हारा गला सहला दूँ ।",' आपने एक नया सिद्धांत निकाला है कि दंड देने से लड़के खराब हो जाते हैं । "उन पर किसी तरद्ट का बन्धव, शासन या दबाव थे धोना चाहिए ।",आपके विचार से लड़कों को आजाद रहना चाहिए ।,"उन पर किसी तरह का बंधन, शासन या दबाव न होना चाहिए ।" श्राताःकाल से लकों को लेकर बे नाते थे ।,खून पी जाते ।,प्रात:काल से लड़कों को लेकर बैठ जाते थे । कभो-क्ती आप स्रींग फ्टा/कर बछढ़े बन णाते हैं ।,यह नहीं कि आप तो अखबार पढ़ा करें और लड़के गली-गली भटकते फिरें ।,कभी-कभी आप सींग कटाकर बछड़े बन जाते हैं । "मेंने दिल में कद्ां--चढो, गह्ते छूटे ।","अब प्रतिदिन पत्र लिखा करना, मैं एक न सुनूँगी और सीधे चली आऊँगी ।","मैंने दिल में कहा, चलो, सस्ते छूटे ।" जूते और एक: बाबू के ठह्े |,"अचकन है, वह एक साहब के पास है, कोट और दूसरे साहब ले गये ।",जूते और एक बाबू ले उड़े । में वद्दी रहो कोट भौर वद्दी चमरौधा जूता पहनकर द्ततर जाता हूँ ।,जूते और एक बाबू ले उड़े ।,मैं वही रद्दी कोट और वही चमरौधा जूता पहनकर दफ्तर जाता हूँ । शर्माजी ने आराम की साँच की और उस पोधे को उठाकर रही में ढाल दिया और जले हुए दिल से आप-द्दी-आप कद्दा--इईइवर न करें कि फिर तुम्दारे दशत हों ।,निराश होकर कामाक्षी देवी विदा हुईं और शीघ्र ही फिर आने का वादा कर गयीं ।,"शर्माजी ने आराम की साँस ली और उस पोथे को उठाकर रद्दी में डाल दिया, और जले हुए दिल से आप-ही-आप कहा- ईश्वर न करे कि फिर तुम्हारे दर्शन हों ।" "- “खेर चलो, कहदों रलॉँकी देखने चलते दो ?",हाथ न खाली होगा ।,"’ ‘खैर चलो, कहीं झाँकी देखने चलते हो ?" सेठ:घुरेलाल के-मन्दिर में' ऐप्तो झाँकी बनी है कि देखते हो बनता 'है ।,"’ ‘खैर चलो, कहीं झाँकी देखने चलते हो ?",सेठ घूरेमल के मंदिर में ऐसी झाँकी बनी है कि देखते ही बनता है । ", घिंदासन के ठोक सामने ऐसा, फौवारा लगाग़ा है , कि उसमें से शुलाबजल को फुटटरें:निकलती. हैं ।",ऐसे-ऐसे शीशे और बिजली के सामान सजाये हैं कि आँखें झपक उठती हैं ।,सिंहासन के ठीक सामने ऐसा फौवारा लगाया है कि उसमें से गुलाबजल की फुहारें निकलती हैं । सीधे तुम्दारे पास दौड़ा आ रद्दा हूँ ।,मेरा तो चोला मस्त हो गया ।,सीधे तुम्हारे पास दौड़ा चला आ रहा हूँ । माघ-पूस को रात द्वार में कत्ते कटेगी ।,"पीछे फिरकर बोली- तीन ही तो रुपये हैं, दे दोगे तो कम्मल कहाँ से आवेगा ?",माघ-पूस की रात हार में कैसे कटेगी ? "मुन्नी उसके पास से दूर हट गई और आंखें तरेतरी हुई बोढौ--कर जुके दूसरा उपान ! जरा स॒नूँ, कौन उपाय करोगे ?",कम्मल के लिए कोई दूसरा उपाय सोचूँगा ।,मुन्नी उसके पास से दूर हट गयी और आँखें तरेरती हुई बोली- कर चुके दूसरा उपाय ! जरा सुनूँ तो कौन-सा उपाय करोगे ? में रुपये न दंगो-न दूँगौ ।,ऐसी खेती से बाज आये ।,"मैं रुपये न दूँगी, न दूँगी ।" मगर यदद कहने के साथ ही उसकी तनौ हुई भौंदें ढोलो पढ़ गई' ।,"मुन्नी ने तड़पकर कहा- गाली क्यों देगा, क्या उसका राज है ?",मगर यह कहने के साथ ही उसकी तनी हुई भौहें ढीली पड़ गयीं । "इल्कू के उम् वाक्य में जो कठोर सत्य था, वद्द मार्नां एक भौषण जंतु की भाँति उसे घर रद्दा था ।",मगर यह कहने के साथ ही उसकी तनी हुई भौहें ढीली पड़ गयीं ।,"हल्कू के उस वाक्य में जो कठोर सत्य था, वह मानो एक भीषण जंतु की भाँति उसे घूर रहा था ।" चसुधा ने थकन से पलंग पर लेटते हुए कहा--अब में भी शिक्वर खेलने चल थी ।,""" जब शिकारी सब खालें लेकर चला गया , तो कुँवर साहब ने कहा, मैं इस खाल पर काले ऊन से अपना समर्पण लिखूँगा ।","वसुधा ने थकान से पलंग पर लेटते हुए कहा , अब मैं भी शिकार खेलने चलूँगी ।" उस दिन से जब देखा वृक्षों को छाँद. में खड़ी निशाने का अभ्यास कर रही है. और 'कुअए साइब खड़े उसकी परोक्षा लेरहे हैं ।,कुँवर साहब ने शुभ मुहूर्त में उसे दीक्षा दी ।,"उस दिन से जब देखो , वृक्षों की छांह में खड़ी निशाने का अभ्यास कर रही है, और कुँवर साहब खड़े उसकी परीक्षा ले रहे हैं ।" "जिस दिन ठसने पहली चिड़िया मारो, कुँभर साहब हे से ठठल पढ़े ।","उस दिन से जब देखो , वृक्षों की छांह में खड़ी निशाने का अभ्यास कर रही है, और कुँवर साहब खड़े उसकी परीक्षा ले रहे हैं ।","जिस दिन उसने पहली चिड़िया मारी , कुँवर साहब हर्ष से उछल पड़े ।" ", इस आनन्द को शुभ र्ति में से पक्षी की ममी बनाकर रखौ गई ।",नौकरों को इनाम दिये ; ब्राह्मणों को दान दिया गया ।,इस आनन्द की शुभ-स्मृति में उस पक्षी की ममी बनाकर रखी गयी । "अब दूसरी नाव वह कहाँ से लद््वाये ; अगर वह नाव डूबी है, तो उसके साथ ही वह भी दब जायगी ।","जीवन में जब आशा ही लुप्त हो गयी , तो अब अन्धकार के सिवा और क्या रहा! अपने हृदय की सारी सम्पत्ति लगाकर उसने एक नाव लदवायी थी , वह नाव जलमग्न हो गयी ।",अब दूसरी नाव कौन वहाँ से लदवाये ; अगर वह नाव टूटी है तो उसके साथ वह भी डूब जायगी । भ्रभात को सुनदरो किरणे उसके पीले मुख को-जीवन की आाभा अदान कर रदी थीं ।,"मगर सबेरा हुआ , तो उसके कमरे में उसकी लाश पड़ी हुई थी ।",प्रभात की सुनहरी किरणें उसके पीले मुख को जीवन की आभा प्रदान कर रही थीं । "कया कझू, अगर किसी तरह का विश्न पढ़ गया, तो किसडी पदतामों होगी ?","अब और जीकर क्या करूँगी, सोचो ।","क्या करूँ, अगर किसी तरह का विघ्न पड़ गया तो किसकी बदनामी होगी ।" "नींद दो नहों भातो , पर मेरा चित्त प्रसन्त है ।",इन चार महीनों में मुश्किल से घंटा भर सोती हूँगी ।,"नींद ही नहीं आती, पर मेरा चित्त प्रसन्न है ।" "एक देवी ने आकर कदा--बहन, ज़रा चहुझर देख लो, चाशनी ठौक हो गई है या नदों ।","मदारीलाल ने अपनी सज्जनता दिखाई, तो मुझे भी तो अपनी नाक रखनी है ।","एक देवी ने आकर कहा - बहन, जरा चलकर देख लो, चाशनी ठीक हो गयी है या नहीं ।" "तुमहे ज़रा बात करने लगी, उधर चादनी इतनी छड़ी हो गई कि लट॒इ दातों से लड़ेंगे ।","गोपा उसके साथ चाशनी की परीक्षा करने गयी और एक क्षण के बाद आकर बोली- जी चाहता है, सिर पीट लूँ ।","तुमसे जरा बात करने लगी, उधर चाशनी इतनी कड़ी हो गयी कि लडडू दाँतों से लड़ेंगे ।" अपने पास होने को खुशी आधो हो गई ।,"नतीजा सुनाया गया, तो वह रो पड़े और मैं भी रोने लगा ।",अपने पास होने वाली खुशी आधी हो गयी । अबको भाई साहब बहुत कुछ नम पढ़ गये ये ।,"मुझे उस वक्त अप्रिय लगता है अवश्य, मगर यह शायद उनके उपदेशों का ही असर हो कि मैं दनादन पास होता जाता हूँ और इतने अच्छे नंबरों से ।",अब भाई साहब बहुत कुछ नर्म पड़ गये थे । "मसाँछा देता, कने बाँधवा, पतंग-ट्रनामेंट की तेयारियाँ भादि समस्याएँ सब शुप्त रूप से हल की जाती थों ।","मुझे कनकौए उड़ाने का नया शौक पैदा हो गया था और अब सारा समय पतंगबाजी की ही भेंट होता था, फिर भी मैं भाई साहब का अदब करता था, और उनकी नजर बचाकर कनकौए उड़ाता था ।","माँझा देना, कन्ने बाँधना, पतंग टूर्नामेंट की तैयारियाँ आदि समस्याथएँ अब गुप्तौ रूप से हल की जाती थीं ।" "जाँखें आसमान को ओर थीं और मन उस भाकाशगाप्तों पथिक को और, जो सनन्‍्द गति से झम्तता पतन को भोर चला था रहा था, मार्नो कोई भात्मा स्वर्ग से तिकलकर विरक्त सन से नये संस्झार ग्रहण करने जा रदही दो ।",एक दिन संध्या समय होस्टल से दूर मैं एक कनकौआ लूटने बेतहाशा दौड़ा जा रहा था ।,"आँखें आसमान की ओर थीं और मन उस आकाशगामी पथिक की ओर, जो मंद गति से झूमता पतन की ओर चला जा रहा था, मानो कोई आत्मा स्वर्ग से निकलकर विरक्त मन से नये संस्कार ग्रहण करने जा रही हो ।" तेमर उप्े इस सुद्दिम् पर नहीं भेजना चाहता ; लेकिन हृषीब के आग्रह के सामने बेबस है ।,वह शांतिमय उपायों से इस विद्रोह को ठंडा करके तैमूर को दिखाना चाहता है कि सद्भावना में कितनी शक्ति है ।,तैमूर उसे इस मुहिम पर नहीं भेजना चाहता लेकिन हबीब के आग्रह के सामने बेबस है । "में नहीं कह सद्चता इवोष, तुमसे मेंने कितना पाया ।","मेरे जैसे लुटेरे हमेशा पैदा होते रहेंगे , लेकिन खुदा न करे, तुम्हारे दुश्मनों को कुछ हो गया, तो यह सल्तनत खाक में मिल जायगी, और तब मुझे भी सीने में खंजर चुभा लेने के सिवा और कोई रास्ता न रहेगा ।",मै नहीं कह सकता हबीब तुमसे मैंने कितना पाया । "तमूर ने दाढ़ो पर द्वाथ रखकर कद्दा--जंसी तुम्दारी मरी, छेकित रोज़ाना क्रादिद भेजते रहना, वरना शायद में बेचेन होकर चला भार्ऊँ ।",हबीब ने धड़कते हुए हृदय से कहा- अगर मैं आपकी जरूरत समझूँगा तो इत्तला दू ं गा ।,"तैमूर ने दाढ़ी पर हाथ रखकर कहा- जैसी तुम्हारी मर्जी लेकिन रोजाना कासिद भेजते रहना, वरना शायद मैं बेचैन होकर चला आऊँ ।" तेमूर ने कितनी मुदृब्जत से दृदोब के सफर को तैयारियां को ।,"तैमूर ने दाढ़ी पर हाथ रखकर कहा- जैसी तुम्हारी मर्जी लेकिन रोजाना कासिद भेजते रहना, वरना शायद मैं बेचैन होकर चला आऊँ ।",तैमूर ने कितनी मुहब्बत से हबीब के सफर की तैयारियाँ की । तरह-तरह के जाराम और तदत्छुफ की चोजें उसके लिए ज्ता को ।,तैमूर ने कितनी मुहब्बत से हबीब के सफर की तैयारियाँ की ।,तरह-तरह के आराम और तकल्लुफ की चीजें उसके लिये जमा कीं । मेरे प्राण घन दृपकड़ियों से जकड़े हुए लाये गये ।,कमरे के बाहर सारे नगर की राजनैतिक चेतना किसी बंदी पशु की भाँति खड़ी चीत्कार कर रही थी ।,मेरे प्राणधन हथकड़ियों से जकड़े हुए लाये गये । "चह अदालत, कुरसों पर बेठा हुआ अओेज़ अफपर, छाल ज़रोदार पयड़िया बंध हुए पुलोस के कर्मचारी, सब मेरी आँखों में तुच्छ जान पढ़ते थे ।",ओह इतना गर्व मुझे कभी नहीं हुआ था ।,"वह अदालत, कुरसी पर बैठा हुआ अंग्रेज अफसर, लाल जरीदार पगड़ियाँ बांधे हुए पुलिस के कर्मचारी सब मेरी आँखो में तुच्छ जान पड़ते थे ।" "घार-बार जी में लाता था, दौद़कर जीवनघन के चरणों से लिपट जाऊं और उसो दशा में प्राण (पा दूँ. ।","वह अदालत, कुरसी पर बैठा हुआ अंग्रेज अफसर, लाल जरीदार पगड़ियाँ बांधे हुए पुलिस के कर्मचारी सब मेरी आँखो में तुच्छ जान पड़ते थे ।","बार-बार जी में आता था, दौड़कर जीवन-धन के चरणों में लिपट जाऊँ और उसी दशा में प्राण त्याग दूँ ।" "कितनी शान्त, अविचबिति, तेज और स्वामिमान हे श्रद्मीम्त मूति थो |","बार-बार जी में आता था, दौड़कर जीवन-धन के चरणों में लिपट जाऊँ और उसी दशा में प्राण त्याग दूँ ।","कितनी शांत, अविचलित, तेज और स्वाभिमान से प्रदीप्त मूर्ति थी ।" "करुणा ने लिखा, तुम सिघ व गये, इसका सुझे खेद है ।",चलते समय उसने बीमारी का बहाना कर दिया ।,"करूणा ने लिखा, तुम सिन्ध न गये, इसका मुझे दुख है ।" फूलमतो दका-बक्का होकर उसका सुद्द ताकने लगी ।,’ ‘है क्यों नहीं; लेकिन अपना हानि-लाभ तो हम समझते हैं ?,’ फूलमती हक्की-बक्की होकर उसका मुँह ताकने लगी । उन्हें क्रिसी-त झिसो काम में फेस्ाये रखो ।,बच्चे तो स्वभाव के चंचल होते हैं ।,उन्हें किसी-न-किसी काम में फॅंसाये रखो । "ज्यॉ-ज्यों सम्य निकट भांता था, उसी इत्तियाँ (शथिल द्वोतो जातो थीं ।",यह सोचकर उसका हृदय काँप जाता था ।,"ज्यों-ज्यों समय निकट आता था, उसकी वृत्तियाँ शिथिल होती जातीं थीं ।" "मन को सम्रका रद्दी थो, वद्दध लोग अपने दोते तो क्या इप्त तरह चले जाते ?",कभी अवसर पाकर एकांत में जाकर थोड़ा-सा रो आती थी ।,"मन को समझा रही थी, यह लोग अपने होते तो क्या इस तरह चले जाते ।" "और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभो किताब के द्वाशियों पर चिढ़ियों, कुर्तों, बिहियों को तस्वीरें बनाया करते थे ।",वह स्वभाव से बड़े अघ्ययनशील थे ।,"हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिड़ियों, कुत्तों, बिल्लियों की तस्वीरें बनाया करते थे ।" उनको रचनाओं को प्रमस्तता मेरे लिए छोठा मुंह बढ़ी बात थो ।,"वह नवीं जमात में थे, मैं पाँचवी में ।",उनकी रचनाओं को समझना मेरे लिए छोटा मुँह बड़ी बात थी । वेश्या अगर बेशभ न दो तो वेश्या नहीं |,'लेकिन वेश्याएँ भी तो इस तरह बेशर्मी नहीं करतीं ।,' 'वेश्या अगर बेशर्म न हो तो वेश्या नहीं । "*हो सकता है, घर से रूवकर आई हो ।",' 'कुलवधू पार्क में सोने आयेगी ?,"' 'हो सकता है, घर से रूठकर आयी हो ?" बचलकर पूछ ही क्यो न लें ?,"' 'हो सकता है, घर से रूठकर आयी हो ?",' 'चलकर पूछ ही क्यों न लें । 'मिडकने को कोई बात भी हो ।,' 'और जो कहीं झिड़क दे ?,' 'झिड़कने की कोई बात भी हो । थाघों रात हुई और चोर चोर ! लेना लेना की आवाजें आने लगों |,"चोरियाँ तो इस कसरत से होती हैं कि अगर कोई रात कुशल से बीत जाय, तो देवताओं की मनौती की जाती है ।",आधी रात हुई और 'चोर-चोर ! लेना-लेना !' की आवाजें आने लगीं । "श्रोमान्‌ जी लड़कों को कतकौवा वड़ाने' को शिक्षा दे रहे घे--यों घुमाओ, पो गोता दो, था खाँचो, यों ढोल दो ।",और क्या कहूँ; एक दिन तो हद ही हो गयी ।,"श्रीमानजी लड़कों को कनकौवा उड़ाने की शिक्षा दे रहे थे यों घुमाओ, यों गोता दो, यों खींचो, यों ढील दो ।" "ऐपा तन-मत से सिद्वा रहे थे, मानों शुद्र मन्त्र दे रहे हों ।","श्रीमानजी लड़कों को कनकौवा उड़ाने की शिक्षा दे रहे थे यों घुमाओ, यों गोता दो, यों खींचो, यों ढील दो ।",ऐसा तन-मन से सिखा रहे थे मानो गुरु-मंत्र दे रहे हों । "आप इन्हें सुधार नहों सकते, तो कम्त-पे-झम बवियाडिए मत ।",बुरी-बुरी आदतें न सिखाइए ।,"आप उन्हें सुधार नहीं सकते, तो कम-से-कम बिगाड़िए मत ।" "में घादती हूँ, एक बार यद्द भी यरम पढ़ें, तो अपना चण्डोरप दिखाऊँ ; पर यह इतना छल्द दब जाते हैं कि में द्वार जातो हूँ ।",लगे बगलें झाँकने ।,"मैं चाहती हूँ, एक बार यह भी गरम पड़ें, तो अपना चंडी रूप दिखाऊँ, पर यह इतना जल्द दब जाते हैं कि मैं हार जाती हूँ ।" "लड़का ब्विर पटककर सर जाय $ मगर ज़रा भी न पस्ोजते थे और इन अद्दात्माजी का यह हाल दे. कि एक-एक से पूछकर मेले ले जाते हैं---चलो, चलो, वां वढ़ो बार है, खूब आतशबानियाँ छुटेगी, ग्रुब्मरे उड़ेंगे, विलायतो चरजियाँ भी हैं ।",पिताजी किसी लड़के को मेले-तमाशे न ले जाते थे ।,"लड़का सिर पटककर मर जाय, मगर जरा भी न पसीजते थे और इन महात्माजी का यह हाल है कि एक-एक से पूछकर मेले ले जाते हैं चलो, चलो, वहाँ बड़ी बहार है, खूब आतिशबाजियाँ छूटेंगी, गुब्बारे उड़ेंगे, विलायती चर्खियाँ भी हैं ।" "और तो और, आप लड़कों को द्वाो खेलने से भो नहीं रोदते ।",उन पर मजे से बैठना ।,"और तो और, आप लड़कों को हाकी खेलने से भी नहीं रोकते ।" "यह अग्नेज्ञो खेल भो द्धितने जानलेवा होते हैं, क्रिकेट, फुटबाल, द्वायो, एक से एक घातक ।","और तो और, आप लड़कों को हाकी खेलने से भी नहीं रोकते ।","यह अंग्रेजी खेल भी कितने जानलेवा होते हैं, क्रिकेट, फुटबाल, हाकी एक-से-एक घातक ।" "गेंद रूम जाय तो जान लेकर हो छोड़े , पर आपको इद्र सभी खेलों से प्रेम है ।","यह अंग्रेजी खेल भी कितने जानलेवा होते हैं, क्रिकेट, फुटबाल, हाकी एक-से-एक घातक ।",गेंद लग जाय तो जान लेकर ही छोड़े; पर आपको इन सभी खेलों से प्रेम है । क्या उपना कोमल फूल-सा गात इप्त योग्य था कि प्रिर पर घाप्त छो टोकरी रखरर बेचने जाती ?,"मालूम नहीं, चमारों के इस घर में वह अप्सरा कहाँ से आ गयी थी ।",क्या उसका कोमल फूल-सा गात इस योग्य था कि सर पर घास की टोकरी रखकर बेचने जाती ? "वद्द घाम्त लिये निछुलतो, तो ऐसा मालप्र द्ोता, मानों उषा का प्रकाश, सुनहरे आवरण पे र॒जित, अपनी छठा बिखेश्ता जाता ही ।","उस गाँव में भी ऐसे लोग मौजूद थे, जो उसके तलवे के नीचे आँखें बिछाते थे, उसकी एक चितवन के लिए तरसते थे, जिनसे अगर वह एक शब्द भी बोलती, तो निहाल हो जाते; लेकिन उसे आये साल-भर से अधिक हो गया, किसी ने उसे युवकों की तरफ ताकते या बातें करते नहीं देखा ।","वह घास लिये निकलती, तो ऐसा मालूम होता, मानो उषा का प्रकाश, सुनहरे आवरण में रंजित, अपनी छटा बिखेरता जाता हो ।" "कोई ग्रज़लें गाता, कोई छाती पर द्वाथ रखता , पर मुल्या अपनी नौची से किये अपनी राद्द चली जाती ।","वह घास लिये निकलती, तो ऐसा मालूम होता, मानो उषा का प्रकाश, सुनहरे आवरण में रंजित, अपनी छटा बिखेरता जाता हो ।","कोई गजलें गाता, कोई छाती पर हाथ रखता; पर मुलिया नीची आँख किये अपनी राह चली जाती ।" "मुसलमानों ने उन्हें परास्त करके वहाँ अपना अधिकार जमा लिया था और ऐसे नियम बना दिये थे, जिससे ईसाइयों को पग पग पर अपनी पराघीनता का स्मरण होता रहता था ।","जिस वक्त हबीब फौज के साथ चला, तो सारा समरकंद उसके साथ था और तैमूर आँखों पर रूमाल रखे, अपने तख्त पर ऐसा सिर झुकाये बैठा था, मानो कोई पक्षी आहत हो गया हो ।","7 इस्तखर अरमनी ईसाईयों का इलाका था, मुसलमानों ने उन्हें परास्त करके वहाँ अपना अधिकार जमा लिया था और ऐसे नियम बना दिये थे, जिससे ईसाइयों को पग-पग अपनी पराधीनता का स्मरण होता रहता था ।" उसने पंग्म्बरी का दावा तो नहीं किया ; पर उसके मन में यह भावना हृढ़ हो गईं थो ; इसलिए जब आज एक युवक ने प्रार्णा का मोह छोड़कर उसझो गति का परदा खोल दिया तो उपकी चेतना जंसे. जाय उठो ।,उसे विश्वास हो गया था कि खुदा ने इस्लाम को जगाने और सुधारने के लिये ही उसे दुनिया में भेजा है ।,"उसने पैगंबरी का दावा तो नहीं किया, पर उसके मन में यह भावना दृढ़ हो गयी थी; इसलिये जब आज एक युवक ने प्राणों का मोह छोड़कर उसकी कीर्ति का परदा खोल दिया, तो उसकी चेतना जैसे जाग उठी ।" उप्को सधार-बिनयिवी शक्ति के सामने यह दुधमुं हवा बालक मार्नों अण्मे नन्‍्हे-न॑न्हें द्वाों से समुद्र के प्रवाह को रोकने के लिए खढ़ा हो ।,उसकी आँखों का एक इशारा इस युवक की जिंदगी का चिराग गुल कर सकता था ।,उसकी संसार विजयिनी शक्ति के सामने यह दुधमुँहा बालक मानो अपने नन्हे- नन्हे हाथों से समुद्र के प्रवाह को रोकने के लिये खड़ा हो । तुम्र आन द्वी रजिस्ट्रार साहम को पतन्न लिफ दो ।,मैं तो जब जानती कि तुम्हारे मन में आप-ही-आप सेवा का भाव उत्पन्न होता ।,तुम आज ही रजिस्ट्रार साहब को पत्र लिख दो । रघ्सों के साथ घढ़ा घढ़ाम से पानो से गिस जौर कह क्षद तक पानी में इल्छोरे को आवाज़ें सुनाई देती रहों ।,गंगी के हाथ से रस्सी छूट गयी ।,रस्सी के साथ घड़ा धड़ाम से पानी में गिरा और कई क्षण तक पानी में हिलकोरे की आवाजें सुनाई देती रहीं । "उच्तका प्रिर झुका हुआ था, करुणा उसका चेद्दरा न देख सकती थी ; लेकिन चाल-ढाल से छोई बूढ़ा आदमी मालुम द्वोता था; पर एऋ क्षण में जब वह सम्नीप आ गया, तो करुणा उसे पहचान गई ।",पग-पग पर रूककर खाँसने लगता थी ।,"उसका सिर झुका हुआ था, करणा उसका चेहरा न देख सकती थी, लेकिन चाल-ढाल से कोई बूढ़ा आदमी मालूम होता था; पर एक क्षण में जब वह समीप आ गया, तो करूणा पहचान गयी ।" बालक भी उसकी गोद में बेल हुआ सहमी जँखों से इस ककाऊ को देख रद्दा था और माता की गोद में चिफ्ठ) णाता था |,स्वागत या दु:ख का एक शब्द भी उसके मुँह से न निकला ।,बालक भी गोद में बैठा हुआ सहमी आँखों से इस कंकाल को देख रहा था और माता की गोद में चिपटा जाता था । ऐप उलाए से भरी हुई इंसो उम्रने बहुत दिन से न हँसी थी ।,"वह डालियों में छिप गया, कई आम काट-काटकर नीचे गिराये, और जोर से ठट्ठा मारकर हँसा ।",ऐसी उल्लास से भरी हुई हँसी उसने बहुत दिन से न हँसी थी । "डॉटकर बोछा--वबहाँ से बेढे बेठे हँसोगे, तो आकर सारी हँसों निछ्चाल दूँया, नहीं सीधे परे उतर आओ ।",अब गाँव में ऐसा कौन है ?,"डाँटकर बोला- वहाँ बैठे-बैठे हँसोगे, तो आकर सारी हँसी निकाल दूँगा, नहीं सीधे से उतर आओ ।" दोनों बचपन के उखा व्दों बले मिले ।,इस पेड़ पर कब से बैठे हो ?,दोनों बचपन सखा वहीं गले मिले । पन्‍ता को अवसर मिलता तो वह आकर उ्ते तसको देती ; छेछित उधके लड़के अब रण्घ्‌ हे वात सी व करते घे ।,कमजोरी बढ़ती ही गयी ।,"पन्ना को अवसर मिलता, तो वह आकर उसे तसल्ली देती;लेकिन उसके लड़के अब रग्घू से बात भी न करते थे ।" "बढ़ा होशियार है, बढ़ा आज्ञादारी, परले सिर का मेहनतो, गज़ब का सलोकेदार और बहुत दो इमाव- दार ।","उसकी सूरत कहे देती थी कि कोई जाँगलू है; मगर आपने उसका ऐसा बखान किया, कि क्या कहूँ ।","बड़ा होशियार है, बड़ा आज्ञाकारी, परले सिरे का मेहनती, गजब का सलीकेदार और बहुत ही ईमानदार ।" "और गदें का यह हाल, कि साँस ' ""ना कठित ; पर भाप छशान्तिपूर्वक कमरे में बेठे हैं, जेसे कोई बात दी नहीं ।","उसमें झाड़ू लगाता, तो इधर की चीज उधर, ऊपर की नीचे; मानो कमरे में भूकंप आ गया हो ।","और गर्द का यह हाल, कि साँस लेना कठिन; पर आप शांतिपूर्वक कमरे में बैठे हैं, जैसे कोई बात ही नहीं ।" घूरे मेरी दृष्टि में विश्वासपांत्र बनने छगा ।,अब रोज कमरा साफ-सुथरा मिलता ।,घूरे मेरी दृष्टि में विश्वासी बनने लगा । "तुम मेरे रूप हो के दीवाने हो न १ आज मुम्ते माता नि*क भाये, कानी हो जाऊँ, तो मेरी भोर ताझीगे भी नहां ।","हाँ, वह अपने मन की करने लगे, मेरी छाती पर मूँग दलने लगे, तो मैं भी उसकी छाती पर मूँग दलूँगी ।","तुम मेरे रूप ही के दीवाने हो न! आज मुझे माता निकल आयें, कानी हो जाऊँ, तो मेरी ओर ताकोगे भी नहीं ।" "नाप्त बढ़े, दशन थोड़े ।",फिर दुनिया क्या कहेगी ?,"नाम बड़े, दर्शन थोड़े ।" "झितवा समस्ताया, बेटा, साई-भौजाई किद्ो के नहीं होते ।",- शिवदास ने चिंतित होकर कहा- इस तरह एक दिन धागा भी न बचेगा ।,"कितना समझाया, बेटा, भाई-भौजाई किसी के नहीं होते ।" "प्यारी ने ऐस! सुँह् बताया, मार्वों वह ऐसो बूढ़ी बातें बहुत सन चुड्डी है, और भोलौ-- जो अपने हैं, वे बात भी न पूछे, तो भी भयने ही रहते हैं ।","अपने पास दो चीजें रहेंगी, तो सब मुँह जोहेंगे; नहीं कोई सीधे बात भी न करेगा ।","प्यारी ने ऐसा मुँह बनाया, मानो वह ऐसी बूढ़ी बातें बहुत सुन चुकी है, और बोली- जो अपने हैं, वे भी न पूछें, तो भी अपने ही रहते हैं ।" "देद्गात के ज़र्मीदार, लाखों का मुनाफा , मगर पुलिस कॉन्स्टेबिल को भी अफसर छम्मसनेवाले ।","नौकर- चाकर ही नहीं, घर के लोग भी मेरा सम्मान करने लगे ।","देहात के जमींदार, लाखों का मुनाफा, मगर पुलिस कान्सटेबिल को अफसर समझने वाले ।" "में इसे .अमोर्रों के चोंचले, रईसों का गधापन और बढ़े आदमियों छो मुख्मरदों और धाने क्या-क्या कहकर ईश्वरी का परिद्वाप किया करता और भथाज में पौतढ़ों का रभस बनने का स्वॉग भर रहा था ! इतने भें दस बज गये ।",मेरे जीवन में ऐसा शायद ही कभी हुआ हो कि किसी ने मेरे पाँव दबाये हों ।,"मैं इसे अमीरों के चोचले, रईसों का गधापन और बड़े आदमियों की मुटमरदी और जाने क्या-क्या कहकर ईश्वरी का परिहास किया करता और आज मैं पोतड़ों का रईस बनने का स्वाँग भर रहा था ।" अपने द्वा्यों अपनी घोतो छाँटते बढ़ी शर्स आ रही थी ।,मैं हमेशा अपनी धोती खुद छाँट लिया करता हूँ; मगर यहाँ मैंने ईश्वरी की ही भाँति अपनी धोती भी छोड़ दी ।,अपने हाथों अपनी धोती छाँटते शर्म आ रही थी । रात द्वी से सिर-ए्द से बेचेन हूँ ।,उस पर कार्याधिक्य से इधर मेरा स्वास्थ्य भी बिगड़ रहा है ।,रात ही से सिर-दर्द से बेचैन हूँ । "सोचा, राष्ते में आयके दर्शव ऋरतो चल; लेकिन जब आपछा स्थस्थ्य ठो नहों है, तो मुप्ते यहाँ कुछ दिन रहकर आपदा! सवा- स्थ्य सुधारना पढ़ेगा ।",मैं तो एक सहेली से मिलने जा रही थी ।,"सोचा, रास्ते में आपके दर्शन करती चलूँ; लेकिन जब आपका स्वास्थ्य ठीक नहीं है, तो मुझे यहाँ कुछ दिन रहकर आपका स्वास्थ्य सुधारना पड़ेगा ।" "उचित तो यह था, -यद्द खेचेवाडे ढोल मेजोरे के साथ छोगों को अपनी चीज़ों को ओर आकर्षित करते ; मगर इन भौंधी अवल्वा्ों को यह कहाँ सूझतो है ।",वह खोंचेवालों की शब्द-क्रीड़ा है ।,"उचित तो यह था, यह खोंचेवाले ढोल-मँजीरे के साथ लोगों को अपनी चीजों की ओर आकर्षित करते; मगर इन औंधी अक्लवालों को यह कहाँ सूझती है ।" मद्दोनों को दवा- दारू के बाद अच्छी हुईं |,"एकाएक जो किसी खोंचेवाले की भयंकर धवनि कानों में आयी, तो चीख मारकर चिल्ला उठी और फिर बेहोश हो गयी ।",महीनों की दवा-दारू के बाद अच्छी हुई । "श्रीमतीणी ने इपके जवाब में लिखा--वुम बरम्मते हो, में खॉँचेवार्लों को भावाज़ों से डर जाऊँगी ।",मेरे ही मित्रों में कई ऐसे हैं जो अपनी स्त्रियों को घर से लाये; मगर बेचारियाँ दूसरे ही दिन इन आवाजों से भयभीत होकर लौट गयीं ।,"श्रीमतीजी ने इसके जवाब में लिखा तुम समझते हो, मैं खोंचेवालों की आवाजों से डर जाऊँगी ।" म्ि० टडन ने पूछा--रात क्या तुम्र मेरे घर गई थीं ।,उन्हें देखकर उसने मुँह फेर लिया ।,मिसेज टंडन ने पूछा- रात क्या तुम मेरे घर आयी थीं ? "कई मिनट तौनों आदमी विर्वाकू,' निस्पन्द बठे रहे ।","इंद्रनाथ ने शून्य नेत्रों से उनकी ओर देखा, पर मुँह से कुछ बोले नहीं ।",कई मिनट तीनों आदमी निर्वाक् निस्पंद बैठे रहे । इंशीघर के उदाल मुख पर हे का प्रकाश दौढ़ गया ।,वंशीधर ने तीखे स्वर में कहा- गोकुल को तो तुम ले बीते ! इंद्रनाथ ने अपनी अंगूठी की ओर ताकते हुए कहा- वह मेरे घर पर हैं ।,वंशीधर के उदास मुख पर हर्ष का प्रकाश दौड़ गया । गोकुल ने उप्के गले में हाथ ढालऋर कह्दा -में परसों खुद द्वो भाऊँगा ।,"दो-तीन दिन में फिर मिलूँगा, मगर ऐसा न हो कि तुम संकोच में पड़कर सोचते-विचारते रह जाओ और दिन निकलते चले जायँ ।",गोकुल ने उसके गले में हाथ डालकर कहा- मैं परसों खुद ही आऊँगा । "सदसा गोकुल ने पुछारा--मावो, एक ग्लाध्ष ठंडा पानी तो लाना, बढ़ो प्यास लगो दे ।",केवल मानी घर की देखभाल कर रही थी और ऊपर गोकुल अपने कमरे में बैठा हुआ समाचार पढ़ रहा था ।,"सहसा गोकुल ने पुकारा- मानी, एक ग्लास ठंडा पानी तो लाना, प्यास लगी है ।" "देखते नहीं हो, कोस-भर पर खड़ी है ।",मुन्नी भूसे में मुँह नहीं डालती ।,"देखते नहीं हो, कोस-भर पर खड़ी है ।" फिर तो मैंने पदाना शुरू किया ।,"जैसे उसके हाथों में कोई चुम्बक हो, गुल्लियों को खींच लेता हो; लेकिन आज गुल्ली को उससे वह प्रेम नहीं रहा ।",फिर तो मैंने पदाना शुरू किया । "बाप ही नहीं, सारा गाँव उसका दुश्मन था ।",किसके सामने रोये ?,"बाप ही नहीं, सारा गाँव उसका दुश्मन था ।" जीवन की लीला समाप्त हो रही है ।,"बस, ऐसा मालूम हो रहा है कि दिल बैठा जाता है, जैसे पानी में डूबा जाता हूँ ।",जीवन की लीला समाप्त हो रही है । बहुत रोते थे ।,"सहसा ग्वाले ने आकर कहा— बहूजी, भइया चले गये ।",बहुत रोते थे । इनके लिए तो ईद है ।,रोजे बड़े-बूढ़ों के लिए होंगे ।,इनके लिए तो ईद है । पन्ना को अपनी आँखों पर विश्वास न आया ।,"घर से बाहर निकली, तो देखा, रग्घू सामने झोपड़े में बैठा ऊख की गँडेरिया बना रहा है, लड़के उसे घेरे खड़े हैं और छोटी लड़की उसकी गर्दन में हाथ डाले उसकी पीठ पर सवार होने की चेष्टा कर रही है ।",पन्ना को अपनी आँखों पर विश्वास न आया । दादा दोनों गाड़ियाँ खींचेंगे ।,"यह देख, एक पर हम और खुन्नू बैठेंगे, दूसरी पर लछमन और झुनिया ।",दादा दोनों गाड़ियाँ खींचेंगे । कुछ व्यस्त से रहते थे ।,"उसका स्वास्थ्य बिगड़ता जाता था , चेहरे पर स्वास्थ्य की लाली न थी ।",कुछ व्यस्त से रहते थे । नोच ही डाले ।,"उसने दिल में कहा- नहीं, जबरा के होते कोई जानवर खेत में नहीं आ सकता ।",नोच ही डाले । इतने में चार बजे ।,"वही मुलिया, जो शेरनी की तरह तड़प उठी थी ।",इतने में चार बजे । कुछ देर में लड़के जागे ।,झाडू से फुरसत पाकर उसने आग जलायी और चावल-दाल की कंकड़ियाँ चुनने लगी ।,कुछ देर में लड़के जागे । दूसरे दिन पत्र लिख दिया गया ।,मुरारीलाल को इनकारी-पत्र लिखने की बात पक्की हो चुकी थी ।,दूसरे दिन पत्र लिख दिया गया । प्रतिरोध उसकी कल्पना से परे था ।,"घरवालों ने जिससे विवाह कर दिया, उसमें हजार ऐब हों, तो भी वह उसका उपास्य, उसका स्वामी है ।",प्रतिरोध उसकी कल्पना से परे था । इन बातों से धर्म नहीं जाता ?,' कामता हँसकर बोला- 'क्या पुराने जमाने की बातें करती हो अम्माँ ।,इन बातों से धर्म नहीं जाता ? रात का समय है ।,2 दो महीने गुजर गये हैं ।,रात का समय है । चालीस भी तो पूरे न हुए थे ।,"और अभी उनकी उम्र ही क्या थी, जो संचय की चिंता करते ।",चालीस भी तो पूरे न हुए थे । आपकी परजा हूँ ।,"महावीर ने सजल आँखो से देखकर कहा- मालिक, आप ही का तो खाता हूँ ।",आपकी परजा हूँ । दाँत पीस रहे थे ।,यह आदत ही छूट जायगी ।,दाँत पीस रहे थे । "बर्खा बन्द हो जाय, तो खेत सूख जाय ।","झड़ी लग जाय, तो खेत डूब जाय ।","बर्खा बन्द हो जाय, तो खेत सूख जाय ।" प्यारी तो अपने सरल स्वभाव के लिए गाँव में मशहूर थी ।,"अगर शिवदास ने बहाना किया होता, तो उसे आश्चर्य न होता ।",प्यारी तो अपने सरल स्वभाव के लिए गाँव में मशहूर थी । वह वहाँ चला गया था ।,इंद्रनाथ को बंबई में एक जगह मिल गयी थी ।,वह वहाँ चला गया था । वह कभी भाग्य का रोना नहीं रोती ।,संसार करूणा को अभागिनी और दीन समझे ।,वह कभी भाग्य का रोना नहीं रोती । शहर तबाह हुआ जाता था ।,"4 कुस्तुन्तुनिया में कितनी खुशियाँ मनायी गयीं, हबीब का कितना सम्मान और स्वागत हुआ, उसे कितनी बधाइयाँ मिली, यह सब लिखने की बात नहीं ।",शहर तबाह हुआ जाता था । उसने देवियों का मस्तक ऊँचा कर दिया था ।,और नगर की महिलाएँ हृ दय के अक्षय भंडार से असीसें निकाल- निकालकर उस पर लुटाती थी और गर्व से फूली हुई उसका मुँह निहारकर अपने को धन्य मानती थीं ।,उसने देवियों का मस्तक ऊँचा कर दिया था । फिर दोनों चुप हो गये ।,तुमने मुझे बचा लिया ।,फिर दोनों चुप हो गये । तुम हमारा भिश्ती लेकर देखो ।,"मोहसिन ने कहा— जरा अपना चिमटा दो, हम भी देखें ।",तुम हमारा भिश्ती लेकर देखो । अमीना का दिल कचोट रहा है ।,बिल्कुल न डरना ।,अमीना का दिल कचोट रहा है । "नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी ।",उस भीड़-भाड़ से बच्चा कहीं खो जाय तो क्या हो ?,"नहीं, अमीना उसे यों न जाने देगी ।" जूते भी तो नहीं हैं ।,पैर में छाले पड़ जायेंगे ।,जूते भी तो नहीं हैं । हम लोगों को जाने दो ।,सब कुछ समझता हूँ ।,हम लोगों को जाने दो । फिर खेत में काम करने चली जाती ।,"वह बेचारी पहर रात से उठकर कूटने-पीसने में लग जाती, चौका-बरतन करती, गोबर पाथती ।",फिर खेत में काम करने चली जाती । परवल छील रही थी ।,मैं बरामदे में थी ।,परवल छील रही थी । जोखू कई दिन से बीमार है ।,कोई तीसरा कुआँ गाँव में है नहीं ।,जोखू कई दिन से बीमार है । यों कहो कि भीख माँगकर जमा किये थे ।,इसके पीछे महीनों मारी मारी फिरी थी ।,यों कहो कि भीख माँगकर जमा किये थे । इस वक्त कुछ न बोले ।,उन्हें मन-ही-मन इसका बड़ा दु:ख था ।,इस वक्त कुछ न बोले । उनकी तो यह आदत ही है ।,गोकुल- इसकी कोई परवाह नहीं है ।,उनकी तो यह आदत ही है । ताँगा पहुँच गया ।,उनकी तो यह आदत ही है ।,ताँगा पहुँच गया । यह निश्चय करके वह घर में दाखिल हुआ ।,आज ही क्यों न कह दूँ ।,यह निश्चय करके वह घर में दाखिल हुआ । और यह बात सारे कालेज में मशहूर थी ।,"प्रेमा पुराने संस्कारों की कायल थी , पुरानी मर्यादाओं और प्रथाओं में पूरा विश्वास रखनेवाली ; लेकिन फिर भी दोनों में गाढ़ा प्रेम हो गया था ।",और यह बात सारे कालेज में मशहूर थी । भाई साहब उपदेश की कला में निपुण थे ।,"अपराध तो मैंने किया, लताड़ कौन सहे ?",भाई साहब उपदेश की कला में निपुण थे । सदा तुम्हें कष्ट ही देता रहा ।,मुझ जैसे कपूत को तो तुम्हारी कोख से जन्म ही न लेना चाहिए था ।,सदा तुम्हें कष्ट ही देता रहा । इनसे कुछ पूछना व्यर्थ समझा ।,मैं तो महाशय को जानती थी ।,इनसे कुछ पूछना व्यर्थ समझा । दो आने की है ।,प्रभावित होकर बोला— मेरी खँजरी से बदलोगे ?,दो आने की है । उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति ।,"सम्मी तो विधर्मी हो गया! दूसरे पक्ष से जा मिला, लेकिन मोहसिन, महमूद और नूरे भी हामिद से एक-एक, दो-दो साल बड़े होने पर भी हामिद के आघातों से आतंकित हो उठे हैं ।",उसके पास न्याय का बल है और नीति की शक्ति । लीला मिशन में डाक्टर थी ।,"मुझे भगा ले जाने के प्रस्ताव भी करना, बस यों बन जाना जैसे अपने होश में नहीं हो ।",लीला मिशन में डाक्टर थी । मेरा घाटा पूरा हो जायगा ।,"' देवीजी ने सहृदय भाव से मेरा कंधा पकड़कर कहा- जब तुम्हारे बाबूजी, लौट आवें; तो मुझे भी अपने घर मेहमान रख लेना ।",मेरा घाटा पूरा हो जायगा । "चार जवान बेटे थे, एक लड़की ।","पंडित अयोध्यानाथ का देहांत हुआ तो सबने कहा, ईश्वर आदमी की ऐसी ही मौत दे ।","चार जवान बेटे थे, एक लड़की ।" फूलमती घर की मालकिन थी ।,"किसी लड़के में वह दुर्व्यसन, वह छैलापन, वह लुटाऊपन न था, जो माता-पिता को जलाता और कुल-मर्यादा को डुबाता है ।",फूलमती घर की मालकिन थी । अभी बहुत उजाला है ।,"‘नहीं, नहीं ।",अभी बहुत उजाला है । शिवदास बाहर था ।,उसकी छोटी बहन और देवर दोनों काम करने गये हुए थे ।,शिवदास बाहर था । अम्मा भी आयेंगी ही ।,आखिर अब्बाजान कभीं न कभी आयेंगे ।,अम्मा भी आयेंगी ही । "शहर में इतने लक्ष्मी के पुत्र हैं, पर आपका किसी से परिचय नहीं ।",ऐसे ही दरिद्र भट्टाचार्यों से इनकी पटती है ।,"शहर में इतने लक्ष्मी के पुत्र हैं, पर आपका किसी से परिचय नहीं ।" प्रकाश लज्जित न हुआ ।,करूणा ने कठोर स्वर में पुकारा— प्रकाश ?,प्रकाश लज्जित न हुआ । मेरे पति की कमाई है ।,"फूलमती ने जिद पकड़कर कहा- विवाह तो मुरारीलाल के पुत्र से ही होगा, पाँच हजार खर्च हों, चाहे दस हजार ।",मेरे पति की कमाई है । ठाकुर मेरे पाँव दबाने लगा ।,मैं कुरसी पर पाँव लटकाये बैठा था ।,ठाकुर मेरे पाँव दबाने लगा । दुनिया के हाथों बिकी नहीं हूँ ।,"मुलिया— दुनिया जो चाहे, कहे ।",दुनिया के हाथों बिकी नहीं हूँ । बखार में अनाज गीला हो रहा था ।,बरसात शुरु हो गयी थी ।,बखार में अनाज गीला हो रहा था । महतो से न रहा गया ।,मगर उसके माँ-बाप बैठे सुन रहे थे ।,महतो से न रहा गया । "कोई पचास माँगता, कोई सौ ।","नाजिर और मोहतमिम, सभी कहते थे, नकल नहीं मिल सकती ।","कोई पचास माँगता, कोई सौ ।" सबसे सुन्दर एक सिंह की खाल थी ।,"इतना सजीव , स्फूर्तिमय आनन्द उसे आज तक किसी कविता , संगीत या आमोद में भी न मिला था ।",सबसे सुन्दर एक सिंह की खाल थी । आज शाम को यहीं आकर भोजन करो ।,"मुझे तुम्हारे पिताजी की सम्पत्ति का मोह नहीं है , मैं तो केवल तुम्हारा प्रेम चाहती हूँ और उसी में प्रसन्न हूँ ।",आज शाम को यहीं आकर भोजन करो । सागर पहले खेतों को सींचकर खुद खाली हो जाता था ।,रूपये हाथ में आते ही उसने अपने गिरवी गहने छुड़ाए और भोजन भी संयम से करने लगी ।,सागर पहले खेतों को सींचकर खुद खाली हो जाता था । वह कई बार चौंककर उठा ।,"एक अज्ञात शंका उसके मन पर छायी हुई थी, जैसे भोला महतो द्वार पर बैठा रो रहा हो ।",वह कई बार चौंककर उठा । एक सप्ताह से उसका कहीं पता नहीं है ।,"’ ‘नयी तो नहीं है, लेकिन एक तरह में नयी ही समझो, केदार एक ऐक्ट्रेस के साथ कहीं भाग गया ।",एक सप्ताह से उसका कहीं पता नहीं है । उसका एक भाग किराये पर उठा दिया ।,मकान बहुत बड़ा था ।,उसका एक भाग किराये पर उठा दिया । कई बार मरते-मरते बच गया हूँ ।,"आदित्य ने हाथ के इशारे से उसे मना करके कहा— व्यर्थ है करूणा! अब तुमसे छिपाना व्यर्थ है, मुझे तपेदिक हो गया है ।",कई बार मरते-मरते बच गया हूँ । दो भद्र पुरुष थे ।,स्टेशन पर कई आदमी हमारा स्वागत करने के लिए खड़े थे ।,दो भद्र पुरुष थे । लोगों ने उससे बोलना छोड़ दिया था ।,ऐसा अनुमान होता था-उन्माद हो गया है ।,लोगों ने उससे बोलना छोड़ दिया था । उन्हें भी तो अपना खर्च है ।,कहने लगे उन्हें क्यों चिंता में डालूँ ।,उन्हें भी तो अपना खर्च है । मुझे न्याय का बल था ।,"गया ने मुझे अपनी ओर खींचते हुए कहा-मेरा दाँ व देकर जाओ, अमरूद-समरूद मैं नहीं जानता ।",मुझे न्याय का बल था । वह अन्याय पर डटा हुआ था ।,मुझे न्याय का बल था ।,वह अन्याय पर डटा हुआ था । "तुम्हें सौ बार गरज हो, जाकर पूछो ।",मुलिया अँगूठा दिखाकर बोली— यह जाता है ।,"तुम्हें सौ बार गरज हो, जाकर पूछो ।" ऐसा चरका उसने कभी न खाया था ।,जबान बंद हो गयी ।,ऐसा चरका उसने कभी न खाया था । अब रुपये चुक गये ।,"मैंने अब तक तुमसे इसलिए नहीं कहा, कि तुम अपने को मेरा देनदार समझ रही थीं ।",अब रुपये चुक गये । उनका आना खल रहा था ।,फिर भी मैं बोला नहीं ।,उनका आना खल रहा था । "अभागी हो, तो राजा के घर में भी रोयेगी ।",' बड़ी बहू ने श्रद्धा भाव ने कहा- 'कन्या भाग्यवान हो तो दरिद्र घर में भी सुखी रह सकती है ।,"अभागी हो, तो राजा के घर में भी रोयेगी ।" उसने रस्सी का फंदा घड़े में डाला ।,"गंगी दबे पाँव कुएँ की जगत पर चढ़ी, विजय का ऐसा अनुभव उसे पहले कभी न हुआ था ।",उसने रस्सी का फंदा घड़े में डाला । सरकारी पदों पर न गिरो ।,"इसी सजा ने उनके प्राण लिये बेटा, मेरी इतनी बात मानो ।",सरकारी पदों पर न गिरो । बेचारे दिल में सहमे जा रहे थे ।,सब-के-सब डाँटे जायेंगे ।,बेचारे दिल में सहमे जा रहे थे । इस समय तो बहुत-सा काम है ।,मैं अवकाश में पढ़ूँगा ।,इस समय तो बहुत-सा काम है । उसका सूखा हुआ साँवला चेहरा उत्तेजित हो उठा ।,पहले दो-चार घरों में चौका-बरतन कर चुकी थी; पर रानियों से अदब के साथ बातें करना अभी न सीख पाई थी ।,उसका सूखा हुआ साँवला चेहरा उत्तेजित हो उठा । अब उसे रोटियों के भी लाले हैं ।,"अब वह दरिद्र है, उसकी सारी जायदाद को इन्हीं लोगों ने कूड़ा कर दिया ।",अब उसे रोटियों के भी लाले हैं । "मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियाँ जमावेगा, गालियाँ देगा ।","पूस सिर पर आ गया, कम्मल के बिना हार में रात को वह किसी तरह नहीं जा सकता ।","मगर सहना मानेगा नहीं, घुड़कियाँ जमावेगा, गालियाँ देगा ।" एक जून खाता ।,उसने धर्मशाला से निकल कर शहर से बाहर 5 रु. महीने पर एक छोटी-सी कोठरी ले ली ।,एक जून खाता । जमीन पर सोता ।,बर्तन अपने हाथों से धोता ।,जमीन पर सोता । यह उसका सौभाग्य था ।,शताब्दियाँ व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आये और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गाँव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गाँव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ ।,यह उसका सौभाग्य था । यह गरीबों के साथ घोर अन्याय है ।,भगत-कहा जाता है कि विदेशी चीजों का व्यवहार मत करो ।,यह गरीबों के साथ घोर अन्याय है । कष्ट न करो ।,आ.-बाजार का रास्ता तो मैंने भी देखा है ।,कष्ट न करो । रानी का चेहरा तमतमा गया ।,राजकुमार अकेला क्या करता पाँव-पाँव घर आया और उसने सारन्धा से सब समाचार बयान किया ।,रानी का चेहरा तमतमा गया । अब और क्या कहूँ ।,उन्हें कोतवाल क्या बादशाह-सलामत भी गिरफ्तार नहीं कर सकते ।,अब और क्या कहूँ । यह स्थान तुम्हारे योग्य नहीं ।,प्यारे तुम मेरे हृदय मंदिर से निकल जाओ ।,यह स्थान तुम्हारे योग्य नहीं । उनके राजनैतिक ज्ञान की वृद्धि होती ।,उनके यहाँ नित्य पंचायतों की राष्ट्रोन्नति की चर्चा रहती जनता को इन बातों में बड़ा आनंद और उत्साह होता ।,उनके राजनैतिक ज्ञान की वृद्धि होती । यह पाप किसके सिर पड़ेगा ?,उस हरदौल के खून से अपना हाथ काला करूँ जो मुझे बहन समझता है ?,यह पाप किसके सिर पड़ेगा ? शाम हो जायगी ।,भोजन के उपरान्त आराम करने का जी चाहेगा ।,शाम हो जायगी । उनकी वाणी ने कभी किसी का हृदय नहीं दुखाया ।,सदैव परोपकार में मग्न रहते थे ।,उनकी वाणी ने कभी किसी का हृदय नहीं दुखाया । वे आपके समक्ष हैं ।,आपको रुपये मनुष्य की जान से प्यारे हैं ।,वे आपके समक्ष हैं । मूठ तक तेगा चुभ गया ।,इतना सुनते ही पृथ्वीसिंह ने बिजली की तरह अपने कमर से तेगा खींच लिया और उसे धर्मसिंह के सीने में चुभा दिया ।,मूठ तक तेगा चुभ गया । शोर मचाना व्यर्थ था ।,इधर-उधर देखा कोई आदमी नहीं ।,शोर मचाना व्यर्थ था । उनका विचार है कि एक मासिक पत्रिका निकालें ।,उसका मकान कानपुर ही में है ।,उनका विचार है कि एक मासिक पत्रिका निकालें । चमे गेरे हाथ से छूट पड़े और नेत्रो मे झविरक् अश्लु-पारा बहने छगी |,पाँचवीं बार एक सज्जन से स्थान माँगने पर उन्होंने एक मुट्ठी चने मेरे हाथ पर रख दिये ।,चने मेरे हाथ से छूट पड़े और नेत्रों से अविरल अश्रु-धारा बहने लगी । यह हमारा जतिथि- सत्कारका री प्यारा भारत नहीं है--कदापि नहीं है ।,मुख से सहसा निकल पड़ा कि हाय ! यह मेरा देश नहीं है यह कोई और देश है ।,यह हमारा अतिथि-सत्कारी प्यारा भारत नहीं है-कदापि नहीं । "यहूं दशा देख कर विवशत. मेरे दृदय से एक मई आहू निकल तल पड़ी और में जोर से चिहला उठा कि ""हीं, नहीं, नहीं और हजार वार नही है--पह मेरा प्यारा रत मही है ।",मदिरा दुराचार और द्यूत ने उसे अपना घर बना रखा था ।,यह दशा देख कर विवशतः मेरे हृदय से एक सर्द आह निकल पड़ी और मैं जोर से चिल्ला उठा कि नहीं नहीं नहीं और हजार बार नहीं है -यह मेरा प्यारा भारत नहीं है । मे अप्ता हु खित हृदय छेकर उसी नाले के किनारे जा कर बैठ गया और सोचने रूगा--अब क्या करूं ! क्‍या फिर अपने पूत्रो के पास लौट जाएं और सपता .वह क्षरीर अमेरिका की मिट्टी में मिाऊं ।,गीदड़ और कुत्ते अपने-अपने कर्कश स्वर में उच्चारण कर रहे थे ।,मैं अपना दुखित हृदय ले कर उसी नाले के किनारे जा कर बैठ गया और सोचने लगा-अब क्या करूँ ! फिर अपने पुत्रों के पास लौट जाऊँ और अपना यह शरीर अमेरिका की मिट्टी में मिलाऊँ । "घटेवाक़े ने ,तीन वजोये ओर किसी के गाते का शब्द छात्रों में आया ।",रात्रि नेत्रों में ही व्यतीत की ।,घंटेवाले ने तीन बजाये और किसी के गाने का शब्द कानों में आया । मारपत्र्य आज हरदौछ भी जीत को खुशी में शिकार खेजने निकले ये ।,वे घोड़े से उतरे और एक पेड़ की छाँह में जा बैठे ।,भाग्यवश आज हरदौल भी जीत की खुशी में शिकार खेलने निकले थे । "उत्होगे राणा जुझ्ारसिह को अकेे बैठे देखा, पर वे अपने घमड़ में इतने डूबे हुए थे कि हमके पाम तक ने आये ।",सब अभिमान के नशे में चूर थे ।,"उन्होंने राजा जुझारसिंह को अकेले बैठे थे देखा, पर वे अपने घमंड में इतने डूबे हुए थे कि इनके पास तक न आए ।" "छोड़ी से आ कर कहा--महाराज, मोजन तैयार हैं ।",नौ बजे होंगे ।,"लौंडी ने आकर कहा, ""महाराज, भोजन तैयार है ।" रानी को तरफ घूम कद देखा और भोजव करने छतें ।,"जबान से कुछ न बोले, पर तेवर बदल गए और मुँह लाल हो गया ।",रानी की तरफ़ घूर कर देखा और भोजन करने लगे । कम से कप्र मुझे तो ऐसा हो जान पडता है ।,शायद मुझे तंग करने के लिए अवसर ढूँढ़ रही थीं ।,कम-से-कम मुझे तो ऐसा ही जान पड़ता है । दूसरी ओर बगालो दावू रुते है ।,बाहर के सैकड़ों आदमी जमा थे ।,दूसरी ओर बंगाली बाबू रहते हैं । "चह जत्य॑व स्पएपवात्‌ थे” और रूपबान्‌ पृश्ष की स्त्री का जीवन बेहूंते मुखमेय नही होता, “पर मुझे “उन पर संजय करने का अवसर कभी नहीं मिला ।",मेरे पति विद्याधरी को सदैव बहिन कह कर संबोधित करते थे ।,वह अत्यंत स्वरूपवान् थे और रूपवान् पुरुष की स्त्री का जीवन बहुत सुखमय नहीं होता पर मुझे उन पर संशय करने का अवसर कभी नहीं मिला । 6 शाप & छ्रु गयी कि जिस राजकुमार का शोक भनाया जा रहा है वह बही युवक हैँ जो मेरो गुफा में पद्म हुआ है ।,मेरे पकड़े जाने का कारण यह था कि मैंने काले वस्त्र क्यों न धारण किये थे ।,यह वृत्तांत सुन कर मैं समझ गयी कि जिस राजकुमार का शोक मनाया जा रहा है वह वही युवक है जो मेरी गुफा में पड़ा हुआ है । इधर सूर्य ने उपान्मागर से सिर तिकारा ।,शोक के काले वस्त्रों की जगह केसर का सुहावना रंग बधाई दे रहा था ।,इधर सूर्य ने उषा-सागर से सिर निकाला । "पतितोदार की कपाएँ और हौवा, यां बम्फेशन करके पाप से मुवत हो जाने को बातें, यह मद संसार-तिप्मी पाथंडी, - घर्माव्ेम्दियों की गल्पतोएँ है ।",कोई तपस्या कोई दंड कोई प्रायश्चित्त इस कालिमा को नहीं धो सकता ।,पतितोद्धार की कथाएँ और तौबा या कन्फेशन करके पाप से मुक्त हो जाने की बातें यह सब संसार-लिप्सी पाखंडी धर्मावलम्बियों की कल्पनाएँ हैं । समाज इसको साया मैने अपनी आँसों से देखो ।,मुझे आज अनुभव हुआ जो बहुत दिनों से पुस्तकों में पढ़ा करता था कि सौंदर्य में प्रकाश होता है ।,आज इसकी सत्यता मैंने अपनी आँखों से देखी । उसके मुँह से यह प्रइन सुनने के लिए में तैयार मं था ।,प्रियंवदा ने मुस्करा कर कहा- मुसाफिर तुझे स्वदेश में भी कभी हम लोगों की याद आयी थी अगर मैं चित्रकार होता तो उसके मधु हास्य को चित्रित करके प्राचीन गुणियों को चकित कर देता ।,उसके मुँह से यह प्रश्न सुनने के लिए तैयार न था । "मैं यह भी मे कह सफा कि मेरे जोदत का सबमे मुछद भाग यही था जो ज्ञानमरोबर के तद वर व्यतीत हुआ, था; कितु मुस्से इसना सादस भी ते हुआ ।",यदि इसी भाँति मैं उसका उत्तर देता तो शायद वह मेरी धृष्टता होती और शेरसिंह के तेवर बदल जाते ।,मैं यह भी न सह सका कि मेरे जीवन का सबसे सुखद भाग वही था जो ज्ञानसरोवर के तट पर व्यतीत हुआ था किंतु मुझे इतना साहस भी न हुआ । ' मैने दबीं जवान से कहा--/ यया मैं मनुष्य नही हूँ ?,मैं यह भी न सह सका कि मेरे जीवन का सबसे सुखद भाग वही था जो ज्ञानसरोवर के तट पर व्यतीत हुआ था किंतु मुझे इतना साहस भी न हुआ ।,मैंने दबी जबान से कहा क्या मैं मनुष्य नहीं हूँ । उसमे मेंरी झ्लुद्ध रचनाओ कौ दिल खोल कर दाद दी ग्पी थी ।,पिछले साल सावन के महीने में मुझे एक ऐसा ही पत्र मिला ।,उसमें मेरी क्षुद्र रचनाओं की दिल खोल कर दाद दी गयी थी । हे . प्रत्न-प्रेषक महोदय स्वयं एक अच्छे कवि थे ।,उसमें मेरी क्षुद्र रचनाओं की दिल खोल कर दाद दी गयी थी ।,पत्र-प्रेषक महोदय स्वयं एक अच्छे कवि थे । यहाँ तक कि जब पत्र समा करके “बुदार पढ़ा सो कबिता का आनंद आगा ।,मैंने कभी कविता नहीं की और न कोई गद्य-काव्य ही लिखा पर भाषा को जितना सँवार सकता था उतना सँवारा ।,यहाँ तक कि जब पत्र समाप्त करके दुबारा पढ़ा तो कविता का आनंद आया । पांचवे दिस कबि महोदय का दूसरा पत्र जा पढ़ेच ।,सारा पत्र भाव-लालित्य से परिपूर्ण था ।,पाँचवें दिन कवि महोदय का दूसरा पत्र आ पहुँचा । वह बदले पत्रद्वे भी कह्दो भविक भर्मस्पर्शी था ।,पाँचवें दिन कवि महोदय का दूसरा पत्र आ पहुँचा ।,वह पहले पत्र से भी कहीं अधिक मर्मस्पर्शी था । ", बह बड़े प्रेम मे आपकी रवदाओी को पढ़ती है ।",अंत में यह शुभ समाचार है कि मेरी पत्नी जी को आपके ऊपर बड़ी श्रद्धा है ।,वह बड़े प्रेम से आपकी रचनाओं को पढ़ती हैं । उपर से डॉद सड़तो तो वादशाह अपना भुस्मा राजासाहव पर उतारते ।,अगर राजा बख्तावरसिंह वेतन-वृद्धि या नये शस्त्रों के सम्बन्ध में कोई प्रयत्न करते तो कम्पनी का रेजीडेंट उसका घोर विरोध और राज्य पर विद्रोहात्मक शक्ति-संचार का दोषारोपण करता था ।,उधर से डाँट पड़ती तो बादशाह अपना गुस्सा राजा साहब पर उतारते । बादशाह के सभी जेंयरेण मुसाहब राजासाहव * है बंकित रहते और उनकी जड़ खोदने का प्रयाप्त किया करते-थे ।,उधर से डाँट पड़ती तो बादशाह अपना गुस्सा राजा साहब पर उतारते ।,बादशाह के सभी अँग्रेज मुसाहब राजासाहब से शंकित रहते और उनकी जड़ खोदने का प्रयास किया करते थे । "अत- एवं इतनी कठिनाइयों के होते हुए, भी चारों ओर बेर-विद्येष से पिरे द्वोने पर भी, बह अपने पद से हूटने का निश्चय न कर सकते थे ।",राजा साहब के मन में बार-बार प्रेरणा होती कि इस पद को त्याग कर चले जायँ पर यह भय उन्हें रोकता था कि मेरे हटते ही अँग्रेजों की बन आयेगी और बादशाह उनके हाथों में कठपुतली बन जायँगे रही-सही सेना के साथ अवध-राज्य का अस्तित्व भी मिट जायगा ।,अतएव इतनी कठिनाइयों के होते हुए भी चारों ओर से वैर-विरोध से घिरे होने पर भी वह अपने पद से हटने का निश्चय न कर सकते थे । खबसे कठिन समह्था _ यह थी कि रोझनुद्रोछा भी राजा सस्हबसे खार खाता था ।,अतएव इतनी कठिनाइयों के होते हुए भी चारों ओर से वैर-विरोध से घिरे होने पर भी वह अपने पद से हटने का निश्चय न कर सकते थे ।,सबसे कठिन समस्या यह थी कि रोशनुद्दौला भी राजा साहब से खार खाता था । उसे सदैव पका रहती कि यह मरा थे मंत्री करके अवध-्राम्य को सिटाता चाहते है ।,सबसे कठिन समस्या यह थी कि रोशनुद्दौला भी राजा साहब से खार खाता था ।,उसे सदैव शंका रहती कि यह मराठों से मैत्री करके अवध-राज्य को मिटाना चाहते हैं । इस सप्रय संधि डी छर्तों पर विवाद छिझ था ।,नेपाल ने एक बड़ी लड़ाई के पश्चात् तिब्बत पर विजय पायी थी ।,इस समय संधि की शर्तों पर विवाद छिड़ा था । "सदि तिम्वद का दरवार हमे ध्यापारिक सुविधाएँ प्रदात करने को कटिबद्ध हो, तो हम सधि करने के लिए सर्वपा उद्यत हैं ॥** /» |",क्या इस अवसर पर स्वार्थ के मोह में हम अपने बहुमूल्य उद्देश्य को भूल जायेंगे हम ऐसी संधि चाहते हैं जो हमारे हृदय को एक कर दे ।,यदि तिब्बत का दरबार हमें व्यापारिक सुविधाएं प्रदान करने को कटिबद्ध हो तो हम संधि करने के लिए सर्वथा उद्यत हैं । "ययथपि अधिकाध सदस्यों को धशु के साथ ऐसी वरमी पसद व थी, दभापि महांयज के विपक्ष में बोलने का किसी को राहेस न हुआ ।",सबकी सम्मति इस दयालुता के अनुसार न थी किंतु महाराज ने राणा का समर्थन किया ।,यद्यपि अधिकांश सदस्यों को शत्रु के साथ ऐसी नरमी पसंद न थी तथापि महाराज के विपक्ष में बोलने का किसी को साहस न हुआ । द्रेष की साव प्रेम के मापर पे दूद गये ।,निकट था कि सिपाही लोग राजा को पकड़ लें कि सारन्धा ने दामिनी की भाँति लपक कर तलवार राजा के हृदय में चुभा दी ।,प्रेम की नाव प्रेम के सागर में डूब गयी । च यह कह कर उसने वही त्तलवार अपने हृदव में खुभा छो ।,सारन्धा ने कहा-अगर हमारे पुत्रों में से कोई जीवित हो तो ये दोनों लाशें उसे सौंप देना ।,यह कह कर उसने वही तलवार अपने हृदय में चुभा ली । वारबार जी में आया कि कहीं डूब मम; पर जाने वड़ीं दरों होती हैं ।,तीन वर्ष तक पहाड़ों और जंगलों में छिपी रही ।,बार-बार जी में आया कि कहीं डूब मरूँ पर जान बड़ी प्यारी होती है । "न जाने कया वया मुसीवर्तें और कठिताद्याँ भोगती है, गितको मोगने को अभी तक जीती हूं ।",बार-बार जी में आया कि कहीं डूब मरूँ पर जान बड़ी प्यारी होती है ।,न जाने क्या-क्या मुसीबतें और कठिनाइयाँ भोगनी हैं जिनको भोगने को अभी तक जीती हूँ । "एक दिन बादल घिरे हुए थे, राशनदिती ने केहाण” आज़ विहारीछाल की 'सतमई' सुनने को जो चाहता है ।",पहले बिना संकोच कभी-कभी छेड़छाड़ हो जाती थी पर अब दोनों हरदम उसका दिल बहलाया करती हैं ।,एक दिन बादल घिरे हुए थे राजनंदिनी ने कहा-आज बिहारीलाल की सतसई सुनने को जी चाहता है । दुर्वाकुवरि--बडी बतप्रोल पुस्तक है ।,वर्षाऋतु पर उसमें बहुत अच्छे दोहे हैं ।,दुर्गाकुँवरि-बड़ी अनमोल पुस्तक है । ब्रेजेविल्यसिती पी आँखें लाल हो गयी ।,वह उसी निर्दय युवक की तसवीर थी जो उसके बाप का हत्यारा था ।,ब्रजविलासिनी की आँखें लाल हो गयीं । थोड़े ने मिर शुका दशा ।,उसकी आँखों में प्रेम का प्रकाश था छल का नहीं ।,घोड़े ने सिर झुका दिया । रात ने उसको गईव पर हाथ रसा और वह उसकी पीठ सहछाने लगी ।,घोड़े ने सिर झुका दिया ।,रानी ने उसकी गर्दन पर हाथ रखा और वह उसकी पीठ सहलाने लगी । रनी उसकी रास पकई वर लेमे का ओर चलो ।,घोड़े ने उसके अंचल में मुँह छिपा लिया ।,रानी उसकी रास पकड़ कर खेमे की ओर चली । इस मैदान में उसो मेतापति को विजय-छाम्र होता है घो शरसर को पहचानता है ।,संसार एक रण-क्षेत्र है ।,इस मैदान में उसी सेनापति को विजयलाभ होता है जो अवसर को पहचानता है । "अथर अनुभवों सेनाएति रा को नतीजे डालता है. तो आव पर जान देनेवाला, मुँह न मोड़नेवाला सिप्राही रोष्टर के मात्रो को उच्च करता हूँ, और उसके हुदय पर मैंतिक गौरव को अकित कर देठा है ।",उनमें कोई विरला ही संसार-क्षेत्र में विजय प्राप्त करता है किंतु प्रायः उसकी हार विजय से भी अधिक गौरवात्मक होती है ।,अगर अनुभवशील सेनापति राष्ट्रों की नींव डालता है तो आन पर जान देनेवाला मुँह न मोड़नेवाला सिपाही राष्ट्र के भावों को उच्च करता है और उसके हृदय पर नैतिक गौरव को अंकित कर देता है । "जब से राजा बह्तावरसिह चजर-बंद हुए हूँ, इन पर किस्सी को दाव हो नही रहौ ।",तब सौदागर ने माधोदास से पूछा-इन्हें देख कर तुम क्यों चौंके माधोदास ने कहा-ये फौज के सिपाही हैं ।,जब से राजा बख्तावरसिंह नजरबंद हुए हैं इन पर किसी की दाब ही नहीं रही । "वस, नोव-ससोद करके गुजर करते है ।",सरकार से तलब मिलने का कुछ ठीक तो नहीं है ।,बस नोच-खसोट करके गुजर करते हैं । पुक पुराती मठजिद भो थी ।,वहाँ एक छोटा-सा बाग था ।,एक पुरानी मसजिद भी थी । ", रोशनुद्दौत्य ने तिर्मीकता ले उत्तर दिया---आप मेरे बादशाह है, इपलिए आपका अदब करठा हूँ, चर्ना इसो वक्‍त इस वदन्‍जदातों का मजा चला देता ।",इस नमकहरामी की तुझे वह सजा दूँगा कि देखनेवालों को भी इबरत (शिक्षा) हो ।,रोशनुद्दौला ने निर्भीकता से उत्तर दिया-आप मेरे बादशाह हैं इसलिए आपका अदब करता हूँ वरना इसी वक्त बदजबानी का मजा चखा देता । "पर इंडों से वेट चाहे भर गया हो, वह उत्कदा ध्वात्त उ हुई ।",दो-तीन बार उसे मनमाने भोजन करने की ऐसी प्रबल उत्कंठा हुई कि उसने संदिग्ध साधनों द्वारा उसको पूरा करने की चेष्टा की पर जब परिणाम आशा के प्रतिकूल हुआ और स्वादिष्ट पदार्थों के बदले अरुचिकर दुर्ग्राह्य वस्तुएँ भरपेट खाने को मिलीं-जिससे पेट के बदले कई दिन तक पीठ में विषम वेदना होती रही-तो उसने विवश हो कर फिर सन्मार्ग का आश्रय लिया ।,पर डंडों से पेट चाहे भर गया हो वह उत्कंठा शांत न हुई । "वह किसी. ऐसी जगह जाना चाहता था, जहाँ खूब शिकार मिछे, खस्गोय्ग, हिरन, भेषों के बच्चे मेदानो भे विचर रहे हों और उनका कोई मालिक न हो, जहाँ क्रिप्ती प्रतिदंद्रीं की गंध तक ने हो; आराम करने फ्ो सघन वृक्षों की छात्रा हो, पीने को तदी का पवित्त जछ ।",पर डंडों से पेट चाहे भर गया हो वह उत्कंठा शांत न हुई ।,वह किसी ऐसी जगह जाना चाहता था जहाँ खूब शिकार मिले खरगोश हिरन भेड़ों के बच्चे मैदानों में विचर रहे हों और उनका कोई मालिक न हो जहाँ किसी प्रतिद्वंद्वी की गंध तक न हो आराम करने को सघन वृक्षों की छाया हो पीने को नदी का पवित्र जल । "वहाँ मतमाना छिकार कह, स्राऊँ और मीठी सीद सोऊँ |",वह किसी ऐसी जगह जाना चाहता था जहाँ खूब शिकार मिले खरगोश हिरन भेड़ों के बच्चे मैदानों में विचर रहे हों और उनका कोई मालिक न हो जहाँ किसी प्रतिद्वंद्वी की गंध तक न हो आराम करने को सघन वृक्षों की छाया हो पीने को नदी का पवित्र जल ।,वहाँ मनमाना शिकार करूँ खाऊँ और मीठी नींद सोऊँ । बह जात छोड़ कर भागा ।,इस अन्यायपूर्ण व्यवहार ने टामी का दिल तोड़ दिया ।,वह जान छुड़ा कर भागा । "जहाँ तक नियांह जादों थो, हरियाली की छटा दिखांगी देती थी ।",2 यह एक विस्तृत मैदान था ।,जहाँ तक निगाह जाती थी हरियाली की छटा दिखायी देती थी । "बैद्य जी इस विज्ञापन को समाप्त कर उच्च स्वर से पढ़ रहे ये, उनके नेत्रों मे उचित क्षभिमान भौर आशा झलक रही थी कि इतने में देवदत्त ने बाहर से जाबाज दी ; दैद्य जी बहुत खुश हुए ।",इसका सबसे बड़ा फायदा जो पहले ही दिन मालूम हो जायगा यह है कि आपकी आँखें खुल जायँगी और आप फिर कभी इश्तहारबाज हकीमों के दाम फरेब में न फँसेंगे ।,वैद्य जी इस विज्ञापन को समाप्त कर उच्च स्वर से पढ़ रहे थे उनके नेत्रों में उचित अभिमान और आशा झलक रही थी कि इतने में देवदत्त ने बाहर से आवाज दी । "यो तो मेरे भाग्य में जो डिखा है, बढ़ी होण; कितु इस समपर तनिक चछ कर आप देस हें तो मेरे दिक्त बा दाह मिट जायगा |",अब आप ही उसे बचा सकते हैं ।,यों तो मेरे भाग्य में जो लिखा है वही होगा किंतु इस समय तनिक चल कर आप देख लें तो मेरे दिल का दाह मिट जायगा । "नंगा मैने रिसी स्रमाचारप्त्र में पद्म था कि एक स्त्रो ने किसी पुरुष पर इस प्रकार का अभियोग चलाया था कि उसने मुझे निर्नी हठाएूईक दुष्ट से भूय था, जिठु विचाएक ने उड्र मो को नत्न-शिख से देख कर बह कह कर मुकदमा खारिल कर दिया क्रि प्रत्येक सनुप्य को अधिकार है हि हाटनवाद में नदजवान स्‍थरी की पुर कर देखे ।",द.-वहाँ इसी बेपर्दगी ने तो सतीत्व-धर्म को निर्मूल कर दिया है ।,अभी मैंने किसी समाचारपत्र में पढ़ा था कि एक स्त्री ने किसी पुरुष पर इस प्रकार का अभियोग चलाया था कि उसने मुझे निर्भीकतापूर्वक कुदृष्टि से घूरा था किन्तु विचारक ने उस स्त्री को नख-शिख से देख कर यह कह कर मुकदमा खारिज कर दिया कि प्रत्येक मनुष्य को अधिकार है कि हाट-बाट में नौजवान स्त्री को घूर कर देखे । खीर आदि के बारे में भवविष्य-दाजों की डा सकती हैँ ।,यथाशक्ति खस्ते और समोसे भी आयेंगे ।,खीर आदि के बारे में भविष्यवाणी की जा सकती है । आँखें बुझ् गयीं ।,उसका बालस्वप्न भी भंग हो गया ।,आँखें डबडबा गयीं । अनुमात से जाते पह्तां या हि समय में इसकी यह दशा कर रखो है ।,चाल-ढाल में कोमलता थी और उसके डील-डौल की गठन बहुत मनोहर थी ।,अनुमान से जान पड़ता था कि समय ने इसकी वह दशा कर रखी है । "46 आवाज सम्हाज् कर धोहौ--दसका जवाब मैं. फिर फभी दूँगी, मेरो रामदहातों बड़ी दुःखमय है ।",तुम्हारा ब्याह तो हो गया है न ब्याह का नाम सुनते ही ब्रजविलासिनी की आँखों से आँसू बहने लगे ।,वह आवाज सम्हाल कर बोली-इसका जवाब मैं फिर कभी दूँगी मेरी रामकहानी बड़ी दुःखमय है । सम्हतन्साहित्य में उसकी. बहुत प्रवेश था ।,आज से ब्रजविलासिनी वहीं रहने लगी ।,संस्कृत-साहित्य में उसका बहुत प्रवेश था । यहाँ तक कि राजजुमारियों और ग्रजविद्ञातिगी के बोच बड़ाईनछूटाई उद गयी और वे सहेछियो की भाँति रहते छगी ।,उसके रंग रूप और विद्या ने धीरे-धीरे राजकुमारियों के मन में उसके प्रति प्रेम और प्रतिष्ठा उत्पन्न कर दी ।,यहाँ तक कि राजकुमारियों और ब्रजविलासिनी के बीच बड़ाई-छोटाई उठ गयी और वे सहेलियों की भाँति रहने लगीं । यह वि को घरड़ियाँ मेधद्ूत और रघुवंध के पढने में कटी ।,कुँवर पृथ्वीसिंह और धर्मसिंह दोनों महाराज के साथ अफगानिस्तान की मुहीम पर गये हुए थे ।,यह विरह की घड़ियाँ मेघदूत और रघुवंश के पढ़ने में कटीं । "दाइ में झहर के मुख्य-स्थानो का निरीक्षण करके एक डाकदर के सामने - छिज़ने का सामात के कर बैठ गया और अपढ मजदूरों की चिट्टियाँ, मनीआईर आदि लिसने का व्यवस्ताय करने छमा ।",उसने एक धर्मशाला में असबाब रखा ।,बाद में शहर के मुख्य स्थानों का निरीक्षण करके एक डाकघर के सामने लिखने का सामान लेकर बैठ गया और अपढ़ मजदूरों की चिट्ठियाँ मनीआर्डर आदि लिखने का व्यवसाय करने लगा । "शाजू मुझे माई करके रोता है, मेऐे पास आना चाहता है, स्वास्थ्य नो अच्छा नही हैं ।",उत्तर आया तो उसके आनंद की सीमा न रही ।,ज्ञानू मुझे याद करके रोता है मेरे पास आना चाहता है स्वास्थ्य भी अच्छा नहीं है । प्यास को पादी में जोनतृष्ति होती है बहो तृष्ठि इस पत्र से सत्पप्रकाश को हुई |,ज्ञानू मुझे याद करके रोता है मेरे पास आना चाहता है स्वास्थ्य भी अच्छा नहीं है ।,प्यासे को पानी से जो तृप्ति होती है वही तृप्ति इस पत्र से सत्यप्रकाश को हुई । यूबक़ो को मित्र बहुत जहद मिल जाते है ।,उसी दिन से सत्यप्रकाश को यह चिंता हुई कि ज्ञान के लिए कोई उपहार भेजूँ ।,युवकों को मित्र बहुत जल्द मिल जाते हैं । बड़े देग से नेविक पतन और धारोणि बिताध दी घोर दौड़ा चछा जाता वा ।,आईना तेल कंघी का शौक भी पैदा हुआ जो कुछ पाता उड़ा देता ।,बड़े वेग से नैतिक पतन और शारीरिक विनाश की ओर दौड़ा चला जाता था । "' उस वक्‍त घ्ल्हया जछाना, भोजन पकाना बहुत अखरता ।",पर अब रात को अच्छी तरह नींद न आती बाजारी भोजन से घृणा होती रात को घर आता तो थक कर चूर-चूर हो जाता था ।,उस वक्त चूल्हा जलाना भोजन पकाना बहुत अखरता । कभी-कमों वह अपने क्केलेपत परः रोता ।,उस वक्त चूल्हा जलाना भोजन पकाना बहुत अखरता ।,कभी-कभी वह अपने अकेलेपन पर रोता । खेतों में हुछ चछानेबाले विमान ऊँचे ओर सुहावने स्वर गे गा रह घे ।,5 अमावस्या की अँधेरी रात गिरिजा के अंधकारमय जीवन की भाँति समाप्त हो चुकी थी ।,खेतों में हल चलाने वाले किसान ऊँचे और सुहावने स्वर से गा रहे थे । सर्दी से कॉपते हुए बच्चे सुर्य्य-रेदता से बाहर तिवलने को प्रार्येना कर रहे थे ।,खेतों में हल चलाने वाले किसान ऊँचे और सुहावने स्वर से गा रहे थे ।,सर्दी से काँपते हुए बच्चे सूर्य देवता से बाहर निकलने की प्रार्थना कर रहे थे । पनपट पर गाँव को अलवेलो स्त्रियों जमा हो गयो यो ।,सर्दी से काँपते हुए बच्चे सूर्य देवता से बाहर निकलने की प्रार्थना कर रहे थे ।,पनघट पर गाँव की अलबेली स्त्रियाँ जमा हो गयी थीं । इस भौड़-भब्भड से डुछ दूर पर दो-तीन मुदर दिलु मुर्माए हुए नवयुबक टहुल रहे थे ओर बैच जी से एकात से कुछ बातें किया चाहते थे ।,खाँसते हुए बच्चे और कराहते हुए बूढ़े उनके औषधालय के द्वार पर जमा हो चले थे ।,इस भीड़-भभ्भड़ से कुछ दूर पर दो-तीन सुंदर किंतु मुरझाये हुए नवयुवक टहल रहे थे और वैद्य जी से एकांत में कुछ बातें किया चाहते थे । यह. आपका पुरस्कार और फोस है ।,हकीम जी उठने की चेष्टा कर रहे थे कि सहसा देवदत्त उनके सम्मुख जा कर खड़े हो गये और नोटों का पुलिंदा उनके आगे पटक कर बोले-वैद्य जी ये पचहत्तर हजार के नोट हैं ।,यह आपका पुरस्कार और आपकी फीस है । उतके दस्वाजों पर घोडे बंधे हुए है ।,मैं अपने चपरासियों को दो रुपया माहवार देता हूँ और वे तंजेब के अँगरखे पहन कर निकलते हैं ।,उनके दरवाजों पर घोड़े बँधे हुए हैं । बरमसो तनस्‍््वाह का हिसाव नहीं करते ।,न जाने उनकी कमाई में क्या बरकत होती है ।,बरसों तनख्वाह का हिसाब नहीं करते । "जिसे इस नौकरो का चसका छये गया हूँ, उप्तके सामने -शहप्रीलदारी झूठी है ।",समझ लीजिए मुख्तारआम अपने इलाके में एक बड़े जमींदार से अधिक रोब रखता है उसका ठाट-बाट और उसकी हुकूमत छोटे-छोटे राजाओं से कम नहीं ।,जिसे इस नौकरी का चसका लग गया है उसके सामने तहसीलदारी झूठी है । "_ शताब्दियाँ व्यतीत हो गयी, बुंदेछलंड में कितते ही राज्यों का उदय धौर अस्त हुआ, मुसठमाव आये ओर गये, बुँदेला सजा उठे और गिरे--कोई गाँव, कोई इन्ताका ऐसा न था, जो इन दुर्गवस्थाओं से पीड़ित न हों; मकर इ् दुर्ग पर किसी शत की विजेय-पव का ने लहूराबी और इस गाँव में किसो विद्रोह का भो पृशर्रण थे हुआ ।",यह गढ़ी और गाँव दोनों एक बुंदेला सरकार के कीर्ति-चिह्न हैं ।,शताब्दियाँ व्यतीत हो गयीं बुंदेलखंड में कितने ही राज्यों का उदय और अस्त हुआ मुसलमान आये और बुंदेला राजा उठे और गिरे-कोई गाँव कोई इलाका ऐसा न था जो इन दुरवस्थाओं से पीड़ित न हो मगर इस दुर्ग पर किसी शत्रु की विजय-पताका न लहरायी और इस गाँव में किसी विद्रोह का भी पदार्पण न हुआ । इससे बढ़ अपने दुठ और मर्पाश की रक्षा किया करता था ।,अनिरुद्धसिंह के पास सवारों और पियादों का एक छोटा-सा मगर सजीव दल था ।,इससे वह अपने कुल और मर्यादा की रक्षा किया करता था । तीत वर्य पहले उसका विवाह शीनछा देवी से हुआ था; मगर अति््द विहार के दिन और विछारा को साें पहाड़ी में काटा था और झीतता उत्तकी जान की सैर मसाने में |,उसे कभी चैन से बैठना नसीब न होता था ।,तीन वर्ष पहले उसका विवाह शीतला देवी से हुआ था मगर अनिरुद्ध विहार के दिन और विलास की रातें पहाड़ों में काटता था और शीतला उसकी जान की खैर मनाने में । "बढ़ कितनी बार पति से अनुसेष कर चुरो दो, कितनों यार उसके ैसें पर गिर कद रोपी थी कि तुम मेरी आँखों से दूर न हो, मुझे हरिझए छे चछो, मुझे तुम्दारे साथ बनवास अच्छा है, यह वियोग अब नही सट्टा झाता ।",तीन वर्ष पहले उसका विवाह शीतला देवी से हुआ था मगर अनिरुद्ध विहार के दिन और विलास की रातें पहाड़ों में काटता था और शीतला उसकी जान की खैर मनाने में ।,वह कितनी बार पति से अनुरोध कर चुकी थी कितनी बार उसके पैरों पर गिर कर रोई थी कि तुम मेरी आँखों से दूर न हो मुझे हरिद्वार ले चलो मुझे तुम्हारे साथ वनवास अच्छा है यह वियोग अब नहीं सहा जाता । जब वह आगरे पहुँचा तो विगयदेवी से उसके लिए तिहाम्नु सजा दिया! हर हे! है» है औरंगजेब गुणज्ञ था ।,शाहजादा मुहीउद्दीन चम्बल के किनारे से आगरे की ओर चला तो सौभाग्य उसके सिर पर मोर्छल हिलाता था ।,जब वह आगरे पहुँचा तो विजयदेवी ने उसके लिए सिंहासन सजा दिया ! औरंगजेब गुणज्ञ था । "उसने बादशाही सरदारों के.अग॒राब क्षमा कर दिये, के राज्य-पद छोटा दिये और ह्ाजा चम्पतराय को उसके बहुमूल्य हृत्यों के उपलब्ध मे बारह हजारी मत्सव प्रदान ,क्रिया ।",जब वह आगरे पहुँचा तो विजयदेवी ने उसके लिए सिंहासन सजा दिया ! औरंगजेब गुणज्ञ था ।,उसने बादशाही अफसरों के अपराध क्षमा कर दिये उनके राज्य-पद लौटा दिये और राजा चम्पतराय को उसके बहुमूल्य कृत्यों के उपलक्ष्य में बारह हजारी मनसब प्रदान किया । भोरछठा से यनारक्त और बतारस से जमुना तक उसकी जागीर नियत को गयी ।,उसने बादशाही अफसरों के अपराध क्षमा कर दिये उनके राज्य-पद लौटा दिये और राजा चम्पतराय को उसके बहुमूल्य कृत्यों के उपलक्ष्य में बारह हजारी मनसब प्रदान किया ।,ओरक्षा से बनारस और बनारस से जमुना तक उसकी जागीर नियत की गयी । हि बली बहादुर ण्राँ बडा धावप्र-चतुर मनुष्य था ।,बुन्देला राजा फिर राज-सेवक बना वह फिर सुख-विलास में डूबा और रानी सारन्धा फिर पराधीनता के शोक से घुलने लगी ।,वली बहादुर खाँ बड़ा वाक्य-चतुर मनुष्य था । उसकी मृद्रुता ने शीघ्र ही उसे वादशाहू आलमग्रीर का विश्वामप्रारर बता दिया ।,वली बहादुर खाँ बड़ा वाक्य-चतुर मनुष्य था ।,उसकी मृदुता ने शीघ्र ही उसे बादशाह आलमगीर का विश्वासपात्र बना दिया । एक दित कुकर छत॒स्ताक् उसी थोड़े पर सवार हो.कर सैर को गया था ।,खाँ साहब के मन में अपने घोड़े के हाथ से निकल जाने का बड़ा शौक था ।,एक दिन कुँवर छत्रसाल उसी घोड़े पर सवार होकर सैर को गया था । उसने तुरंत बपने सेवकों को इशारा क्ित्रा ।,वली बहादुर ऐसे ही अवसर की ताक में था ।,उसने तुरन्त अपने सेवकों को इशारा किया । "यद्यपि जब जुद्घाइस्था के कारण यह शक्ति निःश्चेष हो चली भी, पर फिर भी इस बिय्या के गूढ तत्तों के पूर्ण जानकार थे |",राव साहब को गाने से प्रेम था वे स्वयं भी इस विद्या में निपुण थे ।,यद्यपि अब वृद्धावस्था के कारण यह शक्ति निःशेष हो चली थी पर फिर भी विद्या के गूढ़ तत्त्वों के पूर्ण जानकार थे । » भगत--भॉजा-शराब की ओर आजकल छोगरो की कड़ी निगाह हैं ।,ये देश के द्रोही हैं ।,भगत-गाँजा-शराब की ओर आजकल लोगों की कड़ी निगाह है । "नशा बुरी खत है, इसे सत्र जानते है ।",भगत-गाँजा-शराब की ओर आजकल लोगों की कड़ी निगाह है ।,नशा बुरी लत है इसे सब जानते हैं । अगर दुकानों मे न जाने से छोगो को तरशे को लल छूट जाय तो बढ़ो अक्तओ्र बात हैं ।,सरकार को नशे की दूकानों से करोड़ों रुपये साल की आमदनी होती है ।,अगर दूकानों में न जाने से लोगों की नशे की लत छूट जाय तो बड़ी अच्छी बात है । "इस्रे केबल समय का दुष्प्रयोग ही नहीं, वरन्‌ मन भौर वृद्धि-विकास के छिए घातक खयांद करते थे ।",शायद ही अपने जीवन में उन्होंने कोई किस्से-कहानी की किताब पढ़ी हो ।,इसे केवल समय का दुरुपयोग ही नहीं वरन् मन और बुद्धि-विकास के लिए घातक ख्याल करते थे । बहुधा मुहल्के के छोट्े-छोडे दुकानदारों की दूकात पर जा बैठते और उनके घादेन्डोडे तैंगे की रामकहानी सुनते ।,स्वदेशवासियों की सेवा के किसी अवसर को हाथ से न जाने देते ।,बहुधा मुहल्ले के छोटे-छोटे दूकानदारों की दूकान पर जा बैठते और उनके घाटे-टोटे मंदे-तेजे की रामकहानी सुनते । शर्न:-श्ने” काछेज से उन्हें घृणा हो गयो ।,बहुधा मुहल्ले के छोटे-छोटे दूकानदारों की दूकान पर जा बैठते और उनके घाटे-टोटे मंदे-तेजे की रामकहानी सुनते ।,शनैः-शनैः कालेज से उन्हें घृणा हो गयी । ",जिपर आँख उठाते, सप्चाटो दिखायी देंता ।",देखा तो मैदान खाली था ।,जिधर आँख उठाते सन्नाटा दिखाई देता । कानंदी वी और फिर देधा ।,औषधियाँ सभी पुष्टिकर और बलवर्द्धक थीं ।,आनंदी की ओर फिर देखा । उतका गा भी भर थामा ।,उसकी आँखों से अश्रुधारा बह रही थी ।,उनका गला भी भर आया । यहे-वहते-वट्ले बह फूट-फूट कर रोने खूगी ।,मर भी जाऊँगी तो कौन रोनेवाला बैठा हुआ है ।,यह कहते-कहते वह फूट-फूट कर रोने लगी । "वम्पित स्वर से बोले--आलंदी, संसार से कम से दम एक ऐसा आइमी है जो नुम्दारे छिए थपने घाग तक दे देगा ।",गोपीनाथ दार्शनिक थे पर अभी तक उनके मन के कोमल भाव शिथिल न हुए थे ।,कम्पित स्वर से बोले-आनंदी संसार में कम-से-कम एक ऐसा आदमी है जो तुम्हारे लिए अपने प्राण तक दे देगा । बडा हो बदुमुंत उदास्तीव मदुष्य है कि आते हो आते सो गया और अभो तक नहीं चौंका ।,वह स्वादिष्ट वस्तुएँ क्या हुईं जिनका आपने वादा किया था और जिनका स्मरण मैं प्रेमानुरक्त भाव से कर रहा हूँ द.-ज्योतिस्वरूप कहाँ गये से.-ऊर्द्ध्व संसार में भ्रमण कर रहे हैं ।,बड़ा ही अद्भुत उदासीन मनुष्य है कि आते ही आते सो गया और अभी तक नहीं चौंका । सब सामान मौजूद भौर चूल्हे से आग से जले ।,उसे और क्या कहूँ ।,सब सामान मौजूद और चूल्हे में आग न जली । सभा आाजाएँ मिट्टों मे मिल गयी ।,क्या सोचा था क्या हुआ ! मजे ले-ले कर समोसे और कोफ्ते खाते और गपड़चौथ मचाते ।,सभी आशाएँ मिट्टी में मिल गयीं । ईदइ्वर ने चाहा तो शोध इसका प्रायश्चित करूँगा ।,सभी आशाएँ मिट्टी में मिल गयीं ।,ईश्वर ने चाहा तो शीघ्र ही इसका प्रायश्चित्त करूँगा । "क्योकि एक तो दिन अर गली+ गली पूने के पश्चात्‌ सुझमे 'इत्तजार करने को , श्वक्ति ही नहीं, दूसरे ठोक म्पारह बजे बोडिय हाउस का दरवाजा बंद हो जाता है ।",अभी तो नौ बजे होंगे ! द.-नहीं अभी क्या देर होगी ! आ.-वहाँ बहुत इंतजार न कराना ।,क्योंकि एक तो दिन भर गली-गली घूमने के पश्चात् मुझमें इंतजार करने की शक्ति ही नहीं दूसरे ठीक ग्यारह बजे बोर्डिंग हाउस का दरवाजा बंद हो जाता है । "- मेने तो सेवती , से पहुले हो कह दिया है कि नौ वजे तक सब सामान तैयार रखना |",द.-अजी चलते-चलते थाली सामने आवेगी ।,मैंने तो सेवती से पहले ही कह दिया है कि नौ बजे तक सामान तैयार रखना । यदि मैदठी गुँदे छोले हुए भी तुम्दारे सम्मुख था जाय ठो सृझे कोई म्लान नहीं ।,द.-तुम्हारे और मेरे बीच में तो भाईचारे का सम्बन्ध है ।,यदि सेवती मुँह खोले हुए भी तुम्हारे सम्मुख आ जाय तो मुझे कोई म्लान नहीं । फिसु सापारधतः में परदे को श्रघ्ा का चंहायक बोर समर्थक हूँ ।,यदि सेवती मुँह खोले हुए भी तुम्हारे सम्मुख आ जाय तो मुझे कोई म्लान नहीं ।,किंतु साधारणतः मैं परदे की प्रथा का सहायक और समर्थक हूँ । यह एक छोटी रिपामत का अधिकारी और मद्दाराज यश्रव॑तसिहे की सेना का उच्च यद्माध्रिकारी था ।,इसका ब्याह कुँवर धर्मसिंह से हुआ था ।,यह एक छोटी रियासत का अधिकारी और महाराज यशवंतसिंह की सेना का उच्च पदाधिकारी था । धर्मामेह वढा उदार और कर्मदीर था ।,यह एक छोटी रियासत का अधिकारी और महाराज यशवंतसिंह की सेना का उच्च पदाधिकारी था ।,धर्मसिंह बड़ा उदार और कर्मवीर था । घर्ममिह अषिकतर नोषपुर में हो रहता था ।,इसे होनहार देख कर महाराज ने राजनंदिनी को इसके साथ ब्याह दिया था और दोनों बड़े प्रेम से अपना वैवाहिक जीवन बिताते थे ।,धर्मसिंह अधिकतर जोधपुर में ही रहता था । पृस्वो्िह की स्त्री दुर्पाडुवारि अहुत सुशोला और चतुप्त धी ।,जिस प्रकार इन दोनों राजकुमारों में मित्रता थी उसी प्रकार दोनों राजकुमारियाँ भी एक दूसरी पर जान देती थीं ।,पृथ्वीसिंह की स्त्री दुर्गाकुँवरि बहुत सुशीला और चतुर थी । राजनदियों ने ४ -सोछा तो बह संस्कृत का एक पत्र था ।,एक दिन दोनों राजकुमारियाँ बाग की सैर में मग्न थीं कि एक दासी ने राजनंदिनी के हाथ में एक कागज ला कर रख दिया ।,राजनंदिनी ने उसे खोला तो वह संस्कृत का एक पत्र था । थोड़ो देर में एक स्त्री सिर थे पर तक एक चादर आई क्षति विखायी दी ।,उसे पढ़ कर उसने दासी से कहा कि उन्हें भेज दे ।,थोड़ी देर में एक स्त्री सिर से पैर तक चादर ओढ़े आती दिखायी दी । "देवद्विया को अय कभी-कमी धोसा हो जाता कि सत्पप्रशाध घर म आ गया है, वह मुन्ने मारना चाहता है, ज्ञानप्रवाश यो बिए छिडाये दता है ।",अगर भोजन में नमक तेज हो गया तो यह शत्रु ने कोई रोड़ा रख दिया होगा ।,देवप्रिया को अब कभी-कभी धोखा हो जाता कि सत्यप्रकाश घर में गया है वह मुझे मारना चाहता है ज्ञानप्रकाश को विष खिलाये देता है । तूने मेरे छडफ़ पर वीकरण-अत्र चरा दिया है ।,वह कौन दिन आयेगा कि तेरी मिट्टी उठेगी ।,तूने मेरे लड़के पर वशीकरण-मंत्र चला दिया है । इस पत्रा वो बहू बहारिन वे हाथ डायप्र निशवा दिया करते थी ।,जब तक एक चिट्ठी में सत्यप्रकाश को गालियाँ न दे लेती उसे चैन ही न आता था ।,इन पत्रों को वह कहारिन के हाथ डाकघर भिजवा दिया करती थी । "शानप्रकाश ने जोर दे कर ल्सा, भव आप मेर हेतु बोई प् न उठये ।",अब यह अवलम्ब भी जाता रहा ।,ज्ञानप्रकाश ने जोर दे कर लिखा अब आप मेरे हेतु कोई कष्ट न उठायें । अर दोना वक्‍त भोजत करने गा ।,एक वक्त रूखा-सूखा खा कर एक तंग आर्द्र कोठरी में रह कर 25-30 रु. बच रहते थे ।,अब दोनों वक्त भोजन करने लगा । मम्र थोड़े हो दितो में उसके सर्च में ओऔपधियो की एक मद बढ़ गयो और फिर वही पहिले बो-्सी इशा हो गयो ।,कपड़े भी जरा साफ पहिनने लगा ।,मगर थोड़े ही दिनों में उसके खर्च में औषधियों की एक मद बढ़ गयी और फिर वही पहिले की-सी दशा हो गयी । "सत्पश्रकाश वो नौ अरुचि, मंदाग्ति भादि रोगा दे जा घेरा ।",बरसों तक शुद्ध वायु प्रकाश और पुष्टिकर भोजन से वंचित रह कर अच्छे से अच्छा स्वास्थ्य भी नष्ट हो सकता है ।,सत्यप्रकाश को भी अरुचि मंदाग्नि आदि रोगों ने आ घेरा । कभो-द्भी ज्वर भी बा जाता ।,सत्यप्रकाश को भी अरुचि मंदाग्नि आदि रोगों ने आ घेरा ।,कभी-कभी ज्वर भी आ जाता । "कभो बाजार मे पूरियाँ छे कर खा छेता, वी मिकाइयों पर टाल ददा |",सत्यप्रकाश पहिले सोता तो एक ही करवट में सबेरा हो जाता ।,कभी बाजार से पूरियाँ ले कर खा लेता कभी मिठाइयों पर टाल देता । ज्ञानू०---( सोते रोते ) मुझ्त न जाने क्या तुम्हारों बड़ी मुहब्बत लगतो हैं १ उत्य०-- तुम्हें सदेव याद रखूंगा ।,सत्य.-तुम्हारे स्कूल के पते से चिट्ठी लिखूँगा ।,ज्ञानू.-(रोते-रोते) मुझे न जाने क्यों तुम्हारी बड़ी मुहब्बत लगती है ! सत्य.-मैं तुम्हें सदैव याद रखूँगा । +.. महू बह कर उसने फिर भाई को गले से लगाया ओर घर से विकल पड़ा ।,ज्ञानू.-(रोते-रोते) मुझे न जाने क्यों तुम्हारी बड़ी मुहब्बत लगती है ! सत्य.-मैं तुम्हें सदैव याद रखूँगा ।,यह कह कर उसने फिर भाई को गले लगाया और घर से निकल पड़ा । पास एक कोडो भो न थो ओर वह कलकते जा रहा था ।,यह कह कर उसने फिर भाई को गले लगाया और घर से निकल पड़ा ।,पास एक कौड़ी भी न थी और वह कलकत्ते जा रहा था । धत्वप्रकाद्य मजबुरो करना नीच वाम समझता था ।,सरल है उनके लिए जो हाथ से काम कर सकते हैं कठिन है उनके लिए जो कलम से काम करते हैं ।,सत्यप्रकाश मजदूरी करना नीच काम समझता था । "वे सोचने लगै--न्यदि किसी कार्यालय थे बल वन जाऊँ तो अगना निर्वाह हो सकता हू, कितु सर्व- गाधारण से कुछ भो सम्बन्प न रहेगा ।",इच्छा थी कि ऐसा काम करना चाहिए जिससे अपना जीवन भी साधारणतः सुखपूर्वक व्यतीत हो और दूसरों के साथ भलाई और सदाचरण का भी अवसर मिले ।,वे सोचने लगे-यदि किसी कार्यालय में क्लर्क बन जाऊँ तो अपना निर्वाह हो सकता है किन्तु सर्वसाधारण से कुछ भी सम्बन्ध न रहेगा । "' कितना ही चाहो, पर वहाँ कड़ाई क्षोए डॉटडपट से घचे रहना अशम्भव है ।",शासन-विभाग में नियम और नीतियों की भरमार रहती है ।,कितना ही चाहो पर वहाँ कड़ाई और डाँट-डपट से बचे रहना असम्भव है । "वेतन तो अवश्य 'कम्र मिछेया; ' किन्तु दोन-खेतिहरों से "" रात-दित सम्बन्ध रहेगा, उसके साथ मद्‌व्यवहार का अवसर मिठेगा ।",इसी प्रकार बहुत सोच-विचार के पश्चात् उन्होंने निश्चय किया कि किसी जमींदार के यहाँ मुख्तारआम बन जाना चाहिए ।,वेतन तो अवश्य कम मिलेगा किंतु दीन खेतिहरों से रात-दिन सम्बन्ध रहेगा उनके साथ सद्व्यवहार का अवसर मिलेगा । "अुँवर साहब ने इन्हें खिए पे पैर घक्त देखा और कहा--सृड्ति जो, + आपको बने यहाँ रघने,में भुझे बड़ी प्रसश्नता होतो, किंतु आपके-योग्य मेरे,यहाँ- कोई स्थान नहीं देख पडता ।",पं. दुर्गानाथ ने उनके पास जा कर प्रार्थना की कि मुझे भी अपनी सेवा में रख कर कृतार्थ कीजिए ।,कुँवर साहब ने इन्हें सिर से पैर तक देखा और कहा-पंडित जी आपको अपने यहाँ रखने में मुझे बड़ी प्रसन्नता होती किंतु आपके योग्य मेरे यहाँ कोई स्थान नहीं देख पड़ता । स्वर्गीय दोगक भी पूँपले हो बे थे ।,वही अमावस्या की रात्रि थी ।,स्वर्गीय दीपक भी धुँधले हो चुके थे । उनको मात्रा सूर्यवारायण के जाने को सूचना दे रही थो ।,स्वर्गीय दीपक भी धुँधले हो चुके थे ।,उनकी यात्र सूर्यनारायण के आने की सूचना दे रही थी । मत्मतारायण कौ कथा धूम-धाम रो भुनने का निव्वय हो चुका था ।,कोई प्रार्थी उस समय उनके घर से निराश नहीं जा सकता था ।,सत्यनारायण की कथा धूमधाम से सुनने का निश्चय हो चुका था । इसमे मेरी ओर गिरिजा को जिंदगों ज्ञानंद से कट जायगी ।,ईश्वर ने मुझे इतना दे दिया है ।,इसमें मेरी और गिरिजा की जिंदगी आनंद से कट जायगी । "चिता"" और कष्ट में हो उस्तकी ऐसी दुर्गति चना दी है ।",उनके दिल में यह विचार गुदगुदा रहा था कि जिस समय गिरिजा इस आनंद-समाचार को सुनेगी उस समय अवश्य उठ बैठेगी ।,चिंता और कष्ट ने ही उसकी ऐसी दुर्गति बना दी है । किंतु जब गिरिजा तनिक भी ने मिनकी तेव उन्होंने चादर उठा दी और उसके मूँह की ओर देखा ।,देखो ईश्वर ने तुम्हारी विनती सुन ली और हमारे ऊपर दया की ।,कैसी तबीयत है किंतु जब गिरिजा तनिक भी न मिनकी तब उन्होंने चादर उठा दी और उसके मुँह की ओर देखा । इसी को राजभवित कहने है ।,3 भगत जी भी राजभक्ति का उपदेश करने लगे- भाइयो राजा का काम राज करना और प्रजा का काम उसकी आज्ञा का पालन करना है ।,इसी को राजभक्ति कहते हैं । "/ के ५ एक दाका-हराजा को भी तो अपने घर्म का पाउन करना चाहिए 2: * दूभरी शका--हमारे राजा तो नाम के है, असछो राजा तो विछाय॑त के बनिये-महाजन है ।",राजविमुख प्राणी नरक का भागी होता है ।,एक शंका-राजा को भी तो अपने धर्म का पालन करना चाहिए दूसरी शंका-हमारे राजा तो नाम के हैं असली राजा तो विलायत के बनिये-महाजन हैं । "गैय तुम्हें, छिक्षा देते हैं कि अद्माख्तो में मत जानो, पंचायतों मे मुकदमे ले जाजों; छेकिन ऐसे पत्र कहाँ है, जो सच्चा न्यात्र करें, दूध का दूध और पाती का पाती कर दें ! यहाँ मेह-देखो बातें होंगो ।",तीसरी शंका-बनिये धन कमाना जानते हैं राज करना क्या जानें ।,भगत-लोग तुम्हें शिक्षा देते हैं कि अदालतों में मत जाओ पंचायतों में मुकदमे ले जाओ लेकिन ऐसे पंच कहाँ हैं जो सच्चा न्याय करें दूध का दूध और पानी का पानी कर दें ! यहाँ मुँह-देखी बातें होंगी । "अदाक्तो मे सब कारवाई कानून पर होतो है, वढाँ छोटेन्तडे सब्र बराबर है, चेर-बकरी एक घाट पर पानी पोते है ।",जिनका कुछ दबाव है उनकी जीत होगी जिनका कुछ दबाव नहीं है वह बेचारे मारे जायँगे ।,अदालतों में सब कार्रवाई कानून पर होती है वहाँ छोटे-बड़े सब बराबर हैं शेर-बकरी एक घाट पर पानी पीते हैं । "नये पर, तगे सिर, क्घ पर एक मृयचम शरोर पर एक गेझुआ वस्त्र, हावा में एक सितार ।",थोड़ी देर में रागिया भीतर आया-सुन्दर सजीले बदन का नौजवान था ।,नंगे पैर नंगे सिर कंधे पर एक मृगचर्म शरीर पर एक गेरुआ वस्त्र हाथों में एक सितार । "उमावे बहा-योगो जो, हमार बडे भाग्य थे कि आपके दर्शन दंग, हेमका नो शोई पद शुना कर कृतार्थ कोजिए ।",प्रभा ने झिझकती हुई आँखों से देखा और दृष्टि नीचे कर ली ।,उमा ने कहा-योगी जी हमारे बड़े भाग्य थे कि आपके दर्शन हुए हमको भी कोई पद सुना कर कृतार्थ कीजिए । हि वोगी ने सिर झुका कर उत्तर दिय--हप्र सोगो छोग मारायण वा भजन करत हैं ।,उमा ने कहा-योगी जी हमारे बड़े भाग्य थे कि आपके दर्शन हुए हमको भी कोई पद सुना कर कृतार्थ कीजिए ।,योगी ने सिर झुका कर उत्तर दिया-हम योगी लोग नारायण का भजन करते हैं । "योगी वा रखीछा कर्ण स्वर, सिवार का मुमघुर निनाद, उस पर गीत को माय, प्रभा को बेसुष क्ये दता बा ।",कहाँ वह प्रीति कहाँ यह बिछरन कहाँ मधुबन की रीति कर गये थोड़े दिन की प्रीति ।,योगी का रसीला करुण स्वर सितार का सुमधुर निनाद उस पर गीत का माधुर्य प्रभा को बेसुध किये देता था । "इसका रमन्न स्वभाव और उसवा मधुर रख्ोा यान, अयूव संयोग था ।",योगी का रसीला करुण स्वर सितार का सुमधुर निनाद उस पर गीत का माधुर्य प्रभा को बेसुध किये देता था ।,इसका रसज्ञ स्वभाव और उसका मधुर रसीला गान अपूर्व संयोग था । हृदय सुब-्स्वप्त देवने छगा |,वे भावनाएँ जो अब तक शांत थीं जाग पड़ीं ।,हृदय सुख स्वप्न देखने लगा । छोग अपनोन्‍अपनी तलवारे गमालन छगे और चारों तर झोर मच गया ।,आलमगीर भी सहन में निकल आये ।,लोग अपनी-अपनी तलवारें सँभालने लगे और चारों तरफ शोर मच गया । + रानो--मैं अपना थोड़ा छूँगी ।,क्या रणनीति की इतनी मोटी बात भी आप नहीं जानते खाँ साहब-वह घोड़ा मैं नहीं दे सकता उसके बदले में सारा अस्तबल आपकी नजर है ।,रानी-मैं अपना घोड़ा लूँगी । दस नाम को हअकठकित रख हर में समाज वो बहुत छुछ सेवा कर सत्ता हूं ।,गोपी.-आनंदी मैं अपने को प्रेम पर बलिदान कर सकता हूँ लेकिन अपने नाम को नहीं ।,इस नाम को अकलंकित रखकर मैं समाज की बहुत कुछ सेवा कर सकता हूँ । मेँ प्रेम पर अपनी आत्मा व भी स्रोष्ठावर बर सकतो हूँ ।,मेरे लिए संभव है ।,मैं प्रेम पर अपनी आत्मा को भी न्योछावर कर सकती हूँ । पिजरे में गानेवाडी चिटिया दिल्तूत परतंशशिरों में आकर अपना राग सूद गयी ।,इसके आवेश में दर्शनानुराग भी विदा हुआ ।,पिंजरे में गानेवाली चिड़िया विस्तृत पर्वतराशियों में आ कर अपना राग भूल गयी । अमरनाय इस ब्यस्थ से बटुत छब्जित हुए ।,अध्यापकों का क्रियात्मक राजनीति में फँसना बहुत अच्छी बात नहीं ।,अमरनाथ इस व्यंग्य से बहुत लज्जित हुए । एक क्षण के बाई ग्रतिकार के आव से बोले---ुम आजकल दर्शन का अम्पास करते हो या नहीं ?,अमरनाथ इस व्यंग्य से बहुत लज्जित हुए ।,एक क्षण के बाद प्रतिकार के भाव से बोले-तुम आजकल दर्शन का अभ्यास करते हो या नहीं गोपी-बहुत कम । इसी दुवियां में पडा हुआ हूँ छि याप्ट्रीय सेवा का मा ग्रहण बरूँ या सत्य की खोज में जोवन व्यतोत कह ?,एक क्षण के बाद प्रतिकार के भाव से बोले-तुम आजकल दर्शन का अभ्यास करते हो या नहीं गोपी-बहुत कम ।,इसी दुविधा में पड़ा हुआ हूँ कि राष्ट्रीय सेवा का मार्ग ग्रहण करूँ या सत्य की खोज में जीवन व्यतीत करूँ । चनुर नाइन ने रावीवा शूगार किया और वह मुस्करा कर वोलो--कछ महाराज से इसका इनाम दूँगे ।,राजा जुझार सिंह शीशमहल में लेटे ।,"चतुर नाइन ने रानी का शृंगार किया और वह मुस्करा कर बोली, ""कल महाराज से इसका इनाम लूँगी ।" वह अप्मरान्धो माटूम होतो थी ।,यह सोच कर रानी बड़े शीशे के सामने खड़ी हो गई ।,वह अप्सरा-सी मालूम होती थी । "सुंदरता की ' वित्त ही तसवीरें उसने देखो थो, पर उसे इस समय शीदों को तसवीर मबमे ज्याश खूबसूरत मालूम होती थी ।",वह अप्सरा-सी मालूम होती थी ।,सुंदरता की कितनी ही तस्वीरें उसने देखी थीं; पर उसे इस समय शीशे की तस्वीर सबसे ज़्यादा खूबसूरत मालूम होती थी । भुदर्ता और आत्मदचि का साथ हैं ।,सुंदरता की कितनी ही तस्वीरें उसने देखी थीं; पर उसे इस समय शीशे की तस्वीर सबसे ज़्यादा खूबसूरत मालूम होती थी ।,सुंदरता और आत्मरुचि का साथ है । "लोग बहले है कि सुदरता में जादू हैँ और बढ़ पादू, जिगफ़ा कोई उतार नहीं ।",वह तन कर खड़ी हो गई ।,"लोग कहते हैं कि सुंदरता में जादू है और वह जादू, जिसका कोई उतार नहीं ।" "मैं मुइद ने सही, ऐसी बुरूषा भो नहीं हूँ ।","धर्म और कर्म, तन और मन सब सुंदरता पर न्यौछावर है ।","मैं सुंदर न सही, ऐसी कुरूपा भी नहीं हूँ ।" "मुशंग अपराध हुआ है, मुझे उनमे छामा मॉँगनो चाहिए ।",आह! यह मैं क्या स्वप्न देख रही हूँ! मेरे मन में ऐसी बातें क्यों आती हैं! मैं अच्छी हूँ या बुरी हूँ उनकी चेरी हूँ ।,"मुझसे अपराध हुआ है, मुझे उनसे क्षमा माँगनी चाहिए ।" यह सोच कर राती ने सत्र गठने उसार दिये ।,यह शृंगार और बनाव इस समय उपयुक्त नहीं है ।,यह सोच कर रानी ने सब गहने उतार दिए । इतर में यगी हुई रेशम को सादी अलग बर्‌ दी ।,यह सोच कर रानी ने सब गहने उतार दिए ।,इतर में बसी हुई रेशम की साड़ी अलग कर दी । "उनमें मे कुछ छोग हाथो में पौदल के ब्मइलु लिये हुए शिव-शिव, हर-हर, गषें-गगे, नारायघनतारायण बादि इब्द बोठते हुए चले जाते थे ।",मैं तुरंत उठ खड़ा हुआ और क्या देखता हूँ कि 15-20 वृद्धा स्त्रियाँ सफेद धोतियाँ पहिने हाथों में लोटे लिये स्नान को जा रही हैं और गाती जाती हैं: हमारे प्रभु अवगुन चित्त न धरो... मैं इस गीत को सुन कर तन्मय हो ही रहा था कि इतने में मुझे बहुत से आदमियों की बोलचाल सुन पड़ी ।,उनमें से कुछ लोग हाथों में पीतल के कमंडलु लिये हुए शिव-शिव हर-हर गंगे-गंगे नारायण-नारायण आदि शब्द बोलते हुए चले जाते थे । "में भी इन झादमियों के साथ हो लिया, और ६ सीऊ तक पहाड़ी मार्ग पार करके उच्ो नदी बेर किसारे पहुँचा, जिशृदा वाम परतितयावतों हैं, जिसक्री लहरों में दुबकी छगाना और जिसकी गोद में मरना हत्येक हिंद अअना परम सौभाखख समझता है ।",आनंदातिरेक से मेरा हृदय आनंदमय हो गया ।,मैं भी इन आदमियों के साथ हो लिया और 6 मील तक पहाड़ी मार्ग पार करके उसी नदी के किनारे पहुँचा जिसका नाम पतित-पावनी है जिसकी लहरों में डुबकी लगाना और जिसकी गोद में मरना प्रत्येक हिंदू अपना परम सौभाग्य समझता है । पतित- पादती मावीरदी गया मेरे प्यारे गाँव से छै-तात मौल पर बहती थों ।,मैं भी इन आदमियों के साथ हो लिया और 6 मील तक पहाड़ी मार्ग पार करके उसी नदी के किनारे पहुँचा जिसका नाम पतित-पावनी है जिसकी लहरों में डुबकी लगाना और जिसकी गोद में मरना प्रत्येक हिंदू अपना परम सौभाग्य समझता है ।,पतित-पावनी भागीरथी गंगा मेरे प्यारे गाँव से छै-सात मील पर बहती थी । कुछ छोग वात पर बेठे गायत्रो-सत्र जप रहे थे ।,यहाँ मैंने हजारों मनुष्यों को इस ठंडे पानी में डुबकी लगाते हुए देखा ।,कुछ लोग बालू पर बैठे गायत्री-मंत्र जप रहे थे । दुछ छोग हवत करने मैं संहम्त ये ।,कुछ लोग बालू पर बैठे गायत्री-मंत्र जप रहे थे ।,कुछ लोग हवन करने में संलग्न थे । "मै तुमे कुछ बिदाई देना चोहतो हैं, वह तुझे स्वीकार करती पढ़ेगो ।",तूने मेरे राजवंश का उद्धार कर दिया नहीं तो कोई पितरों को जल देनेवाला भी न रहता ।,मैं तुझे कुछ बिदाई देना चाहती हूँ वह तुझे स्वीकार करनी पड़ेगी । नौकद चाकरो को -कड़ो आाद्ना दे दी गयी है कि मेरो शाति में बाधक न' हो ।,मैं नित्यप्रति अर्जुन नगर जाती हूँ और रियासत के आवश्यक काम-काज करके लौट आती हूँ ।,नौकर-चाकरों को कड़ी आज्ञा दे दी गयी है कि मेरी शांति में बाधक न हों । रिथरामत की सम्पूर्ण आप शरोपकार हें ब्यय होती हैं ।,नौकर-चाकरों को कड़ी आज्ञा दे दी गयी है कि मेरी शांति में बाधक न हों ।,रियासत की सम्पूर्ण आय परोपकार में व्यय होती है । "मेने 'इन दो वर्षों मे बीस, बढ़े बड़े ताछावः धनवा दिये है ओर चालोस बोचाछाएँ बतवा दी है ।",आपको अवकाश हो तो आप मेरी रियासत का प्रबंध देख कर बहुत प्रसन्न होंगे ।,मैंने इन दो वर्षों में बीस बड़े-बड़े तालाब बनवा दिये हैं और चालीस गोशालाएँ बनवा दी हैं । मेरा विदार हैं कि अपनी रियासत में हरी का ऐसा जाछ दिद्ला दूँ जैठ्टे शरोर में नाडियो का ।,मैंने इन दो वर्षों में बीस बड़े-बड़े तालाब बनवा दिये हैं और चालीस गोशालाएँ बनवा दी हैं ।,मेरा विचार है कि अपनी रियासत में नहरों का ऐसा जाल बिछा दूँ जैसे शरीर में नाड़ियों का । "हैं मुत्ठाफिर, में राजपूत की कन्या हूँ ।",इसके अतिरिक्त उद्धार का और कोई उपाय नहीं ।,ऐ मुसाफिर मैं राजपूत की कन्या हूँ । यदि में उसके चरणों पर प्ौघ् रख देतो तो कदाचित्‌ उसे मुझ पर दया आ जाती; किंतु शाजपूत क्री अन्‍्या इतनी अप्रमाव नहीं सह सकती ।,उसका हृदय दया का आगार था ।,यदि मैं उसके चरणों पर शीश रख देती तो कदाचित् उसे मुझ पर दया आ जाती किंतु राजपूत की कन्या इतना अपमान नहीं सह सकती । - बई महीने “ गुजर गये ।,मैंने पटरे से उतर कर पतिदेव के चरणों पर सिर झुकाया और उन्हें साथ लिये हुए अपने मकान चली आयी ।,कई महीने गुजर गये । में पतिदेव को सेवा-शुधूपा में तन मत से व्यस्त “शहती ।,कई महीने गुजर गये ।,मैं पतिदेव की सेवा-सुश्रुषा में तन-मन से व्यस्त रहती । में उन्हें दोनों बेला दूंब शिलाती थोर सध्या समय उद्दे साथ हे कर सहादियों की सैर कराती ।,मेरी पशुशाला में सैकड़ों गायें-भैंसें थीं किंतु शेरसिंह ने कभी किसी की ओर आँख उठा कर भी न देखा ।,मैं उन्हें दोनों वेला दूध पिलाती और संध्या समय उन्हें साथ लेकर पहाड़ियों की सैर कराती । उनके मिर पर रत्ल-जटित मुकुट की जगह जेयरेजी दोपो यी ।,लखनऊ के बादशाह नासिरुद्दीन अपने मुसाहबों और दरबारियों के साथ बाग की सैर कर रहे थे ।,उनके सिर पर रत्नजटित मुकुट की जगह अँग्रेजी टोपी थी । मुसाहवों में पाँव अंगरेज ये ।,वस्त्र भी अँग्रेजी ही थे ।,मुसाहबों में पाँच अँग्रेज थे । घरीर खूब गठा हुआ ।,वह अधेड़ आदमी थे ।,शरीर खूब गठा हुआ था । "उसे न संगठत भा, न बछ ।",बादशाही सेना की दशा हीन से हीनतर होती जाती थी ।,उसमें न संगठन था न बल । वरसों तझ सिपाहियों का वेतव न मिलता |,उसमें न संगठन था न बल ।,बरसों तक सिपाहियों का वेतन न मिलता था । "मैं अंथा था, अनजान था ।",हाय ! उस देवता को कहाँ पाऊँ जो कोई उसके दर्शन करा दे आधी जायदाद उस पर न्योछावर कर दूँ-प्यारे पंडित ! मेरे अपराध क्षमा करो ।,मैं अंधा था अज्ञानी था । अब मेरे बांह पकूडो ।,मैं अंधा था अज्ञानी था ।,अब मेरी बाँह पकड़ो । बुंवर साहब मे उनकी बोर अपबुलो औँणों से देखा ।,हितार्थी और सम्बन्धियों का समूह सामने खड़ा था ।,कुँवर साहब ने उनकी ओर अधखुली आँखों से देखा । सक््या हितेषी कही देख ने पड़ा ।,कुँवर साहब ने उनकी ओर अधखुली आँखों से देखा ।,सच्चा हितैषी कहीं देख न पड़ा । सबके चेहरे पर हवा को सलक पी ।,सच्चा हितैषी कहीं देख न पड़ा ।,सबके चेहरे पर स्वार्थ की झलक थी । निराणा से आँखें मूँद स्थे ।,सबके चेहरे पर स्वार्थ की झलक थी ।,निराशा से आँखें मूँद लीं । "वे तौवयाव्रा करने आये हैं, कितु दमते पहुछे पहुँच जायेंगे ।",कुछ देर पीछे रानी ने पूछा-यह पड़ाव किसका है सिपाही ने कहा-राणा जंगबहादुर का ।,वे तीर्थयात्र करने आये हैं किन्तु हमसे पहले पहुँच जायेंगे । आप जामूसो को दुष्ट से के बच सकती ।,सिपाही-यहाँ उनसे मिलना असम्भव था ।,आप जासूसों की दृष्टि से न बच सकतीं । "स्वर्य प्रादी में उतर जाते और इूदते-उत्तराते, वहते, लवर खाई पार पहुँच जाते ।",न नदियों में नाव न नालों पर घाट किंतु घोड़े सधे हुए थे ।,स्वयं पानी में उतर जाते और डूबते-उतराते बहते भँवर खाते पार पहुँच जाते । है! कहीं ऊँचे ऊँच साखू और महुए के जयछ थ और कही हर-भर जायुत कै बन ।,यह यात्र उससे कम भयानक न थी ।,कहीं ऊँचे-ऊँचे साखू और महुए के जंगल थे और कहीं हरे-भरे जामुन के वन । यहाँ तक पहलर में मैजी और धनिष्ठता बदी कि मानअतिष्ठा का विचार भी जाता रहा ।,किंतु जब राजा साहब से मेल-जोल बढ़ा तो उनके आग्रह से विवश हो कर राजमहल में चले आये ।,यहाँ तक परस्पर मैत्री और घनिष्ठता बढ़ी कि मान-प्रतिष्ठा का विचार जाता रहा । "- राजा मांदेश पंडित जी से सस्कृत री पढ़ते थे ओर उनके समय का अधिकाद भाग पंडित जी के मकान प्र हो कटवा या, कितु भोक ! मदद - दिग्वाप्रेम या शुद मित्रभाव को आरर्पण ने था ।",यहाँ तक परस्पर मैत्री और घनिष्ठता बढ़ी कि मान-प्रतिष्ठा का विचार जाता रहा ।,राजा साहब पंडित जी से संस्कृत भी पढ़ते थे और उनके समय का अधिकांश भाग पंडित जी के मकान पर ही कटता था किन्तु शोक ! यह विद्याप्रेम या शुद्ध मित्रभाव का आकर्षण न था । "जिस प्रद्मार छतरंगें मारदा हुआ हिरन व्याप्न की फँलायी हुई हरी-हरी घास सें प्रसन्न हो कर. उस और बढ़ता है. और यह नही समझता कि प्रत्येक-पण सुझे कर्वनाज्ध को मोर डिये जाता हैं, उसी माँति विद्याधरी को उसका चचछ मर्न क्रंघक्ार को ओर खोजे लिये जाता था ।",भोली-भाली विद्याधरी मनोविकारों की इस कुटिल नीति से बेखबर थी ।,जिस प्रकार छलाँगें मारता हुआ हिरन व्याध की फैलायी हुई हरी-हरी घास से प्रसन्न हो कर उस ओर बढ़ता है और यह नहीं समझता कि प्रत्येक पग मुझे सर्वनाश की ओर लिये जाता है उसी भाँति विद्याधरी को उसका चंचल मन अंधकार की ओर खींचे लिए जाता था । हमर अपनी गांदों कमाई के करोड़ों रुसदे गाज-ाराद में उडा दंते हैं ।,अब गाँव-गाँव और गली-गली में मदिरा की दूकानें हैं ।,हम अपनी गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये गाँजे-शराब में उड़ा देते हैं । "जनता---जो दासभाँग पियें उसे डॉड़ लूग'ना चाहिए ! चौधरी-हमारे, दाश-वाबा, छोटेन्वड्रे खव गाश-गजी पहनते थे ।",हम अपनी गाढ़ी कमाई के करोड़ों रुपये गाँजे-शराब में उड़ा देते हैं ।,जनता-जो दारू-भाँग पिये उसे डाँड़ लगाना चाहिए ! चौधरी-हमारे दादा-बाबा छोटे-बड़े सब गाढ़ा-गजी पहनते थे । "इस निप्टुर वैद्य को यहाँ कैसे छायें २--जालिम, मै सारी उमर तेरी गुलामो करता ।",शोक में इस योग्य भी नहीं थे कि प्राणों से भी अधिक प्यारी गिरिजा का दवा-दरपन कर सकें ।,क्या करें इस निष्ठुर वैद्य को यहाँ कैसे लायें जालिम मैं सारी उमर तेरी गुलामी करता । उसके इस विनोत भाव से कुछ लज्जित हो कर पडित जो बोछू--नापका आग्रमन कहाँ से हुआ 2. _ हु४« _ नवयुवक ने बडे नम्न शब्दों में जवाव दिया ।,पंडित जी को देखते ही उसने रकाब पर पैर रखा और नीचे उतर कर उनकी वंदना की ।,उसके इस विनीत भाव से कुछ लज्जित हो कर पंडित जी बोले-आपका आगमन कहाँ से हुआ नवयुवक ने बड़े नम्र शब्दों में जवाब दिया । राजा--मह मेरी अंतिम यावना है ।,सारन्धा-मरते दम तक न टालूँगी ।,राजा-यह मेरी अन्तिम याचना है । राजा--ं बैड़ियाँ पहनने के छिए जोवित रहना नदी चाहग ।,आँखों में नैराश्य छा गया ।,राजा-मैं बेड़ियाँ पहनने के लिए जीवित रहना नहीं चाहता । "दो तीन बार उसे मतमाने भोजन करने की ऐसी प्रवर् उल्कथ हुई कि उसने संदिग्ध सावनो द्वारा उसको पूरा करने की चेष्ठा की, पर जब परिषाप्र जाश्या के प्रतिकूल हुआ और स्वादिष्ट पदार्थों के बदके अदचिकर दुर्पाद्य वस्नुएँ भर-पेट खाने को मिली--जिससे पेट के बदले कई दिन तक पीठ “मे दिपम बेदना होती रही--तो उसने विवश हो कर फिर सन्मार्ग का अभ्िय श्षरे मानसणेवर भाधो--अब वह कैफियत नहीं हैं ।",महीनों बीत जाते और पेट भर भोजन न मिलता ।,दो-तीन बार उसे मनमाने भोजन करने की ऐसी प्रबल उत्कंठा हुई कि उसने संदिग्ध साधनों द्वारा उसको पूरा करने की चेष्टा की पर जब परिणाम आशा के प्रतिकूल हुआ और स्वादिष्ट पदार्थों के बदले अरुचिकर दुर्ग्राह्य वस्तुएँ भरपेट खाने को मिलीं-जिससे पेट के बदले कई दिन तक पीठ में विषम वेदना होती रही-तो उसने विवश हो कर फिर सन्मार्ग का आश्रय लिया । दिन-दहाओं डाके पढ़ते है ।,माधो-अब वह कैफियत नहीं है ।,दिनदहाड़े डाके पड़ते हैं । "कहों कोई सुत छे, तो छेने के देने पढ़ जायें ।",दीवार के भी कान होते हैं ।,कहीं कोई सुन ले तो लेने के देने पड़ जायँ । यहूँ सब उन्हीं को बददतजामो का फक हैं ।,माधो (इधर-उधर चौकन्नी आँखों से देख कर)-एक महीना हुआ रोशनुद्दौला के हाथ में सियाह-सफेद का अख्तियार आ गया है ।,यह सब उन्हीं की बदइंतजामी का फल है । फ़िश्गियों पर उनकी कडो हिगाह रहती थी ।,उनका रोब सभी पर छाया हुआ था ।,फिरंगियों पर उनकी कड़ी निगाह रहती थी । सरकारों भमले अछग छूटतें है ।,बस तब से बाजार में लूट मची हुई है ।,सरकारी अमले अलग लूटते हैं । फिरगी अछग नोचवे-समोदते हैं ।,सरकारी अमले अलग लूटते हैं ।,फिरंगी अलग नोचते-खसोटते हैं । "जो चोज चाहने है, उठा के, जाते हूँ ।",फिरंगी अलग नोचते-खसोटते हैं ।,जो चीज चाहते हैं उठा ले जाते हैं । क्षमों हाल ही में हम सद मिले कर वादेशाहू-संछामत बे खिद्ममत में हाजिर हुए थे ।,शाही दरबार में फरियाद करो तो उलटे सजा होती है ।,अभी हाल ही में हम-सब मिल कर बादशाह-सलामत की खिदमत में हाजिर हुए थे । "पहले तो बह बहुत नाराज हुए, पर आखिर रहने जआा गगे ।",अभी हाल ही में हम-सब मिल कर बादशाह-सलामत की खिदमत में हाजिर हुए थे ।,पहले तो वह बहुत नाराज हुए पर आखिर रहम आ गया । बादशाहो छा मित्रांज ही तो है ।,पहले तो वह बहुत नाराज हुए पर आखिर रहम आ गया ।,बादशाहों का मिजाज ही तो है । हमारों सत्र शिकायने सुनी और तसकौन दी कि हम तह्कीकात करेंगे ।,बादशाहों का मिजाज ही तो है ।,हमारी सब शिकायतें सुनीं और तसकीन दी कि हम तहकीकात करेंगे । माधोदास उनदा रग-ठग देख कर चौड़ा ।,इतने में तीन आदमी राजपूती ढंग की मिर्जई पहने आ कर दूकान के सामने खड़े हो गये ।,माधोदास उनका रंग-ढंग देख कर चौंका । झाहीं फौज के सिपाई बहुवा इसी सज-वज से निकठले थे ।,माधोदास उनका रंग-ढंग देख कर चौंका ।,शाही फौज के सिपाही बहुधा इसी सज-धज से निकलते थे । » पुंढित देवदत्त की जाँखों में आाँमु भर जाये ।,अब मेरा जन्म सफल हुआ ।,पंडित देवदत्त की आँखों में आँसू भर आये । दे संभल कर बोले--सस्भवतः हाँ ।,अंत में ठाकुर ने कहा-आपके पास तो वे चिट्ठियाँ होंगी देवदत्त का दिल बैठ गया ।,वे सँभल कर बोले-सम्भवतः हों । "इन्स०--पाद रख्षिएं, यहू इज्जत खाक में मिल जायगी ।",कोई और गवाह बना लीजिए ।,इन्स.-याद रखिए यह इज्जत खाक में मिल जायगी । "चंदू०---छित जाब, बला से ! के इन्त ०--इनकम टेक्‍्स को जाँच फिर से होगो ।",चंदू-उससे कौन रोटियाँ चलती हैं इन्स.-बंदूक का लाइसेंस छिन जायगा ।,चंदू.-छिन जाय बला से ! इन्स.-इनकम टैक्स की जाँच फिर से होगी । इन्स ०--अच्छी वात हैं ।,चंदू.-कुरसी ले कर चाटूँ दिवाला तो निकला जा रहा है ।,इन्स.-अच्छी बात है । घनन्सबब की चिता ने सारो इच्छाआ को परास्त कर दिया ।,भोजन भी रूखा-सूखा करने लगा ।,धन-संचय की चिंता ने सारी इच्छाओं को परास्त कर दिया । उसने निडवय किया कि एक अच्छोन्सी घड़ो भेजू ।,धन-संचय की चिंता ने सारी इच्छाओं को परास्त कर दिया ।,उसने निश्चय किया कि अच्छी-सी घड़ी भेजूँ । "किशोतवस्था में 'घर' मादा प्रिता, माई-्वहिन, सखी-सहैछो के प्रेम को याद दिलावा है, प्रोद्इस्था में गृहिणी और बाल-वच्ची के प्रेतत की ।",प्रेम ने बहुत तपस्या करके यह वरदान पाया है ।,किशोरावस्था में घर माता-पिता भाई-बहन सखी-सहेली के प्रेम की याद दिलाता है प्रौढ़ावस्था में गृहिणी और बाल-बच्चों के प्रेम की । "उम्री के निमित वहू एक-एक पैसे को करिसायत करता था, उपती के लिए वह कठिन परिधम करता था और घतोपाजंन के नये नये उपाय सोचता घा ।",सत्यप्रकाश का घर कहाँ था वह कौन-सी शक्ति थी जो कलकत्ते के विराट प्रलोभनों से उसकी रक्षा करती थी -माता का प्रेम पिता का स्नेह बाल-बच्चों की चिंता -नहीं उनका रक्षक उद्धारक उसका पारितोषिक केवल ज्ञानप्रकाश का स्नेह था ।,उसी के निमित्त वह एक-एक पैसे की किफायत करता था उसी के लिए वह कठिन परिश्रम करता था और धनोपार्जन के नये-नये उपाय सोचता था । "यह्द देखप्रिया पो विपदृकठ शिखनी से विकला हुआ जहर का प्याठा पा, जिसने एक पछ में गश्ाहीन बर दिया ।",एक क्षण में पत्र उसके हाथ से छूट कर गिर पड़ा और वह सिर थाम कर बैठ गया कि जमीन पर न गिर पड़े ।,यह देवप्रिया की विषयुक्त लेखनी से निकला हुआ जहर का प्याला था जिसने एक पल में संज्ञाहीन कर दिया । में इतने दिनों से केवल उपके जीवत को मिट्टी में मिझाले # लिए ही प्रेम या स्तरॉय भर रहा हैं ।,हा ! सारा जीवन नष्ट हो गया ! मैं ज्ञानप्रकाश का शत्रु हूँ ।,मैं इतने दिनों से केवल उसके जीवन को मिट्टी में मिलाने के लिए ही प्रेम का स्वाँग भर रहा हूँ । पत्र जावी ओर फाड़ दिया जाता ।,फिर वह एक नित्य का कर्म हो गया ।,पत्र आता और फाड़ दिया जाता । "उनने दूशान बद कर दी, बाहर आतानजाना छाड़ दमा ।",एक महीने की भीषण हार्दिक वेदना के बाद सत्यप्रकाश को जीवन से घृणा हो गयी ।,उसने दूकान बंद कर दी बाहर आना-जाना छोड़ दिया । "वरदिये याई जाते जब माता पुकार वर नोद में दिया छेतों और कहती, बेटा!"" पिता जो सच्या समय दफ़र से था कर गोद में उठा छेते और बहते 'भैया !' माता बी सजीव मूर्ति उसके सामने बा खड होती, ठोक वैमी हो जब वह गगा-स्नान बरने गयी थी ।",सारे दिन खाट पर पड़ा रहता ।,वे दिन याद आते जब माता पुचकार कर गोद में बिठा लेती और कहती बेटा ! पिता भी संध्या समय दफ्तर से आकर गोद में उठा लेते और कहते भैया ! माता की सजीव मूर्ति उसके सामने आ खड़ी होती ठीक वैसी ही जब वह गंगा-स्नान करने गयी थी । उसको ध्यारू भरी दातें काना में आने एगठी ।,वे दिन याद आते जब माता पुचकार कर गोद में बिठा लेती और कहती बेटा ! पिता भी संध्या समय दफ्तर से आकर गोद में उठा लेते और कहते भैया ! माता की सजीव मूर्ति उसके सामने आ खड़ी होती ठीक वैसी ही जब वह गंगा-स्नान करने गयी थी ।,उसकी प्यार-भरी बातें कानों में आने लगतीं । "ही ईश्वए०--वहालत मे भेजोगी, पर देख लेगा, पछताना पढेगा ।",यह घर-फूँक काम आप ही को मुबारक रहे ।,ईश्वर.-वकालत में भेजोगी पर देख लेना पछताना पड़ेगा । ". सानकी--वह चाहे मजूरो करे, पर इस काम मे न डाूंगों ।",कृष्णचंद्र उस पेशे के लिए सर्वथा अयोग्य है ।,मानकी-वह चाहे मजूरी करे पर इस काम में न डालूँगी । ईद्वर०--सुमते मुझ्ते देसकर समझ लिया कि ईम काम मैं घाटा ही घादा हैं ।,मानकी-वह चाहे मजूरी करे पर इस काम में न डालूँगी ।,ईश्वर.-तुमने मुझे देख कर समझ लिया कि इस काम में घाटा ही घाटा है । आत्मा के गौख के सामने घय को कुछ न रासशा ।,अपने सिद्धांतों के पालन में उन्हें कितनी ही बार अधिकारियों की तीव्र दृष्टि का भाजन बनना पड़ा था कितनी ही बार जनता का अविश्वास यहाँ तक कि मित्रों की अवहेलना भी सहनी पड़ी थी पर उन्होंने अपनी आत्मा का कभी हनन नहीं किया ।,आत्मा के गौरव के सामने धन को कुछ न समझा । यह तम्बाकू बाछे को दुकान है; इसके बाद चौथा प्रकान मेश दो है ।,द.-लो अब तो आ ही जाते हैं ।,यह तम्बाकूवाले की दूकान है इसके बाद चौथा मकान मेरा ही है । देखना भीढ़ियों पर बेंधेस है ।,द.-यह लो आ गये ।,देखना सीढ़ियों पर अँधेरा है । अगरेजी में हो दा करेंगे ।,आ.-इतना तो अच्छा है ।,अँगरेजी में ही बातें करेंगे । "जसने दोनों दवायों से उसका अंचछ पकड़ कर रहा--अस्माँ ! ५... कितना जरुचिफर दाब्द था, कितना छम्जायुक्‍त, करितता अग्रिप ! पह : छलना जो 'देवप्रिया' नाम से सम्बोधित होती थी, पह उत्तर-दाधित्व, त्याग -« और क्षमा का सम्बोधन ने सह सकी ।",एक लावण्यमयी मूर्ति आभूषण से लदी सामने खड़ी थी ।,उसने दोनों हाथों से उसका अंचल पकड़ कर कहा-अम्माँ ! कितना अरुचिकर शब्द था कितना लज्जायुक्त कितना अप्रिय ! वह ललना जो देवप्रिया नाम से सम्बोधित होती थी यह उत्तरदायित्व त्याग और क्षमा का सम्बोधन न सह सकी । अभी बह प्रेम ओर विलास का सुमस्वष्त - दैख रही धी--यौवतकाऊ की मदमय वायुतरंगों में भादोशित हो रही थी ।,उसने दोनों हाथों से उसका अंचल पकड़ कर कहा-अम्माँ ! कितना अरुचिकर शब्द था कितना लज्जायुक्त कितना अप्रिय ! वह ललना जो देवप्रिया नाम से सम्बोधित होती थी यह उत्तरदायित्व त्याग और क्षमा का सम्बोधन न सह सकी ।,अभी वह प्रेम और विलास का सुख-स्वप्न देख रही थी-यौवनकाल की मदमय वायुतरंगों में आंदोलित हो रही थी । कुछ रुए हो कर बोलौ--मुशे अम्माँ मत कहो ।,इस शब्द ने उसके स्वप्न को भंग कर दिया ।,कुछ रुष्ट होकर बोली-मुझे अम्माँ मत कहो । हेस किय गिनती में है ।,सौत का पुत्र विमाता की आँखों में क्यों इतना खटकता है इसका निर्णय आज तक किसी मनोभाव के पंडित ने नहीं किया ।,हम किस गिनती में हैं । ": जिस दिन उसकी गोद मे. एक चांदसे बच्चे का-आगमत हुआ, सत्ता खूब उछलय-ूदा ओर सौरणढ में. दोड़ा हुआ “बच्चे को- देखते गया ।",देवप्रिया जब तक गर्भिणी न हुई वह सत्यप्रकाश से कभी-कभी बातें करती कहानियाँ सुनातीं किंतु गर्भिणी होते ही उसका व्यवहार कठोर हो गया और प्रसवकाल ज्यों-ज्यों निकट आता था उसकी कठोरता बढ़ती ही जाती थी ।,जिस दिन उसकी गोद में एक चाँद-से बच्चे का आगमन हुआ सत्यप्रकाश खूब उछला-कूदा और सौरगृह में दौड़ा हुआ बच्चे को देखने लगा । उसके लछाट पर पमीने वी ठडी-ठडी दूँदे दिखायी. दे रही थी और ग्रॉस तेजी से चलते लगी थी; पर चेहरे पर प्रसन्नता और सतोप बुत झलक दिखायी देतो थी ।,"उसने एक ठंडी सांस लीं, दोनों हाथ जोड़ कर जुझार सिंह को प्रणाम किया और ज़मीन पर बैठ गया ।",उसके ललाट पर पसीने की ठंडी-ठंडी बूँदें दिखाई दे रही थीं और साँस तेजी से चलने लगी थी; पर चेहरे पर प्रसन्नता और संतोष की झलक दिखाई देती थी । मैं छाहोर को रादी चंद्रकुंवरि हूँ ।,रानी बोली-अच्छा तो सुनो ।,मैं लाहौर की रानी चन्द्रकुँवरि हूँ । झिनारे कै वृक्ष और ऊपर जममगाते हुए “मारे स्ाय-प्ताय दौड़ने लगे ।,मल्लाह ने विनीत भाव से अपना कम्बल बिछा दिया और तेजी से डाँड़ चलाने लगा ।,किनारे के वृक्ष और ऊपर जगमगाते हुए तारे साथ-साथ दौड़ने लगे । ",परतु वहां पहले से हो पुद्धित और सेना का / जाल ब्रिछा हुआ था ।",उधर रानी बनारस पहुँची ।,परन्तु वहाँ पहले से ही पुलिस और सेना का जाल बिछा हुआ था । तगर के नाक़े वंद थे ।,परन्तु वहाँ पहले से ही पुलिस और सेना का जाल बिछा हुआ था ।,नगर के नाके बन्द थे । उसने उनको ओर दब्राप्रार्था नेत्रों से देंगा ।,मुख पीला था शरीर घुल गया था ।,उसने उनकी ओर दयाप्रार्थी नेत्रों से देखा । का से मे शरनेवाला राजपूत शक स्त्री को आग्नेय वृष्टि रो कप उठा ।,मुँह से एक शब्द भी न निकला ।,काल से न डरनेवाला राजपूत एक स्त्री की आग्नेय दृष्टि से काँप उठा । "यह भहठु बीती, जछ-बद ने बर्फ की घुफेद चादर ओही, जलूपक्षियों को मालाएँ मैदानों को ओर उडती हुईं दिखायो देने झगों ।",एक वर्ष बीत गया हिमालय पर मनोहर हरियाली छायी फूलों ने पर्वत की गोद में क्रीड़ा करनी शुरू की ।,यह ऋतु बीती जल-थल ने बर्फ की सुफेद चादर ओढ़ी जलपक्षियों की मालाएँ मैदानों की ओर उड़ती हुई दिखाई देने लगीं । "' नदी-माडो में द्रुप को ,धारें बहने छतीं, चद्मा को स्वच्छ निर्मल ज्योति ज्ञानमरोवर में - थिरकने लगी; परंतु पंडित श्ौधर की भुछ टोहू न छगी ।",यह मौसम भी गुजरा ।,नदी-नालों में दूध की धारें बहने लगीं चंद्रमा की स्वच्छ निर्मल ज्योति ज्ञानसरोवर में थिरकने लगी परंतु पंडित श्रीधर की कुछ टोह न लगी । उसकी संगत में मेरे-जीवब के कई “वर्ष आनंद से' ब्यत्तौत हुए थे ।,वह मेरी प्यारी सखी थी ।,उसकी संगत में मेरे जीवन के कई वर्ष आनन्द से व्यतीत हुए थे । "उसके 'सतोत्व पर किर मेरी थर्डा हो गयी, “किलु उससे कुछ पूछते, सात्वना देते मुस्ते कोच होता था ।",उसकी तपस्या ने मेरे हृदय में उसे फिर उसी सम्मान के पद पर बिठा दिया ।,उसके सतीत्व पर फिर मेरी श्रद्धा हो गयी किन्तु उससे कुछ पूछते सांत्वना देते मुझे संकोच होता था । "मेरा बच्च होता तो तुम्हें दृदय को सेज पर सुलाती, परंतु में धन की रस्प्रियों में वंधी हूँ ।",यह स्थान तुम्हारे योग्य नहीं ।,मेरा वश होता तो तुम्हें हृदय की सेज पर सुलाती परंतु मैं धर्म की रस्सियों में बँधी हूँ । "सोचती, में उनकी जीवन सर्वस्व हूँ, मुन्न अभागिनों को उन्होंने किस छाइ-परार से पाला हैं, में हो उतके जौवत का आधार और अतकाल्‍ की जाशा हूँ ।",कभी-कभी विरह वेदना एवं विचार-विप्लव से व्याकुल होकर उसका चित्त चाहता कि सती-कुण्ड की गोद में शांति लूँ किंतु रावसाहब इस शोक में जान ही दे देंगे यह विचार कर वह रुक जाती ।,सोचती मैं उनकी जीवन सर्वस्व हूँ मुझ अभागिनी को उन्होंने किस लाड़-प्यार से पाला है मैं ही उनके जीवन का आधार और अंतकाल की आशा हूँ । "नहीं, यो प्राण दे कर उतकी आाशाओ की हत्या न कछंगो |",सोचती मैं उनकी जीवन सर्वस्व हूँ मुझ अभागिनी को उन्होंने किस लाड़-प्यार से पाला है मैं ही उनके जीवन का आधार और अंतकाल की आशा हूँ ।,नहीं यों प्राण दे कर उनका आशाओं की हत्या न करूँगी । अपर्मी के राज में रह कर प्रजा का कब्याय ऊंसे हो समता हूँ २ दूमरो शका--सहले दारू पिछा कर पायठ वना रिया ।,उसे यह उचित नहीं ।,अधर्मी के राज में रह कर प्रजा का कल्याण कैसे हो सकता है दूसरी शंका-पहले दारू पिला कर पागल बना दिया । लव पढ़ी हो पैसे: की झट हुई |,अधर्मी के राज में रह कर प्रजा का कल्याण कैसे हो सकता है दूसरी शंका-पहले दारू पिला कर पागल बना दिया ।,लत पड़ी तो पैसे की चाट हुई । छोगों को सह़ें होने _औ जगह न मिछ्तीं ।,चौधरी के उपदेश सुनने के लिए जनता टूटती थी ।,लोगों को खड़े होने को जगह न मिलती । शिनोददिन चोयदी का मान बढ़ने छगा ।,लोगों को खड़े होने को जगह न मिलती ।,दिनोंदिन चौधरी का मान बढ़ने लगा । "उनके यहाँ नित्य पचायत्ों की, राष्ट्रोसति क्ने चर्चा रहतो, जतता को एन बातों में बड़ा आनइ भौर उत्पाद द्वोता ।",दिनोंदिन चौधरी का मान बढ़ने लगा ।,उनके यहाँ नित्य पंचायतों की राष्ट्रोन्नति की चर्चा रहती जनता को इन बातों में बड़ा आनंद और उत्साह होता । उन्हें ख्वदन्पता का स्वाद मिक्ठा ।,निरंकुशता और अन्याय पर अब उनकी तिउरियाँ चढ़ने लगीं ।,उन्हें स्वतंत्रता का स्वाद मिला । "यहाँ तक कि बहुधां उसके श्रोताओं में पटवारी, चौडोदार, मुईरिय और इन्ही कर्मचारियों के मित्रो के अ्रतिरिस्त और 'कोई वे होता था |",जनता को दिनोंदिन उनके उपदेशों से अरुचि होती जाती थी ।,यहाँ तक कि बहुधा उनके श्रोताओं में पटवारी चौकीदार मुदर्रिस और इन्हीं कर्मचारियों के मित्रों के अतिरिक्त और कोई न होता था । कओनो-कनो वड़े हाहिम नो आ निकलते और भगत जी वा बड़ा धादर्सत्कार करते ।,यहाँ तक कि बहुधा उनके श्रोताओं में पटवारी चौकीदार मुदर्रिस और इन्हीं कर्मचारियों के मित्रों के अतिरिक्त और कोई न होता था ।,कभी-कभी बड़े हाकिम भी आ निकलते और भगत जी का बड़ा आदर-सत्कार करते । भग्रत जो अपने प्रतिद्वंद्वी की बड़ाई ज्और अपनी छोकतिंदा पर दाँत प्रोसयीप कुर रह जाठे ये ।,कोई कहता खुशामदी टट्टू है कोई कहता खुफिया पुलिस का भेदी है ।,भगत जी अपने प्रतिद्वंद्वी की बड़ाई और अपनी लोकनिंदा पर दाँत पीस-पीस कर रह जाते थे । यह पहछा अवसर था कि अम्पतराप को आरे-दिन के छशाईटायरे से निदृत्ति मिछी और उसके गाध ही मोग-विलाम वा प्रावल्य हुना ।,उन्होंने चम्पतराय की वीरता की कथाएँ सुनी थीं इसलिए उनका बहुत आदर-सम्मान किया और कालपी की बहुमूल्य जागीर उनको भेंट की जिसकी आमदनी नौ लाख थी ।,यह पहला अवसर था कि चम्पतराय को आये-दिन के लड़ाई-झगड़े से निवृत्ति मिली और उसके साथ ही भोग-विलास का प्राबल्य हुआ । मर्दों की संख्या दिनों-दिन गपूत हूँंदी जाती हैं ।,किले में 20 हजार आदमी घिरे हुए हैं लेकिन उनमें आधे से अधिक स्त्रियाँ और उनसे कुछ ही कम बालक हैं ।,मर्दों की संख्या दिनोंदिन न्यून होती जाती है । स्थरियाँ पुरुषों और घारावो को जीवित रपत के लिए बाप उपवास करती है ।,रसद का सामान बहुत कम रह गया है ।,स्त्रियाँ पुरुषों और बालकों को जीवित रखने के लिए आप उपवास करती हैं । औरतें भूर्यनागंपण की और हाय उठा-उठा करे शब्रु को कोसती है ।,लोग बहुत हताश हो रहे हैं ।,औरतें सूर्य नारायण की ओर हाथ उठा-उठा कर शत्रु को कोसती हैं । "॥ इसी ऋतु में विर्ह वो मारी दियोगिनियाँ अपनी वोमारी वा वहाना करती हैं, जिसमे उसका पति उसे देखले आये ।",यह वह समय है जब रमणियों को विदेशगामी प्रियतम की याद रुलाने लगती है जब हृदय किसी से आलिंगन करने के लिए व्यग्र हो जाता है जब सूनी सेज देख कर कलेजे में हूक-सी उठती है ।,इसी ऋतु में विरह की मारी वियोगिनियाँ अपनी बीमारी का बहाना करती हैं जिसमें उनका पति उन्हें देखने आवे । "वह कई वार उचको, परतु पटरे तकनआा सको |",मैं झूले के पास पहुँच कर पटरे पर जा बैठी किंतु कोमलांगी विद्याधरी ऊपर न आ सकी ।,वह कई बार उचकी परंतु पटरे तक न आ सकी । "मुझे अपने विपय में तो कोई चिता वे थी पर खिता थो कओोरसिह की, गह अकेले घबरा रहे होंगे ।",हाँ अनुमान से यह प्रकट हुआ कि यह स्त्री यहाँ की रानी है ।,मुझे अपने विषय में तो कोई चिंता न थी पर चिंता थी शेरसिंह की वह अकेले घबरा रहे होंगे । नहीं माट्म विधाता सब मेरी बया दुरगंति करेंगे |,किस विपत्ति में फँसी ।,नहीं मालूम विधाता अब मेरी क्या दुर्गति करेंगे । मुझ अभायित को इुम्न दशा में भी छाठि नहीं ।,नहीं मालूम विधाता अब मेरी क्या दुर्गति करेंगे ।,मुझ अभागिन को इस दशा में भी शांति नहीं । इस्टो मलित विचारों में मम्त से सवारों के साय आप घटे तक चछती रही कि सामने एक ऊँची पहाड़ों पर एक विशाल भवन दिखाप्री दिया ।,मुझ अभागिन को इस दशा में भी शांति नहीं ।,इन्हीं मलिन विचारों में मग्न मैं सवारों के साथ आध घंटे तक चलती रही कि सामने एक ऊँची पहाड़ी पर एक विशाल भवन दिखायी दिया । "सत्पाप्रयटा अवदय उत्तम वस्तु है, जितु उसकी भो सीमा है, 'अति सर्व अंयेत्‌ (! अब अधिक सोच-विचार की आपमस्यकृग्रा नहों ।",अभी से आप यह धर्म और सत्यता धारण करेंगे तो अपने जीवन में आपको विपत्ति और निराशा के सिवा और कुछ प्राप्त न होगा ।,सत्यप्रियता अवश्य उत्तम वस्तु है किंतु उसकी भी सीमा है अति सर्वत्रवर्जयेत् ! अब अधिक सोच-विचार की आवश्यकता नहीं । यहू अबरार ऐसा ह्वी है ।,सत्यप्रियता अवश्य उत्तम वस्तु है किंतु उसकी भी सीमा है अति सर्वत्रवर्जयेत् ! अब अधिक सोच-विचार की आवश्यकता नहीं ।,यह अवसर ऐसा ही है । झुवर प्राहव पुराने सुर्राट थे ।,यह अवसर ऐसा ही है ।,कुँवर साहब पुराने खुर्राट थे । पए-थर उदासो छा गयी ।,सम्मन आये ।,घर-घर उदासी छा गयी । विमद तारीख के दिन गाँव के गेवार की पर डोटा-डोर एज ओर बंगोछे में उबेगा बांधे कचहरों को चछे ।,स्त्रियाँ अपने घरवालों को कोसने लगीं और पुरुष अपने भाग्य को ।,नियत तारीख के दिन गाँव के गँवार कंधे पर लोटा-डोर रखे और अँगोछे में चबेना बाँधे कचहरी को चले । संकडी जलियाँ और बालक सेते हुए उनके पीछे-पीछे जाते ये ।,नियत तारीख के दिन गाँव के गँवार कंधे पर लोटा-डोर रखे और अँगोछे में चबेना बाँधे कचहरी को चले ।,सैकड़ों स्त्रियाँ और बालक रोते हुए उनके पीछे-पीछे जाते थे । मातों अब वें फिर उते न मिलेंगे ।,सैकड़ों स्त्रियाँ और बालक रोते हुए उनके पीछे-पीछे जाते थे ।,मानो अब वे फिर उनसे न मिलेंगे । "एक और कुंवर साहब को प्रभावश्ाहिती बातें, - दूसरी बोर किसानों की हाब-हाय, परतु विचार-सागर में तौन दित निमस्न रहने के पश्चात्‌ उन्हें घरतों का रहारा लिख गया ।",पंडित दुर्गानाथ के तीन दिन कठिन परीक्षा के थे ।,एक ओर कुँवर साहब की प्रभावशालिनी बातें दूसरी ओर किसानों की हाय-हाय परन्तु विचार-सागर में तीन दिन निमग्न रहने के पश्चात् उन्हें धरती का सहारा मिल गया । उनको आत्मा ने कहा-न्‍्यह पहलो परीक्षा हूँ ।,एक ओर कुँवर साहब की प्रभावशालिनी बातें दूसरी ओर किसानों की हाय-हाय परन्तु विचार-सागर में तीन दिन निमग्न रहने के पश्चात् उन्हें धरती का सहारा मिल गया ।,उनकी आत्मा ने कहा-यह पहली परीक्षा है । तिदान विश्वप हो गा कि में अपने छाभ के लिए इतने गरोबो को हानि न॑ पुँचाऊँगा |,यदि इसमें अनुत्तीर्ण रहे तो फिर आत्मिक दुर्बलता ही हाथ रह जायगी ।,निदान निश्चय हो गया कि मैं अपने लाभ के लिए इतने गरीबों को हानि न पहुँचाऊँगा । प्रधान--आगवो शहादत तो अवस्य हो होगी ।,इस विषय में अब तो आपको कोई शंका नहीं है हम कितने लड़ाकू कितने द्रोही कितने शांतिभंगकारी हैं यह तो आपको खूब मालूम हो गया होगा चंदूमल-जी हाँ मालूम हो गया ।,प्रधान-आपकी शहादत तो अवश्य ही होगी । पुलिम्र को सस्ती अब नही देखो जाती ।,चंदूमल-होगी तो मैं भी साफ-साफ कह दूँगा चाहे बने या बिगड़े ।,पुलिस की सख्ती अब नहीं देखी जाती । सरकार उप्त दरार में साथ ने जायगों ।,चंदूमल-एक नहीं सौ दबाव पड़ें मैं झूठ कभी न बोलूँगा ।,सरकार उस दरबार में साथ न जायगी । हम आपको तरऊ से वेफिक् है ।,3 शाम को इन्सपेक्टर-पुलिस ने लाला चन्दूमल को थाने में बुलाया और कहा-आपको शहादत देनी होगी ।,हम आपकी तरफ से बेफिक्र हैं । चेदूमलछ बोढे--हाजिर हूँ ।,हम आपकी तरफ से बेफिक्र हैं ।,चंदूमल बोले-हाजिर हूँ । "इन्स०--मुनी या न मुनी, यह बहस नही है ।",इन्स.-वालंटियरों ने कान्स्टेबिलों को गालियाँ दीं चंदूमल-मैंने नहीं सुनी ।,इन्स.-सुनी या न सुनी यह बहस नहीं है । इन बुदेलों उस पहाशे की घादियो मे अपना जीवन विताया है ।,इसके राजा बुंदेले हैं ।,इन बुंदेलों ने पहाड़ों की घाटियों में अपना जीवन बिताया है । एक समय औरफे के राजा जश्ारतिह थे ।,इन बुंदेलों ने पहाड़ों की घाटियों में अपना जीवन बिताया है ।,एक समय ओरछे के राजा जुझार सिंह थे । ये बडे माहसी और वृद्धिमान्‌ थे ।,एक समय ओरछे के राजा जुझार सिंह थे ।,ये बड़े साहसी और बुद्धिमान थे । झाहजहाँ उस समय पदिस्दी के दाइगाह थे ।,ये बड़े साहसी और बुद्धिमान थे ।,शाहजहाँ उस समय दिल्ली के बादशाह थे । "छत्र झाहजहाँ लछोदी ने बलवा क्रिया और बह द्ाही मुक्त को छठतासाइता ओरछे की ओर आ निकल्य, तब राजां जुझारमिह तें उम्मे मोर्चा छिया ।",शाहजहाँ उस समय दिल्ली के बादशाह थे ।,"जब शाहजहाँ लोदी ने बलवा किया और वह शाही मुल्क को लूटता-पाटता ओरछे की ओर आ निकला, तब राजा जुझार सिंह ने उससे मोरचा लिया ।" उन्होंने सुरंत हो राजा को दक्घिन का दामसन्‍्मार सौंपा ।,राजा के इस काम से गुणग्राही शाहजहाँ बहुत प्रसन्न हुए ।,उन्होंने तुरंत ही राजा को दक्खिन का शासन-भार सौंपा । इसके बाद राजा आपती रानी से विदा होने के लिए. र्नवारर आये ।,हरदौल रोता हुआ उनके पैरों से लिपट गया ।,इसके बाद राजा अपनी रानी से विदा होने के लिए रनिवास आए । ५ कुछ्लीना रोने ठगी ।,सोना ज़्यादा गरम होकर पिघल जाता है ।,कुलीना रोने लगी । "जब आवाज वच् में हुई, तो बोलो--मै आपके इस सदेह को वैसे दूर कहाँ ?",क्रोध की आग पानी बन कर आँखों से निकल पड़ी ।,"जब आवाज़ वश में हुई, तो बोली, ""आपके इस संदेह को कैसे दूर करूँ ?" राजा--हरदौछ के खूत से ।,कुलीना - क्यों कर ?,राजा - हरदौल के खून से । "नहीं, मद पाप मुझसे न होगा ।",आह! अभागी कुलीना! तुझे आज अपने सतीत्व की परीक्षा देने की आवश्यकता पड़ी है और वह ऐसी कठिन ?,नहीं यह पाप मुझसे नहीं होगा । आज हरदौल उन्हें जम्द से मिल गया था ।,"नहीं, अवश्य कोई और बात है ।",आज हरदौल उन्हें जंगल में मिल गया । एक-एक पल हमे ठब्राही को ठरफ लिये जा खा है ।,राजा-(जोश में आ कर) जालिम यह इन बातों का वक्त नहीं है ।,एक-एक पल हमें तबाही की तरफ लिये जा रहा है । "जिय घर में आय लगी है, उसके आदमी खुश को नहीं याद करे, झुऐँ क्रो तरफ द्ौहवे हैं ।",खोल दे ये बेड़ियाँ ।,जिस घर में आग लगी है उसके आदमी खुदा को नहीं याद करते कुएँ की तरफ दौड़ते हैं । आपके हुक्म से मुँह नहीं मोह छड़वा ।,कप्तान-आप मेरे मुहसिन हैं ।,आपके हुक्म से मुँह नहीं मोड़ सकता । सजोव उन्माह में वड़ी संक्रामक शवित होतों है ।,कप्तान साहब निरुत्तर हो गये ।,सजीव उत्साह में बड़ी संक्रामक शक्ति होती है । उसी वक्त जेंठ के दाठोना की बुद्य कर कहा--साहव ने ठुबन दिया है कि राजा साहब को फ्रत ऑज[ई कर दिया जाव ।,यद्यपि राजा साहब के नीतिपूर्ण वार्तालाप ने उन्हें माकूल नहीं किया तथापि वह अनिवार्य रूप से उनकी बेड़ियाँ खोलने पर तत्पर हो गये ।,उसी वक्त जेल के दारोगा को बुला कर कहा-साहब ने हुक्म दिया है कि राजा साहब को फौरन आजाद कर दिया जाय । "इउसत्ें एक प्र का भी तासीर ( बिलंब ) हुई, तो मुम्हारे हुक में अच्छा न होगा ।",उसी वक्त जेल के दारोगा को बुला कर कहा-साहब ने हुक्म दिया है कि राजा साहब को फौरन आजाद कर दिया जाय ।,इसमें एक पल की भी ताखीर (विलंब) हुई तो तुम्हारे हक में अच्छा न होगा । "बहू विनीत भाव से वोडे--हुजूर, मुझे इस ओहदे मे मुज्ाफ रखें ।",हितैषी मित्र का जितना सम्मान होता है स्वामिभक्त सेवक का उतना नहीं हो सकता ।,वह विनीत भाव से बोले-हुजूर मुझे इस ओहदे से मुआफ रखें । में जक्वड राजपूत हूँ ।,इस मनसब पर किसी लायक आदमी को माशूर फरमाइए (नियुक्त कीजिए) ।,मैं अक्खड़ राजपूत हूँ । मुत्को इतजाम करना वा जानूँ ।,मैं अक्खड़ राजपूत हूँ ।,मुल्की इन्तजाम करना क्या जानूँ । "दम भर बाद जब रोणनुद्दौा को सजा देने का प्रश्न उठा, तब दोनो आइप्रियो में इतना मतभेद हुआ कि बाद-बिवाद को नौबत जा गयो ।",आखिर मजबूर होकर बादशाह ने उन्हें ज्यादा न दबाया ।,क्षण भर बाद जब रोशनुद्दौला को सजा देने का प्रश्न उठा तब दोनों आदमियों में इतना मतभेद हुआ कि वाद-विवाद की नौबत आ गयी । "राजा माहेव इस बात पर कड़े हुए थे कि इसे जान से न मारा जात्र, केनेल अमरदेई कर दिया जाप ।",बादशाह आग्रह करते थे कि इसे कुत्तों से नुचवा दिया जाय ।,राजा साहब इस बात पर अड़े हुए थे कि इसे जान से न मारा जाय केवल नजरबन्द कर दिया जाय । बर्फ अधिकता में पडने छूगो ।,बादशाह की सेना को बड़ी-बड़ी कठिनाइयों का सामना करना पड़ा ।,बर्फ अधिकता से पड़ने लगी । प्रिपाही भूखों मरने छगे |,रसद के सामान कम मिलने लगे ।,सिपाही भूखों मरने लगे । आखिर धाहजादे मुद्दीदद्दीन को हिम्मत हार कर छोटना पडा ।,अब अफगानों ने समय पा कर रात को छापे मारने शुरू किये ।,आखिर शहजादे मुहीउद्दीन को हिम्मत हार कर लौटना पड़ा । "हि +. दोनों शाजकुमार ज्यो-ज्यों जोधपुर के निकट पहुँचते थे, उत्कंद्रा से उतके मन उम्रड़े आते थे ।",आखिर शहजादे मुहीउद्दीन को हिम्मत हार कर लौटना पड़ा ।,दोनों राजकुमार ज्यों-ज्यों जोधपुर के निकट पहुँचते थे उत्कंठा से उनके मन उमड़ आते थे । मिछते की तृण्या बढ़ती जाती हैं ।,इतने दिनों के वियोग के बाद फिर भेंट होगी ।,मिलने की तृष्णा बढ़ती जाती है । "धत-दित मजिकें काटते चछे आते है, नें थकावद मादूग होती है, न भाँदगी ।",मिलने की तृष्णा बढ़ती जाती है ।,रात-दिन मंजिल काटते चले आते हैं न थकावट मालूम होती है न माँदगी । पृथ्री्तिह दुर्गकुबरि के लिए एक अजुयावी कटार छाये है. ।,दोनों घायल हो रहे हैं पर फिर भी मिलने की खुशी में जखमों की तकलीफ भूले हुए हैं ।,पृथ्वीसिंह दुर्गाकुँवरि के लिए एक अफगानी कटार लाये हैं । ", राजकुमारियों ने जब सुता कि दोनों बौर वायम आते है, तो वे, ,फूले अंगो ने प्रपरायो ।",दोनों के दिल उमंग से भरे हुए हैं ।,राजकुमारियों ने जब सुना कि दोनों वीर वापस आते हैं तो वे फूले अंगों न समायीं । एक दूसरे को ऐडती हैं और छुश दो कर गले मिछती है ।,इतने दिनों के बिछोह के बाद फिर मिलाप होगा खुशी आँखों से उबली पड़ती है ।,एक-दूसरे को छेड़ती हैं और खुश हो कर गले मिलती हैं । जोधपुर के किले से सछार्मियों की पतगरज लावा आदे छगी ।,अगहन का महीना था बरगद की डालियों में मूँगे के दाने लगे हुए थे ।,जोधपुर के किले से सलामियों की घनगरज आवाजें आने लगीं । दोनो राजपुमारियाँ घास में धारती के सामान मिये दरवाजे पर शही्थी ।,सारे नगर में धूम मच गयी कि कुँवर पृथ्वीसिंह सकुशल अफगानिस्तान से लौट आये ।,दोनों राजकुमारियाँ थाली में आरती के सामान लिये दरवाजे पर खड़ी थीं । दुष्दीमिह दरदारियों के मुजरे झेले हुए महल में आये ।,दोनों राजकुमारियाँ थाली में आरती के सामान लिये दरवाजे पर खड़ी थीं ।,पृथ्वीसिंह दरबारियों के मुजरे लेते हुए महल में आये । "मेरी नाम ते चलनेत्रालो सस्थाआ को णो हानि पहुँचनी थी, पहुँच चुकी ।",यद्यपि मैं जानता हूँ कि मेरी बदनामी जो कुछ होनी थी वह हो चुकी ।,मेरे नाम से चलने वाली संस्थाओं को जो हानि पहुँचनी थी पहुँच चुकी । में आपको अयनता इश्देड सममतरों हैँ ओर सदैव समझूँगी ।,मैं ऐसी बुद्धिहीन नहीं हूँ कि केवल अपने स्वार्थ के लिए आपको कलंकित करूँ ।,मैं आपको अपना इष्टदेव समझती हूँ और सदैव समझूँगी । प्रा मे छाले थे ।,मुख पीला पड़ गया था ।,पैरों में छाले थे । १5-सा बदन उुम्हाण गया था ।,पैरों में छाले थे ।,फूल-सा बदन कुम्हला गया था । इस मतृष्य को देखते ही रादी में तुरत कटार उठा कर कमर में सोग्न छी ।,ऐंठी हुई दाढ़ी थी शरीर में सटी हुई चपकन थी कमर में तलवार लटक रही थी ।,इस मनुष्य को देखते ही रानी ने तुरन्त कटार उठा कर कमर में खोंस ली । "थो थोड़ी-यहुत सेवा करते है, दिखाबे बेः छिए ।",ऐसे सच्चे सेवक आजकल कहाँ लोग कीर्ति पर जान देते हैं ।,जो थोड़ी-बहुत सेवा करते हैं दिखावे के लिए । में छाछा जी को बुहप नही देवता समझती हूँ ।,सच्ची लगन किसी में नहीं ।,मैं लाला जी को पुरुष नहीं देवता समझती हूँ । "उत्त पर कोई ऐसा तही, जो उनके आाराम का घ्यान रे ।",भोर से सायंकाल तक दौड़ते रहते हैं न खाने का कोई समय न सोने का समय ।,उस पर कोई ऐसा नहीं जो उनके आराम का ध्यान रखे । "विचारे पर यये, णो कुछ किसी तें सामते रख दिया, चूपके ें खा दिया; फिर छटी उठायी और किसी तरह चल दिये ।",उस पर कोई ऐसा नहीं जो उनके आराम का ध्यान रखे ।,बेचारे घर गये जो कुछ किसी ने सामने रख दिया चुपके से खा लिया फिर छड़ी उठायी और किसी तरफ चल दिये । "यह कहना कठित हैं. कि किसका उत्लाह बढ़ा हुआ था, बाई जौ का था छात्य ग्रोपीनाध का ।",शहर के रईसों को निमंत्रण दिये गये थे ।,यह कहना कठिन है कि किसका उत्साह बढ़ा हुआ था बाई जी का या लाला गोपीनाथ का । "जब एक वज या ओर अब भी बह बहाँगे मे टछे तो आनदी ने कढ्ा--छाझा जी, आपको भोजग करने को देर हो रही है ।",दोपहर तक गोपीनाथ फर्श और कुर्सियों का इंतजाम करते रहे ।,जब एक बज गया और अब भी वह वहाँ से न टले तो आनंदी ने कहा-लाला जी आपको भोजन करने को देर हो रही है । भोजन के उपदत आराम ऋरने को जी चाहेंगा ।,घंटों लग जायेंगे ।,भोजन के उपरान्त आराम करने का जी चाहेगा । अपनी वश्चाबल्ली का वर्णन किया |,मैत्री और बंधुत्व से सारा पत्र भरा हुआ था ।,अपनी वंशावली का वर्णन किया । कदाचित्‌ परे पूर्जजो का ऐसा कोतिन्गान किसी भा ने भी न किया होगा ।,अपनी वंशावली का वर्णन किया ।,कदाचित् मेरे पूर्वजों का ऐसा कीर्ति-गान किसी भाट ने भी न किया होगा । इसके धाद दो सप्ताह तक कोई पत्र न आया ।,खैर मेरा पत्र समाप्त हो गया और तत्क्षण लेटरबक्स के पेट में पहुँच गया ।,इसके बाद दो सप्ताह तक कोई पत्र न आया । सहसा एक भहाश्वय मेंस नाम पूछते हुए आाये और मेरे बास की . कुर्सी पर देंठ गये ।,ताश की बाजी हो रही थी ।,सहसा एक महाशय मेरा नाम पूछते हुए आये और मेरे पास की कुरसी पर बैठ गये । ' ओर मेय उनसे कभी का परिचय न था ।,सहसा एक महाशय मेरा नाम पूछते हुए आये और मेरे पास की कुरसी पर बैठ गये ।,मेरा उनसे कभी का परिचय न था । वितयपूर्ण वीरता का हमसे मुदर चित्र नही खौच सकता था ।,उसकी काली और भाले की नोक के सदृश तनी हुई मूँछें उसके भौंरे की तरह काले घुँघराले बाल उसकी आकृति की कठोरता को नम्र कर देते थे ।,विनयपूर्ण वीरता का इससे सुन्दर चित्र नहीं खींच सकता था । "” मैंने कहा, “भापको हृदय से धस्यवाद देता हैं ।",शेरसिंह ने फिर कहा क्या आप प्रसन्न नहीं हैं कि आपने मुझे पिस्तौल का लक्ष्य नहीं बनाया मैं तब पशु था अब मनुष्य हूँ ।,मैंने कहा आपको हृदय से धन्यवाद देता हूँ । "पद्दि आजा ही, तो में आपसे एक प्रश्त करना चाहता हूँ ।",मैंने कहा आपको हृदय से धन्यवाद देता हूँ ।,यदि आज्ञा हो तो मैं आपसे एक प्रश्न करना चाहता हूँ । ._ दीरसिह---कम से कम आपको मुझते ऐसी शका से करनो चाहिए ।,मैं-मुझे भय है कि उस प्रश्न से आपको दुःख न हो ।,शेरसिंह-कम से कम आपको मुझसे ऐसी शंका न करनी चाहिए । जिस वक्‍त मते उसकी कैलाई पकट्री पी उस समय आदवैश्व से मेरा एक-एक ढंग काँप रहा थीा ।,मैं-विद्याधरी के भ्रम में कुछ सार था शेरसिंह ने सिर झुका कर देर में उत्तर दिया-जी हाँ था ।,जिस वक्त मैंने उसकी कलाई पकड़ी थी उस समय आवेश से मेरा एक-एक अंग काँप रहा था । भे विदावरी के उस अनुग्रह को मरणपुर्यत से मूदूँगा ।,जिस वक्त मैंने उसकी कलाई पकड़ी थी उस समय आवेश से मेरा एक-एक अंग काँप रहा था ।,मैं विद्याधरी के उस अनुग्रह को मरणपर्यंत न भूलूँगा । "यहा, और कोति कालातरे भे मिट जाती है शितु पाप का घव्वा नहीं मिटता ।",संसार की कोई वस्तु स्थिर नहीं किंतु पाप की कालिमा अमर और अमिट है ।,यश और कीर्ति कालांतर में मिट जाती है किंतु पाप का धब्बा नहीं मिटता । मेरा विचार हैं.किं डेइवर भी दाय को नहीं मिद्या सकता ।,यश और कीर्ति कालांतर में मिट जाती है किंतु पाप का धब्बा नहीं मिटता ।,मेरा विचार है कि ईश्वर भी दाग को नहीं मिटा सकता । डाकू बंदूकें छिये हुए शेरसिह की तलाश परे घूपने छगे ।,ऐ मुसाफिर उस प्रान्त में अब मेरा रहना कठिन हो गया ।,डाकू बंदूकें लिए हुए शेरसिंह की तलाश में घूमने लगे । "में ज्ञानसागर से पानों भरने ग्रयी हुई थी, गहसा क्या देखती हूँ कि एक युवक मुरकी भोडे पर. सवार रत्त जटित आभूषण पहुने,हाथ में चमकता हुआ भाला लिये चला जाता हैं ।",उस समय भी यही ऋतु थी ।,मैं ज्ञानसरोवर में पानी भरने गयी हुई थी सहसा क्या देखती हूँ कि एक युवक मुश्की घोड़े पर सवार रत्नजटित आभूषण पहने हाथ में चमकता हुआ भाला लिये चला आता है । शैरसिह की भौ क्रोध आया ।,शेरसिंह को देख कर वह ठिठका और भाला सम्हाल कर उन पर वार कर बैठा ।,शेरसिंह को भी क्रोध आया । उनके गरज की ऐसी गगनमेदी ध्वनि उठी कि ज्ास-- सरीबर का जल आदोछित हो ग्रषा ओर तुरंत पोढे मे सीच कर उप्तकी छाती पर पंजे रुष दिये ।,शेरसिंह को भी क्रोध आया ।,उनके गरजन की ऐसी गगनभेदी ध्वनि उठी कि ज्ञानसरोवर का जल आंदोलित हो गया और तुरंत घोड़े से खींच कर उसकी छाती पर पंजे रख दिये । "ऐसा विश्ित होतां था, मानों थह ऋदृश्य जीवों वी बस्तो है ।",मैं बहुत देर तक इधर-उधर घूमती रही किसी मनुष्य की सूरत भी न दिखायी देती थी कि उससे वहाँ का सब समाचार पूछूँ ।,ऐसा विदित होता था मानो यह अदृश्य जीवों की बस्ती है । "विद्याघरों अत्यत गभोर, शांत प्रकृति की स्थ्री थीं ।",हम दोनों सहेलियाँ थीं ।,विद्याधरी अत्यंत गंभीर शांत प्रकृति की स्त्री थीं । वहाँ कोई आलटियर न भाये ।,तुम न कहते तो हमें क्या पड़ी थी कि इन लोगों को धक्के देते दारोगा जी ने भी हमको ताकीद कर दी थी कि सेठ चन्दूमल की दूकान का विशेष ध्यान रखना ।,वहाँ कोई वालंटियर न आये । "पुलिस धभिकारियों के चले जाने के बाद ग्रेठ जो ने कॉप्रेस के श्रपात से कहा--आज सुझे मालूम हुआ कि ये - छीग वाझूट्यिरों पर इतना घोर अत्याचार ""करते हैं ।",परिणाम यह हुआ कि पुलिसवालों ने दोनों को हिरासत में लिया और थाने की ओर चले ।,पुलिस अधिकारियों के जाने के बाद सेठ जी ने काँग्रेस के प्रधान से कहा-आज मुझे मालूम हुआ कि ये लोग वालंटियरों पर इतना घोर अत्याचार करते हैं । "इन लोगों पर बकाया छपात की नालिश को जायगी, छसछ नीछाम करा छूँगा ।",अब आप इन रसीदों को चिरागअली के सिपुर्द कीजिए ।,इन लोगों पर बकाया लगान की नालिश की जायगी फसल नीलाम कर लूँगा । "आपकी अत्येक आशा का पान करना सुझे उचित है, कितु न्यायालय में मैने गयाहीं नही दी हैं ।",बोले-क्या मेरी शहादत बिना काम न चलेगा कुँवर साहब (क्रोध से)-क्या इतना कहने में भी आपको कोई उज्र है दुर्गानाथ (द्विविधा में पड़े हुए)-जी यों तो मैंने आपका नमक खाया है ।,आपकी प्रत्येक आज्ञा का पालन करना मुझे उचित है किंतु न्यायालय में मैंने गवाही नहीं दी है । "दरवाजे तक आयी, पर भीतर पैर दे रख सको ।","पैर आगे बढ़ते थे, पर मन पीछे हटा जाता था ।","दरवाज़े तक आई, पर भीतर पैर न रख सकी ।" ऐसा जान पडा भातों उमके पैर धर्रा रहे है ।,दिल धड़कने लगा ।,ऐसा जान पड़ा मानो उसके पैर थर्रा रहे हैं । राजा जुआरसिह बोले “कोस है ?,ऐसा जान पड़ा मानो उसके पैर थर्रा रहे हैं ।,"राजा जुझारसिंह बोले, ""कौन है ?" "राजा-पह क्यो नहीं कहती कि मन दोपी है, द्रसलिए आँखे नहीं मिलने देता ?",मैं अपनी जगह क्रोध को बैठा पाती हूँ ।,""" राजा -""यह क्यों नहीं कहती कि मन दोषी है, इसलिए आँखें नहीं मिलने देता ।" राजा--हरदौल के खून रो ।,"जब आवाज़ वश में हुई, तो बोली, ""आपके इस संदेह को कैसे दूर करूँ ?",""" राजा - हरदौल के खून से ।" < # ' मैने ठीक गंगा के किनारे एक छोटोकी कुछो बतवा छी है ।,ये लोग मेरे भाई हैं और गंगा मेरी माता है ।,मैंने ठीक गंगा के किनारे एक छोटी-सी कुटी बनवा ली है । ” ब 'मुझे सिबा रामन्ताम जपने के और फोई- काम गही है ।,मैंने ठीक गंगा के किनारे एक छोटी-सी कुटी बनवा ली है ।,अब मुझे सिवा राम-नाम जपने के और कोई काम नहीं है । मै अपनी मिद्टी गृंगा जी को ही सौपूँता ।,मेरी स्त्री और मेरे पुत्र बार-बार बुलाते हैं मगर अब मैं यह गंगा माता का तट और अपना प्यारा देश छोड़ कर वहाँ नहीं जा सकता ।,अपनी मिट्टी गंगा जी को ही सौंपूँगा । "जिसे देखो, पाँच दस्त्रों से सुप्तज्नित, मूँछे खड़ी किये, ऐंडवा हुआ चला जाता था ।",केवल आदमियों के आने-जाने की भीड़ थी ।,जिसे देखो पाँचों शस्त्रों से सुसज्जित मूँछें खड़ी किये ऐंठता हुआ चला जाता था । "_ सहसा एक आदमी, भारों स़ाक्ा बाँधे, पैर की घुदनियों तक मीचों कवा पहने, कमर में पठका बाँधे, आ कर एक सराफ़ को दुकान पर छड़ा हो गया ।",बाजार के मामूली दूकानदार भी निःशस्त्र न थे ।,सहसा एक आदमी भारी साफा बाँधे पैर की घुटनियों तक नीची कबा पहने कमर में पटका बाँधे आ कर एक सराफ की दूकान पर खड़ा हो गया । "जात पड़ता था, कोई ईदाना सोदागर हे ।",सहसा एक आदमी भारी साफा बाँधे पैर की घुटनियों तक नीची कबा पहने कमर में पटका बाँधे आ कर एक सराफ की दूकान पर खड़ा हो गया ।,जान पड़ता था कोई ईरानी सौदागर है । सराक का नाप माघोदारा था ।,इस समय ऐसे आदमी का आ जाना असाधारण बात न थी ।,सराफ का नाम माधोदास था । माऊ आजार ने आता हूं नहीं ।,आज करीब एक महीना से बाजार का निर्ख बिगड़ा हुआ है ।,माल बाजार में आता ही नहीं । निर्द्ध मुरासिव ही होया ।,जैसा माल चाहिए लीजिए ।,निर्ख मुनासिब ही होगा । इसका इतमिनांव .रखिएं ।,निर्ख मुनासिब ही होगा ।,इसका इतमीनान रखिए । कही पहुछे कौ-सो रौनक नहीं नज़र आती ।,सौदागर-आजकल बाजार का निर्ख क्यों बिगड़ा हुआ है माधो-क्या आप हाल ही में वारिद हुए हैं सौदागर-हाँ मैं आज ही आया हूँ ।,कहीं पहले की-सी रौनक नहीं नजर आती । ....-. « पौदागर--डाकुओ का जोर ता नही है १ पहले तो यहाँ इस किस्म की आारदातें उ होती थीं ।,माधो-इसके बड़े किस्से हैं कुछ ऐसा ही मुआमला है ।,सौदागर-डाकुओं का जोर तो नहीं है पहले तो यहाँ इस किस्म की वारदातें न होती थीं । "* धर्ममिह भी प्रमंमेता सै ऐँटती हुए अपने महल में पहुँचे, पर भीतर वैर रखने भी न पाये थे कि: छोक हुईं और वायी वाँख फडकने छगी ।",दुर्गाकुँवरि ने आरती उतारी और दोनों एक-दूसरे को देख कर खुश हो गये ।,धर्मसिंह भी प्रसन्नता से ऐंठते हुए अपने महल में पहुँचे पर भीतर पैर रखने न पाये थे कि छींक हुई और बायीं आँख फड़कने लगी । घजविलाएिनी महा से छुट्टी पा कर ढुवर पर्ममेह के पास पहुँची ।,वे वीररस के प्रेमी थे उसको पढ़ कर बहुत खुश हुए और उन्होंने मोतियों का हार उपहार दिया ।,ब्रजविलासिनी यहाँ से छुट्टी पा कर कुँवर धर्मसिंह के पास पहुँची । "वे है _हए राजनदिनी को लड़ाई को घटनाएँ सुना रहे थे; पर ज्यों ही प्रजविहा्मितों हो बाल उन पर पड़ी, वह सन्न हो कर पीछे हट गयी ।",ब्रजविलासिनी यहाँ से छुट्टी पा कर कुँवर धर्मसिंह के पास पहुँची ।,वे बैठे हुए राजनन्दिनी को लड़ाई की घटनाएँ सुना रहे थे पर ज्यों ही ब्रजविलासिनी की आँख उन पर पड़ी वह सन्न होकर पीछे हट गयी । "शवों दस कर पर्सिह के चेदरे का भी रग उड़ गया, होढ गूस गये और हाथ-पैर सतसनाते छगें ।",वे बैठे हुए राजनन्दिनी को लड़ाई की घटनाएँ सुना रहे थे पर ज्यों ही ब्रजविलासिनी की आँख उन पर पड़ी वह सन्न होकर पीछे हट गयी ।,उसको देख कर धर्मसिंह के चेहरे का भी रंग उड़ गया होंठ सूख गये और हाथ-पैर सनसनाने लगे । धर्मसिह सारे दिल पलंग पर चुपधाप “पड़े करवर्टे बदढ़ते रहे ।,राजनन्दिनी ने यह दृश्य देखा और उसका फूल-सा बदन पसीने से तर हो गया ।,धर्मसिंह सारे दिन पलंग पर चुपचाप पड़े करवटें बदलते रहे । "वह मद्पि चाहती है क्लि अपने भावों से उनके सत का *वीक्ष हलका करें, पर नहीं कर सक्तती ।",ब्रजविलासिनी इन्हीं के खून की प्यासी है क्या यह सम्भव है कि मेरा प्यारा मेरा मुकुट धर्मसिंह ऐसा कठोर हो नहीं नहीं ऐसा नहीं हो सकता ।,वह यद्यपि चाहती है कि अपने भावों से उनके मन का बोझ हलका करे पर नहीं कर सकती । "इन दोनों प्राणियों के हृदय में कितनी हो बातें आ रही होंगी, दोनों वया-वप्रा कहना झौर वया-क्या सुनना चाहते होगे, यह विचार, मैं उठ खड़ी हुई बोर बोलछौ--वहते, अब में जाती हूँ, शाम को फिर आऊेंगी ।",मैंने वहाँ ठहरना उचित न समझा ।,इन दोनों प्राणियों के हृदय में कितनी ही बातें आ रही होंगी दोनों क्या-क्या कहना और क्या-क्या सुनना चाहते होंगे इस विचार से मैं उठ खड़ी हुई और बोली-बहन अब मैं जाती हूँ शाम को फिर आऊँगी । "बह-मेरे श्राणेश्वर, मेरे पति- देव थे ।",लेकिन जब समीप आ गया तो मेरे हृदय में ऐसी तरंगें उठने लगीं मानो छाती से बाहर निकल पड़ेगा ।,यह मेरे प्राणेश्वर मेरे पतिदेव थे । "आख़िर एक रोज मेने सफर का समान दुरत किया और रमी मिंवी के ठौक एक हजार दिज्रों के बाद जब कि दँवें पूः्जी बार झाव- सरोवर के तट पर कदम रखा था, में फिर वहाँ जा पहुँचा ।",कभी-कभी कल्पना में मुझे वह देवी आकाश से उतरती हुई मालूम होती तब चित्त चंचल हो जाता और विकल उत्कंठा होती कि किसी तरह पर लगा कर ज्ञानसरोवर के तट पहुँच जाऊँ ।,आखिर एक रोज मैंने सफर का सामान दुरुस्त किया और उसी मिती के ठीक एक हजार दिनों के बाद जब कि मैंने पहली बार ज्ञानसरोवर के तट पर कदम रखा था मैं फिर वहाँ जा पहुँचा । ", छदरों के साम शतदलछ यो कक थे जैसे कोई बालक हिंडोके में झुल रहा हो ।",मंद समीर के आनन्दमय झोंकों से ज्ञानसरोवर का निर्मल प्रकाश से प्रतिबिम्बित जल इस प्रकार लहरा रहा था मानो अगणित अप्सराएँ आभूषणों से जगमगाती हुई नृत्य कर रही हों ।,लहरों के साथ शतदल यों झकोरे लेते थे जैसे कोई बालक हिंडोले में झूल रहा हो । "एक ओर. रमणोक एउपवत या, दूसरी ओर एक गयाचुस्त्री मंदिर ।",मैंने उत्सुक नेत्रों से इस गुफा की ओर देखा तो वहाँ एक विशाल राजप्रासाद आसमान से कंधा मिलाये खड़ा था ।,एक ओर रमणीक उपवन था दूसरी ओर एक गगनचुम्बी मंदिर । "मुल्य द्वार पर जा कर देखा, तो दो चोवदार ऊदें मखुमठ को वर्दियां पहले, जरी के पट्ठे वॉपे सड़े थे ।",मुझे यह कायापलट देख कर आश्चर्य हुआ ।,मुख्य द्वार पर जा कर देखा तो दो चोबदार ऊदे मखमल की वर्दियाँ पहने जरी के पट्टे बाँधे खड़े थे । "आमंदी--द्ना जाततो हूँ, कितु जिस बारण से आप मेरे यहाँ भोजन करने से इंकार कर रहे है, उमके विषय में बेवक इतना निवेदन है कि मूल आपने क्षेयड स्वामी और सेवक का सम्दत्ध महों हैं ।",यह तो आपको मालूम ही है ।,आनंदी-इतना जानती हूँ किंतु जिस कारण से आप मेरे यहाँ भोजन करने से इनकार कर रहे हैं उसके विषय में केवल इतना निवेदन है कि मुझे आपसे केवल स्वामी और सेवक का सम्बन्ध नहीं है । ", इस घटना की लाला गोपीनाय के मित्री ने यो आलोचना बी---'महाशय जो अब तो वही ( “बढ़ीं” पर खूब जोर दे कर ) भोजन भी करते हैं ।",वह जब तक आसन पर बैठे रहे आनंदी बैठी पंखा झलती रही ।,इस घटना की लाला गोपीनाथ के मित्रों ने यों आलोचना की महाशय जी अब तो वहीं ( वहीं पर खूब जोर दे कर) भोजन भी करते हैं । उसको उल्ठन्पुछट कर देवा और बड़े नम्न भाप से उसे भ्रांखों से छगाया ।,ठाकुर ने कटार हाथ में ली ।,उसको उलट-पुलट कर देखा और बड़े नम्र भाव से उसे आँखों से लगाया । "देखिए, वह आपको किस भँति सिर और झाँखों पर बिठछा हूँ ।",आप भय-त्याग करें और चलें ।,देखिए वह आपको किस भाँति सिर और आँखों पर बिठाता है । "बढ नाम पर मरते है, थान॑दी प्रेम पर ।",लाला गोपीनाथ नित्य बारह बजे रात को आनंदी के साथ बैठे हुए नजर आते हैं ।,वह नाम पर मरते हैं आनंदी प्रेम पर । कोतवाल को गहरा 'जेनरलञ” पर हाथ बढ़ाने की हिम्मत ने पढो ।,इसे मालूम हो जाय कि बादशाहों से बेअदबी करने का क्या नतीजा होता है ।,कोतवाल को सहसा जेनरल पर हाथ बढ़ाने की हिम्मत न पड़ी । ",.. फिसकी मजाल थी, जो जरा भी जबात हिला सके ।",मैं नहीं चाहता कि मेरी खिलअत की बेइज्जती हो ।,किसकी मजाल थी जो जरा भी जबान हिला सके । "दें उन्हे अपना लित्र, बता कर जितना काम्र तिकाछ सकते थे उठवा,उतके मारे जाने से नहीं ।",आप लोगों के खयाल में इसके पास भरी हुई पिस्तौल का निकलना क्या माने रखता है अँग्रेजों को केवल राजा साहब को नीचा दिखाना मंजूर था ।,वे उन्हें अपना मित्र बना कर जितना काम निकाल सकते थे उतना उनके मारे जाने से नहीं । जेवर आपका बाडीगाई ( रक्षक ) है ।,इसी से एक अँग्रेज मुसाहब ने कहा-मुझे तो इसमें कोई गैरमुनासिब बात नहीं मालूम होती ।,जेनरल आपका बाडीगार्ड (रक्षक) है । "झूम-झूम कर वाह, वाह ! करने छगा;' जैसे मुझसे -थढ कर कोई काब्य- रमिक ससार में न द्वोमा ।",कविताएँ तो मेरी समझ में खाक न आयीं पर मैंने तारीफों के पुल बाँध दिये ।,झूम-झूम कर वाह वाह करने लगा जैसे मुझसे बढ़ कर कोई काव्य रसिक संसार में न होगा । स्रौट कर उन्हें ६. फिर भोजन कराया ।,संध्या को हम रामलीला देखने गये ।,लौटकर उन्हें फिर भोजन कराया । ईस समय *- बहू अपनी पत्नी' को छेने के छिए कानपुर जा रहें हैं ।,अब उन्होंने अपना वृत्तांत सुनाना शुरू किया ।,इस समय वह अपनी पत्नी को लेने के लिए कानपुर जा रहे हैं । आइचर्य नहीं « कि गर्वनर महोदय छो भी इसरी यूचता दो थयो दो ।,आज जिले के सारे हाकिम उनके खून के प्यासे हो रहे हैं ।,आश्चर्य नहीं कि गवर्नर महोदय को भी इसकी सूचना दी गयी हो । दिसो तरह उम्हें यहाँ बुदाएएं ।,प्रधान-और कुछ नहीं तो उन्हें नियम का पालन करने ही के लिए प्रतिज्ञा-पत्र पर हस्ताक्षर कर देना चाहिए था ।,किसी तरह उन्हें यहाँ बुलाइए । ठब भा में महों बहूगा कि आपको स्वयं * मिलने के बहाने से उन पर तिगाह स्खनो होगो |,प्रधान-अच्छी बात है आपको उन पर इतना विश्वास हो गया है तो उनकी दूकान छोड़ दीजिए ।,तब भी मैं यही कहूँगा कि आपको स्वयं मिलने के बहाने से उस पर निगाह रखनी होगी । एक मद्ाप्नय भी नहों आये ।,मुनीम-मालूम तो होता है ।,एक महाशय भी नहीं आये । "बहू डाल-डाल परेंगे, तो में पात-याव चलेगा ।",चंदूमल-तो मैं भी तो मौजूद हूँ ।,वह डाल-डाल चलेंगे तो मैं पात-पात चलूँगा । भोऊ कि दूध का धथ्यालय सामने आ कर हाथ से छूंटा जाता है [--हे भगवान्‌ ! वह पत्नी मित्त जाव ।,यदि न मिला तो रुपये कौन देता है ।,शोक कि दूध का प्याला सामने आ कर हाथ से छूट जाता है ! -हे भगवान् ! वह पत्री मिल जाय । "तब दौड़ कर मिरिज को ये से ऊग लिपा बौर दोढे--धप्यारी, यदि ईशर ने चाहा तौतसू अब बच जायगी ।",वे उछल पड़े और उमंग में भरे हुए पागलों की भाँति आनंद की अवस्था में दो-तीन बार कूदे ।,तब दौड़ कर गिरिजा को गले से लगा लिया और बोले-प्यारी यदि ईश्वर ने चाहा तो तू अब बच जायगी । नाड़ो तोब्र-्यति से कूद रहो थी ।,पंडित जी का हृदय बड़े वेग से धड़क रहा था ।,नाड़ी तीव्र-गति से कूद रही थी । अब बिता “किसी भपराध के माँ डॉट बतातो ।,हाय ! उसी वज्र ने मेरा सर्वनाश कर दिया ! फिर ऐसी कितनी ही घटनाएँ याद आतीं ।,अब बिना किसी अपराध के माँ डाँट बताती । "॥ उनका बात बात पर तिउरियोँ बदलता, भाता के भिम्यापवादों पद ,विश्वास करमा--हाय ! मेरा सारा जोवन गष्ट हों गया ! तब बह करवट बंदर छेता और फिर वही दृष्य भाँसों में किसने रूगते ।",पिता का निर्दय निष्ठुर व्यवहार याद आने लगता ।,उनका बात-बात पर तिउरियाँ बदलना माता के मिथ्यापवादों पर विश्वास करना-हाय ! मेरा सारा जीवन नष्ट हो गया ! तब वह करवट बदल लेता और फिर वही दृश्य आँखों में फिरने लगते । उसने काने छगा कर झुना और चौक पड़ ।,संध्या हो गयी थी कि सहसा उसे द्वार पर किसी के पुकारने की आवाज सुनायी पड़ी ।,उसने कान लगाकर सुना और चौंक पड़ा । अपथफ़ार छापा हुआ था ।,दोनों भाई घर में आये ।,अंधकार छाया हुआ था । "श्ञानप्रकाश भाई का जर्जर शरीर, पोछा मुल, वुन्नी हुई भाँखें देपता था ओर रोता था ।",सत्यप्रकाश ने जल्दी से एक कुरता गले में डाल लिया ।,ज्ञानप्रकाश भाई का जर्जर शरीर पीला मुख बुझी हुई आँखें देखता था और रोता था । "वह अब केवछ पप्रछेल़क न था, छिखने के सामान की एक छोटीन्सी दुकान भी उसने खोल छी थी ।",तब से सत्यप्रकाश प्रतिमाह ज्ञानू के पास कुछ न कुछ अवश्य भेज देता था ।,वह अब केवल पत्रलेखक न था लिखने के सामान की एक छोटी-दूकान भी उसने खोल ली थी । "रेब०--ज्ञानू का इल्कार केवल संकोच का इन्कार नहीं हैं, वह तिद्याव का इत्कार है ।",सभी लड़के पहले नहीं करते हैं ।,देव.-ज्ञानू का इनकार केवल संकोच का इनकार नहीं है वह सिद्धांत का इनकार है । "-. अकाल * . कृष्णचंद्र ने माता नो श्रद्धामय नेत्रों से देख कृद बहा--कर्ें तो सगर संभव है, हब यह टीम-टाम त विम सके ।",इससे उनकी आत्मा को शांति होगी ।,कृष्णचन्द्र ने माता को श्रद्धामय नेत्रों से देख कर कहा-करूँ तो मगर संभव है तब यह टीम-टाम न निभ सके । बाडियाँ छाओ और भानो जी से यह कह देता हि गड्र-स्रा बेल गर्म कर लें ।,क्या ज्यादा चोट लगी आ.-भीतर जाओ ।,थालियाँ लाओ और भाभी जी से कह देना कि थोड़ा-सा तेल गर्म कर लें । मैने दीड कर विद्यायरी के चरया पर-सिर झुका दिया ।,पातिव्रत का यह अलौकिक दृश्य देख कर मेरा हृदय पुलकित हो गया ।,मैंने दौड़ कर विद्याधरी के चरणों पर सिर झुका दिया । "-5सका हूंब्य बड़े वेग से थड़क रहा था और, पतिउश्नत का आनंद आँखों से आँसू बन कर निकछता था ।",तीन बार सँभली और तीन बार गिरी तब मैंने उसका सिर अपनी गोद में रख लिया और आँचल से हवा करने लगी ।,उसका हृदय बड़े वेग से धड़क रहा था और पतिदर्शन का आनन्द आँखों से आँसू बन कर निकलता था । तुम्हें परमाटसा की ओर से यह शबित प्रदान हुई है ।,मैं तो बेगारी करता हूँ ।,तुम्हें परमात्मा की ओर से यह शक्ति करता हुई है । गगर के छाल- बुशकाड़ों से इस सहकारिता पर ठीका-टिणणियाँ होने रुगो पर विदज्ज़न अपनी आत्मा को शुचिता के सापने ईर्ष्या के व्याय को कब परवाह करते है ।,तुम्हें परमात्मा की ओर से यह शक्ति करता हुई है ।,नगर के लाल-बुझक्कड़ों में इस सहकारिता पर टीका-टिप्पणियाँ होने लगी पर विद्वज्जन अपनी आत्मा की शुचिता के सामने ईर्ष्या के व्यंग्य की कब परवाह करते हैं । » आराए-कुरगी पर छेद जाते ।,रात की नीरवता में खूब जी लगता ।,आराम-कुरसी पर लेट जाते । "उनकी आँखों से विदय ओर झील, श्रद्धा ओर प्रेम की किरण-मी, निकुछतो हुई जाव पडती ।",जो कुछ उनके मुख से निकलता तुरंत लिख लेतीं ।,उनकी आँखों से विनय और शील श्रद्धा और प्रेम की किरण-सी निकलती हुई जान पड़ती । कमरे में एक लालटेन जक्ू रहो थो ।,इसके बाद रानी तुरंत छत से उतरी ।,कमरे में एक लालटेन जल रही थी । "उसके उनेठे में उगते एक मैछो साड़ी पहनो, गहने उठार दिये, रत्लों क एक छोटे-्से बस्स को और पक तीद्र कटार को बमर मे रखा ।",कमरे में एक लालटेन जल रही थी ।,उसके उजाले में उसने एक मैली साड़ी पहनी गहने उतार दिये रत्नों के एक छोटे-से बक्स को और एक तीव्र कटार को कमर में रखा । "जिय समय बह बाहर निकछो, नैश्स्यपूर्ण साहू शी मूति थी |",उसके उजाले में उसने एक मैली साड़ी पहनी गहने उतार दिये रत्नों के एक छोटे-से बक्स को और एक तीव्र कटार को कमर में रखा ।,जिस समय वह बाहर निकली नैराश्यपूर्ण साहस की मूर्ति थी । "सदरी को धोत़ा दे कर चद्नुंवरि गृप्द द्वार से होतो हुई बेंपेरे में कॉँदा से उलझ्ती, चद्टाता से टकरानो, गगा के विनारे जा पहुँची ।",देख लेंगी ।,संतरी को धोखा दे कर चंद्रकुँवरि गुप्त द्वार से होती हुई अँधेरे में काँटों से उलझती चट्टानों से टकराती गंगा के किनारे पर जा पहुँची । तरगें ताय को गांद में छियेसो रही पीं ।,गंगा जी में संतोषदायिनी शांति विराज रही थी ।,तरंगें तारों को गोद में लिये सो रही थीं । आज गउ्या बोर हरदोल अपने दृइय के वदप्पत पर अपतो सारी वीरता अर साहस न्योछावर करने को उद्यत है ।,क्रोध में आकर मारू के भय बढ़ानेवाले शब्द सुन कर रणक्षेत्र में अपनी जान को तुच्छ समझना इतना कठिन नहीं है ।,आज सच्चा वीर हरदौल अपने हृदय के बड़प्पन पर अपनी सारी वीरता और न्योछावर करने को उद्यत है । ” यह कह कर हरदौछ ने धोकों पर से पान-दान उठा छिप्रा और उसे शजा के सामने रुप कर बीडा छेते के लिए हाथ बढाया |,"आपको ईश्वर ने अजित बनाया है, मुझे अपने हाथ से विजय का बीड़ा दीजिए ।",""" यह कह कर हरदौल ने चौकी पर से पान-दान उठा लिया और उसे राजा के सामने रख कर बीड़ा लेने के लिए हाथ बढ़ाया ।" हरदोऊ का जिला हुआ मुख देख कर राजा की ईर्प्पा की आग और भो मडक उठी ।,""" यह कह कर हरदौल ने चौकी पर से पान-दान उठा लिया और उसे राजा के सामने रख कर बीड़ा लेने के लिए हाथ बढ़ाया ।",हरदौल का खिला हुआ मुखड़ा देख कर राजा की ईर्ष्या की आग और भी भड़क उठी । "सबतें डुवकियाँ मारी, टटोठा, पर निर्मला का पंगा जे बल |",दो मल्लाह भी कूद पड़े ।,सबने डुबकियाँ मारीं टटोला पर निर्मला का पता न चला । अम्मा-अम्मी कह कर रोन छगा ।,सत्यप्रकाश ने उनके मुख की ओर जिज्ञासाभाव से देखा और आशय समझ गया ।,अम्माँ-अम्माँ कह कर रोने लगा । "भाता का प्रेम या, तो सभी प्रेम बख्ते थे, सपा का प्रेप उठ जया, हो सभी विछ्कुर हो यये ।",वृक्षों में उसे कुछ-कुछ सहानुभूति का अज्ञात अनुभव होता था जो घर के प्राणियों से उसे न मिलती थी ।,माता का प्रेम था तो सभी प्रेम करते थे माता का प्रेम उठ गया तो सभी निष्ठुर हो गये । दरिद को कोन भित्ता देता है ?,पिता की आँखों में भी वह प्रेम-ज्योति न रही ।,दरिद्र को कौन भिक्षा देता है । भाइयों को ख़खवारें रुका से०.. लाल हुईं ।,एक घोर संग्राम हुआ ।,भाइयों की तलवारें रक्त से लाल हुईं । "भहाँ तक कि निज सम्बन्धियों से भी आस चुस लीं; परन्तु इन कंथ्ताइयो से भो चम्पतराप ने हिम्मत नही हारी, धीरंज को न छोड़ा ।",साथियों में कुछ तो काम आये कुछ दगा कर गये ।,यहाँ तक कि निज सम्बन्धियों ने भी आँखें चुरा लीं परन्तु इन कठिनाइयों में भी चम्पतराय ने हिम्मत नहीं हारी धीरज को न छोड़ा । उन्होने ओरछा छोड़ दिया और वे दीन वर्ष तक बुंदेछ़खड के सर्त पर्दतों पुर छिपे फिरते रहे 4 |,यहाँ तक कि निज सम्बन्धियों ने भी आँखें चुरा लीं परन्तु इन कठिनाइयों में भी चम्पतराय ने हिम्मत नहीं हारी धीरज को न छोड़ा ।,उन्होंने ओरछा छोड़ दिया और वह तीन वर्ष तक बुंदेलखंड के सघन पर्वतों पर छिपे फिरते रहे । "घादशाही झेनाएं शिकारी, लानवरों की आँति सारे देख म्े,मेंट्र या रही थीं ।",उन्होंने ओरछा छोड़ दिया और वह तीन वर्ष तक बुंदेलखंड के सघन पर्वतों पर छिपे फिरते रहे ।,बादशाही सेनाएँ शिकारी जानवरों की भाँति सारे देश में मँडरा रही थीं । "शुसछमानों की सेनाएँ वार-यार उन पर हमले दग्तों थी, पर हार कर छोट जाती थी ।",गद्दी पर बैठते ही उन्होंने मुगल बादशाहों को कर देना बन्द कर दिया और वे अपने बाहुबल से राज्य-विस्तार करने लगे ।,मुसलमानों की सेनाएँ बार-बार उन पर हमले करती थीं पर हार कर लौट जाती थीं । ऐसा पतित कौन प्राणो होगा जो स्वराज्य का निदक हो; लेकित इसके आए करनें क्र वह उपाय तही है जो चौधरी ने बठकाया है. और जिस प्र तुम छोग चद्दू हो रहे हो ।,स्वयंसेवकों ने स्वराज्य फंड के लिए चंदा जमा करना शुरू किया कि इतने में भगत जी न जाने किधर से लपके हुए आये और श्रोताओं के सामने खड़े हो कर उच्च स्वर से बोले: भाइयो मुझे यहाँ देखकर अचरज मत करो मैं स्वराज्य का विरोधी नहीं हूँ ।,ऐसा पतित कौन प्राणी होगा जो स्वराज्य का निंदक हो लेकिन इसके प्राप्त करने का वह उपाय नहीं है जो चौधरी ने बताया है और जिस पर तुम लोग लट्टू हो रहे हो । उप्र को बह किसी तरह छोड़हीं न थी ।,प्रभा बहुत रोयी ।,उमा को वह किसी तरह छोड़ती न थी । श्वगार चतुरात्रो ने दुलहिन को खूब सेबारा ।,उसके रहने के लिए वह आनंद-भवन सजाया गया था जिसके बनाने में शिल्प विशारदों ने अपूर्व कौशल का परिचय दिया था ।,शृंगार चतुराओं ने दुलहिन को खूब सँवारा । "श्रभा को बाणे रसोला राग थी, उत्तको चितवन भुस का सागर भर उसका मुख-चद्र आमोद का सुहावत्ता कुंज ।",न राज-पाट की चिंता थी न सैर और शिकार की परवा ।,प्रभा की वाणी रसीला राग थी उसकी चितवन सुख का सागर और उसका मुख-चंद्र आमोद का सुहावना कुंज । "दस, प्रेम-सद मे राजासाहब बिल्कुल मंतबाले हो गये थे, उन्हे कया माझूम था कि दूप में मवत्ो है ।",प्रभा की वाणी रसीला राग थी उसकी चितवन सुख का सागर और उसका मुख-चंद्र आमोद का सुहावना कुंज ।,बस प्रेम-मद में राजा साहब बिलकुल मतवाले हो गये थे उन्हें क्या मालूम था कि दूध में मक्खी है । "बहू अपने को इस ति:छ और विशुद्ध प्रेम के योग्य ज्ञ पाती थी, इस, पवित्र प्रेम के बदछे में उसे अपने,झनिम,-रंगरे- हुए भाव प्रकट करते हुए सामसिक पष्ट द्ोथा था ।",प्रभा मन में बहुत लज्जित होती ।,वह अपने को इस निर्मल और विशुद्ध प्रेम के योग्य न पाती थी इस पवित्र प्रेम के बदले में उसे अपने कृत्रिम रँगे हुए भाव प्रकट करते हुए मानसिक कष्ट होता था । "इसके दिए घनिकों की दर्वारशरो या दूसरे शब्दों मे खुशामद भी करनी पडनो थी, दर्शन के उस गौरवयुक्त्र अब्ययन और इस दानछोलुउता में वितना अतर था! यहाँ मिल ओर केंट, स्पेन्पर और कि के साथ एक्रात में वैठे हुए जीव और प्रकृति के गहन गूड विषय पर वार्तालाप और बढ़ो इन अभिमानी, अगम्प, मूर्ख व्यापारियों के सामते मिर झुकाना |",उन्हें अब विदित हो गया था कि जाति-सेवा बड़े अंशों तक केवल चंदे माँगना है ।,इसके लिए धनिकों की दरबारदारी या दूसरे शब्दों में खुशामद भी करनी पड़ती थी दर्शन के उस गौरवयुक्त अध्ययन और इस दानलोलुपता में कितना अंतर था कहाँ मिल और केंट स्पेन्सर और किड के साथ एकांत में बैठे हुए जीव और प्रकृति के गहन गूढ़ विषय पर वार्तालाप और कहाँ इन अभिमानी असभ्य मूर्ख व्यापारियों के सामने सिर झुकाना ! वह अंतःकरण में उनसे घृणा करते थे । यह सत्र सोच कर उसकी टिस्सत डूट भाती थी ।,कोई एक घूँट पानी देनेवाला भी नहीं ।,यह सब सोचकर उसकी हिम्मत टूट जाती थी । यह लोग अवश्य हमारे दबु है ।,उसका माथा ठनका कि अब कुशल नहीं है ।,यह लोग अवश्य हमारे शत्रु हैं । "सिर में आकर आए, पैर यर्रोये ओर वे घरतो पर गिर पड़े ।",धनुष-बाण हाथ में ले लिया किन्तु वह धनुष जो उनके हाथ में इन्द्र का वज्र बन जाता था इस समय जरा भी न झुका ।,सिर में चक्कर आया पैर थर्राये और वे धरती पर गिर पड़े । "झोंक ! जिस आपत्ति से यावस्जीवन दरता रहा, उसने इस अतिम समप्र में आ चेरा ।",चम्पतराय बोले-सारन देखो हमारा एक वीर जमीन पर गिरा ।,शोक ! जिस आपत्ति से यावज्जीवन डरता रहा उसने इस अन्तिम समय में आ घेरा । "दूसरा दिन बावा ओर गया, पर टामो निराहार, निजंछ नदो के छिनारे चक्कर रूगाता रहा ।",दिन बीत गया रात बीत गयी पर उसने विश्राम न लिया ।,दूसरा दिन आया और गया पर टामी निराहार निर्जल नदी के किनारे चक्कर लगाता रहा । मे अपने घुजु्गों का नाप्र न डुबाऊँगा ।,बादशाह-हजरत इमाम की कसम मैं यह जिल्लत न बर्दाश्त करूँगा ।,मैं अपने बुजुर्गों का नाम न डुबाऊँगा । आपकी पेश-परस्ती बूजगों का नाम शेशन नही कर रहो है ।,रोशन-आपके बुजुर्गों के नाम की फिक्र हमें आपसे ज्यादा है ।,आपकी ऐश परस्ती बुजुर्गों का नाम रोशन नहीं कर रही है । रोश्न--जपभैब्राजों के वादों पर कोई दोवाना हो यकीन कर सकता है ।,बादशाह (दीनता से)-वादा करता हूँ कि आइंदा से आप लोगों को शिकायत का कोई मौका न दूँगा ।,रोशन-नशेबाजों के वादों पर कोई दीवाना ही यकीन कर सकता है । “ वादशाह--सुम मुझे जबरइस्तो तश्त से नहीं उतार सकते |,रोशन-नशेबाजों के वादों पर कोई दीवाना ही यकीन कर सकता है ।,बादशाह-तुम मुझे जबरदस्ती तख्त से नहीं उतार सकते । उससे इनके हाथ से बचाओ दौडो वर्ना पछताओये ! गड्े झाते पुकार आकाश कौ नीखता को चीरतो हुई शोमतों को लहरों में विछ्लीन नहीं हुई बल्कि छखनऊबादों के' हृदयो मे जा पहुँची ।,उन्होंने जोर से झटका दे कर अपना हाथ छुड़ा लिया और नैराश्यपूर्ण दुस्साहस के साथ परिणाम-भय को त्याग कर उच्च स्वर से बोले-ऐ लखनऊ के बसनेवालो ! तुम्हारा बादशाह यहाँ दुश्मनों के हाथों कत्ल किया जा रहा है ।,उसे इनके हाथ से बचाओ दौड़ो वरना पछताओगे ! यह आर्त पुकार आकाश की नीरवता को चीरती हुई गोमती की लहरों में विलीन नहीं हुई बल्कि लखनऊवालों के हृदयों में जा पहुँची । "राजा इल्तावर्रासह्‌ बदी-गृह से निकल कर सगर-निवासियों को उत्तेजित करते और प्तिक्षण रक्षाकारियों के दछ को वद्मते, बढ़े बेंग पे दौड़े चछे जा रहे थे ।",उसे इनके हाथ से बचाओ दौड़ो वरना पछताओगे ! यह आर्त पुकार आकाश की नीरवता को चीरती हुई गोमती की लहरों में विलीन नहीं हुई बल्कि लखनऊवालों के हृदयों में जा पहुँची ।,राजा बख्तावरसिंह बंदी-गृह से निकल कर नगर-निवासियों को उत्तेजित करते और प्रतिक्षण रक्षाकारियों के दल को बढ़ाते बड़े वेग से दौड़े चले आ रहे थे । वह छत को धोर निरणतों हुई बोलौ---सू रदास का कोई पद था ।,उसे विश्वास हो गया कि आज कुशल नहीं है ।,वह छत की ओर निरखती हुई बोली-सूरदास का कोई पद था । वह विगईड कर बौली--पहु बिलकुल झूड हैँ ।,प्रभा को अब सच्चा क्रोध दिखाने का अवसर मिल गया ।,वह बिगड़ कर बोली-यह बिलकुल झूठ है । वा उनके दर्शन फिर होगे ” इस आशा से प्रभा का मुखसंडछ विकर्तित हो गया ।,सिर के बल दौड़ा आयेगा ।,क्या उनके दर्शन फिर होंगे इस आशा से प्रभा का मुखमंडल विकसित हो गया । "खजाता छुट गया, बही-खाते पस्ारियों के काम जायें |",मगर सन् 57 ईस्वी के बलवे ने कितनी ही रियासतों और राज्यों को मिटा दिया और उनके साथ तिवारियों का यह अन्न-धन-पूर्ण परिवार भी मिट्टी में मिल गया ।,खजाना लुट गया बही-खाते पंसारियों के काम आये । "जब बुछ ज्ञाति हुई, रियासत फ़िर सेभछी तो समय प्रछट चुका था ।",खजाना लुट गया बही-खाते पंसारियों के काम आये ।,जब कुछ शांति हुई रियासतें फिर सँभलीं तो समय पलट चुका था । "पैतृक प्रतिष्ठा का चिह्ध यदि कुछ झोप था, तो_ वह पुराती चिट्ठी-पत्रियों का ढेर तंधा हुडियों का पुलिश, जिनको स्थाह्ों भो उनके मंइ भाग्य को भाँति फ्रौकी पड़े गयो थो ।",अस्तु साल में दो-तीन बार अपने पुराने व्यवहारियों के घर बिना बुलाये पाहुनों की भाँति जाते और कुछ विदाई तथा मार्ग-व्यय पाते उसी पर गुजारा करते ।,पैतृक प्रतिष्ठा का चिह्न यदि कुछ शेष था तो वह पुरानी चिट्ठी-पत्रियों का ढेर तथा हुंडियों का पुलिंदा जिनकी स्याही भी उनके मंद भाग्य की भाँति फीकी पड़ गयी थी । दुज वेग दिन पड़ित जो के प्रतिष्ठा के श्राद्ध का दिन था |,लक्ष्मी न सही लक्ष्मी का स्मारक-चिह्न ही सही ।,दूज का दिन पंडित जी के प्रतिष्ठा के श्रद्धा का दिन था । "इसे चाहे विडबना कहो, चाहे भूर्खता परंतु श्रोम्ान्‌ प्रेत महाशव को उन प्रश्नों पर बड़ा अभिमात था ।",दूज का दिन पंडित जी के प्रतिष्ठा के श्रद्धा का दिन था ।,इसे चाहे विडंबना कहो चाहे मूर्खता परंतु श्रीमान् पंडित महाशय को उन पत्रों पर बड़ा अभिमान था । "वास्तव म जितनी देर बह छांड नाई के साथ रहता, उतनी देश उसे एक शातिमय आनंद का भनृभव होता ।",ज्ञानप्रकाश बहुत चाहता था कि अपने जेब-खर्च से बचा कर कुछ अपने भाई को दे पर सत्यप्रकाश कभी इसे स्वीकार न करता था ।,वास्तव में जितनी देर वह छोटे भाई के साथ रहता उतनी देर उसे एक शांतिमय आनन्द का अनुभव होता । देव०--तुम ज्ञानू से जलते हो २ फत्म०--में ज्ञानू से क्यों जरने रगा ।,देव.-तुमने चन्दा क्यों दिया ! सत्य.-ज्ञानू ने चन्दा दिया तो मैंने भी दिया ।,देव.-तुम ज्ञानू से जलते हो सत्य.-मैं ज्ञानू से क्यों जलने लगा । यह क्यो नहीं बहते कि पढ़ना अत्र मुचे मणूर नहीं हैं ।,देव.-अच्छा तो आप मेरी मानरक्षा करते हैं ।,यह क्यों नहीं कहते कि पढ़ना अब मुझे मंजूर नहीं है । मर पराम इतना रुपया नहीं कि तुम्दें एक-एक मेहास में तीन-तौद साछ पद्मऊँ जौर ऊपर से धुम्हारे खर्च के छिए भी प्रतिमात कुछ दूँ ।,यह क्यों नहीं कहते कि पढ़ना अब मुझे मंजूर नहीं है ।,मेरे पास इतना रुपया नहीं कि तुम्हें एक-एक क्लास में तीन-तीन साल पढ़ाऊँ और ऊपर से तुम्हारे खर्च के लिए भी प्रतिमास कुछ दूँ । "सातवाब्‌ तुमसे व्िदना छारा है, छेकित तुमसे एक ही दर्जा नीचे है ।",मेरे पास इतना रुपया नहीं कि तुम्हें एक-एक क्लास में तीन-तीन साल पढ़ाऊँ और ऊपर से तुम्हारे खर्च के लिए भी प्रतिमास कुछ दूँ ।,ज्ञानबाबू तुमसे कितना छोटा है लेकिन तुमसे एक ही दर्जा नीचे है । "देवपकाश ने देखा कि बात का बतगड हुआ चाहंठा है, तो ज्ञानप्रकाग्न को इशारे से टाल द्व्याि और पत्नी के क्रोध को शत करने की चेंश्टा करने छगे ।",देव.-क्यों व्यर्थ में ऐसे कटुवचन बोलती हो ज्ञान.-अगर आप लोगों की यही इच्छा है तो यही होगा ।,देवप्रकाश ने देखा कि बात का बतंगड़ हुआ चाहता है ज्ञानप्रकाश को इशारे से टाल दिया और पत्नी के क्रोध को शांत करने की चेष्टा करने लगे । "मगर देवप्रिया फूंढ” फूट कर रो रही थो और वार-दार वहती थी, मैं इसकी सूरत न देखूँगी |",देवप्रकाश ने देखा कि बात का बतंगड़ हुआ चाहता है ज्ञानप्रकाश को इशारे से टाल दिया और पत्नी के क्रोध को शांत करने की चेष्टा करने लगे ।,मगर देवप्रिया फूट-फूट कर रो रही थी और बार-बार कहती थी मैं इसकी सूरत नहीं देखूँगी । मैं उसकी नद्च-बस पहि- चानती हूँ ।,मेरे बेटे को मुझसे छीनने के लिए उसने यह प्रेम का स्वाँग भरा है ।,मैं उसकी नस-नस पहिचानती हूँ । """उतन शव बार नहीं करके हा! वे की ।",कहा-तुम्हारी माता इस शोक से मर जायगी किंतु कुछ असर न हुआ ।,उसने एक बार नहीं करके हाँ न की । ईइवर ने चाहा तो अब ऐसो भूछ कदापि न होगी ।,किंतु तुमने मुझे शिक्षा दे दी ।,ईश्वर ने चाहा तो ऐसी भूल कदापि न होगी । एक अँगरेजों का पूर्ण पंडित सहज ही में प्रिछठ रहा हैं ।,कुँवर साहब ने मन में सोचा कि मेरे यहाँ सदा अदालत-कचहरी लगी ही रहती है सैकड़ों रुपये तो डिगरी और तजवीजों तथा और-और अँग्रेजी कागजों के अनुवाद में लग जाते हैं ।,एक अँग्रेजी का पूर्ण पंडित सहज ही में मिल रहा है । "इसे रख सेना ही उचित है) लेकिन पडिंत जो की वात का उत्तर देना आवश्यक था, जतः कहा--महाशव, सत्यवारों मनुष्य को किलता ही कम वेतत दिया जाये, बह सत्य को न ' छोडेगा झौर न अधिक वेतन पाने से वेइमान रुच्चा बत सकता हैं ।",इसे रख लेना ही उचित है ।,लेकिन पंडित जी की बात का उत्तर देना आवश्यक था अतः कहा-महाशय सत्यवादी मनुष्य को कितना ही कम वेतन दिया जाये वह सत्य को न छोड़ेगा और न अधिक वेतन पाने से बेईमान सच्चा बन सकता है । "रहने के लिए सुंदर चेंगला हैं, जिसमे बहुमूल्य विछोता बिछा हुआ था, सेकड़ो बोषे की भोर, कई नौकर-बाकर, कितने हो चपरासों, सवारी के लिए एक़ सुंदर टाँगत, सुख ठाठ-जाढ़ के सारे साम्रान उपस्थित ।",यथार्थ में रियासत की नौकरी सुख-सम्पत्ति का घर है ।,रहने के लिए सुंदर बँगला है जिसमें बहुमूल्य बिछौना बिछा हुआ था सैकड़ों बीघे की सीर कई नौकर-चाकर कितने ही चपरासी सवारी के लिए एक सुंदर टाँगन सुख ठाट-बाट के सारे सामान उपस्थित । छोडे-छोदे भाँवों में मो आपको लालदेनें जूतों हुई मिलेंगी ।,मेरा कोई ऐसा ग्राम नहीं है जहाँ मेरी ओर से सफाई का प्रबंध न हो ।,छोटे-छोटे गाँवों में आपको लालटेनें जलती हुई मिलेंगी । सबसे प्रयप्त कोर्य जो मैने किया वह यह था कि उत्हें ढूँढ विकालू और यह मोर उनके सिर रखे डूं ।,मैंने सारा प्रबंध पंडित श्रीधर के हाथों में दे दिया है ।,सबसे प्रथम कार्य जो मैंन किया वह यह था कि उन्हें ढूँढ़ निकालूँ और यह भार उनके सिर रख दूँ । मुझे देखरे हो उंसके ऊपर पड़े पानी पड़ जोंवा है जौर उसके माये के जलूविदु दिखाई देने रूगते हैं ।,उसकी आँखें झुक जाती हैं ।,मुझे देखते ही उसके ऊपर घड़ों पानी पड़ जाता है और उसके माथे के जलबिंदु दिखाई देने लगते हैं । ' दीन-दुललोजनों को दान देने के लिए रुपया और मशरफियों को यैंडियाँ साथ छे ली ।,मैं भी उनके साथ हो ली ।,दीन-दुखी जनों को दान देने के लिए रुपयों और अशर्फियों की थैलियाँ साथ ले लीं । "भर्मशाछों में रहने का स्थानन मिलता,थां ।",सन्यासियों और तपस्वियों की संख्या गृहस्थों से कुछ ही कम होगी ।,धर्मशालाओं में रहने का स्थान न मिलता था । भोलों तक आदमियों का फर्शन्‍्सा विछा हुआ था ।,दूर से वह छोटे-छोटे खिलौने की भाँति दिखायी देते थे ।,मीलों तक आदमियों का फर्श-सा बिछा हुआ था । धारा परबंलवेग ये अवाहित थी और जहू वर्फ से भी अधिक शीतल |,सभी हतबुद्धि- से हो रहे थे ।,धारा प्रबल वेग से प्रवाहित थी और जल बर्फ से भी अधिक शीतल । में तैस्ने में अम्पस्त थी ।,यह हृदय-विदारक दृश्य मुझसे न देखा गया ।,मैं तैरने में अभ्यस्त थी । "ज्यीजज्यों में आगे बढती थो, देह मनृष्प मुझे दूर हाता ता जाता था ।",मैंने ईश्वर का नाम लिया और मन को दृढ़ करके धारा के साथ तैरने लगी ।,ज्यों-ज्यों मैं आगे बढ़ती थी वह मनुष्य मुझसे दूर होता जाता था । / छेकिम ईदवरचद्र एक बार मैदान में आ कर भागगा विंच ममझते थे ।,उनके पूज्य पिता भी बिगड़े हितैषियों ने भी समझाया- अभी इस काम को कुछ दिनों के लिए स्थगित कर दो कानून में उत्तीर्ण हो कर निर्द्वंद्व देशोद्धार में प्रवृत्त हो जाना ।,लेकिन ईश्वरचंद्र एक बार मैदान में आ कर भागना निंद्य समझते थे । "ज्योनज्यों बोलो को आतरिक दशा का ज्ञान होता हैं, मुझे उस परेगें से घृणा होती जाती है ।",मानकी ने व्यंग्य से कहा-बहुत कठिन है ईश्वरचंद्र-कठिन नहीं है और कठिन भी होता तो मैं उससे डरने वाला न था लेकिन मुझे वकालत का पेशा ही पतित प्रतीत होता है ।,ज्यों-ज्यों वकीलों की आंतरिक दशा का ज्ञान होता है मुझे उस पेशे से घृणा होती जाती है । ..*५ढ कक उतना सुनते द्वी पृथ्वी सिंह ने विजली की तरह कमर पे त्ेगा सीच लिया और उसे धर्ममिह के सीने_मे चुभा दिया ।,पृथ्वीसिंह-(घबरा कर) ऐं तुम ! -मैं- धर्मसिंह-राजपूत अपनी प्रतिज्ञा पूरी करो ।,इतना सुनते ही पृथ्वीसिंह ने बिजली की तरह अपने कमर से तेगा खींच लिया और उसे धर्मसिंह के सीने में चुभा दिया । दुमने पुरुष का कर्सस्य पुरप की -भांति पाशन किया ।,तुम सच्चे वीर हो ।,तुमने पुरुष का कर्त्तव्य पुरुष की भाँति पालन किया । "कलाई ये सोहाण ,का कंगन है; परों मे » “दावर छाायो है ौर जाल चुवरी ओढ़ो है ।",उसने सोलहों शृंगार किये हैं और माँग मोतियों से भरवायी है ।,कलाई में सोहाग का कंगन है पैरों में महावर लगायी है और लाल चुनरी ओढ़ी है । वह आज स्वर्ग की रैदी जान पह्ती हैं ।,प्रेम-मद से उसका रोआँ-रोआँ मस्त हो गया है उसकी आँखों से अलौकिक प्रकाश निकल रहा है ।,वह आज स्वर्ग की देवी जान पड़ती है । "सती चिता पर बैठ चुक्रो पी कि इतने में बुदर पृथ्वीसिह आये और हाप जोड़ कर बेठें--महारावी, मेश मपराप क्षमा करो ।",बाजे बज रहे हैं फूलों की वृष्टि हो रही है ।,सती चिता पर बैठ चुकी थी कि इतने में कुँवर पृथ्वीसिंह आये और हाथ जोड़कर बोले-महारानी मेरा अपराध क्षमा करो । "* एक ओर तो ब्राइशाई को तिरकुशता, दूसशी ओर वलदान्‌ और युक्तिन्सपल अषुओं की कृटनीजि--इस शिठा ओर नंबर के बोच में राग्य को नौका को चलाते रहना किठना कष्टसाब्य वा ! शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरा होगा, जिम्र दिन मेरा बित्त-प्राण घक्ा से आदोलिठ न हुआ हो ।",नहीं तो क्या मेरी राज-भक्ति का यही पुरस्कार मिलना चाहिए था मैंने अब तक कितनी कठिनाइयों से राज्य की रक्षा की है यह भगवान् ही जानते हैं ।,एक ओर तो बादशाह की निरंकुशता दूसरी ओर बलवान् और युक्ति- संपन्न शत्रुओं की कूटनीति-इस शिला और भँवर के बीच में राज्य की नौका को चलाते रहना कितना कष्टसाध्य था ! शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरा होगा जिस दिन मेरा चित्त प्राण-शंका से आंदोलित न हुआ हो । मुझे इन बेड़ियो की पर्वाह नही ।,लेकिन इतना जानता हूँ कि प्यारी सुखदा अंत तक अपने सतीत्व की रक्षा करेगी अन्यथा प्राण त्याग देगी ।,मुझे बेड़ियों की परवाह नहीं । पर मुनता हूँ छडको के पये में भो बेड़ियाँ डाछों गयी हैं ।,मुझे बेड़ियों की परवाह नहीं ।,पर सुनता हूँ लड़कों के पैरों में भी बेड़ियाँ डाली गयी हैं । "और, इस्री ववन जा कर इसको सारी जायदाद जब्त कर छो ।",मैं इसकी सूरत नहीं देखना चाहता ।,और इसी वक्त जा कर इसकी सारी जायदाद जब्त कर लो । ममझ गये कि पहले ही भे यह पहुयत्र रखा बया था ।,तब बादशाह की आँखें खुलीं ।,समझ गये कि पहले ही से यह षड्यंत्र रचा गया था । "बोढे--मेंते दो आप छोगो की- मस्जी के लिछाफ ऐसा कोई काम नही किया, जिसकी यह सजा मिले ।",एक क्षण में बादशाह की उद्दंडता और घमंड ने दीनता और विनयशीलता का आश्रय लिया ।,बोले-मैंने तो आप लोगों की मरजी के खिलाफ ऐसा कोई काम नहीं किया जिसकी यह सजा मिले । :7 उस समय विद्याघरी. की घबराहट का भेद में छुछ ग शमझी ।,विद्याधरी के चेहरे का रंग उड़ गया आँखें झुक गयीं कुछ हिचकिचायी कुछ घबरायी अपने अपराधी हृदय को इन शब्दों से शांत किया- यह हार मैंने ठाकुर जी के लिए गूँथा है ।,इस समय विद्याधरी की घबराहट का भेद मैं कुछ न समझी । रहेंसों और अमीरों ने खिलखतें पापी ।,वह मुझसे गले मिलने के लिए बढ़ी किंतु मैं हट गयी और बोली कि तूने मुझसे यह बात छिपायी क्यों ऐ मुसाफिर राजा रणधीरसिंह की उदारता ने प्रजा को मालामाल कर दिया ।,रईसों और अमीरों ने खिलअतें पायीं । 'भुझे उन्होंने शो भगवदुगीता को एक अ्रति मखमल्ी बस्ते में रख कर दी ।,किसी को घोड़ा मिला किसी को जागीर मिली ।,मुझे उन्होंने श्रीभगवद्गीता की एक प्रति एक मखमली बस्ते में रख दी । उस कंगन में अतमीछ' हीरे पड़े 'हुए थे ।,विद्याधरी को एक बहुमूल्य जड़ाऊ कंगन मिला ।,उस कंगन में अनमोल हीरे जड़े हुए थे । "हम छोग सब हुजू र के चाकर हैं, सरकार हमको पाला-पोप्ता है ।",6 मलूका ने सामने आ कर विनयपूर्वक कहा-सरकार हम लोगों से जो कुछ भूल-चूक हुई हो उसे क्षमा किया जाय ।,हम लोग सब हुजूर के चाकर हैं सरकार ने हमको पाला-पोसा है । यहू भुत कर'मलूका की आँखों में बौँतू मर आये ।,कड़क कर बोले-वे तुम्हारे सहायक पंडित कहाँ गये वे आ जाते तो जरा उनकी खबर ली जाती ।,यह सुन कर मलूका की आँखों में आँसू भर आये । कितनी थाद पर में आग छगवायो ।,इन्हीं रुपयों के लिए कई बार खेत कटवाने पड़े थे ।,कितनी बार घरों में आग लगवायी । हे - मुख्तारआम साहव से कागजात खोले और असामियों अपनो-अपनो पोट- लियाँ ।,यह क्या जादू है ।,मुख्तारआम साहब ने कागजात खोले और असामियों ने अपनी-अपनी पोटलियाँ । "जिसके जिसमे जितना निकला, बे काव-पूछ द्विलाये उदभा अब्य सामने रख दिया ।",मुख्तारआम साहब ने कागजात खोले और असामियों ने अपनी-अपनी पोटलियाँ ।,जिसके जिम्मे जितना निकला बे-कान-पूँछ हिलाये उतना द्रव्य सामने रख दिया । यह कोर गवाब सुन कर उसकी भ्राँसों से असू गिरने छये ।,खेद है ।,यह कोरा जवाब सुन कर उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे । वह बोला“ आय चाह सो कुछ न कुछ प्रबंध अबध्य कर सकते दैं ।,यह कोरा जवाब सुन कर उसकी आँखों से आँसू गिरने लगे ।,वह बोला-आप चाहें तो कुछ न कुछ प्रबंध अवश्य कर सकते हैं । "प्रगठ में कहा--इसमें मुछ्ते कोई संदेह नही है, डेहिन येद है कि मेरे पास स्पये नहीं है ।",मैंने दिल में कहा-यहाँ तुम्हारी नीयत साफ है लेकिन घर पहुँच कर भी यही नीयत रहेगी इसका क्या प्रमाण है नीयत साफ रहने पर भी मेरे रुपये दे सकोगे या नहीं यह कौन जाने कम से कम तुमसे वसूल करने का मेरे पास कोई साधन नहीं है ।,प्रकट में कहा-इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है लेकिन खेद है कि मेरे पास रुपये नहीं हैं । "हा, नुम्द्दारी जितनी तनस्याह निकछती हो बह छे सकते हू ।",प्रकट में कहा-इसमें मुझे कोई संदेह नहीं है लेकिन खेद है कि मेरे पास रुपये नहीं हैं ।,हाँ तुम्हारी जितनी तनख्वाह निकलती हो वह ले सकते हो । निवेदक से तुलभ्नीदास की यह चौपाई लिख दो है-- “/आपत-काऊ परखिए चारी ।,आज राज-सभा में आते समय मुझे यह आवेदनपत्र मिला है जिसे मैं आप सज्जनों की सेवा में उपस्थित करता हूँ ।,निवेदक ने तुलसीदास की यह चौपाई लिख दी है- आपत-काल परखिये चारी । अपनी जात्रीच साहराहीनता का यह छज्जाजनक दृशक्ष्य अब सुझछे नहीं दंखा जाता ।,वे बोले-भाइयो यदि इस समय मेरी बातें आप लोगों को अत्यंत कड़ी जान पड़ें तो मुझे क्षमा कीजिएगा क्योंकि अब मुझमें अधिक श्रवण करने की शक्ति नहीं है ।,अपनी जातीय साहसहीनता का यह लज्जाजनक दृश्य अब मुझसे नहीं देखा जाता । "परंतु वह घटना जी सैंते झातसरोबर के त पर देखी, उसका उटाहरण मूब्किक में मिेगा, में उसे कभी न भूलूगा ।",मैंने ऐसी-ऐसी आश्चर्यजनक घटनाएँ आँखों से देखी हैं जो अलिफ-लैला की कथाओं से कम मनोरंजक न होंगी ।,परंतु वह घटना जो मैंने ज्ञानसरोवर के तट पर देखी उसका उदाहरण मुश्किल से मिलेगा मैं उसे कभी न भूलूँगा । "ज्ञानमशोबर के स्वच्छ निर्मेल ऊस्थ में आकाश और पर्वत श्रेणों कई प्रतिव्िम्द, जलपक्षियों का पानी पर तैरता, सुन हिमलेणी कर सूर्प के प्रवषण'से चमवना आदि दृश्य ऐसे ममोहर ये कि में आत्मोल्दास में विह्नल हो गंया ।",मैं हिमालय के दामन में ज्ञानसरोवर के तट पर हरी-हरी घास पर लेटा हुआ था ऋतु अत्यंत सुहावनी थी ।,ज्ञानसरोवर के स्वच्छ निर्मल जल में आकाश और पर्वत श्रेणी का प्रतिबिम्ब जलपक्षियों का पानी पर तैरना शुभ्र हिमश्रेणी का सूर्य के प्रकाश से चमकना आदि दृश्य ऐसे मनोहर थे कि मैं आत्मोल्लास से विह्वल हो गया । मेटे अगत्यग मेरे काबू से बाहर थे ।,मैं तैरने में कुशल हूँ पर मैं ऐसा भयभीत हो गया कि अपने स्थान से हिल न सका ।,मेरे अंग-प्रत्यंग मेरे काबू से बाहर थे । "सेरी ध्यामी मोहिली इस समय ज॑यछ से छौटी थी, सौर उगपा बच्चा इपर करू/ले बर रहा था ।",इतने में एक जवान बाँकी पगड़ी बाँधे हथियार सजाये झूमता आता दिखायी दिया ।,मेरी प्यारी मोहिनी इस समय जंगल से लौटी थी और उसका बच्चा इधर किलोलें कर रहा था । देखतेनदेखते सैक्शो आाइमी जमा हो गये और उसतों देही-सीपी सुनाने छगे ।,मेरी आँखों के सामने उस राजपूत ने उस प्यारी गाय को जान से मार डाला ।,देखते-देखते सैकड़ों आदमी जमा हो गये और उसको टेढ़ी-सीधी सुनाने लगे । सागर के क्तारे एक बडीन्सो गुफा थी ।,बिजली की चमक ने दीपक का काम किया ।,सागर के किनारे एक बड़ी-सी गुफा थी । "मैचे अनुमात किया कि यह - वही अस्वारोदी पथिके हैं, जिस पर इन झॉकुओं नें ४ आचान किया चा ।",उस स्त्री के सामने एक रक्त से लिपटी हुई लाश पड़ी थी और लाश के समीप ही एक मनुष्य रस्सियों से बँधा हुआ सिर झुकाये बैठा था ।,मैंने अनुमान किया कि यह वही अश्वारोही पथिक है जिस पर इन डाकुओं ने आघात किया था । "छेस़ों के संशोषत, परिवर्यत और परिवर्तन, लेखकगण से पत्रछवह्ार और चित्ताकर्षक्र विषयों को खोज ओर सहयोगियों से आगे बड़ जाने को चिता में उन्हें कांतूत वा अध्यरत करने का अवकाण होने मिलता था ।",लेकिन नौका में बैठ कर उन्हें अनुभव हुआ कि यात्र उतनी सुखद नहीं है जितनी समझी थी ।,लेखों के संशोधन परिवर्धन और परिवर्तन लेखकगण से पत्र-व्यवहार और चित्ताकर्षक विषयों की खोज और सहयोगियों से आगे बढ़ जाने की चिंता में उन्हें कानून का अध्ययन करने का अवकाश ही न मिलता था । वास्ववार सकलन करते कि अब नियमित रूप से पुस्तेदा- वल्लोकन करूँगा और एक निदिष्ट ममय से अधिक सम्पांदतत्रार्य में ने छगाऊंगा ।,सुबह को किताबें खोल कर बैठते कि 100 पृष्ठ समाप्त किये बिना कदापि न उठूँगा किन्तु ज्यों ही डाक का पुलिंदा आ जाता वे अधीर हो कर उस पर टूट पड़ते किताब खुली की खुली रह जाती थी ।,बार-बार संकल्प करते कि अब नियमित रूप से पुस्तकावलोकन करूँगा और एक निर्दिष्ट समय से अधिक सम्पादनकार्य में न लगाऊँगा । "पत्रों को नोकन्‍झोक, पत्रिकाओं के तक-वितर्क, आलोचदाप्रत्या स्वेवता, कत्रियों के काज्यचमलार, लेखकों का रचताकौशल इत्यादि सभी दातें उन पर जाए का काम करती ।",लेकिन पत्रिकाओं का बंडल सामने आते ही दिल काबू के बाहर हो जाता ।,पत्रों के नोक-झोंक पत्रिकाओं के तर्क-वितर्क आलोचना-प्रत्यालोचना कवियों के काव्यचमत्कार लेखकों का रचनाकौशल इत्यादि सभी बातें उन पर जादू का काम करतीं । "इस पर छत्ाई को कठिताइयाँ, ग्राहकर्सस्या बढ़ाने को चिता और पत्रिका को सर्वाय-सखुंदर दताने को आकांक्षा और औ प्रामो को सक्ट में डाले रहतो थी ।",पत्रों के नोक-झोंक पत्रिकाओं के तर्क-वितर्क आलोचना-प्रत्यालोचना कवियों के काव्यचमत्कार लेखकों का रचनाकौशल इत्यादि सभी बातें उन पर जादू का काम करतीं ।,इस पर छपाई की कठिनाइयाँ ग्राहक-संख्या बढ़ाने की चिंता और पत्रिका को सर्वांग-सुंदर बनाने की आकांक्षा और भी प्राणों को संकट में डाले रहती थी । "मंत को समझाया कि अभी इग काम बंद थोगगेस है, इसों कारण यह सव॑ बाबाएँ उपस्थित होती है ।",वे उसमें सम्मिलित न हुए ।,मन को समझाया कि अभी इस काम का श्रीगणेश है इसी कारण यह सब बाधाएँ उपस्थित होती हैं । "उसके आमन्यास दस-बीस छारू प्रयटीबाज़े, करवद्ध सड़े थे! वहाँ फरे-प्राने कपड़े पहिने, दु्मिक्ष ग्रस्त पुष्प, जिस पर बभी- चाबुवों कौ बौछार हुई थो, पड सिसक रहा यथा ।",मेरे गले में बाँहें डाल कर खेलनेवाले लँगोटिया यार जो कभी रूठते थे कभी मनाते थे कहाँ गये हाय बिना घरबार का मुसाफिर अब क्या अकेला ही हूँ क्या मेरा कोई भी साथी नहीं इस बरगद के निकट अब थाना था और बरगद के नीचे कोई लाल साफा बाँधे बैठा था ।,उसके आस-पास दस-बीस लाल पगड़ीवाले करबद्ध खड़े थे ! वहाँ फटे-पुराने कपड़े पहने दुर्भिक्षग्रस्त पुरुष जिस पर अभी चाबुकों की बौछार हुई थी पड़ा सिसक रहा था । "शोक है कि वे कोल्टू अब तक ज्यो के त्यो खड़े ये, कितु कोन्डवाड़े की जगह पर अब एक सन लपेटनेवाली सश्ीन ऊपरी थी और उमके सामने एक तम्वीली और सियरेट्दाके वी दूकात यो ।",वहाँ हजारों बार मैंने कच्चा रस और पक्का दूध मिला कर पिया था और वहाँ आस-पास के घरों की स्त्रियाँ और बालक अपने-अपने घड़े ले कर आते थे और उनमें रस भर कर ले जाते थे ।,शोक है कि वे कोल्हू अब तक ज्यों के त्यों खड़े थे किन्तु कोल्हवाड़े की जगह पर अब एक सन लपेटनेवाली मशीन लगी थी और उसके सामने एक तम्बोली और सिगरेटवाले की दूकान थी । "युरेडो के दिलों पर उमर सप्रय जैश्नो बीत रहो थो, उसका अनुभान करना कठिन है ।","हर एक आदमी कहता था कि जब तक हम जीते हैं, महाराज को लड़ने नहीं देंगे, पर जब लोग अखाड़े के पास पहुँचे तो देखा कि अखाड़े में बिजलियाँ-सी चमक रही हैं ।","बुंदेलों के दिलों पर उस समय जैसी बीत रही थी, उसका अनुमान करना कठिन है ।" हर एक आऔँस अखाड़े को वरक छगी हुई थी ओर हर एक का दिल हरदोल को मएनकामता के छिए ईमबर का प्रार्यी था ।,"उस समय उस लंबे-चौड़े मैदान में जहाँ तक निगाह जाती थी, आदमी ही आदमी नज़र आते थे, पर चारों तरफ़ सन्नाटा था ।",हर एक आँख अखाड़े की तरफ़ लगी हुई थी और हर एक का दिल हरदौल की मंगल-कामना के लिए ईश्वर का प्रार्थी था । यह देखते ही बुंदेंक मारे आनइ के उनन्‍्मत्त हो गये ।,आख़िर घड़ियाल ने पहला पहर बजाया और हरदौल की तलवार बिजली बनकर कादिर के सिर पर गिरी ।,यह देखते ही बुंदेले मारे आनंद के उन्मत्त हो गए । "तलवारे स्वयं समान से तिकल पहों, भाके चमकने लगे ।",हज़ारों आदमियों पर वीरता का नशा छा गया ।,"तलवारें स्वयं म्यान से निकल पड़ीं, भाले चमकने लगे ।" "सउेरे जब धर्मगद उड़े तब राजमदिती ने कहा था कि में वंजविलामिती के शत्रु का छिए चाईती हू, तुम्हें लाना होगा ।",पर जब रात को उसने देखा कि मेरा पति इसी स्त्री के सामने दुखिया की तरह बैठा हुआ है तब वह संदेह निश्चय की सीमा तक पहुँच गया और यही निश्चय अपने साथ सत लेता आया था ।,सबेरे जब धर्मसिंह उठे तब राजनंदिनी ने कहा था कि मैं ब्रजविलासिनी के शत्रु का सिर चाहती हूँ तुम्हें लाना होगा । "छालटेन डिये बाहर निकले तो देबइत्त रोता हुआ उनके पैरों से छिपट ग्रया और बोला--वैद्य जी, इस समय मुझ्नपर दया कीजिए ।",रात के समय उनकी फीस दुगुनी थी ।,लालटेन लिये बाहर निकले तो देवदत्त रोता हुआ उनके पैरों से लिपट गया और बोला-वैद्य जी इस समय मुझ पर दया कीजिए । “मुझे: ठो यह अभियोग ओर यह फँसटा स्गा द्वास्थास्थद-जान पहले है और किस नो समाज की निदित करतेबाऊे हैं ।,अभी मैंने किसी समाचारपत्र में पढ़ा था कि एक स्त्री ने किसी पुरुष पर इस प्रकार का अभियोग चलाया था कि उसने मुझे निर्भीकतापूर्वक कुदृष्टि से घूरा था किन्तु विचारक ने उस स्त्री को नख-शिख से देख कर यह कह कर मुकदमा खारिज कर दिया कि प्रत्येक मनुष्य को अधिकार है कि हाट-बाट में नौजवान स्त्री को घूर कर देखे ।,मुझे तो यह अभियोग और यह फैसला सर्वथा हास्यास्पद जान पड़ते हैं और किसी भी समाज को निंदित करनेवाले हैं । "गूठर के कोझ्वे बौर आदू के कदाव, यह दोलों ख्ेदती खूंद पकाठो है ।",फीरिनी के लिए भी कह आया था ।,गूलर के कोफते और आलू के कबाब यह दोनों सेवती खूब पकाती है । ' इसके जिवा -दही-वडे बोर चटतो-्जचार क्ोचर्ता वो ब्यई ही है ।,गूलर के कोफते और आलू के कबाब यह दोनों सेवती खूब पकाती है ।,इनके सिवा दही-बड़े और चटनी-अचार की चर्चा तो व्यर्थ ही है । बराठ-डाउ मे जोपतता थो ओर उम्रके डोल-हौछ का गठन बहुत ही मनोहर थो ।,आँखें बड़ी और ओंठ सूखे ।,चाल-ढाल में कोमलता थी और उसके डील-डौल की गठन बहुत मनोहर थी । देर एक समय बड़ भी हींगो जेब यह वहो सुंदर होगो ।,अनुमान से जान पड़ता था कि समय ने इसकी वह दशा कर रखी है ।,पर एक समय वह भी होगा जब यह बड़ी सुंदर होगी । जुप्हारा ब्याह तो हो गया है न १” झ्याए का नाम सुनते ही अजनिडासिती वो आँखों में औसू बढ़ने रूगे |,संस्कृत कहाँ पढ़ी है मेरे पिता जी संस्कृत के बड़े पंडित थे उन्होंने थोड़ी-बहुत पढ़ा दी है ।,तुम्हारा ब्याह तो हो गया है न ब्याह का नाम सुनते ही ब्रजविलासिनी की आँखों से आँसू बहने लगे । आज ते श्रजविशासितों बहों रहने छगो ।,उसे सुन कर आपको दुःख होगा इसलिए इस समय क्षमा कीजिए ।,आज से ब्रजविलासिनी वहीं रहने लगी । छुवर पृश्दोनिद भर पर्मशरिट्‌ दोसो महाराज के सार्व अफवाविस्तान को मुहीम पर गये हुए वे ।,2 कई महीने बीत गये ।,कुँवर पृथ्वीसिंह और धर्मसिंह दोनों महाराज के साथ अफगानिस्तान की मुहीम पर गये हुए थे । "कोई पड़े को कुएँ में डाले हुए अपनों पोषछी डास् की नकल कर रही थी, कोई सम्मों से विपटों हुई अपनी सहेलों से मुस्करा कर प्रेमरहस्य को बातें करती थी ।",पानी भरने के लिए नहीं हँसने के लिए ।,कोई घड़े को कुएँ में डाले हुए अपनी पोपली सास की नकल कर रही थी कोई खम्भों से चिपटी हुई अपनी सहेली से मुस्करा कर प्रेमरहस्य की बातें करती थी । डगामल ने पगढ़ी उत्तारकर खुटी पर लटका दी और बोले--अगर मेरे बेठे रहने से तुम्हारा जी अच्छा हो जाय तो में दूकान न जाऊंगा ।,"लालाजी दूकान जाने लगे , तब उसने डरते-डरते कहा , था देखो , मेरा जी अच्छा नहीं है ।","डंगामल ने पगड़ी उतारकर खूँटी पर लटका दी और बोले अगर मेरे बैठे रहने से तुम्हारा जी अच्छा हो जाय , तो मैं दूकान न जाऊँगा ।" "ठीक ही है, मैं वया जानती हैँ कि वह कौन लोग थे ।",सुमन के मन में बात आ गई ।,"ठीक ही है, मैं क्या जानती हूँ कि वह कौन लोग थे ।" तुम्हारी जगह तो पीछे छूट गई ।,मन में यह विचार स्थिर करके सूरदास अपनी झोंपड़ी से निकला और लाठी टेकता हुआ गोदाम की तरफ चला ।,तुम्हारी जगह तो पीछे छूट गई । आज के देनिक-पत्न में उप्व्य चित्र और जोवन-इत्तान्त छपा है ।,इसका नाम तो तुमने सुना होगा ?,आज के दैनिक पत्र में उसका चित्र और जीवन-वृत्तान्त छपा है । "जिसमें अपना नहीं, उसमें पराया क्या होगा ?",मरते दम तक गुमनाम पड़े रहते ।,"जिसमें अपना नहीं, उसमें पराया क्या होगा ?" सरकार पर इतने एहसान करके यों ही छोड़ देते ?,इसलिए अपनी लाज की रक्षा करने को उसने यही युक्ति निकाल रखी है ।,सरकार पर इतने एहसान करके यों ही छोड़ देते ? "मेम०--तेरा जो न चाहे न बचवा, कोई जबरदस्ती थोड़े द्दी बना देगा ।",आदमी हो जायगा ।,"मेम.- तेरा जी चाहे न बनना, कोई जबरदस्ती थोड़े ही बना देगा ।" "इतने में जाह्नवी भी भा गई, ये वातें उसके कान में पड़ी, वोली-हाँ-हाँ, दोड़ो, वैद्य को बुलाश्ो, नहीं तो भ्रनर्थ हो जाएगा ।",ईश्वर चाहेंगे तो तुम शीघ्र ही अच्छी हो जाओगी ।,"इतने में जाह्नवी भी आ गई, ये बातें उसके कानों में पड़ी, बोली -- हाँ हाँ, दोड़ो वैद्य को बुलाओ नहीं तो अनर्थ हो जाएगा ।" "सोफी ने विनय से कल मिलने का वादा किया था, पर उनकी बातें उसे एक क्षण के लिए भी चैन न लेने देती थीं ।","अगर मैंने वीरपाल पर पिस्तौल न चलाई होती, तो यह उपद्रव शांत हो जाता ।","सोफी ने विनय से कल मिलने का वादा किया था, पर उनकी बातें उसे एक क्षण के लिए भी चैन न लेने देती थीं ।" "अब तक चार पछ्टे का सौदा बेचता, आपने यद्द खटराय बढ़ा दिया |","इतने में कुप्पी उनके हाथ से छूटकर गिर पड़ी, और बुझ गयी ।","अब तक चार पैसे का सौदा बेचता, आपने यह खटराग बढ़ा दिया ।" "बाइर आरुर बोलो->भश्या ने तो नहीं डाटा, अब तुब आकर डांटो ।","अब वह पहले की-सी दशा नहीं है कि कोई चिथड़े लपेटे घूम रहा है, किसी को गहने की धुन सवार है ।",बाहर आकर बोली— भइया ने तो नहीं डाँटा अब तुम आकर डाँटों । इधर कई दिन की निरन्तर भक्ति और उपासना के कारण चौधरी का मन शुद्ध और पवित्र हो गया था ।,घर की मिट्टी खोद कर थोड़े ही कोई ले जायगा ।,इधर कई दिन की निरंतर भक्ति और उपासना के कारण चौधरी का मन शुद्ध और पवित्र हो गया था । "पहला ही ससाचार था-- लन्दुन में भारतीय देश-मक्तों का जमाव, ऑनरेबुल मिस्टर मेहता की वक्‍्तृता पर अ्रसस्तोष, मिस्टर बालकृष्ण मेहता का विरोध और आत्महत्या गत शनिवार को वैक्सयन हाल में भारतीय युवकों और नेताओं की एक बडी सभा हुई ।",राजेश्वरी की सहिष्णुतापूर्ण बातों से वे और जल उरठे ।,"पहला समाचार था लंदन में भारतीय देशभक्तों का जमाव, ऑनरेबुल मिस्टर मेहता की वक्तृता पर असंतोष, मिस्टर बालकृष्ण मेहता का विरोध और आत्महत्या गत शनिवार को बैक्सटन हॉल में भारतीय युवकों और नेताओं की एक बड़ी सभा हुई ।" "परकारी पक्ष के पत्रों ने कलास को धूत कद्दा , जन-पक्षवालों ने नरम को शतान बनाया ।","खैर, हमें तो कोई शिकायत नहीं; हुजूर के गुलाम हैं, जो हुक्म होगा, बजा ही लायेंगे; मगर यह खेल मनहूस है ।",सरकारी पक्ष के पत्रों ने कैलास को धूर्त कहा; जन-पक्षवालों ने नईम को शैतान बताया । "आपको यह मालूम नहों कि सभी मनुष्य कवि नहीं होते, और न एक-से भावुक ।","सतिया की आपने जो अमूल्य सेवा की है , उसका पुरस्कार तो कोई क्या दे सकता है , लेकिन जनता के ह्रदय में आपसे जो श्रद्धा है , उसे तो वह किसी-न-किसी रूप में प्रकट ही करेगी ।","आपको यह मालूम नहीं कि सभी मनुष्य कवि नहीं होते, और न एक-से भावुक ।" बैचारे जाड़ों भर एमलशन और सनाटोजन और न जाने कौन-कौन से रस खाते रहते हैं ; पर यह रोग गला नहीं छोड़ता ।,उन लोगों को कोई तकलीफ तो नहीं है ?,"बेचारे जाड़ों-भर एमलशन और सनाटोजन और न जाने कौन-कौन से रस खाते रहते हैं, पर यह रोग गला नहीं छोड़ता ।" कृष्ण--तो क्या हम झापसे नीच हैं ?,आप के यहाँ मर्यादा खोने नहीं आए हैं ।,कृष्ण -- तो क्या हम आपसे नीच हैं ? "जो आदमी इतना स्वार्यी, इतना दम्भी, इतना नोच है, उसके साथ मेरा निर्वाह न होगा ।",' माता ने तिरस्कार की आँखों से देखा ।,"जो आदमी इतना स्वार्थी , इतना दम्भी , इतना नीच है , उसके साथ मेरा निर्वाह न होगा ।" "कोई जान-पहचान का आदमी, कोई मित्र ऐसा न था, जिसके घर जाकर उसने तलाश न की हो ।",वह प्रात:काल से दो घड़ी रात तक शहर का चक्कर लगाया करता ।,"कोई जान-पहचान का आदमी, कोई मित्र ऐसा न था, जिसके घर जाकर उसने तलाश न की हो ।" न जाने तुम्हें कप्ती बुद्धि आयेगी भो या चढ्ों ।,"जितने मिलने वाले, मित्र, स्नेही, संबंधी थे, सभी के घर गये, पर सब जगह से साफ जवाब पाया ।",न जाने तुम्हें कभी बुद्धि आयेगी भी या नहीं । "मयर वहाँ तुम न जाओगे , क्योंकि चदाँ जाते दुम्दारों छातो दहलतो है ।",उसकी लज्जा न जाने कहाँ गायब हो गयी ।,मगर वहाँ तुम न जाओगे; क्योंकि वहाँ जाते तुम्हारी छाती दहलती है । नाम था बिन्नी ।,कुछ दिन आपकी सेवा में रहना चाहता हूँ ।,नाम था बिन्नी । में तो सबसे पहले बांवा को कुटी बनवा दूँगा ।,"जब होश आया , तो वहाँ सन्नाटा था ।",मैं तो सबसे पहले बाबा की कुटी बनवा दूंगा । विषय-वासना का चस्का पड़ जाने के बाद अब उसकी प्रेम-कल्पना निराधार नहीं रह सकती थी ।,इधर से निराश हो कर सदन का लालसा पूर्ण हृदय फिर सुमन की ओर लपका ।,विषयवासना का चस्का पड़ जाने के बाद अब उसकी प्रेम कल्पना निराधार नहीं रह सकती थी । हाथ ठिदधुर जाते घे ।,उसे चिंचोड़ रहा था ।,हाथ ठिठुरे जाते थे । बड़ी बहू ने श्रद्धा-भाव से कहा--कन्या भाग्यवान दो तो दरिद्र घर में भी सुखी रद सकती है ।,"तुम तो थोड़ा-बहुत मार लेते हो, लेकिन सबको तो नहीं मिलता ।",बड़ी बहू ने श्रद्धा भाव ने कहा- 'कन्या भाग्यवान हो तो दरिद्र घर में भी सुखी रह सकती है । "कदालित्‌ कुछु समय हो चृदल गया, या किसो ग्रह का फेर है ।","चिन्तामणि ने यह समारोह देखा, तो प्रसन्न हो कर बोले, 'क्यों भाई, अकेले ही अकेले ! मालूम होता है, आज कहीं गहरा हाथ मारा है ।","कदाचित् कुछ समय ही बदल गया, या किसी ग्रह का फेर है ।" इस दैवी विधान ने उसे मजबूर कर दिया ।,खिड़की पर ज़रा खड़ी थी ।,इस दैवी विधान ने उसे मजबूर कर दिया । उस हिसा के उन्माद मे भी अपने नेता को जीता-जागता देखकर उनके हर्ष की सीमा न रही ।,युवक भूमि पर गिर पड़ा और हाथ-पाँव फेंकने लगा ।,उस हिंसा के उन्माद में भी अपने नेता को जीता-जागता देखकर उनके हर्ष की सीमा न रही । मेरी यह अवोगति ॥ अपने७ अपपान को याद रह रहकर उनके चित्त झो विहल कर रहो थी ।,कोई संदेह नहीं कि यह सब हमें मिलाकर असहयोगियों को दबाना चाहते हैं ।,मेरी यह अधोगति ! अपने अपमान की याद रह-रहकर उनके चित्त को विह्वल कर रही थी । अपनी गुज़र-भर को आप कमा छेगी,मैं गहनों को भी दया की भिक्षा समझती हूँ,अपनी गुजर भर को आप कमा लूँगी तुम्हारे सिवा वहाँ कोई पंडित था ?,"अगर साल में दो-चार हज़ार दान न कर दे, तो पाप का धन पचे कैसे! धर्म-कर्म वाले ब्राह्मण तो उसके द्वार पर झांकते भी नहीं ।",तुम्हारे सिवा वहाँ कोई पंडित था ? "अ्रगर भेरी बुद्धि काम करती, तो तुम्हारी शररा क्‍यों आता ?",सुभद्रा -- तो यही फिक्र आज क्यों नहीं कर डालते ।,"शर्मा -- भाई, चिढ़ाओ मत, अगर मेरी बुद्धि काम करती तो तुम्हारी शरण क्यों आता ?" "बेशक ! अपने फन का उस्ताद है, छुटा हुआ शुर्गा ।","मित्रों ने बहुत गला दबाया, तो सिनेमा देखने चले गये; लेकिन क्या देखा और क्या सुना, इसकी खबर नहीं ।","बेशक ! अपने फन का उस्ताद है, छॅटा हुआ गुर्गा ।" हवा और प्रकाश का कहीं रास्ता नहीं,विद्याभ्यास में उसे अब रुचि हो गई थी,हवा और प्रकाश का कहीं रास्ता नहीं "ड्रामा का रिहसल शुरू हो जायगा, तो आपको थोड़े दिनों कंपनी के साथ रहने का कष्ट उठाना पड़ेगा |",आपने उनकी नाक की तरफ शायद खयाल नहीं किया ।,"ड्रामा का रिर्हसल शुरू हो जायगा, तो आपको थोड़े दिनों कंपनी के साथ रहने का कष्ट उठाना पड़ेगा ।" उठते द्वी उठते सिरहाने निगाह गई ।,उस पर ह्विसकी की आधी बोतल चढ़ा गया था ।,उठते ही उठते सिरहाने निगाह गयी । साथ हो अपने स्वामी के अविकार पर उसे गये भी हो रहा था ।,हृदय इस वेग से धड़कता था मानो वह छाती से बाहर निकल पड़ेगा,साथ ही अपने स्वामी के अधिकार पर उसे गर्व भी हो रहा था । कुसुम के सिवा दूसरा उनका करन बैठा हआ है ।,इस पामर की दृष्टि में कुसुम का कोई मूल्य ही नहीं ।,कुसुम के सिवा दूसरा उनका कौन बैठा हुआ है ? समाज उसझी जिंदगी को तबाह करने का कोई छूक नहीं रखता,वह अपने हक के लिए मर जाना इससे कहीं अच्छा समझता है कि उसे छोड़कर कायरों की जिंदगी काटे,समाज उसकी जिंदगी को तबाह करने का कोई हक नहीं रखता "अगर तुमने साहब या मेम साहब से मेरी कुछ शिकायत को, तो क़सम खाकर कहता हूँ, घर खुदवाकर फेंक दूँगा ' देवी० --- जिस दिन मेरा घर खुदेगा, उस दिन यह पगड़ी और चपरास भी न रहेगी, हुजूर ।","अकड़कर बोला, 'आप जब किसी की नहीं सुनते, बात कहकर मुकर जाते हैं, तो दूसरे भी अपने-सी करेंगे ही ।","अगर तुमने साहब या मेम साहब से मेरी कुछ शिकायत की, तो कसम खाकर कहता हूँ, कि घर खुदवाकर फेंक दूँगा!' देवीदीन-'जिस दिन मेरा घर खुदेगा, उस दिन यह पगड़ी और चपरास भी न रहेगी, हुजूर ।" "ऐक्टरो ने यदि पाठ अच्छा न किया, तो आपके सारे परिश्रम पर पानी पड़ जायगा |",वह हिन्दी भाषा के शब्दों का शुद्ध उच्चारण नहीं कर सकते ।,"ऐक्टरों ने यदि पार्ट अच्छा न किया, तो आपके सारे परिश्रम पर पानी पड़ जायगा ।" "३ ) प्रात-काल ग्रेमा सोर उठी, तो उसके मन में एक विचित्र साहस का उदय दो गया था ।",कहीं लड़कियों का आदर नहीं ; लेकिन करना तो बिरादरी में ही पड़ेगा ।,"३ प्रात:काल प्रेमा सोकर उठी , तो उसके मन में एक विचित्र साहस का उदय हो गया था ।" सेठजी फूट-फूटकर रोने लगे |,दोस्तों से बेमुरौवती तो नहीं की जाती ।,' सेठजी फूट-फूटकर रोने लगे । "कितवा अपूर्व हइय था, जिघझ्ो सामूद्दिड क्रियाएं, विस्तार और अवन्तता हृदय को श्रद्धा, गंदे और आत्मावन्द से भर देतो थी, मानों आतृत् का एक सूप इन समस्त आत्मार्थों को एक छड़ो में पिरोये हुए है ।","कई बार यही क्रिया होती है, जैसे बिजली की लाखों बत्तियाँ एक साथ प्रदीप्त हों और एक साथ बुझ जायँ, और यही क्रम चलता रहा ।","कितना अपूर्व दृश्य था, जिसकी सामूहिक क्रियाएँ, विस्तार और अनन्तता हृदय को श्रद्धा, गर्व और आत्मानंद से भर देती थीं, मानों भ्रातृत्व का एक सूत्र इन समस्त आत्माओं को एक लड़ी में पिरोये हुए है ।" "बह-मेरे श्राणेश्वर, मेरे पति- देव थे ।",इन दोनों प्राणियों के हृदय में कितनी ही बातें आ रही होंगी दोनों क्या-क्या कहना और क्या-क्या सुनना चाहते होंगे इस विचार से मैं उठ खड़ी हुई और बोली-बहन अब मैं जाती हूँ शाम को फिर आऊँगी ।,यह मेरे प्राणेश्वर मेरे पतिदेव थे । /लिकिन पुरुष में धोढ़ी-सी पशुता होती टै जिसे वह इरादा करके भी दृदा नहीं,इन दिनों उन्हें कितनी ही बार अपनी माता की याद आई थीं,लेकिन पुरुष में थोड़ी-सी पशुता होती है जिसे वह इरादा करके भी हटा नहीं सकता घर छा खारा बाम बच्चे को सेमालरा रसोई पकाना जम्रोी चौज़ बाज़ार में मंगादा-- बंद सइ उसके मस्थे है,सुखदा जज साहब की पत्नी की सिफारिश से बालिका-विद्यालय में ५०) पर नौकर हो गई है,घर का सारा काम बच्चे को संभालना रसोई पकाना जरूरी चीज बाजार से मंगाना-यह सब उसके मत्थे है यों कलम घिसना दूसरी बात है ।,एक-एक पत्थर पचास-पचास लाख का ।,यों कलम घिसना दूसरी बात है । "हमें घुइकी, हाँट-डपट, सख्ती सब स्वीकार हैं 5 केवल हमारा पेट भरना चाहिए ।","वह कहा करते थे कि यहां हमारा पेट नहीं भरता, हम उनकी भलमनसी को लेकर क्या करें-चाटें ?","हमें घुड़की, डांट-डपट, सख्ती सब स्वीकार है, केवल हमारा पेट भरना चाहिए ।" अमरक्ान्त घढ़ा लिये कुएँ पर पहुँच गया,थक गए हो थोड़ा-सा दूध रखा है पी लो,अमरकान्त घड़ा लिए कुएँ पर पहुँच गया "चोलें--नहीं सेठजी, मुझे अवकाश नहीं है ।",यह कह कर पंडित जी ने सेठ जी को धर्म के दसों लक्षण बतलाये और श्लोक की ऐसी अच्छी व्याख्या की कि वह मुग्ध हो गये ।,"बोले , नहीं सेठ जी, मुझे अवकाश नहीं है ।" देवकी घर में से पानी लायी ।,मैं प्रेम का भूखा हूँ ।,देवकी घर में से पानी लायी । नेता ने जल्दी-जनदी पान फे बोढ़े लगाये और भाभी को खिलाने लगी तो उसझे दवे हए आँसू फच्ञारे छी तरह उयल पढ़े,वह एक बार निष्ठुर बनकर चलते-चलते नैना के मोह-बंधन को तोड़ देना चाहती थी पैने शब्दों से हृदय के चारों ओर खाई खोद देना चाहती थी मोह और शोक और वियोग-व्यथा के आक्रमणों से उसकी रक्षा करने के लिए पर नैना की छलछलाती हुई आँखें वह काँपते हुए होंठ वह विनय-दीन मुखश्री उसे नि:शस्त्र किए देती थी,नैना ने जल्दी-जल्दी पान के बीड़े लगाए और भाभी को खिलाने लगी तो उसके दबे हुए आँसू गव्वारे की तरह उबल पड़े सोफिया इतने ही में संतुष्ट थी ।,सोफिया चिराग जलाए उनकी बाट देखा करती ।,सोफिया इतने ही में संतुष्ट थी । कहीं वे उसे एक सुन्दर सैरगाड़ी में बेठाजर स्वय खींच रहे हैँ,मुहल्ले-भर के बच्चे उनके प्रेम-वारि से अभिसिंचित होते रहते थे,कहीं वे उसे एक सुन्दर सैरगाड़ी में बेठाकर स्वयं खींच रहे हैं "में कद्दता हूँ, अगर आप संसार में जोवित रहना चाइते हैं तो इस प्रथा का तुरन्त अन्त कीजिए ।",माताएँ अपने दुलारों को अपने हाथ से शस्त्रो से सजाकर रणक्षेत्र में भेजती थीं ।,मैं कहता हूँ; अगर आप संसार में जीवित रहना चाहते हैं तो इस प्रथा का तुरन्त अन्त कीजिए । सब आज' ही तो खर्च न हो जायँगे |,"रात को वह अपनी कोठरी में सोने गया, तो उसे ऐसा प्रतीत हुआ कि बुढ़िया गोमती खड़ी मुस्करा रही है ।",सब आज ही तो खर्च न हो जाएेंगे । "में चाहता हूँ, तुम इसरो महल में रहो कि में तुमसे सच्ची ज़िन्दगी का सबक सोखूँ ।",सहसा जीने पर उसकी इन्द्रनाथ से मुठभेड़ हो गयी ।,"मै चाहता हूँ , तुम इसी महल में रहो ताकि मैं तुमसे सच्ची ज़िन्दगी का सबक सीखूँ ।" "जो अपने घर में नित्य कटु शब्द सुनने का आदी हो, उसके लिए उतनी मधुर सहानुभूति काफी से ज्यादा थी ।",वह जानते थे कि इसमें आत्मसम्मान कूट-कूटकर भरा हुआ है ।,"जो अपने घर में नित्य कटु शब्द सुनने का आदी हो, उसके लिए उतनी मधुर सहानुभूति काफी से ज्यादा थी ।" "जब तक बह पराश्रित था, दरिद्र था, उसकी विलासेन्द्रियाँ मानों मूच्छित हो रही थीं ।","भर लोग शिकार खेलते, रात को ग्रामोफोन सुनते, ताश खेलते और बज़रों पर नदियों की सैर करते ।","जब तक वह पराश्रित था, दरिद्र था, उसकी विलासेंद्रियां मानो मूच्र्छित हो रही थीं ।" "वह उसकी थकन मिटा देना चाहती थी, जिसमें देवीदीन प्रसन्न होकर आप ही आप सारा वृत्तान्त कह चले ।","' 'धो लूंगा, जल्दी क्या है ।","वह उसकी थकान मिटा देना चाहती थी, जिससे देवीदीन प्रसन्न होकर आप-ही-आप सारा वृत्तांत कह चले ।" मुझे ज्ञात हो रहा है कि मैं प्राणियों का बहुत उपकार कर सकता हूँ।,यह भेष धारण करके अब लोगों को आसानी से ठग सकता हूँ ।,मुझे ज्ञान हो रहा है कि मैं प्राणियों का बहुत उपकार कर सकता हूँ । सलीम चुप दो गया,अमरकान्त के दिल में ऐसी बात हर्गिज नहीं पैदा हो सकती,सलीम चुप हो गया "सुगन्ध में दितनी उत्तेजक शक्ति 8, छोन नहीं जानता ।",वह सीधे बाजार गये और ५) की मिठाई ली ।,"सुगंध में इतनी उत्तेजित शक्ति है, कौन नहीं जानता ।" अवश्य ही लोग खा-पीकर चले गये ।,उन्हें मालूम हुआ कि मुझे गाते देर हो गई ।,अवश्य ही लोग खा-पीकर चले गए । अमर ने लज्जित होकर कहा--हाँ यद गुरूतो मुझसे हुईं पठानिव मुआफ़ करो,अमर ने जाकर देखा तो बुढ़िया पठानिन लठिया के सहारे खड़ी है,अमर ने लज्जित होकर कहा-हाँ यह गलती मुझसे हुई पठानिन मुआफ करो ", अलग्योमा भोला महतो ने पहली स्त्री के मर जाने के बाद दूसरी सगाई को, तो उसके लड़के रू के लिए बुरे दिन आ गये ।",गुल्ली उसके हाथ से निकलकर टन से डण्डे से आकर लगती थी ।,भोला महतो ने पहली स्त्री के मर जाने बाद दूसरी सगाई की तो उसके लड़के रग्घू के लिये बुरे दिन आ गये । पुदष कतराकर इधर-उधर से निकल जाते और बच्चे चीख सारकर भागते |,"यदि वह कभी गाँव में निकल आती, तो स्त्रियाँ घरों के किवाड़ बन्द कर लेतीं ।",पुरुष कतराकर इधर-उधर से निकल जाते और बच्चे चीख मारकर भागते । रामेश्वरी को आ्राये अभी दो ही तीन महीने हुए थे |,"अगर तुम किसी बात में मेरी सलाह पूछोगी, तो दे दूँगा; वरना मुँह न खोलूँगा ।",रामेश्वरी को आये अभी दो ही तीन महीने हुए थे । ज्वाला लाठी के कुन्दे पर पहुँची और तुम्हारे जीवन का अन्त है ।,चार फरलाँग की दौड़ है ।,ज्वाला लाठी के कुंदे पर पहुँची और तुम्हारे जीवन का अंत है । "इस युवक को, जो प्रेम के विषय में इतना सरल था, वह प्रसन्न करके हमेशा के लिए _ ४ गुलाम बत्ता सकती थी ।","उसकी बात सुनकर उसे ज़रा भी ईर्ष्या न हुई,बल्कि उसके मन में एक स्वार्थमय सहानुभूति उत्पन्न हुई ।","इस युवक को, जो प्रेम के विषय में इतना सरल था, वह प्रसन्न करके हमेशा के लिए अपना गुलाम बना सकती थी ।" "जिस दिन से सुमन गयी थीं, शर्माजी कुछ चिन्तातुर रहा करते थे।","एक दिन उस ने शर्माजी से कहा--चाचा, मुझे, एक अच्छा सा घोड़ा ले दीजिए ।",जिस दिन से सुमन गई थी शर्माजी कुछ चिंतातुर रहा करते थे । भाई -साहब को इस कुप्रथा से रोकना चाहिए ।,"भाई साहब बुरा मानेंगे, ऐसी अवस्था में मेरा क्या कर्तव्य है ?",भाई साहब को उस कुप्रथा से रोकना चाहिए । धम्म-पत्नो से -सारा सम्राचार कद्ठा ।,पण्डितजी को रुपये मिल गये और वह खुश-खुश घर आये ।,धर्म पत्नी से सारा समाचार कहा । और वात भी यही थी ।,"गाँव में कोई बीमार पड़े, वह रोगी की सेवा-सुश्रुषा के लिए हाज़िर है ।",और बात भी यही थी । "सुम्े चाहे कोई पिशाचिनो कहे, चाहे कुल्टा, पर मुझे तो यह कहने में डेशम्रात्र भी सकोच नहीं है कि इनको बीमारी से सुझे एक प्रद्मार का ईष्पसिय आनन्द था रहा है ।","वही मैं हूँ कि आज तीन दिन से उन्हें अपने बगल के कमरे में पड़े कराहते सुनती हूँ; और एक बार भी उन्हें देखने न गयी, आँख में आँसू आने का जिक्र ही क्या ।","मुझे चाहे कोई पिशाचिनी कहे, चाहे कुलटा, पर मुझे तो यह कहने में लेशमात्र भी संकोच नहीं है कि इनकी बीमारी से मुझे एक प्रकार का ईर्ष्या मय आनन्द आ रहा है ।" कौन जाने मुझे धोखा ही हुआ हो ।,कहीं मुझे धोखा तो नहीं हुआ?,कौन जाने मुझे धोखा ही हुआ हो। "द सुमन--यह रामकहानी फिर कहूँगी, इस समय तुम मेरे ऊपर इतनी कृपा करो कि मेरे लिए कहीं अलग एक छोटा-सा मकान ठीक करा दो।",भोली ने पूछा -- आज यह सन्दूकची लिये इधर कहाँ से आ रही थी ?,"सुमन -- यह रामकहानी फिर कहूँगी, इस समय तुम मेरे ऊपर इतनी कृपा करो कि मेरे लिए कहीं अलग एक छोटा-सा मकान ठीक करा दो ।" में उस पर क्रोध प्रकट करना चाहता था और निकल पड़े आँसू ।,मैं अपने शोक को प्रदर्शित करके उसका करुणापात्र बनना नहीं चाहता था ।,मैं उस पर क्रोध प्रकट करना चाहता था और निकल पड़े आँसू । "ईश्वर करे, अभी रानी न उठी हों ।","परदा उठाकर द्वार खोला, तो दिन निकल आया था ।","ईश्वर करे, अभी रानी न उठी हों ।" "भोजन करना, साफ़ वस्त्र पहनना और मन को कुछ पढ़कर बहलाना भी उसे अनुचित जान पड़ता था ।","जीवन का निर्वाह कैसे होगा, नौकरों-चाकरों में किन-किन को जवाब देना होगा, घर का कौन-कौनसा ख़र्च कम करना होगा, इन प्रश्नों के विषय में दोनों में कोई बात न होती ।","भोजन करना, साफ वस्त्र पहनना और मन को कुछ पढ़कर बहलाना भी उसे अनुचित जान पड़ता था ।" "न पच्रग पर सोयी, न केशों को सैंवारा और न नेत्रों में सुर्मा लगाया ।","कई लोहे के नोकदार त्रिशूल भी गड़े थे, जो मानो इन मन्दगति हाथियों के लिए अंकुश का काम दे रहे थे ।","न पलंग पर सोयी, न केशो को सँवारा और न नेत्रों में सुर्मा लगाया ।" यह बात है ।,दयानाथ की सज्जनता ने उन्हें वशीभूत कर लिया ।,यह बात है । आज समस्त संसार जनवाद के आतंक से पीड़ित है ।,डॉक्टर गांगुली-मेरे विचार में भारतीय सरकार की सेवा में डेपुटेशन जाना चाहिए ।,आज समस्त संसार जनवाद के आतंक से पीड़ित है । पह पढ़ा-पड़ा देखता रहा ।,"मालूम नहीं, वह कितनी देर तक सोता रहा; पर किसी की आहट पाकर चौंका तो क्या देखता है कि एक बूढ़ा आदमी बैठा नमाज पढ़ रहा है ।",वह पड़ा-पड़ा देखता रहा । दयाकृष्ण कुछ ऐसे असमजस में पढ़ा हुआ था कि उसके मुंह से एक भी हब्द न निकला ।,"तो ऐसी बहुत-सी औरतें देखी हैं, जो गहने पहनकर भद्दी दीखने लगती हैं ।",दयाकृष्ण कुछ ऐसे असमंजस में पड़ा हुआ था कि उसके मुँह से एक भी शब्द न निकला । जब खेती द्वो नं बचेगी तो रहकर क्‍या करेंगे ।,"न नादिर के समझाने का असर अमीरों पर होता था, न लैला के समझाने का गरीबों पर ।",जब खेती ही न बचेगी तो रहकर क्या करेंगे ? मन में ऐसी ज्वाला उठी कि अभी इसका मुँदद नौच दे,धीरे-धीरे मुझ पर रहस्य खुलने लगा,मन में ऐसी ज्वाला उठी कि अभी इसका मुँह नोच लूँ यहाँ से-जब वह घर लौटे तो देखा--दूकान पर दो गोरे और एक मेम बेंठे हुए हैं और अम्ररकान्त उनसे वार्तें कर रहा है,बोले-मैंने तो बालक का नाम सोच लिया है,यहाँ से जब वह घर लौटे तो देखा-दूकान पर दो गोरे और एक मेम बैठे हुए हैं और अमरकान्त उनसे बातें कर रहा है रामे०--बुलाया था |,प्रकृति की उपासना ने ही यूरोप के बड़े-बड़े कवियों को आसमान पर पहुँचा दिया है ।,' रामे.-' बुलाया था । फिर छोग जी भरकर रोयें और पोर्ट और कोसें,वेश्यागामियों और व्यभिचारियों के आगे लोग माथा टेकते हैं लेकिन शु हृदय और निष्कपट भाव से प्रेम करना निं,फिर लोग जी भरकर रोयें और पीटें और कोसें इसी विचार में श्राज उसे देर हो गईं थी ।,वह टहलता हुआ गंगा तट की ओर चला ।,इसी विचार से आज उसे देर हो गई थी । "ज्यों-ज्यों भामा मना करती थी, सदन जिद पकड़ता था।","भामा -- एक बार कह दिया, मुझे दिक मत करो, वहाँ जाने को मैं न कहूँगी ।","ज्यों-ज्यों भामा मना करती थी, सदन जिद पकड़ता था ।" "परिडत्तजी जब किसी तरह ठहरने पर राजी न हुए, तो सेठजी ने उदाछ दोकर कहा--फिर हम आपकी क्‍या सेवा करें ?","बोले , नहीं सेठ जी, मुझे अवकाश नहीं है ।","पंडित जी जब किसी तरह ठहरने पर राजी न हुए, तो सेठ जी ने उदास होकर कहा , फिर हम आपकी क्या सेवा करें ?" हाथ-पाँव अकड़ रहे थे ।,हवा तीर से समान उसकी हड़ियों में चुभी जाती थी ।,हाथ-पाँव अकड़ रहे थे । बलवान मनुष्य प्रायः दयाल होता है ।,"बादशाह नादिर था, पर अख्तियार लैला के हाथों में था ।",बलवान मनुष्य प्राय: दयालु होता है । "शर्माजी--अच्छा, तो घर में जाशो भर सुमन से कहो कि के यहाँ रहने से उनको बदनामी हो रही हैं।","जीतन -- सरकार, मुझे आज ही तो मालूम हुआ है, नहीं तो जान लो भैया, में बिना कहे नहीं रहता ।","शर्माजी -- अच्छा, तो घर में जाओ ओर सुमन से कहो कि तुम्हारे यहाँ रहने से उनकी बदनामी हो रही है ।" बजानों को दद्धावों से कपड़ों के धान आ जाते हैं कहीं से बाँस कहीं से रस्पियाँ कहीं से धो ढह्ीं से लझ्हो,लोग उन्मत्ता हो-होकर सुखदा के पैरों पर गिरते हैं और तब मंदिर की तरफ दौड़ते हैं,बजाजों की दूकानों से कपड़े के थान आ जाते हैं कहीं से बाँस कहीं से रस्सियाँ कहीं से घी कहीं से लकड़ी "उनमें मे कुछ छोग हाथो में पौदल के ब्मइलु लिये हुए शिव-शिव, हर-हर, गषें-गगे, नारायघनतारायण बादि इब्द बोठते हुए चले जाते थे ।",इतर में बसी हुई रेशम की साड़ी अलग कर दी ।,उनमें से कुछ लोग हाथों में पीतल के कमंडलु लिये हुए शिव-शिव हर-हर गंगे-गंगे नारायण-नारायण आदि शब्द बोलते हुए चले जाते थे । स्कूल से आते हुए युवक सुमन के द्वार की भ्लोर टकटकी लगाते हुए चले जाते ।,उस मुहल्ले में रसिक युवकों तथा शोहदों की भी कमी न थी ।,स्कूल से आते हुए युवक सुमन के द्वार की ओर टकटकी लगाते हुए चले जाते । 'सारे शहर के लोग कह रहे हैं ।,"भोली-भाली बालिका के हृदय में कटुता, द्वेष और प्रपंच का विष बोना मेरी ईर्ष्यालु प्रकृति को भी रुचिकर न जान पड़ा ।",सारे शहर के लोग कह रहे हैं । "रोटी की खैर मनानेवाले शिक्षित युवकों मे एक श्रकार की दुविधा होती है, जो उन्हें अग्रिय सत्य कहने से रोकती है |",मेरे रहते इसकी तो आप चिन्ता न करें ।,"रोटी की खैर मनोनवाले शिक्षित युवकों में एक प्रकार की दुविधा होती है, जो उन्हें अप्रिय सत्य कहने से रोकती है ।" ( बंटवारा होते हो महतो और लक्ष्मी फो मार्नों पंशव मिल गई ।,"'लड़के से लड़की भली, जो कुलवंती होय ।",4 बँटवारा होते ही महतो और लक्ष्मी को मानों पेंशन मिल गयी । चुनार से वारात अ्रमोला चली।,३३ सदन के विवाह का दिन आ गया ।,चुनार से बारात अमोला चली । क्या इस्ती लिए कि मुरमा- कर ज़मोन पर गिर पढ़े और पेरों से कुचल दिया जाय ?,"पति – मेरा खयाल है , तुम जरा भी सहज बुद्धि से काम लो , तो तुम अम्माँ पर भी शासन कर सकती हो ।",क्या इसीलिए कि मुरझाकर जमीन पर गिर पड़े और पैरों से कुचल दिया जाय ? "वागीश्वरी निराशा,मे भी आस बाँघे बेठी हुई थी ।",पांच साल के बाद वागेश्वरी का लुट हुआ सुहाग फ़िर चेता ।,वागेश्वरी निराशा में भी आस बाँधे बैठी हुयी थी । "सारांश यह कि छॉढ़े पेसाने एर प्रीतिभोण का प्रहन्ध किया गया,,और भेज हुआ भी दिराट ।",वहाँ तक उसके फरिश्तों का भी खयाल न पहुँचेगा ।,सारांश यह कि बड़े पैमाने पर प्रीतिभोज का प्रबंध किया गया और भोज हुआ भी विराट् । वगली घूंसे मारना कोई इनसे सीख ले ।,वललाह इनको सूझती खूब है ?,बगली घूंसे मारना कोई इनसे सीख ले । मिस खुदशेद ने शरारत को--सूरत तो उनकी छाख-दो-लाख में एक है. ।,खुरशेद- वह इस वक्त तुमसे अपना अपराध क्षमा कराने आये हैं ।,मिस खुरशेद ने शरारत की- सूरत तो उनकी लाख-दो-लाख में एक है । एक बहू--बुढ़िया यद्दी चाहती हैं कि यह सब जन्म-भर लोंडो बनी रहें ।,"मेरे भी तो यही खाने-पीने, पहनने-ओढ़ने के दिन हैं ।",एक बहू- बुढ़िया यही चाहती है कि यह सब जन्म-भर लौंडी बनी रहें । ध्सो के पप्त कुछ नहों है पर मार-गाली के भय से घेचारे घर को चंजे वेच-बेचऋर लगान चुकते हैँ,चलते-चलते उसने पूछा-अगर श्रीमान् कारिंदों को हुक्म दे दें कि इस वक्त असामियों को दिक न करें तो बड़ी दया हो,किसी के पास कुछ नहीं है पर मार-गाली के भय से बेचारे घर की चीजें बेच-बेचकर लगान चुकाते हैं दोहरे बदन के ऊँचे दमी थे गठा हुआ शरीर तेजस्वी चेहरा ऊँचा माथा गोरा रंग शॉप पर शबंती रेशमी चादर खूब खुल रही थी,रात को धनुष-यज्ञ होगा और मेहमानों की दावत होगी,दोहरे बदन के ऊँचे आदमी थे गठा हुआ शरीर तेजस्वी चेहरा ऊँचा माथा गोरा रंग जिस पर शर्बती रेशमी चादर खूब खिल रही थी मैं अ्रभी चली जाती हैँ ।,कोई किसी के घर में जबरदस्ती थोड़े ही रहता है ।,मैं अभी चली जाती हूँ । "संसार में रहे, पर संसार का होकर न रहे ।",पहली ही मुलाकात में सारी बातें तय कर लेना चाहते हो ?,"संसार में रहे, पर संसार का होकर न रहे ।" "बलभद्र अ्रभी चाहे चुप रह जाएँ, लेकिन इसकी कसर कभी-न-कभी निकालेंगे अवश्य ।",अन्त में आश्रम का सारा भार हमीं लोगों पर आ पड़ेगा ।,बलभद्र अभी चाहे चुप रह जाएँ लेकिन इसकी कसर कभी न कभी निकालेंगे अवश्य । "वेचन--देखना क्‍या है, छोड़ देना कोई बड़ी वात नहीं ।","बस चोट लग जाय का चाही, नशा खाये बिना कोऊ मर नाहीं जात है ।","बेचन- देखना क्या है, छोड़ देना कोई बड़ी बात नहीं ।" "बैजनाथ समझ: रहे थे कि यह मुझे; किसी दूसरे पेंच में ला रहे हैं, लेकिन उन्होंने अभी तक उसका मर्म न समझा था ।",यदि कोई मांस न खाए तो बकरे की गरदन पर छुरी क्यों चलें ?,"बैजनाथ समझ रहे थे कि यह मुझे किसी दूसरे पेंच में ला रहे है, लेकिन उन्होंने अभी तक उसका मर्म न समझा था ।" "जो कुछ करते हैं, मजबूर होकर ।",जुआ नहीं खेलाते ?,"जो कुछ करते हैं, मजबूर होकर ।" "और कुछ बोलने से बात बढ़ जाने का भय था ; पर रमा को उसकी दृष्टि से ऐसा भासित हुआ, मानों उसे चोरी का रहस्य मालूम हैं और वह केवल संकोच के कारण उसे खोलकर नहीं कह रही है ।","रमा ने लज्जित होकर कहा--'कालिख लगने की तो कोई बात न थी, सभी जानते हैं कि चोरी हो गई है, और इस ज़माने में दो-चार हज़ार के गहने बनवा लेना, मुँह का कौर नहीं है ।","और कुछ बोलने से बात बढ़ जाने का भय था, पर रमा को उसकी दृष्टि से ऐसा भासित हुआ, मानो उसे चोरी का रहस्य मालूम है और वह केवल संकोच के कारण उसे खोलकर नहीं कह रही है ।" एक पुराने शायर ने अपने माशूक के एक काले तिल पर समरकन्द ओर बोखारा के सूबे कुरबान कर दिये थे,कुछ उनकी मदद से और कुछ अन्य मित्रों की मदद से एक जूते की दुकान खोल ली,एक पुराने शायर ने अपने माशूक के एक काले तिल पर समरकंद और बोखारा के सूबे कुरबान कर दिये थे डालियों: आर रिशवतों/ तक तो खैर ग्रानीमत है हम सिजदे करने को भी तैयार रहते हैं,उन्हें प्रसन्न करने के लिए हम क्या नहीं करते; मगर वह पचड़ा सुनाने लगूँ तो शायद तुम्हें विश्वास न आये,डालियों और रिश्वतों तक तो खैर गनीमत है हम सिजदे करने को भी तैयार रहते हैं "मालूम होता है प्रेम इन्हें छू नहीं गया या सममती हैं यह घर से इतना चिमटा हुआ है; कि इसे चाहे जितना कोसूँ , टलने का नाम न लेगा।","दिल की बात मुँह से निकल ही आती है, चाहे कोई कितना ही छिपाये।","मालूम होता है, प्रेम इन्हें छू नहीं गया या समझती हैं, यह घर से इतना चिमटा हुआ है कि इसे चाहे जितना कोसूँ, टलने का नाम न लेगा।" डॉक्टर--यह क्यों नहीं कहती कि एक मुरदे को जिला गया ।,उन्हीं पूड़ियों के लिए इतनी दुर्गति करने पर भी उनका पत्थर का कलेजा न पसीजा ।,डॉक्टर यह क्यों नहीं कहती कि एक मुरदे को जिला गया । "सोचा, ज्याद कर दूँ, ठोक द्वो जायगा ।",' उमानाथ बोले- 'मुझे अपना औषधालय खोलने के लिए कम-से-कम पाँच हजार की जरूरत है ।,"सोचा, ब्याह कर दूँ, ठीक हो जायेगा ।" आज तीस वर्ष का साथ छूट गया ।,"कोई उनसे पूछे, हिलोर लय होते समय क्या चमक उठती है ?",आज तीस वर्ष का साथ छूट गया । ः तुर्चारी इच्छा हो घास ही खाओ हमसे तो घांस न खाई जायगी,कब तक पुआल में घुस कर रात काटेंगे और पुआल में घुस भी लें तो पुआल खा कर रहा तो न जायगा,तुम्हारी इच्छा हो घास ही खाओ हमसे तो घास न खाई जायगी "वह अपना विलासमय जोवन, जेसे रुदव करता हुआ उनकी आँखों के सामने आ जाता और उनके अन्त करण से वेदना मे डूबी हुईं ध्वति निकलतौ--ईश्वर, मुझ पर दया करो ।","इस पन्द्रह वर्ष के कठिन प्रायश्चित्त में उनकी सन्तप्त आत्मा को अगर कहीं आश्रय मिला था, तो वह अशरण-शरण भगवान् के चरण थे ।","वह अपना विलासमय जीवन, जैसे रुदन करता हुआ उनकी आँखों के सामने आ जाता और उनके अन्त:करण से वेदना में डूबी हुई ध्वनि निकलती ईश्वर ! मुझ पर दया करो ।" एक ज्लछऐ में दोनों एक दी मंच से बोले,इतना बड़ा इलाका है महीनों घूमने में लग जाएंगे,एक जलसे में दोनों एक ही मंच से बोले "जिन महिलाओं के साथ सुमन उठती-बैठती थी, वे अपने पतियों को इन्द्रियसुख का यन्त्र समझती थीं ।","ऐसा दशा में यदि हमारा गार्हस्थ्य जीवन आनन्दमय न हो, तो कोई आश्चर्य नहीं ।","जिन महिलाओं के साथ सुमन उठती-बेठती थी, वे अपने पतियों को इन्द्रियसुख का यन्त्र समझती थीं ।" तभी तो भाज सारा संसार उनके नाम के आगे पर शुकाता है,काकी ने कहा था-यह सब ठीक है मुन्नी पर तेरा जादू उन पर चल गया है यह मैं देख रही हूँ,तभी तो आज सारा संसार उनके नाम के आगे सिर झुकाता है अब चारों ओर से ठस्तकों सगाई के पेय्राम आमने छगे ।,इसमें कभी नागा न पड़ता ।,अब चारों ओर से उसकी सगाई के पैगाम आने लगे । "सुमन ने उसके तेवर देखे, तो समझ गई कि आग भड़का ही चाहती है; पर वह उसके लिए तैयार बैठी हुईं थी |",उसने भोली को कुछ जवाब न दिया ।,"सुमन ने उसके तेवर देखे,तो समझ गई कि आग भड़का ही चाहती है; पर वह उसके लिए तेयार बैठी हुई थी ।" अबुलवफा ने फरमाया--मगर अब खुदा के फजल से हमको भी अपने नफे-नुकसान का एहसान होने लगा |,मैं तो इनकी रेशादवानियों से इतना बदजन हो गया हूँ कि अगर इनकी नेकनीयती पर ईमान लाने में नजात भी होती तो न लाऊँ ।,अबुलवफा ने फरमाया -- मगर अब खुदा के फजल से हमको भी अपने नफे-नुकसान का एहसास होने लगा । "उसने लीला का यहाँ न देखा होता, तो पहचान भी न सक्तत्ता ।","लीला में रूप है , लावण्य है , सुकुमारता है , इन बातों की ओर उसका ध्यान न था ।","उसने लीला को यहाँ न देखा होता , तो पहचान भी न सकता ।" मैं अपने रानी होने का अभिमान तो उससे कर ही नहीं सकती ।,अपने सामर्थ्य का ज्ञान हमें शीलवान बना देता है ।,मैं अपने रानी होने का अभिमान तो उससे कर ही नहीं सकती । छुम्हारे भाइयों के झनाय बालक क्षुवा से बावले होकर कैसे नाच रहे हैं ।,तुम्हारा पड़ोसी दरिद्र किसान जमींदार के जूते खाकर कैसा नाच रहा है ।,तुम्हारे भाइयों के अनाथ बालक क्षुधा से बावले होकर कैसे नाच रहे है । "में भगर हौ बार जन्म छेकर इस पाप का प्रायथ्ित्त करूँ, तो भी भेश उद्धार न दोगा |",बहुत चीखने-चिल्लाने पर उसने आँखें खोलीं; पर जगह से हिल न सका ।,"मैं अगर सौ जन्म लेकर इस पाप का प्रायश्चित्त करूँ, तो भी मेरा उद्धार न होगा ।" मद्त्त्वाकाक्षा आँखों पर परदा डाल देती है ।,"करूणा के पास जो कुछ था, वह सब खर्च हो गया ।",महत्त्वाकांक्षा आँखों पर परदा डाल देती है । बहुधा वह बिना भोजन किये ही ग्कूच चला जाता,उसने पडोसी ओर भगिनी के धर्म का पालन भली-भाँति किया,बहुधा वह बिना भोजन किये ही स्कूल चला जाता "और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभो किताब के द्वाशियों पर चिढ़ियों, कुर्तों, बिहियों को तस्वीरें बनाया करते थे ।",उन्हें मेरी तम्बीह और निगरानी का पूरा जन्मसिद्ध अधिकार था ।,"हरदम किताब खोले बैठे रहते और शायद दिमाग को आराम देने के लिए कभी कापी पर, कभी किताब के हाशियों पर चिड़ियों, कुत्तों, बिल्लियों की तस्वीरें बनाया करते थे ।" में तुम्हारे लिए कोई मिस नौकर रख दूँगा।,"आजकल जो यह महारानी इतनी खुश दिखाई देती हैं, इसका रहस्य अब समझ में आया।",मैं तुम्हारे लिए कोई मिस नौकर रख दूँगा। रघ्सों के साथ घढ़ा घढ़ाम से पानो से गिस जौर कह क्षद तक पानी में इल्छोरे को आवाज़ें सुनाई देती रहों ।,तुम आज ही रजिस्ट्रार साहब को पत्र लिख दो ।,रस्सी के साथ घड़ा धड़ाम से पानी में गिरा और कई क्षण तक पानी में हिलकोरे की आवाजें सुनाई देती रहीं । किसी बड़े आदमी को रोते देखकर हमें उससे स्नेह हो जाता है ।,"उस पर न पुलिस का जोर था, न अदालत का ।",किसी बड़े आदमी को रोते देखकर हमें उससे स्नेह हो जाता है । वह एक कोच पर लेट गई ।,लज्जायुक्त अभिमान से मुख-कमल खिल उठा और आँखों में नशा छा गया ।,वह एक कोच पर लेट गई । ह ै मानी “मेशा मन कद्दता है कोई अनिष्ट होनेवाला है ।,"उसका हृदय बैठा जाता था, मानों नदी में डुबने जा रही हो ।","मानी- मेरा मन कहता है, कोई अनिष्ट होने वाला है ।" "गया ने पदाना शुरू किया , पर उसे अब बिलकुल अभ्यात्त न था ।","मैंने सोचा, कल बहुत-सा समय होगा, यह न जाने कितनी देर पदाए, इसलिए इसी वक्त मुआमला साफ कर लेना अच्छा होगा ।",‘ गया ने पदाना शुरू किया; पर उसे अब बिलकुल अभ्यास न था । "सोफी और विनय, दोनों ही को इस स्थान से प्रेम हो गया था ।",उन्हें लौटकर आने की बहुत कम आशा थी ।,"सोफी और विनय, दोनों ही को इस स्थान से प्रेम हो गया था ।" मटकों ताड़ी पिला दी होगी ।,"किसी ने बता दिया, ताजी ताड़ी पिए, तो बच जाए ।",मटकों ताड़ी पिला दी होगी । "देवी उसको आवाज पहचान गयी, पर उसे दुत्कारा नहीं ।",इसके सिवा उन्हें दूसरा कोई उपाय न सूझा ।,"देवी उसकी आवाज पहचान गयी, पर उसे दुत्कारा नहीं ।" "अगर इस बलिदान से मजूरों का कुछ हित हो, तो मुझे इसका ज़रा भी खेद न होगा ।","हाँ, इस बात का मुझे गर्व है कि भगवान् ने मुझे ऐसा वीर बालक दिया ।","अगर इस बलिदान से मजदूरों का कुछ हित हो, तो मुझे जरा भी खेद न होगा ।" "खेरियत यहद्द हुई कि इेख़री ने घोढ़े को तेज़ न दिया, वन्‍्ना शायद में हाथ-पाँव तुड़वाकर लौट ।",मैंने चेहरे पर शिकन न पड़ने दिया ।,"खैरियत यह हुई कि ईश्वरी ने घोड़े को तेज न किया, वरना शायद मैं हाथ-पैर तुड़वाकर लौटता ।" विदुलदास को देखकर चौंक पड़ी ।,वह सोने जा रही थी ।,विट्ठलदास को देख कर चोंक पड़ी । परिडतजी इसीलिए विद्वुलदास से डरते थे ।,पण्डित पद्मसिंह उनके इने-गिने अनुयायियों में थे ।,पण्डितजी इसीलिए विट्टलभाई से डरते थे । दिन में दौ-एक बार इधर-उघर ताक-म्ोक करते कि कोई चबूतरे के पास खड़ा तो नहीं है |,मुझे देवताओं की पंक्ति में बैठने का दावा नहीं है ।,दिन में दो-एक बार इधर-उधर ताक-झाँक करते कि कोई चबूतरे के पास खड़ा तो नहीं है । "प्रभात का सम्रय था, पवन भाम की बौर ही सुगन्धि से मतवाछा हो रहा था, आकाश प्रथ्वी पर सोने को वर्षा कर रद्दा था ।","मुलिया मुस्कराकर बोली- मुझे तुमसे यही आशा थी, और है ।","प्रभात का समय था, पवन आम की बौर की सुगंधि से मतवाला हो रहा था, आकाश पृथ्वी पर सोने की वर्षा कर रहा था ।" ठाकुरजी के व्याद् की-तयारी थी,अच्छे-अच्छे घरों की महिलाएँ भक्ति-भाव से व्यंजन पकाने में लगी हुई थीं,ठाकुरजी के ब्यालू की तैयारी थी "समृद्धि के शन्न सब होते हैं , छोटे ही नहीं, बड़े भी ।",जिसमें कुछ सामर्थ्य ही नहीं उससे कोई आशा भी नहीं करता ।,"समृद्धि के शत्रु सब होते हैं, छोटे ही नहीं, बड़े भी ।" कु वर साहब होंगे इतने उदार |,इसे बधावे की क्यों सूझ गई ।,कुँवर साहब होंगे इतने उदार । वे यही सिर थाम कर बैठ ग्ये ।,हृदय से एक करुणात्मक ठंडी आह निकली ।,वे वहीं सिर थाम कर बैठ गये । "बहुत ही स्थूल, दीले-ढाले, ब्रीर में हाड़ की जगह मांस और मांस की जगह वायु भरी हुई थी |",यह साँवले रंग के बेडौल मनुष्य थे ।,"बहुत ही स्थूल, ढीले-ढाले शरीर में हाड़ की जगह मांस और मांस की जगह वायु भरी हुई थी ।" 'लालाजो सन्‍्नाटे में आ गये ।,और ऊंचाई के साथ उसकी शंका और भी बढ़ती जाती थी ।,' लालाजी सन्नाटे में आ गये । वे क्या सममेंगे कि हमारा भी कोई बाप था।,अबला ओर विधवा होना ही उसे दोषों से मुक्त नहीं कर सकता।,वे क्या समझेंगे कि हमारा भी कोई बाप था। "शायद में कुसुम की जगह होता, तो इस निष्ठुरता का जवाब इसकी दसगुनो कणोरता से देता ।","पुरुष अपनी दूसरी, तीसरी, चौथी शादी कर सकता है , स्त्री से कोई सम्बन्ध न रखकर भी उस पर उसी कठोरता से शासन कर सकता है ।","शायद मैं कुसुम की जगह होता, तो इस निष्ठुरता का जवाब इसकी दसगुनी कठोरता से देता ।" घर-गृहस्थी का कोई काम मुझे नहीं आता ।,ईश्वर की दया से तुम्हारे लिए अब तक कष्ट सहने की जरूरत ही नहीं पड़ी ।,घर-गृहस्थी का कोई काम मुझे नहीं आता । परोपकार ही अमरत्व प्रदान करता है ।,इससे सोने का मूल्य चाहे न बढ़े; पर चमक बढ़ जाती है ।,परोपकार ही अमरत्व प्रदान करता है । भ्रपना जी ही तो है।,"सुमन -- नहीं, लड़ाई की क्या बात है ?",अपनी जी ही तो है । "“अगर आप इस इरादे से आये, तो आपका दुश्मन हो जाके ।",चोखेलालजी के पत्र की ग्राहक-संख्या बड़े वेग से बढ़ने लगी ।,' 'अगर आप इस इरादे से आयें तो मैं आपका दुश्मन हो जाऊँ । "भूखा, प्यासा, थका हुआ शरीर जवाब दे गया |",न-जाने कौन-सी गुप्तशक्ति उसके हाथों को चला रही थी ।,"भूखा, प्यासा, थका हुआ शरीर जवाब दे गया ।" "मेंने फिर डण्डा सेभाला और चाहता था, कि खोपड़ी पर जमाऊँ कि साहव ने हाथ जोड़कर कहा--नहीं-नहीं, वाबा, हम पुलिस मे नहीं जायगा ।",मैंने धीरे से उनकी छतरी छीनकर फेंक दी ।,"‘ मैंने फिर डंडा सँभाला और चाहता था कि खोपड़ी पर जमाऊँ कि साहब ने हाथ जोड़कर कहा , ‘ नहीं-नहीं , बाबा , हम पुलिस में नहीं जायगा , माफी दो ।" गाँव में और दिप्ते फुरसत थो कि दौड़ धूप करता ।,माँ की दशा देखकर सुभागी समझ गयी कि इनका परवाना भी आ पहुँचा ।,गाँव में और किसे फुरसत थी कि दौड़-धूप करता । वहीं आपके दिल-बहलाव का कुछ सामान हाजिर हो जायगा ।,"आप जहाँ चलना चाहें, चलिए ।",वहीं आपके दिल-बहलाव का कुछ सामान हाज़िर हो जायगा । उस्ते इस समय सहानुभूति को भूख वो ।,कब तक इस तरह पड़ी रहोगी ।,उसे उस समय सहानुभूति की भूख थी । अमरनाथ तार पाकर स्टेशन पर आये थे ।,मनोरमा की आँखों में अभी तक वही भयंकर स्वप्न समाया हुआ था ।,अमरनाथ तार पा कर स्टेशन पर आये थे । "भतीत' चाहे दुःखद हो क्यों न हो, उम्र धो स्मृतियाँ मधुर द्वोती हैं ।",मानी और उसकी सास एक जनाने कमरे में बैठी हुई थीं ।,"अतीत चाहे दुःखद ही क्यों न हो, उसकी स्मृतियाँ मधुर होती हैं ।" "प्रजविद्यामिनो इशारा समझ गयी और बोली--बहिन, इन.वातों की चर्चा से करो |",ब्रजविलासिनी आवाज सम्हाल कर बोली-बहन मैं अभागिनी हूँ ।,ब्रजविलासिनी इशारा समझ गयी और बोली-बहन इन बातों की चर्चा न करो । जमी तो कुरते दो-तीन साल से अधिक नहीं चलते |,"एक बट्टी साबुन में दर्जनों कपड़े ऐसे साफ हो जाते हैं, जैसे बगुले के पर ।",जभी तो कुर्ते दो-तीन साल से अधिक नहीं चलते । उसके पति ने दूसरा विवाह कर लिया है |,"जी में तो आया, कहूँ , बहन, तुम मेरे घर चलो; मगर तब तो सोमदत्त मेरे प्राणों का गाहक हो जाता ।",उसके पति ने दूसरा विवाह कर लिया है । "पाँच छाख मेरे हिस्से मे आयेंगे, पाँच विकम के ।","क्यों बुढ़िया तुम्हें जवान स्त्री से ज्यादा प्यार करेगी , ज्यादा सेवा करेगी ।","पाँच लाख मेरे हिस्से में आयेंगे , पाँच विक्रम के ।" "और लड़के खुश होते हैं कि अब अपने दोस्तों में रहेंगे, यह उल्टे रो रहा है ।",दीदी का सहारा लेकर अपना मतलब पूरा करना चाहती हैं।,"और लड़के खुश होते हैं कि अब अपने दोस्तों में रहेंगे, यह उलटे रो रहा है।" लोग उन पर कुछ-कुछ विश्वास करने लगे ।,बड़े आदमियों में उनकी चर्चा होने लगी ।,लोग उन पर कुछ-कुछ विश्वास करने लगी । ' 'धन को तुम बहुत बड़ी चीज समझते होगे ?,कान में तेल डालकर बैठे रहने से तो उसे शंका होने लगती है कि इनकी नीयत ख़राब है ।,' 'धन को तुम बहुत बडी चीज़ समझते होगे ? "हम लोग भिक्षा माँग-माँगकर पैसे लाते हैं , इसी लिए कि यार-दोस्तों की दावते हो, शराब उड़ाई जाये और सुजरे देखे जायें ?","इस रत्न को वह अपने हाथ से कभी न जाने देगा , चाहे उसकी जान ही क्यों न चली जाय ।","हम लोग भिक्षा माँग-माँगकर पैसे लाते हैं; इसीलिए कि यार-दोस्तों की दावतें हों, शराबें उड़ायी जायें और मुजरे देखे जायें ?" "जब घट न थी, तो घर क्या भू्खों मरता था ।","वंशीधर को पहले संदेह हुआ कि गोकुल इंद्रनाथ के घर छिपा होगा, पर जब वहाँ पता न चला तो उन्होंने सारे शहर में खोज-पूछ शुरू की ।","जब वह न थी, तो घर क्या भूखों मरता था ?" "साधु--नहं वाबा, क्षमा करो |",यह कह कर महात्मा जी जवाहिर के निकट गये और उसके खुर चूमने लगे ।,"साधु- नहीं बाबा, क्षमा करो ।" "वेथ, उतरो, बारात स्टेशन पहुँच रही होगी |","मैं न जानता था, तुम व्रतधारी हो ।","बेटा, उतरो, बारात स्टेशन पहुँच रही होगी ।" और अब उसके जीवन छा कोई आधार न था ।,उसे अपने माता-पिता की परवाह न थी ।,और अब उसके जीवन का कोई आधार न था । "सन कहता था जो वस्तु प्रत्यक्ष दिखाई ठेती है, वह मिल क्यों नहीं सकती ।","पहले तो ऑंख झपकते ही उनकी मूर्ति सामने आ जाती थी , लेकिन फिर तो यह दशा हो गयी कि जाग्रत दशा में भी रह-रह कर उनके दर्शन होने लगे ।","मन कहता था , जो वस्तु प्रत्यक्ष दिखायी देती है , वह मिल क्यों नहीं सकती ?" "उन्हें बचाना देवताओं से बैर मोल लेना था, ओर देवताओं से बैर करके कहाँ जाते ?",घरवाले इन रोगियों को छोड़कर भाग खड़े हुए ।,"उन्हें बचाना देवताओं वैर मोल लेना था, और देवताओं से वैर कर के कहाँ जाते ?" ' रे बालक गयू को छोग त्राह्मण कहते हैं. और वह अपने को ब्राह्मण समझता भी है ।,"' आशा ने जैसे भीतर से जोर लगाकर कहा , ' तुम ' और उसका मुखमण्डल लज्जा से आरक्त हो गया ।",गंगू को लोग ब्राह्मण कहते हैं और वह अपने को ब्राह्मण समझता भी है । में ही ऐसी हूँ कि तुम्हारे साथ गनिबाह हुआ,तुमने खाली मारना सीखा दुलार करना सीखा ही नहीं,मैं ही ऐसी हूँ कि तुम्हारे साथ निबाह हुआ "आगरा “निवासी मित्र बोले--मुभसे भी तो तुम्हारी, मृत्यु के बद्यने सो रुपये लाया था ।","उन्होंने माथुर को देखकर पूछा, 'अच्छा ! आप अभी जिंदा हैं ।",' आगरा-निवासी मित्र बोले -'मुझसे भी तो तुम्हारी मृत्यु के बहाने सौ रुपये लाया था । "ले-देकर एक हँसली बनवाई थी, वह भी बनिये के घर पड़ी हुई है ।",पता लगा कि डिस्ट्रिक्ट बोर्ड की तरफ से वहाँ एक छोटा-सा अस्पताल है ।,"ले देकर एक हँसली बनवायी थी, वह भी बनिये के घर पड़ी हुई है ।" "जेकढ़ीं आदमी जमा मे, सुक्के व जने क्या शामत सूको कि वहाँ से माया ।",मुझे वनमानुष बनाकर साहब ने मेरे हाथ छुड़वा दिये और ताली बजाता हुआ मेरे पीछे दौड़ा ।,"सैकड़ों आदमी जमा थे, मुझे न जाने क्या शामत सूझी कि वहाँ से भागा ।" "गजानन्द तो मल्लाहों से दातें करने लगे, लेकिन उमानाथ चिन्तासागर में. डूबे हुए थे।",दोनों नाव पर बैठे ।,"गजानन्द तो मल्लाहों से बातें करने लगे, लेकिन उमानाथ चितासागर में डूबे हुए थे ।" "वह उस मानसिक दुर्बलता की दशा में थी, जब मनुष्य को छोटे-छोटे काम भी असूझ मालूम होने लगते हैं ।","लक्षण वही है, पर एक वैद्य रक्तदोष बतलाता है, दूसरा पित्तदोष, एक डाक्टर फेफड़े का सूजन बतलाता है, दूसरा आमाशय का विकार ।","' वह उस मानसिक दुर्बलता की दशा में थी, जब मनुष्य को छोटे-छोटे काम भी असूझ मालूम होने लगते हैं ।" "यह कोई पर्दानशीन क्री न*थी, मेले-ठेले में श्राती-जाती थी, केवल एक दिन जरा देर हो जाने से गजाधर उसे कठोर -: दण्ड कभी न देता ।",लेकिन गजाधर सुमन से इतना क्यों बिगड़ा ।,"वह कोई पर्दानशीन स्त्री न थी, मेले-ठेले में आती-जाती थी, केवल एक दिन जरा देर हो जाने से गजाधर उसे कठोर दंड कभी न देता ।" "भामा को उदास देखकर तसल्ली देने लगीं, 'वहिन, पराया कभी अ्रपना नहीं'होता ।",गाँव की रमणियाँ होली खेलने आई ।,"भामा को उदास देखकर तसलल्ली देने लगी, “बहिन, पराया कभी अपना नहीं होता ।" 'बैंडाइक' ओर 'रेमब्रांड' के थाहृति चित्रों में मी ऐसी मनोहर छवि नही देखा ।,मैंने तुरंत ही पिस्तौल निकाली और निकट था कि शेर पर वार करूँ कि मेरे कानों में यह शब्द सुनायी दिए मुसाफिर ईश्वर के लिए वार न करना अन्यथा मुझे दुःख होगा ।,बैंडाइक और रेमब्राँड के आकृति-चित्रों ने भी ऐसी मनोहर छवि नहीं देखी । मेरे पेय का अन्तिम बिन्दु शुष्क हो गया है ।,"हाँ, मैं तेरे मार्ग के कंकड़ चुनूँगी, तेरे झोंपड़े को फूलों से सजाऊँगी, तेरी मॉँझिन के पैर मलूँगी ।",मेरे धैर्य का अन्तिम बिन्दु शुष्क हो गया । "उन्होंने शर्माजी का पत्र पढ़ा, तो एक थप्पड़-सा मुँह पर लगा।",पर उनमें देशानुराग का एक ऐसा गुण था जो उन्हें सारे नगर में सर्वसम्मान्य बनाए हुए था ।,उन्होंने शर्माजी का पत्र पढ़ा तो एक थप्पड़ सा मुँह पर लगा । धूप पेज थी ।,दोपहर का समय था ।,धूप तेज़ थी । लोग तो धन देखत हैँ; इसलिए उसने इस अवसर पर सारी शक्ति लगा दी और उसकी विजय हुई ।,वह कुछ-कुछ निराश हो चली थी ।,"लोग तो धन देखते हैं, इसलिए उसने इस अवसर पर सारी शक्ति लगा दी और उसकी विजय हुई ।" केले के लिए ठीकरा भी तेज होता है ।,दिलावरी तो जब देखता कि किसी बड़े आदमी से हाथ मिलाते ।,केले के लिए ठीकरा भी तेज होता है । मगर निकले भी तो चटनियाँ छे कर ।,से.-मैं तो इसे आकस्मिक समय नहीं कहती ।,मगर निकले भी तो चटनियाँ ले कर । कई दिन के वाद यह विचार फिर पलटा खा गया ।,"अवश्य ही उन्हें शहर से निकाल देना उन्हीं पर नहीं, वबरन सारे समाज पर घोर अत्याचार होगा ।",कई दिन के बाद यह विचार फिर पलटा खा गया । एक दिन इम और गया दो द्वो खेल रहे ये ।,"गुल्ली कैसी ही हो, पर इस तरह लपकता था, जैसे छिपकली कीड़ों पर लपकती है ।",एक दिन मैं और गया दो ही खेल रहे थे । "मुख से झौय टपक रद्दा था, पोर-पोर से शिक्षता कछऊतो थी, मालपम होता था, चह इसी सम्राज में बचपन से पलछा है ।",वह पूरे फैशनेबुल रईस बने हुए थे ।,"मुख से शौर्य टपक रहा था, पोर-पोर से शिष्टता झलकती थी, मालूम होता था वह इसी समाज में पला है ।" उसने कहा---मुभे; यहाँ बैठते स्वतः लज्जा आती है ।,उसकी सच्चाई हमारे हृदय में उच्च भावों को जागृत कर देती है ।,उसने कहा -- मुझे यहाँ बेठते स्वयं लज्जा आती है । उसकी भी फ़िक्र करनी है,अमरकान्त की यह सलाह है यह और भी अफसोस की बात है,उसकी भी फिक्र करनी है "छिसी ने सिर पर टोपी टेढ़ी रखी और पढ़ोसियों को आँखों पें खुबा, कोर ज़रा अकढ़कर चला और पड़ोप्तियों ने अवाजे क॒प्ती' ।",पड़ोसियों में इन सैर-सपाटों की चर्चा होने लगी ।,"किसी ने सिर पर टोपी टेढ़ी रखी और पड़ोसियों की आँखों में खुबा, कोई जरा अकड़कर चला और पड़ोसियों ने आवाजें कसीं ।" वह कसर आज निकालेगा।,आप अभी तक मुझ पर शक करती जा रही हैं।,वह कसर आज निकालेगा। उसकी आत्मा से मानो एक प्रडाश-था निकलऋर अपर के भन्तःकरण का आलोढकित करने लगा,अमर को इस काली-कलूटी काया में स्वर्ण-जैसा हृदय चमकता दीख पड़ा,उसकी आत्मा से मानो एक प्रकाश-सा निकलकर अमर के अंत:करण को अवलोकित करने लगा उसके जीवनरूपी वृक्ष में योवनरूपी कोपलें फूट रही थीं,तुम्हारी चर्चा के अतिरिक्त उसे कोई बात ही नहीं भाती,उसके जीवनरूपी वृक्ष में योवनरूपी कोपलें फूट रही थी कितनी मजबूरी है--वाह सलीम ने दूसरा शेर पढ़ा-- क़सम ले लो जो शिकवा हो तुम्दारी वेवफ़ाई का किये को अपने रोता हूँ मुझे जी भर के रोने दो,दोनों आदमी बगल वाले कमरे में गए,सलीम ने दूसरा शेर पढ़ा : कसम ले लो जो शिकवा हो तुम्हारी बेवफाई का किए को अपने रोता हूँ मुझे जी भर के रोने दो वाश्तव में हम छिप्ानों का कल्यान दबे रहने में हो है ।,नहीं तो तुम्हारे साथ सारे गाँव पर आफत आ जायगी ।,वास्तव में हम किसानों का कल्याण दबे रहने में ही है । उसी नशे में बोली--तो चलिए मुझे उनके दशन करा दौजिए,मेहता ने बच्चे के हाथों से अपने मूँछों की रक्षा करते हुए कहा - मेरी स्त्री कुछ और ही ढंग की होगी,उसी नशे में बोली - तो चलिए मुझे उनके दर्शन करा दीजिए जॉन सेवक-कुछ काम की बातचीत भी की ?,सूरदास-गाने को थोड़े ही कोई मने करता है ।,जॉन सेवक-कुछ काम की बातचीत भी की ? चारों तरफ अंधकार छात्रा हुआ था ।,सुमन भी अपने घर की ओर चली ।,चारों तरफ अंधकार छाया हुआ था । भेरे अम्रामे को कोन देखेगा ?,एक दिन दोनों मित्र मसजिद के खंडहर में बैठे हुए शतरंज खेल रहे थे ।,मेरे अमामे को कौन देखेगा ? "यार दोस्तों से छुट्टी मिलेगी, तो भूलकर इधर भी आ जायेंगे ।",ऐसा पवित्र आचरण तो मैंने आज तक देखा ही नहीं ।,"यार-दोस्तों से छुट्टी मिलेगी, तो भूलकर इधर भी आ जायेंगे ।" "उसके प्रति अब उसे क्रोध न था, ह्ेष न था, दया भी न थी, केवल उदासीनता थी ।",आत्मा की गहराइयों में छिपी हुई कोई शक्ति उसकी ज़बान बंद कर देती थी ।,"उसके प्रति अब उसे क्रोध न था, द्वेष न था, दया भी न थी, केवल उदासीनता थी ।" राजा साहब बोले-आपसे खूब मुलाकात हुई ।,वह आशा पूरी न हुई ।,राजा साहब बोले-आपसे खूब मुलाकात हुई । अच्छे बालकों से भगवान्‌ को भी तो प्रेम है ।,वसुधा ने आज सुबह से उन्हें प्यार न किया था ।,अच्छे बालकों से भगवान को भी तो प्रेम है । स्नेह के घदछे वह शव उस पर दया करतो थी पर इस पराजय ने उसे हतादा नहीं किया उसका आत्माभिमान कई शुता बढ़ गया हैं,उसके कमरे में अमर की तस्वीर थी उसे उसने तोड़कर फेंक दिया था,स्नेह के बदले वह उस पर दया करती थी पर इस पराजय ने उसे हताश नहीं किया उसका आत्माभिमान कई गुना बढ़ गया है "ऋद्दीं तौतरों के जोड़ होते घे, कहीं बटेरों और बुश्बु्लों दो पालियां उततों थीं ।",पुरुषों को सुख-भोग के सिवा और कोई चिंता न थी ।,"कहीं तीतरों के जोड़ होते थे, कहीं बटेरों और बुलबुलों की पालियाँ ठनती थीं ।" रात भीग ही चुकी थी ।,नींद का बहाना करने लगे ।,रात भीग ही चुकी थी । "ऐसा माल्म पढ़ा, मानो भब तक वह कोई सुनइला स्वप्न देख रही थी पर आँख खुलने पर सब कुछ भद्य्य हो गया ।","वसुधा के जीवन में अब एक नया उत्साह , एक नया उल्लास, एक नयी आशा थी ।","ऐसा मालूम पड़ा , मानो , अब तक वह कोई सुनहला स्वप्न देख रही थी ; पर आँख खुलने पर वह सब कुछ अदृश्य हो गया ।" रोश्न--जपभैब्राजों के वादों पर कोई दोवाना हो यकीन कर सकता है ।,आपकी ऐश परस्ती बुजुर्गों का नाम रोशन नहीं कर रही है ।,रोशन-नशेबाजों के वादों पर कोई दीवाना ही यकीन कर सकता है । "गजाधर ने सुमन को सुख से रखने के लिए, अपने से जो कुछ हो सकता था, सब करके देख लिया और अपनी स्ली के लिए आकाश के तारे तोड़ लाना उसकी सामर्थ्य से बाहर था।","इसके बिना उनकी सुन्दरता इन्द्रायण का फल है, विषमय ओर दग्ध करनेवाला ।","गजाधर ने सुमन को सुख से रखने के लिए, अपने से जो कुछ हो सकता था, सब करके देख लिया ओर अपनी स्त्री के लिए आकाश के तारे तोड़ लाना उसकी सामर्थ्य से बाहर था ।" "दो-तीन दिन तो उनकी दशा उससे भी खराब रही, जैसी प्रयाग में थी, लेकिन दवा शुरू होने के दो-तीन दिन बाद वह कुछ सभलने लगे ।",उदासों के लिए स्वर्ग भी उदास है ।,"दो-तीन दिन तो उनकी दशा उससे भी ख़राब रही, जैसी प्रयाग में थी,, लेकिन दवा शुरू होने के दो-तीन दिन बाद वह कुछ संभलने लगे ।" उनकी इच्छा भव काशी- वास करने की भी दो गई,अमरकान्त की ओर से निश्चिन्त न हो सकती थी,उनकी इच्छा अब काशीवास करने की भी हो गई इस विपय पर वह सर्वोत्तम अंथ था ।,"हेलेन ने कठोर मुद्रा से कहा , यह अन्धेर तो अब नहीं देखा जाता , आइवन ।",इस विषय पर वह सर्वोत्तम ग्रन्थ था । महंत रामदास के यहाँ दस-बीस मोटे-ताजे साधु स्थायी रूप से रहते थे।,‘श्री बांकेबिहारीजी’ को रुष्ट करके उस इलाके में रहना कठिन था ।,महंत रामदास के यहाँ दस-बीस मोटे-ताजे साधु स्थायी रूप से रहते थे । गोरे-चिट्टे रूववान्‌ भादमी थे,शान्तिकुमार की अवस्था कोई पैंतीस की थी,गोरे-चिट्टे रूपवान आदमी थे हाँ जनता की आँखो में धूल मो कने के लिए अच्छा स्वाँग दे,शौक था शायरी का और शराब का,हाँ जनता की आँखों में धूल झोंकने के लिए अच्छा स्वाँग है च यह कह कर उसने वही त्तलवार अपने हृदव में खुभा छो ।,प्रेम की नाव प्रेम के सागर में डूब गयी ।,यह कह कर उसने वही तलवार अपने हृदय में चुभा ली । "ज्री पर प्रकृति ने ऐसे बन्धन लगा दिये हैं कि वह कितना भी चाहे, पुरुष की भांति स्वच्छन्द नहीं रह सकती और न पशुबल में पुरुष का मुकाबला कर सकती है ।","अगर आप इन शब्दों में कहना चाहते हैं , तो मुझे कोई आपत्ति नहीं ; मगर अधिकार की बागडोर जैसे राजनीति में , वैसे ही समाज-नीति में धनबल के हाथ रही है और रहेगी ।","स्त्री पर प्रकृति ने ऐसे बन्धन लगा दिये हैं कि वह जितना भी चाहे , पुरुष की भाँति स्वच्छन्द नहीं रह सकती और न पशुबल में पुरुष का मुकाबला ही कर सकती है ।" "नगे बदन, पसीने में तर, काउवौ कसे हुए, सत्र-के-सब फावढ़े से मिट्टो खोदकर मेंड़ पर रखते जाते थे ।","आकाश में चांदी के पहाड़ भाग रहे थे , टकरा रहे थे गले मिल रहें थे , जैसे सूर्य मेघ संग्राम छिड़ा हुआ हो ।","नंगे बदन पसीने में तर कछनी कसे हुए , सब के सब फावड़े से मिटटी खोदकर मेड़ पर रखते जाते थे ।" "ओहो, कितने सुडौल, मेर्चा से मरे हुए, घी से तरातर लड्ड् होंगे, मुँह में रखते-ही-रखते घुल जाते होगे, जोभम भी न इलानी पड़ती होगी ।",पंडित मोटेराम के घर से तो कुछ जाता न था ।,"ओहो, कितने सुडौल, मेवों से भरे हुए, घी से तरातर लड्डू होंगे, मुँह में रखते ही घुल जाते होंगे, जीभ भी न डुलानी पड़ती होगी ।" "तहसीलदार साइंब की आमदनी हसारी आमर्दनी की चौगुगी है, रिखत भी लेते हैं, तो फिर हमारे रुपये क्यों नहों देते ?",यह सारी दिलजोई केवल इसलिए थी कि श्रीमान् के भाईसाहब के विषय में कुछ पूछ न बैठूँ ।,"तहसीलदार साहब की आमदनी हमारी आमदनी की चौगुनी है, रिश्वतें भी लेते हैं; तो फिर हमारे रुपये क्यों नहीं देते ?" "चलकर खाना खा लो सीधे से, नहीं तो में भी जाकर -चसो रहेँगी ।","अब इसे बेटे प्यारे हैं, मैं तो निखट्टू; लुटाऊ, घर-फूँकू, घोंघा हूँ ।","चल कर खाना खा लो सीधे से, नहीं तो मैं जा कर सो रहूँगी ।" कई मामूली चालों के बाद रमेश बाबू ने रमा का रुख पीट लिया ।,"जिन भावनाओं को उसने कभी मन में आश्रय न दिया था,जिनकी गहराई और विस्तार और उद्वेग से वह इतना भयभीत था कि उनमें फिसलकर डूब जाने के भय से चंचल मन को उधर भटकने भी न देता था, उसी अथाह और अछोर कल्पना-सागर में वह आज स्वच्छंद रूप से क्रीडाकरने लगा ।",कई मामूली चालों के बाद रमेश बाबू ने रमा का रूख पीट लिया । "सदसा तेसूर ने कद्टा--इनोब, मेने आज तर तुम्हारो हरेक बात मानों है ।",इस मौके को हाथ से खो देने का अफसोस मुझे उम्र-भर रहेगा ।,"सहसा तैमूर ने कहा- हबीब, मैंने आज तक तुम्हारी हरेक बात मानी है ।" धुँधले दीपक के प्रकाश में उन्हें उसके मुख पर एक अलौकिक शोभा दिखाई दी ! उसकी आँखें निर्मल आत्मिक ज्योति से चमक रही थीं ।,इस समय उन्होंने उसकी ओर करुण नेत्रों से देखा ।,धुँधले दीपक के प्रकाश में उन्हें उसके मुख पर एक अलोकिक आभा दिखाई दी । विट्वुलदास--फिर तो न जाझ्नोगी ! डे:,सुमन -- जब आप का जी चाहे ।,विट्ठलदास -- फिर तो न जाओगी ? "बालिका ने मेरी ओर अविश्वास की आँखो से देखा, शायद वह समझो, में भो महाशय “ग' के भाई-बदों मे हूँ ।",शहर वाले झूठ बोल रहे हैं ।,"बालिका ने मेरी ओर अविश्वास की आँखों से देखा, शायद वह समझी, मैं भी महाशय 'ग' के ही भाई-बन्दों में से हूँ ।" जब तक मेरी शादी न दो जायगी आप बेटी रहेंगी,तो क्या मैं हमेशा बैठी रहूँगी,हाँ जब तक मेरी शादी न हो जाएगी आप बैठी रहेंगी लेकिन गर्मियों में शहर में हैजा फेला और बुढ़िया चल बसी ।,गजाधर की एक बूढ़ी फूआ घर का सारा काम-काज करती थी ।,लेकिन गरमियों में शहर में हैजा फेला और बुढ़िया चल बसी । में तो उनके पास आनेवाला था ।,मैं इस आक्षेप का समर्थन न कर सका ।,मैं तो उनके पास आनेवाला था । "पर्चों ने एक स्वर से कहा--नहीं, नहीं ! आपसे ऐसा नहीं हों सकता |",'अमानत' में अब एक कौड़ी बाकी न थी ।,"' पंचों ने एक स्वर से कहा-नहीं, नहीं ! आपसे ऐसा नहीं हो सकता ।" अबला का छुब्घ- हृदय सेठनजी की इस कृपा से पुलकित हो उठा |,"भगवान्, कैसे बेड़ा पार लगेगा ।",अबला का क्षुब्ध ह्रदय सेठजी की इस कृपा से पुलकित हो उठा । सुबह तक सबका गुत्सा ठण्डा हो जायगा ।,"जब सब लोग सो जाएँगे, तो अम्माँ से सारी कथा कह सुनाऊँगा ।",सुबह तक सबका गुस्सा ठंडा हो जायगा । "विदुल--अगर तुम्हें यह आशा है कि यहाँ सुख से जीवन कटेगा, तो तुम्हारी बड़ी भूल है ।",मेरे लिए सुख से जीवन बिताने का ओर कौन सा उपाय है ?,विट्ठलदास -- अगर तुम्हें यह आशा है कि यहाँ सुख से जीवन कटेगा तो तुम्हारी बड़ी भूल है । “सूरत देखकर दिल पर काबू तो नहीं रहता ।,गधी यह नहीं समझती कि दुनिया में किसी तरह मान-मर्यादा का निर्वाह करते हुए जिन्दगी काट लेना ही हमारा धर्म है ।,सूरत देखकर दिल पर काबू तो नहीं रहता । वह छज्जे पर खडा सड़क का तमाशा देख रहा था ।,जालपा ने गोपी को बुलाया ।,वह छज्जे पर खडा सड़क का तमाशा देख रहा था । "वह अब भी भूंकता था, लेकिन लेटे-लेटे और प्राय: छाती में सिर छिपाये हुए, मानों अंपनी वर्तमान स्थिति पर रो रहा हो |",बिल्ली ने भी स्वामिभक्ति से मुँह मोड़ा ।,"वह अब भी भूंकता था, लेकिन लेटे-लेटे और प्रायः छाती में सिर छिपाये हुए, मानो अपनी वर्तमान स्थिति पर रो रहा हो ।" कुशल यद् थी कि मैं वहाँ मौजूद था |,खेद तो यह है कि आपके दारोगा जी भी उसके सहायक थे ।,कुशल यह थी कि मैं वहाँ मौजूद था । "रमा अपने कमरे में गया, तो उसका मन बहुत प्रसन्न था ।","हमारे जितने गाहक आवेंगे, उनमें से कितने ही चाय भी पी लेंगे ।","' रमा अपने कमरे में गया, तो उसका मन बहुत प्रसन्न था ।" "रामेश्वरी फिर लेट रही, मगर जालपा उसी तरह बैठी रही ।",जालपा इन्हीं चिंताओं में डूबी हुई न जाने कब तक बैठी रही ।,"' जागेश्वरी फिर लेट रही, मगर जालपा उसी तरह बैठी रही ।" यों बातें करते हुए दोनों अपने-अपने घर गए ।,मैंने उसे कभी रोते ही नहीं देखा ।,यों बातें करते हुए दोनों अपने-अपने घर गए । "तुम कई दिन से गये नहीं , इसो लिए उन्होंने मुझसे कहा--इस बहाने से वुला लाना ।","यही अवलम्ब था, जिसने निर्वासन-काल में मुझे सर्वनाश से बचाया ।","तुम कई दिन से गये नहीं, इसीलिए उन्होंने मुझसे कहा, इस बहाने से बुला लाना ।" पॉचवा--पापियों भें भो आत्मा द्ा प्रकाश रहता है भौर कष्ठ पाकर जामत दो जाता है ।,"आकर महलसरा में देखो, तुम इसे अपने झोंपड़ों ही की तरह तकल्लुफ और सजावट से खाली पाओगे ।",पाँचवाँ- पापियों में भी आत्मा का प्रकाश रहता है और कष्ट पाकर जाग्रत हो जाता है । "वही उन्हें उबटव मलती, वही काजल लगातो, वह्दी गोद सें लिये फिरती ; मगर मुलिया के मुंह से कभी अनुग्रह का एक शब्द भी न निकलता ।",आप कई दिन सर्दी से ठिठुरते रहे ।,"वहीं उन्हें उबटन मलती, वही काजल लगाती, वही गोद में लिये फिरती, मगर मुलिया के मुँह से अनुग्रह का एक शब्द भी न निकलता ।" "में उस जम्तीच से लिपटकर खुब रोया, यहाँ तक कि हिचकियां वँध गई ।",इस जमीन का एक-एक अणु मेरे लिए मधुर-स्मृतियों से पवित्र था ।,"मैं उसी जमीन से लिपटकर खूब रोया , यहाँ तक कि हिचकियाँ बँध गयीं ।" विलम्ब से मुझे उलझन होती है ।,"मेरी आदत है कि जो काम करती हूँ, जल्द-से-जल्द कर डालती हूँ ।",विलंब से मुझे उलझन होती है । ठुम अपना रास्ता लो ।,जिसने बरसों की कतर-ब्योंत के बाद इतने रुपये जोड़े हों और जिसे भविष्य भी अभावमय ही दीखता हो ।,तुम अपना रुपया रख लो । लेकिन दस ही क़दम के बाद फिर रुककर बोलीं -- मैंने आपका नाम तो पूछा ही नहीं ।,' इतने में अंधेरा हो गया ।,"'लेकिन दस ही कदम के बाद फिर रूककर बोलीं, 'मैंने आपका नाम तो पूछा ही नहीं ।" तू ही उन्हें फटकने न देती होगी ।,"क्लार्क-प्रिये, तुम्हें मालूम नहीं, उसका क्या परिणाम होगा ।",तू ही उन्हें फटकने न देती होगी । उमा--माँ-वाप दोनों मर चुके हैं और भाई-बन्द शहर में किसके होते हैं ?,"गंगा--भाई-बन्द, माँ-बाप है ?",उमा--माँ-बाप दोनों मर चुके हैं ओर भाई-बन्द शहर में किसके होते है ? होरी को ये शब्द जरूरत से ज्यादा कठोर जान पड़े,धनिया का पल्ला हल्का हो रहा था,होरी को ये शब्द जरूरत से ज्यादा कठोर जान पड़े कोई बढ़ा आदमी होगा तो अपने घर का द्वाया ।,एकाएक मुझे क्रोध आ गया ।,"‘ ‘कोई बड़ा आदमी होगा, तो अपने घर का होगा ।" "श्रद्धा की आँखे कद्द रही थीं--इतनी निदयता ! भगतराम ने धीमे, वेदनापूर् स्वर मे कहा--आप लोगों को आज बहुत देर तक मेरी राह देखनी पड़ी , मगर मैं मजबूर था , घर से अशग और दादा श्राये हुए हैं, उन्हीं से बाते कर रहा था |",आज तो तुम बिलकुल अप-टु-डेट हो ।,"श्रृद्धा की आँखें कह रही थीं इतनी निर्दयता ! भगतराम ने धीमे, वेदनापूर्ण स्वर में कहा, 'आप लोगों को आज बहुत देर तक मेरी राह देखनी पड़ी; मगर मैं मजबूर था; घर से अम्माँ और दादा आये हुए हैं; उन्हीं से बातें कर रहा था ।" हम किसी वृक्ष के नीचे दो लड़को को पढ़ा सकते हैं,क्या-क्या गिनाऊँ,हम किसी वृक्ष के नीचे तो लड़कों को पढ़ा सकते हैं दूसरे दिन फिर दवा की आवश्यकता हुईं ।,दिन-भर कुछ फायदा न हुआ ।,दूसरे दिन फिर दवा की आवश्यकता हुई । आख़िर यही न समझ लिया होगा कि बहुत होगा रो-रोकर मर जायगी ।,इतने दिनों वह छलमयी आशा और कठोर दुराशा का खिलौना बनी रही ।,आख़िर यही न समझ लिया होगा कि बहुत होगा रो-रोकर मर जायगी । "शिखर पर एक मनुष्य नंगे सिर बैठा हुआ दे, उसकी श्राँखों का अश्रु-प्रवाद साफ दीख रहा है ।",सब लोग यही समझ रहे थे कि क्षण-भर में यह तीनों उसे गिरा लेंगे ।,"शिखर पर एक मनुष्य नंगे सिर बैठा हुआ है, उसकी आँखों का अश्रु-प्रवाह साफ दीख रहा है ।" मुक्त-जसे कपूत को ते तुम्दारी कोख से जन्म हौ ना लेना वाहिए था ।,"दया ने दृढ़ता से कहा- अम्माँ, तुम्हारे गहने तो न लूँगा, चाहे मुझ पर कुछ ही क्यों न आ पड़े ।",मुझ जैसे कपूत को तो तुम्हारी कोख से जन्म ही न लेना चाहिए था । जब तुम्हारी आमदनी इतनी कम थी तो गहने लिये ही क्‍यों ?,"जालपा ने पूछा, 'तुमने तो कहा था, इसके अब थोड़े ही रूपये बाकी हैं ।",जब तुम्हारी आमदनी इतनी कम थी तो गहने लिए ही क्यों ? "मुँह से न कहें, मन की वात और भाव छिपे नहीं रहते, ढोकिन मीठी निद्रा की गोद में सोये हुए शिशु को देखकर ममता ने उसके अशक्त ऋदय को और भी कातर कर दिया ।",आखिर कोई लाठी मार कर थोड़े ही निकाल देगा ।,"मुँह से न कहें, मन की बात और भाव छिपे नहीं रहते; लेकिन मीठी निद्रा की गोद में सोये हुए शिशु को देख कर ममता ने उसके अशक्त हृदय को और भी कातर कर दिया ।" अगर तुम्र यो न मानोगे तो में ( थप्पड़ दिखाकर ) इपका प्रयोग भी कर सकता हूँ ।,करजदार रहते थे ।,"अगर तुम यों न मानोगे, तो मैं (थप्पड़ दिखाकर) इसका प्रयोग भी कर सकता हूँ ।" "सुभद्रा के कान में भनक पड़ी, आकर वोली--क्या है जीतन, वया कह रहे हो ?","बाँडा आप गये, चार हाथ की पगहिया भी लेते गए ।","सुभद्रा के कान में भनक पड़ी, आकर बोली -- क्या है जीतन, क्या कह रहे हो ?" इन बड़े आदमियों से अभी पाला नहीं पड़ा है ।,"सूरदास-साहब, बड़ी नामूसी होगी ।",इन बड़े आदमियों से अभी पाला नहीं पड़ा है । मुझे देखकर सब' छलते हैं और इसी बद्ाने से मुझे नोचा दिखाता चाहते हैं ।,"बिरादरी जो दण्ड दे, उसे स्वीकार करने को तैयार हूँ ।",मुझे देखकर सब जलते हैं और इसी बहाने से मुझे नीचा दिखाना चाहते हैं । मैं तो केवल गितिना जानता हूँ--हम या तो सांम्यवादी हैं या नहीं हैं,मेहता ने हथौड़े की दूसरी चोट जमाई - मानता हूँ आपका अपने असामियों के साथ बहुत अच्छा बर्ताव है मगर प्रश्न यह है कि उसमें स्वार्थ है या नहीं,मैं तो केवल इतना जानता हूँ हम या तो साम्यवादी हैं या नहीं हैं अपने सिर पर यह तूफान उठते देखकर उसे खुपके से सरक जाने हौ में अपनो कुशल मालम हुईं ।,"उसकी जबान से जो धमकी निकल गयी, उस पर उसे घोर पश्चात्ताप हुआ; लेकिन तीर कमान से निकल चुका था ।",अपने सिर पर यह तूफान उठते देखकर उसे चुपके से सरक जाने में ही अपनी कुशल मालूम हुई । "अब क्याकरे £ अगर शोर मचाता है. तो सेना मे खलबली पड जाय, और अपेरे मे लोग एक दूसरे पर वार करके आपस ही में कट मरें |",वे तीनों हिंò पशुओं की भाँति दबे-पाँव जंगल को पार करके आये और वृक्षों की आड़ में खड़े हो कर सोचने लगे कि चिंता का खेमा कौन-सा है ?,"अगर शोर मचाता है, तो सेना में खलबली पड़ जाए, और अँधेरे में लोग एक-दूसरे पर वार करके आपस ही में कट मरें ।" तब में इस तरद्द थोड़े ही लौटंगी ।,अब उन्हें घर का सारा काम आप ही करना पड़ेगा ।,तब मैं इस तरह थोड़े लौटूँगी । यह निश्चय है ।,किसी तरह उठा और सीधा डाक्टर के पास गया ।,यह निश्चय है । २१४ दूनरे दिन पद्मस्नह सदन को साथ लेकर किसी स्कूल में दाखिल कराने चले ।,"यह विचार शर्माजी के ध्यान में भी न आया कि सम्भव है, उन्होंने जो कुछ कहा हो, वह शुभचिन्ताओं से प्रेरित होकर कहा हो और उस पर विश्वास करते हो ।",२१४ दूसरे दिन पद्मसिंह सदन को साथ लेकर किसी स्कूल में दाखिल कराने चले । "इसी पर दद्धा माता, रोगिणी ञ्नो और पाँच बेटे-बेटियों का निर्वाह होता था ।","छकौड़ीलाल ने दुकान खोली और कपड़े के थानों को निकाल-निकाल रखने लगा कि एक महिला, दो स्वयंसेवकों के साथ उसकी दुकान छेकने आ पहुँची ।","यही जीविका थी, इसी पर वृद्धा माता, रोगिणी स्त्री और पाँच बेटे-बेटियों का निर्वाह होता था ।" "वीरू की माँ कहती है, कोई देवी घटना है ।",एक चीज भी नहीं छुई ।,"बीरू की माँ कहती है, कोई दैवी घटना है ।" "में ऐसी मेदरिया केकर क्या कहँगा, जो गइनों के लिए मेरी जाव खातो रहे ।",तब एक से दो हो जाऊँगी ।,"ऐसी मेहरिया लेकर क्या करूँगा, जो गहनों के लिए मेरी जान खाती रहे ।" जो सहानुभूति उसे जालपा से भी न मिली वह रतन ने प्रदान को |,"ज़ोहरा उसके ऊपर झुकी उसे करूण, विवश, कातर, निराश तथा तृष्णामय नजरों से देख रही थी ।","जो सहानुभूति उसे जालपा से भी न मिली, वह रतन ने प्रदान की ।" आध घण्टे तक घारों पुर कद रहे ।,सभी ने जाकर सब बेर चैनसिंह के आगे डाल दिए और पक्के-पक्के छाँटकर उसे देने लगे ।,आधा घण्टे तक चारों पुर बन्द रहे । "दयाकृृष्ण के सिर से ऋण का भार तो कुछ इलका हो"" जाता, लीला का जीवन तो सुखी हो जाता ।","दयाकृष्ण कुछ देर वहाँ मर्माहत-सा रहा , फिर धीरे-धीरे नीचे उतर गया , मानो देह में प्राण न हो ।","दयाकृष्ण के सिर से ऋण का भार तो कुछ हल्का हो जाता , लीला का जीवन तो सुखी हो जाता ।" में अपने दिल में ऐसी ताक़त ऐसी उमंग पातो है इन शब्दों में उसकी पुरुष-क्ता को ऐसी आनन्द प्रद उत्तेजना मिलतो थी कि वह अपने को भूल जाता था,गोवरधान सराय से चौक तक वह हवा के वेग से गया पर बाजार बंद हो चुका था,मैं अपने दिल में ऐसी ताकत ऐसी उमंग पाती हूँ इन शब्दों में उसकी पुरुष कल्पना को ऐसी आनंदप्रद उत्तेजना मिलती थी कि वह अपने को भूल जाता था रात का समय है ।,इन बातों से धर्म नहीं जाता ?,रात का समय है । "जब से राजा बह्तावरसिह चजर-बंद हुए हूँ, इन पर किस्सी को दाव हो नही रहौ ।",अगर अनुभवशील सेनापति राष्ट्रों की नींव डालता है तो आन पर जान देनेवाला मुँह न मोड़नेवाला सिपाही राष्ट्र के भावों को उच्च करता है और उसके हृदय पर नैतिक गौरव को अंकित कर देता है ।,जब से राजा बख्तावरसिंह नजरबंद हुए हैं इन पर किसी की दाब ही नहीं रही । दोनों अपने-अपने द्वार पर लेटे हुए थे,भाइयों से अलग हो गया है तो क्या हुआ,दोनों अपने-अपने द्वार पर लेटे हुए थे सुमन का लावर्यमय स्वरूप उसकी अआँ़्ों से कभी न उतरता था ।,उसकी प्रेम कल्पनाओं से अब भी उसका हृदय सजग होता रहता था ।,सुमन का लावण्यमय स्वरूप उसकी आँखों से कभी न उतरता था । उस समय यह अल्पना मेरे हृदय में गुदगुदी पंदा कर रही थी फि में बह पहुंचा प्राणी हूँ गिसे यह बात सूझी है कि पैरों से पृथ्वी को तापे ।,राज.-हम प्रेम का स्थान पैदा कर देंगी ।,उस समय यह कल्पना मेरे हृदय में गुदगुदी पैदा कर रही थी कि मैं वह पहला प्राणी हूँ जिसे यह बात सूझी है कि पैरों से पृथ्वी को नापे । "'निरुपभा--भाभी, घुक्तप्ते ऐसी हँसी करोगो तो में चछो जाऊँगी ।","निरुपमा- चलो, गाली देती हो ।","निरुपमा- भाभी, मुझसे ऐसी हँसी करोगी तो मैं चली जाऊँगी ।" यही कहते रहे कि करना-घरना तो कुछ नहीं रोज़ रुपये चाहिए कभी फ़ीस कभी किताब कभी चंदा,मेरी आँखें लाल थीं,यही कहते रहे कि करना-धारना तो कुछ नहीं रोज रुपये चाहिए कभी फीस कभी किताब कभी चंदा "मरा छोटा भाई बहुत दिन हुए, मुझप्ते लड़कर, घर को जम्ता-जथा लेकर रगूत भाग जया था, और वहीं उसका देद्वान्त दो गया था ।",फिर अतीत के गर्भ से मेरे भाई की स्मृति-मूर्ति निकल आयी ।,"मेरा छोटा भाई बहुत दिन हुए, मुझसे लड़कर, घर की जमा-जथा लेकर रंगून भाग गया था, और वहीं उसका देहान्त हो गया था ।" "कई दिन के वाद एक शाम को पन्ना घान रोपकर छौटी, छेघेरा हो गया था ।",मन मतंग की भाँति जंजीर तुड़ाकर भाग जाना चाहता है ।,"कई दिन के बाद एक शाम को पन्ना धान रोपकर लौटी, अंधेरा हो गया था ।" "अगर दूसरे ने यह हरकत की होती, तो श्राज उसका खून पी जाता ।","अबुल -- सुमन, जख्म पर नमक ना छिड़को ।",अगर दूसरे ने यह हरकत की होती तो आज उसका खून पी जाता । सड़क के दोनों ओर पेड़ लगे हुए थे ।,वायु में सुखद शीतलता आ गई थी ।,सड़क के दोनों ओर पेड़ लगे हुए थे । वे प्यारे दिन क्या कभी भूल सकते हैं ] वहो मधुर स्मृतियाँ अब इस जीवन का सर्वेस्व हैं ।,"अगर मुझे एक दिन की भी देर हो जाती , तो तारा का पत्र आ पहुँचता ।",वे प्यारे दिन क्या भूल सकते हैं ! वही मधुर स्मृतियाँ अब इस जीवन का सर्वस्व हैं । नहीं सच कहती हूँ,दादा ने पुलिस कर्मचारी की बात अम्माँ से भी कही होगी,नहीं सच कहती हूँ गजाधर----तो तुमने उन लोगों के बड़े-बड़े तिलक-छापे देखकर ही उन्हें धर्मात्मा समभ लिया ?,"संसार तो व्यवहारों को ही देखता है, मन की बात कौन किसकी जानता है ?",गजाधर -- तो तुमने उन लोगों के बड़े-बड़े तिलक-छापे देखकर ही उन्हें धर्मात्मा समझ लिया ? मेरे लिए वह मर गई ।,बड़ी सीधी है बेचारी ।,मेरे लिए वह मर गयी । तीसरे पहर उसने सब नौकरों को बुलाया और उनसे अपराध क्षमा कराया,सब इसी प्रकार की बातें कर रहे थे,तीसरे पहर उसने सब नोकरों को बुलाया और उनसे अपराध क्षमा कराया कर्ज का तो आप जिक्र ही न करें ।,"राजा साहब इन्हें बहुत मानते हैं, लेकिन यह कहते हैं, मैं स्वाधीन रहना चाहता हूँ ।",कर्ज का तो आप जिक्र ही न करें । कितना बड़ा धूत्ते है! यह पागल नहीं है ।,उसके मुख पर से नम्रता का आवरण हट गया और मन में छुपा हुआ क्रोध जैसे दांत पीसने लगा ।,कितना बड़ा धूर्त है! यह पागल नहीं है । "टामो ने चाहा कि बच कर निकक जाऊं, पर वहू दुष्ट इतना श्ञातिप्रिय न था ।",वहाँ चारों ओर मेरी धाक बैठ जाय सब पर ऐसा रोब छा जाय कि मुझी को अपना राजा समझने लगें और धीरे-धीरे मेरा ऐसा सिक्का बैठ जाय कि किसी द्वेषी को वहाँ पैर रखने का साहस ही न हो ।,टामी ने चाहा कि बच कर निकल जाऊँ पर वह दुष्ट इतना शांतिप्रिय न था । एकाएंक उसका हृंदब उछछ परश्य ।,परस्पर मेल था धन था संतानें थीं ।,एकाएक उसका हृदय उछल पड़ा । हैं तो पने,तुम्हारा घर कहाँ है माता,हैं तो अपने कपड़े पहनने की भी सुधि न रही ।,"कचहरी जाने के लिए अचकन पहन रहे थे, एक हाथ आस्तीन में था, दूसरा बाहर ।",कपड़े पहनने की भी सुधि न रही । अब अगर कुछ कहेँ भी तो कोई छाभ नहीं ।,साफ इन्कार कर जाय कि तुमने टिकट में साझा किया ही नहीं ।,अब अगर कुछ कहूँ भी तो कुछ लाभ नहीं । "में उसे देखकर चकित हो गया अर्म्मा, जेसे मेरी ही तस्वीर हो , केवल मूँछो का अन्तर है ।",मुझे देखते ही बहुत-से आदमियों ने मुझे घेर लिया ।,"उसे देखकर चकित हो गया अम्माँ, जैसे मेरी ही तस्वीर हो, केवल मूँछों का अन्तर है ।" अपने लहइलदहाते हुए खेतों को देखकर फूला न समाता था ।,अब उसे पेट के लिए दूसरों की गुलामी करनी पड़ेगी ।,अपने लहलहाते हुए खेत को देखकर फूला न समाता था । दफ़्तर जाने के पहले और दफ़्तर से आने के बाद तौनों इन्हीं कामों में जुट जाते थे |,चीज़ों को करीने से सजाना उनका काम था ।,दफ्तर जाने के पहले और दफ्तर से आने के बाद तीनों इन्हीं कामों में जुट जाते थे । "उनके पैर वार-बार पत्थरों से कराये तब किसी ने उन्हें पहाड़ पर से पटका, वे मूच्छित हो गयीं ।",उसने पिटारी उठाई और बूढ़ी काकी की कोठरी की ओर चली ।,"उनके पैर बार-बार पत्थरों से टकराए तब किसी ने उन्हें पहाड़ पर से पटका, वे मूर्छित हो गईं ।" "पति-प्रेम का यह परिचय पाकर उसने अपने भाग्य को सराहा, देवताओं में उसकी श्रद्धा और बढ गई ।",वह आमदनी केवल जेवरों में खर्च होगी ।,"पति-प्रेम का यह परिचय पाकर उसने अपने भाग्य को सराहा, देवताओं में उसकी श्रद्धा और भी बढ़ गयी ।" "अभी तो उन्हें मखमली जूतियाँ पहनाते हो, कुछ इसकी भी चिता है कि आगे क्या होगा ?",उस समय किसके सामने हाथ फैलाते फिरोगे ?,"अभी तो उन्हें मखमली जूतियाँ पहनाते हो, कुछ इसकी भी चिंता है कि आगे क्या होगा ?" "ऐसा ब्याह किस काम का कि वह बहू का बाप मालूम हो, बेचारी कन्या के दिन रोते ही बीतें ।",उसी युवक से विवाह कीजिए ।,"ऐसा ब्याह किस काम का कि वह बहू का बाप मालूम हो, बेचारी कन्या के दिन रोते ही बीतें ।" उसकी टिटकार पर दोनो उड़ने लूगते थे ।,अपने दोनों बालों को खली चूनी सब कुछ दी ।,उसकी टिटकार पर दोनों उड़ने लगते थे । भर वे मोटो नींद सो समझते थे ।,"उनके सिर पर एक नंगी तलवार लटकती रहती थी, आज वह हट गई ।",अब वे मीठी नींद सो सकते थे । ” यह कह कर उसने उस रस्सियो के देंधे हुए पुरुष को घमीठा और दहकतो हुई चिता में ठाल दिया ।,कालदेव और कादिर खाँ दोनों लँगोट कसे शेरों की तरह अखाड़े में उतरे और गले मिल गए ।,यह कह कर उसने उस रस्सियों से बँधे हुए पुरुष को घसीटा और दहकती हुई चिता में डाल दिया । मेरे बाप विश्रमनगर के जागौरदार थे ।,यात्र का सातवाँ वर्ष था और ज्येष्ठ का महीना ।,मेरे बाप विक्रमनगर के जागीरदार थे । दुदेखों की स्थ्रियाँ ऐसे अवसर पर रोधा महीं करती ।,"जुझार सिंह ने उठा कर उसे छाती से लगाया और कहा, ""प्यारी, यह रोने का समय नहीं है ।",बुंदेलों की स्त्रियाँ ऐसे अवसर पर रोया नहीं करतीं । में भापसे वेशर्म होकर पूछती हूँ ऐसे पुरुष को जो ज़ी के प्रति अपना धर्म न सममे क्‍या अधिकार है कि वह द्ली से तत- धारिणी रहने को भाशा रखे आप सत्यवादी हैं,आज आपका स्नेह और सौजन्य देखकर मेरे चित्त को बड़ी शांति मिली,मैं आपसे बेशर्म होकर पूछती हूँ ऐसा पुरुष जो स्त्री के प्रति अपना धर्म न समझे क्या अधिकार है कि वह स्त्री से व्रत-धारिणी रहने की आशा रखे- आप सत्यवादी हैं इसके भाई ने गाय को माहुर खिलाकर मार डाला,मुझे मार कर सुखी न रहोगे,इसके भाई ने गाय को माहुर खिला कर मार डाला इसमें कौन-सी हेठी हुई जाती है ।,उस उतावली में मुंशीजी पहले निकल गये ।,इसमें कौन-सी हेठी हुई जाती है । "शव में गया, ओर नियाहें वाछपन के साथियों को खोजने रूगी, किलु चोक ! वे सब के सब मृत्यु के प्रास हो घुके थे ।",सामने एक बँगला था जिसमें दो अँग्रेज बंदूकें लिये इधर-उधर ताक रहे थे ।,गाँव में गया और निगाहें बालपन के साथियों को खोजने लगीं किन्तु शोक ! वे सब के सब मृत्यु के ग्रास हो चुके थे । उन्होंने उसे भोद में टठा लिया भौर उसका मुख चूमने लगे ।,"हाँ, नाइन कभी चुटकियाँ बजाकर चुमकारती तो शिशु के मुख पर ऐसी दयनीय, ऐसी करुण वेदना अंकित दिखायी देती कि वह आँखें पोंछती हुई चली जाती थी ।",उन्होंने उसे गोद में उठा लिया और उसका मुख चूमने लगे । पाँच महीने ग्ुज़र गये |,गंगू क्षुधा-पीड़ित प्राणी की भाँति रोटी का टुकड़ा देखकर उसकी ओर लपक रहा है ।,पाँच महीने गुजर गये । अफसर एक-एक का नाम लेकर रिहाई का परवाना देने लगा ।,न-जाने घर पर क्या आफत आये ।,अफसर एक-एक का नाम लेकर रिहाई का परवाना देने लगा । बिल्ली ने भी स्वोमि-भक्ति से मुँह मोड़ा ।,जब उसे मालूम हो गया कि नगद रुपये वसूल न होंगे तो एक दिन सभी बकरियाँ हाँक ले गया ।,बिल्ली ने भी स्वामिभक्ति से मुँह मोड़ा । ".. देवीदीन ने उसे आदर की दृष्टि से देखकर कहा --- तुमः सब कर लोगी बहू, अब मुझे विश्वास हो गया ।","मैं यह कभी न पसंद करती कि वह दूसरों को दग़ा देकर मुख़बिर बन जायं, लेकिन यह मामला तो बिलकुल झूठ है ।","देवीदीन ने उसे आदर की दृष्टि से देखकर कहा, 'तुम सब कर लोगी बहू, अब मुझे विश्वास हो गया ।" "५"" घालक ने उसकी नाक पकड़ लो और उसे निगल जाने की चेश्ा करने लगा “>जसे हनुप्राव-सूर्य -को -निगल रहे दहो",लालाजी चले गए तो अमर फिर घर में जा पहुंचा और बच्चे को गोद में लेकर बोला-क्यों जी तुम हमारे बापू की मूंछें उखाड़ते हो खबरदार जो फिर उनकी मूंछें छुईं नहीं दाँत तोड़ दूँगा,बालक ने उसकी नाक पकड़ ली और उसे निगल जाने की चेष्टा करने लगा जैसे हनुमान सूर्य को निगल रहे हों "कई किप्तानों ने साग-साजी रपा रखो थो, पारे दिन सौींचते- सोचते मरते थे ।","सारे दिन तो गउओं के साथ रहता, रात को बस्ती में घुस आता और खूँटों से बँधो बैलों को सींगों से मारता ।","कई किसानों ने साग-भाजी लगा रखी थीं, सारे दिन सींचते-सींचते मरते थे ।" ईर्ष्या का ऐसा श्रगोखा उदाहरण उन्हें कभी न मिला था,मालती ने कटोरे के भद्देपन पर मुँह बनाया; लेकिन दूध त्याग न सकी,ईर्ष्या का ऐसा अनोखा उदाहरण उन्हें कभी न मिला था "आप उनके शिष्य हैं, फिर मी वे आपको अपना शिष्य नहीं कहते |","' इतने में पंडित मोटेराम भी गिरते-पड़ते हाँफते हुए आ पहुँचे और यह देख कर कि चिंतामणि भद्रता और सभ्यता की मूर्ति बने खड़े हैं, वे देवोपम शान्ति के साथ खड़े हो गये ।","आप उनके शिष्य हैं, फिर भी वे आपको अपना शिष्य नहीं कहते हैं ।" "जी चाहता था, जंट साहम डो नोच साऊ ।","अनुमान किया था कि संध्या तक लौट आऊँगा; मगर नदियों का चढ़ाव-उतार पड़ा, दस बजे पहुँचने के बदले शाम को पहुँचा ।","जी चाहता था, जंट साहब को नोच खाऊँ ।" जीवन को सफल बनाने के लिए शिक्षा की ज़रूरत है डिआ्री को नहीं,अधयापकों को विश्वास था उसे छात्रवृत्ति मिलेगी,जीवन को सफल बनाने के लिए शिक्षा की जरूरत है डिग्री की नहीं दोनों महिलाओं में इसी तरह नोक-झोंक होती रही ।,उसके चेहरे का रंग उड़ा हुआ था ।,दोनों महिलाओं में इसी तरह नोक-झोंक होती रही । दफ्तरी उसकी पूजा करता था |,वह गहने-कपड़ों के तगादों से पति की नींद हराम न करती थी ।,दफ्तरी उसकी पूजा करता था । व्ाँ से खिसक गया ।,"अरे, लोग पंगत से उठे जा रहे हैं ।",वहाँ से खिसक गया । में निदपयय-भाव से कहा--अच्छी बात है बल से तुम अपनी बिरादरी दो दृश्ताल बरवा दो,सुखदा ने उसकी ओर से मुंह फेर लिया और मतई से बोली-तुम क्या कहते हो क्या तुमने भी हिम्मत छोड़ दी- मतई ने छाती ठोकर कहा-बात कहकर निकल जाना पाजियों का काम है सरकार आपका जो हुक्म होगा उससे बाहर नहीं जा सकता,सुखदा ने निश्चय-भाव से कहा-अच्छी बात है कल से तुम अपनी बिरादरी की हड़ताल करवा दो मुझे बदनाम करने का उन्होंने बीड़ा उठा लिया है।,तुम्हारी बुआजी प्याज-लहसुन न छूती होंगी?,मुझे बदनाम करने का उन्होंने बीड़ा उठा लिया है। "भाई साहब फेल हो गये, में पास हों गया और दरजे - में प्रथम आया ।","फिर भी जैसे मौत और विपत्ति के बीच में भी आदमी मोह और माया के बंधन में जकड़ा रहता है, मैं फटकार और घुडकियाँ खाकर भी खेल-कूद का तिरस्कार न कर सकता ।","भाई साहब फेल हो गये, मैं पास हो गया और दरजे में प्रथम आया ।" "एक किनारे बढ़े-बढ़े बतेन घरे ये, जो शादो-ब्यादह के अवसर पर विद्चाले जाते थे, था माँगे दिये जाते थे ।",इस घर में वह कभी न आयी थी ।,"एक किनारे बड़े-बड़े बरतन धरे थे, जो शादी-ब्याह के अवसर पर निकाले जाते थे, या माँगे दिये जाते थे ।" उसका नाम अदब के साथ लिया जाता था ।,परंतु लोगों में किसी विषय पर बहुत दिनों तक आलोचना करते रहने की आदत नहीं होती ।,उसका नाम अदब के साथ लिया जाता था । मैंने दिनेश की माँ से कहा --मैं यहाँ यूनिवर्सिटी में पढ़ती हैं ।,परदा ढंका रह गया ।,"मैंने दिनेश की माँ से कहा, 'मैं यहाँ यूनिवर्सिटी में पढ़ती हूँ ।" दर्माजी--इसलिए कि एक भले घर की क्ली को इस दशा में देखना में सहन नहीं कर सकता ।,अबुलवफा - क्यों ?,शर्माजी -- इसलिए कि एक भले घर की स्त्री को इस दशा में देखना मैं सहन नहीं कर सकता । "दई हफ्तों के षाद, छावनी रेलवे स्टेशन से एक मौल पश्चिम को ओर सड़ पर कुछ हडिल्याँ मिलीं ।",उसने आत्म-बलिदान से इस कष्ट को निवारण करने का दृढ़ संकल्प कर लिया था ।,"कई हफ्तों के बाद, छावनी रेलवे स्टेशन से एक मील पश्चिम की ओर सड़क पर कुछ हड्डियाँ मिलीं ।" मेरी आत्मा में इतवी शक्ति कहाँ से आ गईं; नहीं कद सकती ।,"नहीं, उन ओठों पर एक स्फूर्ति से भरी हुई मनोहारिणी, ओजस्वी मुस्कान थी ।","मेरी आत्मा में इतनी शक्ति कहाँ से आ गयी, नहीं कह सकती ।" पण्डितजों मे उप्रमें एक ठोकर और ऊूगाई कि बचा-खुचा तेल आओ बह घजाय ।,इस वक्त सरकार की नजर में तुम बेतरह खटक रहे हो ।,पण्डितजी ने उसमें एक ठोकर और लगायी कि बचा खुचा तेल भी बह जाय । में कई बार सख्त बीमार पड़ा हूँ ।,तरकारी काटने में उसे बड़ा मजा आता था ।,मैं कई बार सख्त बीमार पड़ा हूँ । किसी ज़माने मे यह उसका पेशा रहा होगा ।,पतुरिया के घर में ब्याह न करेंगे ।,किसी जमाने में यह उसका पेशा रहा होगा । "और में कहता हूँ, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नहीं छेते ।",मेरा मौन कह देता था कि मुझे अपना अपराध स्वीकार है और भाई साहब के लिए इसके सिवा और कोई इलाज न था कि स्नेह और रोष से मिले हुए शब्दों में मेरा सत्कार करें ।,"और मैं कहता हूँ, तुम कितने घोंघा हो कि मुझे देखकर भी सबक नहीं लेते ।" यह ठेकेदारी का काम बड़े झगड़े का है।,"आज प्रातःकाल आने वाला था, लेकिन कुछ ऐसा झंझट आ पड़ा कि अवकाश ही न मिला ।",यह ठेकदारी का काम बड़े झगड़े का है । वहेंबवढे पहलवान उमा छोहा मान गये थे ।,सुनहले फ़र्श पर इठलाता फिरता था और निश्चिंतता उस सुनहले महल में ताने आलाप रही थी ।,बड़े-बड़े पहलवान उसका लोहा मान गए थे । अमर ने कुर्त के वटन खोलते हुए कद्दा--मेरा तो आज वहाँ बिलकुछ जी न लगा,सुखदा हाथ में पंखिया लिए एक मोढ़े पर बैठी हुई थी,अमर ने कुर्ते के बटन खोलते हुए कहा-मेरा तो आज वहां बिलकुल जी न लगा भाइयो बहनो भागो मत तुम्हारे प्राणों का बलिदान पाकर हो ठाकुरजी तुमसे प्रपन्न होंगे,अछूतों पर यह अत्याचार देखकर उसका खून भी खौल उठा था,भाइयो बहनो भागो मत तुम्हारे प्राणों का बलिदान पाकर ही ठाकुरजी तुमसे प्रसन्न होंगे थ उसी दिन से स्यप्रकाश को यह चिंता हुई कि ज्ञान के लिए कोई उपद्वाद पेजूँ ।,मैं अकेला नहीं हूँ कोई मुझे भी चाहता है-मुझे भी याद करता है ।,उसी दिन से सत्यप्रकाश को यह चिंता हुई कि ज्ञान के लिए कोई उपहार भेजूँ । तेज़ बर्फीली हवा चल रद्दी थी ।,"प्रसाद सन्ध्या समय आता , चाय-वाय पीकर फिर उड़ जाता , तो ग्यारह-बारह बजे के पहले न लौटता ।",तेज बर्फीली हवा चल रही थी । "” अगर में जानता आपकी ऐसी नीयत है, तो में भी बीबो-बचो के नाम से टिकट ले सकता था ।","अगर मेरे लड़के , मेरी बीवी या मेरे नाम लॉटरी निकली , तो आपका उससे कोई सम्बन्ध न होगा , उसी तरह जैसे आपके नाम लॉटरी निकले , तो मुझसे , मेरी बीवी से या मेरे लड़के से उससे कोई सम्बन्ध न होगा ।","अगर मैं जानता कि आपकी ऐसी नीयत है , तो मैं भी बीवी-बच्चों के नाम से टिकट ले सकता था ।" "न, मे असो दख कद बह मक्खों ने निगलूगा ।",ज्ञान०-ऐसे घर को अबसे बहुत पहले चौपट हो जाना चाहिए था ।,न मैं आँखों देख कर यह मक्खी न निगलूँगा । गोौण रुप से आप हो उस फछ के भी अधिकारों दंगे ।,आपसे उसकी प्रशंसा करनी व्यर्थ है ।,गौण रूप से आप ही उस फल के भी अधिकारी होंगे । शायद हजरत समझे होंगे यह लोग तो दोध्त दो दी गये अब क्या फ़िक,बंगले पर पहुंचकर उसने कपड़े बदले नाश्ता किया और आठ बजे गजनवी के पास जा पहुँचा,शायद हजरत समझे होंगे यह लोग तो दोस्त हो ही गए अब क्या फिक्र वह घृम-घुमकर शर्माजी को वदनाम करने लगा ।,"उधर गजाधर को ज्योंही मालूम हुआ कि सुमन पद्मसिंह के घर गई है, उसका सन्देह पूरा हो गया ।",वह घूम-घूमकर शर्माजी को बदनाम करने लगा । बच्चे का माया दूरर दसा ।,ऐसा जान पड़ा मानो पानी में परछाईं हो ।,बच्चे का माथा छू कर देखा । तुरन्त पोषा खोलकर ए% कविता छुसाने लगी ।,उसने अनुमति की प्रतीक्षा न की ।,तुरन्त पोथा खोलकर एक कविता सुनाने लगी । "कही ठाछुस्जी कुपित होकः गाँव का सबनाश कर दे, तो ?","चिढ़कर बोले, 'क्यों रे, तू अभी तक खड़ी है ! ' सुखिया ने थाली जमीन पर रख दी और एक हाथ फैला कर भिक्षा-प्रार्थना करती हुई बोली, 'महाराज जी, मैं अभागिनी हूँ ।","कहीं ठाकुर जी कुपित हो कर गाँव का सर्वनाश कर दें, तो ?" "तुम मुझसे क्यों प्रेम करते हो ! तुम्हें मेरी कसम है, सच बताना ।","मैं समझ गई, तुम मुझसे मुहब्बत नहीं करते ।","तुम मुझसे क्यों प्रेम करते हो! तुम्हें मेरी कसम है, सच बताना ।" उसे कौन चिंता है ?,इसी कारण वह अपने घर नहीं जाना चाहतीं ।,उसे कौन चिंता है ? यहीं कहीं दंगे कद्दो तो तलाश करूँ,नहीं मुझे वह हष्ट-पुष्ट दीखता था,यहीं कहीं होंगे कहो तो तलाश करूँ मुझे ऐसा मालूम होता है कि उस वक्त में छिल्च जठ॒ओों से घिरा हुआ था और मेरी सारी शक्तियाँ अपनी आत्मरक्षा मे ही लगी रहती थीं ।,सम्पत्ति की अट्टालिका तक पहुँचने में दूसरों की जिंदगी ही ज़ीनों का काम देती है ।,मुझे ऐसा मालूम होता है कि उस वक्त मैं हिंस्त्र जंतुओं से घिरा हुआ था और मेरी सारी शक्तियाँ अपनी आत्मरक्षा में ही लगी रहती थीं । "दर्मा--संभव है, वही हो ।","विट्ठलदास -- अरे, वही तो नहीं है, जो कभी-कभी शाम को चौक में घूमने निकला करता है ?","शर्मा -- सम्भव है, वही हो ।" इत्तना प्रस्वा करने पर भी करोड़ों रुपये बेंक में जमा हैं,हजार-दो हजार यात्री नित्य आते हैं,इतना खरचा करने पर भी करोड़ों रुपये बैंक में जमा हैं हर 'तो में तुम्हारा इस्तीफा मजूर करता हें ।,"गंगू ने शहीदों के-से आवेश से कहा, ‘मैं तो समझता हूँ, मेरी जिन्दगी बन जायगी बाबूजी, आगे भगवान् की मर्जी !’ मैंने जोर देकर पूछा, ‘तो तुमने तय कर लिया है ?",तो मैं तुम्हारा इस्तीफा मंजूर करता हूँ । मुन्शीजी ने जब उसके पगद्टे को खोलना शुरू किया तो उसने कनौतियाँ खडी कीं और अमिमान-सूचक भाव से फिर हरी-हरी घास खाने लगा ।,"और अगर उसकी यह जिद आप लोगों ने तोड़ दी, तो मैं आपका बड़ा एहसान मानूँगा ।",मुंशी जी ने जब पगहे को खोलना शुरू किया तो उसने कनौतियाँ खड़ी कीं और अभिमानसूचक भाव से हरी-हरी घास खाने लगा । अपने शरीर की मिट्टी तक उसकी भेंट कर दी ।,रूपा उस समय कार्यभार से उद्विग्न हो रही थी ।,अपने शरीर की मिट्टी तक उसको भेंट कर दी । सन्ध्या समय कृप्णचन्द्र ने उमानाथ से पूछा--शान्ता का विवाह तो तुमने ठीक किया है न !,अनुचित क्रोध ने अकर्मण्यता की निद्रा भंग कर दी ।,संध्या समय कृष्णचंद्र ने उमानाथ से पूछा -- शांता का विवाह तो तुम ने ठीक किया है न ? "चौधरी उसमे शरीक हुए, भगत अलग रहे ।",निदान उसे लज्जा त्यागनी पड़ी ।,चौधरी उसमें शरीक हुए भगत अलग रहे । तुमसे वह एक सलाह करेंगी ।,वह स्थूल भी हो चली थी ।,तुमसे वह एक सलाह करेंगी । दोनों इस प्रसंग को इस समय बंद कर देना चाहते थे ।,"यह पुलिस का काम है, पुलिस जाने ।",दोनों इस प्रसंग को इस समय बंद कर देना चाहते थे । किन्तु आज श्रेमालाप में भी उसका जी न लगता था।,संध्या का समय उसके लिए निकाल रखा था ।,किंतु आज प्रेमालाप में भी उस का जी न लगता था । चौधरी बेखबर सोये थे |,"हरनाथ उसी वक्त क्रोध में भरा हुआ उठा, और दो हजार रुपये ला कर चौधरी के सामने जोर से पटक दिये ।",चौधरी बेखबर सोये थे । आज उन्हें अवायास लखनऊ में देखकर मुझे आश्चर्य हुआ ।,पेशा तो वकालत; पर डूबे रहते हैं काव्य-चिन्तन में ।,आज उन्हें अनायास लखनऊ में देखकर मुझे आश्चर्य हुआ आप यहाँ कैसे ? इसलिए ठुम सब थोड़ी देर फे लिए. भूल जाओ कि मेरे पुत्र हो |,तुम्हारे बिछुओं के पुण्य से नहीं जीता ।,इसलिए तुम सब थोड़ी देर के लिए भूल जाओ कि मेरे पुत्र हो । "कुछ टैक्स के बहाने से, कुछ रोजगार के बहाने से, कुछ किसी बहाने से हजम कर लेती है ।","तुमने इस लोकोक्ति को प्रमाणित कर दिया कि 'बनिया मारे जान, चोर मारे अनजान ।","कुछ टैक्स के बहाने से, कुछ रोजगार के बहाने से, कुछ किसी बहाने से हजम कर लेती है ।" आखिर यह “हे किस दिन काम भायेगो |,रहमान की बूढ़ी माता भी हज के लिए तैयार हुई ।,आखिर यह देह किस दिन काम आयेगी । भ्रव भला बताओ तो क्या प्रबन्ध हो सकता है ?,अभी नारायण की दया से किसी का मुहताज नहीं हूँँ ।,अब भला बताओ तो क्या प्रबन्ध हो सकता है ? यर-थर काँपने लगा ।,"मैंने जा कर उनके कान में कहा- गरीब अपने घर से यह सौगात लाया है, कुछ आप लीजिए, कुछ हम लोगों को बाँट दीजिए ।",थर-थर काँपने लगा । तव उन निन्द्य स्थानों की ओर सैर करने को जाते हुए हमें संकोच होगा ।,इसलिए आवश्यक है कि इन विष भरी नागिनों को आबादी से दूर किसी पृथक स्थान में रखा जाए ।,तब उन निद्य स्थानों की ओर सेर करने को जाते हुए हमें संकोच होगा । मैं अभी कालिज से निकला हुआ पुस्तकों का पुतला हूँ ।,वेतन एक हजार मासिक ! मैं उछल पड़ा ।,मैं अभी कालेज से निकला हुआ पुस्तकों का पुतला हूँ । मैंने तो पेशगी रुपये इसलिए दे दिये कि सुनार खुश होकर जल्दी से बना देगा ।,मुझे क्या जरूरत थी कि अपनी जान संकट में डालता ।,मैंने तो पेशगी रूपये इसलिए दे दिए कि सुनार खुश होकर जल्दी से बना देगा । बोला-आपकी भी यही इच्छा है ?,उसे अपने कानों पर विश्वास न हुआ ।,बोला-आपकी भी यही इच्छा है ? वह उसके धोखे में नहीं आना चाहते थे ।,मैं इतनी उदार नहीं ।,वह उसके धोखे में नहीं आना चाहते थे । "बोले--कहीं सेंव वहीं, कोई ताला वहीँ ह॒आ, किसी दरवाजे की चूल नहीं उतरी ।",नौकर तो उनके तीनों पुराने हैं ।,"बोले - क़हीं सेंध नहीं , कोई ताला नहीं टूटा, किसी दरवाजे की चूल नहीं उतरी ।" वा उनके दर्शन फिर होगे ” इस आशा से प्रभा का मुखसंडछ विकर्तित हो गया ।,वह बिगड़ कर बोली-यह बिलकुल झूठ है ।,क्या उनके दर्शन फिर होंगे इस आशा से प्रभा का मुखमंडल विकसित हो गया । "इसी तरह में कहीं बिना कहे-सुने चली जाती, तो वह मेरे साथ किस तरह पेश आते ?","इसीलिए तो कि वह स्वाधीन हैं, आज़ाद हैं,किसी का दिया नहीं खाते ।","इसी तरह मैं कहीं बिना कहे-सुने चली जाती, तो वह मेरे साथ किस तरह पेश आते ?" "संभव हैं. क्रि यह कार्य मुझसे न हो सके, अतः मुझे तो क्षमा ही कर दिया जाय ।",दुनिया के व्यवहार का कानून दूसरा है ।,संभव है कि यह कार्य मुझसे न हो सके अतः मुझे तो क्षमा ही कर दिया जाय । कुलीना अपने साथ विश्वास का वरदान लिये आतो है ।,शापूरजी को प्रशंसा-सूचक आँखों से देखकर बोले तो हम और आप दोनों एक विचार के हैं ।,कुलीना अपने साथ विश्वास का वरदान लिये आती है । "े दूसरी प्लंका--जो विद्या घप्ंंडी बना दे, उससे मूरख ही अच्छा, यही नयो विद्या पढ़ कर तो लोग सुट-यूट, घडी-छडी, हैट-कैट लगाने लगते है भौर अपते' शौक के पीछे देश का धत विदेशियों की जेब में भरते है ।",हम अपनी खेती-बारी ही में मगन हैं किसी के गुलाम तो नहीं ।,दूसरी शंका-जो विद्या घमंडी बना दे उससे मूरख ही अच्छा यही नयी विद्या पढ़कर तो लोग सूट-बूट घड़ी-छड़ी हैट-कैट लगाने लगते हैं और अपने शौक के पीछे देश का धन विदेशियों के जेब में भरते हैं । "दोक्षा १८७ क्या जानता था कि विधना मेरे लिए कोई दूसरा हो षड़यम्त्र रच रहा है, झुछे विष पिलाने दी तेयारियाँ कर रद्दा है ।",तुम पर क्या मुसीबत पड़ी हुई है ?,"क्या जानता था कि विधना मेरे लिए कोई दूसरा ही षड्यंत्र रच रहा है, विष पिलाने की तैयारियाँ कर रहा है ।" उस्ते चियोड़ रहा था ।,एकाएक एक झोंका मेहँदी के फूलों की खूशबू लिए हुए आया ।,उसे चिंचोड़ रहा था । उसकी जिम अमृंत्य वस्तु का अपहरण किया गया था) उसे कोने दिला सकता था १ दुष्टों को भार डालो इससे तुम्हारी न्‍्याय-चुद्धि को सन्तोष होगा उसको तो जो चीज़ गईं वह गईं,इसके पहले कि वह तीसरी गोली चलाए उस पर डंडों की वर्षा होने लगी और एक क्षण में वह भी आहत होकर गिर पड़ा,उसकी जिस अमूल्य वस्तु का अपहरण किया गया था उसे कौन दिला सकता था- दुष्टों को मार डालो इससे तुम्हारी न्याय-बुध्दि को संतोष होगा उसकी तो जो चीज गई वह गई हमारा उद्धार तो भगवान्‌ ही करेंगे ।,इस मिल से इस साल दस लाख का फायदा हुआ है ।,हमारा उद्धार तो भगवान् ही करेंगे । वह मौहिनी-मूरति फिर देखने को न मिलेगी ।,आज यह प्रेमाभिनय समाप्त हो जाएगा ।,वह मोहिनी मूर्ति फिर देखने को न मिलेगी । बहुत देर तक मुंशीजी उसे समझाते रहे पर वह जाने के लिए राजी न हुआ,प्रयाग जाने से इन्कार कर दिया,बहुत देर तक मुंशीजी उसे समझाते रहे पर वह जाने के लिए राजी न हुआ अफ़सरों की सलाह हुई कि इन्हें छोड़ना न चाहिए ।,"चलो भैया, बुढिया कब से खड़ी है ।",अफसरों की सलाह हुई कि इन्हें छोड़ना न चाहिए । से०--गजब नैने कर दिया या तुमने द०--मैने तो सब सामान छा कर रुप दिया था |,तुरंत भ्रम हुआ कहीं अबकी फिर वही दशा न हो ।,से०-गजब मैंने कर दिया या तुमने द०-मैंने तो सब सामान ला कर रख दिया था । लोग कीति पर जान देते हैं ।,कभी-कभी पुलिस के आदमी भी उसे रानी की टोह में दत्तचित्त देख पड़ते ।,लोग आशीर्वाद देते हैं । "गोविन्दी मव कुछ समझती थी , पर संकोच के मारे कुछ न कह सकती थी |","पर ज्ञानचंद्र के मुख में गोविंदी के प्रति एक भी कटु, अमृदु शब्द न था ।",गोविंदी सब कुछ समझती थी; पर संकोच के मारे कुछ न कह सकती थी । "हरनाथ उसी वक्त क्रोध में भरा हुआ उठा, और दो हजार रुपये लाकर चौधरी के सामने जार से पटक दिये ।",हरनाथ ने ज्यादा बतबढ़ाव न किया ।,"हरनाथ उसी वक्त क्रोध में भरा हुआ उठा, और दो हजार रुपये ला कर चौधरी के सामने जोर से पटक दिये ।" "अव्दुल्लतीफ---वल्लाह, हम आपके नजर इन्तखाव के कायल हैं।",अबुलवफा -- आप की महराजिन 'सुमनबाई' हो गईं ।,"अब्दुल्लतीफ -- वल्लाह, हम आप के नजर इंतखाब के कायल हैं ।" "और तो और, लगान के लिए भी दुनके सिर पर सवार रहने की जरूरत ४ ।","सीधे बात न सुनेंगे, पर कड़ाई से जो काम चाहे करा लो ।","और तो और, लगान के लिए भी उनके सिर पर सवार रहने की जरूरत है ।" दोनों दिन बाजार से पूरियाँ लाया ।,गजाधर सुमन से कुछ न कह सकता था ।,दोनों दिन बाजार से पूरियाँ लाया । "हाते के बाहर निकलकर देवीदीन ने जालपा को सान्त्वना देने के इरादे से हा -- पुलिस ने जिसे एक बार बूटी सुंधा दी, उस पर किसी दूसरी चीज़ का असर नहीं हो सकता ।","देवीदीन उसे उतरते देखकर बरामदे में चला आया और दया से सने हुए स्वर में बोला, ' क्या घर चलती हो, बहूजी ?","' हाते के बाहर निकलकर देवीदीन ने जालपा को सांत्वना देने के इरादे से कहा, ' पुलिस ने जिसे एक बार बूटी सुंघा दी, उस पर किसी दूसरी चीज़ का असर नहीं हो सकता ।" जो मसंद्रेरें थे उन्हें जूते उछालने को सूछी,आनंद महीनों चिंता के बंधनों में पड़े रहने के बाद आज जो छूटा तो छूटे हुए बछड़े की भांति कुलांचें मारने लगा,जो मसखरे थे उन्हें जूते उछालने की सूझी वह आप ही घर छोड़ रहे हैं ।,चार की जगह पचास आदमी लिपट गये और गाड़ी को ढकेलने लगे ।,वह आप ही घर छोड़ रहे हैं । मेरी दोस्ती भी तुम्हें पुलिस के पंजे से न बचा सकेगी |,तुम्हारे साथ तो फिर भी बडी नर्मी कर रहा हूँ ।,मेरी दोस्ती भी तुम्हें पुलिस के पंजे से न बचा सकेगी । "( ६ ) लेकिन अब अनूपा वह भनूपा न थी, जिसने १४ वर्ष पहले वासुदेव को पतिभाव पे देखा था, भब उस भाव का स्थान मातृन्भाव ने ले लिपा था |","जाओ, सबसे कह देना शास्त्रीजी ने व्रत तोड़ दिया ।","( ६ ) लेकिन अब अनूपा वह अनूपा न थी, जिसने १४ वर्ष पहले वासुदेव को पतिभाव से देखा था, अब उस भाव का स्थान मातृभाव ने ले लिया था ।" अब बिता “किसी भपराध के माँ डॉट बतातो ।,नाड़ी तीव्र-गति से कूद रही थी ।,अब बिना किसी अपराध के माँ डाँट बताती । अ्रगर मेरं पूरे रुपये न मिलेंगे तो राज से ३॥) सैंकड़े का ब्याज लग्रेगा ।,"' विप्र -'लेकिन यह तो ६०) ही हैं ! ' शंकर -- ' हाँ महाराज, इतने अभी ले लीजिए, बाकी मैं दो-तीन महीने में दे दूँगा, मुझे उरिन कर दीजिए ।",अगर मेरे पूरे रुपये न मिलेंगे तो आज से ३) सैकड़े का ब्याज लगेगा । किसी- न-फिसी तरह स्टेशन तक पहुँचा दी देगा |,"चार बजे मुंशी ने आ कर मीर साहब से कहा- यार अपना घोड़ा दे दो, वर को स्टेशन तक पहुँचा दें ।",किसी न किसी तरह स्टेशन तक पहुँचा ही देगा । यहाँ तक कि वह हिन्दुस्तानियों से वहुत कम मिलता था ।,आप शायद समझते हों कि उन दिनों को याद करके उसे दु:ख होता होगा ।,यहाँ तक कि वह हिन्दुस्तानियों से बहुत कम मिलता था । साधु के सुमनोहर सधुर अलाप से पत्ती भग्म हो गये ।,उस रमणीय स्थान में वह अपना सुर अलापने लगा ।,साधु के सुमनोहर मधुर अलाप से पक्षी मग्न हो गए । "नसीमा का तौक निकालते थे, और रोते थे ।","ऐसा ही है, तो नसीमा का तौक उतारकर कहीं गिरो रख दो, और तो मेरे किए कुछ नहीं हो सकता ।","नसीमा का तौक निकालते थे, और रोते थे ।" चार्तों तरफ पलौस के कर्मचारी नज़र आते थे ।,सत्कर्म के लिए संसार में स्थान नहीं ।,चारों तरफ पुलिस के कर्मचारी नजर आते थे । विश्वास न हुआ |,"आठ बजे रात को जब घर के भीतर जाने लगे, तो थैली को घर ले जाने के लिए बक्स से निकाला, थैली कुछ हलकी जान पड़ी, तत्काल उसे दवाइयों के तराजू पर तौला, होश उड़ गये ।",विश्वास न हुआ । मैं उसे श्रपने फ्ोपड़े में लाया ओर अपनी रामकहानी कद् सुनाई ।,' मैं नहीं कह सकता कि सूर्यप्रकाश की उन्नति देखकर मुझे कितना आश्चर्यमय आनंद हुआ ।,"मैं उसे अपने झोंपड़े में लाया और अपनी रामकहा,नी कह सुनाई ।" थकी-माँदी चली आ रही थीं ।,देश का उद्धार ऐसे विलासियों के हाथों नहीं हो सकता ।,थकी माँदी चली आ रही थीं । हार को लजा तो पी जाने की ही वस्तु है,वहाँ मार-पीट हो रही थी,हार की लज्जा तो पी जाने की ही वस्तु है पहरेदारों पर मार पड़ने लगी ।,मेरे पीछे मेरे बच्चे चैन उड़ायेंगे ।,पहरेदारों पर मार पड़ने लगी । तो यहाँ मेरे घर में रानी बनके निवाह्द न होगा ।,उसको पेट के अन्दर डाल दिया जाना बेतुकी-सी बात होने पर भी कुछ नयापन रखती है ।,तो यहाँ मेरे घर में रानी बन के निबाह न होगा । "सबको खिलाया, मेरी वात तक न पूछी |","मुझे घसीटा, पटका ।","सबको खिलाया, मेरी बात तक न पूछी ।" उस अठन्नी को इेमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए ; ऊेकित कल ग्वालन सिर पर सवार हो गई तो क्या करती ।,अभागिन अमीना अपनी कोठरी में बैठी रो रही है ।,उस अठन्नी को ईमान की तरह बचाती चली आती थी इसी ईद के लिए लेकिन कल ग्वालन सिर पर सवार हो गयी तो क्या करती ? ब्यलों में पहुँचा देती हूँ,मुन्नी ने पूछा-क्या सोचती हो काकी- सोचती हूँ जरा और अंधेरा हो जाय तो जाऊँ,चलो मैं पहुँचा देती हूँ कई जगह यैलियों मिलीं |,चौबे जी इस प्रार्थना को अस्वीकार न कर सके ।,कई जगह थैलियाँ मिलीं । विद्वान का अपमान करके. विद्वान क्या पावेमा १,"एक पण्डितजी अगर अँधेरे में ठोकर खाकर गिर पड़ें, तो दूसरे पण्डितजी उन्हें उठाने के बदले दो ठोकरें और लगायेंगे कि वह फिर उठ ही न सकें ।",विद्वान् का अपमान करके विद्वान् क्या पायेगा ? इतने में विनय ने एक गद्देदार कुर्सी लाकर सोफी के लिए रख दी ।,प्रभु सेवक-पूरे योगी हैं ।,इतने में विनय ने एक गद्देदार कुर्सी लाकर सोफी के लिए रख दी । कई बार इस विपय पर अमरनाथ से चातचीत कर चुके थे,गूदड़ चौधरी गहरे विचार में डूबे खड़े थे,कई बार इस विषय पर अमरकान्त से बातचीत कर चुके थे वागीख़री ने मुस्किराकर कहा-- आप तो गाली ढे रही हैं ।,"फिर उसने निर्दय कटाक्ष करके कहा-मेरे विचार में तो वह तब बीमार थे, अब उसे पा गये ।",वागेश्वरी ने मुस्कुराकर कहा-आप तो गाली दे रहीं हैं । मेरे लिए वहाँ क्या रक्‍्खा है ।,"' जालपा उसका हाथ पकड़े हुए ऊपर अपने कमरे में ले गई और उसके गले में हाथ डालकर बोली, 'कसम खाओ कि मुझे छोड़कर न जाओगी ।",मेरे लिए वहाँ क्या रक्खा है । "ज्यों हो तुम सौढ़ी से उतरे, मेरी दृष्टि डिविया कौ तरफ गयी, किंतु वह छापता थी ।","हरदौल ने कुछ ध्यान न दिया, वह वर्ष भर से सोने के थाल में खाते-खाते उसका आदी हो गया था, पर जुझार सिंह तिलमिला गए ।",ज्यों ही तुम सीढ़ी से उतरे मेरी दृष्टि डिबिया की तरफ गयी किंतु वह लापता थी । खुशामद से मुझे घुणा है,मैं तो आपके सामने किसी रानी-महारानी की हकीकत नहीं समझता,खुशामद से मुझे घृणा है सलाह नहीं करना है उनसे कह देना है कि रुपये उधार लेने में अपनी बर्बादी के सिवा ओर कुछ नहीं,धनिया के हाथों में कड़े हैं वह भी गिलट के,सलाह नहीं करना है उनसे कह देना है कि रुपए उधार लेने में अपने बर्बादी के सिवा और कुछ नहीं "में तो चाहता हूँ झि सुरारीलाल को जवाब दे दिपा जाय ओर छोई ऐपा चर खोजा जाय, नो थोड़े में राज़ो हो जाय ।","वजीफे उन्हें मिलते हैं, जिनके पास सिफारिशें होती हैं, मुझे कौन पूछता है ।","मैं तो चाहता हूँ कि मुरारीलाल को जवाब दे दिया जाये और कोई ऐसा घर खोजा जाये, जो थोड़े में राजी हो जाये ।" "अचानक उसके कानों में प्रभु सेवक की आवाज आई, जो बड़े वेग से फिटन दौड़ाए चले आते थे ।",कोई प्रबल आकर्षण उसे खींचे लिए जाता था ।,"अचानक उसके कानों में प्रभु सेवक की आवाज आई, जो बड़े वेग से फिटन दौड़ाए चले आते थे ।" उन्हें क्या हो गया है ?,"कभी हँसते दिखाई देते, जीतन उनके लिए रोज दवा क्यों लाता है ।",उन्हें क्या हो गया है ? राह चलते तो किसी को कोई नहीं मारता ।,"मैं इसे स्वच्छंदता नहीं कहती, यह निर्लज्जता है ।",राह चलते तो किसी को कोई नहीं मारता । मुन्शी--देखुँगा तुम्दारी बहादुरी भी ।,"कई आदमी उसके ड्योढे़ दाम देते थे, पर रामटहल ने न बेची ।",मुंशी- देखूँगा तुम्हारी बहादुरी भी । श्रन्त में पद्मासिह उठे ।,उनके पानी के सामने दूसरों का शरबत फीका पड़ जाता था ।,अन्त में पद्मसिंह उठे । उसने फिर चोट की,लाखों मनुष्य जमा थे,उसने फिर चोट की महाराजों को कमी नहीं है ।,आपको खूब सैर कराया करूँगा ।,महाराजों की कमी नहीं है । सुमन ने खिड़की से अआँककर देखा ।,"बाजारों की दुकानें बन्द थी, लेकिन रास्ता चल रहा था ।",सुमन ने खिड़की से झाँक कर देखा । "अब वह॒ किसी युक्ति की नवीनता पर एकाएक मोहित न हो जाता था, वरन्‌ प्रमाणों से सत्यासत्य का निर्णय करने को चेष्टा करता था ।",दोनों पक्षों की बातें महीनों सुनने ओर उन पर विचार करने से उसमें राय स्थिर करने की योग्यता आने लगी ।,"अब वह किसी युक्ति की नवीनता पर एकाएक मोहित न हो जाता था, बरन प्रमाणों से सत्यअसत्य का निर्णय करने की चेष्टा करता था ।" "केश गूँथकर उसने माथे पर अलसी का लुआब लगाया, जिसमें बाल न बिखरने पायें ।","कुछ रुपये डाक्टर के, कुछ दरजी के, कुछ बनियों के ।","केश गूँथकर उसने माथे पर अलसी का लुआब लगाया, जिसमें बाल न बिखरने पायें ।" मुझे अब यहीं रहना होगा ।,अब तुमने दिल मज़बूत कर दिया ।,मुझे अब यहीं रहना होगा । उनकी आत्मा निर्बल हो गई थी,वह उमानाथ से कितनी बातें ठकुरसुहाती के लिए करते ।,उनकी आत्मा निर्बल हो गई थी । वद्दी माल जो तुमने अपने घमंड में लौटा दिया तुम्दारे किसी दूसरे भाई ने दो-चार रुपए कम-बेश देकर छे लिया होगा,मैं ऐसी आत्मा चाहता हूँ जो अवसर देखकर हानि-लाभ का विचार करके काम करे,वही माल जो तुमने अपने घमंड में लौटा दिया तुम्हारे किसी दूसरे भाई ने दो-चार रुपये कम-बेश देकर ले लिया होगा कौन पतियाएगा ?,"जब कभी काम पड़ा है, उसकी मदद की है ।",कौन पतियाएगा ? "वह बहुत ही सीधा, बड़ा आज्ञाकारी, अपने काम में चौकऋस रहनेवाला, घुश् कियाँ खाकर चुप रद्द जानेवाला, यथानाम तथा गुण; मनुष्य है ।","' सूर्यप्रकाश ने अविचलित भाव से कहा, 'आप मेरे पास होने की चिन्ता न करें ।","वह बहुत ही सीधा, बड़ा आज्ञाकारी, अपने काम में चौकस रहने वाला, घुड़कियाँ खाकर चुप रह जानेवाला यथा नाम तथा गुण वाला मनुष्य है ।" रमा रोज़ प्रातः दफ्तर जाता और चिराग जले लौटता ।,"रमा ने कहा, लौटकर चुंगी लूंगा ।",रमा रोज़ प्रातः दफ्तर जाता और चिराग जले लौटता । उसने आहिस्ता से छद्दा-+ मजूर है ।,"तैमूर ने दीन आग्रह के स्वर में कहा- नहीं मेरे प्यारे दोस्त , मेरी यह इल्तजा माननी पड़ेगी ।",उसने आहिस्ता से कहा- मंजूर है । "'यूरोप जग कोई ट्वूसरा मनुष्य जो महाँ की सम्पता से परिचित न हो, इन सत्कारो से ऊब जाता ।",यदि इसी भाँति मैं उसका उत्तर देता तो शायद वह मेरी धृष्टता होती और शेरसिंह के तेवर बदल जाते ।,यूरोप का कोई दूसरा मनुष्य जो यहाँ की सभ्यता से परिचित न हो इन सत्कारों से ऊब जाता । वह मातृस्नेह जो पति की कृपणता से भीतर दी भीतर तड़पकर रह जाता था इस समय जैसे खोल उठा |,"अन्तिम समय जब संसार की असारता कठोर सत्य बनकर आँखों के सामने खड़ी हो जाती है, तो जो कुछ न किया, उसका खेद और जो कुछ किया, उस पर पश्चात्ताप, मन को उदार और निष्कपट बना देता है ।","वह मातृस्नेह, जो पति की कृपणता से भीतर-ही-भीतर तड़पकर रह जाता था, इस समय जैसे खौल उठा ।" ऐसे आत्म-सम्मान वाले देवता उसे अपने जीवन में शायद कभी मिले ही न थे ।,ब्राह्मणों को दान देने का पुण्य कुछ और ही है ।,ऐसे आत्म-सम्मान वाले देवता उसे अपने जीवन में शायद कभी मिले ही न थे । सुखदा बशामदे- में बेठी हुई आँगन में उठते हुए बुलबुलों को सेर कर रही थी,अब उनकी बहू की परीक्षा लेनी है,सुखदा बरामदे में बैठी हुई आंगन में उठते हुए बुलबुलों की सैर कर रही थी उसने कत्तर-व्योत से उसके आधे ही में सारा प्रबन्ध कर दिया था,गृहस्थी की सैकड़ों ही चीजें जमा करनी थीं,उसने कतरब्योंत से उसके आधो ही में सारा प्रबंध कर दिया "लेकिन, मेंने सोचा--जब सुन्ती दी न रहो, तो उसको लाश में क्‍या रखा है |",मेरे जी में भी आया कि चलकर सुन्नी के अन्तिम दर्शन कर लूँ ।,"लेकिन मैंने सोचा, जब सुन्नी ही न रही, तो उसकी लाश में क्या रखा है! न गयी ।" जो विवाह को धर्म का बन्धने नहीं समझता इसे केवल वासना की तृप्ति दर का साधन सममता है वह पश्च है,वह कुछ देर कमरे में मेरी प्रतीक्षा करते रहे फिर झल्लाकर उठे और मेरा हाथ पकड़कर कमरे में ले जाना चाहा,जो विवाह को धर्म का बंधन नहीं समझता है इसे केवल वासना की तृप्ति का साधन समझता है वह पशु है शर्माजी--नौकर से पूछो ?,सुभद्रा -- घर की एक-एक अंगुल जमीन छान डाली ।,शर्माजी -- नौकरों से पूछो । उस ज़रा-से उद्गार को इतना बृहृदू रूप देवा उसके लिए इतर्न क्रवानियाँ करना सारो दुनिया में बदवाम होना और चारों भोर एक तहलका मच देना उसे पागलपन मालूम होता था,जिस सेवा त्याग दया आत्म-शुध्दि पर हिन्दू-धर्म की बुनियाद कायम है उसी पर इस्लाम की बुनियाद भी कायम है,जरा-से उद्गार को इतना वृहद् रूप देना उसके लिए इतनी कुर्बानियाँ करना सारी दुनिया में बदनाम होना और चारों ओर एक तहलका मचा देना उसे पागलपन मालूम होता था "वह चारपाई पर छेटी हुईं थी, और माधवी समीप बैदी बच्चे के लिए दूध गरम कर रद्दी थी ।",मिस्टर बागची शिशु के झूले के पास बैठे हुए थे ।,वहीं चारपाई पर लेटी हुई थी और माधवी समीप बैठी बच्चे के लिए दूध गरम कर रही थी । यही खौफ़ मुझे था कि कहीं जालपा भाँप न जाय ; लेकिन मैंने दांत ख़ूब साफ़ कर लिये थे ।,फिर भी सब मेरी तरफ आँखें फाड़- फाड़कर देखते हैं ।,"यही खौफ मुझे था कि कहीं जालपा भांप न जाय, लेकिन मैंने दांत ख़ूब साफ कर लिए थे ।" अगर मांस खाना अच्छा समझते हो तो खुलकर खाओ,मैं तो केवल इतना जानता हूँ हम या तो साम्यवादी हैं या नहीं हैं,अगर माँस खाना अच्छा समझते हो तो खुल कर खाओ "कौन जाने, कब यही अवरोध एक क्षण और बढ़कर जीवन का अन्त कर दे ।",कभी-कभी तो ऊपर की सांस ऊपर ही रह जाती थी ।,"कौन जाने, कब यही अवरोध एक क्षण और बढ़कर जीवन का अंत कर दे ।" "जो लोग पहली बार देखेंगे, उन्हें दो-एक दिन सोचने में लग जायेंगे ।",यह नक्शा इतना सरल तो नहीं है कि आसानी से हल हो जाय ।,"जो लोग पहली बार देखेंगे, उन्हें दो-एक दिन सोचने में लग जायंगे ।" समझ गए कि मुन्शीजी सावधान हैं ।,सुकराती प्रश्नों का जो क्रम उन्होंने मन में बाँध रखा था वह बिगड़ गया ।,समझ गए कि मुंशीजी सावधान है । "मैं आपको प्रस्ष रख सकती हूँ, पर आपके जीवन को उत्नत नहीं कर सकती, उसे पबित्र और यशस्षी नहीं वना सकती ।",मेरा आपसे यही अनुरोध है कि लज्जा को हाथ से न जाने दीजिए ।,"मैं आपको प्रसन्न रख सकती हूँ, पर आपके जीवन को उन्नत नहीं कर सकती, उसे पवित्र और यशस्वी नहीं बना सकती ।" दमारे शिक्षाल्यों में नरमी को घुत्तने द्वी नहीं दिया जाता,७ वीं तारीख को फीस न दो तो २१ वीं तारीख को दुगुनी फीस देनी पड़ती थी या नाम कट जाता था,हमारे शिक्षालयों में नर्मी को घुसने ही नहीं दिया जाता "में कितनी देर उसे हाथ मे लिये खड़ी रही, कह नही सकती |",मैंने पिटारी से वह पत्र निकाला ।,"मैं कितनी देर उसे हाथ में लिये खड़ी रही, कह नहीं सकती ।" एक आदमी उसे नित्य नहलाता और माड़ता-पोंछता रहता था ।,स्वरूप का अत्यन्त मनोहर और हाथ-पाँव का सुडौल था ।,एक आदमी उसे नित्य नहलाता और झाड़ता-पोंछता रहता था । इन दिनों उन्हें झितिदों ही बार करनी माता को याद भाई थो,इन सेवाओं में वह माधुर्य वह कोमलता न थी जिससे आत्मा की तृप्ति होती,इन दिनों उन्हें कितनी ही बार अपनी माता की याद आई थीं वह भोले-माले किसान यह टेखकर साहब को श्राशीवांद देने लगे ।,मैं अब उनके साथ रहा करूँगा ।,वह भोले-भाले किसान यह देखकर साहब को आशार्वाद देने लगे । खुदा उसे सच्चा रास्ता दिखाए ।,क्या गाड़ी पर न जाने से शान में फर्क आ जाएगा ?,खुदा उसे सच्चा रास्ता दिखाए । "* ब्रजविज्ञासिती आवाज सम्हाल कर बोली--वहिन, में अभागिनी हैं ।",इन्हीं क्यारियों में हमने मृगों की भाँति किलोल किये थे ।,ब्रजविलासिनी आवाज सम्हाल कर बोली-बहन मैं अभागिनी हूँ । उस पर ४० मील जाना बहुत ही कठिन और बड़े साहस का फाम है ।,"आजन्म संन्यासी के समीप रहना तो दूर, वहाँ एक रात बिताना उसको कठिन जान पड़ने लगा ।",उस पर ४० मील जाना बहुत ही कठिन और बड़े साहस का काम है । माँ ने समझा कि लड़का हँसी कर रहा है |,"यदि कोई लड़का भागता न था, तो वह मुंशी रामसेवक का सुपुत्र रामगुलाम था ।",माँ ने समझा कि लड़का हँसी कर रहा है । कैसे सच्चे उद्‌गार थे ! एक-एक शब्द अनुग्रह में दबा हुआ ।,"और इसी से आपसे बातें करने का साहस भी हुआ, नहीं तो कहाँ आप और कहाँ मैं ! ' श्रृद्धा ने अपनी आँखें नीची करके कहा, 'शायद आपको मेरा हाल मालूम नहीं ।",कैसे सच्चे उद्गार थे ! एक-एक शब्द अनुग्रह में डूबा हुआ । "जिस दिन उसे जाने में देर होती, उस दिन विपत्ति में पड़ जाता था ।","राजा और रानी, दोनों ही उसके साथ प्रेम करते हैं ।","जिस दिन उसे जाने में देर होती, उस दिन विपत्ति में पड़ जाता था ।" बड़ा ही मनोहर दृश्य है ।,पाँच रुपये मासिक वेतन पाता था ।,बड़ा ही मनोहर दृश्य है । यहाँ तक कि राजजुमारियों और ग्रजविद्ञातिगी के बोच बड़ाईनछूटाई उद गयी और वे सहेछियो की भाँति रहते छगी ।,संस्कृत-साहित्य में उसका बहुत प्रवेश था ।,यहाँ तक कि राजकुमारियों और ब्रजविलासिनी के बीच बड़ाई-छोटाई उठ गयी और वे सहेलियों की भाँति रहने लगीं । "वह कुछ देर वहाँ खड़ा ताकता रहा, फिर आगे बढ़ा ।",लेकिन एक ही क्षण में उसका आत्मसम्मान जाग उठा ।,"वह कुछ देर वहाँ खडा ताकता रहा, फिर आगे बढ़ा ।" "ज़िंदा रहना जितना हद्वी कठिन होगा, बुराहयाँ भी उत्ती मात्रा में बढ़ेगी, जितना ही आसान होगा उतनी ही छुराश्याँ कम होगी ।",मैंने तुरन्त जवाब दिया आप ड्रामा भेज दीजिए ।,"जिंदा रहना जितना ही कठिन होगा, बुराइयाँ भी उसी मात्र में बढ़ेंगी, जितना ही आसान होगा उतनी ही बुराइयाँ कम होंगी ।" "जिसकी झोर उसकी कृपा-दृष्टि हो जाती, वह अपना अहोमाग्य समझृता-- सदेव के लिए. उसका वेदास,का गुलाम वन जाता |",धनी लोग तारा के भय से थर्राने लगे ।,"जिसकी ओर उसकी कृपा-दृष्टि हो जाती, वह अपना अहौभाग्य समझता, सदैव के लिए उसका बेदाम का गुलाम बन जाता ।" "अब ठत्तक्ो समर में आ गया छि चौधरी के पास क्यों इतना घन है, और व्यों उनका इतना सम्माव है ।","जयदेव ने द्वार को इतनी जोर से झँझोड़ा कि मुझे भय हुआ, कहीं दरवाजा चौखट-बाजू समेत गिर न पड़े ।",अब उसकी समझ में आ गया कि चौधरी के पास क्यों इतना धन है और क्यों उनका इतना सम्मान है । मोटेराम--णभो इनमें इतनो सुगन्ध है ?,कल कहीं शाम को लाट साहब आयेंगे ।,मोटेराम- जभी इनमें इतनी सुगंध है । उसने थोडी-सी पकौढ़ियाँ एक तद्सरी में रसी और प्रकाश को ढठेने गई ।,"मगर जब तक सन्दूक खोलकर सब चीजें देख न ले, प्रकाश को चैन कहाँ ?",उसने थोड़ी-सी पकौड़ियाँ एक तश्तरी में रखीं और प्रकाश को देने गयी । "योगी वा रखीछा कर्ण स्वर, सिवार का मुमघुर निनाद, उस पर गीत को माय, प्रभा को बेसुष क्ये दता बा ।",योगी ने सिर झुका कर उत्तर दिया-हम योगी लोग नारायण का भजन करते हैं ।,योगी का रसीला करुण स्वर सितार का सुमधुर निनाद उस पर गीत का माधुर्य प्रभा को बेसुध किये देता था । उमानाथ वहिन को अपने घर लाने पर मन में बहुत पछताते ।,"उमानाथ को अपनी बहिन गंगाजली से प्रेम था, लेकिन गंगाजली को मैके आने के थोड़े ही दिनों पीछे ज्ञात हुआ कि भाई का प्रेम भावज की अवज्ञा के सामने नहीं ठहर सकता ।",उमानाथ बहिन को अपने घर लाने पर मन में बहुत पछताते थे । "का स्वास्थ्य पहले भी कुछ भच्छा न था, अब तो वह और भो बेजान हो गई ।",और उन्हें रोने की सुधि न थी ।,"लीला का स्वास्थ्य पहले भी कुछ अच्छा न था, अब तो वह और भी बेजान हो गयी ।" बे सब खाक में मिला देने होंगे।,उनकी दशा तो मुझसे भी खराब हो रही होगी।,वे सब खाक में मिला देने होंगे। "इस स्थामि-भक्ति में उसका शरीर बहुत छीण दो चुका था , पर चह सीर साहब को नियत समय पर प्रसज्ञतापूर्वक कचहरी पहुँचा दिया करता था |",साईस का इंतजाम करना कठिन था ।,इस स्वामिभक्ति में उसका शरीर बहुत क्षीण हो चुका था; पर वह मीर साहब को नियत समय पर प्रसन्नतापूर्वक कचहरी पहुँचा दिया करता था । उसे विश्वास था कि कम-से-कम सुभागी को मेरी नीयत का हाल मालूम है ।,"यह दिनों का फेर है, नहीं तो इसकी क्या मजाल थी कि हमारे ऊपर छींटे उड़ाता ।",उसे विश्वास था कि कम-से-कम सुभागी को मेरी नीयत का हाल मालूम है । "यह उन कृपाओ का धन्यवाद है, जिनके विना चौदद साल तो क्या, मेरा यहाँ चौदृह घटे रहवा असह्य हो जाता ।","और मैंने तो उस उन्माद में विक्रम को गोद में उठा लिया ; मगर कोई उससे कुछ पूछता नहीं , सभी जय-जयकार की हाँक लगा रहे हैं ।","यह उन कृपाओं का धन्यवाद है जिनके बिना चौदह साल तो क्या , मेरा यहाँ चौदह घंटे रहना असह्य हो जाता ।" अवश्य ही मेरा इसे विलासिनी समझना भ्रम है ।,उन्होंने खुद गलती की थी ।,अवश्य ही मेरा इसे विलासिनी समझना भ्रम है । "सोफी-अभी तो नहीं गई है, लेकिन शायद अब न रहे ।",सूरदास-कुछ कष्ट नहीं है ।,"सोफी-अभी तो नहीं गई है, लेकिन शायद अब न रहे ।" ( लीलावती को गौर से देखकर ) और मरदों को साढ़ी पहनाकर भराँखों में धूछ कोक रहो हो |,देशसेविका ने थानेदारों के रोब के साथ कहा- यों अपराध क्षमा नहीं हो सकता ।,(लीलावती को गौर से देखकर) और मरदों को साड़ी पहनाकर आँखो में धूल झोंक रही हो । उस पर मुझसे उड़ती थी ।,इतना सुनना था कि भैरों जैसे पागल हो गया ।,उस पर मुझसे उड़ती थी । एक दिन शाम को दीवान साहब की फिटन मेरे द्वार पर आकर रुकी ।,मैंने उससे दगा की थी ।,एक दिन शाम को दीवान साहब की फिटन मेरे द्वार पर आ कर रुकी । देवी का मन्द्रि एक बहुत ऊँचे टीले पर बना हुआ है ।,"यह पक्षियों का जोड़ा कुँवर और चंदा का जोड़ा है, इसमें किसी को सन्देह नहीं है ।",देवी का मंदिर एक बहुत ऊँचे टीले पर बना हुआ है । मेने कहा तुम्हारी राय भी छे छे,अभी यहाँ घंटे ही भर पहले आया था,मैंने कहा तुम्हारी राय भी ले लूँ कृष्णचन्द्र भी पिता को पाकर निहाल हो गया है ।,लोभ तो छू नहीं गया ।,कृष्णचन्द्र भी पिता को पाकर निहाल हो गया है । - में नहीं समझी ।,"यह नहीं जानते कि ऐश के ये सामान उस तहखानों में गड़े हुए पदार्थों की तरह हैं , जो मृतात्मा के भोग के लिए रखे जाते थे ।",' 'मैं नहीं समझी । "अंतर केवल यह था कि तब सिर पर अपना पति था, अब सिर पर कोई न था ।",फिर संदूक की ओर देखा ।,"अंतर केवल यह था कि तब सिर पर अपना पति था, अब सिर पर कोई न था ।" पग-पग पर उसे देवताथ को याद आती ।,यह न जानती थी कि यहाँ ऐसे तमाशे रोज होते हैं और आये दिन भुला दिये जाते हैं ।,पग-पग पर उसे देवनाथ की याद आती । रूल लेकर बिल्ली को इतने जोर से मारा कि वह दो-तीन लुड़कियाँ खा गई ।,"उनके इशारों पर चलती है; एक बार जो बात सुन लेती है, गाँठ बाँध लेती है ।",रूल लेकर बिल्ली को इतने जोर से मारा कि वह दो-तीन लुढ़कियाँ खा गई । कब तक छुआल में घुसकर रात कार्टगे : और पुआल में घुस भी लें तो पुआल खाकर रहा तो न जायगा,पूस की यह ठंड और किसी की देह पर लत्ता नहीं,कब तक पुआल में घुस कर रात काटेंगे और पुआल में घुस भी लें तो पुआल खा कर रहा तो न जायगा सुमपर सारा गुस्सा उतरा ।,"अब जिसे देखिए , विक्रम को डाँट रहा है , अम्माँ भी , चचा भी , पिता भी क़ेवल विक्रम की शुभ-कामना से या और किसी भाव से , ‘ कौन जाने बैठे-बैठे तुम्हें हिमाकत ही सूझती है ।",मुझ पर सारा गुस्सा उतरा । उसे अब इसी नाप्त का भरोसा धा ।,गरीब को घर में जाकर पगड़ी बाँधने का मौका न दिया ।,उसे अब इस नाम का भरोसा था । "म्रि० टंडन ने उत्छुछता से छह्ा--क्या हुआ क्‍या, कुछ कह्दो तो ?",मुझे आग में झोंककर आप दूर हट गयीं ।,"मिसेज टंडन ने उत्सुकता से कहा- क्या, हुआ क्या, कुछ कहो तो ?" उसे सनन्‍्यासी के शारीरिक वल पर अचम्भा हो रह था ।,छोटे भाई का किसी पर रोब न था ।,उस संन्यासी के शारीरिक बल पर अचम्भा हो रहा था । यद्द कहती हुईं सुखदा उठ खड़ी हुईं,सुखदा ने पूछा-बस या और कुछ- बस और मैं आपको क्या समझाऊँगी आप मुझसे कहीं ज्यादा समझदार हैं,यह कहती हुई सुखदा उठ खड़ी हुई "सेठजी गाए़ी से तो उतरे, पर सभा-स्थल में जाते सकोच होता था ।",मैं इसी योग्य हूँ ।,"सेठजी गाड़ी से तो उतरे, पर सभा स्थल में जाते संकोच होता था ।" "मैंने सोचा-- धघर्मात्मा लोग आते होगे, सफाई करने लगा ॥ ?",-- हसन निज़ामी का कोई मुरीद होगा ।,"मैने सोचा---धर्मात्मा लोग आते होंगे, सफ़ाई करने लगा ।" मुदा र॒स्ता कोई नहीं दिखाता,लोग कहते हैं सादी-गमी में तीरथ-बरत में हाथ बाँध कर खरच करो,मुदा रास्ता कोई नहीं दिखाता मेरे मन में भी बांत बेठ गई ।,"मैं संध्या समय दिन-भर की वाग्वितंडा से छुटकारा पाकर जब एकान्त में, अथवा दो-चार मित्रों के साथ बैठकर प्याले-पर-प्याले चढ़ाता, तो चित्त उल्लसित हो उठता था ।",मेरे मन में भी बात बैठ गयी । केलाप्रकुपारों के ससाव में मुझे एक विचित्र अन्तर दिखाई दे रहा ऐ |,"हृदयनाथ उन पुरुषों में न थे जो प्रत्येक अवसर पर अपनी आत्मिक स्वाधीनता का स्वाँग भरते हैं, हठधर्मी को आत्म-स्वातंत्र्य के नाम से छिपाते हैं ।",कैलासकुमारी के स्वभाव में मुझे एक विचित्र अंतर दिखाई दे रहा है । न जावतो तो शायद न ऋरतों ।,"जब हम तुम दोनों इसी बगीचे में खेला करते थे, मैं तुमको मारती थी और तुम रोते थे, मैं तुमको अपनी जूठी मिठाइयाँ देती थी और तुम दौड़कर लेते थे, तब भी मुझे तुमसे प्रेम था; हाँ, वह दया के रूप में व्यक्त होता था ।",न जानती तो शायद न करती । अमरकान्त पर बिजलो-सो गिर पढ़ी,घर को अपना समझो तो तुम्हारा सब कुछ है,अमरकान्त पर बिजली-सी गिर पड़ी स्टेशन पर होटल पूछ रहे थे ।,सेवा-कार्य में वह हमेशा आपसे एक कदम आगे रहेगी ।,स्टेशन पर होटल पूछ रहे थे । "एक विशाल भवन था, अहाता, साफ-छुथरा, सायवान मे फूलो के गमले रखे हुए थे ।",एक क्षण में गाड़ी मँगरु के डेरे पर पहुंच गयी ।,"एक विशाल भवन था , आहाता साफ-सुथरा , सायबान में फूलों के गमले रखे हुए थे ।" वह अब उतनी दुर्वलछ उत्तवी चिन्तित नहीं है,अमरकान्त का कलेजा धक-धक-से हो गया,वह अब उतनी दुर्बल उतनी चिंतित नहीं है जालपा उससे सारा वृत्तान्त कह सुनाती है और उससे अपना बयान वापस लेने पर ज़ोर देती है ।,रमा यह पत्र पढ़ता है और उसकी आंखों के सामने से परदा हट जाता है ।,जालपा उससे सारा वृत्तांत कह सुनाती है और उससे अपना बयान वापस लेने पर ज़ोर देती है । मेरी समझ में नहीं आता कि आपने इस पद की कठिनाइयों को जानते हुए भी क्यों इसे स्वीकार किया ।,राजा साहब की पद-लोलुपता उसे कुठाराघात के समान लगी ।,मेरी समझ में नहीं आता कि आपने इस पद की कठिनाइयों को जानते हुए भी क्यों इसे स्वीकार किया । इतने ही अपराध के लिए आपने सारे शहर में मेरा नाम बेच डाला ।,"यदि मुझे मालूम होता कि जलसे का यह परिणाम होगा, तो या तो जलसा ही न करता या उसे अपने घर आने न देता ।",इतने ही अपराध के लिए आपने सारे शहर में मेरा नाम बेच डाला । बोला--तुमको आराम से सो जाता चाहिए था ।,"फिर भी उसने जरा कड़े स्वर में पूछा , ‘ आज इतनी रात तक कहाँ थे ?","बोला , ‘ तुमको आराम से सो जाना चाहिए था ।" घर में बेलों के सिवा फोई सम्पत्ति व थी ।,जमींदार ने इजाफा-लगान का दावा दायर किया था ।,घर में बैलों के सिवा और कोई सम्पत्ति न थी । "उसको दशा उस मनुष्य कौ-सी थी, जो किसी वाग में पके फल देखकर ललचता है, पर माली के न रहते हुए भी उन्हें तोड़ नहीं सकता ।",वह इस समय अपने भावों को शब्दों में न कह सकती थी ।,"उसकी दशा उस मनुष्य की-सी थी, जो किसी बाग में पके फल देखकर ललचता है, पर माली के न रहते हुए भी उन्हें तोड़ नहीं सकता ।" और फिर जिंदगी पेट ही पालने के लिए थोड़े ही है ।,जानते हैं न कि जरा भी गरम हुए कि बजरंगी ने गरदन पकड़ी ।,और फिर जिंदगी पेट ही पालने के लिए थोड़े ही है । "सम्भव है, उसने दो-चार वार्ते और भी की हों ।","आख़िर, वह क्यों तुझसे इतना उदासीन है ?","सम्भव है,उससे दो-चार बातें और भी की हों ।" "श्रत्यन्त दीनता से बोले--बावू साहब, ईश्वर के लिए मुझ पर दया कीजिए, में पच्चीस हजार पर निपारा करने को तैयार हूँ ।",बदलूसिंह मन में दारोगाजी को गालियाँ देता हुआ पंडित अलोपीदीन की ओर बढा ।,"अत्यंत दीनता से बोले, 'बाबू साहब, ईश्वर के लिए मुझ पर दया कीजिए, मैं पच्चीस हजार पर निपटारा करने का तैयार हूँ ।" किन्तु वेनीवाग या रे उवीस्म पार्क की झर न जाकर वह दुर्गाकुएड और दान्हजी की धर्मशाला की श्रोर ह गये ।,शर्माजी सदन के साथ सैर को निकले ।,किन्तु बेनीबाग या क्वीन्स पार्क की ओर न जाकर वह दुर्गाकुण्ड और कान्हजी की धर्मशाला की ओर गए । "कई बार उन्हें मतलो आ गई, जेसे एक दज़ार गधे कार्नों के पास खड़े अपना चर अलाप रहे हाँ ।",उसे भी शीघ्र ही आपकी सेवा में भेजूँगी ।,"कई बार उन्हें मतली आ गयी, जैसे एक हजार गधे कानों के पास खड़े अपना स्वर अलाप रहे हों ।" एक दित कुकर छत॒स्ताक् उसी थोड़े पर सवार हो.कर सैर को गया था ।,उसकी मृदुता ने शीघ्र ही उसे बादशाह आलमगीर का विश्वासपात्र बना दिया ।,एक दिन कुँवर छत्रसाल उसी घोड़े पर सवार होकर सैर को गया था । यह कहते हुए चची ने हलधर को खाल दिया और हाथ पकड़कर मीतरः : ले गयीं ।,"झूठा तो तू है, और तो सारा संसार सच्चा है, तेरा नाम निकल गया है न ! तेरा बाप नौकरी करता, बाहर से रुपये कमा लाता, चार जने उसे भला आदमी कहते, तो तू भी सच्चा होता ।",यह कहते हुए चची ने हलधर को खोल दिया और हाथ पकड़ कर भीतर ले गयीं । "अल्लाह जानता हे, हुजूर को देखकर भूख-प्यास जाती रहती है ।",हम दोनों साथ-साथ बाहर आये और अपनी-अपनी बीती सुनाने लगे ।,"अल्लाह जानता है, हुजूर को देख कर भूख-प्यास जाती रहती है ।" बचा हमें चकरमा देते हो ।,दूसरा बोला- और दूसरा मेरी ।,"बचा , हमें चकमा देते हो ।" विरजन का सिर कुक गया,विदाई को केवल तीन दिन रह गये थे,विरजन का सिर झुक गया पैने उतका ऐसा भयंकर रूप कभी नहीं देखा था ।,उस समय भी यही ऋतु थी ।,मैंने उनका ऐसा भयंकर रूप कभी नहीं देखा था । समभ गई कि इन्होंने सारा काम किया ।,सुमन जब सोकर उठी तो यह कोतुक देखकर दंग रह गई ।,समझ गई कि इन्होंने सारा काम किया । में ऐसे कितने दो नामी आदमियों के ठदादरन झे स्ता हैं जो बचपन में बई पानी ये पर भागे चछ*२ मद्दात्मा हो गये,तेजा ने पूछा-दादा जब अमर भैया छोटे-से थे तो बड़े शैतान थे न- समरकान्त ने इस प्रश्न का आशय न समझकर कहा-नहीं तो वह तो लड़कपन ही से बड़ा सुशील था,मैं ऐसे कितने ही नामी आदमियों के उदाहरण दे सकता हूँ जो बचपन में बड़े पाजी थे पर आगे चलकर महात्मा हो गए दो सौ से कम की गोई न होगी,बछवे भी अच्छे बैल निकलेंगे,दो सौ से कम की गोंई न होगी "काम उसको कहना चाहिए, जिससे देश और जाति का कुछ उपकार हो ।",गांगुली-सरदी पड़ने लगी ।,"काम उसको कहना चाहिए, जिससे देश और जाति का कुछ उपकार हो ।" उनमें कुछ ऐसी दुर्जनता थी कि यह मनोरजक कार्य भी उर्न्हँ चेगार प्रतीत होता |,इससे मदरसे की शोभा अधिक हो गई थी ।,उनमें ऐसी दुर्जनता थी कि यह मनोरंजक कार्य भी उन्हें बेगार प्रतीत होता । "इसके तीसरे दिन वह नगे सिर, नगे पैर भग्न-द्ृद्य घर पहुँचे |",वह भोले-भाले किसान यह देखकर साहब को आशार्वाद देने लगे ।,"इसके तीसरे दिन वह नंगे सिर, नंगे पैर भग्नहृदय घर पहुँचे ।" "तेजस्वी मूर्ति थी, पीतात्र गले में, जगा सिर पर, पीतल का कर्मं- डल हाथ में, खड़ाऊँपैर मे, ऐनक आंखे पर, सपूण वेष उन महात्माओ्रों का-सा था जो रईसों के प्रातादों में तपस्या, हवा गाड़ियों पर देवस्थानो की परिक्रमा, ओर योग-सिद्धि प्राप्त करने के लिए रुचिकर भोजन करते हैं ।","मंगला जब तक जीवित थी, वह उनसे पिता-पुत्री के भाव को सजग और पुष्ट कराती रहती थी ।","तेजस्वी मूर्ति थी, पीताम्बर गले में, जटा सिर पर, पीतल का कमंडल हाथ में, खड़ाऊँ पैर में, ऐनक आँखों पर, सम्पूर्ण वेष उन महात्माओं का-सा था जो रईसों के प्रासादों में तपस्या, हवागाड़ियों पर देवस्थानों की परिक्रमा और योग-सिद्धि प्राप्त करने के लिए रुचिकर भोजन करते हैं ।" उसने निश्वय किया चलकर दब साफ-बाफ़ कह दूं ।,गोकुल वहाँ से घर चला तो ग्यारह बज रहे थे ।,"उसने निश्चय किया, चलकर साफ-साफ कह दूँ ।" "किसी मंद दी टाँग टूटी, किसी की कमर टूटी ।","उन्हें खेतों में बिठाने के लिए फ़ी रात आठ आने कोड़ी मजदूरी मिलती थी, इसके उपरान्त दूध बेचता था; ऊन के कम्बल बनाता था ।","किसी भेड़ की टाँग टूटी, किसी की कमर टूटी ।" "प्राण निकल गये , पर दस शब्द--“कुँवर'--मने उसका आशय प्रकट कर दिया |",प्राण आँखों में अटके हुए थे ।,"प्राण निकल गये; पर इस शब्द , 'कुँवर' , ने उसका आशय प्रकट कर दिया ।" "वक़ील साहब ने मुँह सिकोड़कर पहलू बदला और बोले -- मालूम नहीं, पेट में क्या हो गया है, कि कोई चीज़ हज़म ही नहीं होती ।","जिंदादिल बूढ़ों के साथ तो सोहबत का आनंद उठाया जा सकता है, लेकिन ऐसे रूखे, निर्जीव मनुष्य जवान भी हों, तो दूसरों को मुर्दा बना देते हैं ।","वकील साहब ने मुँह सिकोड़कर पहलू बदला और बोले, 'मालूम नहीं, पेट में क्या हो गया है, कि कोई चीज़ हज़म ही नहीं होती ।" अपने को घिक्‍्कारने लगा ।,यार जिंदा व सोहबत बाकी ।,अपने को धिक्कारने लगा । सुमन--मैं परिश्रम करूंगी ।,लेकिन रुपयों के बिना तुम्हारा निर्वाह केसे होगा ।,सुमन - मैं परिश्रम करूँगी । दुलारी और मथुरा हार से छोटे ।,जुगनू का मुँह उस लालिमा में बिलकुल जरा-सा निकल आया ।,दुलारी और मथुरा हाट से लौटे । पढ़ने से में जी नहीं चुराता लेकिव इस दशा में मेरा पढ़ना नहीं हो सकता,अमर ने लड़ने के लिए यहाँ भी आस्तीनें चढ़ा लीं-तुम यह आक्षेप व्यर्थ कर रही हो,पढ़ने से मैं जी नहीं चुराता लेकिन इस दशा में पढ़ना नहीं हो सकता "और रोज़ेंदारों'को पैक्तियाँ एक के ' पोछे एक न जाने कहाँ तह चछो पड हैँ, पक्क्ो जगत के नीचे:तंक) जहाँ जाजिम भी नद्दों है ।",सहसा ईदगाह नजर आयी ।,"और रोजेदारों की पंक्तियाँ एक के पीछे एक न जाने कहाँ तक चली गयी हैं, पक्की जगत के नीचे तक, जहाँ जाजम भी नहीं है ।" "नतो तुम आज द्वी इस वक्त उस बनिए को खत लिख दो, और याद रप्तो कि अगर इस तरह छो चर्चा फिर कभी उठी, तो में तुम्दारा सबसे बढ़ा शन्ु टूँगा ।","उस प्रेम की तरंग में वह सारे कष्टों को झेलने के लिए तैयार मालूम होता था ; लेकिन जैसे कोई कायर सिपाही बन्दूक के सामने जाकर हिम्मत खो बैठता है और कदम पीछे हटा लेता है , वही दशा केशव की हुई ।","’ ‘ तो तुम आज ही इसी वक्त उस बनिये को खत लिख दो और याद रखो कि अगर इस तरह की चर्चा फिर कभी उठी , तो तुम्हारा सबसे बड़ा शत्रु होऊँगा ।" सवारी के लिए घोड़ा भी मिल गया ।,धीरे-धीरे सारा मुहल्ला जमा हो गया ।,सवारी के लिए घोड़ा भी मिल गया । ठग्हारा इशारा पाते ही अम अपने सीने में लेजर चुभा सकता है,सच्चा इश्क क्या है अम दिखा देगा,तुम्हारा इशारा पाते ही अम अपने सीने में खंजर चुभा सकता है इस वक़्त उसे अपनी सन्ोव्यथा कह डालने का बहुत ही अच्छा अवसर मिला था ; पर हाय संकोच ! इसने फिर उसकी ज़बान बंद कर दी ।,"अपनी चिंताओं के बोझ से वह उसे दबाना नहीं चाहता था,पर आज उसे ज्ञात हुआ, जालपा उतनी ही चिंतनशील है, जितना वह ख़ुद था ।","इस वक्त उसे अपनी मनोव्यथा कह डालने का बहुत अच्छा अवसर मिला था, पर हाय संकोच! इसने फिर उसकी ज़बान बंद कर दी ।" "मेने तुम्हें चेतावनों दे दी, अब तुम जानों, तुम्दाध दाम जाने ।",यशवंत ने कहा- मैं आत्मा के आगे धन का कुछ मूल्य नहीं समझता ।,"मैंने तुम्हें चेतावनी दे दी, अब तुम जानो, तुम्हारा काम जाने ।" में तो अपनो-सो करके देख चुका ।,लेकिन साल-भर में तो सात सौ के नौ सौ हो जायेंगे ।,मैं तो अपनी-सी करके देख चुका । "यशवत को आत्मा रुज्या, श्लानि और मानपिर पीढ़ा से तढ़पतो थी, और रमेश का मुख निर्दोषिता के प्रद्चशत से चमकता रहता था ।","साथ खेले और साथ पढ़े हुए दो मित्र एक-दूसरे के सम्मुख खड़े थे, केवल एक कठघरे का अंतर था ।","यशवंत की आत्मा लज्जा, ग्लानि और मानसिक पीड़ा से तड़पती थी और रमेश का मुख निर्दोषिता के प्रकाश से चमकता रहता था ।" इन्हीं के उद्योग तथा प्रेरणा से यह विधर्मीय अत्याचार हो रहा है ।,देखना सबेरे तक चोर की क्या दशा होती है ।,इन्हीं के उद्योग तथा प्रेरणा में यह विधर्मीय अत्याचार हो रहा है । में क़ृतम तो नहीं खाता कि उससे शादी हो जाने पर में कण्ठी-माला पदन छूगा लेकिन इतना जानता हूँ कि उसे पाकर में ज़िन्दगों में कुछ कर सकूँगा,अब तुम्हारे उससे मुँह फेरने का कोई सबब नहीं है,मैं कसम तो नहीं खाता कि उससे शादी हो जाने पर मैं कंठी-माला पहन लूँगा लेकिन इतना जानता हूँ कि उसे पाकर मैं जिंदगी में कुछ कर सकूँगा केलासकुमारी को सेवा-प्रत्नत्ति दिनोदिन तौन्र होने लगी ।,उन्हें यहाँ की पढ़ाई खेल मालूम होती ।,कैलासकुमारी की सेवा-प्रवृत्ति दिनोंदिन तीव्र होने लगी । "भोंदू न था, वेवल उसका गधा चला आ रहा था |",मरजाद जान से प्यारी नहीं होती ।,"भोंदू न था, केवल उसका गधा चला आ रहा था ।" "यह कहिए आपका श्राशीर्वाद था, जान बच गई, नहीं तो अब तक जमुनाजी में बह्य चला जाता होता |",' चौधराइन भी पुराने दिन याद करके मुस्कराने लगी ।,"यह कहिए, आपका आशीर्वाद था, जान बच गई, नहीं तो अब तक जमुनाजी में बहा चला जाता होता ।" "सोने जाता तो ज्ञान पड़ता, किसी ने पिंजरे में बन्द कर दिया है ।",चिंता-दाह से दिनोंदिन घुलता जाता था ।,"सोने जाता तो जान पड़ता, किसी ने पिंजरे में बन्द कर दिया है ।" केशव और कुछ न कद्द सका ।,"अगर वह अपनी जिद पर अड़ा और पिता ने भी अपनी टेक रखी , तो उसका कहाँ ठिकाना लगेगा ?",केशव और कुछ न कह सका । इसलिए भब॒ उसकी निर्देय कड़ा की शिक्रायत नहीं कहूँ गा,अब जान पड़ा कि मनुष्य विधि के हाथ का खिलौना है,इसलिए अब उसकी निर्दय क्रीड़ा की शिकायत नहीं करूँगा पत्र हाथ से छूटकर गिर पड़ा ।,उपर्युक्त घटना के दो सप्ताह पीछे मिस्टर मेहता ने विलायती डाक खोली तो बालकृष्ण का कोई पत्र न था ।,पत्र हाथ से छूट कर गिर पड़ा । मेरा क्रोध बहुत बुरा है ।,सन्नाटा छाया हुआ था ।,मेरा क्रोध बहुत बुरा है । "जालपा ने उसे बुलाकर कहा “० सुनो जी, ज़रा बाबू रमानाथ को तो बुला लाओ |","' जालपा को कुछ ढाढ़स हुआ, रमा के पहुंचते-पहुंचते वह भी पहुंच जाएगी ।","जालपा ने उसे बुलाकर कहा, 'सुनो जी, ज़रा बाबू रमानाथ को तो बुला लाओ ।" "यह विचार मन में आते द्वी कगड़, साहु गद्दी से मसनद के सद्दारे उठ बैठे और दृढ़ स्वर से कद्दा--वही परमात्मा जिसने अ्रव तक सम्हारी टेक नियाही है, अब भी नियाहेंगे ।","मन में सोचा, यह मनुष्य तो कभी ओछे विचारों को मन में नहीं लाया ।","यह विचार मन में आते ही झगडू साहु गद्दी से मसनद के सहारे उठ बैठे और दृढ़ स्वर से कहा वही परमात्मा जिसने अब तक तुम्हारी टेक निबाही है, अब भी निबाहेंगे ।" बुढ़िया ने अपनी मोपड़ी की टट्टी खोलते हुए कहा- लाओ लड़की रख दो यहाँ,भावी जीवन की यही उसकी तैयारी है यही तपस्या है,बुढ़िया ने अपनी झोपडी की टट्टी खोलते हुए कहा-लाओ लकड़ी रख दो यहाँ दूसरे जाएँगे तो लुट जाएँगे ।,तुमसे इसलिए कहता हूँ कि तुम्हें वहाँ लोग जानते हो ।,दूसरे जाएँगे तो लुट जाएँगे । दौनों सटे हुए बेंठे थे पर जेपे बोच में कोई दीवार खड़ी दो,हाँ-हाँ ले लो लेकिन राज खुल गया तो यहाँ मेरी लाश नजर आएगी,दोनों सटे हुए बैठे थे पर जैसे बीच में कोई दीवार खड़ी हो बजरंगी के सिवा और किसमें इतना दम है ।,पंद्रह-बीस मिनट तक वहीं अचेत पड़ा रहा ।,बजरंगी के सिवा और किसमें इतना दम है । "उसी आत्य सम्माहित दशा ' में उत्तके मुँह से यह शब्द निकडे --भग्साँ, तुभने मुझे इतना भुला दिया ।","वह अपना छोटा – सा घर, वह आम के बाग, जहाँ वह केरियाँ चुना करता था, वह मैदान जहाँ वह कबड्डी खेला करता था, सब उसे याद आने लगे ।","उसी आत्म-सम्मोहित दशा में उसके मुँह से यह शब्द निकला, अम्मा, तुमने मुझे इतना भुला दिया ।" जिसे देखे कंकाल वनों हुआ है,धानोपार्जन के लिए खून जलाना पड़ता है माँस सुखाना पड़ता है,जिसे देखो कंकाल बना हुआ है उसे अब मोटे-से-मोटा काम करने मे भी सकोच न था ।,"वह प्रेम का स्वाँग नहीं, प्रेम चाहती थी ।",उसे अब मोटे से मोटा काम करने में कोई संकोच नहीं था । "आज ही लगवा दीजिए, नहीं तो वे सब सूख जाएँगे ।",मेरा माली आकर सब ठीक कर देगा ।,"आज ही लगवा दीजिए, नहीं तो वे सब सूख जाएँगे ।" हरखू के खेत गाँववालों की नजर पर चढ़े हुए ये ।,मगर अभी तक इमारतों का काम अपूर्ण था ।,हरखू के खेत गाँववालों की नजर पर चढ़े हुए थे । यह शोभा नहीं देता कि तुम्हारे ऊपर इतने बड़े कार्य का भार रखकर मैं झालसी बना बैठ रहें।,"तुमने मुझे उबार दिया, मेरी नाव पार लगा दी ।",यह शोभा नहीं देता कि तुम्हारे ऊपर इतने बड़े कार्य का भार रख कर मैं आलसी बना बेठा रहूँ । पत्र जावी ओर फाड़ दिया जाता ।,मैं इतने दिनों से केवल उसके जीवन को मिट्टी में मिलाने के लिए ही प्रेम का स्वाँग भर रहा हूँ ।,पत्र आता और फाड़ दिया जाता । "अपना दुःख सयनाने लगता है, तो कैसे न मुननेँ ?",इस भुतने-से न जाने तुम कैसे बात करती हो ! देवी- मुझे उसकी सूरत ले कर क्या करना है ?,"अपना दु:ख सुनाने लगता है, तो कैसे न सुनूँ ?" "कोठसी में ऐसी कोई वस्तु लथी, जिप्मे वह अपनो रक्षा कर सकतें ।",हम निःशस्त्र और प्रतिकार के लिए असमर्थ होने पर भी बैठे-बैठे वारों का निशाना नहीं बनना चाहते ।,कोठरी में ऐसी कोई वस्तु न थी जिससे वह अपनी रक्षा कर सकते । अपराधियों के चेहरे पर हवाइयाँ उड़ने लगी ।,वह संसार के प्रत्येक भाग में उपस्थित हैं और बहुधा मुझसे अनेक प्रकार की जिज्ञासा किया करते हैं ।,अपराधियों के चेहरों पर हवाइयाँ उड़ने लगीं । "यह वह कायरपन था, जिस पर बढ़े-ऐ-बढड़े कायर भो आँसू बहाते हैं ।",पितृस्नेह से हृदय पुलकित हो उठा ।,"यह वह कायरपन था, जिस पर बड़े-बड़े कायर भी आँसू बहाते हैं ।" "मैं कीना नहीं रखता, मलिन द्वद॒य नहीं हूँ, लेकिन न मालूम क्यों लज्जा के रोने पर मुझे इस समय एक आनन्द का अनुमव हुआ ।",मैं उस पर क्रोध प्रकट करना चाहता था और निकल पड़े आँसू ।,"मैं कीना नहीं रखता, मलिन हृदय नहीं हूँ, लेकिन न मालूम क्यों लज्जा के रोने पर मुझे इस समय एक आनन्द का अनुभव हुआ ।" "ु में अभी कपड़े भी न उतारने पाया था कि उसने अपना दुखड़ा शुरू कर दिया -- जैया, पर-द्वार सत्र अच्छा है, सास-ससुर भो अच्छे हैं; छेकित जमाई निकम्मा तिकला ।",मैंने समझा कि अब गोपा सुखी होगी ।,"अभी कपड़े भी न उतारने पाया था कि उसने अपना दुखड़ा शुरू कर दिया- भैया, घर द्‌वार सब अच्छा है, सास-ससुर भी अच्छे हैं, लेकिन जमाई निकम्मा निकला ।" उन्हीं को काढ़ते देख- कर इसने सब कुछ सीख लिया,बुढ़िया ने ज्योंही उसकी शादी की चर्चा छेड़ी वह चूल्हे के पास जा बैठी और आटे को अँगुलियों से गोदने लगी,उन्हीं को काढ़ते देखकर इसने सब कुछ सीख लिया "ऐसा न हो कि पीछे से कोई बात हो जाय, तो आपको बदवासी हो ।",उन्होंने कावसजी को ताकीद और विनय-भरी आँखों से देखा और दूसरे द्वार के कमरे से निकलकर अन्दर चली गयीं ।,"ऐसा न हो कि पीछे से कोई बात हो जाय, तो आपकी बदनामी हो ।" "तुम्हारे मन मे जो , सन्देह् है, वह में जानती हूँ, सममती हैँ ।","उसने नम्रता से कहा , तुम जानती हो , मेरी क्या हालत है ?","तुम्हारे मन में जो सन्देह है , वह मैं जानती हूँ , समझती हूँ ।" "मालम हुआ, ढिदो के शोरबे में मरी हुई चहिया निकल जाई ।",मैदे की पूरियाँ ठंडी होकर चिमड़ी हो जाती हैं ।,"मालूम हुआ, किसी के शोरबे में मरी हुई चुहिया निकल आयी ।" "सुमन--सेठजी, भाप इतनी जल्दी नाराज हो गए ।",चिम्मन -- अब यहाँ आने वाले पर लानत है ।,"सुमन -- सेठजी, आप इतनी जल्दी नाराज हो गए ।" "जोहरा, आज अपने दस्ते-हिनाई से एक जाम भर कर दो ।","दारोग़ा ने कई बार पुकारा, 'ज़रा सुनिए, बात तो सुनिए, ' लेकिन उसने पीछे फिरकर देखा तक नहीं ।",ज़ोहरा -' आज अपने दस्ते-हिनाई से एक जाम भर कर दो । "मैंने सेवा का व्रत लिया था, घर से परोपकार करने चला था ।",मुझे भय लग रहा है कि कोई मुझे पहचान न ले ।,"मैंने सेवा का व्रत लिया था, घर से परोपकार करने चला था ।" इतने में गोपी भी लौटा |,रमा ने पुर्ज़ा फाड़कर फेंक दिया ।,इतने में गोपी भी लौटा । "वह व्यापारियों से दो-दो, चार-चार आने लेते जरा भी न झिझकता था ।",पर रतन की सरलता और विश्वास ने उसके हाथ पकड़ लिए ।,"वह व्यापारियों से दो-दो, चार-चार आने लेते ज़रा भी न झिझकता था ।" 5म_ तो इसकी कोई दुष्टता नहीं देखता |,"मैंने अँगरेजी में कहा- बाबू साहब, यह अन्याय कर रहे हैं, उसने जान-बूझ कर तो रोशनाई गिरायी नहीं ।",'मैं तो इसकी कोई दुष्टता नहीं देखता । शर्माजी ने आराम की साँच की और उस पोधे को उठाकर रही में ढाल दिया और जले हुए दिल से आप-द्दी-आप कद्दा--इईइवर न करें कि फिर तुम्दारे दशत हों ।,मैं वही रद्दी कोट और वही चमरौधा जूता पहनकर दफ्तर जाता हूँ ।,"शर्माजी ने आराम की साँस ली और उस पोथे को उठाकर रद्दी में डाल दिया, और जले हुए दिल से आप-ही-आप कहा- ईश्वर न करे कि फिर तुम्हारे दर्शन हों ।" अध विपत्ति-झथया को क्यों तूल दूं ।,"कोई युक्ति, कोई तर्क, कोई चुटकी मुझ पर इतना स्थायी प्रभाव न डाल सकती थी ।",अब विपत्ति-कथा को क्यों तूल दूँ । "सदन को देखे विना उसे चैन न पड़ता, उसका हृदय दिनोंदिन उसकी ओर खिंचता जाता था ।",सुमन ने हिरिया के द्वारा उस का पता भलीभाँति लगा लिया ओर तभी से वह बड़े चक्कर में पड़ी हुई थी ।,"सदन को देखे बिना उसे चेन न पड़ता, उस का हृदय दिनोंदिन उस की ओर खिंचता जाता था ।" उन्हें सोचकर जवाब देने का वादा करके विदा किया और विसल बाबू को घुलाकर बोले - आज चौधरी साहब क्ृप्णा को शादी की बातचीत करने आये थे ।,मगर विधि-वाम कुछ और ही षडयन्त्र रच रहा था ।,"उन्हें सोचकर जवाब देने का वादा करके विदा किया और विमल बाबू को बुलाकर बोले, ‘ आज चौधरी साहब कृष्णा की शादी की बातचीत करने आये थे ।" कम-पे-कम्त साल-भर घर से खाना पढ़ेगा ।,हमारे पास कुल बीस हजार ही तो हैं ।,कम-से-कम साल-भर घर से खाना पड़ेगा । "वृक्षा में उसे जुरुलुछ गहादुभूद्ि का बज्ात अनुभव होता था, जो पर के प्रायिया में उ्ि च मिद्धती थी ।",दीन से दीन प्राणियों को भी ईश्वर का आधार होता है जो उनके हृदय को सहलाता रहता है ।,वृक्षों में उसे कुछ-कुछ सहानुभूति का अज्ञात अनुभव होता था जो घर के प्राणियों से उसे न मिलती थी । "वह वेदना जो अब तक मूछित पड़ी थी, शीतल जल के यह छींटे पाकर सचेत हो गयी और उसके क्रन्दन ने रमा के सारे अस्तित्व को जैसे छेद डाला ।",मेरा पहला सवाल यह होगा कि बिलायती चीज़ों पर दुगुना महसूल लगाया जाय और मोटरों पर चौगुना ।,"वह वेदना जो अब तक मूर्छित पड़ी थी, शीतल जल के यह छींटे पाकर सचेत हो गई और उसके क्रंदन ने रमा के सारे अस्तित्व को जैसे छेद डाला ।" सुजान की गोद में सिर रखे उन्हें अकथनीय सुख मिल रहा था |,"जब से उन्होंने काम करना छोड़ा था, बराबर चारे के लिए हाय-हाय पड़ी रहती थी ।",सुजान की गोद में सिर रखे उन्हें अकथनीय सुख मिल रहा था । "” 'नहीं, में समभता हूँ, विस्मित्लाह पुरुषों ने की होगी ।","दयाकृष्ण ने पुचारा दिया, ज़ब स्त्री अपना रूप बेचती है , तो उसके खरीदार भी निकल आते हैं ।","नहीं , मैं समझता हूँ , बिस्मिल्लाह पुरुषों ने की होगी ।" यही हवाई किले बनाते-बनाते मुझे नींद आ गयी |,मैंने बार-बार पुकारा; लेकिन कजाकी वहाँ न था ।,यही हवाई किले बनाते-बनाते मुझे नींद आ गयी । मुझे चाहे जेहल ही क्‍यों न हो जाये ; लेकिन मैं कप्तान साहब से जरूर कह दूँगा ।,"पांडे ने आँखें निकालकर कहा, 'जान परत है तुमहू मिले हौ, नांव काहे नाहीं बतावत हो इनका ?","मुझे चाहे जेहल ही क्यों न हो जाए, लेकिन मैं कप्तान साहब से जरूर कह दूँगा ।" "(बिलकुल नहीं, यह मेरा आखिरी हुक्म है ।",मुझे कुछ निवेदन करने की आज्ञा न मिलेगी ?,"बिलकुल नहीं , यह मेरा आखिरी हुक्म है ।" जिस दिन यह कुंजी मिल गई बस फ़तह हे,कहाँ निशाना ठीक बैठेगा इसका निश्चय न कर सका,जिस दिन यह कुंजी मिल गई बस फतह है व-जाने ऐसी क्या गाँठ पढ़ गई है कि उसने इस बेदर्दी से आँखे फेर लीं ।,"घर पहुँचकर उनका हाथ-मुँह धुलाया, शरबत पिलाया ।",न जाने क्या गाँठ पड़ गयी है कि उसने इस बेदर्दी से आँखें फेर लीं । थानेदार ने चालान कर दिया |,"दमड़ी को चारा सिर पर उठाते देखा, तो सन्देह हुआ ।",थानेदार ने चालान कर दिया । "' बालक को देद्व ठंडो हो गई थो और मुख पर चह पीछापत था गया था जिसे देखछूर कलेजा द्विल बाता हैं, कठ ते आह निल्‍्छ जाती है और भांखों से आंसू बहने लगते हैं ।",ईश्वर से मनाती रहती थी कि किसी भाँति एक साल कुशल से कट जाता तो इनसे पूछती ।,"बालक की देह ठंडी हो गई थी और मुँह पर पीलापन आ गया था जिसे देखकर कलेजा हिल जाता है, कंठ से आह निकल जाती है और आँखों से आँसू बहने लगते हैं ।" वायुदेव को प्यार करने के बहाने तुम इध घर पर अधिकार जमाना चाहतो दो ।,"परशुराम- हाँ, वह तो अभी रोते-रोते सो गया है ।",वासुदेव को प्यार करने के बहाने तुम इस घर पर अधिकार जमाना चाहती हो । अबकी नह योई' बटेप्तर फे मेले से ले आवेगा ।,"घर फाड़े खाता था, चित्त ऐसा चंचल हो रहा था कि कहीं उड़ जाऊँ ।",अबकी नयी गोई बटेसर के मेले से ले आयेगा । अपर कौम में अमीर और गरीब जायदाद- चूले और मर-भूखे अपनो-अपनी जप्राभर्तें बवायेंगे,सिर्फ हिन्दुस्तान में उसमें कुछ-कुछ जान बाकी है,अब कौम में अमीर और गरीब जायदाद वाले और मरभुखे अपनी-अपनी जमाअतें बनायेंगे इसी बीच में सदन डिगवी साहव के यहाँ से घोड्ा ले लाया ।,"कई बार कलमदावात ले कर रुक्का लिखने बेठे, किंतु लिखें क्या यह न सूझा |",इसी बीच में सदन डिगवी साहब के यहाँ से घोडा ले आया । "भगवान्‌ ने बेटी का दुःख दे दिया, नहीं मुझे खेत-बारो लेकर क्‍या करता था ।",मैं घर रहूँगा तब तो और जी ऊबेगा ।,"भगवान ने बेटी को दु:ख दे दिया, नहीं मुझे खेती-बारी लेकर क्या करना था ।" "सदन बुल्यकाल में ढीठ, हठी और लड़ाका था ।","उसे मीठे पदार्थ खूब खाने को मिलते है, किन्तु कड़वी ताड़ना कभी नहीं मिलती ।","सदन बाल्यकाल में ढीठ, हठी ओर लड़ाका था ।" "समय की पाबन्दी पर संक्षेप में एक निबन्ध लिखों, जो चार पन्ने से कम्र न हो ।","मगर नहीं, आपको चार पन्ने रंगने पड़ेंगे, चाहे जैसे लिखिए ।","समय की पाबन्दी पर संक्षेप में एक निबंध लिखो, जो चार पन्नों से कम न हो ।" "बह जातते हैं कि वाइशाह फी माजूडी (गद्दी से हटाये जाने ) पर एक आदमी ,भी आँसू न बहुवेगा |",एक दिन उसने सोचा कि क्यों न चल कर पति से सारा वृत्तांत सुना दूँ ।,वह जानते हैं कि बादशाह की माजूली (गद्दी से हटाये जाने) पर एक आदमी भी आँसू न बहावेगा । "अबुल---सुमन, जलाग्ो मत, नहीं तो मेरी जवान से भी कुछ निकल जाएगा।",जरा सी बात के लिए आप इतनी हाय-हाय मचा रहे है ।,"अबुल -- सुमन, जलाओ मत, नहीं तो मेरी जबान से भी कुछ निकल जाएगा ।" खुफ़िया पुलोध ने एक तूफान खड़ा कर दिया था ।,"उनका वे दूर से तमाशा देख सकते थे, अभिज्ञताओं की वे उपेक्षा कर सकते थे ।",खुफिया-पुलिस ने एक तूफान खड़ा कर दिया था । "सकते / और जिन छोगों का पक्ष लिया जाय, वे भी तो कुछ इसका महत्त्व सममें; ।","किसी को मुझसे हमदर्दी नहीं , सब अपनी-अपनी धुन में मस्त हैं ।","और जिन लोगों का पक्ष लिया जाय , वे भी तो कुछ इसका महत्त्व समझें ।" दादा जोवि' थे तब और बात थी ।,आप दो-चार साल में प्रस्थान कर जायेंगी; पर हमारा और उसका बहुत दिनों तक संबंध रहेगा ।,"दादा जीवित थे, तब और बात थी ।" खन्‍ना सुनते ही खिल उउठेंगे लेकिन दुनिया को दिखाने के लिए आँखों पर रूमाल रख लेंगे,सहसा उसे एक लंबा पाइप घास में छिपा नजर आया जिसमें से पानी बह रहा था,खन्ना सुनते ही खिल उठेंगे लेकिन दुनिया को दिखाने के लिए आँखों पर रूमाल रख लेंगे केवल विवाइ-प्रथा की मर्यादा निभाने के लिए वद्द अपना जीवन धूल में नद्हीं मिला सकता अपनी भात्मा के विकास को नहीं रोक सकता,फिर सुखी जीवन की आशा कहाँ- दोनों की जीवन-धारा अलग आदर्श अलग मनोभाव अलग,केवल विवाह-प्रथा की मर्यादा निभाने के लिए वह अपना जीवन धूल में नहीं मिला सकता अपनी आत्मा के विकास को नहीं रोक सकता - लखतऊ में थानंदोत्वव मवाया जा रहां था ।,कुछ बिगड़े दिल ऐसे भी थे जो उसके मुँह पर थूकने में भी संकोच न करते थे ।,लखनऊ में आनन्दोत्सव मनाया जा रहा था । गला कैसे छूटेगा ?,"बस, वही एक बिल्लौरी हार गले में डाले हुए है ।",गला कैसे छूटेगा ? दवा न आयी ।,"आज से बीस साल पहले उसके यहाँ शक्कर बनती थी, कई हल की खेती होती थी और कारोबार खूब फैला हुआ था ।",दवा न आयी । विधवा सुशीला अब और क्या करती |,"अगर तू अब भी अपना हठ न छोड़ेगी, तो हम बात भी न पूछेंगे ।",विधवा सुशीला अब और क्या करती । उदार ऐसे कि पच्रीस-तीस हज़ार की वार्षिक आय भी व्यय को पूरी न होती थी,सुवामा इसी प्रकार देर तक विनती करती रही,उदार ऐसे कि पचीस-तीस हजार की वार्षिक आय भी व्यय को पूरी न होती थी त॒म्दारी चर्चा के अतिरिक्त उसे कोई बात ही नहीं भाती,तुम उसे कितना प्यार करते थे,तुम्हारी चर्चा के अतिरिक्त उसे कोई बात ही नहीं भाती "भेने इस सक्र में रिआया की दादत का गौर ऐे सलछाइज़ा किया है, और इस नतीजे पर पहुँचा हू. कि सभी मुल्कों में उदको दालत खराब है ।","जिन बदमाशों ने आपको परेशान किया था, अब उनका कहीं निशान भी न रहा, हम लोग उन्हें फिर कभी सिर न उठाने देंगे, सिर्फ हुजूर की आड़ चाहिए ।",मैंने इस सफर में रिआया की हालत का गौर से मुलाहजा किया है और इस नतीजे पर पहुँचा हूँ कि सभी मुल्कों से उनकी हालत खराब है । गला तो छूट जाता ।,नायकराम-इसी से मैं यह संदेसा लेकर आने से इनकार कर रहा था ।,गला तो छूट जाता । "दरिद्वता से जो कुछ दुःख भोगने पढ़ते हैं, वह सब उसे मेलने पड़े |",मैं आप सब साहबों का दास हूँ ।,"दरिद्रता से जो कुछ दुःख भोगने पड़ते हैं, वह सब उसे झेलने पड़े ।" दूसरी औरत कदापि अपनी पत्नी को भाँति रोवा-सत्वार नहीं कर सकती ।,सच्ची लगन किसी में नहीं ।,दूसरी औरत कदापि अपनी पत्नी की भाँति सेवा-सत्कार नहीं कर सकती । "सोफी-आज जब आप सैर करने गई थीं, तो मैं आपके कमरे में चली गई थी ।",सुभागी आज सबेरे आकर मेरे पैरों पर गिर पड़ी और तब से घर से बाहर नहीं निकली ।,"सोफी-आज जब आप सैर करने गई थीं, तो मैं आपके कमरे में चली गई थी ।" "जालपा तुम्हारे चरण धो-धो पियेगी, तुम्हारी इतनी सेवा करेगी कि जवान हो जाओगे ।","तुमने ऐसे गाढ़े समय मेरी बांह पकड़ी, जब मैं बीच धार में बहा जा रहा था ।","जालपा तुम्हारे चरण धो-धो पिएगी,तुम्हारी इतनी सेवा करेगी कि जवान हो जाओगे ।" दोनों देर तक रोती रहीं।,मेरे यहाँ किसी ने तुम्हें कुछ कहा है?,दोनों देर तक रोती रहीं। दो के सिरों पर दो टोकरियाँ थीं ।,उससे निवृत्त होने के लिए हमें कायाकल्प की आवश्यकता है ।,दो के सिरों पर दो टोकरियाँ थीं । "यदि मैं उस जलसे में न आती, तो आज मैं अपने भोंपड़े सें सन्तुष्ट होती !","इसका उत्तर मुझे कितनी ही बार मिला, लेकिन आपके होली वाले जलसे के दिन जो उत्तर मिला, उसने भ्रम दूर कर दिया, मुझे आदर और सम्मान का मार्ग दिखा दिया ।","यदि मैं उस जलसे में न आती, तो आज मैं अपने झोंपड़े में संतुष्ट होती ।" वह शाम तक बेंठा काम करता रहा |,रूपये भुनाते हुए उसे एक रूपया कम हो जाने का ख़याल हुआ ।,वह शाम तक बैठा काम करता रहा । उनकी प्रकृति में दया थी ओर अपने नौकरों पर उनकी कृपादृष्टि रहती थी ।,कुएँ पर एक मनुष्य खड़ा पम्प से पानी निकाल रहा था ।,उनकी प्रकृति में दया थी और अपने नौकरों पर उनकी कृपादृष्टि रहती थी । पचौली में मुसलमानों के कई घर थे ।,रहमान एक गरीब किसान था और गरीब के सभी दुश्मन होते हैं ।,पचौली में मुसलमानों के कई घर थे । "अगर तू अब भी अपनी इृठ न छोड़ेगी, तो हम बात भी न पूछेंगे ।","बाल-बच्चों के भाग में लिखा होगा, तो भगवान् और किसी हीले से देगा ।","अगर तू अब भी अपना हठ न छोड़ेगी, तो हम बात भी न पूछेंगे ।" "कुझ्ली मिल गई, आकर किवाड़ खोले, खाना तैयार था ।",मालूम हुआ कि सुभद्रा के घर किसी काम से गई है ।,"कुंजी मिल गई, आकर किवाड़ खोले, खाना तैयार था ।" फपदर काम लेता है ।,फिर काहे का रोना ।,कसकर काम लेता है । "अभाव में जो पररपर सद्भाव था, वह गायब हो गया था ।","ऐसा मालूम होने लगा , मानो चारों ओर जल-ही-जल है और उसमें और उसमें बही जा रही हूँ।","अभाव में जो परस्पर सद्‌भाव था, वह गायब हो गया ।" दाकिम ने उन्हें दौरे सुपुर्द कर दिया ।,दोनों मुकदमें महीने-भर चलते रहे ।,हाकिम ने उन्हें दोरे सुपुर्द कर दिया । “यह तो ठुमने इनाम देने का काम किया है,जब सास जी प्रयाग का स्नान करती हुईं माघ में काशी पहुंचीं तो वहां का सुप्रबंध देखकर बहुत प्रसन्न हुईं,यह तो तुमने इनाम देने का काम किया है विट्रल---इसमें क्या सोचना-समभना है ?,अभी कुछ सोच लेने दीजिए ।,विट्ठलदास -- इसमें क्या सोचना-समझना है ? आकर सामने खढ़े हो गये ।,विपिन को बुला भेजा ।,आकर सामने खड़े हो गये । "मेरे एक परम मित्र परिदत चिंतामणिजी हूँ, थ्राज्षा हो तो उन्हे भी घुला लू |","तुरन्त खड़े हो कर रानी साहब से बोले , 'सरकार ! आज्ञा हो, तो कुछ कहूँ ।","मेरे एक परममित्र पंडित चिंतामणि जी हैं, आज्ञा हो तो उन्हें भी बुला लूँ ।" "गोकुल ने अवद्ो खीकचइर कहा --देखो, मानी यह चुप रहने छा समय नहीं है ।","इन्द्रनाथ तुमसे प्रेम करता ही है, यों भी निष्कलंक चरित्र का आदमी और बला का दिलेर है ।","गोकुल ने अबकी खीझकर कहा- देखो मानी, यह चुप रहने का समय नहीं है ।" "सुजान ने गभीर भाव से कहा--अ्रगले साल क्या होगा, कान जानता है ।","जो काम गाँव में किसी ने न किया था, वह बाप-दादा के पुण्य-प्रताप से सुजान ने कर दिखाया ।","सुजान ने गंभीर भाव से कहा -अगले साल क्या होगा, कौन जानता है ।" अ्रव सौभाग्य ओर सुश्रवसर ने मुझे वह मोती दे दिया हे जिसके सामने योग्यता ओर विद्वत्ता की चमक फीज़ी पढ़ जाती है ।,"अलोपीदीन ने कलमदान से कलम निकाली और उसे वंशीधर के हाथ में देकर बोले- 'न मुझे विद्वत्ता की चाह है, न अनुभव की, न मर्मज्ञता की, न कार्यकुशलता की ।",अब सौभाग्य और सुअवसर ने मुझे वह मोती दे दिया जिसके सामने योग्यता और विद्वत्ता की चमक फीकी पड जाती है । "राजा ईश्वर का प्रतिनिधि है, उसकी आजा के विरुद्ध चलना महान पातक हैँ ।",चौधरी के सब श्रद्धाभाजन बन गये ।,राजा ईश्वर का प्रतिनिधि है उसकी आज्ञा के विरुद्ध चलना महान पातक है । यह भूसा तो मैंने रातो-रात ढोकरः छिपा दिया गेट था नहीं तिनका भी न बचता,उनकी दया है,यह भूसा तो मैंने रातों-रात ढो कर छिपा दिया था नहीं तिनका भी न बचता "में देवासुर-सप्राम के लिए कमर के बेटा था , मगर पिताजी के मुख पर लेश-मात्र भी मैलन आया ।",उनकी बोतल और गिलास को पत्थर पर इतनी जोर से पटका कि भगवान् कृष्ण ने कंस को भी इतनी जोर से न पटका होगा ।,मैं देवासुर-संग्राम के लिए कमर कसे बैठा था; मगर पिताजी के मुख पर लेशमात्र भी मैल न आया । हर एक आऔँस अखाड़े को वरक छगी हुई थी ओर हर एक का दिल हरदोल को मएनकामता के छिए ईमबर का प्रार्यी था ।,"बुंदेलों के दिलों पर उस समय जैसी बीत रही थी, उसका अनुमान करना कठिन है ।",हर एक आँख अखाड़े की तरफ़ लगी हुई थी और हर एक का दिल हरदौल की मंगल-कामना के लिए ईश्वर का प्रार्थी था । बेद्दोश पढ़ी हुई हैं ।,आप क्रोध से बौखलाये हुए हैं ।,बेहोश पड़ी हुई हैं । "तुमसे तो में नहीं पूछने जाती , हालाँकि रोज़ तुम्हे पुलिन्दों पत्र लिखते देखती हू ।",' आशा को जुगल की इन भोली बातों पर खूब हँसी आ रही थी ।,तुमसे तो मैं नहीं पूछने जाती ; हालाँकि रोज तुम्हें पुलिन्दों पत्र लिखते देखती हूँ । "ये लोग लात के आदमी हैं, बातों से न मानेंगे ।",इतनी बड़ी जिम्मेदारी सिर पर लेने से तो यह कहीं अच्छा होता ।,"ये लोग लात के आदमी हैं, बातों से न मानेंगे ।" पाँच रुपये मासिक वेतन पाता था ।,उस रात को मुझे देर तक नींद नहीं आयी ।,पाँच रुपये मासिक वेतन पाता था । तुम्हारे लिए यही क्या कम है कि तुमने इसे मुझे 'दे दिया ।,"अगर सब्र न आता हो, तो मेरा ही कंगन ले लो, मैं फिर बनवा लूँगी ।",तुम्हारे लिए यही क्या कम है कि तुमने इसे मुझे दे दिया । यह साधारण च्ल्रियों का गुरा था और ब्राह्मणियों का तो पूछना ही क्या ?,"यही वह विलक्षण भूमि है जहां स्त्रियाँ नाना प्रकार के कष्ट भोग कर, अपमान और निरादर सह कर पुरुषों की अमानुषीय क्ररताओं को चित्त में न ला कर हिंदू जाति का मुख उज्ज्वल करती थीं ।",यह साधारण स्त्रियों का गुण था और ब्राह्मणियों का तो पूछना ही क्या ? "वह दूसरे मकान की खोज में चारों भ्रोर जाता, पर किराया सुनते ही निराश होकर लौट झाता ।",उसे यह निश्चय हो गया था कि उन्हीं की कुसंगति से सुमन का यह हाल हो गया है ।,"वह दूसरे मकान की खोज में चारों ओर जाता, पर किराया सुनते ही निराश होकर लौट आता ।" "जानते नहीं दो, पिया मरे स्व नहीँ मिलता ।",चिंतामणि- तो अब तुम्हारा किया कुछ न होगा ?,"जानते नहीं हो, बिना मरे स्वर्ग नहीं मिलता ।" उन्तके सुख को वह अपना सुख और उनके दुःख को अपना दु ख मानते हैं ।,"उस एक रोटी से इनकी भूख तो क्या शान्त होती , पर दोनों के हृदय को मानो भोजन मिल गया ।",उनके सुख को वह अपना सुख और उनके दु:ख को अपना दु:ख मानते हैं । उसके पीछे दो थानेदार और कई कान्सटेबल चले झा रहे थे।,"दारोगा जी संध्या समय थाने में मसनद लगाये बैठे थे, उस समय सामने से सुपरिन्टेन्डेन्ट पुलिस आता हुआ दिखाई दिया ।",उसके पीछे दो थानेदार और कई कान्सटेबल चले आ रहे थे । सुमन ने अवश्य ही मेरा पता लगा लिया है और चाची के पास यह कंगन भेज दिया है ।,यह हो सकता है कि यह उसी नमूने का दूसरा कंगन हो लेकिन इतनी जल्दी वह तैयार नहीं हो सकता ।,सुमन ने अवश्य ही मेरा पता लगा लिया है और चाची के पास यह कंगन भेज दिया है । भब फिर बदनामी के सामान होते नज़र आ रहे हैं ।,"भीतर-बाहर कुहराम मच गया, पिट्टस पड़ गयी ।",अब फिर बदनामी के सामान होते नजर आ रहे हैं । भा में केवल वात्सल्य है,इससे भी प्यारा और कोई नाता संसार में है मैं नहीं समझती,माँ में केवल वात्सल्य है भ्रन्त में वह निराश हो गई ।,"सात बज गए, लेकिन सदन न आया ।",अन्त में वह निराश हो गई । इमारा रोग असाध्य हो गया है ।,इस वक्तृता ने सिद्ध कर दिया कि भारत के उद्धार का कोई उपाय है तो वह स्वराज्य है जिसका आशय है मन और वचन की पूर्ण स्वाधीनता ।,हमारा रोग असाध्य हो गया है । एक दिन शर्माजी सैर करने जा रहे थे कि रास्ते में दो सज्जनों से भेंट हो गईं ।,"बहुत चाहते कि सदन को इधर आने से रोकें, किंतु लज्जावश कुछ न कह सकते ।",एक दिन शर्माजी सेर करने जा रहे थे कि रास्ते में दो सज्जनों से भेंट हो गई । उसने फिर भर फरनसी अिकी सुमन की तरफ नहीं देखा ।,अभी-अभी मैंने अपने को इतना समझाया है ओर इतनी ही देर में फिर वही कुवासनाओं में पड़ गया ।,उसने फिर सुमन की तरफ नहीं देखा । "वह धीरे-धीरे एक ऐसे स्थान पर आया, जहाँ से सुमन की अट्टालिका साफ दिखाई देती थी ।",उसकी प्रेमाकांक्षा मंद हो गई ।,वह धीरे-धीरे एक ऐसे स्थान पर आया जहाँ से सुमन की अट्टालिका साफ दिखाई देती थी । इसी से चिरकाल तक झापकी कीति * बनी रहेगी ।,यदि यह स्वीकार न हो तो अमोला में दो सो रुपए की लागत से एक पक्का कुँआ बनवा दीजिए ।,इसी से चिरकाल तक आप की कीर्ति बनी रहेगी । श्राप इस आन्दोलन से स्वभाव तो नहीं बदल सकते ।,इससे यही सिद्ध होता है कि इस विषय में मनुष्य का स्वभाव ही प्रधान है ।,आप इस आंदोलन से स्वभाव तो नहीं बदल सकते । मेरे पास कुल तीन रुपये थे ।,"नित्य नये दृश्य थे, नये विनोद, नये उल्लास ।",मेरे पास कुल तीन रुपये थे । भुद्को है तो ज़रा-सी ; पर उसमें दुनिया-सर को मिठाइयों को मिठांस और तमाशों छा आनन्द भरा हुआ है ।,तुम्हारे यहाँ मड़ैया डालने से क्या हुआ ?,"गुल्ली है तो जरा-सी, पर उसमें दुनिया-भर की मिठाइयों की मिठास और तमाशों का आनन्द भरा हुआ है ।" "उसके छत गुप्त रहस्यों को प्रकाश में लाना उसके प्रति कितना घोर अन्याय होगा! नहीं, में मेन्री को क्ंकित न करूँगा, उम्रकों निर्मल कौति पर धब्जा न लगाऊँ पा, मैन्नी पर वज़ाधात न एकूँगा ।",उसके वैयक्तिक तथा जातीय कर्तव्य में घोर संग्राम होने लगा ।,"उसके उन गुप्त रहस्यों को प्रकाश में लाना उसके प्रति घोर अन्याय होगा ! नहीं, मैं मैत्री को कलंकित न करूँगा, उसकी निर्मल कीर्ति पर धब्बा न लगाऊँगा, मैत्री पर वज्राघात न करूँगा ।" उसे सुमन पर विश्वास नथा।,"अपने घर एक क्षण के लिए जाती और कच्चा-पक्का बनाकर फिर भाग आती, पर गजाधर उसकी इन बातों से जलता था ।",उसे सुमन पर विश्वास न था । "देवता उसकी पूजा स्वीकार करता डे या नहीं, यह सोचना उसका धर्म नहीं ।","मुझे इस भेंट को , इन फूलों को अपने चरणों पर रखने दीजिए ।","देवता उसकी पूजा स्वीकार करता है या नहीं , यह सोचना उसका धार्म नहीं ।" "चलो, पैदल ही चलें |","बेटा, उतरो, बारात स्टेशन पहुँच रही होगी ।",चलो पैदल ही चलें । जॉन सेवक-जो तुम लोग तय कर दो ।,वह कोई-न-कोई राह जरूर निकालेगा ।,जॉन सेवक-जो तुम लोग तय कर दो । जान निकल जायगी,मुसीबत में ही आदमी दूसरों के सामने हाथ फैलाता है,जान निकल जायगी "तुम्हारे लायक़ तो वह जगह नहीं है, चाहो तो कर लो ।",कई बार बचा चुका हूँ ।,"तुम्हारे लायक तो वह जगह नहीं है, चाहो तो कर लो ।" "इन्तजाम यही था कि कोई ई 2 और चूने- वाला फेस जाय और दस-बीस हज़ार का दस्तावेज़ लिखा छे, तो सूद मे ईंट और चूना भी मिल जाय ।","वह दिल के मजबूत आदमी थे , धमकियों से डरना उन्होंने न सीखा था , मुर्दों से भी अपनी रकम वसूल कर लेते थे ।","इन्तजार यही था कि कोई ईंट और चूने वाला फँस जाय और दस-बीस हजार का दस्तावेज लिखा ले , तो सूद में ईंट और चूना भी मिल जाय ।" वह अँधेरे बरामदे में एक मिनट खड़ा रहा ।,लूँगा इंस्पेक्टरी और कल दस बजे मेरे पास नियुक्ति का परवाना आ जाना चाहिए ।,वह अंधेरे बरामदे में एक मिनट खडा रहा । रात को भेस बदलकर रेयत का द्वाल-चाल जानने के लिए निकलते * २६० कर्मभूमि हैं अगर ऐसी भरजी तेयार को जाय जिसपर हम सबके दसखत हो और वद शदशाह के सामने पेघ को जाय तो उसपर ज़रूर लिट्ठाज किया जायगा,अमीरबेग ने अपनी सारस की-सी गर्दन उठाई-बहूजी मैं तो कोई कायदा-कानून नहीं जानता मगर इतना जानता हूँ कि बादशाह रैयत के साथ इंसाफ जरूर करते हैं,रातों को भेस बदलकर रैयत का हाल-चाल जानने के लिए निकलते हैं अगर ऐसी अरजी तैयार की जाय जिस पर हम सबके दसखत हों और बादशाह के सामने पेश की जाय तो उस पर जरूर लिहाज किया जाएगा "ह चौथे दिन उसने रेवती से कह्य-बेटी, तूने बड़े पचजी का घर तो देखा है ।",बुढ़िया ओझे-सयानों के पास दौड़ती फिरती थी; पर ज्वर उतरने का नाम न लेता था ।,"चौथे दिन उसने रेवती से कहा, 'बेटी, तूने बड़े पंचजी का घर तो देखा है ।" ऐसो सजनता से मिले रि में क्‍या कहूँ कद्दा-हर्में तो कुछ माद्म ही नहीं पहले ही क्‍यों न सूचना दो नहीं हममे वसूलो बंद कर दौ होती,बहुत से लोग पूछने लगे-भैया क्या हुकुम हुआ- अमर ने डॉक्टर की तरह मरीजों को तसल्ली दी-महन्तजी को तुम लोग व्यर्थ बदनाम कर रहे थे,ऐसी सज्जनता से मिले कि मैं क्या कहूँ- कहा-हमें तो कुछ मालूम ही नहीं पहले ही क्यों न सूचना दी नहीं तो हमने वसूली बंद कर दी होती लेकिन इस वक़्त इस प्रश्न को छेड़ना उचित नहीं ।,बाहर वालों से मिलने की रोक-टोक है ।,लेकिन इस वक्त इस प्रश्न को छेड़ना उचित नहीं । दोनों आदमियों ने कुछ रात रहे ही उठझर स्नान किया और दिन निकलने के पहले व्योढ़ी पर जा पहुँचे,मुझे तो ऐसा जान पड़ता है कि कल भी दर्सन न होंगे,दोनों आदमियों ने कुछ रात रहे ही उठकर स्नान किया और दिन निकलने के पहले डयोढ़ी पर जा पहुँचे सब कुछ भाग्य के श्धीन है ।,"जिसका जी चाहेगा खायेगा, जिसका जी न चाहेगा, न खायेगा ।",सब कुछ भाग्य के अधीन है । यार ज़िन्दा व सोहबत बाकी ।,"मैं हठ नहीं करती, लेकिन यहाँ मेरा जीवन अपाढ़ हो जायेगा ।",यार जिंदा व सोहबत बाकी । बहू दो पहले सछुराल जाती दे दो उसका क्वितना मद्दातम होता है ।,"जोखू- मैं चाहता हूँ कि वह तुम्हारी तरह हो, ऐसी गंभीर हो, ऐसी ही बातचीत में चतुर हो, ऐसा ही अच्छा पकाती हो, ऐसी ही किफायती हो, ऐसी ही हँसमुख हो ।",बहू तो पहले ससुराल जाती है तो उसका कितना महातम होता है । श्रव वह प्रेम को यथार्थ रूप में देखेगा और यथार्थ रूप में दिखाएगा ।,अब उसे बहुरूप धरने की आवश्यकता नहीं ।,अब वह प्रेम को यथार्थ रूप में देखेगा और यथार्थ रूप में दिखाएगा । "अगर मुक्त एक दिन' की भी देर हो जाती, तो तारा का पत्र आ पहुँचता ।",हर एक तातील में लखनऊ अवश्य जाता और गर्मियों की छुट्टी तो पूरी लखनऊ ही में कटती थी ।,"अगर मुझे एक दिन की भी देर हो जाती , तो तारा का पत्र आ पहुँचता ।" "कोई अपने घर से रोटियाँ लाया, कोई गुड़, कोई चोकर, कोई भूसी ।",झूरी बैलों को देखकर स्नेह से गद्गद हो गया ।,"कोई अपने घर से रोटियाँ लाया , कोई गुड़ , कोई चोकर , कोई भूसी ।" उधर कांग्रेस के कर्मचारी भी दल-वक सहित दौड़े ।,जरा देर में मय सशस्त्र पुलिस के थानेदार और इन्सपेक्टर साहब आ पहुँचे ।,उधर काँग्रेस के कर्मचारी भी दल-बल सहित दौड़े । "सैठजी बहुत कठिनाई से ऊपर भ्राये बोले-- कहाँ हो देवी, आज बग्घी क्यों लौटा दी ?",उसके न आने का क्या कारण है ?,"सैठजी बहुत कठिनाई से ऊपर आए और हाँफते हुए बोले -- कहाँ हो देवी, आज बग्घी क्यों लौटा दी ?" विवाह की तेयारियाँ पूरी दो गई थीं ।,"आँखें डबडबा आयीं, कंठावरोध के कारण मुँह तक न खोल सका ।",विवाह की तैयारियाँ पूरी हो गयी थीं । अ्रधीर होकर वोले--मैं कह चुका कि मैं वहाँ न जाऊंगा ।,पंडितजी से अब सब्र न हो सका ।,अधीर हो कर बोले -- मैं कह चुका कि में वहाँ न जाऊँगा । "उस दिन के बाद एक सप्ताह हो गया, पर विनयसिंह ने राजपूताने को प्रस्थान न किया ।",प्रेम अभय का मंत्र है ।,"उस दिन के बाद एक सप्ताह हो गया, पर विनयसिंह ने राजपूताने को प्रस्थान न किया ।" दवैमरा पत्र ज्ञानप्रकाश को लिसा कि माता-पिता कौ आजा को शिरोधार्य करो ।,"उनके मन में यह दुखानेवाला संदेह उत्पन्न करके भी यदि मैं जीता ही रहूँ और अपने मन की पवित्रता जताऊँ, तो मेरी ढिठाई है ।",दूसरा पत्र ज्ञानप्रकाश को लिखा कि माता-पिता की आज्ञा को शिरोधार्य करो । दोनो वक्त उत्तम पदार्थ खाने को मिलने लगे ।,कोई पागल मालूम होता है ।,दोनों वक्त उत्तम पदार्थ खाने को मिलने लगे । शत्तिवादियिं को अप नादिर की याद थाई |,"सच्चा आदमी एक मुलाकात में ही जीवन को बदल सकता है, आत्मा को जगा सकता है और अज्ञान को मिटाकर प्रकाश की ज्योति फैला सकता है, यह आज सिध्द हो गया ।",शक्तिवादियों को अब नादिर की याद आयी । उससे कभी न रूठना,इस पर सदा दया-दृष्टि रखना,उससे कभी न रूठना आइट पाकर प्यारी की आँखें -खुल गई' ; पर उसने नींद का बहाना दिया और ७घखुली आँखों से यह जानन्द को ढ़ा देखने लगी ।,"प्यारी ने ऐसा मुँह बनाया, मानो वह ऐसी बूढ़ी बातें बहुत सुन चुकी है, और बोली- जो अपने हैं, वे भी न पूछें, तो भी अपने ही रहते हैं ।",आहट पाकर प्यारी की आँखें खुल गयीं; पर उसने नींद का बहाना किया और अधखुली आँखों से यह आनन्द-क्रीड़ा देखने लगी । ". लेकिद क्वार का महोना आया क्ञो टामो का चित्त ;एक बार फ़िर अपने पुंरादे सहचरो हें मिलने के लिए छाछायित होने, छगा गा ।",दौड़ते-दौड़ते हाँफने लगता बेदम हो जाता मगर चित्त को शांति न मिलती ।,लेकिन क्वार का महीना आया तो टामी का चित्त एक बार फिर अपने पुराने सहचरी से मिलने के लिए लालायित होने लगा । यह स्थान तुम्हारे योग्य नहीं ।,अब और क्या कहूँ ।,यह स्थान तुम्हारे योग्य नहीं । "यहाँ से जवाब मिज्रता, चलो, आते हैं; दस्तरणवान ,बिछाओं ।","शतरंज, ताश, गंजीफ़ा खेलने से बुद्धि तीव्र होती है, विचार-शक्ति का विकास होता है, पेंचीदा मसलों को सुलझाने की आदत पड़ती है ।","यहाँ से जवाब मिलता- चलो, आते हैं, दस्तरख्वान बिछाओ ।" "भाप हमारे कमरे में कई-कई झालमारियाँ पुस्तकों से सजी हुई देखेंगे,","हम जानते है कि कौन-सा समय सोला हेट लगाने का है, कौन-सा पगड़ी का ।",आप हमारे कमरे में कई-कई अलमारियाँ पुस्तकों से सजी भरी है । "इस बर्बरता की भी कोई हद हे कि जिसके साथ तीन वर्ष तक जीवन के सुख भोगे, उसे एक जरान्सीः वात पर घर से निकाल दिया ।","जामिद-- इसका बदला यही है कि इस शरारत का बदला किसी ग़रीब मुसलमान से न लीजिएगा, मेरी आपसे यही दरख़्वास्त है ।","इस बर्बरता की भी कोई हद है कि जिसके साथ तीन वर्ष तक जीवन के सुख भोगे, उसे एक जरा-सी बात पर घर से निकाल दिया ।" मिर्जा ने तुरन्त उन्हें उठाया और अपने रूमाल से हवा: करते हुए उनकी पीठ ठोंकी,आँखों के सामने अँधेरा छा गया,मिर्जा ने तुरंत उन्हें उठाया और अपने रूमाल से हवा करते हुए उनकी पीठ ठोंकी "वयस्क होने पर वह झालसी, क्रोधी और वड़ा .उद्दरड ही गया ।","सदन बाल्यकाल में ढीठ, हठी ओर लड़ाका था ।","वयस्क होने पर वह आलसी, क्रोधी ओर बड़ा उद्दण्ड हो गया ।" "इतनी जल्दी कायापलट हो गई ! जानवर लेकर उसे लौटा दोगे, तो क्या बात रह जाएगी ?",सुभद्रा विस्मित हो कर बोली -- यह क्या ?,इतनी जल्दी कायापलट हो गई जानवर ले कर उसे लोटा दोगे तो क्या बात रह जाएगी ? श्राज इसके बेटे हैँ और यह उनकी माँ है ।,"जेठ-बैसाख की दोपहरी में भी दम न लेता था, और अब मेरा घर पर इतना भी अधिकार नहीं है कि भीख तक न दे सकूँ ।",आज उसके बेटे हैं और यह उनकी माँ है । "! रहमान एक गरीब किसान था, और गरीब के सभी दुश्मन द्वोते हैं ।","आप बड़े मौके से आ गये, नहीं तो ये सब जबरदस्ती से गऊ को छीन ले जाते ।",रहमान एक गरीब किसान था और गरीब के सभी दुश्मन होते हैं । "अत्र भो रूला को जनता के दुराप्नह पर बलिदान कर्के वह अपनी राजसत्ता क्ो रक्षा कर बढ़ता था, पर लेला रे प्राणों से प्रिय थी ।",आज से गल्ले का महसूल घटाकर आधा कर दिया गया है और तुम्हारे सिर से महसूल का बोझ पाँच करोड़ कम हो गया है ।,"अब भी लैला को जनता के दुराग्रह पर बलिदान करके वह अपनी राजसत्ता की रक्षा कर सकता था, पर लैला उसे प्राणों से प्रिय थी ।" "बुलाकी--आद मैंने मर-मरकर पीसा है, अनाज दे दो ।","बुलाकी , बहुत अच्छा किया तुमने, बकने दिया करो ।","बुलाकी , आटा मैंने मर-मर कर पीसा है, अनाज दे दो ।" "घुमन ने सोचकर कहा--क्या करू बहिन लोक-लाज का डर है, नहीं तो आराम से रहना किसे बुरा मावूम होता है ?",लेकिन हम सब वही पुरानी लकीर पीटे चली जा रही है ।,"सुमन ने सोचकर कहा -- क्या करूँ बहिन लोक-लाज का डर है, नहीं तो आराम से रहना किसे बुरा मालूम होता है ?" "भाज्न ढ॒द्दार करा देर फे लिए बाहर ले गया था, उसी ने सदी में छोड़ दिया होगा ।",व्यग्र होकर बोली- जरा आग जलाओ ।,"आज कहार जरा देर के लिए बाहर ले गया था, उसी ने सर्दी में छोड़ दिया होगा ।" "हम दोनों प्रेस की नौका पर ऐश्वर्य और वेभव- नंद की सर करेंगे, प्रेम-कुझ्ों में बैठकर प्रेमनचर्चा करेंगे और आनन्द के मनोहर राग गादेंगे |","सेवा ने मुझे, आदर, सुख सबसेनिवृत्त कर दिया ।","हम दोनों प्रेम की नौका पर ऐश्वर्य और वैभव की नदी की सैर करेंगे, प्रेम कुंजों में बैठकर प्रेम-चर्चा करेंगे और आनंद के मनोहर राग गाएँगे ।" विनयसिंह बहुत रात गए सोए थे और अभी तक मीठी नींद के मजे ले रहे थे ।,यह परख और परीक्षा कब तक ?,विनयसिंह बहुत रात गए सोए थे और अभी तक मीठी नींद के मजे ले रहे थे । पहले हाजी साहव ने मुसलमान मेम्वरों को एकत्र किया ।,"उन्हें मालूम हो गया था कि शीघ्र ही यह मंतव्य सभा में उपस्थित होगा, इसलिए दोनों महाशय अपने पक्ष को स्थिर करने में तत्पर हो रहे थे ।",पहले हाजी साहब ने मुसलमान मेम्बरों को एकत्र किया । "हम लोग गरम न पड़ते, तो हजम कर जाता ।","इस भीड़ को तुरंत हट जाना चाहिए, नहीं तो रुपये मिलने में देर होगी ।","हम लोग गरम न पड़ते, तो हजम कर जाता ।" छोग अपनोन्‍अपनी तलवारे गमालन छगे और चारों तर झोर मच गया ।,हृदय सुख स्वप्न देखने लगा ।,लोग अपनी-अपनी तलवारें सँभालने लगे और चारों तरफ शोर मच गया । व्यापार में ज़्यादा पजी छगाभो ज़्यादा नफ़ा द्वोगा,यह किराए की तालीम हमारे कैरेक्टर को तबाह किए डालती है,व्यापार में ज्यादा पूंजी लगाओ ज्यादा नगा होगा दो नावें लिये आइर सुखदा को उठाने लगमौ--जिसकी नाव किनारे तक पहुँच जाय उप्को जीत,इसी वक्त नैना ने पुकारा-भाभी आओ नाव-नाव खेलें,दो नावें लिए आकर सुखदा को उठाने लगी-जिसकी नाव किनारे तक पहुँच जाय उसकी जीत सुखदा के चमरे के द्वार पर जाकर खड़ा हो गया पर अन्दर पाँव न रख सका,तुम लोगों ने तो व्यर्थ ही संसार में जन्म लिया,सुखदा के कमरे के द्वार पर जाकर खड़ा हो गया पर अंदर पाँव न रख सका "द्वामिद के पाँव में जूते नहीं हैं, सिर पर एक पुरानी-घुरानी टोपी है, जिसका गोठा काला पढ़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है ।",उसके अब्बाजान रूपये कमाने गए हैं ।,"हामिद के पाँव में जूते नहीं हैं, सिर पर एक पुरानी-धुरानी टोपी है, जिसका गोटा काला पड़ गया है, फिर भी वह प्रसन्न है ।" "वह चद्दान पर बैठ कर सोचने लगे--क्ष्या करूँ, बुद्धि कुछ काम नहीं करती ।","तब वह लोहे की छड़ से काम लेने लगे, लेकिन कई दिनों तक जोर लगाने पर भी चट्टानें न खिसकीं ।","वह चट्टान पर बैठ कर सोचने लगे क्या करूँ, बुद्धि कुछ काम नहीं करती ।" दस वजे तक लौट आयेंगे इस चक्त मुझे ज़रा सद्ीना से मिलना है,नहीं आप अकेले न जायें,दस बजे रात तक लौट आयेंगे इस वक्त मुझे जरा सकीना से मिलना है "विद्यालय उसके लिए क्रीढ़ा का स्थाव था, और क्षम्री-कभो बेच पर खड़े दोने का ।",फिर विशेष चिंता का कोई कारण न था ।,विद्यालय उसके लिए क्रीड़ा का स्थान था; और कभी-कभी बेंच पर खड़े होने का । "तागे वाला पीछे लपका , मगर जासद ने उसे इतने जोर से घक्का दिया कि वह आधा मुँह जा गिरा ।",जामिद अब तक चुपचाप खड़ा था ।,"तांगे वाला पीछे लपका, मगर जामिद ने उसे इतनी जोर से धक्का दिया कि वह औंधे मुँह जा गिरा ।" "इतना ही नहीं, उसने पीपल की परिक्रमा की और उसे दोनों हाथों से वलपूर्वक हिलाने की 'चेष्टा की ।",वह अपने भीरु हृदय को लज्जित करने के लिए कई मिनट तक पीपल के नीचे खड़ा रहा ।,"इतना ही नहीं, उसने पीपल की परिक्रमा की ओर उसे दोनों हाथों से बलपूर्वक हिलाने की चेष्टा की ।" सुमन ने पीछे फिरकर कातर नेत्रों से देखा।,क्या सरकार ने तेरे ही लिए बेंच रख दी है ?,सुमन ने पीछे फिरकर कातर नेत्रों से देखा । पहले दोनों ने डकार छी ।,खेत में मटर खड़ी थी ।,पहले दोनों ने डकार ली । "नरम-- खेर, खुदा उन्हें जल्द दुनिया से नजात दे ।","मोटी-ताजी महिला थीं, छींट का घाघरेदार लहँगा पहने, पानदान बगल में रखे, गहनों से लदी हुई, सारे दिन बरोठे में माची पर बैठी रहती थीं ।","गिरिधर- खैर, खुदा उन्हें जल्द दुनिया से नजात दे ।" इतने में शायद वहः घर पहुँच जाये ।,उन्हें चौधरी साहब ने कुछ नहीं दिया ।,इतने में शायद वह घर पहुँच जाएँ । "पर मन कहता था, इसमें तुम्हारा क्‍या अपराध ?",इतने दिनों तक त्याग का आनंद उठाने के बाद बुढ़ापे में यह कलंक !,"पर मन कहता था, इसमें तुम्हारा क्या अपराध ?" "इसलिए सोचा था, क्यों बाहरवालों को बुशर्क ।","अन्त को उसने निश्चय किया, मैं इसे न दूँगा, चाहे मेरी जान ही पर क्यों न बन जाय ।","इसलिए सोचा था, क्यों बाहरवालों को बुलाऊँ ।" कुल ऊँचा और घनी ।,"वर सुन्दर, सुशील सुशिक्षित था ।",कुछ ऊँचा और धनी । "परमात्मा फरे, मेरा अनुमान ठीक हो ।","हाँ, इतना मुझे भी मालूम होता है कि इन्हें क्षय का केवल भ्रम है ।",परमात्मा करे मेरा अनुमान ठीक हो । मानव चरित्र की दुबंलताएं उनके जीवन की आधार थीं |,मुंशी रामसेवक चाँदपुर गाँव के एक बड़े रईस थे ।,मानव चरित्र की दुर्बलताएँ उनके जीवन का आधार थीं । शोभा के घर से खुरपी माँगकर लाया और कोई जड़ी खोदकर गाय को खिला दी,कहता था एक जड़ी खोदना है,सोभा के घर से खुरपी माँग कर लाया और कोई जड़ी खोद कर गाय को खिला दी क्या रात-मर लोथ पड़ी रदेगी ?,धीरे-धीरे नौ बजे; पर अब तक बाबू जी न लौटे ।,क्या रात भर लोथ पड़ी रहेगी ? यही गाय तीन साज् पहले आई होती तो सभी का उस पर बराबर अधिकार होता,उसका हृदय यह विभूति पा कर विशाल हो गया था,यही गाय तीन साल पहले आई होती तो सभी का उस पर बराबर अधिकार होता "क्या सोचा था, क्‍या हुआ ! मे केले कर समोस्ते और कोफते साते और गपडचौध मचाते ।",पड़े-पड़े खर्राटे लेने दो ।,क्या सोचा था क्या हुआ ! मजे ले-ले कर समोसे और कोफ्ते खाते और गपड़चौथ मचाते । अकस्मात्‌ सुरन ने दो कान्प्टेवलों को कन्धे पर लट्ट रखे भ्राते देखा ।,पशुबल ने मनुष्य को परास्त कर दिया ।,अकस्मात् सुमन ने दो कान्सटेबलों को कन्धे पर लट्ट रखे आते देखा । "कुंवर साहब ने वड्ी दृढ़ता से कहा--हाँ, यह तो निश्चय है कि सत्मवादी मनुष्य का आदर सव कही होता है, कितु मेरे यहाँ तनख्वाह अधिक नहीं दी जातो ।",कितने ऐसे हैं जो बिना तनख्वाह के कारिंदगी या चपरासगिरी को तैयार बैठे हैं ।,कुँवर साहब ने बड़ी दृढ़ता से कहा-हाँ यह तो निश्चय है कि सत्यवादी मनुष्य का आदर सब कहीं होता है किंतु मेरे यहाँ तनख्वाह अधिक नहीं दी जाती । ईंइरी खूब अण्डे.मंगवाता और कमरे में 'स्टोव! पर आमलेट बनते ।,मैं हमेशा अपनी धोती खुद छाँट लिया करता हूँ; मगर यहाँ मैंने ईश्वरी की ही भाँति अपनी धोती भी छोड़ दी ।,ईश्वरी खूब अंडे मँगवाता और कमरे में ‘स्टोव’ पर आमलेट बनते । ईश्वर को धन्यवाद दो कि उसने हमारी विनय सुन ली ।,उन पिछली बातों को भूल जाइए ।,ईश्वर को धन्यवाद दो कि उसने हमारी विनय सुन ली । ठाकुग्जी क्या किसी के हाथों विक्र गये हैँ कि कोई उन्हें बन्द कर रखे |,"सुखिया ने घर पहुँचकर बालक के गले में जंतर बाँधा दिया; पर ज्यों-ज्यों रात गुज़रती थी, उसका ज्वर भी बढ़ता जाता था, यहाँ तक कि तीन बजते-बजते उसके हाथ-पाँव शीतल होने लगे ! तब वह घबड़ा उठी और सोचने लगी, हाय ! मैं व्यर्थ ही संकोच में पड़ी रही और बिना ठाकुर जी के दर्शन किये चली आयी ।",ठाकुर जी क्या किसी के हाथों बिक गये हैं कि कोई उन्हें बंद कर रखे । "फ़्यादा नहीं, तो बारह जाने तो घोड़े ही को चाहिए, घात ऊपर से |",जब मैंने बहुत मजबूर किया; तो आपने पत्र लिखा ।,"ज्यादा नहीं तो बारह आने तो घोड़े ही को चाहिए, घास ऊपर से ।" वही पुलिस की सिखायी हुई शहादत थी जिसका आशय वह देंवीदीन के मुँह से सुन चुकी थी ।,"जालपा का कलेजा धक-धक कर रहा था, मानो उसके भाग्य का निर्णय हो रहा हो ।",वही पुलिस की सिखाई हुई शहादत थी जिसका आशय वह देवीदीन के मुँह से सुन चुकी थी । फूल्मती ने सिर पीटकर कद्दा--तो ऐसी बातें क्यों लिखते हो बेटा ?,फूलमती ने सशंक होकर पूछा- तुम दोनों घबड़ाये हुए मालूम होते हो ?,फूलमती ने सिर पीटकर कहा- ऐसी बातें क्यों लिखते हो बेटा ? शाम होते-दहोते दोनों को हैल्ा हो गया और दोनों माँ-बाप को रोता छोड़ चल बसे ।,तीसरे दिन दोनों बच्चे दादा-दादी के लिए रोते-रोते बैठके में जा पहुँचे ।,शाम होते-होते दोनों को हैजा हो गया और दोनों माँ-बाप को रोता छोड़ चल बसे । जलती हुई रेत में तलवे भुन जाते ।,साधु के लिए गंगा से जल लाती ।,जलती हुई रेत में तलवे भुन जाते । मोटे द्िसाब से हमें दो हजार मिलता चाहिए ।,पाँच सौ रुपये साल का नफा तो दस साल पहले था ।,मोटे हिसाब से हमें दो हजार मिलना चाहिए । बेचारा उनसे मुँह छिपाता फिरता है ।,यों कलम घिसना दूसरी बात है ।,बेचारा उनसे मुँह छिपाता फिरता है । उद्षकी आत्मा से यह आनन्द भी छीन लूँ ?,मेरे और उनके बीच केवल दो साल का अन्तर रह गया ।,उसकी आत्मा से यह आनन्द भी छीन लूँ ? बहुतेरे वहीं जाकर जमे ।,"सारा चौमासा बीत गया, पानी की एक बूँद न गिरी ।",बहुतेरे वहीं जाकर जमे । किन्तु हर प्रकार से वह इसी परिणाम पर पहुँचता था ।,सदन ने बहुत विचार किया ।,किन्तु हर प्रकार से वह इसी परिणाम पर पहुँचता था । सामने वृक्ष पर एंक मोर बेठा हुआ था,तब तो तुम मुझे मार ही डालोगे,सामने वृक्ष पर एक मोर बैठा हुआ था "दस, उन्हें फेंसाए रखना चाहिए ।",यहाँ तो सिर्फ रईस लोग आते है ।,"बस, उन्हें फँसाए रखना चाहिए ।" "जवानी की उम्र है ही, खरच हो गये होंगे ।","इन बेचारों पर दया की नज़र रहे हुजूर, बेचारे बडे सीधे आदमी हैं ।","जवानी की उम्र है ही, ख़र्च हो गए होंगे ।" "शहद के जितने चोर-डाकू हैं, सब इनसे मिले रहते हैँ ।",घर की मिल्कियत उन्हीं की निगरानी में है ।,"शहर के जितने चोर-डाकू हैं, सब इनसे मिले रहते हैं ।" "उन्हीं दिनों की बात है, मेंने तीजे काव्रत किया था ।","दो-दिन को भी बाहर जाते हैं, तो जरूर एक पत्र भेजते हैं, और जब दस-पाँच दिन को जाते हैं, तो नित्य प्रति एक पत्र आता है ।","उन्हीं दिनों की बात है, मैंने तीजे का व्रत किया था ।" मनहर की इच्छा थी कि वागीद्वरी भी साथ चले; पर वागीख्घवरी उसके पॉँब की बेढ़ी न बनना चाहतो थी ।,और यह सब कुछ वागेश्वरी की भहोरणा का शूभ-फल था ।,"मनहर की इच्छा थी कि वागेश्वरी भी साथ चले, पर वागेश्वरी उनके पाँव की बेड़ी नहीं बनना चाहती थी ।" दूसरे दिन ज्वर द्वो आया,कई दिनों तो उन्होंने दूध पर काटे फिर कई दिन फल खाकर रहे लेकिन रोटी-दाल के लिए जी तरसता रहता था,दूसरे दिन ज्वर हो आया "अन्त में उन्होंने सोचा, अ्रभी विवाह को तीन महीने हैँ ॥ मगर उस समय तक रुपयों का प्रवन्ध हो गया, तो भला ही है, नहीं तो बारात का भझूगड़ा ही तोड़ दूँगा।","हाँ, उन्हें इस विचार से हर्ष होता था कि शांता का विवाह अच्छे घर में होगा, वह सुख से रहेगी और गंगाजली की आत्मा मेरे इस काम से प्रसन्न होगी ।","अन्त में उन्होंने सोचा, अभी विवाह को तीन महीने हैं, अगर उस समय तक रुपयों का प्रबन्ध हो गया तो भला ही है, नहीं तो बारात का झगड़ा ही तोड़ दँगा ।" कई सोये हुए मनुष्यों के बदले एक मांगता हुआ कुत्ता उसके लिए. अ्रधिक बैर्य का कारण हुआ ।,उसे मालूम हुआ कि उस पर हनुमान जी बैठे हुए हैं ।,कई सोए हुए मनुष्यों के बदले एक भागता हुआ कुत्ता उसके लिए अधिक धैर्य का कारण हुआ । "कुछ बोर नही कर सकता, तो अपनी जान तो दें ही घकता हूं ।",राजा ने उसकी कमर में तलवार देखी होगी ।,कुछ और नहीं कर सकता तो अपनी जान तो दे ही सकता हूँ । परिडतजी को भी साथ चलने के लिए वाध्य किया ।,अन्त में विवश होकर दोनों महाशयों ने एक-एक सप्ताह की छुट्टी ली और अयोध्याजी चले ।,पंडितजी को भी साथ चलने के लिए बाध्य किया । भगर मेरी त्री उनसे बातचीत कर सकती तो छुछ न छुछ कमीशन रेट बढ़ जाता,सुखदा को इस इक्कीस वर्ष वाले युवक की इस निस्संकोच सांसारिकता पर घृणा हो रही थी,अगर मेरी स्त्री उनसे बातचीत कर सकती तो कुछ-न-कुछ कमीशन रेट बढ़ जाता यह हमारा जतिथि- सत्कारका री प्यारा भारत नहीं है--कदापि नहीं है ।,चने मेरे हाथ से छूट पड़े और नेत्रों से अविरल अश्रु-धारा बहने लगी ।,यह हमारा अतिथि-सत्कारी प्यारा भारत नहीं है-कदापि नहीं । बालू साइब पुरानी इड्डी के आादमी थे |,"प्रसव-काल में उसे वे भी अत्याचार सहने पड़े जो अज्ञान, मूर्खता और अंधविश्वास ने सौर की रक्षा के लिए गढ़ रखे हैं ।",बाबू साहब पुरानी हड्डी के आदमी थे । किसी को बरतनों की जरूरत न थी ।,सड़क के दोनों ओर पेड़ लगे हुए थे ।,किसी को बरतनों की जरूरत न थी । जैसे कोई विद्यार्थी हू महीनों के कठिन परिश्रम के बाद परीक्षा से निवृत्त होकर प्रामोद-प्रमोद में लीन हो हू जाए।,उसने उन अलोकिक सोंदर्य मूर्तियों को एक बार आँख भर कर देखा,जैसे कोई विद्यार्थी महीनों के कठिन परिश्रम के बाद परीक्षा से निवृत्त होकर आमोद-प्रमोद में लीन हो जाए । अपनी भाभी से सब ज्योरा अच्छी तरह पूछ लेना ।,अभी से सपने दिखाई देने लगे हैं ।,अपनी भाभी से सब ब्योरा अच्छी तरह पूछ लेना । "मिस जोशी ने पिदा दोते हुए कद्दा-भूलिएगा चहों, में आपकी राह देखतो रहूंगी ।",मैं कड़वी से कड़वी दवा पियूँगी यदि आप पिलायेंगे ।,"मिस जोशी ने विदा लेते हुए कहा- भूलिएगा नहीं, मैं आपकी राह देखती रहूँगी ।" "जिपे वह सत्य समझता है, उसझी हत्या के करे ?",हबीब को यहाँ आज दूसरा दिन है; पर इस समस्या को कैसे हल करे ।,"जिसे वह सत्य समझता है, उसकी हत्या कैसे करे ।" स्वामो बात के धबी हैं यद में जानती थी,मैं या तो तुम्हें लेकर जाऊंगा या यहीं गंगा में डूब मरूँगा,स्वामी बात के धनी हैं यह मैं जानती थी कभी जोर देकर तगादा न करते कि कहीं उन्हें दुःख न हो ।,"उधर उन्हीं के छोटे भाई शिवटहल साधु-भक्त, धर्म-परायण और परोपकारी जीव थे ।",कभी जोर दे कर तगादा न करते कि कहीं उन्हें दुःख न हो । सदन ने भी चलने की तैयारी कर दी ।,"मन में कहा -- इसे अपने आनन्द के आगे कुछ भी ध्यान नहीं है, एक या दो महीनों में फिर मिलाप होगा, लेकिन यह कैसी खुश है ?",सदन ने भी चलने की तैयारी कर दी । मैंने ठुम्हारे साथ कोई बुरा सलूक नहीं किया ।,"वे कहने लगे, तुम लोग क्या यही चाहते हो कि मैं इस जिले से बदनाम होकर जाऊँ ।",मैंने तुम्हारे साथ कोई बुरा सलूक नहीं किया । नौकरी से मज- बूर हैं बरना यद्द देवियाँ तो इप्त छायक़ हैं कि उनके कदमों पर सिर रखें,उनका इरादा नेक है वह हमारे गरीब भाइयों के हक के लिए लड़ रही हैं,नौकरी से मजबूर हूँ वरना यह देवियाँ तो इस लायक हैं कि इनके कदमों पर सिर रखें लड़ाई में अद्धरेजों ने छोड दिया था जो इसे पानी की तरह पीते हैं तो हमारे लिए कोई मुश्किल काम नहीं ।,"शाम-सबेरे उसकी पीठ सुहलाते, अपने हाथों से नाज खिलाते ।",लड़ाई में अँगरेजों ने छोड़ दिया था जो इसे पानी की तरह पीते हैं तो हमारे लिए कोई मुश्किल काम नहीं । "में सब॒त दे दूँगी, तब तो मानेंगे ?","जालपा एक वृक्ष की छांह में खड़ी हो गई और बोली, 'दादा, मेरा जी चाहता है, आज जज साहब से मिलकर सारा हाल कह दूं ।","मैं सबूत दे दूंगी, तब तो मानेंगे ?" "एक दिन इसी तरह पद्मा लौटकर आईं, तो प्रसाद ग्रायव थे ।","पद्मा को अपने साथ न ले जाता , उससे बहाना करता कि मेरे सिर में दर्द है और जब पद्मा घूमने जाती तो अपनी कार निकाल लेता और उड़ जाता ।","एक दिन इसी तरह पद्मा लौटकर आयी , तो प्रसाद गायब थे ।" द्ध थोड़े ही पीता है कि खो जायगा,अगर मैं ही उसके मन की दो-चार बातें करता रहता तो कौन छोटा हो जाता,दूध थोड़े ही पीता है कि खो जायगा "पुलिस का उसे जो अनुभव था, उससे चित्त को सन्तोष न होता था ।",पुलिस का कर्तव्य है कि हमारी रक्षा करे ।,"पुलिस का उसे जो अनुभव था , उससे चित्त को सन्तोष न होता था ।" वह दो-तीन बार उछला-कुदा पर आगे न बढा |,"दो-एक बार पिछले पैर भी, जिससे विदित होता था कि वह बिलकुल प्राणहीन नहीं है ।",वह दो-तीन बार उछला-कूदा पर आगे न बढ़ा । एक बार कुछ इलचछ मचेगी मुमकिन है दो-चार गाँवों में फ़्ताद भी हो मगर खुले हुए फ़मांद को रोकना उत्तना मुर्च्लि नहीं है जितना इस दवा को,शायद हजरत समझे होंगे यह लोग तो दोस्त हो ही गए अब क्या फिक्र,एक बार कुछ हलचल मचेगा मुमकिन है दो-चार गाँवों में फसाद भी हो मगर खुले हुए फसाद को रोकना उतना मुश्किल नहीं है जितना इस हवा को शिशु दी कत्पना से वित्त में एक गर्षभय उल्लास होता था पर इसके साथ द्वी हृदय में कम्पन भी दोता था--न जाने क्या होगा,सुखदा का प्रसवकाल समीप आता जाता था,शिशु की कल्पना से चित्ता में एक गर्वमय उल्लास होता था पर इसके साथ ही हृदय में कंपन भी होता था न जाने क्या होगा गन्दे पानी के नाले दोनों तरफ़ बह रहे थे,पंद्रह-बीस मिनट में इक्का गोवर्धन की सराय पहुँच गया,गंदे पानी के नाले दोनों तरफ बह रहे थे राय साहब की जबरदस्ती है नहीं इ्स समय किसी के सामने क्यो हाथ फैलाना पड़ता,एक समय होरी ने भी महाजनी की थी,रायसाहब की जबरदस्ती है नहीं इस समय किसी के सामने क्यों हाथ फैलाना पड़ता "“इधर बीस साल से तो नहीं लिये, उधर की बात नहीं कहता ।",' 'तुम विलायती कपड़े नहीं पहनते ?,"' 'इधर बीस साल से तो नहीं लिए, उधर की बात नहीं कहता ।" सदन का मुख लज्जा से अ्रुणवर्ण हो गया ।,वह उठी ओर मुस्करा कर सदन की ओर हाथ बढ़ाया ।,सदन का मुख लज्जा से अरुणवर्ण हो गया । "बोली-- भगवान्‌ ने सहायता की, नहीं मेरे प्राण बढ़े सकट से पढ़े हुए थे ।","सभी से तो अपना मित्र-भाव है , लेकिन दरोगाजी की तजवीज मुझे पसन्द है ।","बोली, भगवान् ने सहायता की , नहीं मेरे प्राण संकट में पड़े हुए थे ।" "भोंदू के क्रेघ का उसे दो एक बार अनुभव हो चुका था , लेकिन उसने दिल को मजबूत किया ।","बंटी ने उसके अंदर पाँव रखे, तो उसके मन की कुछ वही दशा हुई, जो अकेला घर देखकर किसी चोर की होती है ।","भोंदू के क्रोध का उसे दो-एक बार अनुभव हो चुका था, लेकिन उसने दिल को मजबूत किया ।" "उसने समझा था, गंगू को छः सौ झपये दे दूँगा तो पिछले हिसाब में जमा हो जायेंगे ।",ये युवतियां उन्हें कुछ ओछी जान पड़ीं ।,"उसने समझा था, गंगू को छः सौ रूपये दे दूँगा तो पिछले हिसाब में जमा हो जायेंगे ।" आजकल इन छोटी-छोटी चालों के बगैर काम नहीं चलता ।,"जॉन सेवक-कुछ दौड़-धूप कीजिए, एक जगह बैठे रहने से काम न चलेगा ।",आजकल इन छोटी-छोटी चालों के बगैर काम नहीं चलता । ” ; रब्त-जब्त वढने लगा ।,नेउर को साझा दे गया ।,' रब्त-जब्त बढ़ने लगा । "रत्नसिंह ने चिन्तित नेत्रों से शत्रुदल की ओर देखकर कहा--हाँ, मालूम: तो होता है ।","गाफिल पड़े हुए हैं, भाग खड़े होंगे ।","रत्नसिंह ने चिंतित नेत्रों से शत्रु-दल की ओर देख कर कहा -हाँ, मालूम तो होता है ।" » सुखदा के पास संवन्धियों से मिरे हुए क्रितने हो अच्छे-से-अच्छे कपड़े रखे हुए थे पर इस सरल उपद्दार से उसे जो हादिक आनन्द प्राप्त हुआ वह और किसी उपद्दार से न हुआ था $ क्योंकि इसमें अमीरी का गये दिखावे की इच्छा या प्रथा की शुध्क्ता न थी,अमर ने लज्जित होकर कहा-हाँ यह गलती मुझसे हुई पठानिन मुआफ करो,सुखदा के पास संबंधियों से मिले हुए कितने अच्छे-से-अच्छे कपड़े रखे हुए थे पर इस सरल उपहार से उसे जो हार्दिक आनंद प्राप्त हुआ वह और किसी उपहार से न हुआ था क्योंकि इसमें अमीरी का गर्व दिखावे की इच्छा या प्रथा की शुष्कता न थी यह थाना थोडे ही है कि आपके रोब में फक पड जायगा |,दूसरा मुसाफिर बोला- और आप ही क्यों न नीचे बैठ जाएँ ।,यह थाना थोड़े ही है कि आपके रोब में फर्क पड़ जाएगा । "इतने, रुपये कहाँ ते आयेंगे ।",बाबूजी की पहली स्त्री से पाँच लड़कियाँ और हैं ।,इतने रुपये कहाँ से आयेंगे । वाप उसे किसी खोह भ था वृक्ष की आड़ में छिप कर मैदान में चला जाता ।,उसकी माता उसकी बाल्यावस्था में ही परलोक सिधार चुकी थी ।,बाप उसे किसी खोह में या वृक्ष की आड़ में छिपा कर मैदान में चला जाता । "स्टेशन पर उतरते ही कहीं पुलिस का सिपाही पकड़ ले, तो बस ! देवीदीन ने गंभीर होकर कहा -- सिपाही क्‍या पकड़ लेगा, दिल्लगी हैं ! मुझसे कहो, मैं प्रयागराज के थाने में ले जाकर खड़ा कर दूँ ।",मैं वहाँ सब रंग-ढंग देख लूंगा ।,"स्टेशन पर उतरते ही कहीं पुलिस का सिपाही पकड़ ले, तो बस!' देवीदीन ने गंभीर होकर कहा,'सिपाही क्या पकड़ लेगा, दिल्लगी है! मुझसे कहो, मैं प्रयागराज के थाने में ले जाकर खडाकर दूं ।" यह उसी सुकीर्ति का फल था कि वह इस पद पर नियुक्त हुए थे ।,खबर पाते ही विनय को बुला लिया ।,यह उसी सुकीर्ति का फल था कि वह इस पद पर नियुक्त हुए थे । घर का द्वार उसके लिए बन्द है,नहीं उसकी सराहना होती है,घर का द्वार उसके लिए बंद है "बाहर आकर भिखारी से कह दिया-- बाबा, इस समय जाओ, किसी का हाथ खाली नहीं है, और पेढ़ के नीचे बैठकर विचारों में मग्स हो गया ।",इसलिए वह जल्दी से बाहर निकल जाना चाहते थे ।,"बाहर आ कर भिखारी से कह दिया , बाबा, इस समय जाओ, किसी का हाथ खाली नहीं है, और पेड़ के नीचे बैठ कर विचारों में मग्न हो गया ।" "लेला--भाणो, आज तुम्दें गरीबों का खाना खिलाऊँ ।",केवल एक आदमी झोंपड़ी से कई हाथ पर चुपचाप खड़ा था ।,"लैला- आओ, आज तुम्हें गरीबों का खाना खिलाऊँ ।" "मैंने कहा--महाशय, आप मेरे पिता के तुल्य हैं ओर मुझे जानते हैं ।",वृद्ध चुपचाप खड़े थे और युवती रो रही थी ।,"मैंने कहा, महाशय, आप मेरे पिता के तुल्य हैं और मुझे जानते हैं ।" कहीं धोखा तो न देगी ?,"जालपा ने ज़ब्त तो किया था, पर इस उत्कंठा की दशा में आज उससे कुछ खाया न गया ।",कहीं धोखा तो न देगी ? मुझे उन पर सन्देह करने का कोई कारण नहीं है ।,"यह बुराई उनमें नहीं है, और चाहे जितनी बुराइयां हों ।",मुझे उन पर संदेह करने का कोई कारण नहीं है । उसने वेद्यक की कई किताबें पढ़ ली हैं और छोटी-मोटी बीमारियों की दवा दे देता है ।,"रमा को तो इस जीवन से इतना अनुराग हो गया है कि अब शायद उसे थानेदारी ही नहीं, चुंगी की इंस्पेक्टरी भी मिल जाय, तो शहर का नाम न ले ।",उसने वैद्य की कई किताबें पढ़ली हैं और छोटी-मोटी बीमारियों की दवा दे देता है । "सुनिए, रमानाथ ने मीज़ान लगाने में गलती की, डरकर भागा ।",दारोग़ा -'आपके यहाँ रमानाथ कोई क्लर्क था ?,"सुनिए, रमानाथ ने मीज़ान लगाने में ग़लती की, डरकर भागा ।" "क्‍यों १ आचार्या--आप अगर यह कानून बनवा दें, तो आनेवाली सन्तान आपको अपना मुक्तिदाता सममेगी ।",जनसमूह कुछ दस गज के अन्तर पर खड़ा हुआ है ।,"’ आचार्य –‘ आप अगर यह कानून बनवा दें , तो आनेवाली सन्तान आपको अपना मुक्तिदाता समझेगी ।" दाम्पत्य मेरी निगाह में तुच्छ वस्तु थी ।,एक दिन यशवंत ने रमेश को अपने यहाँ बुला भेजा ।,दाम्पत्य मेरी निगाह में तुच्छ वस्तु थी । बोर्ड को रुपये प्यरे हैं तुम्हारों जान* की उप्तकीः निगांह में कोई क्रोमत नहीं,गरीबों को दस-पाँच रुपये मुआवजा देकर उसी जमीन के हजारों वसूल किए जाते हैं,बोर्ड को रुपये से प्यार है तुम्हारी जान की उनकी निगाह में कोई कीमत नहीं "उसने जबरा पे कद्दा--क्यों जब्बर, अब उप्ड नहीं रुग रदौ है ?",ठण्ड की असीम शक्ति पर विजय पाकर वह विजय-गर्व को हृदय में छिपा न सकता था ।,"उसने जबरा से कहा- क्यों जब्बर, अब ठण्ड नहीं लग रही है ?" मनोराम ने दौड़कर उन्‍हें संभाला भौर उनको पौठ सहलाने लगा,और वह तुम्हें तबाह करके छोड़ेगी,मनीराम ने दौड़कर उन्हें संभाला और उनकी पीठ सहलाने लगा घरवाले भी रो-पीटकर ब्रैठ रहे |,न तो हिन्दू-सभा ने पंडित जी की खबर ली और न घरवालों ने ।,घरवाले भी रो-पीट कर बैठ रहे । चिराग जल चुके थे ।,"भय हुआ, कहीं उसकी भविष्यवाणी सत्य न हो ।",चिराग जल चुके थे । पुलिस ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया कि मुलज़िमों में कोई मुखबिर बन जाये ; पर उसका उद्योग सफल न हुआ ।,"पुलिस ने इन बयानों को पढ़ा, तो दांत पीस लिए ।","पुलिस ने एड़ी-चोटी का ज़ोर लगाया कि मुलज़िमों में कोई मुखबिर बन जाए, पर उसका उद्योग न सफल हुआ ।" क्रोध की अग्नि प्रचएड हो गई।,मदनसिंह को अब कोई संदेह न रहा ।,क्रोध की अग्नि प्रचंड हो गई । कई वर्षों तक हमारा जीवन एक जलखोत की भाँति वृक्ष-युंजों और हरे-हुये मेदातों मे प्रवाहित होता रहा ।,उनका नाम नृसिंहदेव था ।,कई वर्षों तक हमारा जीवन एक जलश्रोत की भाँति वृक्ष-पुंजों और हरे-भरे मैदानों में प्रवाहित होता रहा । "जालपा --- तो अभी कौन-सी जल्दी है, बनते रहेंगे धीरे-धीरे ।","अगर मुझे सारी उम्र बे-गहनों के रहना पड़े, तो भी मैं कुछ लेने को न कहूंगी ।","' जालपा--'तो अभी कौन-सी जल्दी है, बनते रहेंगे धीरे-धीरे ।" "इसकी जगह कि दह मद का त्याग करके एक शिलिंग रोज की बचत कर लें, वे अपने कमसिन बच्चे को एक शिलिंग की मजदूरी करने के लिए दबायेंगे ।",मेरी भावना स्वप्न में भी इतनी दूर न उड़ी थी; किन्तु पदलिप्सा अब किसी और भी ऊँची डाली पर आश्रय लेना चाहती थी ।,"इसकी जगह कि वह मद का त्याग करके एक शिलिंग रोज की बचत कर लें, वे अपने कमसिन बच्चे को एक शिलिंग की मजदूरी करने के लिए दबायेंगे ।" बाज़ार में उससे बहुत अच्छे मिल सकते हैं ।,न जाने कब उसका पेट भरेगा ।,बाज़ार में उससे बहुत अच्छे मिल सकते हैं । "कभी इधर ताकत्ा, कभो उधर नाना प्रकार के जीव दिख्लाई देते; किन्तु ध्यान से देखते ही लुप्त हो जाते ।",इस समय एक- एक रोम सजग हो रहा था ।,"कभी इधर ताकता, कभी उधर नाना प्रकार के जीव दिखाई देते; किन्तु ध्यान से देखते ही लुप्त हो जाते ।" मातृ-स्नेह के वायुमइल में पल्कर 'वह घोर अभिमानिनी दो गई थी |,"पहले की भोली-भाली श्रृद्धा अब एक सगर्व, शांत, लज्जाशील नवयौवना थी, जिसे देखकर आँखें तृप्त हो जाती थीं ।",मातृ-स्नेह के वायुमंडल में पड़कर वह घोर अभिमानिनी हो गई थी । "रमेश नियमानुसार पाँच बजे उठ बंठे, स्नान किया, संध्या की, घूमने गये और आठ बजे लौटे; मगर रमा तब तक सोता ही रहा ।","रमा यों ही आठ बजे से पहले न उठता था, फिर आज तो तीन बजे सोया था ।","रमेश नियमानुसार पाँच बजे उठ बैठे, स्नान किया, संध्या की, घूमने गए और आठ बजे लौटे, मगर रमा तब तक सोता ही रहा ।" "घुटनों तक पाँव कीचड़ से भरे हैं, और दोनों की आँखों में विद्वेहमय स्नेह कलक रहा है ।",दोनों की गरदनों में आधा-आधा गरांव लटक रहा था ।,घुटने तक पाँव कीचड़ से भरे हैं और दोनों की आंखों में विद्रोहमय स्नेह झलक रहा है । बल्कि चमक-दमक में इससे भी बढ़कर |,लडकी के ब्याह में पैसे का मुँह कोई नहीं देखता ।,बल्कि चमक-दमक में इससे भी बढ़कर । "उस मुसाफिर ने डच्च्रे के अन्दर आझइर मेरी भोर एक विचित्र उपेक्षा की दृष्टि से देखकर कद्दा--जी हाँ, सेवक भी इतना समझता है, और बीचवाले ब्थे पर बेठ गया ।",प्रयाग से चली तो प्रतापगढ़ जाकर रूकी ।,"उस मुसाफिर ने डिब्बे के अन्दर आकर मेरी ओर एक विचित्र उपेक्षा की दृष्टि से देखकर कहा- जी हाँ, सेवक इतना समझता है, और बीच वाले बर्थ पर बैठ गया ।" और काए्तकारो को जमीदारी बना देना तो साधारण बात थी ।,अपने पिता को जो एक दफ्तर में क्लर्क थे उस दफ्तर का प्रधानाध्यक्ष बना दिया ।,और काश्तकारी को जमींदारी बना देना तो साधारण बात थी । आत्मा की गहराइयों में छिपी हुई कोई शक्ति उसकी ज़बान बन्द कर देती थी ।,"तुम घोड़े पर नहीं, आसमान में उड़ो, मेरी आंखों में हत्यारे हो, पूरे हत्यारे, जिसने अपनी जान बचाने के लिए इतने आदमियों की गर्दन पर छुरी चलाई! मैंने चलते-चलते समझाया था, उसका कुछ असर न हुआ! ओह, तुम इतने धन-लोलुप हो, इतने लोभी! कोई हरज नहीं ।",आत्मा की गहराइयों में छिपी हुई कोई शक्ति उसकी ज़बान बंद कर देती थी । ये सारी शिकायतें इस तावीज से दूर हो जायँगी ।,"खुदा ने चाहा, तो उन्हें किसी तरह की दहशत या खटका न रहेगा ।",ये सारी शिकायतें इस तावीज से दूर हो जाएँगी । "जनाब, यहाँ लड़कों का यह दाल है कि एक आम तो खाते हैं और पचीस आम गिराते हैं ।","लोग कहते हैं जहाँ हजारों का नुकसान हो रहा है वहाँ तो देखभाल करता नहीं, जरा-सी बगिया की रखवाली में इतना मुस्तैद ।","जनाब, यहाँ लड़कों का यह हाल है कि एक आम तो खाते हैं और पचीस आम गिराते हैं ।" "पति दो स्त्रो का सच्चा प्रित्र, सम्चा पथ-प्रदर्शक और सच्चा सद्दायक है ।",विषय-वासना से चित्त आप ही आप खिंचने लगा ।,"पति ही स्त्री का सच्चा मित्र, सच्चा पथ-प्रदर्शक और सच्चा सहायक है ।" "किसानों को बात-ब्रात के लिए चूसते ₹ं, किसान छान छवाना चाहे तो उन्हें दे, दुरवाजे पर एक खूँटा तक गाडना चाहे तो उन्हें पूजे, एक छप्पर उठाने के लिए. दस रुपये जमींदार को नजराना दे तो दो रुपये मुंशीजी को जरूर ही देने द्वोंगे ।",लीग के प्रायः सभी लोग कॉलेज में पढ़ते थे ।,"किसानों को बात-बात के लिए चूसते हैं, किसान छान छवाना चाहे तो उन्हें दे, दरवाजे पर एक खूँटा तक गाड़ना चाहे तो उन्हें पूजे, एक छप्पर उठाने के लिए दस रुपये जमींदार को नजराना दे तो दो रुपये मुंशी जी को जरूर ही देने होंगे ।" "उन्हें चिढ़ाने को में भी रक्ञ-बिरहो पादियाँ पहनती हूँ, और सी बनती-संवरती हूँ, मुम्हे ज़रा भी दुःख नहीं है ।","मैंने चूड़ियाँ नहीं तोड़ीं, क्यों तोड़ूँ ?","इन्हें चिढ़ाने को मैं भी रंग-बिरंगी साड़ियाँ पहनती हूँ, और बनती-सँवरती हूँ, मुझे जरा भी दु:ख नहीं है ।" ताबड़तोड़ कई चाबुक लगाये ।,जेठ का महीना था ।,ताबड़तोड़ कई चाबुक लगाये । "तुमसे बेटी व्याददी है, इुछ तुम्हारो ज़िन्दगी का टीका नहीं लिया है ।",उसके जी में एक ज्वाला-सी उठी कि इसी वक्त अन्दर जाकर सास को और सालों को भिगो- भिगोकर लगाये; पर जब्त करके रह गया ।,"तुमसे बेटी ब्याही है, कुछ तुम्हारी जिंदगी का ठीका नहीं लिखा है ।" बाहर का आ्रादमी मेरे साथ छुल करे तो क्षमा के योग्य £ै पर घर फे आटमी को म॑ किसी प्रकार ज्ञमा नहीं कर सकता ।,इसी विद्या की बदौलत हुजूर हुक्काम सभी मानते हैं ।,"बाहर का आदमी मेरे साथ छल करे तो क्षमा के योग्य है, पर घर के आदमी को मैं किसी प्रकार क्षमा नहीं कर सकता ।" "न जाने मुझमें ऐसी कौन-सी बात है, जिससे दूसरों को फ़ौरन पता चल जाता है कि में कौन हूँ ; या क्या हूँ ।",देवीदीन के घर से मैं अपने घर गई और ब्रह्मा-समाजी लेडी का स्वांग भरा ।,"न जाने मुझमें ऐसी कौनसी बात है, जिससे दूसरों को फौरन पता चल जाता है कि मैं कौन हूँ, या क्या हूँ ।" "हरिहर ने आदर 'राम-एम! को, और चिलम भरी ।","इधर झींगुर दिन-भर मजदूरी करता, तो कहीं आधा पेट अन्न मिलता ।","हरिहर ने आकर 'राम-राम' की, और चिलम भरी ।" रुपये गिनकर एक थैली में रख दिये और सोच ही रहे थे कि चलेँ इन्हें बक में रखता आरऊँ कि एक रोगी ने बुला भेजा |,"सोचा कि हाँ, मुझे बैंक जाने के लिए ताँगा मँगाना ही पड़ेगा, क्यों न बिन कौड़ी के उपकार वाले सिद्धान्त से काम लूँ ।",रुपये गिन कर एक थैली में रख दिये और सोच ही रहे थे कि चलूँ उन्हें बैंक में रखता आऊँ कि एक रोगी ने बुला भेजा । उसने काँपते हुए स्वर मे अपनी वक्त ता शुरू की ।,उपसंहार तो इतना सुन्दर था कि उसे अपने ही मुख से सुनकर वह मुग्ध हो गयी ।,उसने काँपते स्वर में अपनी वक्तृता शुरू की । सहसा एक युवक किसी तरफ से आ निकला ओर बृद्ध महाराय दया युवती को देखकर बोला--आपको शम नहीं झ्राती कि आप अ्रपनी युवती नया को इस तरह मेले में लिये खड़े हैं ।,मुझसे थोड़ी दूर पर एक और महाशय एक युवती के साथ खड़े थे ।,"सहसा एक युवक किसी तरफ से आ निकला और वृद्ध महाशय तथा युवती को देखकर बोला, 'आपको शर्म नहीं आती कि आप अपनी युवती कन्या को इस तरह मेले में लिये खड़े हैं ।" अतिम दर्मन भी'न कर सका ।,मुझे मिनिस्टर साहब से इतनी आशा अवश्य थी कि वह कम-से-कम इस विषय में न्याय-परायणता से काम लेंगे; मगर उन्होंने न्याय की जगह नीति को मान्य समझा और मुझे कई साल की भक्त िका यह फल मिला कि मैं पदच्युत कर दिया गया ।,अन्तिम दर्शन भी न कर सका । इस समय उनका चित्त कुछ उदास था ।,कृष्णचन्द्र ने आज हत्या मार्ग पर चलने का निश्चय कर लिया था ।,इस समय उनका चित्त कुछ उदास था । "में तो उसके दुष्नाचरण देखती हूँ, तो मेरा रक्त खौलने छगता है ।","किसी से पूछा न गाछा , जाकर एक हरजाई से सगाई कर ली ।",मैं तो उसके दुष्टाचरण को देखती हूँ तो मेरा रक्त खौलने लगता है । "जिसे ईश्वर ने दिया हो, उसे आनलन्‍्दोत्सव में दिल खोलकर व्यय करना चाहिए ।",शर्मा -- इस विषय में मैं आप से सहमत नहीं हूँ ।,जिसे ईश्वर ने दिया हो उसे आनन्दोत्सव में दिल खोलकर व्यय करना चाहिए । जान पड़ता था; सैकड़ों विजलियाँ मिलकर चमक रही हैं ।,वह अभी जाने भी न पाया था कि एकबारगी सारा महल ज्योति से प्रकाशमान हो गया ।,"जान पड़ता था, सैकड़ों बिजलियाँ मिलकर चमक रही हैं ।" इन्हें अवश्य शहर से बाहर क्‍ निकाल देना चाहिए |,"मैं बहुत बचा, नहीं तो कहीं का न रहता ।",इन्हें अवश्य शहर से बाहर निकाल देना चाहिए । जेंसे में गऊ-दला करने जा रही हूँ,अपना टूटा-ठ्ठटा झोंपड़ा अपने मैले-कुचैले कपड़े अपना नंगा-बूचापन कर्ज-दाम की चिंता अपनी दरिद्रता अपना दुर्भाग्य ये सभी पैने कांटे जैसे फूल बन गए,जैसे मैं गऊ-हत्या करने जा रही हूँ वह हँसती है इसलिए ॥ कि उसे इसके भी दाम मिलते हैं,भोला बैलों के सामने से न हटा,वह हँसती है इसलिए कि उसे इसके भी दाम मिलते हैं "इतना कम खाकर और इतनी मेहनत करके वह कंसे इतनी हृ८-पुष्ठ थाँ, में नहों कद्ट सझृतो ।","मैंने ऐसी सहृदय, उदार, मीठी बातें करनेवाली स्त्री नहीं देखी ।","इतना कम खाकर और इतनी मेहनत करके वह कैसे इतनी ह्रष्ट-पुष्ट थीं, मैं नहीं कह सकती ।" सुमन उसे घृणा की दृष्टि से देखती थी ।,कभी-कभी वह फिटन पर हवा खाने जाया करती ।,सुमन उसे घृणा की दृष्टि से देखती थी । "उन्होंने जो निश्चय किया है, उसके विरुद्ध में एक शब्द भी मुँह से नहीं निकाल सकता, और तुम्हारे लिए भी यददी उचित है कि उन्हें वाराज़ व करो ।",तीसरे दिन पत्र का जवाब आया ।,"उन्होंने जो निश्चय किया है , उसके विरुद्ध मैं एक शब्द भी मुँह से नहीं निकाल सकता और तुम्हारे लिए भी यही उचित है कि उन्हें नाराज न करो ।" यहाँ तो रो-रोकर मरने हो के लिए पदा हुए हैं ।,मनहर- मैंने तुम्हे कभी नहीं देखा ।,यहाँ तो रोकर मरने ही के लिए पैदा हुए हैं । दो में एक भी चुनने का नाम न लेता था,नैना ने भाग जाना चाहा,दोनों में से एक भी चुनने का नाम न लेता था आपको अगले स्टेशन पर उतरना होगा ।,न जाने किधर निकल गया ।,आपको अगले स्टेशन पर उतरना होगा । "ठाकुरदीन ने बहुत चिरौरी की, पर सूरदास चलने पर राजी न हुआ ।","हाकिमों से बोलने को हिम्मत चाहिए, अकिल चाहिए ।","ठाकुरदीन ने बहुत चिरौरी की, पर सूरदास चलने पर राजी न हुआ ।" में तुमते सलाह नहीं पूछ रहा है,लालाजी ने प्रतिवाद किया-तुम अपना विज्ञान यहाँ न घुसेड़ो,मैं तुमसे सलाह नहीं पूछ रहा हूँ "हाजी हाशिम बुड़बुड़ाए, मुन्शी अ्वुलवफा के तेवरों पर वल पड़ गए ।","अगर आप चोर है तो हिंदु के घर डाका डालिए, अगर आपको हुस्न या इश्क का खब्त है तो किसी हिंदु नाजनीन को उड़ाइए, तब आप कोम के खादिम, कौम के मुहकिन, कौमी किश्ती के नाखुदा -- सब कुछ हैं ।","हाजी हाशिम बुड़बुड़ाए, मुंशी अबुल वफा के तेवरों पर बल पड़ गए ।" "तम्हारे लिए. ऐसे शिकारों की आव- श्यकता है, जिससे त॒म्हारी प्रजा को सुख पहुँचे |",परमात्मा ने तुम्हें अपनी सृष्टि पर राज करने के हेतु जन्म दिया है ।,"तुम्हारे लिए ऐसे शिकारों की आवश्यकता है, जिसमें तुम्हारी प्रजा को सुख पहुँचे ।" गजावर--तो मैं डाका तो नहीं मार सकता ।,सुमन -- उतने रुपयों में बरकत थोड़े ही हो जाएगी ।,गजाधर -- तो मैं डाका तो नहीं मार सकता । कोई कुछोत स्लो इस तरद भात्म- सम्मान खोना स्वीकार न करेगी,आप अंग्रेजी सभ्यता के बड़े भक्त बनते हैं,कोई कुलीन स्त्री इस तरह आत्म-सम्मान खोना स्वीकार न करेगी वह एक क्रिश्चियन स्त्री से क्यों प्रेम करने लगे ?,सोफी को बहुधा अपने मन की चंचलता पर खेद होता ।,वह एक क्रिश्चियन स्त्री से क्यों प्रेम करने लगे ? जन्म-भर की नेकनामी एक क्षण में घूल में मिल गई ।,पर आज उन्हीं के सामने वह सिर नीचा किये खड़े थे ।,जन्म भर की नेक-नामी एक क्षण में धूल में मिल गयी । उसे कभी चंत से बंठना यशीय से द्ोतां था ।,अनिरुद्धसिंह वीर राजपूत था ।,उसे कभी चैन से बैठना नसीब न होता था । आज छरई महोने के बाद उप्के मम्त मातृ-हृदय को अपवा सर्वेत्ष अपंण करके जप्ते आनन्द की विभूति मिलो ।,इस पर दोनों में ताल ठोकने की नौबत आई है ।,आज कई महीने के बाद उसके भग्न मातृ-हृदय को अपना सर्वस्व अर्पण करके जैसे आनन्द की विभूति मिली । उध् वक्त अपनी-अपनी पड़ी थी कि मुकाबला करने की सकती |,"बोला, 'हाँ, नाक कुछ चिपटी तो थी ।",उस वक्त अपनी-अपनी पड़ी थी कि मुकाबला करने की सूझती । मैने पूछा भी नहीं |,जोशी हरफनमौला था ।,"मैंने पूछा, भी नहीं ।" “(तब घर के दो जवान काम करनेवाले थे ।,"जुआर, बाजरा, सन, अरहर सब तो हैं, धान न सही ।",‘तब घर में दो जवान काम करने वाले थे । "राजा साहब-वाह, तब तो बात ही बन गई ।",सोफी आगे बढ़ गई थी ।,"राजा साहब-वाह, तब तो बात ही बन गई ।" यन्त्रणा में सहानुभूति पैदा करने की शक्ति होती है ।,इस न्याय के परदे में गाँठ के पूरे महाजन की हेकड़ी साफ झलक रही है ।,यंत्रणा में सहानुभूति पैदा करने की शक्ति होती है । सुमने-पर जैसे वज्भपांत हो गया ।,तब अकस्मात वह लपक कर उठे और पीछे की ओर फिर कर वेग के साथ चलने लगे ।,सुमन पर जैसे वज्रपात हो गया । उसने बी० ए० नहीं पास किया; लेकित विचारों की प्रोढता और ज्ञान-विस्तार में किसी ऊँचे दर्ज की शिक्षिता महिला से कम नहीं ।,हमें ईश्वर ने पुत्र न दिया; पर हम अपनी कुसुम को पाकर सन्तुष्ट थे और अपने भाग्य को धान्य मानते थे ।,"उसने बी० ए० नहीं पास किया, लेकिन विचारों की प्रौढ़ता और ज्ञान-विस्तार में किसी ऊँचे दर्जे की शिक्षित महिला से कम नहीं ।" धर्मवीर ही इंश्बर को पाते हैं,यही तेजस्विता जो अभिमान बनकर उसे विलासिनी बनाए हुए थी जो उसे छोटों से मिलने न देती थी जो उसे किसी से दबने न देती थी उत्सर्ग के रूप में उबल पड़ी,धर्मवीर ही ईश्वर को पाते हैं बलभद्र-आश्रम सारे नगर में बदनाम हो जाएगा और सम्भव है कि अन्य विधवाएँ भी छोड़ भागें ।,विट्ठलदास -- विधवाश्रम में ।,बलभद्रदास -- आश्रम सारे नगर में बदनाम हो जाएगा और संभव है कि अन्य विधवाएँ भी छोड़ भागें । अमर- कान्त का विवाद करना ज़छरी हो गया,वृध्द-विवाह की बुराइयाँ भी समझते थे,अमरकान्त का विवाह करना जरूरी हो गया "मदनसिह---तुमने वह कर्म किया है कि भ्रगर तुम्हारा गला काट लूं, तो भी पाप न. लगे ।","बिल्ली के पंजे में फँसे हुए चूहे की तरह दीन भाव से उमानाथ ने उत्तर दिया -- महाराज, मुझ से कौन-सा अपराध हुआ ?",मदनसिंह -- तुमने वह काम किया है कि अगर तुम्हारा गला काट लूँ तो भी पाप न लगे । गये के मारे उसके पाँव ज़प्तोव पर न पढ़ते थे ।,"मिस जोशी ने विदा लेते हुए कहा- भूलिएगा नहीं, मैं आपकी राह देखती रहूँगी ।",गर्व के मारे उसके पाँव जमीन पर न पड़ते थे । वह सोचते कि यह रोज कहाँ घुमने जाता है।,"संगीत के मधुर स्वर उसे उन्मत्त कर देते, बड़ी कठिनता से वह अपने को कोठों पर चढ़ने से रोकता ।",वह सोचते कि यह रोज कहाँ घूमने जाता है । "मालूम नहीं, क्यों इन दिनों मेरा बाजार गिरा जा रहा है ।",यह २० रुपए भी घोड़ा गाड़ी बेचने से बच सकेंगे ।,मालूम नहीं क्यों इन दिनों मेरा बाजार गिरा जा रहा है । इसलिए वह जल्‍दी से बाहर निकल जाना चाहते थे ।,लड़के उसका सत्कार अब बहुत करते ।,इसलिए वह जल्दी से बाहर निकल जाना चाहते थे । उन्हें प्रेम की भूख थी तो मुझे प्रेम की भूख कुछ क्रप्त न थी,मैं भी ईश्वर से कहती हूँ कि अपनी जान में मैंने उन्हें कभी असंतुष्ट नहीं किया,अगर उन्हें प्रेम की भूख थी तो मुझे भी प्रेम की भूख कुछ कम न थी सोफी को विनय आज तक कभी इतना सुंदर न मालूम हुआ था ।,रात की मीठी नींद से मुख पुष्प के समान विकसित हो गया है ।,सोफी को विनय आज तक कभी इतना सुंदर न मालूम हुआ था । आँखें से देखकर उसे ज्ञात हुआ देखने और सुनने में बढ़ा अन्तर है,उसका मंत्री एक दिन सुखदा को खींच ले गया,आँखों से देखकर उसे ज्ञात हुआ देखने और सुनने में बड़ा अंतर है हुजूर में तलबी है ।,कुशल तो है ?,हुजूर में तलबी है । "बढ नाम पर मरते है, थान॑दी प्रेम पर ।",देखिए वह आपको किस भाँति सिर और आँखों पर बिठाता है ।,वह नाम पर मरते हैं आनंदी प्रेम पर । उससे फिर किसी ने कुछ न पूछा ।,"जो-जो वह पगली (मिसेज सेवक) कहती है, वही करता है ।",उससे फिर किसी ने कुछ न पूछा । शीशे के सामान ठेलों पर लदे चले झाते थे ।,उसे सजाने के लिए बहुत से फूल-पत्ते रखे हुए थे ।,शीशे के सामान ठेलों पर लदे चले आते थे । "भ्रगर उन्हें नाराज कर लू, तो यह सारा ठाठ बिगड़ जाए ।","आप जानते होंगे, मेरा सारा कारोबार सेठ चिम्मनलाल की मदद से चलता है ।",अगर उन्हें नाराज कर लूँ तो यह सारा ठाठ बिगड़ जाए । वह उसे एक्क्रे ही पर छोड़कर अन्दर गई ओऔर थोड़ी देर में ताबीज़ भर रुूमालों की बक्नची लेकर आ पहुँची,अमरकान्त को बुढ़िया घर में न ले गई,यह उसे इक्के ही पर छोड़कर अंदर गई और थोड़ी देर में ताबीज और रूमालों की बकची लेकर आ पहुँची "मगर अब उसमें वह पहले-सी तत्परता न थी, बार-बार सन्दृक़ बन्द करती और खोलती ।",रमा खिसियाना-सा होकर एक किनारे खडाहो गया ।,"मगर अब उसमें वह पहले-सी तत्परता न थी, बार-बार संदूक बंद करती और खोलती ।" "दो-चार मिनट देर ही में पहुँचता, तो ऐसी कौन-सी आफ़त आ जाती ।",खिड़की पर बडी भीड़ थी ।,"दो-चार मिनट देर ही में पहुँचता, तो ऐसी कौन-सी आफत आ जाती ।" यह सकोना को झादी थी,डिग्री की परीक्षा समाप्त होते ही वह व्यवहार-क्षेत्र में उतरना चाहता था,यह सकीना की शादी थी "देहात की लड़की होने पर भी शहर के रंग में वह इस तरह रंग गयी थी, मानों जन्म से शहर ही में रहती आयी है |",जालपा-जैसी अनन्य सुंदरी के साथ सैर करने में आनंद के साथ गौरव भी तो था ।,"देहात की लडकी होने पर भी शहर के रंग में वह इस तरह रंग गई थी, मानो जन्म से शहर ही में रहती आई है ।" "सहसा नादिरशाह कठोर शब्दों में पोला--ऐ खुदा को बन्दियों, मेने तुम्दारा हस्तहान लेने के लिए बुलाया था और अफसोस के साथ कहता पढ़ता है. छि तुम्दारो नि्षषत मेरा जो गुमाव था वह हर्फ-ब-हफे प्रच निकला ।",ऐसा जान पड़ा कि वह गहरी निद्रा में मग्न हो गया है ।,"सहसा नादिरशाह कठोर शब्दों में बोला- ऐ खुदा की बन्दियो, मैंने तुम्हारा इम्तहान लेने के लिए बुलाया था और अफसोस के साथ कहना पड़ता है कि तुम्हारी निसबत मेरा जो गुमान था, वह हर्फ-ब-हर्फ सच निकला ।" "आखिर मेरे और बच्चे भी तो हैं, उनके लिए भी तो कुछ चाहिए |",मैं तो फिर यही कहूँगी कि बारातियों के नखरों का विचार ही छोड़ दो।,"आखिर मेरे और बच्चे भी तो हैं, उनके लिए भी तो कुछ चाहिए।" रात को उसी पेढ़ फे नीचे जाकर पढ़ रहता ।,वह सोच रहा था कि विश्व के इस विशाल भवन में कितना आनंद है ।,रात को उसी पेड़ के नीचे जाकर पड़ रहता । ईंट का जवाब पत्थर मिलता ही है ।,"उससे जिसने बैर ठाना, उसने नीचा देखा ।",ईंट का जवाब पत्थर मिलता ही है । उन्होंने भ्रपनी श्रात्मा को कितना गिरा दिया है ! हा ?,"हाँ, वे स्त्रियाँ बहुत सुंदर हैं, बहुत ही कोमल है पर उन्होंने अपने स्वर्गीय गुणों का कैसा दुरुपयोग किया है ?",उन्होंने अपनी आत्मा को कितना गिरा दिया है ? हाँ । अभी इसे उठने में कष्ट होगा ।,"उसे विश्वास था कि वह आते ही होंगे, उनसे सारी बातें स्पष्ट रूप से मालूम होंगी, अभी तो केवल अफवाह सुनी है ।",अभी इसे उठने में कष्ट होगा । इसमें उसे द्ादिक आनन्द प्राप्त होता था ।,अब अगर किसी स्वत्व से प्रेम था तो वह रविवार का शांतिनिवास था ।,इसमें उसे हार्दिक आनंद प्राप्त होता था । "मदनसिह ने विगड़कर कहा--न हुए तुम लोग हमारे गाँव में, नहीं तो - इतनी बेगार लेता कि याद करते ।",मल्‍लाहों से खेवे के लिए घंटों सिरमगजन हुआ तब कहीं जाकर उन्होंने नावें खोली ।,"मदनसिंह ने बिगड़ कर कहा -- न हुए तुम लोग हमारे गाँव में, नहीं तो इतनी बेगार लेता कि याद करते ।" पर यह मैं न जानता था कि उत्चकी झात्मा इतनो निर्बल है ।,"यह में जानता हूँ कि वह अभागिनी थी, किसी बड़े धनी कुल में रहने योग्य थी, भोग-विलास पर जान देती थी ।",पर यह में न जानता था कि उसकी आत्मा इतनी निर्बल है । तुम्दारा घर कहाँ है माता,अमर ने नीचे आकर उसका हाथ पकड़ लिया और उसे सहारा देकर दूकान पर चढ़ा दिया,तुम्हारा घर कहाँ है माता "पा हाथ पकड़ने की चेष्ट! ऋरके बोडे-ग्रिये, वहुत दियों के घाद यह सअवसर मिला है |","जरा अपनी सूरत तो देखो, खासे बनैले सुअर मालूम होते हो ।","उसका हाथ पकड़ने की चेष्टाकरके बोले- प्रिये, बहुत दिनों के बाद यह सुअवसर मिला है ।" "नगर के बढ़े बढ़े अधिकारी, बढ़े बढ़े. व्यापारी, बड़े-बड़े विद्वान , प्रधान समाचार-पर्रा के सम्यादक, भपनी-अपनो महिल ।","संसार में ऐसा और कौन देश होगा, जहाँ प्रजा तो भूखों मरती हो और प्रधान कर्मचारी अपनी प्रेम-क्रीड़ाओं में मग्न हों, जहाँ स्त्रियाँ गलियों में ठोकरें खाती फिरती हों और अध्यापिकाओं का वेष धारण करनेवाली वेश्याएँ आमोद-प्रमोद के नशे में चूर हों... एकाएक सशस्त्र सिपाहियों के दल में हलचल पड़ गई ।","नगर के बड़े-बड़े अधिकारी, बड़े-बड़े व्यापारी, बड़े-बड़े विद्वान्, प्रधान समाचार-पत्रों के सम्पादक अपनी-अपनी महिलाओं के साथ आने लगे ।" वह उससे . दूर-दूर रहता ।,"सुमन का वह मुख-कमल, जिस पर वह कभी भरे की भाँति मैँडराया करता था, अब उसकी आँखों में जलती हुई आग के समान था ।",वह उससे दूर-दूर रहता । घर-घर में आदसी भरे हुए ये ।,छाती पीट ली ।,घर-घर में आदमी भरे हुए थे । "जतन -- आप मुझे उसकी दृकान दिखा दीजिए, मैं उसके बाप से वसूल कर लूंगी ।",अब उससे रूपये निकलना मुश्किल है ।,"' रतन-'आप मुझे उसकी दुकान दिखा दीजिए, मैं उसके बाप से वसूल कर लूंगी ।" भोजन की थालो परतौ रह गई ।,कैलासी- (हँसकर) मर जाऊँगी तो आपके सिर से एक विपत्ति टल जायगी ।,भोजन की थाली परसी रह गई । बच्चों के लिए मिठाई ले गयी थी ।,"मैंने दिनेश की माँ से कहा, 'मैं यहाँ यूनिवर्सिटी में पढ़ती हूँ ।",बच्चों के लिए मिठाई ले गई थी । ये सब रक्में भो किसी-न-दिसी तरह महाजन ही झी जेब में जाती-हैं ।,भंगी बनने में कुछ हानि भी न थी ।,ये सब रकमें भी किसी न किसी तरह महाजन ही की जेब में जाती हैं । मैं तो छोटा नहीं हो गया,गाँव में अपने क्रोध के लिए प्रसिद्ध था,मैं तो छोटा नहीं हो गया चौधरी ने पुनिया को धक्का दिया,बहू भी दूसरे के साथ निकल गई,चौधरी ने पुनिया को धक्का दिया हीरा मारता है तो हुलारता भी है,क्या कभी मारा नहीं है जो मारने की साध बनी हुई है,हीरा मारता है तो दुलारता भी है "इस समय उसकी छवि में प्रफुछता का रोग्रन था, बातों में भी जसे शक्कर घुली हुईं थी ।","बस , वही साड़ी पहनकर खिंचवाना , जो कल पहनी थी और वही मोतियों की माला भी हो ।","इस समय उसकी छवि में प्रफुल्लता की रौनक थी , बातों में भी जैसे शक्कर घुली हुई थी ।" "मेरा मन तो कहता है, अम्माँ को ज़हर रुपये मिलेंगे ।","जब देखो , यहीं बैठे हो ।","मेरा मन तो कहता है , अम्माँ को जरूर रुपये मिलेंगे ।" जाम्दि फाँस लिया गया |,"मैने सोचा---धर्मात्मा लोग आते होंगे, सफ़ाई करने लगा ।",जामिद फाँस लिया गया । "बह पति के शरीर के साथ नही, उसकी आत्मा के साथ सती दृग ।",बुंदेलखंड के एक बीहड़ स्थान में आज भी मंगलवार को सहस्त्रों स्त्री-पुरुषचिंतादेवी की पूजा करने आते हैं ।,"वह पति-शरीर के साथ नहीं, उसकी आत्मा के साथ सती हुईं ।" न-जाने केसे आशा के सिर का अज्चल खिसककर थे पर आ गया था ।,"मेरा ब्याह कोई ५० साल की बुढ़िया से कर दे , तो मैं घर छोड़कर भाग जाऊँ ।",न-जाने कैसे आशा के सिर का अंचल खिसककर कंधो पर आ गया । जिन्‍नी दौड़कर उनकी गोद में जा बेठी ।,"जब लौटा, तो मालूम हुआ कि आपने इस्तीफा दे दिया और कहीं देहात में चले गये हैं ।",बिन्नी दौड़कर उनकी गोद में जा बैठी । सुजान के सामने अव एक नयी समस्या खड़ी हो गयी थी |,अपने भाग सराहो कि मुझ-जैसी सीधी औरत पा ली ।,सुजान के सामने अब एक नयी समस्या खड़ी हो गयी थी । "सूरदास-बस, यही कह दीजिए कि जमीन न बिकेगी ।",ताहिर-खैरख्वाही रुपये के लालच से नहीं है ।,"सूरदास-बस, यही कह दीजिए कि जमीन न बिकेगी ।" होरी पर उनमें से किसी की _ निगाह नहीं पड़ी,सोभा का घर भी उधर ही था,होरी पर उनमें से किसी की निगाह नहीं पड़ी "मन में कहने लगा, कुलटा कामिनी ! अपने सुख ओर अपने कपट-मान-प्रतिष्ठा पर मरे ओर मेरे परिवार की हत्या करने वाली कामिनी !! तू अब भी मेरे हाथ मे है ।",मैं यह वियोग के दिन बड़ी बेसब्री से काटने लगा ।,"मन में कहने लगा- कुलटा कामिनी ! अपने सुख और अपने कपट, मान-प्रतिष्ठा पर मेरे परिवार की हत्या करने वाली कामिनी ! तू अब भी मेरे हाथ में है ।" धूप तेज हो गई थी पर राय साहब खुद काम में लगे हुए थे,साहित्य और संगीत के प्रेमी थे ड्रामा के शौकीन अच्छे वक्ता थे अच्छे लेखक अच्छे निशानेबाज,धूप तेज हो गई थी पर रायसाहब खुद काम में लगे हुए थे वहाँ मार-पीट हो रही थी,ठोकर खा कर ही तो हम सावधानी के साथ पग उठाते हैं,वहाँ मार-पीट हो रही थी स्थरियाँ पुरुषों और घारावो को जीवित रपत के लिए बाप उपवास करती है ।,मर्दों की संख्या दिनोंदिन न्यून होती जाती है ।,स्त्रियाँ पुरुषों और बालकों को जीवित रखने के लिए आप उपवास करती हैं । उनके निःस्वार्थ सार्जनिक ढइृत्यों के कारण उन पर जनता की बड़ी श्रद्धा थी।,"यद्यपि उनकी वक्तृता रूखी थी, न कहीं भाषण लालित्य का पता था,न कटाक्षों का, पर लोग उनकी बातों को बडे ध्यान से सुनते रहे ।",उनके निःस्वार्थ सार्वजनिक कृत्यों के कारण उन पर जनता की बड़ी श्रद्धा थी । "द्विमालय की गोद में चलिए, वही आप उपद्रव मे बच सकती है ।",सिपाही-ऐसा स्थान पहाड़ों में ही मिल सकता है ।,हिमालय की गोद में चलिए वहीं आप उपद्रव से बच सकती हैं । "जो एपया जब तक वसूल हो “चुका हैं, वह बीज और ऋष के खाते में चढा लोजिए ।",जब भूखे मरेंगे तब सूझेगी ।,जो रुपया अब तक वसूल हो चुका है वह बीज और ऋण के खाते में चढ़ा लीजिए । अपर्मी के राज में रह कर प्रजा का कब्याय ऊंसे हो समता हूँ २ दूमरो शका--सहले दारू पिछा कर पायठ वना रिया ।,नहीं यों प्राण दे कर उनका आशाओं की हत्या न करूँगी ।,अधर्मी के राज में रह कर प्रजा का कल्याण कैसे हो सकता है दूसरी शंका-पहले दारू पिला कर पागल बना दिया । आख़िर मिनिस्टर को सजबूर होकर उस चपराधी को वहाल करना पड़ा |,अधिक-से-अधिक इतना ही होगा कि चार-पाँच वर्ष में बालक को अक्षर-ज्ञान हो जायगा ।,आखिर मिनिस्टर साहब को मजबूर होकर उस चपरासी को बहाल करना पड़ा । मुझे एक विषय में उनसे कुछ पूछना है ।,बाहर आकर कई मिनट तक मर्माहत दशा में बैठे रहे ।,मुझे एक विषय में उनसे कुछ पूछना है । तुम्हारा भोजन बना दिया करेगी ।,कुछ अवसर मिला तो फिर जाऊंगी ।,तुम्हारा भोजन बना दिया करेगी । उसे ज्ञात हुआ कि मैं सीमा से बाहर हुई जाती हैँ ।,"जब देखो, म्यान से तलवार बाहर ही रहती है,न जाने किस बिरते पर! यह कहते-कहते सुमन चोंक गई ।",उसे ज्ञात हुआ कि मैं सीमा से बाहर हुई जाती हूँ । उनके सन में बार-बार शंका होती जब छुमः गरीबों के चच्चेल बचते हो तो तुम्हें क्या हक है कि तुम पाँच सौ रुसये साहवार सरकार से बसूछ करो,पर इस आंदोलन के बाद से उन्हें अपने पद पर रहना कुछ जंचता न था,उनके मन में बार-बार शंका होती जब तुम गरीबों के वकील बनते हो तो तुम्हें क्या हक है कि तुम पाँच सौ रुपये माहवार सरकार से वसूल करो वह अव मुझे कदापि घर में न घुसने देंगे।,मैं कहाँ जा रही हूँ ?,वह अब मुझे कदापि घर में न घुसने देंगे । इस उजाड गाँव में आपका जी केसे लगता है ।,"गाँव भर ने विप्रजी की निन्दा की, लेकिन मुँह पर नहीं ।",इस उजाड़ गाँव में आपका जी कैसे लगता है ? "दिन-भर की कठिन यात्रा के वाद जब वह उस स्थाने पर पहुँचे, तो संध्या हो गयी थी ।",कुँवर को कामना-तीर्थ में महीनों लग गये ।,"दिन भर की कठिन यात्रा के बाद जब वह उस स्थान पर पहुँचे, तो संध्या हो गयी थी ।" मैं इस वक्‍त आपे में नहीं हूँ ।,"अबुल -- सुमन, जलाओ मत, नहीं तो मेरी जबान से भी कुछ निकल जाएगा ।",मैं इस वक्त आपे में नहीं हूँ । एक दिन इस घर में लक्ष्मी का वास था ।,मगनसिंह ने एक कोठरी की ओर उन्हें इशारे से बताया ।,एक दिन घर में लक्ष्मी का वास था । "रासे मे खयाल आया, मकतव हांता चलूँ |",उन्हें अपने पास रखना चोरी का ढिंढोरा पीटना था ।,"रास्ते में खयाल आया, मकतब होता चलूँ ।" "अपनी बवतृताओं में असहयोगरियों की ,खूप फटकारा करते श्ले ।",लाला उजागरमल शहर सहयोगी समाज के नेता थे ।,अपनी वक्तृताओं में सहयोगियों को खूब फटकारा करते थे । कम-से-ढम साल भर तो चन्र कौ बंशी बजाता ।,लेकिन हृदयनाथ कई दिनों तक लगातार सेवाधर्म का माहात्म्य उसके हृदय पर अंकित करते रहे ।,कम-से-कम साल-भर तो चैन की वंशी बजाना । सेमल गए ।,किन्तु इतनी देर में आँधी का वेग कुछ कम हो चला था ।,सँभल गए । "लुट-मार का पाज़ार गर्म था, न कोई व्यवस्या थी, न व्यवस्थापक थे ।","' 'कुछ भी हो, मैं इसे जेल में सड़ाना चाहता हूँ ।","लूट-मार का बाजार गर्म था, न कोई व्यवस्था थी न व्यवस्थापक थे ।" "५ के सुशीला ने भयभीत होकर कद्दा--मैया की बातों का विचार न कीजिये, इनकी तो यह आदत है ।","' धनीराम-' नहीं-नहीं, यह मैं कब कहता हूँ ।","' सुशीला ने भयभीत होकर कहा, 'भैया की बातों का विचार न कीजिए,इनकी तो यह आदत है ।" "दीना--अ्रजी, रहने भी दो, सारे कपड़े सत्यानाश कर दिए, अब उपाय बता रही हो ।","सुमन -- रात को कौन देखता है, चुपके से निकल जाइएगा ?","दीनानाथ -- अजी, रहने भी दो, सारे कपड़े सत्यानाश कर दिए, अब उपाय बता रही हो ।" "प्यारी ने ऐस! सुँह् बताया, मार्वों वह ऐसो बूढ़ी बातें बहुत सन चुड्डी है, और भोलौ-- जो अपने हैं, वे बात भी न पूछे, तो भी भयने ही रहते हैं ।","कितना समझाया, बेटा, भाई-भौजाई किसी के नहीं होते ।","प्यारी ने ऐसा मुँह बनाया, मानो वह ऐसी बूढ़ी बातें बहुत सुन चुकी है, और बोली- जो अपने हैं, वे भी न पूछें, तो भी अपने ही रहते हैं ।" "यह शंका सबसे प्रबल, सबसे निराशामय थी ।",नामावली खोली गई ।,"यह शंका सबसे प्रबल, सबसे निराशामय थी ।" "किन्तु आज देखता हैँ, बून्दा ने सबके लिए: एक ही भोजन बनवाया है ।",बड़े-बड़े रईसों के यहाँ भी यही प्रथा चली आती है ।,"किंतु आज देखता हूँ, वृन्दा ने सबके लिए एक ही भोजन बनाया है ।" तुरत एक दरवाजा निकल आया ।,महाशय मेहता विलायती चिट्ठियाँ खोल रहे थे ।,तुरंत एक दरवाजा निकल आया । भयत--तहा जाता है. कि विदेशी चीजों का व्यवहार मत करो ।,प्रभा राजा हरिश्चंद्र के नवीन विचारों की चर्चा सुन कर इस संबंध से बहुत संतुष्ट न थी ।,भगत-कहा जाता है कि विदेशी चीजों का व्यवहार मत करो । उन्हें कभी मनमारे न बेठने देती ।,पंडितजी ने वर के पिता को सूचना दे दी कि कुछ विशेष कारणों से इस साल विवाह नहीं हो सकता ।,उन्हें कभी मनमारे न बैठने देती । "चुटकौ-भर भाठा था, वह भी पट्टी में मिल गया |",भग्नहृदय पति की स्नेह-स्मृति में विश्राम कर रहा था और प्रकाश का जहाज योरप चला जा रहा था ।,"चुटकी-भर आटा था, वह भी मिट्टी में मिल गया ।" उसने घेरदार लहँगा पहना है गुलाबी ओढ़नो भोढ़ी है और पाँव में पेजनियाँ बाँध ली हैं,युवती के अंगों में इतनी लचक है उसके अंग-विलास में भावों की ऐसी व्यंजना है कि लोग मुग्ध हुए जाते हैं,उसने घेरदार लहँगा पहना है गुलाबी ओढ़नी ओढ़ी है और पाँव में पैजनियाँ बाँध ली हैं किसी को जाना चाहिए जो बचा को पक्रड़कर घसीट लाये ।,'प्रजा-मित्र' कार्यालय का पत्र भी दिखाया ।,किसी को जाना चाहिए जो बचा को पकड़कर घसीट लाए । छेकित पत्रिकाओं की बंढल सामने आते ही दिल काबू के वाहर हो जाता ।,लेकिन नौका में बैठ कर उन्हें अनुभव हुआ कि यात्र उतनी सुखद नहीं है जितनी समझी थी ।,लेकिन पत्रिकाओं का बंडल सामने आते ही दिल काबू के बाहर हो जाता । "कौन कह सकता है, क्या होगा ?","लोग समझेंगे, कायर है ।","कौन कह सकता है, क्या होगा ?" वह दबे-पांव कमरे से चाहर निकलकर छत्त पर आया ।,तुम भी कैसी बच्चों की-सी बातें करते हो ?,वह दबे पाँव कमरे से बाहर निकलकर छत पर आया । बोले--मेंने तो बालझ का नाम सोच लिया है,समरकान्त को ऐसी कोई शंका न थी,बोले-मैंने तो बालक का नाम सोच लिया है "लीला उनकी राह देखती, अतिक्षण '(बिकल वेदना का अनुभव करती हुईं न-जाने कब सो गई थी ।","अगर कहती है कि बहुत खराब है , तो शायद वे महाशय वहीं बैठ जायें और उसे जली-कटी सुनाकर अपने दिल का बुखार निकालें ।","लीला उनकी राह देखती , प्रतिक्षण विकल-वेदना का अनुभव करती हुई न-जाने कब सो गयी थी ।" कचहरी में सैकड़ों आदमी इघर-उघर दौड़ रहे थे ।,कोचवान से बार-बार घोडातेज़ करने को कहती ।,कचहरी में सैकड़ों आदमी इधर-उधर दौड़ रहे थे । जहाँ बेठतो वहीं बेठी रद्द जाती ।,"हरदम खोयी-सी रहती, न कपड़े-लत्तो की सुधि थी, न खाने-पीने की ।","जहाँ बैठती, वहीं बैठी रह जाती ।" इन झगड़ों में व्यर्थ सिर खपाती हो ।,इसके सिवा सब गोरखधंधा है ।,इन झगड़ों में व्यर्थ सिर खपाती हो । कुंवर साहब का उत्साह बढ़ा ।,इधर-उधर देखा कोई आदमी नहीं ।,कुँवर साहब का उत्साह बढ़ा । एक क्षण के लिए में अपने को बिलकुल सूल गया ।,बचपन की संचित और अमर स्मृतियाँ बाँहें खोले अपने उन पुराने मित्रों से गले मिलने को अधीर हो रही थीं; मगर वह दुनिया बदल गई थी ।,एक क्षण के लिए मैं अपने को बिल्कुल भूल गया । रूपा न हो तो रुपये कहाँ से बनें बता,निबाह तो रूपा से होता है,रूपा न हो तो रुपए कहाँ से बनें बता "लाचार घर भें दाखिल हुआ, तो सहसा मदद से एक चीख निकल गयी, जैसे मार खाया हुआ कुत्ता किसी को अपनी ओर आता देखकर भय से चिल्लाने लगता है |",रात कट जाने पर फिर कौन पूछता है ।,"लाचार घर में दाखिल हुआ, तो सहसा मुँह से एक चीख निकल गयी, जैसे मार खाया हुआ कुत्ता किसी को अपनी ओर आता देख कर भय से चिल्लाने लगता है ।" जो कुछ थी ज़बान ही की कमाई थी,वह हँसती है इसलिए कि उसे इसके भी दाम मिलते हैं,जो कुछ थी जबान ही की कमाई थी बजरंगी खाट पर बैठा नारियल पी रहा था ।,यह कहकर उठ खड़ा हुआ ।,बजरंगी खाट पर बैठा नारियल पी रहा था । "सोचा, अपने दिल में सममेगा, अपने होटलबाले रुपयो का तक़ाजा कर” रहे हैं |","गाने में कुशल, हारमोनियम में निपुण, इन्द्रजाल के करतब दिखलाने में कुशल ।","सोचा, अपने दिल में समझेगा, अपने होटलवाले रुपयों का तकाजा कर रहे हैं ।" में वह दरख्त हू जिसे कभी पानी नदीं मिला,ज्यादा-से-ज्यादा यही तो होगा कि तुम कुछ कर जाओगे यहाँ पड़े सोते रहेंगे,मैं वह दरख्त हूँ जिसे कभी पानी नहीं मिला "अगर वह इसमें से खुद दो-चार रुगये विकालकर देंगे तो छे लगा, नहीं तो अभबक़ो साल और चूनी-चोछर खांदर छाट पु गा ।","भगवान् ! खानसामा का मुँह बंद कर दो, उसकी वाणी हर लो, तुमने बड़े-बड़े द्रोहियों और दुष्टों की रक्षा की है ।","अगर वह उसमें से खुद दो-चार रुपये निकालकर देंगे, तो ले लूँगा, नहीं तो अबकी साल और चूनी-चोकर खाकर काट दूँगा ।" लोग मान गये कि इस क्षेत्र में एक नई शक्ति का उदय हुआ है ।,ईश्वर ने चाहा तो उसी दिन से तुम्हारी मान-प्रतिष्ठा होने लगेगी ।,लोग मान गये कि इस क्षेत्र में एक नयी शक्ति का उदय हुआ है । यही ठीक है ।,लिफाफा हाथ में लिए हुए सोचने लगे-इसमें मेरी भर्त्सना के सिवा और क्या होगा ?,यही ठीक है । अन्त में मजूरों ने यही निश्चय किया कि हड़ताल कर दी जाय ।,"जब उन्हें आधी मजूरी पर नये आदमी मिल सकते हैं, तब वह क्यों पुराने आदमियों को रखें ।",अंत में मजूरों ने यही निश्चय किया कि हड़ताल कर दी जाय । कभी नहीं ।,"मुझे शक हुआ , यहाँ आयी होगी ।",कभी नहीं । तौव मद्दोने से लगातार घूमते-घूमते उसका जो ऊत्र उठा था,मैं दस-पाँच दिन में फिर आऊँगा और देखूँगा कि किन लड़कों ने झूठा वादा किया था किसने सच्चा,तीन महीने लगातार घूमते-घूमते उसका जी ऊब उठा था जमीन पर बैठ गया और सोचने लगा कि क्‍या करूँ ।,"जब एक फर्लाग शेष रह गया, तो उसके पग न उठे ।",जमीन पर बैठ गया और सोचने लगा कि क्या करू । विजय-गवे ने मुसलमानों की मति हर ली है ।,"मेरी जान लेकर आप जमाल के खून का बदला ही न लेंगे, बल्कि अपनी जाति और धर्म की सच्ची सेवा भी करेंगे ।",विजय-गर्व ने मुसलमानों की मति हर ली है । "ईखर ने लड़के दिये थे, इसबर हो ने छीन लिये ।","कहाँ तो लीला को रोते देख उसकी आँखें सजल हो जाती थीं, कहाँ अब उसे उदास और शोक-मग्न देखकर झुँझला उठता ।","ईश्वर ने लड़के दिये थे, ईश्वर ही ने छीन लिये ।" खाधुर्थों की भाषा इमारी बोल बाल से अलग दोती है ।,"ऐसी ललकार कहीं सुनने में न आयी, तुम सिंह की भाँति गरजते हो ।",साधुओं की भाषा हमारी बोलचाल से अलग होती है । केवल तुम्हारे इशारों का गुलाम था |,मुझे स्वप्न मॆं भी गुमान न था कि तुम मेरे साथ ऐसी बेवफ़ाई करोगी ।,मैं केवल तुम्हारे इशारों का गुलाम था । "में उ्त गव और आनन्द और महत्त्व का अनुमान कर सकता हूँ, जो मेरे अन्य साइयों कौ भाँति मेरे हृदय में भो आन्दो- लित द्दोगा, ढेकिन मेरे भाग्य में वह खुशियाँ--वद् रंगरेलियां नहीं हैँ ।",विलास-वस्तुओं की दुकानों पर उनके साथ जाकर थोड़ी देर के लिए रसमय आग्रह का आनन्द उठाऊँ ।,"मैं उस गर्व और आनन्द और महत्व का अनुभव कर सकता हूँ, जो मेरे अन्य भाइयों की भाँति मेरे हृदय में भी आंदोलित होगा, लेकिन मेरे भाग्य में वह खुशियाँ वह रंगरेलियाँ नहीं हैं ।" "मि० मेहता को नियुक्ति के बाद जब वह पहली बार आया था तो राजा साहब ने उसे खास तौर पर बुलाया था, और उससे जी खोलकर बातें की थीं, उसे अपने साथ शिकार खेलने ले गये और नित्य उसके साथ टेनिस खेला किये थे ।",किसी विश्वविद्यालय में पढ़ता था ।,"मि० मेहता की नियुक्ति के बाद जब वह पहली बार आया था तो राजा साहब ने उसे खास तौर पर बुलाया था और उससे जी खोलकर बातें की थीं , उसे अपने साथ शिकार खेलने ले गये थे और नित्य उसके साथ टेनिस खेला करते थे ।" पहले हम अपने सभापति की सेहत का जाम पियेंगे,जिस सभा के सभापति पूज्य ओंकारनाथ जैसे विशाल-हृदय व्यक्ति हों उस सभा में ऊँच-नीच का खान-पान का और जाति-पाँति का भेद नहीं हो सकता,पहले हम अपने सभापति की सेहत का जाम पीएँगे "विशुद्ध श्वेत पत्थर से बना है, भारत में इसकी ठुलना नहीं |",अकस्मात् उसकी आँखें खुलीं और ये मनोहर ध्वनियॉँ कानों में पहुँची ।,"विशुद्ध श्वेत पत्थर से बना है, भारत में इसकी तुलना नहीं ।" "लेकिन झाज जब विट्टलदास से उसे ज्ञात हुआ कि शर्माजी मुझे उबारने के लिए कितने उत्सुक हो रहे हैं मोर कितनी उदारता के साथ मेरी सहायता करने पर तैयार हैं, तो उनके प्रति घृणा के स्थान पर उसके मन में श्रद्धा उत्पन्न हुईं ।",इसीलिए उस ने विट्ठलदास से पह्मसिंह को अपने साथ लाने की शर्त की थी ।,लेकिन आज जब विट्ठलदास से उसे ज्ञात हुआ कि शर्माजी मुझे उबारने के लिए कितने उत्सुक हो रहे हैं ओर कितनी उदारता के साथ मेरी सहायता करने पर तेयार हैं तो उनके प्रति घृणा के स्थान पर उसके मन में श्रद्धा उत्पन्न हुईं । सुभद्रा ने पूछा--सेंत का धन पाकर भी प्रसन्न नहीं हुए ?,"सोचने लगे, मालूम नहीं सुभद्रा ने किस नीयत से यह रुपए बचाए थे, मालूम नहीं, इन के लिए कौन-कौन से कष्ट सहे थे ।",सुभद्रा ने पूछा -- सेंत का धन पा कर भी प्रसन्न नहीं हुए ? "ढपोरसंख ने गरभीर होकर कहा--मकूठ वह बोलता है, जिसका पत्षे निबल दोता है |",ढपोरसंख ने पत्रों का पुलिंदा समेटा और वृत्तान्त सुनाने लगे ।,"ढपोरसंख ने गम्भीर होकर कहा, 'झूठ वह बोलता है, जिसका पक्ष निर्बल होता है ।" कानूनी कुमार-( आप-ही-आप ) देश कौ दशा कितनी खराब होती चली जातो है ।,देश की चिन्ताओं से उनकी देह स्थूल हो गयी है ; सदैव देशोद्धार की फि क्र में पड़े रहते हैं ।,कानूनी कुमार (आप-ही-आप) देश की दशा कितनी खराब होती चली जाती है । सम्रा बंध गया ।,कोई गीत बजाने की तैयारी हो रही थी ।,समाँ बँध गया । वकील लोग अन्त समय तक यही कहते रहे कि वे छुट जाएँगे ।,"लेकिन गंगाजली का जी न माना, उसने दिल खोलकर रुपये खर्च किए ।",वकील लोग अन्त समय तक यही कहते रहे कि वे छूट जाएँगे । लज्जित डोकर चले गये ।,आशा ने कभी इतनी रुखाई से उन्हें जवाब न दिया था ।,लज्जित होकर चले गये । रात-दिव उन्हों को दवा-दाछ में दौढ़ते गुज़रता है ।,"अधिकारियों से खतोकिताबत की और इसे कम्पनी के नाम खरीद लिया, ४० हजार में यह बँगला सामान समेत लिया गया ।",रात-दिन उन्हीं की दवा-दारू में दौड़ते गुजरता है । "हम अपने पास से, दाम लेकर दवा दे सकता है ।","मगर दिल के चाहे कितने ही बुरे हों, बातें मीठी-मीठी करते थे ।","हम अपने पास से, दाम लेकर दवा दे सकते हैं ।" सभी ने उसका वृत्तान्त सुनकर खेद प्रगट किया और वकील साहब के वसीयत न लिख जाने पर हैरत करते रहे ।,लेना-देना चुका लेने के बाद इससे ज्यादा की गुंजाइश ही नहीं ।,सभी ने उसका वृत्तांत सुनकर खेद प्रकट किया और वकील साहब के वसीयत न लिख जाने पर हैरत करते रहे । "उम्रानाथ ने एक फौजदारी के घामले में रिख्वित छेछर यलत रिपोर्ट लिखी और उनकी सनद्‌ छीन ली गईं , पर फूल- बती के चेद्वरे पर रख की परछाई तक न पड़ी ।",इस विवाह में मैं एक हजार से ज्यादा नहीं खर्च कर सकता ।,उमानाथ ने एक फौजदारी के मामले में रिश्वत लेकर गलत रिपोर्ट लिखी और उसकी सनद छीन ली गयी; पर फूलमती के चेहरे पर रंज की परछायीं तक न पड़ी । यह नहीं कि सबसे पीछे वाले शोर मचाकर पहले आ जायें और पहले वाले खड़े मुँह ताकते रहें ।,"' इतने कठोर शब्द सुनकर दारोग़ाजी को भन्ना जाना चाहिए था, पर उन्होंने ज़रा भी बुरा न माना ।",यह नहीं कि सबसे पीछे वाले शोर मचाकर पहले आ जाएं और पहले वाले खड़े मुँह ताकते रहें । उन्हें तो अपने भोग- विलास से मतलब ।,कोई एक बजे के करीब चोर-चोर का हल्ला सुनकर मैं चौंक पड़ी और अपनी चारपाई के पास चार आदमियों को हाथापाई करते देखा ।,उन्हें तो अपने भोग-विलास से मतलब । "पर घोडे ने मुँह तक न खोला, तब उन्हें क्रोध आ गया |",बच्चा पीठ पर बैठ जायँगे तो कितना ही उछले-कूदे पर उन्हें हिला न सकेगा ।,"पर घोड़े ने मुँह तक न खोला, तब उन्हें क्रोध आ गया ।" उसको श्राश्चर्य मातम होता था कि लोग इतने एकाग्रचित्त होकर क्यों सुन रहे हैं ?,"सुभद्रा को भोली का गाना नीरस, फीका मालूम होता था ।",उसको आश्चर्य मालूम होता था कि लोग इतने एकाग्रचित्त होकर क्यों सुन रहे हैं ? साहब कुछ लाट तो हैं नहीं ।,तुम कुछ मत करना ।,साहब कुछ लाट तो हैं नहीं । हाँ; बीच में भाँजी न मारिएगा ।,"कामतानाथ ने सिर हिलाकर कहा- भाई, मैं इन चालों को पसंद नहीं करता ।","हाँ, बीच में भाँजी न मारिएगा ।" "अधिकारी उसे तरह-तरह के प्रलोभन देते हैं; १९ जब इसका रमा पर कोई असर नहीं होता और उन्हें मालूम हो गया हैं कि उस पर ग़बन का कोई मुक़दमा नहीं है, तो वे उसे जालपा को गिरफ्तार करने की धमकी देते हैं ।","रमा पहले शंकाएं करता है, पर बाद को राज़ी हो जाता है और अपने बंगले पर लौट जाता है ।","अधिकारी उसे तरह-तरह के प्रलोभन देते हैं, पर जब इसका रमा पर कोई असर नहीं होता और उन्हें मालूम हो गया है कि उस पर ग़बन का कोई मुकदमा नहीं है, तो वे उसे जालपा को गिरफ्तार करने की धमकी देते हैं ।" ओमा का नाम बुद्धू था |,"जो सुने, मूर्ख बनाये ।",ओझा का नाम बुद्धू था । क्या तुमने वह काम इतना आसान समझा था कि चुटकी बजाने में पूरा हो जायेगा ।,आपने ही तो एक काम सौंपा और जब वह काम करके लौटी तो आप बिगड़ रहे हैं ।,क्या तुमने वह काम इतना आसान समझा था कि चुटकी बजाने में पूरा हो जाएगा । केवल-एक सज्जन पुरुष; की आड़ चाहिए-।,"अगर कोई मेरी सहायता नहीं करता, न करे, मैं अपनी मदद आप कर लूँगी",केवल एक सज्जन पुरुष की आड़ चाहिए । 'रला एसरे कमरे में मेमपाहव से अंगरेजी पढ़ रद्दी थी ।,"नथुवा को वह पैसे, मिठाइयाँ दे दिया करती थी ।",रतना दूसरे कमरे में मेमसाहब से अँग्रेजी पढ़ रही थी । लाला बैजनाथ शराब के लिए जिद कर रहे थे ।,"कोई कहता था, मुझे घी कम मिला, कोई गोहार लगता कि मुझे उपले नहीं दिए गए ।",लाला बेजनाथ शराब के लिए जिद कर रहे थे । "बूढ़ा, तुमसे मेरी एक विनतो हे ।",तुमने बच्चे को जिला लिया ।,"बूढ़ा, तुमसे मेरी एक विनती है ।" मैं उनकी दृष्टि में कितनी नीच ओर घृरित हो जाऊंगी ?,उन्हें कितना दुख होगा ?,मैं उन की दृष्टि में कितनी नीच और घृणित हो जाऊँगी ? "वे चीज़ें उसकी आँखों में अब काँटों की तरह गड़ती थीं, उसके हृदय में शूल की तरह चुभती थीं ।","' जालपा-'तुम्हें लेना है, इसलिए माल चोखा नहीं है, बेचना होता, तो चोखा होता ।","वे चीजें उसकी आंखों में अब कांटों की तरह गड़ती थीं,उसके ह्रदय में शूल की तरह चुभती थीं ।" "जिस वक़्त उसने फाँसी का हुक्म सुना होगा, उसकी क्‍या दशा हुई होगी ।",' जालपा ने मन को दबाकर लाचारी से सिर झुका लिया और कुछ न बोली ।,"जिस वक्त उसने फाँसी का हुक्म सुना होगा, उसकी क्या दशा हुई होगी ।" उनके थाने के समय दिल में घड़कन-सी होने लगती छे ।,विपिन चारपाई पर बैठते हुए बोले- मेरी दवा अब मौत करेगी ।,उनके आने के समय दिल में धड़कन-सी होने लगती है । "उसके पिता आ गये हैं, उबसे बातें कर रहा है ।",सन्ध्या का समय है ।,"उसके पिता आ गये हैं, उनसे बातें कर रहा है ।" झमोला में कितने ही सुशिक्षित सज्जन थे।,वास्तव में कृष्णचंद्र काम संताप से जले जाते थे ।,अमोला में कितने ही सुशिक्षित सज्जन थे । फिर सिर पर बनारसों साफा बाँधा ।,पण्डित मोटेराम का भाषण समाप्त हो गया ।,फिर सिर पर बनारसी साफा बाँधा । जेल-जीवन की कल्पना ही से उसके रोएँ खड़े होते थे ।,चक्की पीसते-पीसते हाथ में घड्डा पड़ जायगा ।,जेल-जीवन की कल्पना ही से उसके रोएं खड़े होते थे । यही मनुष्यता और शिष्टता अब रह गयी है,वह अभी तक चुका न सका था,यही मनुष्यता और शिष्टता अब रह गयी है इस ज़िम्मेदारी को भी इस वक़्त जालपा अपने ही ऊपर ले रही थी ।,उपहारों को ले-लेकर वह क्यों फली न समाती थी ?,इस जिम्मेदारी को भी इस वक्त ज़ालपा अपने ही ऊपर ले रही थी । पर यहों' इंश्वर की दथा से अक्क के पुतले थे ।,वेश्याओं के दल भी आ पहुँचे ।,पर यहाँ ईश्वर की दया से अक्ल के पुतले थे । वे दाऊद को पेरने की चेषा करने लगे ।,सहसा एक बार नागिन उछलकर अरब के अंतस्तल में जा पहुँची ।,वे दाऊद को घेरने की चेष्टाकरने लगे । "तुम्हारे पास तुम्हारे आशिक आयेंगे, मुझे जलन होगी ।",कई दिन के सोच-विचार के बाद उसने कह डालने ही का निश्चय किया था ।,"तुम्हारे पास तुम्हारे आशिक आयेंगे, मुझे जलन होगी ।" द्यानाथ ने अबकौ अपने पत्न का प्रचार बढ़ाने के लिए व स्तव में एच आपत्ति- जनक लेख लिखा भौर छ मदीने की सज़ा पाई ।,"घर के किसी प्राणी, किसी वस्तु, किसी प्रसंग से उसे प्रयोजन न था ।",दयानाथ ने अबकी अपने पत्र का प्रचार बढ़ाने के लिए वास्तव में एक आपत्तिजनक लेख लिखा और छः महीने की सजा पायी । "ऊदीं रुपये मिलने को जाशा नहीं दे , और उन्हें भवतासे अपीऊ करते संझोच होता है ।","उमा कहाँ तो मुस्करा रही थी, कहाँ रुपये का नाम सुनते ही उसका चेहरा फक हो गया ।",कहीं रुपये मिलने की आशा नहीं है; और उन्हें जनता से अपील करते संकोच होता है । तुम्हारा बहुत संक्षिप्त परिचय भी करा दूँगी।,वह भी जरा तुम्हारी सूरत देख ले।,तुम्हारा बहुत संक्षिप्त परिचय भी करा दूँगी। लड़का दौड़ा हुआ गया और एक क्षण में एक पाँच द्वाथ के काले देव को साथ लिये आता दिखाई दिया ।,एक क्षण के लिए मैं अपने को बिल्कुल भूल गया ।,’ लड़का दौड़ता हुआ गया और एक क्षण में एक पाँ च हाथ के काले देव को साथ लिए आता दिखाई दिया । उसकी सहायता का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण न होता था ।,महात्माजी ने उसे प्रयोगशाला बना लिया था ।,उसकी सहायता का कोई प्रत्यक्ष प्रमाण न होता था । "में कितनी मिहनत करता हूँ, यद्द तुम अपनी आँखों देखते दो, अगर नहीं देखते, तो यद्द तुम्दारी आँखों का कसूर है, तुम्दारी बुद्धि का कसूर है ।","और आती क्या है, हाँ, कहने को आ जाती है ।","मैं कितनी मेहनत करता हूँ, तुम अपनी आँखों देखते हो, अगर नहीं देखते, जो यह तुम्हारी आँखों का कसूर है, तुम्हारी बुद्धि का कसूर है ।" बिलकुल उसो रग की हैं ।,आपकी सहेली आपकी प्रतीक्षा करती होगी ।,बिलकुल उसी रंग की हैं । कमरे में एक खिढ़द्ी थी जो भाँयव में खुलतो थी ।,"एक सहेली ने पूछा- क्यों आशा, अब तो तुम्हें उनका मुँह जरा भी अच्छा न लगता होगा ।",कमरे में एक खिड़की थी जो आँगन में खुलती थी । लोग विस्मय से दग हो गये,इसने पानी के उस पार तक पीछा किया पर न पा सका,लोग विस्मय से दंग हो गये घर को अपना घर न समझ राका,विमाता मिली वह डाइन,घर को अपना घर न समझ सका राघवीति का स्थान शेर-शायरो ने छे लिया था ।,स्त्रियों को बनाव-सिंगार के सिवा कोई काम न था ।,राजनीति का स्थान शेरो-शायरी ने ले लिया था । उसे लड़कों से सचमुच स्नेह था।,उस पर एक परदा पड़ा रहता था।,उसे लड़कों से सचमुच स्नेह था। "युरेडो के दिलों पर उमर सप्रय जैश्नो बीत रहो थो, उसका अनुभान करना कठिन है ।",शोक है कि वे कोल्हू अब तक ज्यों के त्यों खड़े थे किन्तु कोल्हवाड़े की जगह पर अब एक सन लपेटनेवाली मशीन लगी थी और उसके सामने एक तम्बोली और सिगरेटवाले की दूकान थी ।,"बुंदेलों के दिलों पर उस समय जैसी बीत रही थी, उसका अनुमान करना कठिन है ।" "और अगर कुछ सुनभुना दी लेती, तो उत्तका क्या बिगढ़ा जाता था ।","अब उन्हें अपनी जरा-जरा सी बात पर झुँझला पड़ना , उसकी सीधी-सी बातों का टेढ़ा जवाब देना , विकल करने लगा ।",और अगर कुछ भुनभुना ही लेती तो उनका क्या बिगड़ जाता था ? कहिए आप तो अच्छी तरह रहे ।,मेरा नाम कृपाशंकर है ।,कहिए आप तो अच्छी तरह रहे ? बन्दूकें छूट रही थीं,अमरकान्त को कुछ दूर से ही शहनाई की आवाज सुनाई दी,बंदूकें छूट रही थीं "वोली--अच्छा मूँह-हाथ तो धो डालो, आँखें चढ़ी हुई हैं।","सुभद्रा ने सोचा, अभी क्रोध में कुछ न सूझेगा, दो-एक रोज में शान्‍्त हो जाएगी ।","बोली -- अच्छा मुँह-हाथ धो डालो, आँखें चढ़ी हुई है ।" "मेने कर्मी उन कहानियों पर विश्वास नहीं किया, परनन्‍्ठ कुछे-न- कुछ इसमे तत्व है अवश्य, नहीं तो इस प्रकृति-उपासना के युग में इनका अन्तित्व दी न रहता |","गिरधारी अभी कुछ उत्तर न देने पाया था कि तुलसी बनिया आया और गरजकर बोला- गिरधारी ! तुम्हें रुपये देने हैं कि नहीं, वैसा कहो ।","मैंने कभी उन कहानियों पर विश्वास नहीं किया, परन्तु कुछ न कुछ इसमें तत्त्व है अवश्य, नहीं तो इस प्रकृति-उपासना के युग में इनका अस्तित्व ही न रहता ।" इसपेक्टर साहब की मेम भी तो रोज पाउडर लगाती थीं ।,"जानवर को भी जब घास-भूसा नहीं मिलता, तो पगहा तुड़ाकर किसी के खेत में पैठ जाता है ।",इंस्पेक्टर साहब की मेम भी तो रोज पाउडर लगाती थीं । मुकनसा भाग्यशाली ससार में और कौन होगा |,मेरा तो रोयाँ-रोयाँ आपका गुलाम है ।,मुझ-सा भाग्यशाली संसार में और कौन होगा ? अमर की पाठ्याला में भव लड़झ़ियाँ भी पढ़ने लगी थीं,इस तरह जान दोगे तो मुझे तुम्हारी पाठसाला बंद करनी पड़ेगी,अमर की पाठशाला में अब लड़कियाँ भी पढ़ने लगी थीं "चर में जी न लगे, तो आदमी क्या करे ।",दूसरे अवसर पर तो दुष्ट घण्टों रोयेगा ।,' ' घर में जी न लगे तो आदमी क्या करे ? उसे टाल्स्टाय की एक कहानी याद आई जिसमें एक पुरुष अपनी प्रेमिका को लेकर भाग जाता है पर उसका कितना भीषण अन्त होता है,हरेक जबान पर यही चर्चा होगी,उसे टालस्टाय की एक कहानी याद आई जिसमें एक पुरुष अपनी प्रेमिका को लेकर भाग जाता है पर उसका कितना भीषण अंत होता है चिन्ता या क्रोध को तो जेसे उन्होंने जीत लिया दो ।,खाट-वाट कल मँगवा लेंगे ।,चिंता या क्रोध को तो जैसे उन्होंने जीत लिया हो । "भिभककर खडी हो गई, सिर मुकाकर बोली--महाशय, आप इसर कैसे भूल पड़े",उन्हें उसने कई बार शर्माजी के मकान पर देखा था ।,"झिझक कर खड़ी हो गई, सिर झुका कर बोली -- महाशय, आप इधर कैसे भूल पड़े ?" तुम स्नान करके नदी से तो मेरे साथ हो निकली थीं ।,"कुछ उन्हीं की एक दुलारी बेटी थोड़े ही है, इस भाँति मन बढ़ाना अच्छा नहीं ।",तुम स्नान करके नदी से तो मेरे साथ ही निकली थीं । भापने तो थानेदारी की है ।,मैं उनकी उपेक्षा कैसे कर सकता हूँ ।,आपने तो थानेदारी की है । बंधी पर दूध न पहुँचे तो गुजर केसे हो,भोला के समीप जा कर बोला - राम-राम भोला भाई कहो क्या रंग-ढंग हैं,बँधी पर दूध न पहुँचे तो गुजर कैसे हो थोड़ी देर में आते ही होंगे ।,नौ बजे ठाकुरद्वारे में कीर्तन सुनते हैं और फिर संध्या करके भोजन पाते हैं ।,थोड़ी देर में आते ही होंगे । उसकी देह दल्ही थी मन हलझ्ा था भर भागे भानेवाली ऊपर को चढ़ाई मातों उसका स्वागत झऋर रही थी,उसने मन की संपूर्ण श्रध्दा से ईश्वर के चरणों में वंदना की,उसकी देह हल्की थी मन हल्का था और आगे आने वाली ऊपर की चढ़ाई मानो उसका स्वागत कर रही थी सकीना ने इसने की चेट्टा करके कंहा--में तो मोटी-ताज्ी कमो न थी,सुखदा ने देखा वह एक साफ सुथरा छोटा-सा कमरा है जिसमें दो-तीन मोढ़े रखे हुए हैं,सकीना ने हँसने की चेष्टा करके कहा-मैं तो मोटी-ताजी कभी न थी इस लौंडे के कारण आज उन्हें कितता अपमान सहना पडा |,निर्दयी संसार के सामने क्या फिर उन्हें हाथ फैलाना पड़ेगा ?,इस लौंडे के कारण आज उन्हें कितना अपमान सहना पड़ा । प्रेमवती की इच्छा पाकर दोनों फूले न समाये,उसने सुशीला पर अपना यह भाव प्रगट किया,प्रेमवती की इच्छा पाकर दोनों फूले न समाये """. वह अब वड़ी शाढठ से जंगल में चारों कोर गौसरवा- न्वित्र दृष्टि से ठाकंत हुआ विचण करता ।",एक क्षण में बादशाह की उद्दंडता और घमंड ने दीनता और विनयशीलता का आश्रय लिया ।,वह अब बड़ी शान से जंगल में चारों ओर गौरवान्वित दृष्टि से ताकता हुआ विचरा करता । "ज्ली नहीं है, देवी है ।",अपने मित्रों से सुमन की प्रशंसा करता फिरता ।,"स्त्री नहीं है, देवी है ।" वह गंवार था।,बुड़े लोग साधारण बनाव-सिंगार को भी सन्देह की दृष्टि से देखते है ।,वह गँवार था । मैंने इसके विपरीत उससे निर्दयता का व्यवहार किया ।,"निर्धन था, इसलिए आवश्यक था कि मैं धन के अभाव को अपने प्रेम ओर भक्ति से पूरा करता ।",मैंने इसके विपरीत उससे निर्दयता का व्यवहार किया । आकर फिर बरामदे में खड़ा हो गया ।,ईश्वर-भीरुता उनके चरित्र का प्रधान गुण थी ।,आकर फिर बरामदे में खड़ा हो गया । डरी कहीं होरी बैलों को दे नर्दे,मैं तो समझता था गाना सुनने जाता होगा,डरी कहीं होरी बैलों को दे न दें वह तुम्हे श्रपने दिल में क्‍या समभेगी ?,"हाँ, तुम्हारी तकलीफों के भुलावे में पड़ जाती थी ।",वह तुम्हें अपने दिल में क्या समझेंगी ? बहो घुढ़िया पठानित आाज- कल वहां सब कुछ कर-घर रहौ है,एक दिन तो रातो-रात वहाँ सैंकडों झोंपड़े खड़े हो गए लेकिन दूसरे दिन पुलिस ने उन्हें जला दिया और कई चौधरियों को पकड़ लिया,वही बुढ़िया पठानिन आजकल वहां सब कुछ कर-धार रही है आशीर्वाद देता चला गया,मिनटों में लाखों का वारा-न्यारा होता है,आशीर्वाद देता चला गया वद लौटा दो ।,गया ने मुझे दौड़कर पकड़ लिया और डंडा तानकर बोला-मेरा दाँ व देकर जाओ ।,वह लौटा दो । तुम तो इतने गुस्सेवर कभी न थे ।,तुमने अपनी सारी नेकियों को मटियामेट कर दिया ।,तुम तो इतने गुस्सेवर कभी न थे । सगर इस अर्द्ध चितवन में दब्ने हुए पानी का चेग और प्रवाह था |,कदाचित् आँखों में आँसुओं का आवेग हो रहा था ।,मगर इस अर्द्ध-चितवन में दबे हुए पानी का वेग और प्रवाह था । "समझते हैं, वह कोई ऋषि है ।",राजा-सबों को पेश करो ।,"समझते हैं, वह कोई ऋषि है ।" "अैंने तुम्हारा क्या विगाडा है, त॒म्दारी तो सूरत भी नहीं देखी ।",यह थाना थोड़े ही है कि आपके रोब में फर्क पड़ जाएगा ।,"' 'मैंने तुम्हारा क्या बिगाड़ा है, तुम्हारी तो सूरत भी नहीं देखी ।" तुम उससे एक बार कहो तो ।,"जब तक सारी चीज़ें न बनवा लेते, रात को नींद न आती ।",तुम उससे एक बार कहो तो । उनके परदादों में कई वार खूत-वच्चर हुआ ।,मुझे धैर्य हो जायगा कि उसके लिए मुझसे जो कुछ हो सकता था मैंने किया ।,उनके परदादों में कई बार खून-खच्चर हुआ । "जव तुम्हारे रहने से मुझे इतना भी सुख नहीं कि ठीक समय पर भोजन मिल जाए, तो तुम्हारा रहना न रहना दोनों वरात्र है ।",कभी-कभी वह सुमन पर झुँझलाता ओर कहता -- जब देखो तब पड़ी रहती हो ।,"जब तुम्हारे रहने से मुझे इतना भी सुख नहीं कि ठीक समय पर भोजन मिल जाए, तो तुम्हारा रहना न रहना दोनों बराबर है ।" मन को जिस दशा में वद सकौना को भोर लाक़ा था वह दद्चा अब न रद्दो थो,सलीम ने पूछा-जो चीज खाने की थी वह तो तुमने निकालकर रख दी,मन की जिस दशा में वह सकीना की ओर लपका था वह दशा अब न रही थी बिरादरी के लोग निमन्त्रित द्वोंगे ।,"गोकि कुंजियाँ बड़ी बहू के पास रहती थीं – बुढ़िया में वह अधिकार-प्रेम न था, जो वृद्धजनों को कटु और कलहशील बना दिया करता है; किन्तु उसकी इच्छा के बिना कोई बालक मिठाई तक न मँगा सकता था ।",बिरादरी के लोग निमंत्रित होंगे । तो बह लोग तुम्हें कुछ देते नद्दी १,बुढ़िया ने ज्योतिहीन आँखों से उसके मुख की ओर देखकर कहा-गोवर्धन की सराय पर रहती हूँ बेटा,तो वह लोग तुम्हें कुछ देते नहीं दारोग़ाजी ने उन्हें देखते ही कुककर सलाम किया ्रौर शायद मिज़ाज शरीफ पूछना चाहते थे कि उस भले आदमी ने सलाम का जवाब गालियों से देना शुरू किया ।,"उन्हीं दिनों की बात है, मैंने तीजे का व्रत किया था ।",दारोगाजी ने उन्हें देखते ही झुककर सलाम किया और शायद मिजाज शरीफ पूछना चाहते थे कि उस भले आदमी ने सलाम का जवाब गालियों से देना शुरू किया । झ्रापकी तुफैल में हम भी फेज पा जाएंगे ।,चलिए आज आप भी पुरानी मुलाकात ताजा कर आइए ।,आप की तुफैल में हम भी फैज पा जाएंगे । १९ - दरवाजे पर झाकर सुमन सोचने लगी कि भ्रव कहाँ जाऊँ ।,उसने सावधानी से सन्दूकची उठा ली ओर सुभद्रा को प्रणाम करके घर से चली गई ।,१९ - दरवाजे पर आकर सुमन सोचने लगी कि अब कहाँ जाऊँ । इतने में रमानाथ भी दारोगा के सामने हाजिर किया गया ।,ज़रा डांट बताइएगा तो सब कुछ उगल देगा ।,' इतने में रमानाथ भी दारोग़ा के सामने हाज़िर किया गया । गजाधर---.मैं उनका जमाख्च थोड़े ही लिखता हैँ ।,सुमन -- कोई बड़े वकील है ?,गजाधर -- मैं उनका जमाखर्च थोड़े ही लिखता हूँ । "कहीं फरियाद नहीं कर सकता, मुंह तक नहीं खोल सकता ।",धूप निकल आने पर पार्क की ओर निकल जाते और चींटियों को आटा खिलाते ।,"कहीं फरियाद नहीं कर सकता , मुँह तक नहीं खोल सकता ।" "सात कोठरी में छिपा के रक्खूँ, पर इसकी निगाह पहुँच जाती है ।","इन सब कामों से छुट्टी पाकर उसने अपनी चिलम भरी और मोढ़े पर बैठकर पीने लगी, लेकिन उसके अंदाज से मालूम होता था कि वह तंबाकू का रस लेने के लिए नहीं, दिल को जलाने के लिए पी रही है ।","सात कोठरी में छिपा के रक्खूं, पर इसकी निगाह पहुँच जाती है ।" नेना अपने कमरे में बेठी हुई भावज का इन्तज़ार कर रही थी २४६ कमेभूमि उसकी गरज सुनकर सममक्त गई कि कोई न कोई बात दो गई,कोई कुलीन स्त्री इस तरह आत्म-सम्मान खोना स्वीकार न करेगी,नैना अपने कमरे में बैठी हुई भावज का इंतजार कर रही थी उसकी गरज सुनकर समझ गई कोई-न कोई बात हो गई "बूढी गाय जब न दूध दे सकती है, न बच्चे, तब उसके लिए गोशाला ही सबसे अच्छी जगह है ।",मन भी उदास हो गया ।,"बूढ़ी गाय जब न दूध दे सकती है न बच्चे, तब उसके लिए गोशाला ही सबसे अच्छी जगह है ।" फिर अचानक एक ठरण्डी साँस खींचकर उसी चिता में कूद पड़ा |,"फिर एक क्षण में वह अनुपम रूप-राशि, वह आदर्श वीरता की उपासिका, वह सच्ची सती अग्नि-राशि में विलीन हो गयी ।",फिर अचानक एक ठंडी साँस खींचकर उसी चिता में कूद पड़ा । "सोचा, कहीं रात को टिकट न मिला तो टापते रह जायंगे ।",एक दिन पहले से ही लोग अपनी जगहें रक्षित करा रहे थे ।,"सोचा, कहीं रात को टिकट न मिला तो टापते रह जायंगे ।" कदाचित्‌ ओमा ही मुझे ठच्छबुद्धि समझे |,उन्हें बड़ा संतोष हुआ ।,कदाचित् ओझा ही मुझे तुच्छबुद्धि समझे । लेकिन भाज मुक्ति का द्वार सामने खुला देखकर इस कारागार में उसे क्षण-भर भी ठहरना भसह्य हो रहा था ।,उस समय तक उसे यहाँ के रंग-ढंग का ज्ञान न था ।,लेकिन आज मुक्ति का द्वार सामने खुला देख कर इस कारागार में उसे क्षणभर भी ठहरना असह्य हो रहा था । अगर सबक ही देना है तो ऐसा सबक दो जो कुछ दिन इज़रत को याद रहे,दस बजे रात को अमरकान्त सलीम के घर पहुंचा,अगर सबक ही देना है तो ऐसा सबक दो जो कुछ दिन हजरत को याद रहे जुगनू ग्रायब ] उस दिन से शहर में फिर किसो ने जुगनू की सुरत नहीं देखी ।,पीछे के द्वार से निकली और गलियों-गलियों भागी ।,जुगनू गायब ! उस दिन से शहर में फिर किसी ने जुगनू की सूरत नहीं देखी । पर रमानाथ अपनी कुर्सी पर बैठा रजिस्टर लिख रहा था ।,कर्मचारी एक-एक करके जा रहे थे ।,पर रमानाथ अपनी कुर्सी पर बैठा रजिस्टर लिख रहा था । दोनों कमी द्वाथ में द्ाथ मिलाकर कभी कमर पर द्वाथ रखकर कभी कूल्हों को ताल में सटकाकर नाचने में उन्मत्त दो रहे हैं,युवक गठीला जवान है चौड़ी छाती उस पर सोने की मुहर कछनी काछे हुए,दोनों कभी हाथ-में-हाथ मिलाकर कभी कमर पर हाथ रखकर कभी कूल्हों को ताल से मटकाकर नाचने में उन्मत्ता हो रहे हैं "पुरुष को अधिकार था स्त्री को बेचे, गिरो रखे या मार डाले ।","जिसे चाहूँ, फाँसी दे सकता हूँ ।","पुरुष को अधिकार था स्त्री को बेचे , गिरो रखे या मार डाले ।" ज्ञान भौर योग की प्रतिभा की जगह उसके मुख से एक प्रकार की सरलता झौर दया प्रकट होती थी ।,उसके गले में रुद्रक्ष की माला थी और नेत्र लाल थे ।,ज्ञान और योग की प्रतिभा की जगह उसके मुख से एक प्रकार की सरलता और दया प्रकट होती थी । रमानाथ के कथन में बहुत कुछ सत्य था ।,सहसा रमानाथ टेनिस-रैकेट लिये बाहर से आया ।,रमानाथ के कथन में बहुत कुछ सत्य था । "पचाध्त साल की तो उम्र है, चाँद के बाल भढ़ गये हैँ, गालो पर श्ञुर्रियाँ पढ़ गई हैं , पर अभी तक आपको इश्क का खब्त है ।",जेनी-सेक्रेट्ररी से कुछ कहने की जरूरत ही नहीं पड़ी ।,"पचास साल की तो उम्र है, चाँद के बाल झड़ गये हैं, गालों पर झुर्रियां पड़ गयी हैं, पर अभी तक आपको इश्क का ख्ब्त है ।" उस सुख के बदले में सगे का सुख भी न हेती,ऐसा जान पड़ता था कि मेरा बालक मेरी गोद में आने के लिए हुमक रहा है,उस सुख के बदले में स्वर्ग का सुख भी न लेती पहसे सलीम से मुठभेड़ हुईं,इसके संचालन का दायित्व मुझ पर है,पहले सलीम से मुठभेड़ हुई लेकिन महंतजी की उस इलाके में ऐसी धाक जमी हुई थी कि दारोगाजी को कोई गवाही न मिल सकी ।,तहकीकात करने चले ।,लेकिन महंत जी की उस इलाके में ऐसी धाक जमी हुई थी कि दारोगाजी को कोई गवाही न मिल सकी । "हमारे जीवन का यही एक अवृलम्बतन है, महारानी ! हस दोनों रो-रोकर मर जायगे ।",यहाँ तो करोड़ों की रियासत बरबाद हो जायगी ।,"हमारे जीवन का यही एक अवलम्ब है , महारानी ! हम दोनों रो-रोकर मर जायेंगे ।" "कहीं सचमुच ढाकुओं ने छापा मारा, तो कौन उतकी सहा- यता करेगा ।",इस धर्मनिष्ठा ने उनकी आत्मा को और भी शक्ति प्रदान कर दी थी ।,"कहीं सचमुच डाकुओं ने छापा मारा , तो कौन उनकी सहायता करेगा ?" तब आदे-दाल का भाव मालूम होता ।,दुश्मनों ने हमें पीट लिया ।,तब आटे-दाल का भाव मालूम होता । "--मैंने सदिग्ध भाव से सिर हिलकर कहा--सममझ लो, जीवन कड़वा हो जायगा ।",यह कभी-कभी बक-झक करने लगती है और बेहोश हो जाती है ।,"मैंने संदिग्ध भाव से सिर हिलाकर कहा, समझ लो, जीवन कड़वा हो जायगा ।" "वह यहाँ भी नहीं आये, रास्ते में भी नहीं मिले, तो फिर गये कहाँ ?",बडे बाबू ने भेजा है ।,"वह यहाँ भी नहीं आए, रास्ते में भी नहीं मिले, तो फिर गए कहाँ ?" इसमें भाँति-भाँति के सुन्दर आभूषणों के नमूने बने हुए थे ।,"नागपंचमी के दिन मुहल्ले की कई युवतियां जालपा के साथ कजली खेलने आइ, मगर जालपा अपने कमरे के बाहर नहीं निकली ।",इसमें भांति- भांति के सुंदर आभूषणों के नमूने बने हुए थे । अपनी निर्बलता पर यह विजय पाकर उसका मुख प्रदीघ्त हो गया ।,"जालपा ने बेग उठा लिया और तेज़ी से घाट से उतरकर जल-तट तक पहुँच गई, फिर बेग को उठाकर पानी में फेंक दिया ।",अपनी निर्बलता पर यह विजय पाकर उसका मुख प्रदीप्त हो गया । बेचारा नोकरी छोड़ कर भाग जाता है।,"किसी धनी की लड़की से शादी हो जाती, तो चैन से कटती।",बेचारा नौकरी छोड़कर भाग जाता है। "वहाँ किसे फ़िक्र है कि इसने खाया या नहीं, कहाँ कपड़े उतारे, कहाँ सो रहा है ।",इधर कुछ दिनों से वह शाम को प्राय: सेर करने चले जाया करते थे।,"वहाँ किसे फिक्र है कि इसने खोया या नहीं, कहाँ कपड़े उतारे, कहाँ सो रहा है।" "सिपाही की बगल में उसकी तलवार पड़ी थी, पर प्रेम की हिसा से चैर है ।",कुँवर ने सिपाही की नाक की आवाज सुनी ।,सिपाही की बगल में उसकी तलवार पड़ी थी; पर प्रेम का हिंसा से बैर है । सारी घटना समझ में आा गयी ।,इधर अकेले तीन जवानों से भिड़ने में प्राणों का भय ।,सारी घटना समझ में आ गयी । "दो साछ शुजर गये थे, और पद्मा को गर्भ था ।",उसने कील की पतली नोक चुभा दी थी और बड़ी कुशलता से उत्तरोत्तर उसे अन्दर ठोंकता जाता था ।,दो साल गुजर गये थे और पद्मा को गर्भ था । कोकिला ने मुस्क पे हुए पूछा--तो फिर विवाह के नाम से क्यो चिढती है ?,"आप जिस वायुमंडल में पलीं, उसका असर तो पड़ना ही था; किन्तु पाप के दलदल में फॅसकर फिर निकल आना अवश्य गौरव की बात है ।","' कोकिला ने मुस्कराते हुए पूछा, 'तो फिर विवाह के नाम से क्यों चिढ़ती है ?" मैं वक़्त पर रुपये जमा न कर सका ।,"हिमाकत कहिए या बदनसीबी, चुंगी के चार सौ रूपये मुझसे ख़र्च हो गए ।",मैं वक्त पर रूपये जमा न कर सका । यह विचार बहुत पहले उसके मन में आया था,यह मुझसे बातें करने चली हैं,यह विचार बहुत पहले उसके मन में आया था मुक़दमा पेश होनेवाला है,दोनों अमरकान्त के साथ चलीं तो रास्ते में पठानिन ने धीरे से कहा-मैंने उस दिन तुमसे एक बात कही थी बेटा शायद तुम भूल गए,मुकदमा पेश होने वाला है "यहाँ तक कि अँगरेफ्ी लिखने-ऐोलने मे भो उन्हे सकोच होता था, जिपतद्धा परिणाम यह थां छि उतकी अँपरेजो बहुत कमजोर थो, और वह उप्तमें सी वा- या पत्र भी मुश्किल से लिख सकते थे ।",कभी क्रिकेट या हाकी के पास न फटकते थे ।,"यहाँ तक कि अँग्रेजी लिखने-बोलने में भी उन्हें संकोच होता था, जिसका परिणाम यह था कि उनकी अँग्रेजी कमजोर थी और वह उसमें सीधा-सा पत्र भी मुश्किल से लिख सकते थे ।" मगर जो वहाँ जाता है फिर नहीं लौटता ।,मिरिच के देश जा रही हूँ कि वहीं मेहनत-मजदूरी करके जीवन के दिन काटूं ।,"मगर जो वहां जाता है , वह फिर नहीं लौटता ।" सुखदा ने बालक को नेना की गोद से लेच्र ससुर को चारपाई पर सुला दिया और पहा मलने छगी,जो विशाल भवन एक-एक ईंट जोड़कर खड़ा किया था जिसके लिए क्वार की धूप और माघ की वर्षा सब झेली वह ढह गया और उसके ईंट-पत्थर सामने बिखरे पड़े हैं,सुखदा ने बालक को नैना की गोद से लेकर ससुर की चारपाई पर सुला दिया और पंखा झलने लगी मैंते भी त्रियाचरित्र पढ़ा है ।,अन्धा नहीं हूँ ।,में भी त्रियाचरित्र पढ़ा है । कुछ रुए हो कर बोलौ--मुशे अम्माँ मत कहो ।,अभी वह प्रेम और विलास का सुख-स्वप्न देख रही थी-यौवनकाल की मदमय वायुतरंगों में आंदोलित हो रही थी ।,कुछ रुष्ट होकर बोली-मुझे अम्माँ मत कहो । "एक क्षण के बाद उन्होंने फिर पूछा--यह कैसे हुआ, कुछ बात समऋ भें नहीं झाती ?",उमानाथ ने विस्मित होकर गजानंद की ओर देखा और तब लज्जा से उसका सिर झुक गया ।,"एक क्षण के बाद उन्होंने फिर पूछा -- यह कैसे हुआ, कुछ बात समझ में नहीं आती ?" "अगर तुम्हारी जगह मेरा भाई या बेटा होता, तो मैं उसके साथ भी यही सलूक करता, बल्कि शायद इससे सख्त ।",इस अपमान के सामने जीवन के और सारे क्लेश तुच्छ थे ।,"अगर तुम्हारी जगह मेरा भाई या बेटा होता, तो मैं उसके साथ भी यही सलूक करता, बल्कि शायद इससे सख्त ।" "हाँ, प्रात:काल थोड़ी-सी कसरत कर लिया करता था ।","अकेले उसका जी बहुत घबराता, कोई संगी न साथी; न कोई हँसी न दिल्लगी, कैसे जी लगे ।","हाँ, प्रातःकाल थोड़ी-सी कसरत कर लिया करता था ।" "शर्माजी--कुछ भी नहीं, न जाने कहाँ गायब हो गई, गजाधर भी नहीं दिखाई दिया ।",जब वह चलने लगे तो सुभद्रा ने पूछा -- कुछ सुमन का पता चला ?,"शर्माजी -- कुछ भी नहीं, न जाने कहाँ गायब हो गई, गजाधर भी नहीं दिखाई दिया ।" .. एक सद्दीना बीत गया था ।,आज बंटी को हर बार अपनी ज्यादती मालूम हो रही थी ।,एक महीना बीत गया था । महुत एवा की ; पर कोई फायदा नहीं होता ।,इसके पहले इस तरह की बातचीत कभी न हुई थी ।,बहुत दवा की; पर कोई फायदा नहीं होता । "शा रदा--मै सब लगी, मेरा अम्मों न, सब ले लीजिए. |",शारदा- मैं तो सब लूँगी ।,"शारदा- मैं सब लूँगी, मेरी अम्माँ, न, सब ले लीजिए ।" एक-एक अक्षर से दीनता टपक (रही थी।,ऐसी नौकरी मोसे न होई।,एक-एक अक्षर से दीनता टपक रही थी। राजकुमारियाँ उस समय उस्ले रोते देख कर वही महाजुभूति के साथ उसके पास बैठ गयी ।,शायद किसी समय वहाँ देवताओं का वास था पर इस समय वह बिलकुल उजाड़ था ।,राजकुमारियाँ उस समय उसे रोती देख कर बड़ी सहानुभूति के साथ उसके पास बैठ गयीं । "जोवन के पाँच-छ बर्षों मे उसने जितने रत्न मचित किये थे, जिन पर वह गये करता था, जिन्हें पाकर वह अपने को धन्य मानता थ, अब परीक्षा को कसौटो पर आकर नक़ली पत्थर सिद्ध हो रहे ये ।",मैं अंग्रेज हूँहिन्दुस्तानी नहीं हो सकती; एसलिये हममें में से किसी को अधिकार नहीं है कि वह दूसरों को अपनी मर्जीका गुलाम बनाने की चेष्टा करे ।,"जीवन के पांच छः वर्षों मॆं उसने जितने रत्न संचित किये थे, जिन पर वह गर्व करता था; जिन्हे पाकर वह अपने को धन्य समझता था, अब परीक्षा की कसौटी पर जाकर नकली सिद्व हो रहे थे ।" "यह नियम है कि जब हमारा कोई भ्रंग विकृत हो जाता है, तो उसे काट डालते हैं, जिसमें उसका विष समस्त दरीर को नष्ट न कर डाले ।",जिस स्त्री को लोकनिंदा की लाज नहीं उसे कोई शक्ति नहीं सुधार सकती ।,"यह नियम है कि जब हमारा कोई अंग विकृत हो जाता है तो उसे काट डालते हैं, जिससे उस का विष समस्त शरीर को नष्ट न कर डाले ।" प्र मबती एक दिन सुवामा से मिलने गयो हुई थी,तब डिप्टी साहब ने स्वयं पढ़ाना निश्चित किया,प्रेमबती एक दिन सुवामा से मिलने गयी हुई थी "झोंपड़े को गिराना इतना सरल न प्रतीत हुआ, जितना उन्होंने समझा था ।","राजा ने इन आदमियों के तेवर देखे, तो होश उड़ गए ।","झोंपड़े को गिराना इतना सरल न प्रतीत हुआ, जितना उन्होंने समझा था ।" आपके हुक्म को केसे इनकार कर सकती हूँ ।,अब तक उसे कभी-कभी घर की याद आ जाती थी ।,आपके हुक्म को कैसे इनकार कर सकती हूँ । उनमें पुलिस के अफ़सर बैठे हुए थे ।,"जालपा कुछ पढ़ते-पढ़ते या लेटे-लेटे थक जाती, तो एक क्षण के लिए खिड़की के सामने आ खड़ी होती थी ।",उनमें पुलिस के अफसर बैठे हुए थे । मैं यह हरगिज़ नहीं चाहता कि मेरे घर में हराम की एक कौड़ी भी आये ।,"मैंने तुम्हारे विषय में कुछ ऐसी बातें सुनी हैं, जिनसे मुझे बहुत खेद हुआ है और तुम्हें समझा देना मैं अपनाधर्म समझता हूँ ।",मैं यह हरगिज नहीं चाहता कि मेरे घर में हराम की एक कौड़ी भी आए । रामप्यारी कभो-कभो द्वार को दराजों से भीतर म्लाँकतों थो; पर अँपेरे में कुछ न दिखाई देता था ।,इस वक्त वह निश्चित होकर भण्डारे को खोल सकती है ।,"रामप्यारी कभी-कभी द्वार की दरारों से भीतर झाँकती थी, पर अंधेरे में कुछ न दिखाई देता ।" पति ने ढरते-टरते कहद्दा-- यहाँ दस-पाँच दिन रहने में दरज ही क्‍या है मुझे तो तुम्दारे स्वास्थ्य में भभी कोई तबदीली नहीं दिखती,वह उन्हें बात-बात पर झिड़कती,पति ने डरते-डरते कहा-यहाँ दस-पाँच दिन रहने में हरज ही क्या है- मुझे तो तुम्हारे स्वास्थ्य में अभी कोई तबदीली नहीं दिखती मुझे पीछे ज्ञात हुआ कि गोपा ने मुझे भो य्र समझा और वास्तविक स्थिति छिपाती रहद्दी ।,"जो कुछ खर्च था, वह सुन्नी की जात से था ।",मुझे पीछे ज्ञात हुआ कि गोपा ने मुझे भी गैर समझा और वास्तविक स्थिति छिपाती रही । ( कठेजे पर द्वाथ रखकर ) यहाँ बढ़ा दर्द दो रदा दे |,लग्न आ चुकी थी ।,(कलेजे पर हाथ रखकर) यहाँ बड़ा दर्द हो रहा है । कृष्ण--इसीलिए कि तुम इज्जतवाले हो और मेरा कोई ठिकाना नहीं ।,"आपका तो कुछ न बिगड़ेगा, मैं पिस जाऊँगा ।",कृष्ण -- इसीलिए कि तुम इज्जत वाले हो और मेरा कोई ठिकाना नहीं । केवल गिटकिरी न भर सकी ।,सुमन ने भी इस पद को धीरे-धीरे गुनगुनाकर गाया और अपनी सफलता पर मुग्ध हो गई ।,केवल गिटकिरी न भर सकी । सलीस इस जवाब के लिए तंयार न था,तब भी मैं अपनी इच्छा से मुसलमान न हूँगा बल्कि इसलिए कि सकीना की मरजी है,सलीम इस जवाब के लिए तैयार न था वह खुद शायद इतनी मुफ़्त्सल रिपोर्ट न लिख सकते लेकिन क्या तुम सम्रकते हो सरकार को यह बाते मालस नहीं १ सलीम ने ऋद्द---मेरा ते ऐसा ही खयाल है,अमर ने उसे गोद में संभालकर पानी पिलाना चाहा मगर घूँट कंठ के नीचे न उतरा,वह खुद शायद इतनी मुफस्सिल रिपोर्ट न लिख सकते लेकिन तुम क्या समझते हो सरकार को यह बातें मालूम नहीं- सलीम ने कहा-मेरा तो ऐसा ही खयाल है इसे बाहर निकाल दो जी ।,दोनों ही मुझे उल्लू बनाकर जटना चाहती थीं ।,इसे बाहर निकाल दो जी । दक्षिय को दीवार पर राष्ट्रभाषा हिंदो के कवियों का सम्मेत था ।,मैं उनके समाचार पूछ ही रही थी कि उसी गुफा के एक कोने से किसी के कराहने का शब्द सुनायी दिया ।,दक्षिण की दीवार पर राष्ट्रभाषा हिंदी के कवियों का सम्मेलन था । "संसार में करोड़ों मनुष्य एक ही समय खाते हैं, किन्तु बीमार या दुवले नहीं होते ।","भोजन एक ही समय बने, दोनों समय बनने की क्या जरूरत है ?","संसार में करोड़ो मनुष्य एक ही समय खाते है, किन्तु बीमार या दुबले नहीं होते ।" पण्डितनी अछ्ड़े जाते थे ।,"हाँ, इतना देखा कि जब तक खड़ी रही, आपकी ही तरफ उसकी टकटकी लगी हुई थी ।",पण्डितजी अकड़े जाते थे । "हाँ, कुछ उधर का समाचार भी मिला ?",सच पूछिए तो हमारे पापों का दंड उसे भोगना पड़ा ।,"हाँ, कुछ उधर का समाचार भी मिला ?" कभी सामने आा जाता कभी छिप जाता,जगह-जगह कंपनी खुल गई हैं,कभी सामने आ जाता कभी छिप जाता महफिल में सन्नाटा छा गया ।,उसके नेत्र दीपक के समान जल रहे थे ओर मुखमंडल में प्रतिभा की ज्योति स्फुटित हो रही थी ।,महफिल में सन्नाटा छा गया । मेंने चेहरे पर 'शिक्रव न पढ़ने दिया ।,"हाँ, लड़कपन में कई बार लद्दू घोड़ों पर सवार हुआ हूँ ।",मैंने चेहरे पर शिकन न पड़ने दिया । मैं आपसे मिलकर बहुत प्रसन्न हुई ।,परिचय हो जाने पर मिस कांति ने दोनो आदमियों से हाथ मिलाया और हँसती हुई बोली -- बाबा अभी आप लोगों का जिक्र कर रहे थे ।,मैं आप से मिल कर बहुत प्रसन्न हुई । व्यर्थ में एक बेड़ी पदों में पड़ी हुई थी ।,इनके यहाँ मुझे कौन-सा सुख था ?,व्यर्थ में एक बेड़ी पेरों में पड़ी हुई थी । ठलुओं की खुशामद करने से क्‍या फायदा ?,"ज़रा बैठ जाओ, ज़रूरी चीज़ों की सूची बना ली जाए ।",ठलुओं की ख़ुशामद करने से क्या फायदा ? "हाँ, ज़ोहरा का वह सादा, आभरणहीन स्वरूप देखकर उसे कुछ आश्चर्य अवश्य हुआ ।","पढ़े-लिखे आदमी भी ऐसे दगाबाज होते हैं, दादा! सरासर झूठी गवाही दी ।","हाँ, ज़ोहरा का वह सादा, आभरणहीन स्वरूप देखकर उसे कुछ आश्चर्य अवश्य हुआ ।" यह सारा आउम्बर उसे काटे खाने लगा ।,(५) तीन दिन तक मनहर घर से न निकला ।,यह सारा आडम्बर उसे काट खाने लगा । "आदमी चाहे और कुछ न करे, मन में दया बनाये रवखे ।",चर्बी-मिला घी बेचकर इसने लाखों कमा लिए ।,"आदमी चाहे और कुछ न करे, मन में दया बनाए रखे ।" जब छत्रसाल ने आकर रानी को प्रणाम किया तो उसके कमलनेत्र मलतैत्र सजल हो गये और दूृदय से दीर्घ नि.ध्वाय निवल गया ।,यह उसके चारों पुत्रों में बुद्धिमान और साहसी था ।,जब छत्रसाल ने आ कर रानी को प्रणाम किया तो उनके कमल-नेत्र सजल हो गये और हृदय से दीर्घ निःश्वास निकल गया । "घण्टे की सुरीली ध्वनि कह रही थी, सुमन की यह दुर्गंति तुमने को ।",उसमें घंटा बज रहा था ।,"घंटे की सुरीली ध्वनि कह रही थी,सुमन की यह दुर्गति तुम ने की ।" माता से इतनी श्रद्धा कभी उसके दिल में पेदा नही हुई थी ।,' यह कहते हुए पतिदेव मुस्कराये और मुझे गले से लिपटा लेने को बढ़े ।,माता से इतनी श्रृद्धा कभी उसके दिल में पैदा नहीं हुई थी । कह दिया कि वावू साहव ने मकान तबवंदील कर दिया है |,वह काज़ी साहब से सबक लेकर आया और सोने जा रहा था कि सहसा उसे दरवाजे पर एक तांगे के रुकने की आवाज़ सुनाई दी ।,कह दिया कि बाबू साहब ने मकान तब्दील कर दिया है । आपको तो यहाँ आने मे बढ़ा कष्ट हुआ होगा ।,"कृष्णचन्द्र ने एक क्षण में उठकर कहा, ‘हम तो आज आपकी प्रतीक्षा कर रहे थे ।",आपको तो यहाँ आने में बड़ा कष्ट हुआ होगा । "कछ का सारा दिन पड़ा है, लगा लेता ।","जब घर में पैसे होते हैं, तभी ठाकुरजी की भी पूजा होती है ।","कल का सारा दिन पड़ा है, लगा लेना ।" "यह समझ लो / दोनो वहाँ से निकले और आर महेशनाथ के द्वार पर अंपेरे में दबऋकर खड़े हो गये , मगर टठामी को सत्र कहाँ ।","एक बार ' मंगल-मंगल ' होगा और बस , थाली परनाले में उँड़ेल दी जायेगी ।",' दोनों वहाँ से निकले और आकर महेशनाथ के द्वार पर अँधेरे में दबककर खड़े हो गये ; मगर टामी को सब्र कहाँ ? दोनों एक दूसरे को दोषी ठहराते रहे ।,"उसने कुछ ऐसी व्यापारिक सिद्धान्त की बातें कीं,दयानाथ को कुछ ऐसा शिकंजे में कसा कि बेचारे को हाँ-हाँ करने के सिवा और कुछ न सूझा ।",दोनों एकदूसरे को दोषी ठहराते रहे । नये-ये कपड़े मिले ।,मेरी नयी अम्माँ आयेंगी ।,नये-नये कपड़े मिले । देवी--क्या जबाव देती ?,"थानेदार , अजी जी, इसने तो मेरा नातका बन्द कर दिया ।",देवी क्या जवाब देती ? अपर ने वितृप्णा के भाव से छहा -व्याल करने को मेरी इच्छा नहीं है,बोली-पहले चलकर पकौड़ियाँ खा लो फिर इस विषय पर सलाह होगी,अमर ने वित़ष्णा के भाव से कहा-ब्यालू करने की मेरी इच्छा नहीं है "कल वह श्रवश्य साबुन की कई बह्टियाँ लायेगी, और रोज़ लगायेगी |","पहले एक-दो महीने तक तो रामेन्द्र ने इधर ध्यान नहीं दिया; लेकिन जब कई महीने गुजर गये और स्त्रियों ने बहिष्कार का त्याग न किया तो उन्होंने एक दिन सुलोचना से कहा, 'यह लोग आजकल अकेले ही आते हैं !' सुलोचना ने धीरे से कहा, 'हाँ, देखती तो हूँ ।",कल वह अवश्य साबुन की कई बट्टियाँ लायेगी और रोज लगायेगी । विता पुत्र की टालमटोल पर नाराज़ दो घुड़के-मिड़के मुँह फुलाये यह तो उसकी समम्क्त में आता था लेकिन पिता पुत्र से घर का किराया और रोटियों का खच माँगे यह तो माय-लिप्धा को--निर्मेम माया-लिप्सा कौ-पराक्राप्ठा थी,लालाजी को जिस खिलौने की अभिलाषा थी उन्हें वह खिलौना देकर अमर निश्चिंत हो गया था पर आज उसे मालूम हुआ वह खिलौना माया की जंजीरों को तोड़ न सका,पिता पुत्र की टालमटोल पर नाराज हो घुड़के-झिड़के मुँह फुलाए यह तो उसकी समझ में आता था लेकिन पिता पुत्र से घर का किराया और रोटियों का खर्च माँगे यह तो माया-लिप्सा की-निर्मम माया-लिप्सा की-पराकाष्ठा थी बह राष्ट्र से कम-से-कम लेकर अधिक-से-अधिक देते थे,इन्हें इसकी परवाह नहीं कि भारत की जनता दो आने पैसों पर गुजर करती है,वह राष्ट से कम-से-कम लेकर अधिक-से-अधिक देते थे "हमको ऐसा डर लगता ह, कि उसने जज से सब हाल कह दिया है ।",उसे किसी दूसरी जगह ठहराया जायगा ।,"हमको ऐसा डर लगता है, कि उसने जज से सब हाल कह दिया है ।" बच्चा मुझे देखकर मेरी गोद के लिए हाथ फेलायेगा पर में उसके हाथों को नीचा कर दूँगी और भाँखों में आंसू भरे सुँद फेरकर चलो जाऊँगी,उसके बाद भाइयों-बहनों की सज्जनता ने मुझे मोह के बंधन में जकड़ दिया और अब तक मैं अपने को इस धाोखे में डाले हुए हूँ कि शायद मेरे मुख से कालिख छूट गई और अब मुझे भी और बहनों की तरह विश्वास और सम्मान मिलेगा लेकिन मन की मिठाई से किसी का पेट भरा है- आज अगर सरकार मुझे छोड़ भी दे मेरे भाई-बहनें मेरे गले में फूलों की माला भी डाल दें मुझ पर अशर्फियों की बरखा भी की जाए तो क्या यहां से मैं अपने घर जाऊँगी- मैं विवाहिता हूँ,बच्चा मुझे देखकर मेरी गोद के लिए हाथ फैलाएगा पर मैं उसके हाथों को नीचा कर दूँगी और आँखों में आँसू भरे मुँह फेरकर चली जाऊँगी बढ़ी सीधी है बेचारी ।,उसको ऐसा मरहम मिला गया है जिससे वह टूटी टाँग को आनन-फानन जोड़ सकता है ।,बड़ी सीधी है बेचारी । देवी के पद पर पहुँच गई थी,अमरकान्त का बयान भी हुआ,देवी के पद पर पहुंच गई थी एक दिन उसने कह्ा--तुम कितने नालायक आदसो हो जुगल ।,"फिर बोले, आप बड़े हँसोड़ हो , खाँ साहब ?","एक दिन उसने कहा , ‘ तुम कितने नालायक आदमी हो जुगल ।" "सारा मकान कुसियों, मेजों भौर आल्मारियों से भरा हुआ था ।",घर में सामान जमा करने की उन्हें धुन थी ।,"सारा मकान कुर्सियों, मेजों, अलमारियों से भरा हुआ था ।" में जाकर और जढ़ दूँगा ।,"मन में कहते होंगे, इतनी बड़ी लड़की अकेली मारी-मारी फिरती है ।",मैं जाकर और जड़ दूँगा । वह तो एक शत्रु से महयुद्ध करने का आदी था ।,हाकिमों का आदर-सत्कार कभी निष्फल नहीं जाता ।,वह तो एक शत्रु से मल्लयुद्ध करने का आदी था । ” कोई चीज़ तुम्दारी नज़र कर तो नाराज तो न होगी,अमर द्वार पर पहुँचा तो सकीना ने द्वार बंद करते हुए कहा-कल जरूर आना,कोई चीज तुम्हारी नजर करूँ तो नाराज तो न होगी जादोराय चुपचाप था ।,दोनों की आँखें आँसुओं से भरी थीं ।,जादोराय चुपचाप था । सेठ बलभद्रदाप ने उन पर ३००० रु० की नालिश की है ?,ईश्वर चाहेंगे तो उनका वोट आप को मिल जाएगा ।,सेठ बलभद्रदास ने उन पर ३००० रु० की नालिश की है । बड़े दुःख की वात है ?,होशियार रहना ।,बड़े दु:ख की बात है । वेचारे बावूजी दबे जाते थे कि कहीं वह चुड़ेल बात खोलकर न कहे दे दाथ जोढ़ते थे प्रिन्नते करते थे पर वह किसी तरद रास नहोती थी,वह डायन मुझ पर आरोप कर रही थी,बेचारे बाबूजी दबे जाते थे कि कहीं वह चुड़ैल बात खोलकर न कह दे हाथ जोड़ते थे मिन्नतें करते थे पर वह किसी तरह रास न होती थी अमर को उच्च काली-कछूटो काया में स्वरण-जंसा हृदय चम्रकता दीख पढ़ा,जरा देर बाद वह फिर बोला-भैया तुमसे चक्की चलवाना तो ऐसे ही है जैसे कोई तलवार से चिड़िए को हलाल करे,अमर को इस काली-कलूटी काया में स्वर्ण-जैसा हृदय चमकता दीख पड़ा पुलिस का म॒कदमा सच्चा हैं ।,मुझसे तो भैया ने कहा कि इस मुआमले में बिलकुल झूठ न बोलना पड़ेगा ।,पुलिस का मुकदमा सच्चा है । जॉन सेवक से किसी बात पर अनबन हो गई क्या ?,अरदली चला गया ।,जॉन सेवक से किसी बात पर अनबन हो गई क्या ? 58 'पेशा लिखाना कौच पसन्द करता है ।,अब समय आ गया है कि इस विषय में सरकार कदम बढ़ावे ।,यह पेशा लिखाना कौन पसन्द करता है । उत्तका क्या विगढ़ता है ।,"मैने रद्दा जमाया -- देवीजी, आप अन्याय कर रही हैं ।",उसका क्या बिगड़ता है । "कालिन्दो से वह स्नेह तोड़ना चाद्वतो है , पर उसकी म्लान मृति देखकर उसके छृदय के टुकड़े हो जाते हैं ।",इसी चिन्ता में वह गोते खाया करती है; किन्तु गोविंदी भी उससे कम चिंतित नहीं है ।,कालिंदी से वह स्नेह तोड़ना चाहती है; पर उसकी म्लान मूर्ति देख कर उसके हृदय के टुकड़े हो जाते हैं । "कहीं से कोई बालाईं रकम मिल जाय, तो कुछ हिम्मत बढे ।",ऐसा कभी हुआ ही नहीं कि झक्कड़ बाबा की मार खाकर कोई नामुराद रह गया हो ।,"कहीं से कोई बलाई रकम मिल जाय , तो कुछ हिम्मत बढ़े ।" मदर्नासह निरुत्तर-से हो गए थे |,देहात के उजड्ड जमींदारों के सामने आप कंबल बाँटने लगेंगे तो वह आप का मुँह देखेंगे और हँसेंगे ।,मदनसिंह निरुत्तर से हो गए थे । लेकिन घुके यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि हमारे मुस॒लिम भाइयों ने हमारी गरदन बुरी तरह पकड़ी है।,चिम्मनलाल -- मुझे पालिटिक्स से कोई वास्ता नहीं है ओर न में इसके निकट जाता हूँ,लेकिन मुझे यह कहने में तनिक भी संकोच नहीं है कि हमारे मुस्लिम भाइयों ने हमारी गरदन बुरी तरह पकड़ी है । ज्योतिषियों के समान वे भी अनुमान ओर अटकल के अनन्त-सागर में डुबकियाँ लगाने लगते हैं ।,रज्जू ने उसकी ओर करुण-भाव से देखा और अपना काम करने लगा ।,ज्योतिषियों के समान वे भी अनुमान और अटकल के अनंत सागर में डुबकियाँ लगाने लगते हैं । एक वरतन तक न बचा ।,"हामिद ने पूछा— यह लोग चोरी करवाते हैं, तो कोई इन्हें पकड़ता नहीं ?",एक बरतन तक न बचा । "आपके पुँह पर तो आपको प्रशात्ता करना ,खुशामद होगी ; पर जो सजनता मैंने आप में देखो, वद फह्दीं नहों पाई ।","क्या जानता था, अपना तमाचा अपने ही मुँह पर पड़ेगा ।","' 'आपके मुँह पर तो आपकी प्रशंसा करना खुशामद होगी, पर जो सज्जनता मैंने आप में देखी, वह कहीं नहीं पायी ।" "ऐसे कितने धन्धे हैं, जो तुम अपने घर में बेठी हुई कर सकती हो ।",तुम्हारे जीवननिर्वाह का केवल यही एक उपाय नहीं है ।,ऐसे कितने धंधे हैं जो अपने घर में बेठी हुई कर सकती हो । सुप्रन ने झ्राज तक किसी से ऐसी बातें न सुनी थीं।,"सोचो तो, थोड़े दिनों तक इंद्रियों को सुख देने के लिए तुम अपनी आत्मा और समाज पर कितना बड़ा अन्याय कर रही हो ?",सुमन ने आज तक किसी से ऐसी बातें न सुनी थीं । ग्रिंत्रिपल का सिद्धांत यह भा कि विद्यायियों को राजनीति से अलग रद्न चाहिए ।,फल यह हुआ कि उसकी सनद छीन ली गयी ।,प्रिंसिपल का सिद्धांत यह था कि विद्यार्थियों को राजनीति से अलग रहना चाहिए । "आप मेरी दिलजोई करें, फिर देखिए, में अपनी त्रूटियो को कितनी जल्द पूरा कर छेतो हूं. ।",और भी कितनी ही त्रुटियाँ मुझमें होंगी ।,"आप मेरी दिलजोई करें, फिर देखिए, मैं अपनी त्रुटियों को कितनी जल्द पूरा कर लेती हूँ ।" मित्रों ने सान्त्वना देते हुए कह्द--नौकरों का सब जगह यही हाल है ।,यह कह कर वे नैराश्य-वेदना से कुरसी पर बैठ गये ।,मित्रों ने सांत्वना देते हुए कहा नौकरों का सब जगह यही हाल है । तुम्दारे डर से बिल खोदने जा रही हूँ ।,"लीला पर आक्षेप भी असह्य है , इसलिए कि वह कुलवधू है ।",तुम्हारे डर से बिल खोदने जा रही हूँ । प्रेम्ा ने रुखाईं से जवाब दिया--होगा ; मगर में तो इस परोक्षा का कोई महत्त्व नहीं समक्तो ।,"उसने बिना तस्वीर की ओर देखे ही कहा — नहीं , मैंने तो उसका नाम नहीं सुना ।","प्रेमा ने रुखाई से जवाब दिया — होगा , मगर मैं तो उस परीक्षा का कोई महत्त्व नहीं समझती ।" इस संमय नाच करानेवाले और देखने- वाले दोनों हो उसकी दृष्टि में संसार के सबसे पतित प्राणी थे ।,उसका वश चलता तो इस समय वह दालमंडी की ईट से ईट बजा देता ।,"इस समय नाच कराने वाले, देखने वाले दोनों ही उसकी दृष्टि में संसार के सब से पतित प्राणी थे ।" यशवत की ऋारगुजारी का अफपरे! पर सिक्का जप्तता जाता था ।,"काँग्रेसवालों ने कहीं लूट मचवा दी, तो कौन हमारी मदद करेगा ?",यशवंत की कारगुजारी का अफसरों पर सिक्का जमता जाता था । "मेहतरानियों पर वाबू साहवों की बहुत निगाह रहती है, सरकार ! देवी--(हँसकर) चल भूठे ! बाबू साहवों की ओरतें क्‍या मेहतरानियों सेः भी गयी-गुजरी होती है ! मुन्न-अव सरकार कुछ न कइलायें, 'हुजुर को छोड़कर ओर तो कोई ऐसी बनुझआइन नहीं देखता, जिसका कोई वखान करे ।","तीसरे दिन मुन्नू ने देवी से कहा -सरकार, एक जगह सगाई ठीक हो रही है; देखिए कौल से फिर न जाइएगा ।","मेहतरानियों पर बाबू साहबों की बहुत निगाह रहती है, सरकार ! देवी- (हँसकर) चल झूठे ! बाबू साहबों की औरतें क्या मेहतरानियों से भी गयी-गुजरी होती हैं ! मुन्नू- अब सरकार कुछ न कहलायें, हुजूर को छोड़कर और तो कोई ऐसी बबुआइन नहीं देखता, जिसका कोई बखान करे ।" "सदन को ऐसा अ्रनुमान हुआ कि वह मुझे नीच, धोखेवाज और स्वार्थी समझ रही है ।",मानो वह हृदय की दबी हुई आग को उभारना नहीं चाहती ।,"सदन को ऐसा अनुमान हुआ कि वह मुझे नीच, धोखेबाज ओर स्वार्थी समझ रही है ।" मेरी ओर में उस रसिक-समाज से ब्रिलकुल बाहर हूँ मिस्टर खन्ना सच कहता हूँ,तब तो उन्हें आपकी ओर दौड़ना चाहिए था,मेरी ओर मैं उस रसिक-समाज से बिलकुल बाहर हूँ मिस्टर खन्ना सच कहता हूँ ढाढ़स तो हो जाएगी ?,सुभद्रा -- तुम्हारे जैसा दिल कहाँ से लाऊँ ?,ढाढ़स तो हो जाएगी । नौकरों को इनाम दिये गये ; आ्राह्मणों' को दान दिया गया ।,कुँवर साहब ने शुभ मुहूर्त में उसे दीक्षा दी ।,नौकरों को इनाम दिये ; ब्राह्मणों को दान दिया गया । दुर्गन्ध आ रही थो ।,"शायद मेरे पिता को जो वेतन मिलता है, उससे ज्यादा इन खानसामों को इनाम- इकराम में मिल जाता हो ।",दुर्गन्ध आ रही थी । तुमने देखा नहीं सलीम गरीब के बदन पुर चियद तुझे न थे,इस दशा में जमींदार ने लगान की डिगरी करा ली और जो कुछ घर में था नीलाम करा लिया,तुमने देखा नहीं सलीम गरीब के बदन पर चिथड़े तक न थे उसके मिज़ाज में सासारिकता का इतना प्राधान्य हो गया क्लि कौसल भावों के लिए वहाँ कोई स्थान ही न रद्दा |,"मनहर की इच्छा थी कि वागेश्वरी भी साथ चले, पर वागेश्वरी उनके पाँव की बेड़ी नहीं बनना चाहती थी ।",उसके मिजाज ने सांसारिकता का इतना प्रधान्य हो गया कि कोमल भावों के लिये वहाँ कोई स्थान ही न रहा । आज उसने यह कोई नयी वात न की थी ।,यहाँ की खबरें वहाँ नित्य पहुँचती रहती थीं ।,आज उसने यह कोई नयी बात न की थी । हलवाइयों को दृकान शुरू हुईं' ।,"मोहसिन— हाँ, उछल-कूद तो नहीं सकतीं; लेकिन उस दिन मेरी गाय खुल गयी थी और चौधरी के खेत में जा पड़ी थी, अम्माँ इतना तेज दौड़ीं कि मैं उन्हें न पा सका, सच ।",हलवाइयों की दुकानें शुरू हुईं । दोनों ने जेछे बढ़े धर्म-संकट में पढ़कर गहनों छो पिटारी सँभालो और चलते पने ।,"सच कहते हैं, मातृत्व दीर्घ तपस्या है ।",दोनों ने जैसे बड़े धर्मसंकट में पड़कर गहनों की पिटारी सँभाली और चलते बने । तब जीवन का कुछ आनंद मिलेगा ।,"उसके लिए अच्छे कपड़े बनवाने पड़ते, प्रतिमास फीस देनी पड़ती ।",तब जीवन का कुछ आनंद मिलेगा । "पण्डित-- कितना सममाके द्वार गया, तुस व मानी, न मानी |",संदूक भी बन्द पड़े हुए हैं ।,"पण्डित- कितना समझा के हार गया, तुम न मानीं, न मानीं ।" "उसे मालूम था कि पुलिस का साथ देने से सांसारिक भविष्य कितना उज्ज्वल हो जायेगा, वह जीवन की कितनी ही चिन्‍्ताओं से मुक्त हो जायगी ।","उसके सदनुराग, उसके सरल प्रेम, उसकी धर्मपरायणता, उसकी पतिभक्ति, उसके स्वार्थ-त्याग, उसकी सेवा-निष्ठा, किस-किस गुण की प्रशंसा की जाय! आज वह रंगमंच पर न आती, तो पंद्रह परिवारों के चिराग गुल हो जाते ।","उसे मालूम था कि पुलिस का साथ देने से सांसारिक भविष्य कितना उज्ज्वल हो जाएगा, वह जीवन की कितनी ही चिंताओं से मुक्त हो जायगी ।" "ऊपर-नीचे जिघर देलती थी, उजाड-सा माछूम होता भा ।",वे प्रेमोल्लास से उत्तेजित हो कर नाली में कूद पड़े ।,ऊपर-नीचे जिधर देखती थी उजाड़-सा मालूम होता था । "सुमन ने मुस्करा- कर कहा, भाज इतनी देर तक राह दिखाई, क्या यह उसी का भ्रायश्चित्त है ?","सदन ने झेंपते हुए कहा -- कुछ नहीं, आज एक साड़ी नजर आ गई, मुझे अच्छी मालूम हुई, ले ली, यह तुम्हारी भेंट है ।","सुमन ने मुस्करा कर कहा -- आज इतनी देर तक राह दिखाई, क्या यह उसी का प्रायश्चित है ?" "कोई आगे न कोई पीछे ; दोनों लौंडे आवारा हैं, में मरू या जीऊँ, उनसे मतलब नहीं ।","जब सारा यश अफसरों को मिलता और सारा अपयश मातहतों को, तो दारोग़ाजी को क्या गरज़ पड़ी थी कि नई शहादतों की फिक्र में सिर खपाते ।","कोई आगे न कोई पीछे, दोनों लौंडे आवारा हैं, मैं मईं या जीऊँ, उनसे मतलब नहीं ।" बच्चे मन के राजा होते हैं,सुवामा कई मिनट तक इसी चिन्ता में बेठी रही,बच्चे मन के राजा होते हें एे में भी यद सामथ्य न थी छि वह दूसरे को हमखयाल बग लेता लेछिन रय पह दालत न थी,मन की जिस दशा में वह सकीना की ओर लपका था वह दशा अब न रही थी,एक में भी यह सामर्थ्य न थी कि वह दूसरे को हम-खयाल बना लेता लेकिन अब वह हालत न थी "ऐसा विद्वासघात करनेवाले को जो दण्ड दिया जाय, वह थोड़ा है ।",फिर रोते हुये बोली-इस दगाबाजी का मैं इसे मजा चखाऊंगी ।,ऐसा विश्वास घात करने वाले को जओ दण्ड दिया जाय वह थोड़ा है । आश्रम की प्रवन्धकारिणी सभा का एक मेम्वर मैं भी तो हूँ ।,"मैं देखता हूँ कि आप मुझसे सहमत नहीं हैं, लेकिन मेरा जो विचार था वह मैंने स्पष्ट कह दिया ।",आश्रम की प्रबंधकारिणी सभा का मेम्बर मैं भी हूँ ? "वह कितनी मनहूस घड़ी थी, जब उसने रतन से रुपये लिये ! बैठे-बिठाये विपत्ति मोल ली ।","तुम्हारा बढ़ता हुआ ख़र्च देखकर मेरे मन में संदेह हुआ था, मैं इसे छिपाता नहीं हूँ, लेकिन जब तुम कह रहे हो तुम्हारी नीयत साफ है, तो मैं संतुष्ट हूँ ।","वह कितनी मनहूस घड़ी थी, जब उसने रतन से रूपये लिए! बैठे-बिठाए विपत्ति मोल ली ।" शर्मा--सुम्हारी भी क्या समझ है !,"मैंने उसे कमरे में जाते देखा था, शायद दिल्लगी के लिए छिपा रखा हो ।",शर्मा -- तुम्हारी भी क्या समझ है । इस पर दोनों में ताल ठोंकने को नौबत भाई ।,उसने अपने विचार में गुल्ली लपक ली थी ।,इस पर दोनों में ताल ठोकने की नौबत आई है । भाप जो कुछ उपदेश या ताइना देंगे चद्द हमारे ही भले के लिए देंगे,वहाँ की एक-एक वस्तु में अपनापन भरा हुआ था,आप जो कुछ उपदेश या ताड़ना देंगे वह हमारे ही भले के लिए देंगे "मुक्े आप-ही-आप अकारण सदेह होने _ -छगा, कि कहीं विक्रम मुम्के हिस्सा देने से इनकार कर दे, तो में क्या कह ।",असेंबली खुलते ही यह बिल पेश करूँगा ।,"मुझे आप-ही-आप अकारण सन्देह होने लगा कि कहीं वि क्रम मुझे हिस्सा देने से इन्कार कर दे , तो मैं क्या करूँगा ।" "मोटेराम--भच्छा, यह वाणी फेसी है कि न दोगे तो हम चढ बेटेंगे ।","तुम्हारे बिना अब मेरा रंग न जमेगा, ईश्वर तुम्हें सदा सुगंधित वस्तु दिखाये ।","मोटेराम- अच्छा यह वाणी कैसी है कि, 'न दोगे तो हम चढ़ बैठेंगे ।" लेकिन इसका क्या शोक ?,संगमरमर के फर्श पर बहुमूल्य कालीन बिछे हुए थे ।,लेकिन इसका क्या शोक ? ब्रोध को आग पानी वन कर आँखों से निकल पी ।,बुंदेलों की स्त्रियाँ ऐसे अवसर पर रोया नहीं करतीं ।,क्रोध की आग पानी बन कर आँखों से निकल पड़ी । वह सड़क के किनारे एक मील के पत्थर पर बैठ गई ।,"विनयसिंह को देखकर बोली-क्यों विनय, अगर तुम्हारी स्त्री अपनी किसी सहेली को कुछ दिनों के लिए अपने साथ रखना चाहे, तो तुम उसे मना कर दोगे, या खुश होगे ?",वह सड़क के किनारे एक मील के पत्थर पर बैठ गई । "में तो सोचता हूँ, कोई बहुसूल्य वस्तु घर मे न छोड़ ।","कैसी सुव्यवस्था है कि जरा-सी कोई बात हो , वहाँ तक खबर पहुँच जाती है और तुरन्त उसकी रोकथाम का हुक्म हो जाता है ।","मैं तो सोचता हूँ , कोई बहुमूल्य वस्तु घर में न छोङूँ ।" "सोफी को अब अपने एक-एक अंग में, नाड़ियों की एक-एक गति में, आंतरिक शक्ति का अनुभव हो रहा था ।","उसके मुख से एक शब्द भी न निकला, मौन रह गई ।","सोफी को अब अपने एक-एक अंग में, नाड़ियों की एक-एक गति में, आंतरिक शक्ति का अनुभव हो रहा था ।" सलीम ने मोटर से उत्तकर शांतिकुमार को पुकारा,देखिए शायद चल जाए,सलीम ने मोटर से उतरकर शान्तिकुमार को पुकारा "जिन बच्चों को में डॉटता था, उन्हें आज छड़ी आँखों से भो नहीं देख सकता ।",तब वह द्वार पर आकर खड़ी हो गयी ।,"जिन बच्चों को मैं डाँटता था, उन्हें आज कड़ी आँखों से भी नहीं देख सकता ।" जाते ही बुलायेंगे ।,बडे बाबू ने जरूर पूछा होगा ।,जाते ही बुलाएंगे । "फिर देखना, कैसी दौड़-धप करता हे ।","चाय के सेट, शीशे के रंगीन गुलदानऔर फानूस मैं ला दूँगा ।","फिर देखना, कैसी दौड़-धूप करता है ।" इस मिल से इस साल दस लाख का फ़ायदा हुआ है ।,उस शुभ-दिन की कल्पना में वह पागल-से हो रहे थे ।,इस मिल से इस साल दस लाख का फायदा हुआ है । वह तो सजाहीन हो गयी थी |,"अरे ! यह तो बाबू जी की लड़की है, जो ऊपरवाले मकान में रहते हैं ।",वह तो संज्ञाहीन हो गयी थी । २५ सावेजनिक संस्थाएँ भी प्रतिभाशाली मनुष्यों की मोहताज होती हैं ।,गंगाजली के बलिदान ने उनकी आत्मा को बलवान बना दिया ।,२५ सार्वजनिक संस्थाएँ भी प्रतिभाशाली मनुष्य की मुहताज होती है । उसके नाम सास ने एक हज़ार का बीमा भेज दिया था,उसका अंकुर विमाता की निर्ममता ने जमाया था,उसके नाम सास ने एक हजार का बीमा भेज दिया था चलते समय हम दोनों गले मिलकर ओर रोकर विदा हुए ।,"मैं एक ऐसे गहन विषय में, जिस पर दो प्राणियों के समस्त जीवन का सुख-दुःख निर्भर है, भावुकता का आश्रय नहीं ले सकती ।",चलते समय हम दोनों गले मिल कर और रो कर विदा हुए । में इतनो जल्द नहीं मरी णा रहो हूँ,आप मेरे स्वास्थ्य की चिंता छोड़िए,मैं इतनी जल्द नहीं मरी जा रही हूँ जैनब-होश उड़ने की बात ही है ।,"यह तो बहुत अच्छा अवसर हाथ आया, रुपये लेकर धर्म-कार्य में लगा दो ।",जैनब-होश उड़ने की बात ही है । उसने अपनी बन्दृक सेमाली ।,उसकी दुर्गन्धमय साँस देह में लग रही थी ।,उसने अपनी बन्दूक सँभाली । "वह भत्मोल्लास जो उनके चेहरे पर सलकमे लगा था, वह गषेमय लाली जो उनकी आँखों में छा गई थी, भभी तक उसको आँखों में फिर रही है ।",प्रकाश पर वह जान देती है ।,"वह आत्मोल्लास, जो उनके चेहरे पर झलकने लगा था, वह गर्वमय लाली, जो उनकी आँखो में छा गयी थी,अभी तक उसकी आँखों में फिर रही है ।" "विधवाश्रम की इमारत बनाने में हाथ लगाया, लेकिन दो साल से उसकी दीवारें गिरती जाती थीं।","उनकी स्थापित की हुई संस्थाएँ चन्दों से चल रही थीं, लेकिन चन्दों के वसूल होने में सदैव कठिनाइयों का सामना होता था ।","विधवाश्रम की इमारत बनाने में हाथ लगाया, लेकिन दो साल से उसकी दीवारें गिरती जाती थीं ।" ” में परीक्षा करता चाहता हूँ कि वह बिना मनाये मानती है या नहीं ।,' ' तो शायद उसकी बुद्धि जाग रही है ।,' ' मैं परीक्षा करना चाहता हूँ कि वह बिना मनाये मानती है या नहीं । शायद डिप्टी साहब आते हों ।,"रमा ऊपर गया, तो उसके मुँह पर लज्जा और ग्लानि की फटकार बरस रही थी ।",शायद डिप्टी साहिब आते हों । "इस भीड़ को तुरंत हट जाना चाहिए, नहीं तो रुपये मिलने में देर होगी ।",क्यों ?,"इस भीड़ को तुरंत हट जाना चाहिए, नहीं तो रुपये मिलने में देर होगी ।" क्या वह आपके हिस्सेदार नहीं हैं ?,"आप अगर जरा तवज्जह करें, तो बड़ी आसानी से काम निकल जाए ।",क्या वह आपके हिस्सेदार नहीं हैं ? उन्हें ले जाकर उसी हत्यारे रामदास के सिर पटक दो ।,"फिर वह झटपट उठी, मानो नींद से चौंकी है ओर कृष्णचन्द्र का हाथ पकड़कर बोली -- इन रुपयों में आग लगा दो ।",उन्हें ले जाकर उसी हत्यारे रामदास के सिर पटक दो । मेने तो इन्हें कभी कुछ नहीं कहा,परन्तु प्रताप दोनों को देखते ही निकल भागता,मेने तो इन्हें कभी कुछ नहीं कहा "बोले--क्या है रामू, उस शरोबित से क्‍यों छक्ष्ते हो ?",आटा गूँथती थी और रोती थी ।,"बोले- क्या है रामू, उस गरीबिन से क्यों लड़ते हो ?" फिर उसकी कीति-लालसा को इसके सिवा और क्या उपाय था कि अपने कष्टों की राई को पर्वत बनाकर दिखाये ।,"मैं ज़रा भी बुरा नहीं मानती! दया की चीज़ न जबरदस्ती ली जा सकती है, न जबरदस्ती दी जा सकती है ।",फिर उसकी कीर्ति-लालसा को इसके सिवा और क्या उपाय था कि अपने कष्टों की राई को पर्वत बनाकर दिखाए । पति--सिनेसा का तो उन्होंने नाम भी नहीं लिया ।,"जब मैं मोटर पर बैठा, तो मैंने देखा, वह गिर पड़ा और बहुत-से आदमी उसे घेरकर खड़े हो गये ।",पति – सिनेमा का तो उन्होंने नाम भी नहीं लिया । "यह भी सम्पादक दी हैं, कोई घास नहों छोलते और सम्पादक भी एक जगत्‌:विख्यात पत्र के ।",और स्त्रियों से द्वेष करो ।,"यह भी सम्पादक ही हैं, कोई घास नहीं छीलते और सम्पादक भी एक जगत्-विख्यात पत्र के ।" श्रभी तक केवल १० रन का प्रबन्ध हो सका है।,"मैं दूसरों को दोष देता हूँ, पर वास्तव में दोष मेरा ही है ।",अभी तक केवल १० रु० का प्रबन्ध हो सका है । जुझारसिह अपनी जगह से जरा भी न हिले ।,उसका बालस्वप्न भी भंग हो गया ।,जुझार सिंह अपनी जगह से ज़रा भी न हिले । दोने को मनोद्त्तियां में कोई मेल न था,तुम किसी जिले के अफसर बना दिए जाओ तो एक दिन न रह सको,दोनों की मनोवृत्तियों में कोई मेल न था मुन्नी गोबर निकाल रही थी,कुछ विश्राम करने का जी चाहता था,मुन्नी गोबर निकाल रही थी "“अरे, तो में मना थोड़े हो करती हूँ, मुझे वया गरज़ पढ़ी है कि मुफ्त में अपने ऊपर पाप लू, कुछ मेरे सिर तो जायेगी नहीं ।","जब और कोई बस न चला, फौज, पुलिस, कानून सभी युक्तियों से हार गये, तो यह नयी माया रची है ।","अरे तो मैं मना थोड़े ही करती हूँ, मुझे क्या गरज पड़ी है कि मुफ्त में अपने ऊपर पाप लूँ, कुछ मेरे सिर तो जायगी नहीं ।" वह हिन्दू-मात्र को चीक़ है,तुम्हारे ही ऊपर समाज खड़ा है पर तुम अछूत हो,वह हिन्दू-मात्र की चीज है छह देना मानो बीमार है ।,वसुधा का इन चीजों से अवश्य मनोरंजन होगा ।,"कह देना, मानी बीमार है ।" "नथुवा के माँ बाप दोनों मर चुके थे, अवार्थों कौ माँति वह शय सोलानाथ के द्वार पर पड़ा रहता था ।",बूढ़े शेख हसन और उसके बेटे जमाल के लिए खुदा से दुआ किया करना ।,"नथुवा के माँ-बाप दोनों मर चुके थे, अनाथों की भाँति वह राय भोलानाथ के द्वार पर पड़ा रहता था ।" और इसी वक्त इस हुक्म को तामील द्ोनी चाहिए ।,उनके छात्र भी इधर-उधर हो गये ।,और इसी वक्त इस हुक्म की तामील होनी चाहिए । बेलों को देखते ही दौढ़ा और उन्हे वारी- बारी से गले लगाने लगा ।,दोनों दौड़कर अपने थान पर आए और खड़े हो गए ।,बैलों को देखते ही दौड़ा और उन्हें बारी-बारी से गले लगाने लगा । यह ऋषछ जानता नदीं पर नंना के लिए अपनी थात्मा की इत्या करने में भौ मुझे संडोच नही है,समय मिला तो उधर से ही नैना से मिलती आऊँगी,यह कला जानता नहीं पर नैना के लिए अपनी आत्मा की हत्या करने में भी मुझे संकोच नहीं है मरजाद जान से प्यारी नहीं होती |,"भोंदू के क्रोध का उसे दो-एक बार अनुभव हो चुका था, लेकिन उसने दिल को मजबूत किया ।",मरजाद जान से प्यारी नहीं होती । आशा छी सारी देह अकम्पित हो गई ।,"मैं डरता हूँ , आप कहीं नाराज न हो जायें ?",आशा की सारी देह प्रकम्पित हो गयी । "पहला-सहादत ही न मिलेगी, तो जुर्म क्या साबित होगा ?","जो चाहे, उसे हरजाई समझ ले ?","पहला-सहादत ही न मिलेगी, तो जुर्म क्या साबित होगा ?" चपरासी मिला था ?,वह उधर न जाकर रमेश बाबू के कमरे की ओर गया ।,चपरासी मिला था ? "वोले--नहीं, मैं यह नहीं मानता ।",बैजनाथ भी सशस्त्र थे ।,बोले -- नहीं मैं यह नहीं मानता । भारतवर्ष के अतिरिक्त ऐसा सहवेदता घून्य और कौन देश होगा और यह वह देश है जहाँ परमार्थ भमुष्य का कर्तग्य बताया गया है ।,अकस्मात् उस मनुष्य का पाँव ऊपर उठ गया और सैकड़ों ही गज की ऊँचाई से गंगा में गिर पड़ा ।,भारतवर्ष के अतिरिक्त ऐसा समवेदनाशून्य और कौन देश होगा और यह वह देश है जहाँ परमार्थ मनुष्य का कर्त्तव्य बताया गया है । जेल को अंधेरी कोरी में दिन-भर के कठिन परिश्रम के बाद वह दोने क# उपकार और सुधार के मसूचे बाँधा करता था |,यशवंत ने दृढ़ स्वर में फैसला सुनाया ।,जेल की अँधेरी कोठरी में दिन-भर के कठिन परिश्रम के बाद वह दोनों के उपकार और सुधार के मनसूबे बाँधा करता था । 5हे कहते-कहते सुमन की श्राँखें भर भाई ।,"अब चाहे सिर पर जो कुछ पड़े, मगर उस घर में न जाऊँगी ।",यह कहते-कहते सुमन की आँखें भर आई । में लुम्दे कैद करऊे नहीं रपता चाहता ।,यह निर्मम प्रश्न सुन कर उसके आँसू गायब हो गये ।,मैं तुम्हें कैद करके नहीं रखना चाहता । मगवान के पास जितनी अकल थी वह उसके और उसकी घरवाली के हिस्से पड़ गई,उसके लेखे तो सारे बैद डाक्टर हकीम अनाड़ी हैं,भगवान के पास जितनी अक्कल थी वह उसके और उसकी घरवाली के हिस्से पड़ गई उन्हें किसी प्रकार के बिनोद-प्रमोद ये रुचि न थी ।,इस समय उसके सौंदर्य की खूब चर्चा थी ।,उन्हें किसी प्रकार के विनोद-प्रमोद से रुचि न थी । अ्तएव एतवार को आराम करना वह अपना हक ससमझृता था और मुमकिन न था कि कोई उसका यह दक छीन सके |,प्रीति गाढ़ी हो गई ।,अतएव इतवार को आराम वह अपना हक समझता था और मुमकिन न था कि कोई उसका यह हक छीन सके । "और अगर उसकी यह जिद्द आप लोगों ने तोड़ दो, तो मैं आपका बड़ा एद्सान मार्नूँगा |",भुनगी- टहल तो तभी करूँगी जब भाड़ बनाऊँगी ।,"और अगर उसकी यह जिद आप लोगों ने तोड़ दी, तो मैं आपका बड़ा एहसान मानूँगा ।" दिल में उसी वक्त सोच लिया था कि रात को रुपये उड़ा लाऊँगा ।,मैं भी उनकी युक्ति का समर्थन करता हूँ ।,दिल में उसी वक्त सोच लिया था कि रात को रुपये उड़ा लाऊँगा । सूरदास-कितने रुपये होंगे ?,"अब बतलाओ, वे रुपये क्या हों, जो जुलूस के खर्च के लिए जमा किए गए थे ?",सूरदास-कितने रुपये होंगे ? "बेचारे कितने भकछे आदमों हैं, दो सी रुपये ठठाद्वर दे दिये ।","कहीं नालिश कर दी, तो हजार ही समझो ।","बेचारे कितने भले आदमी हैं, दो सौ रुपये उठाकर दे दिया ।" मुलाक्रात का कमरा जेल के मध्य में था और रास्ता बाहर द्वी से था,अगर मेरे इतने दिनों की सेवा और शिक्षा का यही फल है तो मैं कहूंगा कि मेरा सारा परिश्रम धूल में मिल गया,मुलाकात का कमरा जेल के मधय में था और रास्ता बाहर ही से था "उत्के कई कमरों में फर्श, गदह्टे, कोच, कुर्वियाँ; मोढ़े, सब खालों ही के थे ।",मैं मानूँगी नहीं ।,"उनके कई कमरों में फर्श-गद्दे , कोच, कुर्सियाँ, मोढ़े सब खालों ही के थे ।" सगला की दुृत्यु से पडितनी का जीवन अनियमित और विश्वखल्न-सा हो गया ।,द्वार पर आवाज़ दी ढ़पोरसंख ! तुरन्त बाहर निकल आये और गले से लिपट गये ।,मंगला की मृत्यु से पंडितजी का जीवन अनियमित और विश्रृंखल-सा हो गया । ऐसा आभास हुआ कि इसकी नीयत साफ़ नहीं है।,"यही सोचते हुए बाबू साहब गलियों में चले जा रहे थे, सहसा उन्हें अपने पीछे किसी दूसरे आदमी के आने की आहट मिली, समझे कोई होगा।",ऐसा आभास हुआ कि इसकी नीयत साफ नहीं है। उन्हें कितना दुःख होगा ?,कहीं पद्मसिंह ओर सुभद्रा पर यह रहस्य खुल जाए तो वह मुझे क्या समझेंगे ?,उन्हें कितना दुख होगा ? क्रानून में पाखड का सौ तो दण्ड है ।,मैं आज डाक से जरा बचा कर खबर लेता हूँ ।,कानून में पाखंड का भी तो दण्ड है । जरगो ने दो पैसे और थोड़े से आलू देकर उसे विदा किया और दुकान सजाने लगी ।,(मजूर से) 'कै पैसे हुए तेरे ?,' जग्गो ने दो पैसे और थोड़े से आलू देकर उसे विदा किया और दुकान सजाने लगी । "में सस्तिष्् से तो इन बातों को ढक्नोसला ही सममता हूं, लेकिन हृदय से इन्हें दुर नहीं कर सकता ।",घर को लाख सजाओ तो क्या बाग हो जायगा ?,मैं मस्तिष्क से तो इन बातों को ढकोसला ही समझता हूँ; लेकिन हृदय से इन्हें दूर नहीं कर सकता । इधर हफ्तों से उपने विपिन को न देखा था ।,लेकिन दम-भर के बाद प्यास ने फिर जोर किया ।,इधर हफ्तों से उसने विपिन को न देखा था । छुखदा ने चट-पट लल्द का मुँह धोया नये कपड़े पहनाये जो कई दित पहले जेल में सिये ये और उसे गोद में लिये मेट्रन के साथ बाइर निकली मानो पहले ही से तेयार बेठी दो,लेडी मेटन ने आकर कहा-सुखदादेवी तुम्हारे ससुर तुमसे मिलने आए हैं,सुखदा ने चटपट मुन्ने का मुँह धोया नए कपड़े पहनाए जो कई दिन पहले जेल में सिले थे और उसे गोद में लिए मेटन के साथ बाहर निकली मानो पहले ही से तैयार बैठी हो घोबी भो इतनी नि द्यता से अपने गधे फोी न पीठता होगा ।,"भेड़ों ने जो हरी-हरी पत्तियाँ देखीं, तो अधीर हो गई ।",धोबी भी इतनी निर्दयता से अपने गधे को न पीटता होगा । "वह उछल पड़ा, ध्यान से देखा तो कुत्ता था ।",अकस्मात्‌ उसे कोई वस्तु दोड़ती नजर आई ।,"वह उछल पड़ा, ध्यान से देखा तो कुत्ता था ।" "सबेरे कुछ प्रबन्ध न हुआ, तो क्या होगा ! यह सोचकर वह काँप उठा ।","मगर यह दो सौ रूपये मिल भी गए, तब भी तो पांच सौ रूपयों की कमी रहेगी ।","सबेरे कुछ प्रबंध न हुआ, तो क्या होगा! यह सोचकर वह कांप उठा ।" "तुमने जब तक नि्भ सका, निवाहा ।","पर मन कहता था, इसमें तुम्हारा क्या अपराध ?","तुमने जब तक निभ सका, निबाहा ।" ग्रीप्म की उप्ण बायु अभी तक बिलकुल शात नहीं हुई थी ।,और इस परिस्थिति में कर ही क्या सकता है; लेकिन ज्ञानचंद्र का सिर नीचा करने के लिए अवसर खोजता रहता है ।,ग्रीष्म की उष्ण वायु अभी तक बिलकुल शांत नहीं हुई थी । सुखी पर दुःख पढ़ता टै तो वह विद्रोह करने लगता है,तुम जैसों के लिए यही जवाब है,सुखी पर दु:ख पड़ता है तो वह विद्रोह करने लगता है "में क्या जानू, केसो सलाह करेंगी ।","जोर तो मारता ही जाऊंगा , चाहे कितने ही बंधन पड़ते जायें ।","मैं क्या जानूँ, कैसी सलाह करेंगी ।" क्या अधिकारियों के दबाव से इन्होंने जमीन को मिस्टर सेवक के अधिकार में देने का फैसला कर लिया है और मुझसे अपने निश्चय का अनुमोदन कराना चाहते हैं ?,सोचा-इनका अभिप्राय क्या है ?,क्या अधिकारियों के दबाव से इन्होंने जमीन को मिस्टर सेवक के अधिकार में देने का फैसला कर लिया है और मुझसे अपने निश्चय का अनुमोदन कराना चाहते हैं ? मुझे अपने वचपन को एक घटना याद आईं ।,इसकी सोहबत में लड़का बिगड़ा जाता है ।,मुझे अपने बचपन की एक घटना याद आयी । शका हुई कहीं रामेंद्र इस मज़ार के विषय में कुछ पूछ न बैठे ।,एक दिन शाम को कुँवर साहब जुहरा के मजार को फूलों से सजा रहे थे और सुलोचना कुछ दूर पर खड़ी अपने कुत्ते को गेंद खिला रही थी कि सहसा उसने अपने कालेज के प्रोफेसर डाक्टर रामेन्द्र को आते देखा ।,शंका हुई कहीं रामेन्द्र इस मजार के विषय में कुछ पूछ न बैठें । "हमारे देश और जाति को यह चीज जिराग्रे हमारा सान था, अब अंतिम साँस के रही हैं ।",पक्षियों के घोंसलों में रातें काटी हैं किंतु ये सारी बलाएँ कट गयीं और वह समय अब दूर नहीं है कि साहित्य और विज्ञान-संसार मेरे चरणों पर शीश नवायें ।,"हमारे देश और जाति की वह चीज़ जिससे हमारा मान था, अब अंतिम सांस ले रही है ।" किंतु सोफिया के अंतस्तल में अनिष्ट-शंका का प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था ।,विनय-हम अपना दु:ख का हिस्सा भोग चुके ।,किंतु सोफिया के अंतस्तल में अनिष्ट-शंका का प्रतिबिंब दिखाई दे रहा था । मानी - अम्मी तुम्हें घर में घुसने न देंगी ।,अपने शिकारी तोहफे दिखाने का कुँवर साहब को मरज था ।,मानी- अम्माँ तुम्हें घर में घुसने न देंगी । .. चचा साहब ने गम्भीर भाव से कह्य- यह तुम्हारा आखिरी फैसला है ?,मैंने उसी निर्भीकता से जवाब दिया –‘ इसीलिए कि मैं इस विषय में स्वाधीन रहना चाहता हूँ ।,"चचा साहब ने गम्भीर भाव से कहा , यह तुम्हारा आखिरी फैसला है ?" "मैने तो समम्का था, ठुम वहाँ पहुँच गये होगे ।","कल का सारा दिन पड़ा है, लगा लेना ।","मैंने तो समझा था, तुम वहाँ पहुँच गये होगे ।" प्रकाश ने मुसकिराकर कहा--यह तो बीरू वाबू ही से पूछिए ।,"तुम नहीं जानते , कि प्रेम के लिए उसके मन में कितनी व्याकुलता होती है और जब वह सौभाग्य से उसे पा जाती है , तो किस तरह प्राणों की भाँति उसे संचित रखती है ।",प्रकाश ने मुस्कराकर कहा - यह तो बीरू बाबू ही से पूछिए । "ताहिर-बिरादर, जैसे इतने दिनों तक सब्र किया है, थोड़े दिन और करो ।",सुभागी मुस्कराकर चली गई ।,"ताहिर-बिरादर, जैसे इतने दिनों तक सब्र किया है, थोड़े दिन और करो ।" "उम्रने समझा, यह मेरी शका को निमूल सम्ररतो है, मानो मुझे इस बच्ची पे कोई पेर है ।","एक आदमी ने शंका की- महाराज, आपके प्राण निकलते-निकलते महीने-भर से कम न लगेगा ।","उसने समझा, यह मेरी शंका को निर्मूल समझती है, मानो मुझे इस बच्ची से कोई बैर है ।" किस्ची को नीयत सदा ठीक नहीँ रहतो ।,"मोटेराम- खोंचा रखे जाओ, लपककर थोड़ा तेल ले लो; नहीं मुझे कोई साँप काट लेगा तो तुम्हीं पर हत्या पड़ेगी ।",किसी की नीयत सदा ठीक नहीं रहती । "जब अँंयेरा हा गया, त्तो कुंवर नीचे उतरे आर उठी बृत्च के नीचे थांड़ी- सी भूमि फाड़कर पत्तिया को शब्या बनायी ओर लेटे |",आकाश में तैरने वाली लालिमामयी नौकाओं पर चंदा ही उड़ी जाती थी ।,"जब अँधेरा हो गया, तो कुँवर नीचे उतरे और उसी वृक्ष के नीचे थोड़ी-सी भूमि झाड़ कर पत्तियों की शय्या बनायी और लेटे ।" वसुधा का ज्वर इक्कीस दिन तक न उतरा ।,ऐसी बेहूदा सड़क दुनिया में न होगी ।,वसुधा का ज्वर इक्कीस दिन तक न उतरा । शोक यही है कि सुझे बहुत पीछे मालूम हुआ ।,मेरे मुँह से एक शब्द भी न निकला ।,शोक यही है कि मुझे बहुत पीछे मालूम हुआ । "कया कझू, अगर किसी तरह का विश्न पढ़ गया, तो किसडी पदतामों होगी ?",बोली- उसकी चिन्ता न करो भैया विधवा की आयु बहुत लम्बी होती है ।,"क्या करूँ, अगर किसी तरह का विघ्न पड़ गया तो किसकी बदनामी होगी ।" देर ही हो तो तीन खाँचे दे दो,धनिया फूली हुई थी,देते ही हो तो तीन खाँचे दे दो कही आते-जाते नहीं देखती ।,जब एक बार इसे गऊ-रक्त कह चुका तो फिर इसकी ओर ताक भी नहीं सकता ।,कहीं आते-जाते नहीं देखती । "ग्राइए, आपको दारोगा जी से इन्ट्रोड्यूस (परिचित) करा दूँ ।",लेकिन मनोवृत्तियाँ सुगंध के समान हैं जो छिपाने से नहीं छिपतीं ।,"आइए, आपको दारोगा जी से इन्ट्रोड्यूस (परिचय) करा दूँ ।" "उन्होंने यह पता तो लगा लिया था कि इस समर के अन्य सभी योदागण मदरसे आते हैं ओर मुशीजी उनसे कुछ नहीं बोलते, किन्तु चित्त से शज्टा दूर न होती थी |","वहाँ दिन-भर किसी वृक्ष के नीचे बैठे रहते, अथवा गुल्ली- डण्डे खेलते ।","उन्होंने यह पता लगा लिया था कि समर के अन्य सभी योद्धागण मदरसे आते हैं और मुंशीजी उनसे कुछ नहीं बोलते, किन्तु चित्त से शंका दूर न होती थी ।" जालपा ने उसके मन का भाव ताड़कर कहा -- मुझे भी अक्सर इनकी बातों पर हँसी आ जाती हैं बहन ! इस वक़्त तो इनका ज्वर कुछ हलका हैं ।,देखो तो आज कितनी बे-मौका हंसी आई है ।,"जालपा ने उसके मन का भाव ताड़कर कहा,मुझे भी अक्सर इनकी बातों पर हंसी आ जाती है, बहन! इस वक्त तो इनका ज्वर कुछ हल्का है ।" में उनको रिहा कर दूंगा ।,"सन्दूक में क्या है, यह देखने की उत्सुकता हुई ।",मैं उनको रिहा कर दूंगा । "वरौंठे में धीरे से बेठ गया , मगर उर रहा था कि झोई उठा न मार हे ।",' दोनों वहाँ से निकले और आकर महेशनाथ के द्वार पर अँधेरे में दबककर खड़े हो गये ; मगर टामी को सब्र कहाँ ?,"बरोठे में धीरे से बैठ गया , मगर डर रहा था कि कोई डण्डा न मार दे ।" सावन का महीना आ गया था और बगूले उठ रहेः थ,तू किसी का औसान नहीं मानती यही तुझमें बुराई है,सावन का महीना आ गया था और बगुले उठ रहे थे "जमींदार तो किसानों को चूसते ही हैं, कारिन्दे भी कम नहीं चूसते |","किसानों को बात-बात के लिए चूसते हैं, किसान छान छवाना चाहे तो उन्हें दे, दरवाजे पर एक खूँटा तक गाड़ना चाहे तो उन्हें पूजे, एक छप्पर उठाने के लिए दस रुपये जमींदार को नजराना दे तो दो रुपये मुंशी जी को जरूर ही देने होंगे ।","जमींदार तो किसानों को चूसते ही हैं, कारिंदे भी कम नहीं चूसते ।" पहले दृल्हें के लिए पालकी का विचार था ।,बरात ऐसे धूम से जानी चाहिए कि गांव-भर में शोर मच जाय ।,पहले दूल्हे के लिए पालकी का विचार था । "बजरंगी जानवरों को प्राण से भी प्रिय समझता था, तिनक गया ।",नायकराम टट्टी की आड़ से शिकार खेलते थे ।,"बजरंगी जानवरों को प्राण से भी प्रिय समझता था, तिनक गया ।" मैं गंगा में सड़ी स्नान कए रही थौ ।,दूर से वह छोटे-छोटे खिलौने की भाँति दिखायी देते थे ।,मैं गंगा में खड़ी स्नान कर रही थी । वह क्‍ चुप थी ।,गंगाजली सिर झुकाए अपने पति की बातें सुन कर दुःखित हो रही थी ।,वह चुप थी । आखिर हम भी तो इसी जननी की संतान हैं ।,प्रत्येक अवसर पर अंगरेजों की सहायता से उन्हें दबाने की चेष्टा करते हैं ।,आखिर हम भी तो इसी जननी की संतान हैं । आपसे सत्य कहता हूँ कि मुझे यह समाचार सम्बन्ध ठीक हो जाने के वाद मिला ।,वह बात छिपाए बिना कैसे बनता ?,आप से सत्य कहता हूँ कि मुझे यह समाचार संबंध ठीक हो जाने के बाद मिला । फिर एक को तीस रुपये और दूसरे को तीन सौ रुपये क्‍यों देते हो ?,"कुछ बचा भी लेता हूँ, लेकिन जिस घर में बहुत से आदमी हों, लड़कों की पढ़ाई हो, लड़कियों की शादियां हों, वह आदमी क्या कर सकता है ।",फिर एक को तीस रूपये और दूसरे को तीन सौ रूपये क्यों देते हो ? न मालूम वह कहाँ गयी ।,मैंने अच्छा नहीं किया ।,न मालूम वह कहाँ गई । कूद पड़ा तब सिन्धु मँमारी ॥ जेहि पर जाकर सत्य सनेहू ।,समुझत मन दुख भयउ अपारा॥ कौशलेश दशरथ के जाएे ।,कूद पड़ा तब सिंधु मझारी॥ जेहि पर जा कर सत्य सनेहू । अरब गाँव में इलचल पड़ी ।,"भाड़ के समीप ही किसानों की कई झोंपड़ियाँ थीं, वह सब उन्मत्त ज्वालाओं का ग्रास बन गयीं ।",अब गाँव में हलचल पड़ी । "सुमन ने भाज असाधारण रीति से उनकी आवभगत की और इधर-उधर की वातें करने के वाद वोली--आइए, आज आपको वह सिगरेट पिलाऊँ कि भ्राप भी याद करे ।",यह हजरत सिगरेट बहुत पीते थे ।,"सुमन ने आज असाधारण रीति से उनकी आवभगत की और इधर-उधर की बातें करने के बाद बोली - आइए, आज आप को वह सिगरेट पिलाऊँ कि आप भी याद करें ।" भघकार ऐसा था मानों निशा- देवी यहीं शयत कर रद्दो दों ।,"इसका तो मुझे जरा भी भय नहीं है कि ब्राह्मण भूत बनकर हमको सतायेगा, या हमें उसकी वेदी बनाकर पूजनी पड़ेगी, यह भी जानता हूँ कि पाप का दण्ड भी बहुधा नहीं मिलता; लेकिन हिंदू होने के कारण संस्कारों की शंका कुछ-कुछ बनी हुई है ।",अंधकार ऐसा था मानो निशादेवी यहीं शयन कर रही हों । "पिछली स्म्ृतियाँ जीवित हो गई', हृदय में इज़ारीलाल के प्रति श्रद्धा का एक ठद्गार-सा उठ पढ़ा ।",४ भादों का महीना था और तीज का दिन ।,"पिछली स्मृतियाँ जीवित हो गयीं, हृदय में हजारीलाल के प्रति श्रध्दा का एक उद्गार-सा उठ पड़ा ।" ऐसी रुखाई का व्यवहार करते हैं जिससे सारा उत्साह भग द्वो जाता है ।,"उस पर भी यदि दुर्भाग्यवश किसी चंदे के सम्बन्ध में जाता हूँ, तो लोग मुझे यम का दूत समझते हैं ।",ऐसी रुखाई का व्यवहार करते हैं जिससे सारा उत्साह भंग हो जाता है । "तुम्हें सौ बार गरज हो, जाकर पूछो ।",वह अन्याय पर डटा हुआ था ।,"तुम्हें सौ बार गरज हो, जाकर पूछो ।" "सड़क के किनारे के वृक्ष और मंदान चन्द्रमा के मन्द प्रकाश में हतोत्साह, निर्जीव-से मालूम होते थे ।",शहर की घनी बस्ती से ये लोग दूर निकल आए थे ।,"सड़क के किनारे के वृक्ष और मैदान चन्द्रमा के मंद प्रकाश में हतोत्साह, निर्जीव-से मालूम होते थे ।" मैं इस काब्रिल भी नहीं समभता कि उस पर मतानत के हाथ बहस की जाय ।,मैं इस तहरीक की सख्त मुखालिफत करता हूँ ।,मैं उसे इस काबिल भी नहीं समझता कि उस पर मतानत के साथ बहस की जाए । आप इस समय .हिरासत में हैँ ।,वंशीधर पर ऐश्वर्य की मोहिनी वंशी का कुछ प्रभाव न पडा ।,आप इस समय हिरासत में हैं । "रानी साहब से कहूँ, चुरा तो न मानेंगी |",इनसे उत्तम पदार्थों की तो कल्पना भी नहीं हो सकती ।,"रानी साहब से कहूँ, बुरा तो न मानेंगी ।" सुभद्रा---उसकी सूरत से साफ मालूम होता था ।,शर्मा -- यह सामुद्रिक विद्या कब से सीखी ?,सुभद्रा -- उसकी सूरत से साफ मालूम होता था । "चतुर व्यापारी की भाँति वह जो कुछ खर्च करता था, वह केवल कमाने के लिए ।","मुफ्त का धन अकेले नहीं हजम होता, यह वह अच्छी तरह जानता था ।","चतुर व्यापारी की भांति वह जो कुछ खर्च करता था, वह केवल कमाने के लिए ।" "भ्पने जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए जिन वातों की जरूरत हैं, उनको शिक्षा हमको मिल छुकी हैं ।",हम को किताब के कीड़े बनने की जरूरत नहीं ।,अपने जीवन में सफलता प्राप्त करने के लिए जिन बातों की जरूरत है उनकी शिक्षा हम को मिल चुकी है । नहीं तो वह सुमे देख-देखकर क्यों जलते और में उनकी सूरत से क्यों घृणा करती ।,मैं अब ज्यादा दिनों तक न जिऊँगा ।,नहीं तो वह मुझे देख-देखकर क्यों जलते और मैं उनकी सूरत से क्यों घृणा करती ? "कोई झासन विदाए ध्यान करता था और सोचता था, ।",मुवक्किल हाथ-मुँह धो रहे थे ।,कोई आसन बिछाए ध्यान करता था और सोचता था । "में चाहता हूँ, आप थोड़े-से मातबर आदमियों को लेकर जायें और उस रमणी को किसी तरह ले आयें ।",मन को समझाकर हार गया और अब विवश होकर मैंने कूटनीति से काम लेने का निश्चय किया है ।,"मैं चाहता हूँ , आप थोड़े-से मातबर आदमियों को लेकर जायँ और उस रमणी को किसी तरह ले आयें ।" पत्नो-- तो में ही चली जाऊँ ?,न जाने किस बुरी साइत से मैंने इसके रुपये लिये ।,पत्नी- तो मैं ही चली जाऊँ ? यह लोग अनाथों की खोज-खब्रर नलें तो कोन ले ।,' सेठजी फूट-फूटकर रोने लगे ।,ये लोग अनाथों की खोज-खबर न लें तो कौन ले । "सच कहना, कभी तुम्हारा हृदय इतना आनंद-पुलकित हुआ था ?",राजा साहब छत पर खड़े यह दृश्य देख रहे थे ।,"सच कहना, कभी तुम्हारा हृदय इतना आनंद-पुलकित हुआ था ?" हमारी पुरानी पुस्तके अब दीमछो के सिवा हमारे किसी काम की न थीं ।,बीस रुपये मिलते थे ।,हमारी पुरानी पुस्तकें अब दीमकों के सिवा हमारे किसी काम की न थीं । सभी जातियों ओर वर्णों के लोग साथ भोजन करने बैठे,वह उनके लिए है जो विवाह नहीं करना चाहते,सभी जातियों और वर्णों के लोग साथ भोजन करने बैठे इरिहर--तुम नहीं लाठो कन्ये पर रखे बछिय्रा को बाँघ रहे थे ?,हरिहर- मैंने कल साँझ को इन्हें भेड़ों में बछिया को बाँधते देखा था ।,हरिहर- तुम नहीं लाठी कंधे पर रखे बछिया को बाँध रहे थे ? रास्ते में बजरंगी से मुठभेड़ हो गई ।,अपने द्वार पर पड़ा रहा ।,रास्ते में बजरंगी से मुठभेड़ हो गई । "घालक प्रद्मरा अब दस साल का रुपवान्‌, बलिछ, प्रपन्नतुख कुमार था, बला छा तेज, साहयों और मनस्व्ों ।","जब सारे पुरजे जमा हो गये, तो करूणा दीपक के सामने बैठकर उसे जोड़ने लगी, जैसे कोई वियोगी हृदय प्रेम के टूटे हुए तारों को जोड़ रहा हो ।","बालक प्रकाश अब दस साल का रूपवान, बलिष्ठ, प्रसन्नमुख कुमार था, बल का तेज, साहसी और मनस्वी ।" यह कहकर बढ उठकर ऊपर चली,नैना ने बालक का चुंबन लेकर कहा-वहाँ दो-एक बार रोज इसे याद करके रोती थी,यह कहकर वह उठकर ऊपर चली "गाँव के मकान तथा रास्ते वेसिलसिले, वेढगे तथा टटे- फूटे थे ।",चारों ओर से दुर्गंध उठ रही थी ।,"गाँव के मकान तथा रास्ते बेसिलसिले, बेढंगे तथा टूटे-फूटे थे ।" "अपने अतीत को मिटाने के लिए, अपने पिछले दागों को धो डालने के लिए, उसके पास इसके सिवा और क्या साधन था ।",किसे शंका थी कि मृत्यु की ऐसी भीषण पीडा उनको देखनी पड़ेगी ।,"उसके अतीत को मिटाने के लिए, अपने पिछले दागों को धो डालने के लिए, उसके पास इसके सिवा और क्या उपाय था ।" "सभद्रा--भला, अ्व की वार सिद्धान्त के विरुद्ध, ही सही ।","पद्म -- खर्च की बात नहीं, सिद्धान्त की बात है ।","सुभद्रा -- भला, अब की बार सिद्धान्त के विरुद्ध ही सही ।" भोजन करते-करते एक बच्चन गया ।,"अगर मैं देखता कि जनता में वास्तविक जागृति है, तो तुमसे पहले मैदान में आता ।",भोजन करते-करते एक बज गया । "कोई चलता हुआ आदमी शायद इतना व्यग्र न होता, हीले-हवाले करके महा- जन को महीनों टालता रहता; लेकिन दयानाथ इस मामले में अनाड़ी थे ।",किस्त बांधकर सब रूपये छः महीने में अदा कर देने का वादा किया ।,"कोई चलता हुआ आदमी शायद इतना व्यग्र न होता, हीले-हवाले करके महाजन को महीनों टालता रहता; लेकिन दयानाथ इस मामले में अनाड़ी थे ।" अभी दस-पाँच वर्ष मेरी परीक्षा होने दीजिए,किसी शुभ कार्य में लग जाय वह कहीं अच्छा,अभी दस-पाँच वर्ष मेरी परीक्षा होने दीजिए "तुम जिस दशा में हो, उसमे तुम्हे जहाँ तक हो सके, आराम से रहना चाहिए ।","वह बार-बार उठती , फाटक पर जाकर नजर दौड़ाती ।","तुम जिस दशा में हो , उसमें तुम्हें , जहाँ तक हो सके , आराम से रहना चाहिए ।" "कई वार इधर-उधर घम जाने का विचार हुआ, पर अन्तःप्रेरणा ने सीधी राह से हटने न दिया ।",जादोराय थका-माँदा आकर बैठ गया और स्त्री से उदास होकर बोला- दरखास्त नामंजूर हो गई ।,कई बार इधर-उधर घूम जाने का विचार हुआ पर अन्तःप्रेरणा ने सीधी राह से हटने न दिया । में पीछे-पीछे दौढ़ रद्दा था ।,"‘ ‘अच्छा, कल मैंने अमरूद खिलाया था ।",मैं पीछे-पीछे दौड़ रहा था । किसी भिक्षुक के मंह से गाली खाकर सज्जन मनुष्य चुप रहने के सिवा और क्या कर सकता है?,निर्बल क्रोध उदार हृदय में करुणा का भाव उत्पन्न कर देता है ।,किसी भिक्षुक के मुँह से गाली खा कर सज्जन मनुष्य चुप रहने के सिवा और क्या कर सकता है ? उनका इरादा नेक है वह हमारे ग्रीव भाइयों के टफ़ के लिए ठड़ रही छूँ,डिप्टी ने सेठजी को बराबर की कुर्सी पर बैठाकर कहा-सेठजी यह बातें उन मुआमलों में चलती हैं जहाँ कोई काम बुरी नीयत से किया जाता है,उनका इरादा नेक है वह हमारे गरीब भाइयों के हक के लिए लड़ रही हैं में मनुष्य हूँ ।,मैंने कभी धर्म का परित्याग नहीं किया और न कभी करूँगा ।,मैं मनुष्य हूँ । "समझ गयी, बंगाली मुसलमान होगी ।","देर न हो रही हो तो आओ, कुछ देर गप-शप करें ।","समझ गई, बंगाली मुसलमान होगी ।" शंकर आशाहदीन दोकर उदासीन हो गया |,"उसने समझ लिया कि जब इतना कष्ट सहने पर भी साल-भर में ६० रु से अधिक न जमा कर सका, तो अब और कौन सा उपाय है जिसके द्वारा इसके दूने रुपये जमा हों ।",शंकर आशाहीन होकर उदासीन हो गया । मेरी कल्पना कभी इतनौ सचित्र और प्जीव त थी ।,एक क्षण में गीत शुरु हुआ ।,मेरी कल्पना कभी इतनी सचित्र और सजीव न थी । "अब जो सोचते हैं, तो मालूम होता है, कितनी आसान बात थी ।",उसने पति के शीतल चरणों पर सिर झुका लिया और बिलख-बिलखकर रोने लगी ।,"अब जो सोचते हैं, तो मालूम होता है, कितनी आसान बात थी ।" आपकी ववतृताझ्रों में तो वह प्रभाव होगा कि लोग सुनकर दंग हो जाएँगे ।,दृढ़ संकल्प हवा में किले बना देता है ।,आपकी वक्तताओं में तो वह प्रभाव होगा कि लोग सुनकर दंग हो जाएँगे । तीन मद्दीने बीत गये थे,इस अल्पकाय शिशु ने ऊँट के नन्हे-से नकेल की भांति उसके जीवन का संचालन अपने हाथ में ले लिया था,तीन महीने बीत गए थे "वह बच्चों के सहश रोने लगे, सिसकते थे, हिचकियाँ लेते थे, पर हृदय में लेशमात्र भी क्रोध न था ।","सारी बाल्यावस्था बीत गई, बड़े-बड़े उपद्रव किए, पर भाई ने कही हाथ न उठाया ।","वह बच्चों के सदृश्य रोने लगे, सिसकते थे, हिचकियाँ लेते थे, पर हृदय में लेशमात्र को भी क्रोध न था ।" घृूप और प्रकाश का कहीं गुजर नहीं ।,बाहर से नालियों की दुर्गध आती रहती थी ।,धूप और प्रकाश का गुजर नहीं । द्वार-पूजा समाप्त हो चुकी थी ।,"मुँह से तो कुछ नहीं कहते, पर मन में अपनी भूल पर पछताते हैं।",द्वार-पूजा समाप्त हो चुकी थी। थोड़ी देर के बाद दोर्नों गाड़ियाँ लोंटों ; लड़के घर में जाकर इस यानयात्रा के अनुभव बयान करने लगे ।,लक्ष्मी चुप हो रही ।,थोड़ी देर के बाद दोनों गाड़ियाँ लौटीं; लड़के घर में जाकर इस यानयात्रा के अनुभव बयान करने लगे । उन्हें ग्राज इस पद्‌ की महानता ज्ञात हुई ।,अब तक कभी मोटर पर बैठने का सौभाग्य न हुआ था ।,उन्हें आज इस पद की महानता ज्ञात हुई । "बस, बगलें झाँकने लगे ।","रोने से माँ दूध पिलाती है, सेर अपना सिकार नहीं छोड़ता ।","बस, बगलें झांकने लगे ।" युवराज का स्वागत करने के लिए अधिकारियों ने उनसे २५ हजार के कपडे खरोदे ।,सेठ चंदूमल की दूकान चाँदनी चौक दिल्ली में थी ।,युवराज का स्वागत करने के लिए अधिकारियों ने उनसे २५ हजार के कपड़े खरीदे । समस्त प्रान्त मे चिन्ता देवी की घाक बैठ गयी ।,कभी-कभी उसका पिता संध्या समय भी न लौटता; पर चिंता को भय छू तक न गया था ।,समस्त प्रांत में चिंतादेवी की धाक बैठ गयी । बडा विचितर रहस्य हैं ! भठा में इन दोनो को कया मुँह दिखाऊंगा ।,मानकी-मैं देखती हूँ तुम्हारी दशा दिन-दिन बिगड़ती जाती है ।,क्या विचित्र रहस्य है ! भला मैं इन दोनों को क्या मुँह दिखाऊँगा । "जब लोग श्राकर बैठ जाये, ओर महफिल का रंग जम जाय, तो , अ्रवादीजान रसिकजनों की कलाइयों पकड़-पकड़कर ऐसे हाव-भाव दिखायें कि लोग शरमाते-शरमाते मी कुछ-न-कुछ दे ही मरे ।",कोई मिठाई या फल पाते ही मैं बेतहाशा चौपाल की ओर दौड़ता ।,"जब लोग आ कर बैठ जाएँ, और महफिल का रंग जम जाए, तो आबादीजान रसिकजनों की कलाइयाँ पकड़-पकड़ कर ऐसे हाव-भाव दिखायें कि लोग शरमाते-शरमाते भी कुछ न कुछ दे ही मरें ।" मुँह से तो कुछ नहीं कहते; पर मन में अपनी भूल पर पछताते हैं ।,भला वहाँ वाले क्या कहते होंगे?,"मुँह से तो कुछ नहीं कहते, पर मन में अपनी भूल पर पछताते हैं।" बूढ़ा माली हमें अपनी कोपडी में बढ़े पेंम से बैठाता था ।,"मौलवी साहब के यहाँ कोई हाजिरी का रजिस्टर तो था नहीं, और न गैरहाजिरी का जुर्माना ही देना पड़ता था ।",बूढ़ा माली हमें अपनी झोपड़ी में बड़े प्रेम से बैठाता था । "दारोगा ने कई बार पुकारा, ज़रा सुनिए, बात तो” सुनिए; लेकिन उसने पीछ फिरकर देखा तक नहीं ।",मोटर की सवारी और बंगले में रहने के लिए पंद्रह आदमियों को कुर्बान करना पडाहै ।,"दारोग़ा ने कई बार पुकारा, 'ज़रा सुनिए, बात तो सुनिए, ' लेकिन उसने पीछे फिरकर देखा तक नहीं ।" "विरादरी के लोग भी जो कुछ पूछते हैं, छाम्तानाथ से, या बड़ी बहू से ।","सम्बन्धियों के यहाँ के नेवते में शक्कर, मिठाई, दही, अचार आदि आ रहे थे ।","बिरादरी के लोग जो कुछ पूछते हैं, कामतानाथ से या बड़ी बहू से ।" "मोर₹-- हरमिज़ नहीं, जब तक भाप सुब न आवंगे, में मुदरे में दाथ दो न लगाऊंगा ।","सिर-दर्द खाक नहीं है, मुझे परेशान करने का बहाना है ।","मीर- हरगिज़ नहीं, जब तक आप सुन न आयेंगे, मैं मुहरे में हाथ ही न लगाऊँगा ।" पर दूसरे ही दिन पंडित मदनसिह के एक पत्र ने उत सबकी इच्छाएँ पूरी कर दीं।,"वह भी घर जाना चाहता था, लेकिन कोई इस विषय में मुँह न खोल सकता था ।",पर दूसरे ही दिन पंडित मदनसिंह के एक पत्र ने उन सब की इच्छाएँ पूरी कर दी । में उन्हें पढ़ती हूँ श्रोर एक ठडी सांस लेकर रख देती हूँ ।,"कितना सरल, भोले-भाले ह्रदय से निकला हुआ, निष्कपट मानपूर्ण आग्रह और आतंक से पत्र भरा हुआ था, मानो उसका सारा उत्तरदायित्व मेरे ही ऊपर था ।",मैं उन्हें पढ़ती हूँ और एक ठंडी साँस लेकर रख देती हूँ । "मुहब्बत फी जगह ईर्ष्या ने घेर छी धी और यह केवल इसलिए कि हरदौल दूरमे दंगे पैर उनकी तरफ ने दौडा, उसके राबारों से दूर ही से उसकी अस्यर्धना से की ।",वे घोड़े पर सवार अकड़ते हुए जुझारसिंह के सामने आए और पूछना चाहते थे कि तुम कौन हो कि भाई से आँख मिल गई ।,"मुहब्बत की जगह ईर्ष्या ने घेर ली थी और वह केवल इसीलिए कि हरदौल दूर से नंगे पैर उनकी तरफ़ न दौड़ा, उसके सवारों ने दूर ही से उनकी अभ्यर्थना न की ।" "अगर आपको यह इच्छा हो कि हम सब दाने बगेर अर जाये, तो मार ढालिए, और घुझे कुछ नहीं कट्टना है ।",वहाँ स्यापा बैठ गया ।,"अगर आपकी यही इच्छा हो कि हम सब दाने बगैर मर जायें, तो मार डालिये, और मुझे कुछ नहीं कहना है ।" किसी को नम्बर भी तो मालूम नही ।,तहकीकात होने लगी ग्यारह बजे ।,किसी को नम्बर भी तो मालूम नहीं । "फिर वद्द क्यों दबे और क्यों न जान पर खेल- कर तंमर के प्रति उसके भन में जो घृणा है, उसे अक््ट कर दे ।","वहाँ माल अधिक खपता है, इसलिए ताजा माल आता रहता है; पर इनकी तो टुटपुँजिया से बनती है, और वे इन्हें उल्टे छुरे से मूँडते हैं ।","फिर यह क्यों दबे और क्यों न जान पर खेलकर तैमूर के प्रति उसके मन में जो घृणा है, उसे प्रकट कर दे ।" तभी से तेंतर छा वाम सुनते हो मेरा कछेझा काँप उठता है ।,"माता- अरे बेटा, तुम क्या जानो इन बातों को, मेरे सिर तो बीत चुकी है, प्राण नहों में समाया हुआ है ।",तभी से तेंतर का नाम सुनते ही मेरा कलेजा काँप उठता है । चौकीदारों को भी रसद का सामान जुटाने के लिए इधर-उधर भेज दिया था और झ्ञाप अकेले बैठे हुए मुख्तार की राह देख रहे थे ।,दारोगाजी ने अपने तीनों कांस्टेबलों को किसी बहाने से थाने के बाहर भेज दिया ।,चौकीदारों को भी रसद का सामान जुटाने के लिए इधर-उधर भेज दिया था और आप अकेले बैठे हुए मुख्तार की राह देख रहे थे । "रामवली ने कदह्द--आइए मुख्तार साहब, बड़ी देर लगायी ।","यद्यपि वह बाजी मार कर आये थे, मुख पर विजय गर्व की जगह खिसियानापन छाया हुआ था ।","रामबली ने कहा- आइए मुख्तार साहब, बड़ी देर लगायी ।" "आसपास देहातों से सैकड़ों ज्री-पुरुष, लड़के नित्य आते और पजावे से ईंट सिर उठाकर ऊपर कतारों में सजाते |",अपनी वक्तृताओं में न्याय और सत्य की बातें करते हैं और सरकार की नीति को हानिकर समझते हुए भी उसका समर्थन करते हैं ।,"आसपास के देहातों से सैकड़ों स्त्री-पुरुष, लड़के नित्य आते और पजावे से ईंट सिर पर उठा कर ऊपर कतारों से सजाते ।" "खेमे वहाँ गडे रहते हैं, केप के अमले वहाँ पड़े रहते हैं, ओर राय साहब घर ममत्रों के साथ गप-शप करते रहते हैं, पर किसी का मजाल है कि राय साहब की नेकनीयती पर संदेह कर सके !","' 'तो हुजूर, आजकल तो मटर की फसिल है ।","खेमे वहॉँ गड़े रहते हैं, कैंप के अमले वहाँ पड़े रहते हैं और राय साहब घर पर मित्रों के साथ गप-शप करते रहते हैं, पर किसी की मजाल है कि राय साहब की नेकनीयती पर सन्देह कर सके ।" "देवयोग से उस्ची वक्त मुन्शी रियासत अलो था निऊले, ।","अब जो याद आयी, तो भागा हुआ आया ।",दैवयोग से उसी वक्त मुंशी रियासत अली आ निकले । "एक सतुप्ट हो कर जाता, तो अपने कई अस्त भाइयों को खोज छाता ।",उनकी दशा ठीक रोगियों की-सी होती है जो वैद्य से अपनी व्यथा और वेदना का वृत्तांत कहते नहीं थकते ।,एक संतुष्ट हो कर जाता तो अपने कई अन्य भाइयों को खोज लाता । "प्यारी--बक्ो मत, चटपट आकर बेठ जाओ ।",प्यारी- मैं तुम्हे आज फुलके खिलाऊँगी ।,"प्यारी- बको मत, चटपट आकर बैठ जाओ ।" पाप को क्षमा करना पाप करना है ।,"साहब बोले-ये रुपये तुम उनके घरवालों को दे दो, तो उनका गुजर हो जाए ।",पाप को क्षमा करना पाप करना है । "उनसे प्रार्थना की जाय की वह तुरन्त मद्रास चले जायें, और घम-विमुख बन्घुओं का उद्धार करें ।",खबर आयी कि मद्रास-प्रांत में तबलीग वालों ने तूफान मचा रखा है ।,"उनसे प्रार्थना की जाए कि वह तुरन्त मद्रास चले जाएें, और धर्म-विमुख बंधुओं का उद्धार करें ।" मै विद्याघरी के वैसे से लिपट गयी और फूट फूट कर रोने छगी ।,द०-तुम्हारी लाचारी का कुछ अनुमान कर सकता हूँ पर मुझे अब भी यह मानने में आपत्ति है कि दियासलाई का न होना चूल्हा न जलने का वास्तविक कारण हो सकता है ।,मैं विद्याधरी के पैरों से लिपट गयी और फूट-फूट कर रोने लगी । इस तरद कई साल गुजर गये ।,कभी जोर दे कर तगादा न करते कि कहीं उन्हें दुःख न हो ।,इस तरह कई साल गुजर गये । बहुत तेज दोड़ने वाला मनुप्य प्रायः मुँह के बल गिर पड़ता है |,"कलकत्ते के आढ़तियों से जो माल मँगाया था, रुपये चुकाने की तिथि सिर पर आ पहुँची और यहाँ रुपया वसूल न हुआ ।",बहुत तेज दौड़ने वाला मनुष्य प्राय: मुँह के बल गिर पड़ता है । "मुलिया-- इसलिए न डि जानते हो, में कुछ कर नहीं सच्चती ।","मैं सच कहता हूँ, इसमें ऊँच-नीच की बात नहीं है ।","मुलिया- इसीलिए न कि जानते हो, मैं कुछ कर नहीं सकती ।" वहाँ से पता चल जायगा ।,"मोटर चली तो जालपा ने कहा, 'बहन, कलकत्ता तो बहुत बडा शहर होगा ।",वहाँ से पता चल जाएगा । आँखें किसी को ढेँढा करती |,"रामबली- मुख्तार साहब, अब ज्यादा मजबूर न कीजिए ।",आँखें किसी को ढूँढ़ा करतीं । "आज ही से दौड़-धूप होगी, तब सब चीज़ें जुटा सकूंगा ।","कहूँगा, जगह चाहते हो तो कारगुजारी दिखाओ ।","आज ही से दौड़-धूप होगी, तब सब चीजें जुटा सकूंगा ।" "मेंगछ--कासिम, इन्हे सत छेड़ो, नहीं तो अच्छा न होगा ।",मँगरु – अच्छी बात है इन्हें भी लेती चलो ।,"मँगरु – कासिम , इन्हें मत छेड़ो , नहीं तो अच्छा न होगा ।" में यह कभी न पसन्द करती कि वह दूसरों को दग़ा देकर मुखबिर बन जायें ; लेकिन यह मामला तो बिलकुल झूठ है ।,"फिर बोली, 'दादा, मैं उन्हें पुलिस के पंजे से बचाने का ठेका नहीं लेती ।","मैं यह कभी न पसंद करती कि वह दूसरों को दग़ा देकर मुख़बिर बन जायं, लेकिन यह मामला तो बिलकुल झूठ है ।" "यह तो उनकी फतह होगी , लेकिन शोरीं को भोग-लालसा पर केसे विजय पाये |",और एक उपन्यासकार की हस्ती ही क्या है ।,यह तो उनकी फतह होगी ; लेकिन शीरीं की भोग-लालसा पर कैसे विजय पायें । उस समय मेरा अस्तक्‌ .इन्दो वियारों से भदा हुआ भआा ।,आवश्यक वैज्ञानिक यंत्र साथ लिये और ईश्वर का नाम ले कर चल खड़ा हुआ ।,उस समय मेरा मस्तिष्क इन्हीं विचारों से भरा हुआ था । "यद्यपि में जातता हूँ कवि मेरी बदनाम जो श्रुछ होनो थो, वह हो चुकी ।",गोपीनाथ आकर खड़े हो गये और सोते हुए बालक को प्यार से देखकर बोले-आनंदी मैं तुम्हें मुँह दिखाने लायक नहीं हूँ ।,यद्यपि मैं जानता हूँ कि मेरी बदनामी जो कुछ होनी थी वह हो चुकी । कभी चौधरी को नागा करते नहीं देखा कभी उतके मुँह से ऐसी विराग की वात नहीं सुदी,उसे आए यहाँ तीन साल से अधिक हुए,कभी चौधरी को नागा करते नहीं देखा कभी उनके मुँह से ऐसी विराग की बात नहीं सुनी "खानसाम्र पर ज्ब मार-घाह़ का कुछ अपर न हुआ, तो साहब उत्रके काव पकड़े हुए डाऊ बँगछे की तरफ चले ।","जब तक जिऊँगा, उस वीरात्मा का गुणानुवाद करता रहूँगा ।","खानसामा पर जब मार-धाड़ का कुछ असर न हुआ, तो साहब उसके कान पकड़े हुए डाक-बँगले की तरफ चले ।" कहीं-न-कहीं से रुपये आ ही जायेंगे,एक आत्मानन्द संन्यासी थे जो संसार से विरक्त होकर सेवा में जीवन सार्थक करना चाहते थे दूसरे एक संगीत के आचार्य थे जिनका नाम था ब्रजनाथ,कहीं-न-कहीं से रुपये आ ही जायेंगे "ज्यॉ-ज्यां रात भीगती थी, देवी विकराल रूप धारण करती जाती थीं ।",बार-बार कसमें खाता था कि अब फिर मुझसे ऐसा अपराध न होगा; लेकिन कोई उसके निकट न आता था ।,ज्यों-ज्यों रात भीगती थी देवी विकराल रूप धारण करती जाती थी । मैंने एक बीड़ा दिया,एक पान वाले ने कहा-एक दिन मेरी दूकान पर आकर खड़ी हो गई,मैंने एक बीड़ा दिया अनाड़ी बहुत-सी जगह में भी यही सोचता रहता है कि कीन वस्तु कहाँ रुखूँ ।,"पुराना खिलाड़ी मैदान में जा कर जितना नाम करेगा, उतना नया पट्ठा नहीं कर सकता ।",अनाड़ी बहुत-सी जगह में भी यही सोचता है कि कौन वस्तु कहाँ रखूँ । अपने पशु-पक्षियोँ में उतकी जान बस्ती थी,भोग-विलास सैर-तमाशे से आत्मा उसी भांति संतुष्ट नहीं होती जैसे कोई चटनी और अचार खाकर अपनी क्षुधा को शांत नहीं कर सकता,अपने पशु-पक्षियों में उनकी जान बसती थी मारवादी उन्‍्दीं के देश का था ।,उनके मक्खीचूसपने की सैकड़ों ही दंतकथाएँ नगर में प्रचलित हैं ।,मारवाड़ी उन्हीं के देश का था । देवीदीन के घर में दो कोठरियाँ थीं और सामने एक बरामदा था ।,"शहर भर में उसकी बदनामी हो ही गई होगी, पुलिस में इत्तला की ही जा चुकी होगी ।",देवीदीन के घर में दो कोठरियां थीं और सामने एक बरामदा था । इसका मज़ा भी चस की ।,"जब वह अपनी झोंपड़ी के द्वार पर पहुँची, तब सभी आदमी विदा हो चुके थे ।",इसका मजा भी चख लो । यह आतंक दूर करना होगा,सलीम की स्टिक ने इस सैनिक को भी जमीन पर सुला दिया,यह आतंक दूर करना होगा वह दयाहीन व्यापत्र के समान मेरे हृदय को घायल करके मेरे तड़पने का आनन्द उठाना चाहते हैं।,मेरे चले जाने से उनकी काम तृष्णा में विघ्न पड़ेगा ।,वह दयाहीन व्याप्र के समान मेरे हृदय को घायल करके मेरे तड़पने का आनन्द उठाना चाहते हैं । तीन दिन पहले यहाँ रक्त को नदो बह्दी यी ।,"राज्य बच जाने की उतनी खुशी न थी, जितनी हीरे के बच जाने की ।",तीन दिन पहले यहाँ रक्त की नदी बही थी । "अ्रपनी शादी करके लोटने पर जब-जब रास्ते में मुझसे सेंट हुई, कह्य--आपकी मिठाई रखी हुईं है, भेजवा दूंगा; पर बह मिठाई श्राजतक न आईं, हालाँकि अब ईश्वर की. दया से विवाह-तरु में फल भी लग आये, लेकिन खेर, मैं साहित्य-सेवियों से इतना चोकज्ना नहीं रहता ।","शिक्षा ऐसी कितनी बातों को मानती है, जो रीति-नीति और परंपरा की दृष्टि से त्याज्य हैं ।","अपनी शादी करके लौटने पर जब-जब रास्ते में मुझसे भेंट हुई, कहा, आपकी मिठाई रखी हुई है, भेजवा दूँगा, पर वह मिठाई आज तक न आई, हालाँकि अब ईश्वर की दया से विवाह-तरु में फल भी लग आये, लेकिन खैर, मैं साहित्यसेवियों से इतना चौकन्ना नहीं रहता ।" अपने इस नन्‍हें-से हृदय में अम्ति का टहकता हुआ कुण्ड छिपाये बेठा हूँ ।,मैं केवल तुम्हारे इशारों का गुलाम था ।,अपने इस नन्हे-से ह्रदय में अग्नि का दहकता हुआ कुण्ड छिपाये बैठा हूँ । "ज्योंही चार बजते, व्याकुल होकर, सड़क पर आइर, खड़ा हो जाता, और थोड़ी देर मे कजाकी कन्घे पर वलल्‍लम रखे, उसकी #ऋईकुनी बज्ाता, दूर से दौड़ता हथा आता दिखलायी देता |","कजाकी जाति का पासी था, बड़ा ही हँसमुख, बड़ा ही साहसी, बड़ा ही जिंदादिल ।","ज्यों ही चार बजते, व्याकुल हो कर, सड़क पर आ कर, खड़ा हो जाता, और थोड़ी देर में कजाकी कंधो पर बल्लम रखे, उसकी झुँझुनी बजाता, दूर से दौड़ता हुआ आता दिखलायी देता ।" धर दाब-पेर उललालकर 'गूं-गूँ” करने लगी और दीपक छक्वी ओर द्वाथ फलाने लगी ।,इस नन्हे-से बच्चे के प्रति हमारी कठोरता क्या ईश्वर को अच्छी लगती होगी ?,वह हाथ-पैर उछालकर 'गू-गूँ' करने लगी और दीपक की ओर हाथ फैलाने लगी । सिनद्वा--तुम दो जगत पांडे ! आओ बेठो ।,आरामकुर्सी पर लेटे हुए पेचवान पी रहे थे ।,सिनहा- तुम हो जगत पाँडे ! आओ बैठो । उनपर क्िंस्ती का दावा नहीं है,बोला-लेकिन गहने तो तुम्हारे हैं,उन पर किसी का दावा नहीं है मुझे भी धन कमाने की कला आती हे,अगर धन मेरे जीवन का आदर्श होता तो आज मैं इस दशा में न होता,मुझे भी धन कमाने की कला आती है "सुन लेना, शायद कुछ कहना भी चाहते हों ।",स्टेशन पर होटल पूछ रहे थे ।,"सुन लेना, शायद कुछ कहना भी चाहते हों ।" बह घर मेरे लिए जेलज़ाने से बदतर है,और अगर उसे जल्द बुझाया न गया तो मुझे जलाकर खाक कर देगी,वह घर मेरे लिए जेलखाने से बदतर है उदास होकर बोली--मैंने आपसे कह दिया था कि मैं इन चीजों की भूखी नहीं हूँ ।,"पहचान गई, हृदय पर बोझ सा आ पड़ा ।",उदास हो कर बोली - मैंने आप से कह दिया था कि मैं इन चीजों की भूखी नहीं हूँ । घर्ममिह अषिकतर नोषपुर में हो रहता था ।,धर्मसिंह बड़ा उदार और कर्मवीर था ।,धर्मसिंह अधिकतर जोधपुर में ही रहता था । अभि में कमल खिल गया ।,"तुम मेरी तरफ देखो तो, मैं ही तुम्हारा दास, तुम्हारा उपासक, तुम्हारा पति हूँ ।",अग्नि में कमल खिल गया । "जो उन्हें मानता हो माने, हमको तो यु अपनी वही पुरानी चाल पसन्द है ।","तो भाई, ये सब बातें हमारे मान की नहीं है ।","जो उन्हें मानता हो माने, हम को तो अपनी वही पुरानी चाल पसंद है ।" जालपा भी कोठे से उतरी ; लेकिन नीचे आयी तो रमा का पता न था ।,"अगर उसी वक्त सगाई से सारी कथा कह दी होती, तो चाहे उस वक्त इन्हें बुरा लगता, लेकिन यह विपत्ति सिर पर न आती ।","जालपा भी कोठे से उतरी, लेकिन नीचे आई तो रमा का पता न था ।" "पिता ने कुछ सपत्ति भी न छोढ़ी, उलटे वधू का बोक और सिर पर लछाद दिया और खत्री भो मिली, तो पढी-लिखी, शौकीन, ज़वान की तेज़, जिसे मोटा खाने और मोटा पहनने से मर जाना कवूल था ।","पिता ऊँचे ओहदे पर थे, उनकी कोशिश से चन्द्रप्रकाश को कोई अच्छी जगह मिलने की पूरी आशा थी; पर वे सब मनसूबे धरे रह गये और अब गुजर-बसर के लिए वही ३०) महीने की टयूशन रह गई ।","पिता ने कुछ सम्पत्ति भी न छोड़ी, उलटे वधू का बोझ और सिर पर लाद दिया और स्त्री भी मिली, तो पढ़ी-लिखी, शौकीन, जबान की तेज जिसे मोटा खाने और मोटा पहनने से मर जाना कबूल था ।" वास्तव में विवाह के बन्धन में पड़ना ही अपने पेरों में कुल्हाड़ी मारना था।,भोजन तक नहीं कर सका।,वास्तव में विवाह के बन्धन में पड़ना ही अपने पेरों में कुल्हाड़ी मारना था। "वह घर पहुँचे तो इतने दुखी और हताश थे, मानो हाथों में हृथकड़ियाँ पड़ी हाँ ] प्रमोला ने घबराई हुईं आवाज़ में पूछा--हढ़ताल का क्‍या हुआ ?",न-जाने कब झपकी आ गयी और मैंने एक बुरा सपना देखा ।,"वह घर पहुँचे तो इतने दुखी और हताश थे, मानो हाथों में हथकड़ियाँ पड़ी हों ! प्रमीला ने घबड़ायी हुई आवाज में पूछा, ‘हड़ताल का क्या हुआ ?" दयानाथ और रामेश्वरी को यह कहकर शान्‍्त कर दिया गया था कि वह देवीदीन की विधवा बह है ।,यहाँ सभी उसके साथ घर के प्राणी का-सा व्यवहार करते थे ।,दयानाथ और जागेश्वरी को यह कहकर शांत कर दिया गया था कि वह देवीदीन की विधवा बहू है । इस बँगलेवाले आदमी कया हुए ?,डंड ही भरना पड़ेगा ।,इस बंगले वाले आदमी क्या हुए ? बच्चा पालने में सो रहा था,अब उसे लेन-देन से उतनी घृणा न थी,बच्चा पालने में सो रहा था जालपा ने छुरी ले ली ; पर कुछ बोली नहीं ।,"इसकी बिलकुल फिक्र मत करना कि क्या होगा, क्या न होगा ।","' जालपा ने छुरी ले ली, पर कुछ बोली नहीं ।" कहिए तो गोपी बाबू को भेज दूँ ।,"दस बजे घर से निकले थे, अभी तक पता नहीं ।",कहिए तो गोपी बाबू को भेज दूँ । आप अपने स्वाथ के भक्त हैं ।,रात-दिन यही मनाया करती कि भगवान् यहाँ से ले चलो ।,आप अपने स्वार्थ के भक्त हैं । जब अपर ने गाँवों की हालत उनसे बयान कर्मभूमि ३०१ को तो देखकर बोले--आपके मदहन्तजो ने फ़रमाया है सरकार जितनी मालगुजासे छोड़ दे में उतनी द्वौ लगान छोड़ देँगा,उनकी नाक इतनी लंबी और चिबुक इतना गोल था कि हास्य-मूर्ति लगते थे,जब अमर ने गाँवों की हालत उनसे बयान की तो हंसकर बोले-आपके महन्तजी ने फरमाया है सरकार जितनी मालगुजारी छोड़ दे मैं उतनी ही लगान छोड़ दूंगा "दण्ड दोनों द्ौ हैं, तो क्यों एक का प्रभाव पढ़ता है और दुधरे का वहीं ।","आप पूछेंगे, ऐसा क्यों है ?","दण्ड दोनों ही हैं, तो क्यों एक का प्रभाव पड़ता है और दूसरे का नहीं ।" उन्हें बुलाकर इन शब्दों में अपना अभिप्राय प्रकट फिवा- मित्रदृन्द [ श्राप अपनी जाति के दीपक हैं ।,कभी-कभी उनकी हँसी उड़ाते थे ।,उन्हें बुला कर इन शब्दों में अपना अभिप्राय प्रकट किया- मित्रवृन्द ! आप अपनी जाति के दीपक हैं । यहाँ सबसे अनुभवी जो दो डाफ्टर हैं उन दोनों हो पे मेने अपनों आरोग्य-परौक्षा कराई और दोनों दी ने स्पष्ट कह्दा €ि तुम्हें सिछ है ।,"मगर तुमसे मेरी अन्तिम विनय यही है कि बिरादरी से बाहर न जाना, नहीं तो परलोक में भी मेरी आत्मा को शांति न मिलेगी ।","यहाँ सबसे अनुभवी जो दो डाक्टर हैं, उन दोनों ही से मैंने अपनी आरोग्य-परीक्षा करायी और दोनों ही ने स्पष्ट कहा कि तुम्हें सिल है ।" "प्रभु सेवक-मामा, आप घोर अन्याय कर रही हैं ।",मातृस्नेह हाथों को रोके हुए था ।,"प्रभु सेवक-मामा, आप घोर अन्याय कर रही हैं ।" कौन ऐसा हृदयशूल्य प्राणी है जो निप्फास सेवा के वशीभूत न हो जाय |,"उस दिन जब प्रोफेसर भाटिया ने बातों ही बातों में मुझ पर व्यंग्य किये, मुझे वैभव और सम्पत्ति का दास कहा और मेरे साम्यवाद की हँसी उड़ानी चाही तो उसने कितनी चतुरता से बात टाल दी ।",कौन ऐसा हृदयशून्य प्राणी है जो निष्काम सेवा के वशीभूत न हो जाय । "उसे सुमन से बड़ी चिढ़ थी, जो नोकरों को उन छोटे मनुष्यों से होती है, जो उनके स्वामी के महलगे होते हैं।",जीतन बहुत प्रसन्न हुआ ।,"उसे सुमन से बड़ी चिढ़ थी, जो नोकरों को उन छोटे मनुष्यों से होती है, जो उनके स्वामी के मुँहलगे होते है ।" लेकिन मिस्टर मेहरा वहाँ दोज के किनारे हाथ में हएटर लिये माली की बाट जोहते रहे |,इस वक्त सामने आ जाय तो अधमुआ कर दूँ ।,लेकिन मिस्टर मेहरा वहाँ हौज के किनारे हाथ में हंटर लिए माली की बाट जोहते रहे । "उसे खूब याद था कि उसने यहीं ताक पर रख दिया था, लेकिन उसका वहाँ पता न था |",लपकी हुई स्नानघर में गई ।,"उसे खूब याद था कि उसने यहीं ताक पर रख दिया था, लेकिन उसका वहाँ पता न था ।" इधर महीनों से वह अतपनी-सी रहती थी ।,पास-पड़ोस की दुष्टाओं ने उसे बिगाड़ दिया था ।,इधर महीनों से वह अनमनी-सी रहती थी । बढ़े-बढ़े आदमी धर्मशाले में आते थे सैकड़ों-दज़ारों दान करते थे पर इस दुखिया पर किसी को दया न आती थी,इस नाते सारे गाँव का अतिथि हूँ,बड़े-बड़े आदमी धर्मशाला में आते थे सैकड़ों-हजारों दान करते थे पर इस दुखिया पर किसी को दया न आती थी "सामान तो पहले ही से जमा कर रखे थे, जाकर ले आना था ।",आपसे तो मुझे कोई शिकायत नहीं ।,"सामान तो पहले ही से जमा कर रखे थे, जाकर ले आना था ।" धम के काम मे मीन-मेप निकालना अच्छा नहीं |,सुजान की नम्रता का अब पारावार न था ।,धर्म के काम में मीनमेख निकालना अच्छा नहीं । बस एक दिन निकले और उसी दिन पुलिस ने पकड़ लिया ।,जालपा को सहसा इसका विश्वास न आया ।,बस एक दिन निकले और उसी दिन पुलिस ने पकड़ लिया । सुशीला को यह रकमे घर का बचा-खुचा सामान बेचकर चुकानी पड़ीं ।,बोरिया-बँधना लेकर पहुँच गये और डेरा डाल दिया ।,सुशीला को यह रकमें घर का बचा-खुचा सामान बेचकर चुकानी पड़ीं । वह क्‍या जानती है कि कंगन किसका है ?,क्या यह संभव है कि सुमन ने उसे यहाँ भेज दिया हो ?,वह क्या जानती है कि कंगन किस का है ? अपमान और लोक-निंदा का भय उसके दिल से मिटने लगा था ।,उससे पूछो कि हम लोगों में कौन-सी बातें हो रही थीं ।,अपमान और लोक-निंदा का भय उसके दिल से मिटने लगा था । मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं है ।,मुझे उसके जीवन से विशेष अनुराग हो गया था ।,मेरा तुमसे कोई सम्बन्ध नहीं है । अपनी भाव पर मर मिटती ीं,बोला-रहने दो मैं अभी बिछाए लेता हूँ,अपनी आन पर मर मिटती थीं अब आप लोग मुझे बधाइयाँ दे' ।,"उस पर भी तेरा काज सिद्ध होगा या नही , यह मै नहीं कह सकता ।",अब आप लोग मुझे बधाइयाँ दें । "सोचने लगे, मालूम नहीं, सुभद्रा ने किस नीयत से यह रुपये बचाए थे; मालुम नहीं, इनके लिए कौन-कौन से कष्ट सहे थे ।",इन रुपयों में हाथ लगाना उन्हें अतीब अनुचित प्रतीत हुआ ।,"सोचने लगे, मालूम नहीं सुभद्रा ने किस नीयत से यह रुपए बचाए थे, मालूम नहीं, इन के लिए कौन-कौन से कष्ट सहे थे ।" मामा ने लौट आकर कहा-वह तो बैठी रो रही हैं ।,"नायकराम-चुप रहो ठाकुरदीन, यह गुस्सा करने की बात नहीं, रोने की बात है ।",मामा ने लौट आकर कहा-वह तो बैठी रो रही हैं । ऐसी दलीलों पर गंभीर विचार किया हो न जा सकता था,अमरकान्त ने इस ज्ञानोपदेश का जवाब देने की जरूरत न समझी,ऐसी दलीलों पर गंभीर विचार किया ही नहीं जा सकता था सुमन---कयों,"सुमनबाई, मुझे लज्जित न करो, में तुम्हारे सामने मुँह दिखाने योग्य नहीं हूँ ।",सुमन - क्यों ? "एक दिन को बात हो, तो बर्दाश्त कर लो जाय ।",शायद ऊँची दुकान और फीके पकवान के कायल हैं ।,"एक दिन की बात हो, तो बरदाश्त कर ली जाय ।" "एक आम के वृक्ष में झला पड़ा था, बिजली की बत्तियाँ जल रही थीं, बच्चे झूला झूल रहे थे और रतन खड़ी झला रही थी ।","रतन का एकांत नीरस जीवन इन विषयों की ओर उसी भांति लपकता था, जैसे प्यासा पानी की ओर लपकता है ।","एक आम के वृक्ष में झूला पडा था, बिजली की बत्तियां जल रही थीं, बच्चे झूला झूल रहे थे और रतन खड़ी झुला रही थी ।" उनके जाते हो मिरजा ने फिर बाजी बिछा दो |,इस वक्त इधर तबीयत नहीं लगती ।,उनके जाते ही मिरज़ा ने फिर बाजी बिछा दी । "बहुत होगा, दो-चार महीने इवालात में रहना पड़ेगा ।","अगर पहले से मालूम होता कि कुआँ बनवाने की इतनी जल्दी है, तो यह काम छेड़ता ही क्यों ?","बहुत होगा, तो-चार महीने हवालात में रहना पड़ेगा ।" हेहरान में घर-घर आनंदोत्सव हो रद्दा था ।,"चलो, मैं तुम्हारे पीछे-पीछे चलूँगी ।",तेहरान में घर-घर आनंदोत्सव हो रहा था । कुछ देर तो शुघ्से के मारे तुम्दारा ख़त न खोला,क्या आप नाराज होंगे- मुझे तो यह खौफ नहीं है,कुछ देर तो गुस्से के मारे तुम्हारा खत न खोला "बहुत कम ऐसे व्यवसाय हैं, जिनमें १५ सेकड़े से अधिरू लाभ हो और वह भो बिना किप्ती फमठ के ।","प्रचुर स्थावर या जंगम सम्पत्ति पर १२ रु. सैकड़े सालाना सूद लिया जाता है, इससे कम ब्याज पर रुपया मिलना प्रायः असंभव है ।","बहुत कम ऐसे व्यवसाय हैं, जिनमें १५ रु. सैकड़े से अधिक लाभ हो और वह भी बिना किसी झंझट के ।" "दारोग़ाजी ने आकर रमा से कहा, तो वह चलने को तैयार हो गया ।",एक प्रेम-कथा थी ।,"दारोग़ाजी ने आकर रमा से कहा, तो वह चलने को तैयार हो गया ।" रानी का चेहरा तमतमा गया ।,कष्ट न करो ।,रानी का चेहरा तमतमा गया । यहाँ तक कि एक दिन दोनों प्रतियोगियों म॑ खुल्लमसुल्ला ठन गयी |,सिलिया पयाग पर अपना आधिपत्य जमाये रखने के लिए जान तोड़ कर परिश्रम करती ।,यहाँ तक कि एक दिन दोनों प्रतियोगियों में खुल्लमखुल्ला ठन गयी । घुविया चकमे में आ गई ।,कभी किसी का पैसा भी न दबाता था ।,बुढिया चकमे में आ गयी । छोय बहुत ईताश हो रहे है ।,आने-जाने के मार्ग चारों तरफ से बंद हैं ।,लोग बहुत हताश हो रहे हैं । करा चित्र लेकर क्या करोगे ?,' तो क्या दूकान पर बैठा मौज किया करता हूँ ।,मेरा चित्र लेकर क्या करोगे ? औरतें भूर्यनागंपण की और हाय उठा-उठा करे शब्रु को कोसती है ।,स्त्रियाँ पुरुषों और बालकों को जीवित रखने के लिए आप उपवास करती हैं ।,औरतें सूर्य नारायण की ओर हाथ उठा-उठा कर शत्रु को कोसती हैं । "एक महाशय कहते हैं, बहुत दिन हुए आपकी प्रेरणा से मैं अपने बडे भाई की मृत्यु के बाद्‌ उनकी सम्पत्ति का अधिकारी बन बैठा था ।","मुझे संसार में बहुत काम करना है, बहुत नाम करना है ।",एक महाशय कहते हैं-'बहुत दिन हुए आपकी प्रेरणा से मैं अपने बड़े भाई की मृत्यु के बाद उनकी सम्पत्ति का अधिकारी बन बैठा था । "बाली--हाँ, जूता तो पहने ये |",सोम. -जूता भी पहने थे ?,"बोली - हाँ, जूता तो पहने थे ।" इस पर सहिलाओं में समटकियाँ होने लगीं ओर थोडी देर में वे किसी- न-किसी बद्दाने से एक-एक करके चली गयीं ।,मैंने उन्हें भी ला कर कालीन पर बैठा दिया ।,इस पर महिलाओं में मटकियाँ होने लगीं और थोड़ी देर में वे किसी न किसी बहाने से एक-एक करके चली गयीं । वह उठे और वेग से चलती हुई गाड़ी पर से कूद पड़े ।,अतएव उन्होंने अपने कर्तव्य का निश्चय कर लिया ।,वह उठे और वेग से चलती हुए गाड़ी पर से कूद पड़े । अन्त में विवश द्दोकर दोनों महाशर्यों ने एक-एक सप्ताह की छुट्टी ली और अयोध्याजी चले |,हफ्तों पहले से तैयारियाँ होने लगीं ।,अन्त में विवश होकर दोनों महाशयों ने एक-एक सप्ताह की छुट्टी ली और अयोध्याजी चले । तब खिड़की के बाहर सिर निकालकर फूट-फूटकर रोने लगी ।,"मिस्टर क्लार्क को खुश करके गवर्नमेंट को खुश किया जा सकता था, पर प्रजा की जबान इतनी आसानी से न बंद की जा सकती थी ।",तब खिड़की के बाहर सिर निकालकर फूट-फूटकर रोने लगी । गाविन्दी का इतना आदर और मान उन्होंने कभी नहीं किया था |,"गोविंदी पलँग पर पड़ी हुई चिंता, नैराश्य और विषाद के अपार सागर में गोते खा रही थी ।",गोविंदी का इतना आदर और मान उन्होंने कभी नहीं किया था । भेरे फाबड़ा हाथ में लेने की देर थी सारा गाँव जम्ता हो गया और बात-दी-वात में सारा गाँव मऊ दो-गया,मैंने सारा कूड़ा आधा घंटे में साफ कर दिया,मेरे गावड़ा हाथ में लेने की देर थी सारा गाँव जमा हो गया और बात-की-बात में सारा गाँव झक हो गया "चलू गजाधर के पास, सम्भव है, वह घर झा गई हो ।","सुमन की इच्छा होगी, चली जाएगी ।","चलूँ गजाधर के पास, सम्भव है, वह घर आ गई हो ।" "मेरा ता खून सर्द हो गया, हल्घर के दानो हाथ एक खम्मे से वँघे थे, सारी देह धूल धूसरित हा रही थी; ओर' बह गमी तक सिसक रहे थे |",पिता जी ने जोर से डाँट कर पूछा-बोलता क्यों नहीं ?,"मेरा तो खून सर्द हो गया, हलधर के दोनों हाथ एक खम्भे से बँधो थे, सारी देह धूल-धूसरित हो रही थी, और वह अभी तक सिसक रहे थे ।" "डिन्‍्देंनि उनकी वह अनुपम - छवि देखी, वे बहुत दिनें तक याद रखेंगे ।",लोग इतिहास और भाषा छोड़-छोड़कर दर्शन की कक्षा में प्रविष्ट होने लगे ।,"जिन्होंने उनकी वह अनुपम छवि देखी, वे बहुत दिनों तक याद रखेंगे ।" "पर अब पाठशाला मे आप! सध्या समय एड जगह 'सागवत को कथा! कहने जाते, वहाँ से लौदझर ११-१९ बजे रात तद्य जन्म॑-कुण्ड- लिया, वर्षे-फछ आदि बनाया करते ।","उसने मुगलेआजम नाम के हीरे की प्रशंसा, उसकी करामातों की चरचा सुनी थी- उसको धारण करनेवाला मनुष्य दीर्घजीवी होता है, कोई रोग उसके निकट नहीं आता, उस रत्न में पुत्रदायिनी शक्ति है, इत्यादि ।","पर अब पाठशाला से आकर संध्या समय एक जगह 'भागवत की कथा' कहने जाते, वहाँ से लौट कर ११-१२ बजे रात तक जन्म-कुंडलियाँ, वर्ष-फल आदि बनाया करते ।" "मैं किसी फेल को कौमी ख्याल से पसन्दीदा नहीं समझता, जो इखज़ाकों तौर पर पसन्दीदा न हो ॥",पर पोलिटिकल मफाद की बिना पर में उसकी मुखालिफत नहीं कर सकता ।,में किसी फेल को कोमी खयाल से पसन्दीदा नहीं समझता जो इखलाकी तोर पर पसन्दीदा न हो । "जब माता का स्व्रगवास हुश्रा, तब पुत्र का शुमार ज़िले के गणय मान्य व्यक्तियों में दो गया था ।","कुन्दनलाल उससे कभी सन्तुष्ट भी हो सकते हैं, उनके उपदेशों की वर्षा कभी बन्द भी हो सकती है, यह प्रश्न उसके मन में बार-बार उठने लगा ।",जब माता का स्वर्गवास हुआ तब पुत्र का शुमार जिले के गण्यमान्य व्यक्तियों में हो गया था । "मनोरमा--चोधरी, तेरे पाँव पडती हूँ ।",सरिता-तट पर कँटीली झाड़िया थीं ।,"मनोरमा-चौधरी, तेरे पॉँव पड़ती हूँ ।" कई बार मरते-मरते बच गया हूँ ।,उसका एक भाग किराये पर उठा दिया ।,कई बार मरते-मरते बच गया हूँ । बजाजे में सियार लोटने लगे |,"कुछ बेसी दाम लग जाता है, पर रूपया तो देस ही में रह जाता है ।",बजाजे में सियार लोटने लगे । आपटे--तो फिर में आपको अपना अप्तल नाम भो बतलाये देता हूँ ।,"मेरा शरीर दुर्बल था, जेल की कड़ी मेहनत न हो सकती थी और अधिकारी लोग मुझे कामचोर समझकर बेंतों से मारते थे ।",आपटे- तो फिर मैं आपको अपना असल नाम भी बतलाये देता हूँ । सोने का एक भाभूषण और दो रुपये इनके हवाले छिये ।,अपने पहचान के एक सुनार को बुला रही थी ।,सोने का एक आभूषण और सौ रुपये इनके हवाले किये । नईम और गिरिघर भी भपने कुटत्य पर लज्ञित हुए ।,वह बेचारा पण्डित तो हमारे हाथ का खिलौना था ।,नईम और गिरिधर भी अपने कुकृत्य पर लज्जित हुए । "इनका मत है कि हिंसक पशुओं के हृदय में भी अनंत ज्योति की किरणें विद्यमान रहती हैं, केवल परदे को हटाने की जरूरत है ।","जिस राष्ट्र ने एक बार अपनी स्वाधीनता खो दी, वह फिर उस पद को नहीं पा सकता ।","इनका मत है कि हिंसक पशुओं के हृदय में भी अनंत ज्योति की किरणें विद्यमान रहती हैं, केवल परदे को हटाने की जरूरत है ।" "उन्होंने मन में सोचा, जो मनुष्य राग-रंग में इतना लिप्त है, वह इस काम में मेरी क्या सहायता करेगा ?",लेकिन विट्ठलदास उनके द्वार पर जा कर केवल इसलिए लौट आए कि उन्हें वहाँ तबले की गमक सुनाई दी ।,"उन्होंने मन में सोचा, जो मनुष्य राग-रंग में इतना लिप्त है वह इस काम में मेरी क्या सहायता करेगा ?" "शुभा ही नहीं, पूरा विश्वास था ।","जान सलामत रहे, तो माल फिर आ जाता है ।","शुभा ही नहीं, पूरा विश्वास था ।" उपज सारी-की-सारी खलिहान से उठ गई ।,वह मर्द कैसा कि औरत उसके कहने में न रहे ।,उपज सारी-की-सारी खलिहान से उठ गयी । अँत में लाचार हो कर बेठ रही ।,हाथ मल कर रह गयी ।,अंत में लाचार हो कर बैठ रही । एक क्षण के बाद फिर बोली- में इससे सहानुभूति फरने आई थी पर यहां से परास्त होकर जा रहो हूँ,मैं औरत हूँ और औरत का दिल इतना कड़ा नहीं होता लेकिन उनकी खुशामद तो मैं मरते दम तक नहीं कर सकती,एक क्षण के बाद फिर बोली-मैं इससे सहानुभूति करने आई थी पर यहाँ से परास्त होकर जा रही हूँ चौथा--देदी को प्रेरणा से इसकी यह कायापलट हुई है ।,"लैला तुम्हारी मलका होकर भी फकीरी की जिंदगी बसर करती है, तुम्हारी खिदमत में हमेशा मस्त रहती है ।",चौथा- देवी की प्रेरणा से इसकी कायापलट हुई है । "और छेग ते दावत खाने में जुटे हुए थे, घोर बढ मदनवाण-पीड़ित युवक बंठा सोच रहा था कि यह अभिलाषा क्योंद्र पूरी है ?",मित्रों की तो दिल्लगी थी और उस बेचारे की जान पर बन रही थी ।,और लोग तो दावत खाने में जुटे हुए थे; और वह मदन-बाण-पीड़ित युवक बैठा सोच रहा था कि यह अभिलाषा क्योंकर पूरी हो ? न »« सानकी जिड़ कर बोलो-पहले तो तुम वत्रीलो को इतनी विश व करते थे! »« इैवसचद्र ने उत्तर रिधा--ठद अनुभव न था ।,अगर कोई महाशय जातीय आंदोलन में शरीक भी होते हैं तो स्वार्थसिद्धि करने के लिए अपना ढोल पीटने के लिए ।,मानकी चिढ़ कर बोली-पहले तुम वकीलों की इतनी निंदा न करते थे ! ईश्वरचंद्र ने उत्तर दिया-तब अनुभव न था । "क्या बात है, क्‍यों मुझसे इतना छिपाते हैं ?","आख़िर वह लौटकर फिर तरकारी काटने लगी, पर उसका मन उसी ओर लगा हुआ था ।","क्या बात है, क्यों मुझसे इतना छिपाते हैं ?" सदन इन सभी गुणों से रहित था ।,"विचारों की स्वतंत्रता विद्या, संगति ओर अनुभव पर निर्भर होती है ।",सदन इन सभी गुणों से रहित था । नोकरों मे बातचीत हो रही थी ।,"‘ टामी ने अपनी श्वान-भाषा में कहा , ‘ अकेला नहीं जाता , तुम्हें साथ लेकर चलूँगा ।",नौकर में बातचीत हो रही थी । प्विर झुकाये भाइयों कौ स्वार्थभरी बात खुन-सुनकर कुछ कहने के लिए उतावला द्वो रहा था ।,कामतानाथ ने स्त्री की ओर प्रशंसा-भाव से देखा- फिर इसी साल हमें सीता का विवाह भी तो करना है ।,सिर झुकाये भाइयों की स्वार्थ-भरी बातें सुन-सुनकर कुछ कहने के लिए उतावला हो रहा था । "पण्डित के घामने दोनों शर्त रखो गई', तो बेचारा मिलबिला ठठा ।","हाँ, उसके एवज में मैं पचास दफा कान पकड़कर उठ-बैठ सकता हूँ ।","पण्डित के सामने दोनों शर्तें रखी गई, तो बेचारा बिलबिला उठा ।" उनका आना खल रहा था ।,अब रुपये चुक गये ।,उनका आना खल रहा था । साल-भर से ऊपर तो हो गया होगा ।,अब मेरे लिए तुम्हीं विनय की प्रतिच्छाया हो ।,साल-भर से ऊपर तो हो गया होगा । दूसरा साल बोत रहा है ।,"मगर आपने उन्हें यों सिर चढ़ा रखा है, यह मुनासिब नहीं ।",दूसरा साल बीत रहा है । त्योरियाँ चढ़ी हुई थीं ।,"नाश्ता करके रमा ने ख़त साफ किया, कपड़े पहने और दारोग़ा के पास जा पहुँचा ।",त्योरियां चढ़ी हुई थीं । "आपको उन यौोवन-रुमृतियों. . - सुलोचना बोल उठी--वह सुनाने की चीज़ नहीं है, दादा ! “ कुबर--मैं रामेंद्र बाबू को गेर नहीं समझता ।","किन्तु वे सामर्थ्यवान् होकर हमें न पूछें, हमारे यहाँ तीज और चौथ न भेजें, तो हमारे कलेजे पर साँप लोटने लगता है ।","आपको उन यौवन-स्मृतियों ... सुलोचना बोल उठी, 'वे सुनाने की चीज नहीं हैं, दादा !' कुँवर -'मैं रामेन्द्र बाबू को गैर नहीं समझता ।" जँंगले पर झुककर फिर उधर कान लगा दिये ।,"पहला ही वाक्य सुनकर जालपा सिहर उठी, दूसरे वाक्य ने उसकी त्योरियों पर बल डाल दिए, तीसरे वाक्य ने उसके चेहरे का रंग फीका कर दिया और चौथा वाक्य सुनते ही वह एक लंबी सांस खींचकर पीछे रखी हुई कुरसी पर टिक गई, मगर फिर दिल न माना ।",जंगले पर झुककर फिर उधर कान लगा दिए । सेवासदन क्‍ हे उन्होंने मना कर दिया ! समझ में नहीं श्राता कि यह लोग पॉलिटिक्स का क्या अर्थ लगाते हैं ।,मैंने इस मुआमिले में बड़े साहब से राय ली थी ।,उन्होंने मना कर दिया -- समझ में नहीं आता कि यह लोग पोलिटिक्स का क्या अर्थ लगाते है । मेरा भी कोई पत्र है ?,तुम खूब मिले ।,मेरा भी कोई पत्र है ? "उसके पीछे भी घुधिया जब तह रहे, आराम से रहे, किसीके सामने हाथ न फेलाये, इसी लिए वह मरता रहता था, जिसमें हाथ में चार पेसे जमा हो जायें ।","आलसिन लोभिन , स्वार्थिन बुढिया अपनी जीभ पर केवल मिठास रखकर नेउर को नचाती थी जैसे कोई शिकारी कँटिये में चारा लगाकर मछली को खिलाता है ।","उसके पीछे भी बुढिया जब तक रह आराम से रहे , किसी के सामने हाथ न फैलाये , इसीलिए वह मरता रहता था , जिसमे हाथ में चार पैसे जमाहो जाये ।" "भौतिक संसार से श्रब उस्ते कोई वात्ता च था, अब ठसका निवास कत्पना-ससार में था ।","कैलासी को देखते ही मग्न होकर बोलते- बेटी आओ, तुम्हें आज काश्मीर के दृश्य दिखाऊँ; कभी कहते, आओ आज स्विट्जरलैंड की अनुपम झाँकी और झरनों की छटा देखें; कभी ग्रामोफोन बजाकर उसे सुनाते ।","भौतिक संसार से अब कोई वास्ता न था, अब उसका निवास कल्पना-संसार में था ।" पत्तों पर खाबा ज्यों-कान्त्यों पढ़ा हुआ था ।,उनकी निगाह भी उस नींद की माती युवती पर पड़ी ।,पत्तलों पर खाना ज्यों-का-त्यों पड़ा हुआ था । "मेंने कहा--गोमती, अगर तुम्हारा मन मुमपे नहीं मिलता, तो सुझे छोड़ दो ।",' 'कैसी बे-सिर-पैर की बात कर रहे हो ?,"मैंने कहा, ‘ग़ोमती, अगर तुम्हारा मन मुझसे नहीं मिलता, तो तुम मुझे छोड़ दो ।" "मोदे ०--मैं तो जानता हूँ, रानी ने जान-बूककर कुत्ते को बुला लिया ।",' सोना - 'तुम्हार एको विद्या काम न आयी ।,"' मोटे - 'मैं तो जानता हूँ, रानी ने जान-बूझ कर कुत्ते को बुला लिया ।" एक बाहर सामान को मोटर पर लछाद रहा था और हरेक चीज को नोट-बुक पर टाँकता जाता था ।,' तीन कानिस्टिबिलों ने आकर सन्दूकचे और सेफ निकालने शुरू किये ।,एक बाहर सामान को मोटर पर लाद रहा था और एक हरेक चीज को नोटबुक पर टाँकता जाता था । "मेरा भनुभव तो यद्द है, कि नोची दुकान पर द्वो घड़े पकवान भिलते हैं ।","यह दोष न होते, तो वह दुकान बदनाम ही क्यों होती; पर इन्हें ऐसी ही गयी-बीती दुकानों की चीजें लाने का मरज है ।","मेरा अनुभव तो यह है, कि नीची दुकान पर ही सड़े पकवान मिलते हैं ।" साक्ष--वही तो में कहूँ कि महात्मा की बात केसे निष्फल हुईं ।,"सास- इसने कभी इसकी चर्चा ही नहीं की; नहीं, पाँच क्या दस ब्राह्मणों को जिमा देती ।",सास- वही तो कहूँ कि महात्मा की बात कैसे निष्फल हुई । सुखदा ने ऊपर ही से कहा मुद्दे भूख नहीं है,अमर आँगन में पहुँचा तो नैना ने भाभी को बुलाया,सुखदा ने ऊपर ही से कहा-मुझे भूख नहीं है "बडढे कितने ही मूर्ख हो , लेकिन दुनिया का तजरबा तो रखते हैं ।",बूढ़ियों के पाँव छू लेने में ही क्या हरज है ?,बुङ्ढे कितने ही मूर्ख हों ; लेकिन दुनिया का तजरबा तो रखते हैं । मैंने बहुत दिन हुए कंढाकद नहों खाया ।,अंधा आँखें पाकर भी संसार को ऐसे तृष्णापूर्ण नेत्रों से न देखेगा ।,मैंने बहुत दिन हुए कलाकंद नहीं खाया । तब सदन अपना सूट पहनकर गद॑ के साथ फिटन पर सैर करने निकलता ।,शाम को शर्माजी उसके लिए फिटन तैयार करा देते ।,तब सदन अपना सूट पहनकर गर्व के साथ फिटन पर सैर करने निकलता । "इसलिए मंयर गति से इधर-उधर ताकते, राहगीरो से बातें करते चले जाते थे कि लोग समझे वायु-सेवन करने जा रहे हैं ।",छ: महीने से दुष्ट ने सूद-ब्याज कुछ न दिया था और न कभी कोई सौगात लेकर हाजिर हुआ था ।,"कहलाते सेठ, चलते हैं पैदल इसलिए मंथर गति से इधर-उधर ताकते, राहगीरों से बातें करते चले जाते थे कि लोग समझें वायु-सेवन करने जा रहे हैं ।" "जाता हूं, महीने-दो-महोने जगछ-पहाड की बुर छानूँ गा ।","‘ मंगल ने दबी आवाज से कहा , ‘ याद क्यों नहीं है ।","जाता हूँ, महीने-दो-महीने जंगल, पहाड़ की धूल छानूँगा ।" सलोम--उन्हीं के छ्रौफ़ से तो यह भागे हुए हैं,बस अब सरकारी काम खत्म,सलीम-उन्हीं के खौफ से तो यह भागे हुए हैं बोली-सिर में दर्द है क्या ?,वह राजा साहब को जरूर राजी कर लेगी ।,बोली-सिर में दर्द है क्या ? रानी -परश्डित चिन्तामणि बड़े साधु प्रकृति एव विद्वान्‌ हैं ।,"सरकार, मैं किसी से वाद-विवाद नहीं करता; यह मेरा अनुशीलन (अभीष्ट) नहीं ।",रानी - 'पंडित चिन्तामणि बड़े साधु प्रकृति एवं विद्वान् हैं । "पर्म सह--जी नहीं, दोपहरी तक पहुँच जानी चाहिए।","मदनसिंह -- तुमने जो गाड़ियाँ भेजी है,वे कल शाम तक अमोला पहुँच जाएँगी ।","पद्मसिंह -- जी नहीं, दोपहरी तक पहुँच जानी चाहिए ।" यह रमेश के छूटने का उत्धव था |,गरीबों को भोजन कराया जा रहा था ।,यह रमेश के छूटने का उत्सव था । "जब लोग सड़क पर पहुँच, तो एक सिपाही ने कहा--मेहरिया बढ़ी वनमन दिखात है |","आप उनकी मोटरें रोकेंगे, तो नौकरी कैसे रहेगी ?","जब लोग सड़क पर पहुँचे, तो एक सिपाही ने कहा -मेहरिया बड़ी टनमन दिखात है ।" कठिन है विनय को आने पर राजी करना ।,तुम उसे किसी तरह अपने साथ लाओ ।,कठिन है विनय को आने पर राजी करना । इन दोनों मे जरूर सॉ5-गॉठ है ।,अब तुम कहते हो तो चली चलूँगी ।,इन दोनों में जरूर साँठगाँठ है । उसकी दशा दिनों-दिन बिगड़ती गयी ।,हरखू दालान में खाट पर पड़ा रहता ।,उसकी दशा दिनोंदिन बिगड़ती गई । "अगर एजेंट को माल्स हो जाय कि उसके स्वागत के लिए प्रजा पर कितने जुल्म ढाये जा रहे हैं, तो शायद वह यहां से प्रसन्ष होकर न जाय ।","अगर वह सभा-चतुर होता , तो जाहिरदारी के लिए ही इस भाषण को बड़े ध्यान से पढ़ता , उनके शब्द-विन्यास और भावोत्कर्ष की प्रशंसा करता और उसकी तुलना महाराजा बीकानेर या पटियाला के भाषणों से करता ; पर अभी दरबारी दुनिया की रीति-नीति से अनभिज्ञ था ।","अगर एजेन्ट को मालूम हो जाय कि उसके स्वागत के लिए प्रजा पर कितने जुल्म ढाये जा रहे हैं , तो शायद वह यहाँ से प्रसन्न होकर न जाय ।" योँ भगर टाठ उल्ठ देते तो कोई बात न थी ।,पण्डित- अब पछताने और अपने को कोसने से क्या फायदा ?,यों अगर टाट उलट देते तो कोई बात न थी । "मोती ने हीरा को कई कदम पीछे हट दिया, यहाँ तक कि वह खाई' में गिर गया ।","जब पेट भर गया , दोनों ने आजादी का अनुभव किया तो मस्त होकर उछलने-कूदने लगे ।","मोती ने हीरा को कई कदम पीछे हटा दिया , यहां तक कि वह खाई में गिर गया ।" कोई फौज तक न जाकर सशस्त्र पुलीस तक हो रह जाता था,गोरों का खून हुआ है,कोई फौज तक न जाकर सशस्त्र पुलिस तक ही रह जाता था केलास खूप समझता था कि यह केवल नईम को विनयणीलता है ।,कभी-कभी दोनों में मुलाकात भी हो जाती थी ।,कैलास खूब समझता था कि यह केवल नईम की विनयशीलता है । बाबूलाल समर गये कि यह मद्राशय इस समय शआपे मे नहीं हैं |,पंडित जी को उसकी चिंता न थी क्योंकि एक तो भुनगी दो-एक दिन भूखी रहने से मर नहीं सकती थी और यदि दैवयोग से मर भी जाती तो उसकी जगह दूसरा गोंड़ बड़ी आसानी से बसाया जा सकता था ।,बाबूलाल समझ गये कि यह महाशय इस समय आपे में नहीं हैं । कल्लेजा मज़बूत किया और एक बीस: कदम और चले,उन्होंने बढ़ कर हिरन को गर्दन पर उठा लिया और चले मगर मुश्किल से पचास कदम चले होंगे कि गर्दन फटने लगी पाँव थरथराने लगे और आँखों में तितलियाँ उड़ने लगीं,कलेजा मजबूत किया और एक बीस कदम और चले उधर से होता हुआ घर पहुँचा तो नोट गायब थे ।,यही निश्चय किया कि साथ लेता जाऊँ ।,उधार से होता हुआ घर पहुँचा तो नोट गायब थे । प्रस्टे-भर तक तहकीकात होती रही |,"मुहल्ले के कई आदमी पूछने लगे , बाबू जी कहाँ गये हैं ?",घंटे-भर तक तहकीकात होती रही । दोनो उन्मत्त होकर बछड़ों की भांति कुलेलें करते हुए घर की ओर दौढ़े ।,मारता तो दोनों सींगे नीची करके हुंकारते ।,’ दोनों उन्मत्त होकर बछड़ों की भांति कुलेलें करते हुए घर की ओर दौड़े । "भरुझे उन्होंने एक रिस्टवाच भेंट दी है, दिखाऊँ ९ ?","तुम खुद रोओ , मेरा अँगूठा रोये ।","मुझे उन्होंने एक रिस्टवाच भेंट दी है , दिखाऊँ ?" "हम उप नियमों से, जिस्हें पाझन करता हमारा कर्तस्य है, मुँह नहीं भोड़ सकते ।",कड़बड़ खत्री गर्म हो कर बोले-केवल यह घोषणा देश को भय से रहित नहीं कर सकती ।,हम उन नियमों से जिन्हें पालन करना हमारा कर्त्तव्य है मुँह नहीं मोड़ सकते । "अपने घर एक क्षण के लिए जाती और कच्चा-पक्‍्का खाना वनाकर फिर भाग आती, पर गजाधर उसकी इन वातों से जलता था|",सुमन कभी उसके पास से न टलती ।,"अपने घर एक क्षण के लिए जाती और कच्चा-पक्का बनाकर फिर भाग आती, पर गजाधर उसकी इन बातों से जलता था ।" ९ बजते-बजते समोप का रेलवे स्टेशन मिला,डॉक्टर ने उनको बहुत धान्यवाद देकर विदा किया,९ बजते-बजते समीप का रेलवे स्टेशन मिला पहले --थह आकाशवाणी है ।,"यशोदानन्द- बैठिए-बैठिए, पत्तल लगाये जा रहे हैं ।",पहले- यह आकाशवाणी है । "घर तो वह हैं, जहाँ रनेह और प्यार मिले ।",इस छोकरी ने हमारे घर को अपना समझा ही नहीं ।,घर तो वह है जहाँ स्नेह और प्यार मिले । "कपड़े अष्ट हुए वह अलग, देह अष्ट हुई वह अलग, आशिक क्षति जो हुईं वह अलग ।",तकदीर ठोंककर बैठ रहो और क्या ।,"कपड़े भ्रष्ट हुए , वह अलग , देह भ्रष्ट हुई , वह अलग , आर्थिक क्षति जो हुई , वह अलग ।" उमरा और हुक्राम रखसत हो जुके हैं ।,मुझे उम्मीद है कि आप भी मुस्लिम आबादी को उसके जायज हकों से महरूम न करेंगे ।,उमरा और हुक्काम रूखसत हो चुके हैं । तल्ोनता को अवस्था प्राप्त हो गईं ।,"वैधव्य यातना नहीं है, जीवोध्दार का साधन है ।",तल्लीनता की अवस्था प्राप्त हो गयी । "जाना चाहेगी, तो रेल पर भेज दूँगी ।","मैं कल ही जालपा का पता लगाऊँगी और वह यहाँ रहना चाहेगी, तो उसके आराम के सब सामान कर दूँगी ।","जाना चाहेगी, तो रेल पर भेज दूँगी ।" भुरूई धुन्नू घतीठे कोई भी तो नद्ों नद्गाता,फिर एक-एक करके सबने हाथ उठा दिए,भुलई पुन्नू घसीटे कोई भी तो नहीं नहाता अपनो मोपड़ी में आऋर अमर कुछ अनिश्चित दशा में खडा रह,उसका सारा वैधाव्य सारा मात्त्व आशीर्वाद बनकर उसके एक-एक रोम को स्पंदित करने लगा,अपनी झोंपड़ी में आकर अमर कुछ अनिश्चित दशा में खड़ा रहा भय उसके प्राणो' को मुट्ठी में लिये उप्तकी भात्म-एक्षा कर रह्दा था ।,दौड़कर उसे छाती से चिपटा लिया ।,भय उसके प्राणों को मुट्ठी में लिये उसकी आत्म-रक्षा कर रहा था । पीप में अनाज बिका पूरे ५००) का लाभ हुआ ।,"भिक्षुक , बाबा, इतना तो मुझसे उठ न सकेगा ।","पौष में अनाज बिका, पूरे ५००) का लाभ हुआ ।" सिपाही- आपके कहने से चछे जायें ?,रमेश यह अँधेर देखकर चुप बैठनेवाला मनुष्य न था ।,सिपाही- आपके कहने से चले जायँ ? "माना, सम्राज उसको निन्दा करता ।","उसने बहुत अच्छा किया कि माधुरी के कपट-जाल में न फँसा , नहीं तो उसकी न जाने क्या दुर्गति होती ।","माना , समाज उसकी निन्दा करता ।" तुम्दारे साथ कालेज की रौनक चली गईं,सुनती हूँ असामियों पर भी उतनी सख्ती नहीं करते,तुम्हारे साथ कॉलेज की रौनक चली गई "नौ बजे वह पढ़ाकर चले जाते, तव सदन स्नान-भोजन करके सोता ।",दूसरे दिन से मास्टर साहब सदन को पढ़ाने लगे ।,"नौ बजे वह पढ़ाकर चले जाते, तब सदन स्नान-भोजन करके सोता ।" सुवामा पास खड़ी थी,घर में बहुत कम आता था,सुवामा पास खड़ी थी थैली में कुछ है ?,नायकराम-हैं तो वह भी ।,थैली में कुछ है ? "दम भर बाद जब रोणनुद्दौा को सजा देने का प्रश्न उठा, तब दोनो आइप्रियो में इतना मतभेद हुआ कि बाद-बिवाद को नौबत जा गयो ।",मुल्की इन्तजाम करना क्या जानूँ ।,क्षण भर बाद जब रोशनुद्दौला को सजा देने का प्रश्न उठा तब दोनों आदमियों में इतना मतभेद हुआ कि वाद-विवाद की नौबत आ गयी । आँखों से आँसू बहने लगे ।,उसके चेहरे का रंग उड़ गया।,आँखों से आँसू बहने लगे। अपना पुरुष तो मारा-सारा फिरता है और भाप देश का उद्धार कर रहो हैं,विवाह के बाद उनकी द्वेष ज्वाला ठंडी हो गई थी,अपना पुरुष तो मारा-मारा फिरता है और आप देश का उधार कर रही हैं हा ! विषयभोग के सेवको ! तुम्हें नाच का नाम लेते लज्जा नहीं आती !,तुम्हारी काम तृष्णा को इस नाच का क्या आनन्द मिलेगा ।,हा! विषभोग के सेवकों! तुम्हें नाच का नाम लेते लज्जा नहीं आती । "व्यंग हृदय को इस प्रकार विदीरण कर देता है, जैसे छैनी बर्फ के-ट्ुुकड़े को ।",व्यंग और क्रोध में आग ओर तेल का सम्बन्ध है ।,"व्यंग हृदय को इस प्रकार विदीर्ण कर देता है, जैसे छैनी बर्फ के टुकड़े को ।" "कभी किसी के घर कभी किसी के घर, फागुन में पन्द्रह दिन बराबर गाना होता रहा ।","'यह कहकर जौहरी ने फिर हार को केस में रक्खा और इस तरह संदूक समेटने लगा, मानो वह एक क्षण भी न रूकेगा ।","कभी किसी के घर, कभी किसी के घर, गागुन में पंद्रह दिन बराबर गाना होता रहा ।" सेवकों की गिरफ्तारी से उनकी उत्सुकता और भी बढ़ गई थी ।,पर आप लोगों के सामने यह अपने मन की बातें न कहेगा ।,सेवकों की गिरफ्तारी से उनकी उत्सुकता और भी बढ़ गई थी । "मगर नहीं, भाषकों चार पन्ने रंगने पढ़ेंगे, चाहे जेसे लिखिए ।",मेरी अंतिम याचना है कि मेरे लिये आप शोक न कीजिएगा ।,"मगर नहीं, आपको चार पन्ने रंगने पड़ेंगे, चाहे जैसे लिखिए ।" दोनों ओर सघन द्क्षों की कतारे थीं ।,"जिस दिन झगड़े की नौबत आयेगी , कहीं डूब मरुँगी ।",दोनों ओर सघन वृक्षों की कतारें थी । आपने उसके लेख देखे हैं ।,इससे आप हमारी परेशानी का अनुमान कर सकते हैं ।,आपने उसके लेख देखे हैं । श्राँख बद करते समय सामने आ जातीं ; पर श्राँखे खोलते ही श्रद्श्व हो जाती थीं ।,"गाँव में सब मनुष्य-ही-मनुष्य थे, देवता एक भी न था, अतएव देवताओं का खाद्य पदार्थ कैसे मिलता ।",आँखें बन्द करते समय सामने आ जातीं; पर आँखें खोलते ही अदृश्य हो जाती थीं । "वैठक समाप्त होने पर सेठजी रामरक्षा के साथ अपने भवन पर पहुँचे, तो मालूम हुआ कि आज बही दुद्धा ख्ली उनसे फिर मिलने आयी है ।",आज डिस्ट्रिक्ट मैजिस्ट्रेट नियमानुसार इसकी घोषणा करेंगे और सूचित करेंगे कि नगर के माननीय पुरुषों की ओर से सेठ जी को धन्यवाद देने के लिए बैठक हुई है ।,"बैठक समाप्त होने पर सेठ जी रामरक्षा के साथ अपने भवन पर पहुँचे, तो मालूम हुआ कि आज वही वृद्धा उनसे फिर मिलने आयी है ।" दिल की बात कहिएगा ।,जॉन सेवक-पर ऐसे बेजोड़ और अस्वाभाविक विवाह कभी-कभी हो जाते हैं ।,दिल की बात कहिएगा । "यहाँवालों को विदख्ाप था कि अनूपा इतनी जल्द दूसरा घर करने पर राजी न होगी, दो-चार बार वह ऐसा कद्द भी खुकी थो ।","गाँव के आदमी जमा हो गये, पंचायत होने लगी ।","यहाँवालों को विश्वास था कि अनूपा इतनी जल्द दूसरा घर करने पर राजी न होगी, दो-चार बार वह ऐसा कह भी चुकी थी ।" "एक क्षण वह्शाँ खड़ी रही, फिर धीरे-धीरे कमरे से चली गई ।","यह हिन्दू-जाति है, जो अभी तक समय के क्रूर आघातों का सामना करती चली जाती है ।","एक क्षण वहाँ खड़ी रही, फिर धीरे-धीरे कमरे से चली गई ।" "नायकराम-यारो, सूरे को समझाओ ।",पर अंत में यह सारा पाप मेरे ही सिर पड़ेगा ।,"नायकराम-यारो, सूरे को समझाओ ।" ज्ञानू घशे देख कर कसा खुश होया अम्माँ और बाबू जो भी देखेंगे ।,अगर तीन महीने तक एक कौड़ी का भी अपव्यय न करूँ तो घड़ी मिल सकती है ।,ज्ञानू घड़ी देख कर कैसा खुश होगा ! अम्माँ और बाबू जी भी देखेंगे । "मेरी अपेक्षा जिन्हें रुपये मिलने का चौगुना चास है, उनकी नोयत बिगढ़ जाय, तो लज्जा और ढु-ख की बात है ।",घर वालों से खैरात या पुरस्कार के रूप में कुछ लेने की बात उसे अपमान-सी लगती थी ।,"मेरी अपेक्षा जिन्हें रुपये मिलने का चौगुना चांस है , उनकी नीयत बिगड़ जाय , तो लज्जा और दु:ख की बात है ।" आँखें फैलकर माथे पर जा पहुँचीं ।,' रमा के पैरों के नीचे से मिट्टी खिसक गई ।,आँखें फैलकर माथे पर जा पहुंचीं । "कहीं ठिकाना नहीं मिलता, नहीं तो इस माया के घोंसले में एक दिन भी न रहता ।",शायद उनकी दुष्टता ही उनकी दरिद्रता का कारण है ।,"कहीं ठिकाना नहीं मिलता, नहीं तो इस माया के घोंसले में एक दिन भी न रहता ।" "जिसने किसी रसणी को प्राप्त कर लिया, उसको मानों तकदीर खुल गई ।","मलोयोग और तपस्या के बलबूते पर नहीं, पत्नी के प्रभाव और आकर्षण के तेज पर ।","जिसने किसी रमणी को प्राप्त कर लिया, उसकी मानो तकदीर खुल गयी ।" "भद्- पुरुष ने कितने द्वी घरों को लूटा, कितनों ही का गला दुवाया और इस प्रकार धन-सचय किया, किसी को भी उन्हें श्रांख दिखाने का साहस न हुआ ।","बाप ऋण ले कर मर जाए, लड़का कौड़ी-कौड़ी भरे ।","भद्र पुरुष ने कितने ही घरों को लूटा, कितनों ही का गला दबाया और इस प्रकार धन-संचय किया, किसी को भी उन्हें आँख दिखाने का साहस न हुआ ।" "तब उसने तुम्दारा नाम, पता, ठिकाना पूछा ।",तुम स्नान करके नदी से तो मेरे साथ ही निकली थीं ।,"तब उसने तुम्हारा नाम, पता ठिकाना पूछा ।" तलाक़ को प्रथा यहाँ दो जाने दो फिर मालृम होगा कि हमारा जीवन कितना सुखी है,एक मैं कुल-मर्यादा के नाम को रोया करूँ लेकिन यह अत्याचार बहुत दिनों न चलेगा,तलाक की प्रथा यहाँ हो जाने दो फिर मालूम होगा कि हमारा जीवन कितना सुखी है कुछ मालूम हुआ ?,किस मुकदमे में सहादत देनी है ?,कुछ मालूम हुआ ? वह राजबर्मचारियें दो प्रजा पर अज्ाचार करते देखती थी और उसका कोमल हृदय तड़प ठठता था ।,"पर्वतों पर देवियाँ निकल-निकलकर नाचने लगीं, आकाश पर देवता नृत्य करने लगे ।",वह राजकर्मचारियों को प्रजा पर अत्याचार करते देखती थी और उसका कोमल हृदय तड़प उठता था । "अत में जब जयल में रहते-रहते जी उकता गया, तो जोषपुर घी आयी ।",मैं तलवार छोड़कर भागी ।,अंत में जब जंगल में रहते-रहते जी उकता गया तो जोधपुर चली आयी । नागिन ने बल खाकर कहा--तेरा मुँह मुलस दूँगी ।,रामसेवक के लहू मांस की भूख में वह अपना लहू और मांस सुखा चुकी थी ।,नागिन ने बल खाकर कहा-तेरा मुँह झुलस दूंगी । "यहाँ साबुन ओर तेढ लगातै- लगाते भोर हुआ जाता है, और कुछ अपर नद्दीं होता ।","हाँ, तुम्हारी-जैसी सूरत कहाँ से लावें ।",यहाँ साबुन और तेल लगाते-लगाते भौंरा हुआ जाता हूँ और कुछ असर नहीं होता । इसके पहले बुढ़िया कभी चिलम रखने को न पूछती थी ।,तीन दिन रमा की शहादात बराबर होती रही और तीनों दिन देवीदीन ने न कुछ खाया और न सोया ।,इसके पहले बुढिया कभी चिलम रखने को न पूछती थी । वह अ्रभी तक दस-स्यारह के धोखे में थी ।,वह आवाज उसकी नस-नस में गज उठी ।,वह अभी तक दस-ग्यारह के धोखे में थी । "तुम्हें तो पता नहीं है , पर यहाँ तुम्हारे वी्सों दुश्मन हैं |",यह चोट निशाने पर जा बैठी ।,"तुम्हें तो पता नहीं है , पर यहाँ तुम्हारे बीसों दुश्मन हैं ।" रेणुका उसक्नो जेबखचे के लिए जो रुपये देती वह सब-के-सब रझूमालों में जाते,यहां धर्म ने विभिन्नता और द्वेष पैदा कर दिया है,रेणुका उसको जेब खर्च के लिए जो रुपये देतीं वह सब-के-सब रूमालों में जाते "इसके तीन तो बड़े-बड़े धर्मशाले हैं, मुदा है पाखंडी ।",'रमा ने सिर हिलाया ।,"इसके तीन तो बड़े-बडे धरमशाले हैं, मुदा है पाखंडी ।" गले की आवाज़ बद-सी हो गई थी ; पर वह वाक्य सुनते ही वह सचेत ल ।,मुर्दों की तरह जीने से क्या फायदा ।,गले की आवाज बंद-सी हो गई थी; पर वह वाक्य सुनते ही वह सचेत हो गया । तुलसों सिर पीठते थे ।,"कोई सुभागी का बखान न करे, इसलिए वह अनायास ही उसे डाँटती रहती थी ।",तुलसी सिर पीटते थे । "श्रद्धा ने दुखित होकर कद्ा--अम्माजी, मे आपसे हज़ार बार विनय कर चुकी हूँ कि चाहे लौकिक-रूप मे कुमारी द्वी वयो न रहूँ; लेकिन हृदय से उनकी ब्याहिता हो चुकी |","कोकिला ने कहा, 'मैं तो तुझसे कह चुकी कि उनका अब वह मिजाज नहीं रहा ।","' श्रृद्धा ने दुखित होकर कहा, 'अम्माँजी, मैं आपसे हजार बार विनय कर चुकी हूँ कि चाहे लौकिक रूप में कुमारी ही क्यों न रहूँ; लेकिन ह्रदय से उनकी ब्याहता हो चुकी ।" "महिलाएँ कहती, बाप तो मर्द है, लेकित माँ केसी है, उसको ज़रा भो विचार नहों' कि दुनिया क्‍या कद्देगी ।","लड़की प्यारी सही, लेकिन शर्म और हया भी तो कोई चीज है ।","महिलाएँ कहतीं, बाप तो मर्द है, लेकिन माँ कैसी है उसको जरा भी विचार नहीं कि दुनिया क्या कहेगी ।" जवान ओऔरत थी ।,पयाग ने कहा -तो तू ही बाजार जाएा कर ।,जवान औरत थी । "चिन्ता०--मोटेराम, महारानी के सामने तुम्हे दृतनी कठु बातें न करनी चाहिये ।","मोटे - 'नहीं बेटा, दुष्टों को परमात्मा स्वयं दंड देता है ।","' चिंता. - 'मोटेराम , 'महारानी के सामने तुम्हें इतनी कटु बातें न करनी चाहिए ।" "शर्माजी सुभद्रा की व्यंगपूर्णा बातों को सुन-सुनकर मन में ऋभला रहे थे, पर धीरज के साथ वोले--इस तरह कोई पन्द्रह रुपए मासिक तो मैं दूँगा, शेष पाँच रुपए का बोझ तुम्हारे ऊपर है ।",संसार की रीति है कि पहले अपने घर में दिया जलाकर मस्जिद में जलाते हैं ।,"शर्माजी सुभद्रा की व्यंग्यपूर्ण बातों को सुन-सुनकर मन में झुँझला रहे थे, पर धीरज के साथ बोले -- इस तरह कोई पन्द्रह रुपए मासिक तो में दूँगा, शेष पाँच रुपए का बोझ तुम्हारे ऊपर है ।" दस-बारह कोस से आ रहा था ।,अब तक प्रकाश और चम्पा के बीच में कोई परदा न था ।,दस-बारह कोस से आ रहा था । बोस रुपये मिलते थे ।,मारे दर्द के हाथ फटा पड़ता था और सिर से अभी तक खून जारी था ।,बीस रुपये मिलते थे । अच्छी / रक्तम देते थे पर ईश्वर भला करे राय साहब का कि उन्होंने साफ़ कह दिया यह ज़मीन जानवरों की चराई के लिए छोड़ दी गई है और किसी दाम पर भी न उठाई जायगी,कई किसान इस गड्ढे का पट्टा लिखाने को तैयार थे,अच्छी रकम देते थे; पर ईश्वर भला करे रायसाहब का कि उन्होंने साफ कह दिया यह जमीन जानवरों की चराई के लिए छोड़ दी गई है और किसी दाम पर भी न उठाई जायगी आँखें निकल गईं,कुछ नहीं तो चार-पाँच सेर दूध होगा,आँखें निकल गईं और अब विलायती कपड़े भूलकर भी न बेचना ।,"भोजन के लिए तो ठिकाना ही नहीं, दंड कहाँ से दें ?",और अब विलायती कपड़े भूलकर भी न बेचना । नोच ही डाले ।,कुछ व्यस्त से रहते थे ।,नोच ही डाले । भव कोई दूसरा दाँव निकालना चाहिए ।,समझ गए कि मुंशीजी सावधान है ।,अब कोई दूसरा दाव निकालना चाहिए । "कभी दोपहर को खाया, तो कमी तीसरे पहर ।",उनसे सतर्क रहना हमारा कर्तव्य है ।,"कभी दोपहर को खाया, कभी तीसरे पहर ।" पेट में जेपे कोई बठा हुआ कुरेद रहा हो ।,अभी कल दोनों पक्ष एक-दूसरे के खून के प्यासे थे ।,पेट में जैसे कोई बैठा हुआ कुरेद रहा हो । "हम दरिद्र हैं, हमारी कमाई का एक पैसा भी फ़जल न खर्च होना चाहिए ।",क्या योरोप में गहनों का रिवाज नहीं है ?,"हम दरिक्र हैं, हमारी कमाई का एक पैसा भी फजूल न खर्च होना चाहिए ।" उमप्के दो लड़कियाँ थीं।,पड़ोसियों के यहाँ बेठी हुई गंगाजली का दुखड़ा रोया करती ।,उसके दो लड़कियाँ थी । "वह पढी*दिसो थी, में करिया अक्षर सेस बराबर ।",न-जाने मुझमें क्या बुराई देखी ।,"वह पढ़ी-लिखी थी, मैं करिया अक्षर भैंस बराबर ।" वह घर आज उससे छूटा जा रहा है |,मरनेवालों की स्मृतियों ने उसकी एक-एक ईंट को पवित्र कर दिया था ।,वह घर आज उससे छूटा जा रहा है । "महाराजा ने खड़े होकर कहा-आ गया यमदूत, आ गया ।","फिर जिसने दान लिया, संसार-भर का पाप हजम किया, तो फिर औरत की क्या बात है ।","महाराजा ने खड़े होकर कहा-आ गया यमदूत, आ गया ।" यह साहब बड़ा जल्लाद आदमी है ।,कुछ सूझ ही न पड़ता था कि क्या करें ।,यह साहब बड़ा जल्लाद आदमी है । "विक्रम की छोटी बहन थी, कोई ग्यारह साल की ।",जरा उम्र खिसकी और लौंडे मनाने लगे कि कब आप प्रस्थान करें और वह गुलछर्रे उड़ायें ।,"वह विक्रम की छोटी बहन थी , कोई ग्यारह साल की ।" अंत को यह शंका भी मिट गई ।,एक-एक लिफाफे को खोलकर देखने लगी कि कहीं रानी ने उसे किसी दूसरे लिफाफे में रख दिया हो ।,अंत को यह शंका भी मिट गई । "तोन-चार साल हुए, एक बार में उत्तके घर गया था ।",आदमी की सूरत से दूर भागता हूँ ।,"तीन-चार साल हुए , एक बार मैं उसके घर गया था ।" उसके आग्रह से समन कई दिन लगातार स्नान ..._ करने गयी और उसे अ्रनुभव हुआ कि उसका जी कुछ हल्का हो.रहा है|,"कहाँ तो उसे चिक के पास खड़े होने से मना किया था, मेलों में जाने ओर गंगास्नान करने से रोकता था, कहाँ अब स्वंय चिक उठा देता और सुमन को गंगास्नान करने के लिए ताकीद करता ।",उसके आग्रह से सुमन कई दिन लगातार स्नान करने गई ओर उसे अनुभव हुआ कि उसका जी कुछ हल्का हो रहा है । अपने हठ का खेद था ।,"आज मालूम हुआ कि स्त्रियों के सामने कोरी साफगोई नहीं चलती, वे लल्लो-चप्पो ही से राजी रहती हैं ।",अपने हठ का खेद था । "जैसे ग्रापने अबतक उसकी रक्ता की है, वही निगाह उस पर सदैव बनाये रखिएगा |","उनकी आहट पाते ही आँखें खोलीं और अनुमान से पहचान गयी, बोली- आप आ गये, बड़ी दया की ।","जैसे आपने अब तक उसकी रक्षा की है, वह निगाह उस पर सदैव बनाये रखिएगा ।" _रमा निराश होकर घर लौट आया ।,"अब तक मैंने रूपये की कोई फिक्र की होती न!' गंगू-'मैं क्या जानता था, आप इतना भी नहीं समझ रहे हैं ।",' रमा निराश होकर घर लौट आया । "हम मोटर से नहीं, पाँव-पाँव आये हैं ।",इसके साथ वह भी चक्कर खाकर गिर पड़ा ।,"हम मोटर से नहीं, पाँव-पाँव आये हैं ।" "वोे--कसम हैं हजर्त इमामहुसैन को, अब इसको ज़ांवर्यों नही कछूँगा ।",बदनाम दोनों हैं लेकिन आनंदी के साथ लोगों की सहानुभूति है गोपीनाथ सबकी निगाह से गिर गये हैं ।,बोले-कसम है हजरत इमामहुसैन की अब इसकी जाँबख्शी नहीं करूँगा । "विट्वुलदास--घवराइए नहीं, बहुत सीधी-सी द्तं है, वस यही कि श्राप जरा देर के लिए उसके पास चले जाएँ, वह आपसे कुछ कहना चाहती है |",पद्मसिंह ने विस्मित हो कर विट्ठलदास की ओर देखा ।,"बिट्ठलदास -- घबराइए नहीं, बहुत सीधी सी शर्त है; बस यही कि आप जरा देर के लिए उसके पास चले जाएं, वह आप से कुछ कहना चाहती है ।" उसके चंचल हृदय को इस ताक-भाँक में असीम आनन्द प्राप्त होता था ।,"सुमन कोई काम भी करती हो, पर उन्हें चिक की आड़ से एक झलक दिखा देती ।",उसके चंचल हृदय को इस ताक-झाँक में असीम आनन्द प्राप्त होता था । सुनीम तिजोरी को कुंजी माँगने गया,कई असामी रुपये लेकर आए,मुनीम तिजोरी की कुंजी माँगने गए अगर वह स्वार्थ-साधन पर अपना समर्पण नहीं करते तो कोई ऐसा काम नहीं करते जिसका यह दण्ड दिया जाय,उन्हें आशा थी कि सुखदा उनके घाव पर मरहम रखेगी पर सुखदा उन्हें अपने द्वार के सामने देखकर भी बाहर न निकली,अगर वह स्वार्थ साधन पर अपना समर्पण नहीं करते तो कोई ऐसा काम नहीं करते जिसका यह दंड दिया जाय कंगन को छिपाकर वाहर लाया और सन्दूक में रख दिया।,"उसने सोचा, चाची को खूब हेरान कर के तब दूँगा, अच्छी दिल्लगी रहेगी ।",कंगन को छिपा कर बाहर लाया ओर संदूक में रख दिया । "दौड़ जाओ पढ्टे, वेल छेते आओ), में तुम्दारा खाँचा देखता रहूंगा ।","देखो, वह रेंगता है ।","दौड़ जाओ पट्ठे, तेल लेते आओ, मैं तुम्हारा खोंचा देखता रहूँगा ।" बाप भी ऐसे बेहया होते हैं,ऐसा जी होता है माहुर खा लूँ,बाप भी ऐसे बेहया होते हैं "जिन लोगों के बढावे में आकर सुक्खू ने ठाकुर से छेड्छाड की थी, उनका दशन मिलना दुलंम हो गया |",अपने कारिंदे से बकाया लगान की बही माँगी ।,"जिन लोगों के बढ़ावे में आ कर सुक्खू ने ठाकुर से छेड़छाड़ की थी, उनका दर्शन मिलना दुर्लभ हो गया ।" "ऐसी वेदना होने लगी, मानों हृदय में शूल उठ रहा हो ।",तुम्हारा जी अब कैसा है?,"ऐसी वेदना होने लगी, मानो हृदय में शूल उठ रहा हो।" "कु अर साहब ने कोमल कण्ठ से कद्ा-हाँ जी, और क्या ।","मैं कहता हूँ , आपको मुझसे यह बात कहने का साहस कैसे हुआ ?","कुँवर साहब ने कोमल कण्ठ से कहा , हाँ जी, और क्या ।" "तब एक दूसरे से दिल की बात कहता था, भविष्य के मसून्रे बाँध जाते थे, आपस मे सहानुभूति थी ।",यह दुर्भावना इनके मन में आयी ही क्यों ?,"तब एक दूसरे से दिल की बात कहता था, भविष्य के मनसूबे बाँधे जाते थे, आपस में सहानुभूति थी ।" "भ्गर ज्षियों की हँसी की श्रावाज कभी मरदाने में जाती, तो वह तेवर बदले घर में झ्राता और भ्रपनी माँ को आड़े हाथों लेता |","सदन को घर से निकल भागना स्वीकार होता, इसके बदले कि वह घर की स्त्रियों को गंगा नहलाने ले जाए ।",अगर स्त्रियों की हँसी की आवाज कभी मरदाने में जाती तो वह तेवर बदले घर में आता ओर अपनी माँ को आड़े हाथों लेता । रूपरंग में वह हेठी नहीं ।,पुरूष मन का हो तो स्त्री उसके साथ उपवास करके भी प्रसन्न रहेगी ।,रूप-रंग में वह हेठी नहीं । बेचारा आजकल बहुत तंग है,मैंने भोला को देने को कहा है,बेचारा आजकल बहुत तंग है यह हार-जीत तो जिंदगानी के साथ है ।,"सूरदास-राजी ही है, बस उसे यही डर है कि तुम फिर मारने-पीटने लगोगे ।",यह हार-जीत तो जिंदगानी के साथ है । "बहतेरे साघु-सन्‍्त, योगी- यती, देश ओर भर्म जे सेबक आते रहते ह; पर से जाने क्‍यों कसी ऊे प्रति भेरे मन में भद्दा नहीं उत्पन्त होती ।","गद्गद कंठ से बोले , इसका तो कुछ काम न था, सेठ जी ! मैं भिक्षुक नहीं हूँ, आपका सेवक हूँ ।","बहुतेरे साधु-संत, योगी-यती देश और धर्म के सेवक आते रहते हैं; पर न जाने क्यों किसी के प्रति मेरे मन में श्रृद्धा नहीं उत्पन्न होती ?" एक महैला को गोलियों के सामने खड़ी देखकर कायरता भी लज्जित द्दो गईं,इन्हीं के आदेश से तो गोली चली है,एक महिला को गोलियों के सामने खड़ी देखकर कायरता भी लज्जित हो गई दिल में मुझे दयाहीन भौर क्रूर समभेगी ।,इससे तो यह विदित होता है कि उसने उसे छोड़ने का निश्चय कर लिया ।,दिल में मुझे दयाहीन और क्रर समझेगी । पं० बुद्धिराम काकी को देखते द्वी क्रोध से तिलमिला गये ।,"कोई दही खाकर चटकारता था, परन्तु दूसरा दोना मांगते संकोच करता था कि इतने में बूढ़ी काकी रेंगती हुई उनके बीच में आ पहुँची ।",पंडित बुद्धिराम काकी को देखते ही क्रोध से तिलमिला गए । "बक्स का ताला भी बन्द कर दिया था, किन्तु ओह, अब समझ में आ गया, कुंजी मेज पर ही छोड़ दी, जल्दी के मारे उसमे जेब मे रखना भूल गया, वद अभी तक भेज पर पडी है ।",विश्वास न हुआ ।,"बक्स का ताला भी बन्द कर दिया था, किन्तु ओह, अब समझ में आ गया, कुंजी मेज पर ही छोड़ दी, जल्दी के मारे उसे जेब में रखना भूल गया, वह अभी तक मेज पर पड़ी है ।" पोहला दा प्रायश्वित्त करना पड़ेगा ।,हरिहर- तो मुझ पर काहे बिगड़ते हो भाई ?,गोहत्या का प्रायश्चित्त करना पड़ेगा । "वह इसी सुमनवाई की बहिन निकली, भेया को ज्योंही मालुम हुआ, वे द्वार से बारात लौटा लाए ।",विवाह क्या हुआ एक अबला कन्या का जीवन नष्ट कर आए ।,"वह इसी सुमन बाई की बहन निकली, भैया को ज्योंही मालूम हुआ, वह द्वार से बारात लोटा लाए ।" घर सूना हो गया,थोड़ी देर में पालकी द्वार पर आयी,घर सूना हो गया "वाजबहादुर था तो कमजोर, पर अत्यन्त चपल और सतके, उस पर सत्य का विश्वास हृदय को और भी बलवान बनाये हुए था ।",स्वार्थ और देश-भक्ति में विरोधात्मक अन्तर है ।,"बाजबहादुर था तो कमजोर, पर अत्यंत चपल और सतर्क था, उस पर सत्य का विश्वास हृदय को और भी बलवान बनाए हुए था ।" "व्धों, यह देव- ताझों का नाच पसन्द नहीं है?","जंगल में जाकर देखो, मोर पर फेलाए केसा नाच रहा है ।","क्यों, यह देवताओं का नाच पसंद नहीं है ?" उसकी कितनी इच्छा होती कि रमा भी उसके साथ बैठता ।,स्वप्न देखते थे क्या ?,उसकी कितनी इच्छा होती कि रमा भी उसके साथ बैठता । यह हृदय-दाह जीवन के साथ ही शांत होगा ।,अपनी प्रेममय सहानुभूति से मेरी हृदयाग्नि को शांत करना चाहिए था ।,यह हृदय-दाह जीवन के साथ ही शांत होगा । "यह पाषाणहृदग, लम्पट, विवेक-शम्य जमादार इस समय एक अपरिचित खत्री के सतीत्व की रक्षा करने के लिए अपने प्राण तक देने पर तयार था, केवल इस नाते कि यह उसके पत्नी की सगिनी थी ।",चारों ओर सन्नाटा छाया था और उस नीरव अंधकार में मंगरु का करुण-विलाप किसी पक्ष की भांति आकाश में मंडला रहा था ।,"यह पाषाणहृदय लम्पट , विवेक शून्य जमादार इस समय एक अपरिचित स्त्री के सतीत्व की रक्षा करने के लिए अपने प्राण तक देने को तैयार था , केवल इस नाते कि यह उसकी पत्नी की संगिनी थी ।" मेरे ही इमप्रिन तो थे,मैं समझता हूँ अब उसकी हिम्मत न पड़ती होगी,मेरे ही हमसिन तो थे यह्‌ कहकर सुमन चली गई ।,"सुमन -- नहीं, वचन दे आयी हूँ ।",यह कह कर सुमन चली गई । केशव ने झुँकलाकर कहा--इसका यह अर्थ है कि तुम्दें मेरी परवाह नहीं है ।,विक्टोरिया-पार्क के एक निर्जन स्थान में दोनों आमने-सामने हरियाली पर बैठे हुए हैं ।,केशव ने झुँझलाकर कहा — इसका यह अर्थ है कि तुम्हें मेरी परवाह नहीं है ? साधारणतः महीना चढ़ जाने और बार-बार तकाजे चोरी १११ ऊकरने पर कहीं पैसे मिलते थे |,फिर क्या पूछना था ?,साधारणत: महीना चढ़ जाने और बार-बार तकाजे करने पर कहीं पैसे मिलते थे । मेरी वही जमीन लेने को कहते थे ।,सूरदास-पत्थर हाथ लगा ।,मेरी वही जमीन लेने को कहते थे । घड़ा में देखा तो भाठ बन रहे थे |,"मेरे कारण आपको इतना शोक हुआ, इसका मुझे बहुत दु:ख है, मगर भैया आवेंगे अवश्य, इसका मुझे विश्वास है ।",घड़ी में देखा तो आठ बज रहे थे । इस गाँव में कोई ज़ममींदार न रहता था,चौधरी का नाम गूदड़ था,इस गाँव में कोई-जमींदार न रहता था भाये क्यों नहों ?,चर-चर शोर हुआ मानो गाड़ी भी इस खेल में लड़कों के साथ शरीक है ।,आया क्यों नहीं ? "सारे राजनेतिक, आर्थिक, साम्राजिक, आचारिक प्रश्नों को म्मेसे व्याख्या को जाती थी, इतने विस्तार और गवेषणा के साथ कि विशेषज्ञ भी लोहा मान जाये ।","धन की कमी थी ही नहीं, उस पर माँ-बाप के अकेले बेटे ।","सारे राजनैतिक, आर्थिक, सामाजिक, आचारिक प्रश्नों की मुझसे व्याख्या की जाती थी, इतने विस्तार और गवेषणा के साथ, कि विशेषज्ञ भी लोहा मान जायें ।" भेड़ी' के झुण्ड में जाने का अवकाश ही न मिला ।,"मजदूरी करके घर लौटा, तो सबसे पहला काम जो उसने किया वह अपनी बछिया को बुद्धू के घर पहुँचाना था ।",भेड़ों के झुण्ड में जाने का अवकाश ही न मिला । "सातवें दिन जेनी सिविल सर्जन को लेकर आईं, तो मनहर का कहीं पता न था ।","न मित्रों को पहचान्ता, न नौकरों को ।",सातवें दिन जेनी सिविल सर्जन को लेकर आयी तो मनहर का कहीं पता नहीं था । मे घनीराम को भय हुआ करों यह मद्ाशय सस्ते न छूट जायें,एक बाबू साहब ने कहा-यहाँ किसी में इतना सामर्थ्य नहीं है,धानीराम को भय हुआ कहीं यह महाशय सस्ते न छूट जायें देवी ने घर लोटने के लिए कहा,उस कर्कशा के साथ उनका जीवन इस तरह कट रहा था मानो बिल्ली के पंजे में चूहा हो,देवजी ने घर लौटने के लिए कहा नित्य किसी सज्जन के पास जाते और उससे सहायता को याचना करते ।,उसे सुमन के पास जाने का साहस न हुआ ।,नित्य किसी सज्जन के पास जाते और उनसे सहायता की याचना करते । "रमा ने सोचा, एक बार फिर गंगू के पास चलूं ; शायद दृकान पर मिल जाय, उसके हाथ-पाँव जोड़, ।","सबेरे कुछ प्रबंध न हुआ, तो क्या होगा! यह सोचकर वह कांप उठा ।","रमा ने सोचा, एक बार फिर गंगू के पास चलूं, शायद दुकान पर मिल जाय, उसके हाथ-पांव जोडूं ।" रात को भोजन के साथ ढृष्णचन्द्र ने शान्‍्ता से सुमन का पता पूछा ।,किस मुहल्ले में रहती है ?,रात को भोजन के समय कृष्णचंद्र ने शांता से सुमन का पता पूछा । "कितवा द्वोनद्वार, कितना प्रतिभाशाली लड़का था ।","क्या तुमने समझा था, मैं दफ्तर से लौटकर आऊँगा ही नहीं, वहीं मेरी अंत्येष्टि हो जायगी ।","कितना होनहार, कितना प्रतिभाशाली लड़का था ।" "जब आज भी मंजूरी न आई, तो राजा साहब ने तार द्वारा पूछा ।","अगर पद-त्याग कर देते, तो दूसरा आदमी आकर सरकारी आज्ञा का पालन करता ।","जब आज भी मंजूरी न आई, तो राजा साहब ने तार द्वारा पूछा ।" लकड़ी घी आठा दाल सब बाज़ार से लाई है,दस बजे घर लौटा तो देखा सिल्लो आटा गूंथ रही है और नैना चौके में बैठी तरकारी पका रही है,लकड़ी घी आटा दाल सब बाजार से लाई है "बिलऊुल निरक्षर है , लेकिन फिर भौ वह ब्ाह्यण है और चाहता है. कि दुनिया उसकी अतिष्ठा और सेवा करे और क्यो न चाहे ?","आश्चर्य यह है कि उसे भंग-बूटी से प्रेम नहीं, जो इस श्रेणी के मनुष्यों में एक असाधरण गुण है ।",बिलकुल निरक्षर है; लेकिन फिर भी वह ब्राह्मण है और चाहता है कि दुनिया उसकी प्रतिष्ठा तथा सेवा करे और क्यों न चाहे ? र्र्ज इसरी बोली--मेरे तो तेंतर का नाम सुनते दी रोएँ खड़े हो जाते हैं ।,एक ने कहा- यह तो कहो बड़ी कुशल हुई कि बुढ़िया के सिर गई; नहीं तो तेंतर माँ-बाप दो में से एक को लेकर तभी शांत होती है ।,दूसरी बोली- मेरे तो तेंतर का नाम सुनते ही रोयें खड़े हो जाते हैं । इतमे दिनों ठोरुरें खाने से उसका इृंदय कोमल हो गया था |,महमूद को आज ज्ञात हुआ कि वह अच्छा डाक्टर है ।,इतने दिनों ठोकरें खाने से उसका हृदय कोमल हो गया था । "प्रेम का झाननद उसे कभी नहीं प्राप्त हुआ था, इस दुर्लभ रत्न को पाकर वह उसे हाथ से नहीं जाने देना चाहती थी ।",सुमन इस समय सदन के प्रेम जाल में फँसी हुई थी ।,"प्रेम का आनंद उसे कभी नहीं प्राप्त हुआ था, इस दुर्लभ रत्न को पा कर वह उसे हाथ से नहीं जाने देना चाहती थी ।" "आधीरात को जब घर में सन्नाण छा गया, तो हरनाथ चौधरी की कोठरी की चूल खिसकाकर अन्दर घुसा ।",मैं आज रुपये लूँगा ।,"आधी रात को जब घर में सन्नाटा छा गया, तो हरनाथ चौधरी के कोठरी की चूल खिसका कर अंदर घुसा ।" सरदार साहब ने कई महीने की दौड-धूप में इस विवाद्द को तब किया था ।,"शाहबाज़ खाँ बोले, हाँ, नेक और पाक-साफ रहना जरूर अच्छी चीज है, मगर ऐसी नेकी ही से क्या जो दूसरों की जान ले ले ।",सरदार साहब ने कई महीने की दौड़-धूप में इस विवाह को तै किया था । लल्लू ने उसकी गुड़िया मरोड़ दी,मजीद -- तो भई यह दोस्ती किस दिन काम आयेगी,लल्लू ने उसकी गुड़िया मरोड दी चौकीदार हाथ-पैर जोड़ने लगा ।,"अभी रिपोर्ट कर दूँ, तो नौकरी से हाथ धो बेठेगा ।",चोकीदार हाथ-पेर जोड़ने लगा । दयाकृष्ण की धम- निया में शतगुण वेग से रक्त दौड़ने लगा |,अन्त में उसी कुर्सी पर पड़ा-पड़ा बेसुधा हो गया ।,दयाकृष्ण की धामनियों में शतगुण वेग से रक्त दौड़ने लगा । सुजान महतो सुजान भगत हो गये |,"इस पर चारों ओर से उस पर बौछारें पड़ने लगीं , हाँ, तुम्हारे बाप-दादा जो खजाना छोड़ गये थे, यही उसके हाथ लग गया है ।",सुजान महतो सुजान भगत हो गये । "वारह आने तो बक मे जमा हो कर चुके थे, साढ़े तीन आने में मेला देखने की ठहरो |",मौलवी साहब मेले में बुलबुल लड़ाने जाएँगे ।,बारह आने तो बैंक में जमा ही कर चुके थे; साढ़े तीन आने में मेला देखने की ठहरी । अन्यथा साथ भार नहंस भौर ठप्तके दोस्त गिरधर पर पढ़ता ।,"यद्यपि चीजें बहुत महँगी थीं, लेकिन झंझट से नजात हो गई ।",अन्यथा सारा भार नईम और उसके दोस्त गिरिधर पर पड़ता । हम और तुम इस ससथा के शुभचिन्तऋक है ।,हमारी संस्था गरीबों की संस्था है ।,हम और तुम इस संस्था के शुभचिन्तक हैं । बिजली ने जो तपस्या की है वह इस प्रांत के ही नहीं इस राष्ट्र के इतिहास में अभूतपूव है,हाँ इसे तपस्या ही कहना चाहिए बड़ी कठोर तपस्या,बिजली ने जो तपस्या की है वह इस प्रांत के ही नहीं इस राष्ट्र के इतिहास में अभूतपूर्व है "मैं चाहूँ, तो आज इन सबों की जान बचा सकती हूँ ।","बहुत संभव था कि कोई शहादत न पाकर पुलिस इन मुलजिमों को छोड़ देती और उन पर कोई मुकदमा न चलाती, पर इस युवक के चकमे में आकर उसने अभियोग चलाने का निश्चय कर लिया ।","मैं चाहूँ, तो आज इन सबों की जान बचा सकती हूँ ।" ह गर्मियों के दिन थे ।,"उसे किसी बच्चे को डाँटने का भी अधिकार न था, सास फाड़ खाती थी ।",गर्मियों के दिन थे । कितनी भ्रधोगति है ! इन घुशात्मक विचारों से सदन को कुछ शान्ति हुई ।,"वे हृदय जिनमें विशुद्ध निर्मल प्रेम का स्रोत बहना चाहिए था, कितनी दुर्गध और विषाक्त मलिनता से ढँके हुए है ।",इन घृणात्मक विचारों से सदन को कुछ शांति हुई । भामा रोने लगी।,यह पहली होली थी कि पद्मर्सिंह घर नहीं आए ।,भामा रोने लगी । तुम्हें थाइसिस हो रहा है ।,अगर कोई लड़का बीमार होता तो उसे दवा देते।,तुम्हें थाइसिस हो रहा है। इन कामों में उसे जरा भी आलस्य न होता था।,"कभी-कभी पण्डित पद्मसिंह के लिए जलपान बना देती, कभी पान लगाकर भेज देती ।",उन कामों ने उसे जरा भी आलस्य न होता था । "रमा ने फिर कहा -- यहाँ अकेले पड़े-पड़े तुम्हारा जी घबराता रहा होगा ! जालपा ने तीत्र स्वर में कहा --- तुम कहते हो, मैंने गलती की : में समझती हूँ, मंने अच्छा किया ।","' जालपा ने मुँह उधर लिया, कोई उत्तर न दिया ।","रमा ने फिर कहा--'यहाँ अकेले पड़े-पड़े तुम्हारा जी घबराता रहा होगा! ' जालपा ने तीव्र स्वर में कहा--'तुम कहते हो, मैंने गलती की, मैं समझती हूँ, मैंने अच्छा किया ।" -बुढ़िया अंचल फैलाकर उसे दुआएं देती रद्दी,वह बड़ी-बड़ी पलकों से आँखें छिपाए देह चुराए शोभा की सुगंधा और ज्योति फैलाती हुई इस तरह निकल गई जैसे स्वप्न-चित्र एक झलक दिखाकर मिट गया हो,बुढ़िया आँचल फैलाकर उसे दुआएं देती रही में तो सोचती हूँ दुर्गा-पाठ बेठा दौजिए,पहलौंठी में बड़ा संकट रहता है,मैं सोचती हूँ दुर्गा-पाठ बैठा दीजिए सब कुछ कावर्ड के हाथ से है ।,मनहर उछलकर बोला-सच! सेक्रेट्ररी से कोई बातचीत हुई थी ?,सब कुछ कावर्ड के हांथो में है । इनके एक नये मित्र पैदा हो गये हैं ।,"मर गया, तो कोलाहल मचाने के लिए सब की सब आ पहुँचीं ।",इनके एक नये मित्र पैदा हो गये हैं । वह नखरे करने छगी ।,सहसा पार्क में एक स्त्री सामने से गुजरती है ।,वह नखरे करने लगी । "जब दिन में तीन बार भोजन श्रोर पचासों बार पान मिलता है, तो उसे 8 से ने काटा है, जो श्रपने घर जाय ! ?","' कोकिला ने मुस्कराते हुए पूछा, 'तो फिर विवाह के नाम से क्यों चिढ़ती है ?","जब दिन में तीन बार भोजन और पचासों बार पान मिलता है, तो उसे कुत्ते ने काटा है, जो अपने घर जाय ।" "द्ाय, कहाँ छिपाऊं ?",लुटे हुए पथिक की भाँति वह अपनी वह लकड़ी हाथ से न देना चाहता था ।,हाय कहाँ छिपाऊँ ? "जितका कुछ इबाव हैं, उनकी जीत होगी, जिनका चुछ दबाव नहीं है, वह वैचारें मारे जायंगे ।",तीसरी शंका-बनिये धन कमाना जानते हैं राज करना क्या जानें ।,जिनका कुछ दबाव है उनकी जीत होगी जिनका कुछ दबाव नहीं है वह बेचारे मारे जायँगे । "उस पत्र में कितना व्यंग था, इसकी झोर उन्होंने कुछ ध्यान नहीं दिया।",उन्होंने शर्माजी का पत्र पढ़ा तो एक थप्पड़ सा मुँह पर लगा ।,"उस पत्र में कितना व्यंग्य था,इसकी ओर उन्होंने कुछ ध्यान नहीं दिया ।" इसे तुम छोटी साधना मत सममको,हम देवतापन के उस दर्जे पर पहुँच गये हैं जब हमें दूसरों के रोने पर हँसी आती है,इसे तुम छोटी साधना मत समझो "तव उसने आकर सुभद्रा से कहा--बहुजी, एक बात पूछ, बुरा न मानना ।",भोलीबाई के अपने हृदयांकित चित्र से अपने एक-एक अंग की तुलना की ।,"तब उसने आकर सुभद्रा से कहा -- बहूजी एक बात पूछूँ, बुरा न मानना ।" धर रहा था ५ बहीं गमचम्द्र चले न ग हा ।,रात भर गाना होता रहा ।,डर रहा था कि कहीं रामचन्द्र चले न गये हों । तब दौड़ने लगे ।,कोई दोस्त होगा ?,तब दौड़ने लगे । फिर ऐसा जान पड़ा कि किसी पर मार पढ़ रही है ।,बीच-बीच में मुख्तार साहब और सिपाहियों के हृदय-विदारक शब्द आकाश में गूँज उठते ।,फिर ऐसा जान पड़ा कि किसी पर मार पड़ रही है । मनोराम ने तुरंत पंखा बंद करते हुए कद्ा--आपने क्यों कष्ट किया बावूजोी मुछ्ठे बुला लेते,वह धन कमा सकता था इसलिए उसके आचार-व्यवहार को पसंद न करने पर भी घर उसका गुलाम था,मनीराम ने तुरंत पंखा बंद करते हुए कहा-आपने क्यों कष्ट किया बाबूजी- मुझे बुला लेते फिर रोती हुईं बोली--इस दग्राबाज़ी का मैं इसे मज़ा चखाऊंगी ।,क्रोधावेश के कारण वह काँप उठी ।,फिर रोते हुये बोली-इस दगाबाजी का मैं इसे मजा चखाऊंगी । सबसे बुरी दशा बजरंगी की थी ।,"बस, मेरे कहने-भर की देर है ।",सबसे बुरी दशा बजरंगी की थी । उसकी भाँसों के सामने पूव॒विश्या की स्मृतियाँ मदोहर स्वप्न की भाँति आने लगीं ।,एक-एक वक्तृता के लिए मुझे कई-कई हजार पौंड दिये जाते थे ।,उसकी आँखों के सामने पूर्वावस्था की स्मृतियाँ मनोहर स्वप्न की भाँति आने लगीं । निकाल कोई मज़ेदार चीज़ १ अभी हाल में विज्ञयत से पारचल भाया है ।,"तभी तो यह हुक्म दिया है, नहीं तो इनके मिज़ाज ही न मिलते थे ।",निकालूँ कोई मजेदार चीज ! अभी हाल में विलायत से पारसल आया है । छ बजे शाम को बरात चलने का मुहूत्त था ।,"मुंशी जी बहुत गरम पड़े, हरजाने की धमकी दी, पर कुछ फल न हुआ ।",छह बजे शाम को बारात चलने का मुहूर्त था । "चलो, में तुम्हें पहुँचा दूँ ।","बालक पर कभी दया आती , कभी प्यार आता , कभी घृणा आती ।","चलो , मैं तुम्हें पहुँचा दूँ ।" "उसके चेहरे पर एक प्रकार का गव था, मानों उसकी आत्मा जागरिन हो गयी ऐ ।","हम इस अस्वाभाविक जीवन, इस सभ्यता के तिलिस्म से बाहर निकलने की चेष्टा नहीं करते ।","उसके चेहरे पर एक प्रकार का गर्व था, मानो उसकी आत्मा जागरित हो गई है ।" _ रूपा कूदती हुई हीरा के घर चली,थाली में खाने का गौरव पाने के लिए रूपा होरी के साथ खाती थी,रूपा कूदती हुई हीरा के घर चली ज़रा देर में जार्जटाउन आ गया ।,दारोग़ाजी को शक हुआ ।,ज़रा देर में जार्जटाउन आ गया । में वहाँ से इंटरों की भार खाकर आपकी शरण थाया हूँ ।,"मुझे घर का भेदी, जासूस या विभीषण न समझिए ।",मैं वहाँ से हंटरों की मार खाकर आपकी शरण आया हूँ । भाश्चय की बात तो यह थी कि दूसरे गांवों के चमारों ने भी मुरदा-माँस खाना छोड़ दिया,मगर क्या भाभी बहुत बिगड़ी थीं- गूदड़ बोला-बिगड़ी ही नहीं थी भैया वह तो जान देने को तैयार थी,आश्चर्य की बात तो यह थी कि दूसरे गाँव के चमारों ने भी मुरदा माँस खाना छोड़ दिया सब मीठे पद्माथ समान रोच- कता नहों रखते ।,"यदि मैं कह दूँ 'हाँ' तो आप चिल्ला उठोगे कि पण्डितजी तुम बावले हो, इसलिए मैं कहूँगा, 'नहीं' और बारम्बार 'नहीं' ।",सब मीठे पदार्थ समान रोचकता नहीं रखते । ँ विट्ूल--परह सामान क्या होंगे ?,"सुमन -- यहाँ की कोई वस्तु साथ न ले जाऊँगी, यह वास्तव में मेरा पुनर्जन्म हो रहा है ।",विट्ठलदास -- यह सामान क्या होंगे ? गौरा को मेंगरू से इस निष्ठुरता की आशा न थी ।,"लेकिन पाँच हजार की सम्पत्ति को इस तरह छोड़ देना कि उसका ध्यान ही न आवे, प्रकाश के लिए असम्भव था ।",गौरा को मेंगरु से इस निष्ठुरता का आशा न थी । "अगर तुम्हारे पुरुष ने कोई तरका नहीं छोड़ा, तो तुम अकेली रहो चाहे परिवार में, एक ही बात हैं ।",तुझे उनका अपमान करते लज्जा न आई ?,"अगर तुम्हारे पुरूष ने कोई लङका नहीं छोडा, तो तुम अकेली रहो चाहे परिवार में, एक ही बात है ।" "वह जन छिसी मलेप्नानस के द्वार पर जाते हैं, तो गिठ-गिद़ादर द्वाथ नहीं फेलाते और झूठ-पूठ आशीर्वाद वहीं देने लगते कि, “नारायण वुम्दवारा चोला मस्त रखे, तुम सदा सुखी रहो ।","कौन जाने, दो-चार प्राण ही दे दें तो हमारे मुँह पर सदैव के लिए कालिख पुत जायगी ।","यह जब किसी भलेमानस के द्वार पर जाते हैं, तो गिड़-गिड़ाकर हाथ नहीं फैलाते और झूठ-मूठ आशीर्वाद नहीं देने लगते कि 'नारायण तुम्हारा चोला मस्त रखे, तुम सदा सुखी रहो ।" करुणा पछाड़ खाकर गिर पड़ी ।,"देखा, सामने कोई नहीं है ।",करूणा पछाड़ खाकर गिर पड़ी । "जिस प्रकार इन दोनों राजफुमारों में मित्रता थी, उसी प्रकाए दोनों हाजेकुमारियाँ सी एक दूसरे पर जात देती भीं ।",पाप को तो वह अपने पास भी नहीं फटकने देती थी ।,जिस प्रकार इन दोनों राजकुमारों में मित्रता थी उसी प्रकार दोनों राजकुमारियाँ भी एक दूसरी पर जान देती थीं । में हत्यारिनी नहीं हू,पुलिस सुपरिंटेंडेंट ने पूछा-तेरी इन आदमियों से कोई अदावत थी- भिखारिन ने कोई जवाब न दिया,मैं हत्यारिन नहीं हूँ मगर तुम अपने दिल से उन्हें क्षमा कर दो ।,तुम्हारे पिता का सारा जीवन स्वार्थ-सेवा में गुजरा है और वह अभी तक उसका उपासक है ।,मगर तुम अपने दिल से उन्हें क्षमा कर दो । कुछ दूर चलने के बाद प्रमील्ा एक गली में सुढ़ी ।,इसके पहले भी कितनी ही बार यह प्रश्न उठा था और या ही छोड़ दिया गया था ; लेकिन न जाने क्यों नेउर ने अपनी डिग्री कर ली थी और उसे निश्चय था कि पहले मैं जाऊंगा ।,कुछ दूर चलने के बाद प्रमीला एक गली में मुड़ी । "जब-जब मैंने इसका इशारा किया, उन्होंने ऐसा मुँह बताया, गोया वह यह बात सुनना भी नहीं चाहतीं ।",बस वही शाम को मौका मिलता था ।,"जबजब मैंने इसका इशारा किया, उन्होंने ऐसा मुँह बनाया, गोया वह यह बात सुनना भी नहीं चाहतीं ।" यही हो सकता है कि में घर की किसी बात से सरोकार न रखूँ,बच्चों की भांति उन्हें भी तुम सेवा और भक्ति से ही अपना सकते हो,यही हो सकता है कि मैं घर की किसी बात से सरोकार न रखूं वसुधा झाट पर पढ़े-पढ़े कुअर साइब को शुश्रुषाओं में अलोकिक आनन्द और सम्तोष छा अनुभव किया करती ।,"कुँवर साहब ने वसुधा के सिर के नीचे तकिया सीधा करके कहा , कचूमर तो हम लोगों का निकल जाता है ।",वसुधा खाट पर पड़ी-पड़ी कुँवर साहब की सुश्रुषाओं में अलौकिक आनन्द और सन्तोष का अनुभव किया करती । इस घाव पर कोमल शब्दों के मरहम को ज़दरत थो--कोई उसे लेटाकर उप्तके घाव को फाहे से धोये उस पर शीतल लेप करे,उन्हें आज घोड़े का आसन मिल गया था,इस घाव पर कोमल शब्दों के मरहम की जरूरत थी-कोई उन्हें लिटाकर उनके घाव को गाहे से धोए उस पर शीतल लेप करे "क्ृतज्ञता से भरे हुए स्वर से बोली --- तुम जितना कहो, उतना देने को तैयार हूँ ।",जालपा ने कंगन निकालकर रतन के हाथों में पहना दिए ।,"कृतज्ञता से भरे हुए स्वर से बोली, 'तुम जितना कहो, उतना देने को तैयार हूँ ।" "भला खट्या कौन देगा ! हमारे उष्ले, सेठे, भूसा, लकड़ी थोड़े ही हैं कि जो चाहें उठा ले जाय |",हँसी तो हमारी होगी ।,"भला खटिया कौन देगा ! हमारे उपले, सेंठे, भूसा, लकड़ी थोड़े ही हैं कि जो चाहे उठा ले जायें ।" "एक आदमी का जीवन इतना मूल्यवान्‌ नहीं है, कि उसके लिए असख्य जाने ली जाये ।","उन्होंने प्रमीला से कहा, ‘मैं जाकर सबके सामने अपना अपराध स्वीकार किये लेता हूँ ।",एक आदमी का जीवन इतना मूल्यवान् नहीं है कि उसके लिए असंख्य जानें ली जायँ । इलायची-पान खाकर उन्होंने अपनी व्रिपत्ति-कथा सुनानी शुरू की--- कुसुम के विवाह मे तो आप गये ही थे ।,अधिकांश कलाविदों की भाँति मैं भी शब्दों से आन्दोलित नहीं होता ।,इलायची-पान खाकर उन्होंने अपनी विपत्ति-कथा सुनानी शुरू की-- 'कुसुम के विवाह में आप गये ही थे । दूसरे ने समर्थ किया-- इतनी दूर से दोनों अकेले चले आये ।,"जिसे उन्होंने अपना घर समझ रखा था , वह आज उनसे छूट गया ।",’’ दूसरे ने समर्थन किया- ‘‘ इतनी दूर से दोनों अकेले चले आए । तुम्हारी रूह कठ्ज करने आझे हैं ।,सहसा किसी की आहट पा कर वह चौंक पड़े ।,तुम्हारी रूह कब्ज करने आये हैं । "साहब इछंगे तो साफ़ कह दूँगा, मैं सर्जन के पास गया था, उसने छुट्टी नहीं दी ।","' मुंशी-'छुट्टी के लिए दरख्वास्त तो भेज दी थी, मगर साहब मैंने डाक्टरी सर्टिफिकेट नहीं भेजी ।","साहब पूछेंगे तो साफ कह दूँगा, मैं सर्जन के पास गया था, उसने छुट्टी नहीं दी ।" "घर लौटे तो सीधे गंगाजली के पास जाकर बोले--लो वहिन, मनोरथ पूरा हो गया ।",उमानाथ स्नान करने गए ।,"घर लोटे तो सीधे गंगाजली के पास जाकर बोले -- लो बहिन, मनोरथ पूरा हो गया ।" इसी का यह परिणाम है कि दुर्बल झात्माप्रों का साहस इतना बढ़ गया है ।,"हम अपनी कायरता से, प्राण भय से, लोक निंदा के डर से, झूठे संतान प्रेम से, अपनी बेहयाई से, आत्मगोरव की हीनता से, ऐसे पापाचरणों को छिपाते है, उन पर परदा डाल देते है ।",इसी का परिणाम यह है कि दुर्बल आत्माओं का साहस इतना बढ़ गया है । सोचा में नहीं खोलता तो नहीं मालूम और कितनी मार पड़े ।,देखूँ ऐसा कौन बड़ा सिद्ध है जो कराही का रस उड़ा देता है ?,सोचा मुँह नहीं खोलता तो नहीं मालूम और कितनी मार पड़े । मुझे न्याय का बल था ।,उन्हें भी तो अपना खर्च है ।,मुझे न्याय का बल था । "जात पर खेलकर नादिरशाद के सामने पहुँचा, और यद्द शेर पढ़ा -- कसे न माँद कि दीगर ब तेरे चाज् कुशी ; मगर छि ज़िदा कुनी खल्क़ रा व बाज कुश |","असहायों पर, दुर्बलों पर, स्त्रियों पर उन्हें क्रोध नहीं आता ।",जान परखेल कर नादिरशाह के सामने पहुँचा और यह शेर पढ़ा- कसे न माँद कि दीगर व तेगे नाज कुशी; मगर कि ज़िंदा कुनी खल्करा व बाज़ कुशी । “ल तो जाता पर महाजन भी तो उसके साथ होगा ।,"' 'हाँ, मालूम तो होता है ।",टल तो जाता पर महाजन भी तो उसके साथ होगा । झ्राज वह बहुत देर तक बैठा रहा ।,वह इस बहुमूल्य वस्तु को इस प्रकार भेंट करना चाहता था मानो वह कोई अति सामान्य वस्तु दे रहा हो ।,आज वह बहुत देर तक बेठा रहा । "देवीदीन ने तुरन्त अपनी गठरी खोली, उसमें से एक दरी निकाली, और तख्त पर ब्िछाकर बोला -- तुम यहाँ आकर लेट रहो भैया, में तुम्हारी जगह पर बैठ जाता हूँ ।","' जालपा-'लालाजी के सामने तो वह सिर तक नहीं उठाते, पान तक नहीं खाते, भला झगडा क्या करेंगे ।","देवीदीन ने तुरंत अपनी गठरी खोली, उसमें से एक दरी निकाली, और तख्त पर बिछाकर बोला, 'तुम यहाँ आकर लेट रहो, भैया! मैं तुम्हारी जगह पर बैठ जाता हूँ ।" "छालटेन डिये बाहर निकले तो देबइत्त रोता हुआ उनके पैरों से छिपट ग्रया और बोला--वैद्य जी, इस समय मुझ्नपर दया कीजिए ।",यह एक विस्तृत मैदान था ।,लालटेन लिये बाहर निकले तो देवदत्त रोता हुआ उनके पैरों से लिपट गया और बोला-वैद्य जी इस समय मुझ पर दया कीजिए । कम से कम इन युवकों की बातचीत से ऐसा ही टपकता था ।,"उसके मन में कितनी ही बार इच्छा हुई कि देवीदीन से कह दूँ, पर बात होंठों तक आकर रूक जाती थी ।",कम-सेकम इन युवकों की बातचीत से ऐसा ही टपकता था । ठीक यही बात है ।,"उसी दिन की बात है, जब मैं सोफी की लताड़ सुनकर उदयपुर जा रहा था ।",ठीक यही बात है । "एक स्नी--गाने-बजानेवाले को घुलाओ, पा9्नोवियसत शरीफ दै ।",जनसत्तावाद का सबसे निर्बल अंग यही है ।,"एक स्त्री- गाने-बजानेवालों को बुलाओ, पासोनियस शरीफ है ।" हृदयनाथ- जो रास्ता निकालता हूं वह्दी कुछ दिनों के वाद किसी दलदल में फंसा देता है ।,"तब हृदयनाथ ने जागेश्वरी से कहा- जान पड़ता है, बहुत जल्द यह पाठशाला भी बन्द करनी पड़ेगी ।",हृदयनाथ- जो रास्ता निकालता हूँ वही कुछ दिनों के बाद किसी दलदल में फँसा देता है । "अगर यह बात न होती, तो इस स्मणी को इस तरद्द देखकर दम लोग यो' न चले जाते ।","पुरुष का जौहर उसकी जवानी नहीं, उसका शक्ति सम्पन्न होना है ।",अगर यह बात न होती तो इस रमणी को इस तरह देखकर हम लोग यों न चले जाते । जमी इन लोगों के पास इतने रुपये आते हैं ।,"दोपहर तक घास छीलती है, तीसरे पहर बाजार जाती है ।",तभी इन लोगों के पास इतने रूपये आते हैं । उसका नाम होगा--“दम्पति-सुख-शान्ति-विल' ।,"मैं तो कानून को ईश्वर से ज्यादा सर्वव्यापी , सर्वशक्तिमान् समझती हूँ ।",उसका नाम होगा --दम्पति-सुख-शान्ति बिल । इतने में रुखू भी अन्दर आ गया ।,उसकी व्यंजना-शक्ति उछल-कूद और नेत्रों तक परिमित थी-तालियाँ बजा-बजाकर नाच रही थी ।,इतने में रग्घू भी अन्दर आ गया । बाजबहादुर--इमने कह दिया कि चुगली न खारयँंगे लेकिन मंशीजी ने पूछा तो भ्ूठ मी न बोलेंगे ।,बाजबहादुर-यह झूठ मुझसे न बोला जाएगा ।,"बाजबहादुर-हमने कह दिया कि चुगली न खायँगे लेकिन मुंशीजी ने पूछा, तो झूठ भी न बोलेंगे ।" "जी चाहता था, ज़मीन फट जाय और में समा जाऊ ।","जितनी घास चाहे छील ले, मेरा ही खेत है ।",जी चाहता था; जमीन फट जाय और मैं समा जाऊँ । पद्मसिह चारपाई पर लेटे हुए निद्रा देवी की आराधना कर रहे थे कि इतने में विट्ठठलदास ने झ्ाकर भ्रावाज दी ।,काम करने वाले यों काम किया करते हैं ।,पदमसिंह चारपाई पर लेटे हुए निद्रा देवी की आराधना कर रहे थे कि इतने में विट्ठठलदास ने आ कर आवाज दी । उप्तके कव्पित राष्ट्र के कर्मचारी सेवा के पुतले होते अध्यापऊ सॉपडी में रहनेयाले वल्क़लबारी कंद्सूल फल भोगी संन्‍्यासी जनता हेप और लोभ से रहित न यह आये-दिन के टटे न चखेड़े,इनमें भी वही दंभ है वही धान-मद है वही अधिकार-मद है,उसके कल्पित राष्ट के कर्मचारी सेवा के पुतले होते अधयापक झोंपडी में रहने वाले बल्कलधारी कंदमूल-फल-भोगी संन्यासी जनता द्वेष और लोभ से रहित न यह आए दिन के टंटे न बखेड़े समाज उनका तिरस्कार नहीं करता ।,उसका नाम सुकेशी था ।,समाज उनका तिरस्कार नहीं करता । "मैं आदर्श-पत्नी नहीं हूँ, इसे मैं खूब जानती हैँ |","जहां विश्वास नहीं है, वहाँ प्रेम कैसे रह सकता है ?","मैं आदर्श-पत्नी नहीं हूँ, इसे मैं खूब जानती हूँ ।" डिन्तु सभी मन में लज्जित थे जसे मंदाव से भागा पिपाददी,हमार तो बधिया बैठ जाएगी,किंतु सभी मन में लज्जित थे जैसे मैदान से भागा सिपाही "उसे तकाज़े सहना, लज्जित होना, मुँह छिपाये फिरना, चिन्ता की आग में जलना, सब कुछ सहना मंजर था ।","किसी संकट से बच जाने में जो हार्दिक आनंद होता है, वह कहाँ था ?","उसे तकाज़े सहना, लज्जित होना, मुँह छिपाए फिरना, चिंता की आग में जलना, सब कुछ सहना मंजूर था ।" अभी द्वार खुला हुआ था,विष ने जैसे चेतना को आक्रांत कर दिया हो,अभी द्वार खुला हुआ था "विपत्ति भपना सारा दल-चल लेकर भाये, दामिद को आवन्द-भरी चितवन उसझा विध्वस्त कर देगी ।",किसने बुलाया था इस निगोड़ी ईद को ?,"विपत्ति अपना सारा दल-बल लेकर आये, हामिद की आनन्द-भरी चितवन उसका विध्वंस कर देगी ।" "पंडित ने कहा--रोनै दो चुड़ेलो, को कब तक रोयेगी ।",एक क्षण के बाद वह मुस्कराहट एक लम्बी साँस में विलीन हो गयी ।,"पंडित ने कहा, रोने दो चुड़ैलों को, कब तक रोयेंगी ।" शर्माजी इस व्यंग के लिए तैयार थे ।,उसी भाई का बेटा है जिस ने आप को पालपोस कर आज इस योग्य बनाया ।,शर्माजी इस व्यंग के लिए तैयार थे । "तुम शोक से खेलो, सुबह-शाम मैदान में निकल जाया करो ।",तुम्हारी यह दशा देखकर मेरे दिल के टुकड़े हुए जाते हैं।,"तुम शोक से खेलो, सुबह-शाम मैदान में निकल जाया करो।" "साधु कोग छोटे-बढ़े,-अमीर-गरीव, बूढ़े जवान, सपकों तू ऋ्कर पुकारते 8 ।",साधुओं की भाषा हमारी बोलचाल से अलग होती है ।,"साधु लोग छोटे-बड़े, अमीर-गरीब, बूढ़े-जवान, सबको तू कह कर पुकारते हैं ।" "जेनी ने फिर कहा--तुम्हारे चले आने के बाद मेरे ऊपर जो सकट आये, वह चुनाऊं तो ठुम घबढ़ा जाओगे ।","कहती थीं , रुपये-पैसे बहू के हाथ में दे दिया करो ।","जेनी ने फिर कहा-तुम्हारे चले आने के बाद मेरे ऊपर जो संकट आये, वह सुनाऊं तो तुम घबरा जओगे ।" पुलिस को संदेह है कि यह संगीन वारदात तुम्हारे इशारे से हुई है ।,जसवंतनगर चलने का विचार करके उठे थे कि कई आदमियों को घोड़े भगाए अपनी तरफ आते देखा ।,पुलिस को संदेह है कि यह संगीन वारदात तुम्हारे इशारे से हुई है । "संभव था, वह अपने को कर्तव्य की बेदी पर बलिदान कर देता, रोन्‍्चार साल की सज़ा के लिए अपने को तैयार कर लेता ।","' रमानाथ के सामने एक नई समस्या आ खड़ी हुई, पहली से कहीं जटिल, कहीं भीषण ।","संभव था, वह अपने को कर्तव्य की वेदी पर बलिदान कर देता, दो-चार साल की सज़ा के लिए अपने को तैयार कर लेता ।" मौरसाइब के होश उड़ गये |,कभी-कभी ऐसा भी होता कि बाजी उठा दी जाती; मिरज़ाजी रूठकर अपने घर चले जाते ।,मीर साहब के होश उड़ गये । "यह पुराने विचारों का पोगा आाह्मण, जिसे नयी सभ्यता को हवा तक व रूपी, उस कुलटा से विवाह करने जा रहा है, जिसे कोई भला आदमी अपने घर में कदम भी न रखने देगा |",जिज्ञासा की अग्नि प्रचण्ड हो गयी ।,"यह पुराने विचारों का पोंगा ब्राह्मण जिसे नयी सभ्यता की हवा तक न लगी, उस कुलटा से विवाह करने जा रहा है, जिसे कोई भला आदमी अपने घर में कदम भी न रखने देगा ।" दयाक्षष्ण पहले हो हमले मे हिम्मत छोड़ बठा ।,"सम्भव है , तुम मेरा जो रूप देख रही हो , वह मेरा असली रूप न हो ?",दयाकृष्ण पहले ही पहले हमले में हिम्मत छोड़ बैठा । स्वामी ने अवश्य मुझे बुछाया था और मेरे आने से पहले यहाँ चले आये ।,बूढ़े ब्राह्मण ने बहुत ठीक कहा था ।,स्वामी ने अवश्य मुझे बुलाया था और आने से पहले यहाँ चले आये । द कि लेकिन भ्ब शान्ता को इसका भय नहीं है ।,वह जानती थी कि माता का हृदय व्यंग्य की चोटें नहीं सह सकता ।,लेकिन अब शांता को इसका भय नही हैं । मानों पायमय आत्म नरक को नालियों में बही चली जाती थी |,"उनमें जितना पौरुष, जितनी चपलता, जितना-साहस, जितनी चेतना, जितनी बुद्वि, जितना औसान था, वे सब इस वक्त सजग और सचेत होकर इच्छा-शक्ति की सहायता कर रहे थे ।",मानो पापमय आत्मा नरक की नालियों में बही चली जाती थी । मेरा भी कोई हितू है,उसने इनकार कर दिया,मेरा भी कोई हितू है खेद और लज्जा का रंग प्रकट हुआ ।,एक ही क्षण में वह शांति की झलक भी मिट गई ।,खेद और लज्जा का रंग प्रकट हुआ । "गाने में कुशल, दारमोनियम में निपुण, इंद्रजाल के करतब दिखलाने में कुशल |","कभी उनके लिए पकौड़ियाँ बन रही हैं, कभी हलवा ।","गाने में कुशल, हारमोनियम में निपुण, इन्द्रजाल के करतब दिखलाने में कुशल ।" इसने संनुष्यों को असादवात और बलदीन बता दिया है ।,कौड़ियों पर अशर्फियाँ लुट रही थीं ।,इसने मनुष्यों को असावधान और बलहीन बना दिया है । ऐसे आदमी के साथ कुछ बल भी खाना पढ़े तो बुरा नहीं लगता ॥ |,साहब की अकड़ अभी काफी थी ।,"ऐसे आदमी के साथ कुछ बल भी खाना पड़े, तो बुरा नहीं लगता ।" "क्या मुझे भूखों मरते देखकर मेरे साथ उससे कुछ भी ज़्यादा सलूक न करोगी, जो आदमी कुत्ते के साथ करता है ?","मैंने जालपा को जिस सूरत में देखा है, वह मेरे दिल को भालों की तरह छेद रहा है ।","क्या मुझे भूखों मरते देखकर मेरे साथ उससे कुछ भी ज्यादा सलूक न करोगी, जो आदमी कुत्तों के साथ करता है ?" "बेटा, रंग मिलाए बगैर भी दुनिया का कोई काम चलता है ?","थोड़ा-सा रंग तो जरूर भरना पड़ा, पर उसका असर बहुत अच्छा हुआ ।","बेटा, रंग मिलाए बगैर भी दुनिया का कोई काम चलता है ?" पहर रात तक उसके कमरे से मधुर गान की ध्वनि आया करती ।,भोली नित नए सिंगार करके अपने कोठे के छज्जे पर बैठती ।,पहर रात तक उसके कमर से मधुर गान की ध्वनि आया करती । "विट्डुल--बरामदे में पड़े हैं, उठवा ले जाइए ।",मैंने सहारनपुर से मँगवाए थे ।,"विट्ठल -- बरामदे में पड़े है, उठवा ले जाइए ।" "(२ एक दिन बड़े बावू ने गरीब से अपनी मेज साफ करने को कहा, वह सुस्त मेज साफ करने लगा ।",लेकिन फिर न जाने कब उसकी अभागी आँखें झपक गयीं ।,"एक दिन बड़े बाबू ने गरीब से अपनी मेज साफ करने को कहा, वह तुरंत मेज साफ करने लगा ।" होरी आज धनिया से किसी तरह पेश नहीं पा सकता:,हार की लज्जा तो पी जाने की ही वस्तु है,होरी आज धनिया से किसी तरह पेश नहीं पा सकता "आकर महलसरा में देखो, तुम इसे अपने भरोपडें ही की तरदइ तकल्छफ और सज्नावट हे खाड़ी पाओगे' ।","मैं तुम्हें हुक्म देता हूँ कि एक लम्हे के अन्दर यहाँ से चले जाओ, वरना कलामे-पाक की कसम, मैं तुम्हारे खून की नदी बहा दूँगा ।","आकर महलसरा में देखो, तुम इसे अपने झोंपड़ों ही की तरह तकल्लुफ और सजावट से खाली पाओगे ।" जेलखाने में उन्होंने श्रभियुकतों से हत्याकाएड के कितने ही मन्त्र सीखे थे ।,यह निश्चय करके कृष्णचन्द्र अपने उद्देश्य को पूरा करने के साधनों पर विचार करने लगे ।,जेलखाने में उन्होंने अभियुक्तों से हत्याकांड के कितने ही मंत्र सीखे थे । मुझे यहीं पड़ा रहने दो ।,इतनी भूल जरूर मेरी है ।,मुझे यहीं पड़ा रहने दो । "अगर तुम्हें 'छोड़ दूं, तो इसी तरह भौर लोग भी करेंगे ।","अगर आपकी यही इच्छा हो कि हम सब दाने बगैर मर जायें, तो मार डालिये, और मुझे कुछ नहीं कहना है ।","अगर तुम्हें छोड़ दूँ, तो इसी तरह और लोग भी करेंगे ।" "गजाधर---हाँ, हाँ, वही हैं ।",ऐनक लगाते है ।,"गजाधर - हाँ, हाँ, वही है ।" चटपर्ट एक टाइम-टेबिल बना डालता ।,घर बिलकुल खाली था ।,चटपट एक टाइम-टेबिल बना डालता । "और कुछ न हो, तो पचास रुपये - की वँधी हुईं आमदनी तो होनी दी चाहिए ।",सबेरे कुन्दनलाल नदी स्नान करने गये ।,"और कुछ न हो, तो पचास रुपये की बँधी हुई आमदनी तो होनी ही चाहिए ।" रमेश -- देर क्या होगी ।,"फिर शह! रमा०--जी तो चाहता है, दूसरी बाज़ी मात देकर जाऊँ, मगर देर होगी ।",रमेश--देर क्या होगी । "और तो और कुछ ऐसे महाशय भी हैं, जो जाति और वर्ण को भी मिटा देना चाहते हैं।","कोई शिक्षा की जड़ काटने पर तुला हुआ है, कोई इसी धुन में है कि शूद्र और चांडाल सब क्षत्रिय हो जाएँ, कोई विधवाओं के विवाह का राग अलापता फिरता है ।",और तो और कुछ ऐसे महाशय भी है जो जाति ओर वर्ण को भी मिटा देना चाहते है । कितनो द्योशियारी से ठाकुर ने थानेदार रो एक खास झुकदमे में रिद्गतत दे दो और साफ निद्नक् घये ।,"मैदानी बहादुरी का तो अब न जमाना रहा है, न मौका ।",कितनी होशियारी से ठाकुर ने थानेदार को एक खास मुकदमे में रिश्वत दी और साफ निकल गये । एक दिन प्रात-छाल आचाये महाशय संध्या से उठे थे कि राय भोलावाथ उनसे मिलने भाये |,लोग उनका अलौकिक गान सुनकर अलौकिक आनन्द उठाते थे ।,एक दिन प्रातःकाल आचार्य महाशय संध्या से उठे थे कि राय भोलानाथ उनसे मिलने आये । आपकी पेश-परस्ती बूजगों का नाम शेशन नही कर रहो है ।,मैं अपने बुजुर्गों का नाम न डुबाऊँगा ।,आपकी ऐश परस्ती बुजुर्गों का नाम रोशन नहीं कर रही है । भविष्य प्र विज्ञात्त नहीं रहा,इसलिए अब उसकी निर्दय क्रीड़ा की शिकायत नहीं करूँगा,भविष्य पर विश्वास नहीं रहा "दस वक्त अगर वह मुनती कि श्यामकिशोर को किसी ने वाजार में जुना से पीश, तो कदाचित बह खुश होती ।","देवी- जो अरमान हों, पूरे कर लो ।","इस वक्त अगर वह सुनती कि श्यामकिशोर को किसी ने बाजार में जूते से पीटा, तो कदाचित् वह खुश होती ।" उन्हें निश्चय था कि यह भेद न खुल सकेगा ।,महंत पहले तो बहुत अकड़े रहे ।,उन्हें निश्चय था कि यह भेद न खुल सकेगा । "जब बुवेरसिह जोता था, तभी कुबर राजनाथ यहाँ भागकर आये थे और उसके यहाँ रहे थे, उस लड़की की कुँवर से कहीं: बातचीत हो गयी ।",उनकी स्त्री तो पहले ही मर चुकी थी ।,"जब कुबेरसिंह जीता था, तभी कुँवर राजनाथ यहाँ भाग कर आये थे और उसके यहाँ रहे थे, उस लड़की की कुँवर से कहीं बातचीत हो गयी ।" "जहाँ प्रन्यालय, धर्मसभाएँ और सुधारक संस्थाश्रों के स्थान होने चाहिए, वहाँ हम रूप का वाजार सजाते हैं ।",मैं तो समझता हूँ कि विषयी मुसलमान बादशाहों के समय में इनका जन्म हुआ होगा ।,"जहां ग्रंथालय, धर्म सभाएँ और सुधारक संस्थाओं के स्थान होने चाहिए, वहाँ हम रूप का बाजार सजाते हैं ।" संध्या होते-द्ोते लाश घर से विकछी ।,"शहर के डाक्टर बुलाये गये, लेकिन उनके आने के पहले ही बाबू साहब चल बसे थे ।",संध्या होते-होते लाश घर से निकली । ग्रज़नरी ---जो हाँ वह तो जनाब का दिल ही जानता होगा,अमर ने सलीम की गरदन पकड़कर कहा-तुमने मुझे बदनाम किया होगा,गजनवी-जी हाँ वह तो जनाब का दिल ही जानता होगा "नादिरशाही हुक्म है कि जितनी जल्द हो सके, यह जत्था हरमसरा से दूर हटा दिया जाए ।",हम सब इस हरमसरा के हब्शी ख्वाजासरा हैं ।,"नादिरशाही हुक्म है कि जितनी जल्द हो सके, यह जत्था हरमसरा से दूर हटा दिया जाए ।" "सहैलियों से ढॉरगें मारतो, यहाँ के लोग मूर्ख हैं, यह सिनेमा कौ कद कण क्रेंगे ।","भौतिक संसार से अब कोई वास्ता न था, अब उसका निवास कल्पना-संसार में था ।","सहेलियों से डींगे मारती, यहाँ के लोग मूर्ख हैं, यह सिनेमा की कद्र क्या करेंगे ।" "तब लोगों ने, चन्दा करके गाँव की सब वर्वारी लड़क्यों की दावत की थी ।","अम्माँ कहती हैं , कुँवारी लड़कियों की दुआ कभी निष्फल नहीं होती ।",सब लोगों ने चन्दा करके गाँव की सब कुँवारी लड़कियों की दावत की थी । "हो, एक लड़का सेलता हुआ मिला ।",यह संशय भी हो रहा था कि कहीं चोरी खुल तो नहीं गयी और चाचा जी हलधर को पकड़ कर घर तो नहीं ले गये ?,"हाँ, एक लड़का खेलता हुआ मिला ।" आने जाते के रास्ते बंद हो गये ।,पहाड़ों के दर बर्फ से ढक गये ।,आने-जाने के रास्ते बंद हो गये । "ढपोरसख --तो साइब, इस तरह कोई दो महीने गुज़रे, इस बीच में भी जोशी दो-तीन बार श्राये ; मगर मुझसे कुछ माँगा नहीं ।",कहार ने दो आने लिये और बर्तन धोकर चलता बना ।,"' ढपोरसंख -'तो साहब, इस तरह कोई दो महीने गुजरे, इस बीच में भी जोशी दो-तीन बार आये; मगर मुझसे कुछ माँगे नहीं ।" पहले एक-दो महीने तक तो रामेंद्र ने इधर ध्यान नदीं दिया ; लेकिन जब कई महीने गुज़र गये श्रौर स्त्रियों ने बहिष्कार का त्याग न किया तो उन्होंने एक दिन झुलोचना से कह्य--यह लोग श्राजकल अकेले दी आते हैं ! सुलोचना ने धीरे से कह्य-- देखती तो हू ।,"जड़ भरत की तरह बैठे हुए थे, न मुस्कराहट थी, न कुतूहल, न हर्ष; न कुछ ।","पहले एक-दो महीने तक तो रामेन्द्र ने इधर ध्यान नहीं दिया; लेकिन जब कई महीने गुजर गये और स्त्रियों ने बहिष्कार का त्याग न किया तो उन्होंने एक दिन सुलोचना से कहा, 'यह लोग आजकल अकेले ही आते हैं !' सुलोचना ने धीरे से कहा, 'हाँ, देखती तो हूँ ।" दोनों आदमियों ने सूची तैयार की ।,ठलुओं की ख़ुशामद करने से क्या फायदा ?,' दोनों आदमियों ने सूची तैयार की । "शाम की थका-मॉँदा लौंथ, तो मिलिया से बोला--ला, कुछ पैसे दे दे, तो दम लगा आरके |","सिलिया की सुबुद्धि और कार्यशीलता सभी की आँखों में खटकती थी , वह सबसे अधिक घास क्यों छीलती है, सबसे ज्यादा लकड़ियाँ क्यों लाती है, इतने सबेरे क्यों उठती है, इतने पैसे क्यों लाती है, इन कारणों ने उसे पड़ोसियों की सहानुभूति से वंचित कर दिया था ।","शाम को थका-माँदा लौटा तो सिलिया से बोला - ला, कुछ पैसे दे दे, तो दम लगा आऊँ ।" में चुपके से जीने पर चढ्य और छत पर जा पहुँचा ।,गैस की रोशनी हो रही थी ।,मैं चुपके से जीने पर चढ़ा और छत पर जा पहुँचा । ज्ञानचन्द्र दिन-फे-दिन घर भे पड़े रहते |,गर्व से उसका मस्तक ऊँचा हो गया और मुख पर स्वर्गीय आभा झलक पड़ी ।,ज्ञानचन्द्र दिन के दिन घर में पड़े रहते । मेरा मन दुवल है ।,मैं कल एक हजार कॅगलों को भोजन कराऊँगी ।,मेरा मन दुर्बल है । सलोत के लिए हुकूमत नह ची ज्ञ थी,इसलिए उसकी गंवाई सूरत होने पर भी गजनवी बराबरी के भाव से मिला,सलीम के लिए हुकूमत नई चीज थी ख़तों को सुरक्षित रखने की तो इनकी आदत नहीं |,"इसलिए मैंने यह नियम बना लिया है कि जब उनके पास जाता हूँ, तो एक-दो दिन में जितनी बड़ी-से-बड़ी चपत दे सकता हूँ, देता हूँ ।",खतों को सुरक्षित रखने की तो इनकी आदत नहीं ? "यशबदत--दवठी तो तुप्र सदा के हो, मगर मोक़ा नाजुक है, संसले रहना दो अच्छा है ।",लोग खुल्लमखुल्ला कहते थे कि पण्डितजी ने एक हजार रुपये सरकार से लेकर यह अनुष्ठान किया है ।,"यशवंत- हठी तो तुम सदा के हो, मगर मौका नाजुक है, सँभले रहना ही अच्छा है ।" मगर होरी ने आगा-पीछा उुकाकर आखिर धनिया को किसी तरह राज़ी कर लिया,सोना कहती मुझे ज्यादा चाहती है रूपा कहती मुझे,मगर होरी ने आगा-पीछा सुझा कर आखिर धनिया को किसी तरह राजी कर लिया घर बचाने का भी कुछ उपाय सोचा कि इसे यों ही मिट्टी में मिला दोंगे |,पुजारी जी सुक्खू चौधरी के पास से उठ कर चले गये थे और चौधरी उच्च स्वर से अपने सोये हुए देवताओं को पुकार-पुकार कर बुला रहे थे ।,घर बचाने का भी कुछ उपाय सोचा कि इसे यों ही मिट्टी में मिला दोगे ? "उन्होंने सोचा, इन झ्बलाओों की क्या गति होगी ?",कृष्णचन्द्र भी कातर हो गए ।,"उन्होंने सोचा, इन अबलाओं की क्या गति होगी ?" अमरनाय इस ब्यस्थ से बटुत छब्जित हुए ।,पिंजरे में गानेवाली चिड़िया विस्तृत पर्वतराशियों में आ कर अपना राग भूल गयी ।,अमरनाथ इस व्यंग्य से बहुत लज्जित हुए । "न दम फूनता था, न पोच थकते थे ।","जान पड़ता था, पाँव भूमि पर पड़ते ही नहीं ।","न दम फूलता था, न पाँव थकते थे ।" बम्बई पहुँचकर पत्र लिखगा ।,उसे कौन समझाये कि आदित्य भी इस अवसर पर पछताने के सिवा और कुछ न कर सकते ।,बम्बई पहूँचकर पत्र लिखूँगा । ज्ञायद ही अपने जोवत में उन्होंने कोई किस्मे-कद्दानो की किताब पढ़ी हो ।,काव्य अलंकार उपन्यास सभी को त्याज्य समझते थे ।,शायद ही अपने जीवन में उन्होंने कोई किस्से-कहानी की किताब पढ़ी हो । भमरकान्त को फौज के बुलाये जाने का विधास था,सुखदा से बोलीं-यह स्त्री बिलकुल निरपराध है,अमरकान्त को फौज के बुलाए जाने का विश्वास था "तुम्दँ परभात्मा ने ऐेश्वर्य दिया है, लेकिन कुछ देर के लिए. संन्यासाअम का रग भी देखो और वनस्पतियों और नदी के शीतल जल का स्वाद लो |","वह व्यवहार-बुद्धि भी न थी, जो बिना धन के भी अपनी राह निकाल लेती है ।","तुम्हें परमात्मा ने ऐश्वर्य दिया है, लेकिन कुछ देर के लिए संन्यासश्रम का रंग भी देखो और वनस्पतियों और नदी के शीतल जल का स्वाद लो ।" मोलबी साहब मेले में चुलचुल लड़ाने जायँगे |,साधारणत: महीना चढ़ जाने और बार-बार तकाजे करने पर कहीं पैसे मिलते थे ।,मौलवी साहब मेले में बुलबुल लड़ाने जाएँगे । भिक्षा तक तो स्वार्थ के लिए हो देते हैं ।,कौन निःस्वार्थ किसी के साथ सलूक करता है ।,भिक्षा तक तो स्वार्थ के लिए देते हैं । घहुत दूर तक भमय्कने के बाद वे गगा के किनारे पहुँचे ।,"तंग, अँधेरी, दुर्गन्धपूर्ण कीचड़ से भरी हुई गलियों में वे नंगे पॉँव, स्वार्थ, लोभ और कपट का बोझ लिए चले जाते थे ।",बहुत दूर तक भटकने के बाद वे गंगा किनारे पहुँचे । फिर यह ज्ञान भी जाता रहा,बाप-दादों ने नहीं पी थी न पी हो,फिर यह ज्ञान भी जाता रहा पणिडतजी की यही क्या कस कृपा थी कि वह भुनगी को अपने गाँव में बसाये हुए थे |,किसान को अधिकार है कि बैलों को दिन भर जोतने के बाद शाम को खूँटे से भूखा बाँध दे ।,पंडित जी की यही क्या कम कृपा थी कि वह भुनगी को अपने गाँव में बसाये हुए थे । "बस, यही समम्क छो & मोत हर दम पिर पर सेलतो रहतो है ।",जिधर देखिए यमराज की अमलदारी है ।,बस यही समझ लो कि मौत हरदम सिर पर खेलती रहती है । उन्होंने प्रकाश को इगलेंह जाकर विद्याभ्याप करने के लिए सरकारी वज़ोफे की मंजूरी की सूचना दी थो ।,"अब दरिद्र हूँ, तुम क्यों बात पूछोगी ।",उन्होंने प्रकाश को इंग्लैंड जाकर विद्याभ्यास करने के लिए सरकारी वजीफे की मंजूरी की सूचना दी थी । "सिगार सम्पन्न बाप का बेटा था, बढ़ा दी अल्हड़, बडा ही ज़िद्दी, बढ़ा ही आरासपसन्द ।","कभी-कभी नहीं , अक्सर संकट पड़ने पर ही आदमी के जौहर खुलते हैं ।","सिंगार सम्पन्न बाप का बेटा था , बड़ा ही अल्हड़ , बड़ा ही जिद्दी , बड़ा ही आरामपसन्द ।" "कु जड़िन के जाने के बाद पत्नीजी लोदे का पानी लाई, तो आपने कहा--अश्राज तो तुमने ज़रा-सा साग लेने में पूरे आध घटे लगा दिये ।",आप लोगों के हाथों में पड़कर यह ड्रामा धूम मचा देगा ।,"कुँजड़िन के जाने के बाद पत्नीजी लोटे का पानी लाईं तो आपने कहा, 'आज तो तुमने जरा-सा साग लेने में पूरे आधा घंटे लगा दिये ।" इस आग्रह से विवश होकर शर्माजी फिटन पर बैठे ।,हम तो आप के दोलतखाने पर हाजिर होने वाले थे ।,इस आग्रह से विवश हो कर शर्माजी फिटिन पर बेठे । "श्रम्माँ--देखा, वही बात निकली न ! में तो कहती ही थी कि बच्चा की ऐसा आदत नहीं, पैसा तो बद्द हाथ से छूता द्वी नहीं, लेकिन सब लोग मुझी को उल्लू बनाने लगे |",मेरा तो दो ही चार घूँसों में काम तमाम हो जाता ।,"अम्माँ - देखा, वही बात निकली न ! मैं तो कहती थी कि बच्चा की ऐसी आदत नहीं; पैसा तो वह हाथ से छूता ही नहीं, लेकिन सब लोग मुझी को उल्लू बनाने लगे ।" नै कल एक हजार केंगलों को भोजन कराऊँगी ।,धीरे-धीरे उसे जासूसी का शौक हुआ ।,मैं कल एक हजार कॅगलों को भोजन कराऊँगी । हमारे देश में जनसंख्या जरूरत से ज्यादा हो गई है ।,हमने इसी को अपने जीवन का लक्ष्य समझ रखा है ।,हमारे देश में जनसंख्या जरूरत से ज्यादा हो गई है । उसने कपड़े बदले ओर भोजन बनाने लगी।,सुमन ताड़ गई कि वकील साहब की चर्चा गजाधर को अच्छी नहीं मालूम होती ।,उसने कपड़े बदले ओर भोजन बनाने लगी । "यद्द तो बिलकुल सेवडे हैं, इनका सत्तु कैसे बनेगा ।",बहुत छानबीन के पश्चात् उसी कुटी का पता लगा ।,"यह तो बिलकुल सेवड़े हैं, इनका सत्तू कैसे बनेगा ।" अब हम दोनों सेवक-दल का काम खूब उत्साह से करेगा ।,उन पर पक्षपात का दोषारोपण किया ।,अब हम दोनों सेवक-दल का काम खूब उत्साह से करेगा । "सामने उद्यान में चाँदनी कुहरे की चादर ओढ़े, ज़मीन पर पड़ी सिसक रही थी ।",कदाचित उन्हें अपनी दशा का यथार्थ ज्ञान हो चुका था ।,"सामने उद्यान में चांदनी द्दहरे की चादर ओढ़े, ज़मीन पर पड़ी सिसक रही थी ।" अब पक्की सड़क मिल गई थी,मंडली यों ही बातचीत करती चली जाती थी,अब पक्की सड़क मिल गई थी यही तो मरदों के काम हैं ।,"बजरंगी-तुम्हें हट जाना था, उसकी औरत थी, मारता चाहे पीटता, तुमसे मतलब ?",यही तो मरदों के काम हैं । डाक आ गयी है |,"वे उठ खड़े हुए और बोले- दारोगा जी, आपकी बातें बड़ी मजेदार होती हैं ।",डाक आ गयी है । कौंसिल में उनसे ज़्यादा उत्साही मेम्बर कोई न था,न भूत का पछतावा था न भविष्य की चिंता,कौंसिल में उनसे ज्यादा उत्साही मेंबर कोई न था तुम सब मोटीः तोंदवाले हरामज़ोर हो पक्के इरामखोर हो,उन दिनों तो मेरा बड़ा आदर करती थीं,तुम सब मोटी तोंद वाले हरामखोर हो पक्के हरामखोर हो कु दनलाल लेटे-लेये अग्बार पढ़ रहें थे |,बैलों को भूखे खड़े देखकर नींद आँखों से भाग गई ।,कुन्दनलाल लेटे-लेटे अखबार पढ़ रहे थे । मिसेज सेवक ने नाक सिकोड़कर कहा-इस दुष्ट की चीख ने तो कान के परदे फाड़ डाले ।,सूरदास फिटन के पीछे दौड़ता चला आता था ।,मिसेज सेवक ने नाक सिकोड़कर कहा-इस दुष्ट की चीख ने तो कान के परदे फाड़ डाले । आज आपके दर्शन पाकर हमारा जीवन सफल हो गया ।,"सरदार ने कहा-महाराज, हमारा अपराध क्षमा कीजिए ।",आज आपके दर्शन पाकर हमारा जीवन सफल हो गया । अंग्रेज़ी तो न पढ़ी होगी 2,चौधरी ने दीनता से कहा-बेटा चाहे नास्तिक कहो चाहे मूरख कहो पर दिल पर चोट लगती है तो मुँह से आह निकलती ही है,अंगरेजी तो न पढ़ी होगी चारों ओर से दौड़ पडे |,"उसने सड़क पर देखा , एक यूरोपियन लेडी अपने पति के साथ अपने बालक को बच्चों की गाड़ी में बिठाये लिये चली जा रही थी ।",चारों ओर से दौड़ पड़े । "वह उन दोनों थानेदारों को दिखाना चाहते थे कि यदि मैंने पाप किया है, तो मर्दों की भाँति उसका फल भोगने के लिए तैयार हूँ ।",कृष्णचन्द्र की इन बातों में ग्लानि के साथ अभिमान भी मिला हुआ था ।,"वह उन दोनों थानेदारों को दिखाना चाहते थे कि यदि मेंने पाप किया है, तो मर्दों की भाँति उसका फल भोगने को तेयार हूँ।" जानवरों को भी बहुधा घर छूट जाने का दुःख होता है,होरी और गोबर खा कर आधी-आधी रोटियाँ उसके लिए लाये पर उसने सूँघा तक नहीं,जानवरों को भी बहुधा घर छूट जाने का दु:ख होता है "उसकी चाल मंद पड़ गयी, आप हो बआप ऐछिर झुक गया, दुम दिकुड़ मयो ।",वह दिन याद आया जब वह दो-चार मित्रों के साथ किसी प्रेमिका के पीछे गली-गली और कूचे-कूचे में चक्कर लगाता था ।,उसकी चाल मन्द पड़ गयी आप ही आप सिर झुक गया दुम सिकुड़ गयी । उसका मुख-मण्ठल विजय कौ जलालिपा से रफ्षित हो रहा था ।,दिन-के-दिन अन्दर पड़ा सोचा करता कि क्या करूँ ।,उसका मुख-मंडल विजय की लालिमा से रंजित हो रहा था । मुझे ५-६ मद्दोने से यह अनुभव द्वो रद्दा है कि में ' क्षय-रोग से ग्रसित हूँ ।,यह कहते मिसेज़ सिनहा की आँखों से आँसू बहने लगे ।,मुझे ५-६ महीनों से यह अनुभव हो रहा है कि मैं क्षय रोग से ग्रसित हूँ । बालक सजल नेत्रों से माता को देखता हुआ बोला-- झुझे बार-बार पिताजी को याद आती रहती है ।,"बालक ने गिरे हुए मन से जवाब दिया, ‘हाँ अम्माँ, हो गयी; लेकिन मेरे परचे अच्छे नहीं हुए ।","‘ बालक सजल नेत्रों से माता को देखता हुआ बोला, ‘मुझे बार-बार पिताजी की याद आती रहती है ।" "राजों, रईसो को अलग घरों मे रहने दौजिए, वह एक को जगह दस खर्च कर सकते हैं ।","जब तक छोटी-छोटी घरेलू चिन्ताओं से मुक्त न हो जायेंगे, आप उन्नति कर ही नहीं सकते ।","राजों , रईसों को अलग घरों में रहने दीजिए , वह एक की जगह दस खर्च कर सकते हैं ।" "..' जब किसी तरह न रहा गया, तो उसने जबरां को घोरे से 'ठठाया और ठप्तके प्रिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया ।",जबरा ने अपने पंजे उसकी घुटनियों पर रख दिये और उसके मुँह के पास अपना मुँह ले गया ।,जब किसी तरह न रहा गया तो उसने जबरा को धीरे से उठाया और उसक सिर को थपथपाकर उसे अपनी गोद में सुला लिया । रमा अभी कुछ कहना ही चाहता था कि दारोग़ाजी ने पुकारा -- मुझे भी खिलवत में आने की इजाज़त है ?,"जाना चाहेगी, तो रेल पर भेज दूँगी ।","रमा अभी कुछ कहना ही चाहता था कि दारोग़ाजी ने पुकारा, 'मुझे भी खिलवत में आने की इजाज़त है ?" "छेक्िन द्ाठिम्रा छूट जाती दे, पर उसका दाग दिल से रभी नहों मिठता ।",देखा तो स्याही छूट रही थी ।,"लेकिन कालिमा छूट जाती है, पर उसका दाग दिल से कभी नहीं मिटता ।" ब्रह्ममोज होगा ।,"किसी लड़के में वह दुर्व्यसन, वह छैलापन, वह लुटाऊपन न था, जो माता-पिता को जलाता और कुल-मर्यादा को डुबाता है ।",ब्रह्मभोज होगा । ग्यारह बजे ये ।,वह कैसे शव की दाहक्रिया करेगी ?,ग्यारह बजे थे । श्यामकिशोर नशे से चर थ ।,देवी सहम उठी ।,श्यामकिशोर नशे में चूर थे । "भाई साहब के मन में बड़े-बड़े हौसले हैं, इन हौपलों के पूरे होने में कुछ भी कसर रही तो उन्हें दुःख होगा ।",बड़ों के सामने न्याय और सिद्धांत की बातचीत असंगत सी जान पड़ती है ।,"भाई साहब के मन में बड़े-बड़े होसले है, इन होसलों के पूरे होने में कुछ भी कसर रही तो उन्हें दुख होगा ।" "हाँ, इतना याद रखना कि अपने विषय मे किसी से कुछ मत कहना, नहीं तो विधवाओं में हलचल मच जाएगी ।","अभी मैंने आश्रम की कमेटी में तुम्हारे रहने का प्रस्ताव नहीं किया है, लेकिन कोई हरज नहीं हैं, तुम वहाँ चलो, ठहरो ।","हाँ, इतना याद रखना कि अपने विषय में किसी से कुछ मत कहना, नहीं तो विधवाओं में हलचल मच जाएगी ।" मगर चाहे किम्नी के कार्यों में आवाज़ न जाती हो उसके भोठ अब भी खुल रहे ये और अब भी अत्लाहो भकवर की भव्यक्त ध्वनि निकल रही थी,उसी वक्त जेलर साहब चार वार्डरों के साथ आटा तुलवाने आ पहुँचे,मगर चाहे किसी के कानों में आवाज न जाती हो उसके होंठ अब भी खुल रहे थे और अब भी अल्लाहो अकबर की अव्यक्त ध्वनि निकल रही थी "तोन दन और ग़ुज़र गये, पर दृफ्षारोडाल कुछ निदचय न कर सका ।","डाक्टर किसी की कर्मरेखा तो नहीं पढ़े होते, ईश्वर की लीला अपरम्पार है, डाक्टर उसे नहीं समझ सकते ।","तीन दिन और गुजर गये, पर हजारीलाल कुछ निश्चय न कर सका ।" "दरनाथ- हाँ, कहा तो था, लेकिन श्राजकल बाजार अच्छा है ।",नाम तो चलना चाहिए ।,"हरनाथ , हाँ, कहा तो था, लेकिन आजकल बाजार अच्छा है ।" ये सब मोरचे तो पार हो गए ।,दोस्तों के आतिथ्य में उन्हें आनंद आता था ।,ये सब मोरचे तो पार हो गए । उसी भाँति जेसे चन्द्रमा समस्त नक्षत्रों में श्रेष्ठ है ।,आप ही बताने की कृपा कीजिए ।,उसी भाँति जैसे चन्द्रमा समस्त नक्षत्रों में श्रेष्ठ है । "आजकल पोलिटिकल मफाद का जोर है, हक और इन्साफ़ का नाम न लीलिए ।",ऐसा न हो कि आप पर कुफ्र का फतवा सादिर हो जाए ।,"आजकल पोलिटिकल मफाद का जोर है, हक ओर इंसाफ का नाम न लीजिए ।" आप अपने वादों को पूरा करना नहीं जानते ।,उसे देखकर मेरा दिल भर आया ।,आप अपने वादों को पूरा करना नहीं जानते । स्वामोजी जिस गाँव में जाते वहाँ लोग उन पर सआवाज्तें कप्तते,दूसरे दिन उसी कड़ाई से प्यादों ने डाँट-फटकार की लेकिन तीसरे दिन से वह कुछ नर्म हो गए,स्वामीजी जिस गाँव में जाते थे वहाँ लोग उन पर आवाजें कसते धुनगी का भाड़ आज बड़े जोरों पर था ।,"मालूम नहीं, किस डाक से आता था ।",भुनगी का भाड़ आज बड़े जोरों पर था । इनको इतना साहस कैसे हुआ १ इसी लिए कि भारत परावीन दे,स्टेशन-मास्टर से कहा गाड़ी में मुसाफिरों से कहा रास्ते में जो मिला उससे कहा,इनका इतना साहस कैसे हुआ- इसीलिए कि भारत पराधीन है रमानाथ ने बुरी तरह डाँटा है ।,उसके जाने की अब जरूरत नहीं है ।,रमानाथ ने बुरी तरह डांटा है । "वह समझती है, सारा घर मेरी उपेक्षा कर रहा है ।",उसकी दशा ज्यों-की-त्यों है ।,"वह समझती है, सारा घर मेरी उपेक्षा कर रहा है ।" "बाप ज़्यादा से ज्यादा घुड़क देंगे, जिया तो मारेगा, फिर वह किसके पास फ़रियाद लेकर जायगा।",जियाराम भी बेठा हुआ था।,"बाप ज्यादा- से-ज्यादा घुड़क देंगे, जिया तो मारेगा, फिर वह किसके पास फरियाद लेकर जायगा।" तुम्हारे सलुृक का बखान यहाँ अच्छी तरह सुन चुका ।,सलूक का नाम लेते हुए लज्जा नहीं आती ?,तुम्हारे सलूक का बखान यहाँ अच्छी तरह सुन चुका । कौत-सो ऐसी बचत दो जाती होगी ।,"उसके हृदय में जो सम्मान और विशिष्टता की कामना है, वह कहाँ पूरी हो ।",कौन-सी ऐसी बचत हो जाती होगी । मोग की तेयारी हुई ।,दोनों अपना-अपना पुरुषार्थ दिखाने के लिए अधीर हो रहे थे ।,भोग की तैयारी हुई । न जाने किस बुरो साइत में मेने इसके रुपये लिये ।,दूसरे महाशय बोले- यह लोग हिंदू-धर्म का सर्वनाश करके छोड़ेंगे ।,न जाने किस बुरी साइत से मैंने इसके रुपये लिये । लड़के की पढाना- लिखाना दे दी |,घर का हाल आपको मालूम है ।,लड़के को पढ़ाना-लिखाना है ही । "“हाँ, और क्‍या |","लेकिन मैंने सोचा, जब सुन्नी ही न रही, तो उसकी लाश में क्या रखा है! न गयी ।","हाँ, और क्या ?" तब दरुणा की समाधि हटी ।,"सहसा ग्वाले ने आकर कहा— बहूजी, भइया चले गये ।",तब करूणा की समाधि टूटी । चिन्तामणिजी तीन नहिलाओं फे स्वामी थे ।,' दोनों महात्मा अलग खड़े होकर अपने-अपने रचना-कौशल की डींगें मार रहे थे ।,चिन्तामणि जी तीन महिलाओं के स्वामी थे । "हरदौल ने कुछ ध्यान न दिया, वह वर्ष भर से सोने के थाल में खातेनवाते उसका आदी हो गया था, पर जुझारसिंह तलमला बये ।",नौ बजे होंगे ।,"हरदौल ने कुछ ध्यान न दिया, वह वर्ष भर से सोने के थाल में खाते-खाते उसका आदी हो गया था, पर जुझार सिंह तिलमिला गए ।" "हृदय वह जो उदार हो, आत्म-बल वह जो श्रापत्ति का वीरता के साथ सामना करे और इस रियासत फे सौभाग्य से हमको ऐसा परुष मिल गया ।","शहर के रईस और धनाढ्य लोग, राज्य के कर्मचारी और दरबारी तथा दीवानी के उम्मीदवारों का समूह, सब रंग-बिरंगी सज-धज बनाये दरबार में आ विराजे ! उम्मीदवारों के कलेजे धड़क रहे थे ।","हृदय वह जो उदार हो, आत्मबल वह जो आपत्ति का वीरता के साथ सामना करे और इस रियासत के सौभाग्य से हमें ऐसा पुरुष मिल गया ।" माहिर-साहब तो यहीं हैं ।,विनय-आप इतनी कृपा कर सकते हैं कि थोड़ी देर के लिए सिपाहियों को रोक लें ।,माहिर-साहब तो यहीं हैं । अगर में चली जाती हूँ तो थोड़े हो दिनों में सारा घर पिट्टो में मिल जायगा भीर इनका वह्दी दाल होगा जो स्वार्थी भिन्नों के चंगुल में फंसे हुए नौजवान रईस का होता है ।,"लीला ने देखा, मेरे स्वामी मेरे हाथों से निकले जा रहे हैं ।","मैं क्या करूँ, अगर मैं चली जाती हूँ तो थोड़े ही दिनों में सारा घर मिट्टी में मिल जायगा और इनका वही हाल होगा जो स्वार्थी मित्रों के चंगुल में फँसे हुए नौजवान रईसों का होता है ।" मिर झुकाये हुए बोली--बृूझा ! मैं इन वातो को क्या जाने ?,इन्हीं में एक सरदार था कि सबको सँभाल लिया ।,सिर झुकाये हुए बोली-बुआ! मैं इन बातों को क्या जानूँ ? सच्चाई का रुपये से कुछ सम्बन्ध नही ।,अब निर्वाह के लिए कोई उपाय न था ।,सच्चाई का रुपये से कुछ सम्बन्ध नहीं । अमरकान्त ने शमति हुए कद्दा--नहीं नहीं सुझे याद है,मैंने तो सिर्फ इस खयाल से कहा था कि तुम्हें तकलीफ होगी,अमरकान्त ने शरमाते हुए कहा-नहीं-नहीं मुझे याद है राय साहब ने बेटे के ब्याह में बीस हजार जुटा दिये,मुदा रास्ता कोई नहीं दिखाता,रायसाहब ने बेटे के ब्याह में बीस हजार लुटा दिये "पण्डितजी ने तुरन्त उसे बुलाकर कठोर कंठ से कद्दा-मेंने सुना है, तुमने किसी बनिये कौ लड़कों से अपना विवाह कर लिया है ।",उसी वक्त केशव कालेज से आया ।,"पण्डित जी ने तुरन्त उसे बुलाकर कठोर कंठ से कहा — मैंने सुना है , तुमने किसी बनिये की लडक़ी से अपना विवाह कर लिया है ।" दोनों अपने कर्मानुसार पाप-पुण्य के अधिकारी होते हैं ।,"उन्हें संसार चाहे कुछ कहे, चाहे कुछ समझे, पर उनके घरों में तो कोई मीन-मेख नहीं निकालता ।",दोनों अपने कर्मानुसार पाप-पुण्य के अधिकारी होते हैं । सुजान ही के द्वार पर उनका भोजन बना ।,रानी साहब ने उन्हें याद किया है ।,सुजान ही के द्वार पर उनका भोजन बना । दूसरे दिन पत्र लिख दिया गया ।,कुछ देर में लड़के जागे ।,दूसरे दिन पत्र लिख दिया गया । "और कई लड़कों ने भी सबक सुना दिये थे, वे सभी मेला देखने चल पड़े ।",मैं तो वही हूँ ।,"और कई लड़कों ने भी सबक सुना दिये थे, वे सभी मेला देखने चल पड़े ।" "भारणी, यह दवा है, महौषधि है, यही सोम-रस दे ।","अरे धर्मात्माजी, एक बार पी के देखिए ।","भाईजी, यह दवा है, महौषधि है, यही सोम-रस है ।" "उसके लेखों में विस्तार कम, पर सार अधिक द्वोता था ।","जो कुछ उसने नईम से सुना था, वह सब एक लेखमाला के रूप में प्रकाशित करने लगा ।","उसके लेखों में विस्तार कम, पर सार अधिक होता था ।" "> बेटा--तो क्या में उससे कह दूँ कि में कुछ नहीं कमाता, बिलकुल निखट्ट, हूँ ?","उसके सामने अपनी आबरू बचाती फिरती हूँ , कि किसी के मुँह पर मुझे कोई अनुचित शब्द न कह बैठे ।","बेटा — तो क्या मैं उससे कह दूं कि मैं कुछ नहीं कमाता , बिलकुल निखट्टू हूँ ?" "अब आप खुदा के लिए यहाँ न आया कीजिए, "" नहीं देख लेना, में एक दिन ग्राण दे दगी ।","' माधुरी एक क्षण तक विचार करके बोली , एक बात कहूँ , मानोगे ?","अब आप खुदा के लिए यहाँ न आया कीजिए , नहीं तो देख लेना , मैं एक दिन प्राण दे दूंगी ।" इस शहर में उसका सानी नहीं ।,"अभी आप के यहाँ से निकले हुए उसे पाँच-छह महीने से ज्यादा नहीं हुए होंगे, लेकिन कल उस का गाना सुना तो दंग रह गए ।",इस शहर में उसका सानी नहीं । "(कुछ याद करके ) हाँ, एक बात दो सकती है ।",व्यंग्योक्ति ही से काम लिया ।,"(कुछ याद करके) हाँ, एक बात हो सकती है ।" वद भागा-भागा चला जा रहा! था ।,कुछ देर तक दोनों ओर से मोल-भाव होता रहा ।,वह भागा-भागा चला जा रहा था । मेंने दिनेश की माँ से बंगला में पूछा -- क्या यह कहारिन है ?,बच्चों के लिए मिठाई ले गई थी ।,"मैंने दिनेश की माँ से बंगला में पूछा, 'क्या यह कहारिन है ?" "उनके कमरे का द्वार बंद करा दिया है, न कभी आप उसमें जाती हैं, न और किसी को जाने देती हैं, और मिस सोफिया का नाम ले लेना तो उन्हें चुटकी काट लेने के बराबर है ।",नित्य गुमसुम रहती हैं ।,"उनके कमरे का द्वार बंद करा दिया है, न कभी आप उसमें जाती हैं, न और किसी को जाने देती हैं, और मिस सोफिया का नाम ले लेना तो उन्हें चुटकी काट लेने के बराबर है ।" अ्रव में भूत की भाँति अकेला पड़ा हुआ हूँ; कोई इंसने-योलनेवाला नहीं ।,"मैंने प्रोफेसर को लिखा था- लज्जावती से मेरी बीमारी का जिक्र न करें, लेकिन प्रोफेसर साहब इतने गहरे न थे ।","अब मैं भूत की भाँति अकेला पड़ा हुआ हूँ, कोई हँसने-बोलने वाला नहीं ।" क्‍या मेरे दस-पाँच रुपये लेकर भाग जाओगे ।,रूपये का कोई बंदोबस्त करके फिर आऊँगा ।,क्या मेरे दस-पांच रूपये लेकर भाग जाओगे । चार्रों तरफ़_फ़स को टट्टियाँ थीं जिन पर गृलाब छा छिड़काव दो रहा या,रोज बड़ी-बड़ी किसान-सभाओं की खबरें आती थीं,चारों तरफ खस की टट्टियाँ थीं जिन पर गुलाब का छिड़काव हो रहा था "भगतराम को ऐसा मालूम हुआ, मानो उसकी आँखों की ज्योति बढ़ गई है, श्रथवा शरीर में कोई दूसरी ज्योतिमंय आत्मा आ गई है ।",' रसिक -'मैं उसकी चुप्पी देखकर पहले ही डर रहा था कि यह कोई पल्ले सिरे का घाघ है ।,"भगतराम को ऐसा मालूम हुआ, मानो उसकी आँखों की ज्योति बढ़ गयी है, अथवा शरीर में कोई दूसरी ज्योतिर्मय आत्मा आ गयी है ।" कबरी गाय पूँछ से मक्खियाँ उड़ाती सिर हिलाती मस्तानी मंद-गति से भूमती चली जाती थी जैसे बाँदियों के बीच में कोई रानी हो,उसने पीछे फिरकर देखा,कबरी गाय पूँछ से मक्खियाँ उड़ाती सिर हिलाती मस्तानी मंद-गति से झूमती चली जाती थी जैसे बांदियों के बीच में कोई रानी हो मेंने ऐसी दयादार और सलीक़ेमन्द लड़की नहीं देखी,है कोई तुम्हारी निगाह में ऐसा आदमी- बस यही समझ लो कि उसकी तकदीर खुल जाएगी,मैंने ऐसी हयादार और सलीकेमंद लड़की नहीं देखी उनकी सूरत आँखों के सामने खड़ी रहती है।,"बस, कोयले की एक सजीव मूर्ति थी।",उनकी सूरत आँखों के सामने खड़ी रहती है। कितु शोक ! वह क्दाचित्‌ मेरे सौभाग्यचंद्र की अंतिम झलक थी ।,इन दिनों प्रत्येक रमणी का चित्त आप ही आप झूला झूलने के लिए विकल हो जाता है ।,किन्तु शोक ! वह कदाचित् मेरे सौभाग्यचंद्र की अंतिम झलक थी । "विनीत भाव से बोली--अम्माजी, सा बाप की मरजी का गुलाम होना कोई पाप नहीं है ।",श्रृद्धा ने देखा कि भगतराम की आँखों से आँसू गिर रहे हैं ।,"विनीत भाव से बोली -- अम्माँजी, माँ-बाप की मरजी का गुलाम होना कोई पाप नहीं है ।" ” प्रधान ने सुप्तकरिराकर प्रतिज्ञा-पत्र मेरे सामने रख दिया |,वह भी बहुत हिम्मत की तो रुपये की तीन सेर मिठाई खिला दी ।,' प्रधान ने मुस्कराकर प्रतिज्ञा-पत्र मेरे सामने रख दिया । क्या बात पत्र द्वारा न हो सकती थी ?,वह मुझसे क्या कहना चाहती है ?,क्या बात पत्र द्वारा न हो सकती थी ? इत्र और गुलाब की सुगन्ध उड़ रही थी ।,कमरा बिजली की दिव्य वत्तियों से ज्योतिर्मम हो रहा था।,इत्र और गुलाब की सुगन्ध उड़ रही थी । कर्कश स्वर में प्यादे से बोला --- तुम अभी यहीं खड़े हो ?,"' रमा सारी दुनिया के सामने जलील बन सकता था, किंतु पिता के सामने जलील बनना उसके लिए मौत से कम न था ।","कर्कश स्वर में प्यादे से बोला, 'तुम अभी यहीं खड़े हो ?" उसने जल्दी से किवाड़ खोले; चटपट दीया जलाया भर छुल्हे 55. में श्राग जलाने लगी ।,बातों में उसे मालूम ही न हुआ कि कितनी रात चली गई ।,उसने जल्दी से किवाड़ खोले; चटपट दीया जलाया ओर चूल्हे में आग जलाने लगी । "इसके प्रतिकूल उन्हें अपने कर्तव्य के पूरा करने का सन्‍्तोष था, झौर वह पछता रहे ये कि मैंने इसमें इतना विलम्ब क्यों किया ?",इसकी शंका होने पर भी विट्ठडलदास को यह क्षोभ नहीं था जो किसी झगड़े के बाद मेघ के समान हृदयाकाश पर छा जाया करता है ।,"इसके प्रतिकूल उन्हें अपने कर्त्तव्य के पूरा करने का संतोष था, ओर वह पछता रहे थे कि मैंने इतना विलम्ब क्यों किया ।" "उनका कथन था कि जब तक जनता स्वयं अपनी रक्षा करना न सीखेगी, ईश्वर भी उसे अत्याचार से नहीं बचा सकता ।",सबलों के अत्याचार पर ही उनकी खास निगाह रहती थी ।,"उनका कथन था कि जब तक जनता स्वयं अपनी रक्षा करना न सीखेगी, ईश्वर भी उसे अत्याचार से नहीं बचा सकता ।" भय की भाँति साहप भी संक्रमक होता है,अब मामला नाजुक था,भय की भाँति साहस भी संक्रामक होता है "जब राजा उठ गये और उसने थाछू को देखा, तो कलेजा धक से हो गया और पेरो तले से मिद्ठी निकल गयो ।",इसके आवेश में दर्शनानुराग भी विदा हुआ ।,"जब राजा उठ गए और उसने थाल को देखा, तो कलेजा धक से हो गया और पैरों तले से मिट्टी निकल गई ।" "अमरनाथ--लाहीर ड्रामेटिक क्लब का मालिक हफ्ते भर यहाँ पड़ा रहा, पेरों पड़ा कि मुझे यह नाटक दे दीजिए ; लेकिन आपने न दिया ।","ड्रामा ऐसा चाहिए कि जो सुने, दिल हाथों से थाम ले ।","अमरनाथ लाहौर ड्रामेटिक क्लब का मालिक हफ्ते भर यहाँ पड़ा रहा, पैरों पड़ा कि मुझे यह नाटक दे दीजिए, लेकिन आपने न दिया ।" सुखदा ने समीप जाकर चौकीदारिन को दृसया भर क्रेदिन करा द्वाथ पकड़कर करे में ले गई,सुखदा के लगातार लिखा-पढ़ी करने पर यह टहलनी दी गई थी पर यह कांड देखकर सुखदा का मन क्षुब्धा हो उठा,सुखदा ने समीप जाकर चौकीदारिन को हटाया और कैदिन का हाथ पकड़कर कमरे में ले गई इसका भय नहीं ।,शायद दो-चार साल के लिए सरकार की मेहमानी खानी पड़े ।,इसका भय नहीं । कितना निराशा-जनक होता है यह दृश्य जब देखता हूं. कि मेले सें बच्चा कियों खिलौने को दूकान के सामने मचल रहा है और पिता महोदय ऋषियों को-छी विद्वत्ता के साथ उनको क्षणभंगुरता का राग अलाप रहे हैं ।,"मुझसे यह नहीं हो सकता था कि सुनकर पेट में डाल लेता; मगर अब करना क्या चाहिए, यह मैं खुद निर्णय नहीं कर सकता ।","कितना निराशाजनक होता है यह दृश्य, जब देखता हूँ कि मेले में बच्चा किसी खिलौने की दुकान के सामने मचल रहा है और पिता महोदय ऋषियों की-सी विद्वता के साथ उनकी क्षणभंगुरता का राग अलाप रहे हैं ।" में भी आदमी पहचानता हैँ ।,उधर जाड़े का दिन किसी विलासी के धन की भाँति भागा चला जाता था ।,मैं भी आदमी पहचानता हूँ । इसलिए बहाँ से भी वह उठा लिया गया,उसका भी विवाह प्रयाग के एक धनी घराने में हुआ था,इसलिए वहाँ से भी वह उठा लिया गया "रेगिणी ने प्रमीला की आवाज्ञ छुतकर आँखें खोल दीं और मन्द स्वर में बोली-- आओ माताजी, बेठो ।","भगवान् की व्यापकता का, दया का रूप आज जीवन में पहली बार उन्हें दिखायी दिया ।","रोगिणी ने प्रमीला की आवाज सुनकर आँखें खोल दीं और मन्द स्वर में बोली, ‘आओ माताजी, बैठो ।" उसे तेज़ मोटर चलाने की धुन थी ; पर आज वह ताँगे से भी कम जा रही थी |,इसी उधेड़-बुन में वह आज रतन से न मिल सकी ।,"उसे तेज़ मोटर चलाने की धुन थी, पर आज वह तांगे से भी कम जा रही थी ।" सारा देश भआत्म-क्षा के लिए तेयार दो गया था ।,ईरानी दिन-दिन बढ़ते जाते थे और यूनान के लिए संकट का सामना था ।,सारा देश आत्मरक्षा के लिए तैयार हो गया था । "जब यह जीवन आपकी सेंट हो गया, तो आप इसे मारें या जिलाये, यह आपकी इच्छा है ।","आप पुरुष हैं , आपके ह्रदय में दया है, सहानुभूति है, उदारता है, मैं विश्वास नहीं कर सकती कि आप मुझ जैसी नाचीज़ पर क्रोध कर सकते हैं ।","जब जीवन आपकी भेंट हो गया , तो आप मारें या जिलायें, यह आपकी इच्छा है ।" क्यों १ में साती-पदनती हैं गहने बनयाती हूँ पुस्तक ठेती हूँ पत्रिशाएँ मेंगपानी हैं दसरों ही को कमाई पर तो १ इसझ्ा तो यदू आद्यय भी हो सझता है दि मुते हुम्दागे ऋगाठ पर भोकोई सविकार नहों,सुखदा ने निर्दयता के साथ कहा-तो जब तुम अपने पिता से कुछ लेना अपमान की बात समझते हो तो मैं क्यों उनकी आश्रित बनकर रहूँ- इसका आशय तो यही हो सकता है कि मैं भी किसी पाठशाला में नौकरी करूँ या सीने-पिरोने का धंधा उठाऊँ- अमरकान्त ने संकट में पड़कर कहा-तुम्हारे लिए इसकी जरूरत नहीं,क्यों मैं खाती-पहनती हूँ गहने बनवाती हूँ पुस्तकें लेती हूँ पत्रिकाएं मंगवाती हूँ दूसरों ही की कमाई पर तो- इसका तो यह आशय भी हो सकता है कि मुझे तुम्हारी कमाई पर भी कोई अधिकार नहीं कोई बात न सूझ्की ।,"उसे आदमी डाँटता भी है, मारता भी है, जब चाहता है, रखता है, जब चाहता है, निकाल देता है ।",कोई बात न सूझी । "जालपा तड़पकर बोली -- वह मेरे कौन होते हैं, जो उनसे पूछें ?",' देवीदीन ने रतन की कोठरी में जाकर देखा ।,"जालपा तड़पकर बोली--वह मेरे कौन होते हैं,जो उनसे पूछूँ ?" माठम होगा में भी आदमी हैँ,खुदा जानता है नौकरी से मेरी देह काँपती है लेकिन करूँ क्या अब्बाजान हाथ धोकर पीछे पड़े हुए हैं,मालूम होगा मैं भी आदमी हूँ प्म--दृूथ ही बन्द कर दो ।,ओर किस खर्चे में कमी करने को कहते हो ?,पद्म -- दूध ही बन्द कर दो । पूरे एक हजार का माल उठ गया ।,"मेरे ही घर चोरी हुई, तो क्या बाहर के चोर थे ?",पूरे एक हजार का माल उठ गया । "जब इनके पास इतना धन है, तो फिर मेरे गहने क्‍यों नहीं बनवाते ?",सबके- सब मेरे प्राण के ग्राहक हो रहे हैं ।,"जब इनके पास इतना धन है, तो फिर मेरे गहने क्यों नहीं बनवाते ?" "रमा ने उसका कोई जवाब न दिया, आगे बढ़ा ।",कल रूपये जुटा रखना ।,"' रमा ने उसका कोई जवाब न दिया, आगे बढ़ा ।" "यहाँ रह- कर वह घर की देखभाल न कर सकता था, भाइयों को शिक्षा न दे सकता था और न माता-पिता को सेवा-सत्कार कर सकता था ।",आख़िर में अम्माँ और दादा का ज़िक्र आया ।,"यहाँ रहकर वह घर की देखभाल न कर सकता था, भाइयों को शिक्षा न दे सकता था और न मातापिता की सेवा-सत्कार कर सकता था ।" बढ़ाया लगान ने उन्हें अपने दिल का गुबार निकालने का मौका देदिया,महन्तजी के प्यादे और कारकून पहले ही से जले बैठे थे,बकाया लगान ने उन्हें अपने दिल का गुबार निकालने का मौका दे दिया मुन्नो जेसे सम्मोददन-शक्ति से उसे भपनी भोर खोँचने लगी,अमरकान्त ने आश्चर्य से कहा-तुम तो पहेलियों में बातें करने लगीं,मुन्नी जैसे सम्मोहन-शक्ति से उसे अपनी ओर खींचने लगी मुफ़्त छा काम बेगार समा जाता है,अमरकान्त दोनों स्त्रियों का रेणुका से परिचय कराके बाहर निकला तो प्रो शान्ति कुमार से मुठभेड़ हुई,मुर्ति का काम बेगार समझा जाता है तब से सत्यप्रकाश प्रतिमास ज्ञानू के पास कुछ न कुछ अवश्य भेज देता था ।,अब उन्होंने अपना वृत्तांत सुनाना शुरू किया ।,तब से सत्यप्रकाश प्रतिमाह ज्ञानू के पास कुछ न कुछ अवश्य भेज देता था । "अगर पचास-साठ रुपये महीने भी बच जायें, तो पाँच साल में जालपा गहनों से लद जायेगी ।",मुझे यहीं सबसे अच्छा लगता है ।,"अगर पचास-साठ रूपये महीने भी बच जायं, तो पांच साल में जालपा गहनों से लद जाएगी ।" इसपे ज्यादा अपनो ग्ररोबी का और क्या प्रप्माण-दूँ ।,मैं इन चकमों में नहीं आता ।,इससे ज्यादा अपनी गरीबी का और क्या प्रमाण दूँ । कुबर ने गागर का मु ह पकड़कर कहा--इस अपराध का बहुत दड सह चुका हूँ ।,चंदा क्यों पानी लेने गयी थी ?,कुँवर ने गागर का मुँह पकड़ कर कहा -इस अपराध का बहुत दंड सह चुका हूँ । ह ह उम्रानाथ भी वहीं बेठा हुआ था ।,फूलमती निर्मम भाव से बोली- मैं बीमार न पडूँगी ।,उमानाथ भी वहीं बैठा हुआ था । हा हतमाग्य ! में अपने को कितनी खुशनसीब समम्कती थी ।,"मोटर की जरूरत नहीं, फिटन पर बैठने से ज्यादा लाभ होगा ।",हा हतभाग्य ! मैं अपने को कितनी खुशनसीब समझती थी । "भावुक प्रकृति, कोमल गात, याचना-भरे नेत्र, बिम्ब-अधर, चंपई रंग, भंग-अग में घपलता भरी हुई, पहले गोंद की तरद् शुष्ध्र और रठोर, भाद्र द्ोते ही चिपक जाने- खाली ।","कविता इतने सुन्दर अक्षरों में लिखी थी, लेखिका का नाम इतना मोहक था कि सम्पादकजी के सामने उसका एक कल्पना-चित्र सा आकर खड़ा हो गया ।","भावुक प्रकृति, कोमल गात, याचना-भरे नेत्र, बिंब-अधर, चंपई रंग, अंग-अंग में चपलता भरी हुई, पहले गोंद की तरह शुष्क और कठोर, आर्द्र होते ही चिपक जाने वाली ।" वायी ओर हरे-भरे खेत थे |,रास्ता दो फरलाँग से कम न था ।,बायीं ओर हरे-भरे खेत थे । मेडेवाले आ गये ।,दूसरी गोली सिर पर मारी और उसके साथ ही रिवाल्वर लिये नीचे कूदी ।,मेलेवाले आ गये । थ्रद्ध विवार आते ही वह घर लौटे ।,"चलूँ गजाधर के पास, सम्भव है, वह घर आ गई हो ।",यह विचार आते ही वह घर लोटे । रोने की वात पर हँसती हँसने की बात ॥ पर रोती,तुम्हारी रानीजी क्या कर रही हैं- सिल्लो का पूरा नाम था कौशल्या,रोने की बात पर हँसती हँसने की बात पर रोती परिडतजों यो चहुत ही वलिष्ठ पुरुष ये; उन दानों को एक घक्फे में गिरा सकते थे |,"पंडित जी ने शंकित हो कर पूछा , तुम कौन हो ?","पंडित जी यों बहुत ही बलिष्ठ पुरुष थे, उन दोनों को एक धक्के में गिरा सकते थे ।" तुम समभती हो कि मैं ऐसी तुच्छ वस्तुओं से प्रेम मोल लेना चाहता हूँ ।,सदन -- इसलिए कि तुम मुझे बाणों से छेदती हो ।,तुम समझती हो कि मैं ऐसी तुच्छ वस्तुओं से प्रेम मोल लेना चाहता हूँ । एक के मिर पर मटका था जिसमें ऊख का रस था ।,दूसरे दिन गरीब आया तो उसके साथ तीन हृष्ट-पुष्ट युवक भी थे ।,एक के सिर पर मटका था जिसमें ऊख का रस था । बह अपनी नीति का समर्थन मुँद से चाहे ऋर ले हृदय से नहीं कर सक्तता,तुमने मेरा अभिमान तोड़ दिया,वह अपनी नीति का समर्थन मुँह से चाहे कर ले हृदय से नहीं कर सकता "फर्श को पच्चोकारी, को देख कर उम्र पर पाँव बर्ते सकोच होता था ।",समझ गये आज शत्रुओं के पंजे में फँस गया और ऐसा बुरा फँसा कि भगवान् ही निकालें तो निकल सकता हूँ ।,फर्श की पच्चीकारी को देख कर उस पर पाँव धरते संकोच होता था । ” लेकिन अपने वश की बात तो थी नहीं |,वह दो-तीन बार उछला-कूदा पर आगे न बढ़ा ।,' लेकिन अपने वश की बात तो थी नहीं । "दहेज को छुप्रपा पर मेंने खुद कोई व्याख्यान नहों दिया, शायद छोईं नौट तर नहदों लिखा |",मेरी समझ में तो ऐसी दशा में लड़के के पिता से यह शिकायत न होनी चाहिए ।,"दहेज की कुप्रथा पर मैंने खुद कोई व्याख्यान नहीं दिया, शायद कोई नोट तक नहीं लिखा ।" "तुमसे सच कहता हूँ, बिरादरी के अन्याय से कछेश्ा चलनो हो गया है ।","पिताजी रोयेंगे, अम्माँ प्राण त्याग देंगी; लेकिन एक बालिका का जीवन तो सफल हो जायगा, मेरे बाद कोई अभागा अनाथ तो न रोयेगा ।",तुमसे सच कहता हूँ बिरादरी के अन्याय से कलेजा चलनी हो गया है । दारोगा-अब तो शायद ही उसका पता लगे |,"जरा भी न शरमायी, जरा भी न झिझकी ।","दारोगा , अब तो शायद ही उसका पता लगे ।" "कहार ने पकाया, खाया, लेटा, घातें होने छगीं ।",तब से यहीं पड़ा हुआ हूँ ।,"कहार ने पकाया , खाया , लेटा , बातें होने लगीं ।" एकाएक उसे ऐसा जान पड़ा कि तार के बाहर वृक्षों की आड़ में कोई है ।,"यही धुन सवार थी, कैसे यहाँ से निकल जाऊँ ।",एकाएक उसे ऐसा जान पडाकि तार के बाहर वृक्षों की आड़ में कोई है । पाँव-पाँव चलेंगे १,अमर के प्रति इस समय उसके मन में सच्ची सहानुभूति उत्पन्न हुई,पाँव-पाँव चलेंगे कृष्णचन्द्र की आत्मग्लानि से भरी हुईं बातें उमानाथ को श्षीत्न भूल गई और उनके कृतध्त शब्द कानों में गूंजने लगे ।,"छाले पर मक्खन लगाने से एक क्षण के लिए कष्ट कम हो जाता है, किंतु फिर ताप की वेदना होने लगती है ।",कृष्णचन्द्र की आत्मग्लानि से भी हुई बातें उमानाथ को शीघ्र ही भूल गई और उनके कृतघ्न शब्द कानों में गँजने लगे । "उसकी श्रान्तरिक अवस्था तो ज्ञात नहीं, पर वह सदैव साफ-सुथरे कपड़े पहनता और प्रसन्न-चित्त रहता |","यही उसकी जीविका थी, पर वह अपनी दशा पर संतुष्ट था ।","उसकी आंतरिक अवस्था तो ज्ञात नहीं, पर वह सदैव साफ-सुथरे कपड़े पहनता और प्रसन्नचित्त रहता ।" किसी तरह उसे प्रसन्न करना चाहता था ।,इन्हें काम के बोझ से आजकल सिर उठाने की भी फुर्सत नहीं है ।,किसी तरह उसे प्रसन्न करना चाहता था । वे हो भोलो-भोली बातें इस समय याद प्न्‍्यारुर माता के छहठय की शूल ऊे समान बेव रही थों ।,उसके लिए उसने नन्ही-सी खुरपी और नन्ही-सी खाँची बनवा दी थी ।,वे ही भोली-भोली बातें इस समय याद आ-आकर माता के हृदय को शूल के समान बेध रही थीं । बाप ने दूसरा विवाह कर लिया है|,"इतना प्रसन्न था, मानो सोने की गठरी लिए जाता हो।",बाप ने दूसरा विवाह कर लिया है। मै उनके .समांचार पूछ ही रही घी कि उसी गुफा के एक कोने मरे कियो के कराहने का शब्द खुनायी दिया ।,जैसे सर्प अपना शिकार छिन जाने से फुफकारता हुआ लपकता है उसी प्रकार गरजती हुई लपटें मेरे पीछे दौड़ीं ।,मैं उनके समाचार पूछ ही रही थी कि उसी गुफा के एक कोने से किसी के कराहने का शब्द सुनायी दिया । "साफ़-साफ़ कह दूँगा, पुलिस ने मुझे धोखा देकर शहादत दिलवायी है ।",उससे मेरा ताल्लुक नहीं ।,"साफ-साफ कह दूँगा, पुलिस ने मुझे धोखा देकर शहादत दिलवाई है ।" दोनों में पहले से कुछ बातचीत रही दोगी ।,इधर मिस खुरशेद और युवक में बातें होने लगीं ।,दोनों में पहले से कुछ बातचीत रही होगी । तीन महीने की तपस्या था ही रही |,"अच्छा , तो अपना-अपना नाम सुनने के लिए तैयार हो जाओ ।",तीन महीने की तपस्या यों ही रही ? "इसी एक चुटको राख में उसका शुद्धियोवाला दचयन, उप्रक्ता सतप्त यौवव और उसका तृप्णामय बेधव्य सब समा गया ।",आँसू बहने लगे ।,"इसी एक चुटकी राख में उसका गुड़ियोंवाला बचपन, उसका संतप्त यौवन और उसका तृष्णामय वैधव्य सब समा गया ।" रानी--मेरी मोटर ले लीजिए |,"मेरे एक परममित्र पंडित चिंतामणि जी हैं, आज्ञा हो तो उन्हें भी बुला लूँ ।",' रानी - टमेरी मोटर ले लीजिए । इस पर साधोराय ने कह्ा--अब में रोज तुम्हारे पास आऊँगा ।,प्रायः रात के सन्नाटे में यह गरजती हुई आवाज सुनकर स्त्रियाँ चौंक पड़ती थीं ।,इस पर साधोराय ने कहा- अब मैं रोज तुम्हारे पास आऊँगा । दस बजे सहसा फिर बाजें बजने लगे |,द्वारचार के बाद बरात जनवासे चली गई ।,दस बजे सहसा फिर बाजे बजने लगे । "ताहिर-हुजूर, अब आइंदा ऐसी गलती न होगी ।",ताहिर-मैंने तो समझा कि वह मेरा हक है ।,"ताहिर-हुजूर, अब आइंदा ऐसी गलती न होगी ।" "उस समय उस हम्बे-चोड़े मदान में जहाँ तक निगाह जाती थी, आदमी हो भादमी नजर आते थे, पर चारो तरर सन्नाटा था ।",इन हृदय-विदारक दृश्यों को देखकर मैंने दुखित हृदय से एक आदमी से जो देखने में सभ्य मालूम होता था पूछा महाशय मैं एक परदेशी यात्री हूँ ।,"उस समय उस लंबे-चौड़े मैदान में जहाँ तक निगाह जाती थी, आदमी ही आदमी नज़र आते थे, पर चारों तरफ़ सन्नाटा था ।" "विलऊुल नहीं , वही उसके जीवन को सबसे मधुर स्म्ृतियाँ हैं |","अगर तारा दुखी होती , कष्ट में होती , फटेहालों में होती , तो मैं उस पर बलि हो जाता ; पर सम्पन्न , सरस , विकसित तारा मेरी संवेदना के योग्य न थी ।","बिल्कुल नहीं , वही उसके जीवन की सबसे मधुर स्मृतियाँ हैं ।" कूदाचित्‌ यह इस बुझूते हुए दीपछ की अन्तिम फछक थी ।,मुझे तो यह आश्चर्य है कि यहाँ पहुँच कैसे गया ।,कदाचित् यह इस बुझते हुए दीपक की अन्तिम झलक थी । "चुप रहो वेटा, अब तुम उनके पास कमी मत्त जान्म |","मैं दौड़ा हुआ घर गया, लेकिन अम्माँ जी को कुछ कहने के बदले बिलख-बिलख कर रोने लगा ।","चुप रहो बेटा, अब तुम उनके पास कभी मत जाना ।" कितनी ही पुस्तकों की भूमिका भी लिख चुका हूँ |,"ढपोरसंख ने गम्भीर होकर कहा, 'झूठ वह बोलता है, जिसका पक्ष निर्बल होता है ।",कितनी ही पुस्तकों की भूमिका लिख भी चुका हूँ । बोला-हम तुमको निकाल देंगे ।,जैनब समझ गई कि यह अहीरन कच्ची गोटी नहीं खेली है ।,बोला-हम तुमको निकाल देंगे । उन्हीं के फेर में पढ़कर अमर घर से फिर उदासीन हो गया है,सुखदा भी खुश हुई,उन्हीं के फेर में पड़कर अमर घर से उदासीन हो गया है व्यंग्योक्ति ही से काम लिया ।,यहाँ तक कि मैंने विरोध को गंभीर विचार के लायक भी न सोचा ।,व्यंग्योक्ति ही से काम लिया । गरीब को यो न दुत्कारना चाहिए ।,"इसी भाँति एक दिन रामेश्वरी ने एक भिक्षुक को दुत्कार दिया, तो बाबू साहब ने फिर उपदेश देना शुरू किया ।",गरीब को यों न दुत्कारना चाहिए । "आधात ऐसा कठोर था कि हृदय और मस्तिष्क की सम्पूर्ण शक्तियाँ, सम्पूर्ण विचार और सम्पूर्ण भार उसी शोर आकर्षित हो गये ये |","जिन लोगों के बढ़ावे में आ कर सुक्खू ने ठाकुर से छेड़छाड़ की थी, उनका दर्शन मिलना दुर्लभ हो गया ।","आवाज़ ऐसी कठोर थी कि हृदय और मष्तिष्क की सम्पूर्ण शक्तियाँ, सम्पूर्ण विचार और सम्पूर्ण भार उसी ओर आकर्षित हो गए थे ।" हमको किताब के कीड़े बनने की जरूरत नहीं ।,कुँवर -- पढ़ना हम लोगों को मना है ।,हम को किताब के कीड़े बनने की जरूरत नहीं । खुद रानीजी प्राय: मेरे पास बैठी पंखा झलती रहती हैं ।,सभी सहृदयता और विनय के पुतले हैं ।,खुद रानीजी प्राय: मेरे पास बैठी पंखा झलती रहती हैं । "कोकिला ने गद्गद होकर कहा--नहीं बेटी, उस परम दयालु भगवान से यही प्राथना है कि तुम्दारी-जेसी सुशील लड़की सबको दे |",ये लोग अनाथों की खोज-खबर न लें तो कौन ले ।,"' कोकिला ने गदगद होकर कहा, 'नहीं बेटी, उस परम दयालु भगवान् से यही प्रार्थना है कि तुम्हारी जैसी सुशील लड़की सबको दे ।" पन्द्रह साल के बाद भूतपरवे सेठ खूबचन्द अपने नगर के स्टेशन पर पहुँचे ।,"धर्म और अधर्म , सेवा और परमार्थ के झमेलों में पड़कर मैंने बहुत ठोकरें खायीं ।",पन्द्रह साल के बाद भूतपूर्व सेठ खूबचन्द अपने नगर के स्टेशन पर पहुँचे । "ज्षरा इन्हें बुला लिया और खुशामद के दो-चार शब्द छुना दिये, थोड़ो-सो स्तुति कर दी, बस व्यपका मिज्ञाज आसम्राव पर जा पहुँचा ।","मैं शोहदा था, लुच्चा था, लेकिन जब से तुझे देखा है, मेरे मन से सारी खोट मिट गयी है ।","जरा इन्हें बुला लिया और खुशामद के दो शब्द सुना दिये, थोड़ी-सी स्तुति कर दी, बस आपका मिजाज आसमान पर जा पहुँचा ।" डिप्टी साहब बोल रहे थे -- इस रमानाथ ने बड़ा गोलमाल कर दिया है ।,उठकर बैठे ही थे कि टेलीगषेन पर पुकार हुई ।,"डिप्टी साहब बोल रहे थे,इस रमानाथ ने बडा गोलमाल कर दिया है ।" सकड़ा पूरा करके उठे द्वी थे कि के हुई ।,"यहाँ पर हृदयगत कोमल भावों का अपहरण कर लेता है- चरित्र में अस्वाभाविक विकास उत्पन्न कर देता है- मनुष्य लोक-लाज और उपहास की ओर से उदासीन हो जाता है, नैतिक बंधन टूट जाते हैं ।",सैकड़ा पूरा करके उठे ही थे कि कै हुई । वागीश्वरी--ईश्वर को धन्यवाद दो बेटी ।,इस दान से मुसलमानों के दिलों पर भी उसका सिक्का बैठ गया ।,वागीश्वरी--ईश्वर को धन्यवाद दो बेटी । धर्मात्मा लोग भी उसका आदर करते हैं।,"भोली के सामने केवल धन ही सिर नहीं झुकाता, धर्म भी उसका कृपाकांक्षी है ।",धर्मात्मा लोग भी उसका आदर करते हैं । जरा अवकाश मिले तो इसका पता लगाऊँ ।,एक बार भी उनके चेहरे पर हँसी न दिखायी दी ।,जरा अवकाश मिले तो इसका पता लगाऊँ । विवाद के कट्टर विरोधी स्वतन्त्रता-प्रेस के कट्टर भक्त बहुत ही प्रसन्न-मुख सहृदंय सेवाशील व्यक्ति थे,अमरकान्त ने विरोध किया-मुझे तो इन गाँवों में एक भी ऐसा किसान न मिला,विवाह के कट्टर विरोधी स्वतंत्रता-प्रेम के कट्टर भक्त बहुत ही प्रसन्न मुख सहृदय सेवाशील व्यक्ति थे इस समय उसके मन में कोई बुरा भाव न था ।,सदन ने उसे देखते ही लपक कर उठा लिया ।,इस समय उसके मन में कोई बुरा भाव न था । सत्यप्रकाथ को भो कई युवकों से मित्रता हो गयी थी ।,वह अपनी दशा पर संतुष्ट था ।,सत्यप्रकाश को भी कई युवकों से मित्रता हो गयी थी । आते ही आते दोनों बुआ जी के पास जाकर खाने को माँगने लगे।,तानों से सीख मिलने के बदले उलटा और जी जलने लगता है।,आते ही आते दोनों बुआजी के पास जाकर खाने को माँगने लगे। अब उसे रोटियों के भी लाले हैं ।,उसका सूखा हुआ साँवला चेहरा उत्तेजित हो उठा ।,अब उसे रोटियों के भी लाले हैं । मेंने तो कलकत्ता से मि० लेसेट को घुला लिया है,मैं तुम्हारे लिए सवारी भेजूँगी कृपा करके कभी-कभी हमारे यहाँ आ जाया करो,मैंने तो कलकत्ता से मि. लैंसट को बुला लिया है प्न साला महंतजी तीथंयात्रा करने गये थे।,"यह दल जिस गांव में जा पहुँचता था, उसकी शामत आ जाती थी ।",इस साल महंतजी तीर्थयात्रा करने गए थे । "सुमन अपने पड़ोसियों को जितनी शिक्षा देती थी, उससे अधिक उनसे ग्रहण करती थी ।","हमारा चरित्र कितना ही दृढ़ हो, पर उस पर संगति का असर अवश्य होता है ।","सुमन अपने पड़ोसियों को जितनी शिक्षा देती थी, उससे अधिक उनसे ग्रहण करती थी ।" कमर झुक गई हाँफ उठे और लाश को ज़मीन पर पटकनेवाले ही थे कि मिर्ज़ा ने उन्हें सहारा देकर आगे बढ़ाया,निकल जाने वाले पर लानत भेजता हूँ,कमर झुक गई हाँफ उठे और लाश को जमीन पर पटकने वाले थे कि मिर्जा ने उन्हें सहारा दे कर आगे बढ़ाया बे खाने दो कोई बात नहीं दे ।,सवा सेर तो एक जून को चाहिए ।,बड़े- खाने की कोई बात नहीं है । हाजी साहब का जनता पर बड़ा प्रभाव था और वह शहर के सदस्य मुसलमानों के नेता समभे जाते थे।,पहले हाजी साहब ने मुसलमान मेम्बरों को एकत्र किया ।,हाजी साहब का जनता पर बड़ा प्रभाव था और वह शहर के समस्त मुसलमानों के नेता समझते जाते थे । भोजन बनाना स्त्रियों के लिए सबसे आवश्यक बात है,प्रताप को गोद में उठा लिया और फिर दोनों बच्चों का हाथ पकड़े हुए सुशीला के पास गये,भोजन बनाना स्त्रियों के लिए सबसे आवश्यक बात हे वसुधा को इक्ष ससार के व्यापार से कोई रुचि न ' थी ; बल्कि अरुचि थी ।,""" जब शिकारी सब खालें लेकर चला गया , तो कुँवर साहब ने कहा, मैं इस खाल पर काले ऊन से अपना समर्पण लिखूँगा ।","वसुधा को इस संसार के व्यापार से कोई रुचि न थी , बल्कि अरुचि थी ।" कितने खुश थे सब सातों हवाई जहाज़ पर बेठ थये हो ।,पन्ना चकित नेत्रों से यह दृश्य देख रही थी और सोच रही थी कि यह वही रग्घू है या कोई और ।,"कितने खुश थे सब, मानों हवाई जहाज पर बैठ आये हों ।" अब तो वह रियासत के दाहिने हाथ बने हुए थे ।,वास्तव में उन पर प्रमाद का रंग छाया हुआ था ।,अब तो वह रियासत के दाहिने हाथ बने हुए थे । "केवल शत्य, निराश, करुण, आहत नेत्रों से लोगों को ओर देखता रहा, सावो उसकी वाणी हर गई है ।",जेनी सिर पर हाथ रखकर बैठ गयी ।,केवल शुन्य निराश करुण आहत नेत्रो से लोगो की ओर देखता रहा मानो उसकी वाणी हर लीगयी है । "उसने तीरय करने के वास्ते लिये थे, वह उसी काम में लगेंगे ।",क्या उसके प्राण का मूल्य इतना भी नहीं है ।,"उसने तीरथ करने के वास्ते लिये थे, वह उसी काम में लगेंगे ।" एक दिन बुलाकी श्रोखली मे दाल छाँ- रही थी |,"किस खेत में क्या बोना है, किसको क्या देना है, किसको क्या लेना है, किस भाव क्या चीज बिकी, ऐसी-ऐसी महत्त्वपूर्ण बातों में भी भगत जी की सलाह न ली जाती थी ।",एक दिन बुलाकी ओखली में दाल छाँट रही थी । "तुम अपनों देखो, मेरी चिंता न करो ।",यहाँ किसी ने जनम भर का ठीका नहीं लिया है ।,"तुम अपनी देखो, मेरी चिंता न करो ।" रोशनुद्दौढ़ा की बादशाही है ।,इस एक महीने में शहर के सैकड़ों बड़े-बड़े रईस मिट गये ।,रोशनुद्दौला की बादशाही है । साहब कह्दते थे कि में ठ॒म्हे रोज अच्छी-अच्छी चीज़ें खिलाऊँगा ।,साहब बड़े अच्छे हैं ।,साहब कहते थे कि मैं तुम्हें रोज अच्छी-अच्छी चीजें खिलाऊँगा । त्तारा चौंक पड़ी ।,पानी में लहरें उठने लगीं ।,तारा चौंक पड़ी । गूदढ़ को उम्र साठ के लगभग थी मगर अभी टॉठा था,इस गाँव में कोई-जमींदार न रहता था,गूदड़ की उम्र साठ के लगभग थी मगर अभी टाँठा था "पलंग हुआ था, दामा जल रही थी, वजू का पानी रखा हुआ था ।","प्रेम का फूल कभी नहीं मुरझाता, प्रेम की नींद कभी नहीं उतरती ।","पलंग बिछा हुआ था, शमा जल रही थी, वजू का पानी रखा हुआ था ।" कृष्ण और भज्जुन तक को एक नये तक की शरण लेती पढ़ी,गृहस्थी के चरखे में पड़कर बड़े-बड़ों की नीति भी स्खलित हो जाती है,कृष्ण और अर्जुन तक को एक नए तर्क की शरण लेनी पड़ी सिल्लो भी सुखदा के साथ चली गई थी,अमर इसी तरह का त्यागी था,सिल्लो भी सुखदा के साथ चली गई थी संसार-भर की विद्दा तुम्हीं नहीं पढ़े हो,गाँव का हाल जान कर भी अनजान बनते हो,संसार-भर की विद्दा तुम्हीं नहीं पढ़े हो यहाँ तक कि डा० द्ान्तिकुमार ने भी उसे बहुत सम: माया पर वह अपनी ज़िद पर अड़ा रहा,सकीना बाजरे की रोटियाँ मसूर की दाल के साथ खाकर टूटी खाट पर लेटी और पुराने गटे हुए लिहाफ में सर्दी के मारे पांव सिकोड़ लिए पर उसका हृदय आनंद से परिपूर्ण था,यहाँ तक कि डॉ. शान्तिकुमार ने भी उसे बहुत समझाया पर वह अपनी जिद पर अड़ा रहा हमारे और उनके बीच में दो-ढाई सौ मिक्र का अन्तर था ।,कुछ तो विचार से काम लो ।,हमारे और उनके बीच में दो-ढाई सौ मील का अन्तर था । इसके राजा दूदेले है ।,इन्स.-सुनी या न सुनी यह बहस नहीं है ।,इसके राजा बुंदेले हैं । "हम दोनो मे कभी-कभी लड़ाई भी होती थी, और कई-कई दिनो तक वातचीत को नौवत न आती, लेकिन ज्यादतो कोई करे, मनाना उसी को पढ़ता था ।",केवल रस्में बाकी थीं ।,"हम दोनों में कभी-कभी लड़ाई भी होती थी और कई-कई दिनों तक बातचीत की नौबत न आती ; लेकिन ज्यादती कोई करे , मनाना उसी को पड़ता था ।" उसने फिर घुढुढे को चाँद लगाया पर चाँदा पड़ने के पहले ही जामिद ने उसकी गदन पकड् ली ।,"जामिद-- खोद कर गाड़ दोगे, भाई साहब, तो तुम भी यों खड़े न रहोगे ।","उसने फिर बुड्ढे को चाँटा लगाया, पर चाँटा पड़ने के पहले ही जामिद ने उसकी गरदन पकड़ ली ।" शान्तिऊुमार एक क्षण खड़े रहे फिर दताश होझर चलने को तेयार हुए,समय आ जाने पर गरीबों के घर भी बन जायेंगे,शान्तिकुमार एक क्षण खड़े रहे फिर हताश होकर चलने को तैयार हुए उपर से डॉद सड़तो तो वादशाह अपना भुस्मा राजासाहव पर उतारते ।,वह बड़े प्रेम से आपकी रचनाओं को पढ़ती हैं ।,उधर से डाँट पड़ती तो बादशाह अपना गुस्सा राजा साहब पर उतारते । आशा का कच्चा धागा मुझे अब भी जीवन से वाँधे हुए है ।,"वह नहीं जानते कि मेरे लिए मसूरी नहीं , स्वर्ग भी काल-कोठरी है ।",आशा का कच्चा धागा मुझे अब भी जीवन से बाँधे हुए है । जिस जाति के युवकों में अपने पीड़ित भाइयों के प्रति ऐसी करुणा और यह अय्ल प्रेम है वह ससार में सदेव यश-कीत्ति की भागी रहेगी ।,ऐसी हरकत बौड़म लोग किया करते हैं ।,जिस जाति के युवकों में अपने पीड़ित भाइयों के प्रति ऐसी करुणा और यह अटल प्रेम है वह संसार में सदैव यश-कीर्ति की भागी रहेगी । यहाँ तो वद्दी घटा स्रोने का :है ।,मुझे कभी-कभी झपकियाँ आ जाती हैं ।,यहाँ तो वही घंटा सोने का है । भोर होते हो हमारी आँखें केलेंडर पर जाती ।,गौरा ने कहा — गौरा ।,भोर होते ही हमारी आँखें कैलेंडर पर जातीं । चचा साहव हूँ वह पहर सात तक शौरे के पीपों के पास खड़े दोकर उन्हें गाट़ी पर लद॒वाते हैं ।,मुझे यह बौड़म का लकब मिला है ।,"चचा साहब हैं, वह पहर रात तक शीरे के पीपों के पास खड़े हो कर उन्हें गाड़ी पर लदवाते हैं ।" मेरे साथ उुम्हें सदैव ही दुख भोगना पड़ा |,इस समय उस पत्र को पढ़ने की प्रबल इच्छा हुई ।,मेरे साथ तुम्हें सदैव ही दुख भोगना पड़ा । सारा समूह जैसे थर्रा उठा ७,पटेश्वरी ने देखा निशाना और आगे जा पड़ा,सारा समूह जैसे थर्रा उठा तवायफों को शहर से खारिज कर देने से उनकी इसलाह नहीं हो सकती ।,"हम चाहे खुद कितने ही गुनाहगार हों, पर अपनी औलाद को हम नेक ओर रास्तबाज देने की तमन्ना रखते हैं ।",तवायफों को शहर से खारिज कर देने से उनकी इसलाह नहीं हो सकती । लेकिन वलभद्रदास ने कुछ समभकर ही टाला होगा ।,"बोले -- महाशय, मुझे आपसे पूरी सहानुभूति है ।",लेकिन बलभद्रदास ने कुछ समझ कर ही टाला होगा । फिर ईम्हारे छूरे-गड़ोंसे को कोई कहा तक डरे |,' बंटी विचलित न हुई ।,फिर तुम्हारे छुरे-गँड़ासे को कोई कहाँ तक डरे । गुम्रशुम्र दोकर उत हो ओर ताकने लगा ।,"भय होता था, कहीं वह ताड़ न जाय ।",गुमशुम होकर उसकी ओर ताकने लगा । "उसकी समझ ही में न श्राता था, यह किस स्वभाव के आदमी हैं |",अब सब रुपये मेरी तलब से काट लीजिए ।,"उसकी समझ ही में न आता था, यह किस स्वभाव के आदमी हैं ।" शाम के समय मेंहगू ने आकर फिर तीलियों का तमाशा किया ।,मँहगू सबको दिलासा देकर शाम को फिर आने का वायदा करके चला गया।,शाम के समय मँहगू ने आकर फिर तीलियों का तमाशा किया। "जिस प्रकार मेंढक केचुये पर काठता है, उसी प्रकार वह बूढ़ी काफी पर रपटी ओर उन्हें दोनों दार्थों स कटककर बोली--ऐसे पेट में श्राग लगे, पेट है या भाड़ ?",इस अवस्था में उसने बूढ़ी काकी को कड़ाह के पास बैठी देखा तो जल गई ।,"जिस प्रकार मेंढक केंचुए पर झपटता है, उसी प्रकार वह बूढ़ी काकी पर झपटी और उन्हें दोनों हाथों से झटक कर बोली-- ऐसे पेट में आग लगे, पेट है या भाड़ ?" "नह मेरा मित्र है, डिन्तु राष्ट्र मेरा इृष्ठ है ।",यह कर्तव्यपथ से विमुख होना और राजनीतिक क्षेत्र में सदैव के लिए बहिष्कृत हो जाना था ।,"नईम मेरा मित्र है, किन्तु राष्ट्र मेरा इष्ट है ।" उसका यश भी तो नहीं गाते ।,सोते-जागते वही मूर्ति आँखों के सामने नाचती रहती है ।,उसका यश भी तो नहीं गाते । ऐसी सूरत बना ली थी कि पहचान ही में न आते थे ।,तोप के सामने खड़ा सिपाही भी बिच्छू को देखकर सशंक हो जाता है ।,ऐसी सूरत बना ली थी कि पहचान ही में न आते थे । आप लोग साम्यवाद का डंका बजाते फिरते हैं ।,"नादिरशाही हुक्म है कि जितनी जल्द हो सके, यह जत्था हरमसरा से दूर हटा दिया जाए ।",आप लोग साम्यवाद का डंका बजाते फिरते हैं । चाबूजी अभी वहाँ छुछ दिन और रहना चाहते थे,देवजी ने घर लौटने के लिए कहा,बाबूजी अभी वहाँ कुछ दिन और रहना चाहते थे बाबू दरबारीलाक चारपाई पर लेटे हुए हुक्का पी रहे थे ।,यह महाशय मोटे-ताजे आदमी थे ।,बाबू दरबारीलाल चारपाई पर लेटे हुए हुक्का पी रहे थे । "लेकिन पंचायतों में, आपस की कलह मे, उसकी सम्मति अब भी सम्मान की दृष्टि से देखी जाती हे |","कल्लू अहीर ने जब से हलके के थानेदार साहब से मित्रता कर ली है और गाँव का मुखिया हो गया है, उसका नाम कालिकादीन हो गया है ।","लेकिन पंचायतों में, आपस की कलह में, उसकी सम्मति अब भी सम्मान की दृष्टि से देखी जाती है ।" पहले कर्म से भी निराशावादी था और वचन से भी ।,हम दोनों साथ-साथ पढ़ते थे ।,पहले कर्म से भी निराशावादी था और वचन से भी । "बहुत सुम-रगुम रहते, मानों ध्यान में हैं |",चित्त पर चंचलता छायी रहती ।,"बहुत गुम-सुम रहते, मानो ध्यान में हों ।" "आखिर वही धात हुई, जिसका सुझे विज्वास यथा ।",मुझे गंगू के संतुष्ट और सुखी जीवन पर एक प्रकार कीर् ईर्ष्या होती थी ।,"आखिर वही बात हुई, जिसका मुझे विश्वास था ।" "हृदयनाथ-- बेटी, संसार में रहकर तो संसार क्ो-सो करनी हो पढ़ेगी ।",हृदयनाथ- जो रास्ता निकालता हूँ वही कुछ दिनों के बाद किसी दलदल में फँसा देता है ।,"हृदयनाथ- बेटी, संसार में रहकर तो संसार की-सी करनी ही पड़ेगी ।" "वह किस फन्दे सें गला डाल रहे हैं, वह खूब समझते थे |","उन पर अब जवानी का वह नशा न था , जो विवेक की आँखों पर छाकर बहुधा हमें गङ्ढे में गिरा देता है ।","वह किस फन्दे में गला डाल रहे हैं , वह खूब समझते थे ।" "वह आश्या-नौका, जिस पर वेठी हुईं वह चलो जा रही थी, ट्थ गई थी, और भब समुद्र को लहरों के सिवा उप्तकी रक्षा करनेवाल्य कोई न था ।",समझ गयी बूढ़े ब्राह्मण ने दगा की ।,"यह आशा – नौका जिस पर बैठी हुई वह चली जा रही थी , टुट गयी थी और अब समुद्र की लहरों के सिवा उसकी रक्षा करने वाला कोई न था ।" यह चोट निशाने पर जा बेठी ।,"फिर जो इस द्वार पर तेरी सूरत नजर आयी , तो खून ही पी जाऊँगी ।",यह चोट निशाने पर जा बैठी । वक्ष पर पक्ती का मधुर स्वर सुनायी दिया ।,"एक ही दिन में इतनी दीवार उठ गयी, जितनी चार मजदूर भी न उठा सकते थे ।",वृक्ष पर पक्षी का मधुर स्वर सुनायी दिया । "उसने सोचा, हमारे माता-पिता कितने अद्रदर्शी हैं, अपनी उम्रभ में इन्हें इतना भी नहों समता दि वधू पर क्या घुफ्षरेगी ।","तेल, साबुन, उबटन की लूट मची हुई थी और हजारीलाल बगीचे में एक वृक्ष के नीचे उदास बैठा हुआ सोच रहा था, क्या करूँ ?","उसने सोचा हमारे माता-पिता कितने अदूरदर्शी हैं, अपनी उमंग में इन्हें इतना भी नहीं सूझता कि वधू पर क्या गुजरेगी ।" "न करेगा, तो चक्को पौसनी पंडेगी ।","बिगड़कर कहा , ‘ तुम्हारी नीयत तो अभी से खराब हो गयी ।","न करेगा , तो चक्की पीसनी पड़ेगी ।" पानी भी दोगो या खिकाती दो जाओगी २,सुखदा ने मुँह खोल दिया और ग्रास के साथ आँसू भी पी गई,पानी भी दोगी या खिलाती ही जाओगी पहले विद्ठुलदास के पास गया ।,वह घूम-घूमकर शर्माजी को बदनाम करने लगा ।,पहले विट्ठलदास के पास गया । आपको देखकर किसी डाकू की मजाल नहीं कि मुझ पर हाथ उठा सके ।,तुम्हारे पास कोई हथियार है ?,आपको देखकर किसी डाकू की मजाल नहीं कि मुझ पर हाथ उठा सके । बेचारी धूप में चली होग॑,ये तीन सौ किसके घर से आवेंगे,बेचारी धूप में चली होगी कुछ जवाब न दिया ।,"हिरिया पर किसी का दावा नहीं है, वह अकेली उन्हीं की लौंडी है ।",कुछ जवाब न दिया । रमा की आमदनी तेज़ी से बढ़ने लगी ।,तुम पर आंच तक न आने पायेगी ।,' रमा की आमदनी तेज़ी से बढ़ने लगी । दुसरे सिपाहियों की हिम्मत छूट गई ।,खुफिया-पुलिस ने एक तूफान खड़ा कर दिया था ।,दूसरे सिपाहियों की हिम्मत छूट गयी । "हाँफते-हाँफते वेदम हो गये, लेकिन दार- जीत का निर्णय न हो सका ।",खून की गर्मी आँख और चेहरे से झलक रही थी ।,"हाँफते-हाँफते बेदम हो गये, लेकिन हार-जीत का निर्णय न हो सका ।" तुमने देखा कि नहीं ?,मैंने कुसल पूछी ।,तुमने देखा कि नहीं ? बड़ी सुंदर और बड़ी चचल थी ।,राजी हो गये ।,बड़ी सुन्दर और बड़ी चंचल थी । "ऐेठजी एक घार'ठोझर खाकर मिरे, पर साइब के पहुंचते- पहुंचते संभल उठे ।",तेजी से कमरे के बाहर निकले और सिर पर पैर रखकर बेतहाशा भागे ।,"सेठजी एक बार ठोकर खाकर गिरे, पर साहब के पहुँचते-पहुँचते सँभलकर उठे ।" अत्यन्त सुरम्य दृश्य था ।,अब वह अन्य स्त्रियों के साथ इस विषय पर बातचीत करने की अधिकारिणी थी ।,अत्यन्त सुरम्य दृश्य था । टोकरी उसके हाथ से छूटकर ग्रिर पड़ती है और मियाँ सिपाह्दी अपनी बन्दक लिये ज़म्मीन पर आ जाते हैं और उनको एक टॉम में विकार आ जाता दे ।,"उसे चटपट गाँव का पहरा देने का चार्ज मिल गया, लेकिन पुलिस का सिपाही कोई साधारण व्यक्ति तो नहीं, जो अपने पैरों चलें ।",टोकरी उसके हाथ से छूटकर गिर पड़ती है और मियाँ सिपाही अपनी बन्दूक लिये जमीन पर आ जाते हैं और उनकी एक टाँग में विकार आ जाता है । भगत---कुवर साहव के यहाँ जाइए ।,"मुझे केवल एक वोट की फिक्र है, कोई उपाय बताइए, कैसे मिले ?",भगत -- कुँवर साहब के यहाँ जाइए । यह नहीं कि उनके इलाके में असाम्रियों के साथ कोई ख़ास रिश्रायत की जाती हो या डाँड और बेगार की कड़ाई कुछ कम हो मगर यह सारी बदनामो मुखतारों के सिर जाती थी,पिछले सत्याग्रह-संग्राम में रायसाहब ने बड़ा यश कमाया था,यह नहीं कि उनके इलाके में असामियों के साथ कोई खास रियायत की जाती हो या डाँड़ और बेगार की कड़ाई कुछ कम हो मगर यह सारी बदनामी मुख्तारों के सिर जाती थी सुभागी ने सूरदास के चेहरे की तरफ अन्वेषण की दृष्टि से देखा ।,सूरदास-फिर वही रट लगाए जाते हो ।,सुभागी ने सूरदास के चेहरे की तरफ अन्वेषण की दृष्टि से देखा । "मदन---आपको जो करना हो, कोजिए ।",यहाँ आकर आप ऐसे नहीं लोट सकते ।,मदन -- आप को जो करना हो कीजिए । "पहले कालिन्दी चालक को सारे दिन खिलाया करती थी, माँ के पाप्त केवल दूध पोने जाता था ।","उसका बच्चा कालिंदी से कितना हिला हुआ था, कालिंदी उसे कितना चाहती थी ?","पहले कालिंदी बालक को सारे दिन खिलाया करती थी, माँ के पास केवल दूध पीने जाता था ।" कितने ही शरीफजादे उनकी बदौलत खस्ता वा ख्वार हो रहे हैं ।,कितनी ही ने बीबियाँ उनकी बदोलत खून के आँसू रो रही है ।,कितने ही शरीफजादे उनकी बदोलत खस्ता व खार हो रहे हैं । "क्‍यों, नकली दाढ़ियाँ भी तो मिलती हैं ?",अगर मेरे दाढ़ी होती तो आपको दे देती ।,"क्यों, नकली दाढ़ियाँ भी तो मिलती है ?" मुझे जरूरत नहीं ।,आगे कदम रखने का साहस न हुआ ।,मुझे जरूरत नहीं । ' दीन-दुललोजनों को दान देने के लिए रुपया और मशरफियों को यैंडियाँ साथ छे ली ।,मुझे देखते ही उसके ऊपर घड़ों पानी पड़ जाता है और उसके माथे के जलबिंदु दिखाई देने लगते हैं ।,दीन-दुखी जनों को दान देने के लिए रुपयों और अशर्फियों की थैलियाँ साथ ले लीं । "कहाँ गई है, यह कोई न बता सका ।",मैं उसी वक्त दौड़ा हुआ उसके घर गया ।,"कहाँ गयी है , यह कोई न बता सका ।" पानी न हो तो गगरा ला मैं खींच दूँ,उसकी आँखें लाल थीं और नाक के सिरे पर भी सुर्खी थी,पानी न हो तो गगरा ला मैं खींच दूँ सछेादी भोतर पढ़ी नींद फो बुलाने के लिए गा रद्दो थी,अमर ने अपनी कोठरी में जाकर बिछावन के नीचे से धोतियों का एक जोड़ा निकाला और सलोनी के घर पहुंचा,सलोनी भीतर पड़ी नींद को बुलाने के लिए गा रही थी "फिर जो कुछ होगा, देखा जाएगा।","कभी सोचते, क्यों न एक दिन इन दुराचारियों को फटकारूँ ?",फिर जो कुछ होगा देखा जाएगा । कुशल यही है कि अभी विवाह नहीं हुआ था ।,इतनी सज्जनता अभी उसमें है ।,कुशल यही है कि अभी विवाह नहीं हुआ था । यह चोट मुझसे न सद्दी जायगी ।,सारी बातें तय हो जाने के बाद यह उचित नहीं है कि पंडित मुरारीलाल से सम्बन्ध तोड़ लिया जाये ।,यह चोट मुझ से न सही जायगी । उसे देखते ही उसने इस बात को आश्चर्य के रूप में प्रकट भी किया था ।,इस विराग ने मेरी दृष्टि में तुम्हारे आदर को कई गुना बढ़ा दिया है ।,उसे देखते ही उसने इस बात को आश्चर्य के रूप में प्रकट भी किया था । तव अमरकान्त ने पराष्त होकर कहा--अच्छो वात है,उधर से छुट्टी मिली तो यह पचड़ा ले बैठे,तब अमरकान्त ने परास्त होकर कहा-अच्छी बात है काकी ने लाडली की बोली पहचानी |,"बहुत गुम-सुम रहते, मानो ध्यान में हों ।",काकी ने लाड़ली की बोली पहचानी । काल उसके सिर पर खेल रहा है ।,मगर कब तक ?,काल उसके सिर पर खेल रहा है । सुमन का मुजरा अभी समाप्त हुआ था ।,नौ बज गए थे ।,सुमन का मुजरा अभी समाप्त हुआ था । "उसकी आँखों में वह दूरहष्टि ओर चेहरे वह अलोकिक आभा थी, जो मेंडराती हुई मृत्यु की सूचना देती है ।","भूमिका ने उन्हें विशेष प्रभावित किया था, पर असली चीज सामने आते ही आँखें खुलीं ।",उसकी आँखों में वह दूरदृष्टि और चेहरे पर वह अलौकिक आभा थी जो मँडराती हुई मृत्यु की सूचना देती है । यह तम्बाकू बाछे को दुकान है; इसके बाद चौथा प्रकान मेश दो है ।,आत्मा के गौरव के सामने धन को कुछ न समझा ।,यह तम्बाकूवाले की दूकान है इसके बाद चौथा मकान मेरा ही है । "एक पैसे की,जरूरत होती तो सास से मॉगती ।",बहू में आत्म- सम्मान जरा भी नहीं था; न सास में आत्म-गौरव का जोश ।,एक पैसे की जरुरत होती तो सास से मॉँगती । मन में विद्ुुलदास को गालियाँ देते हुए फिटन पर सवार हो गए ।,अब दोनों सज्जनों को लोट जाने के सिवा और कोई उपाय न सूझा ।,मन में विट्ठलदास को गालियाँ देते हुए फिटन पर सवार हो गए । "इतने में मानकी ने आकर कहा --तुम तीनों यहाँ बैठी क्या कर रही हो, चलो वहाँ लोग खाना खाने आ रहे हैं ।",राधा--प्रेम के सामने गहनों का कोई मूल्य नहीं ।,"इतने में मानकी ने आकर कहा--तुम तीनों यहाँ बैठी क्या कर रही हो , चलो वहाँ लोग खाना खाने आ रहे हैं ।" "सुमन ने मन में सोचा था, गाड़ी श्रावेगी ।",दोपहर को सुभद्रा को एक महरी उसे लेने आई ।,सुमन ने मन में सोचा था गाड़ी आवेगी । मैं इस योग्य भी तो नहीं कि आपके तलुवों को आँखों से लगाऊँ ।,वह एक पैसा भी न देगा ।,मैं इस योग्य भी तो नहीं कि आपके तलुओं को आँखों से लगाऊँ । पुजारीजी सुक्‍्खू चौधरी के पास से उठकर चले गये थे और चौधरी उच्च स्वर से अपने सोये हुए देवताओं को पुकार-पुकारकर बुला रहे थे ।,बहुत देर के बाद उन्हें दरवाजा मिला ।,पुजारी जी सुक्खू चौधरी के पास से उठ कर चले गये थे और चौधरी उच्च स्वर से अपने सोये हुए देवताओं को पुकार-पुकार कर बुला रहे थे । दुर्बल इच्छा ने उसे यह दिन दिखाया था और अब एक नये और संस्कृत जीवन का स्वप्न दिखा रही थी ।,"केवल खाना, सोना और रूपये के लिए हाय-हाय करना ही जीवन का व्यापार न होगा ।",दुर्बल इच्छा ने उसे यह दिन दिखाया था और अब एक नए और संस्कृत जीवन का स्वप्न दिखा रही थी । आखिर बचा को अपनी अद्रदरशिता का दण्ड भोगता पडा ।,इस खबर से ईर्ष्या को सान्त्वना मिली ।,आखिर बच्चा को अपनी अदूरदर्शिता का दण्ड भोगना पड़ा । (हमें तो उन्होंने कभी एक गाय नहीं दे दी,वह संकट में है उसकी मदद तो करनी ही पड़ेगी,हमें तो उन्होंने कभी एक गाय नहीं दे दी और अब भाई के पच्छ में कूठ बोलता है,हाँ मैंने नहीं देखा कसम खाता हूँ,और अब भाई के पच्छ में झूठ बोलता है घर की कु जो भी भगवत्ती देवी के पास थी |,"यहाँ जो पंचायत देखी, तो रम गयीं ।",घर की कुंजी भी भगवती देवी के पास थी । बाब॒ साहब की जगह में होता तो में भी ऐसा ही करता ; लेकिन इसका मतलब यह नहीं हैं कि यह हमारे ख़िलाफ़ शहादत देंगे ।,"उसका पक्ष लेकर डिप्टी से बोले,हलफ से कहता हूँ, 'आप लोग आदमी को पहचानते तो हैं नहीं, लगते हैं रोब जमाने ।","बाबू साहब की जगह मैं होता तो मैं भी ऐसा ही करता, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि यह हमारे खिलाफ शहादत देंगे ।" "तुरन्त खढ़े होकर रानी साहब से वोले-- सरवार ! आजा हो, तो कुछ कहूँ ।","जो कुछ हो, एक बार जोर तो लगाना ही चाहिए ।","तुरन्त खड़े हो कर रानी साहब से बोले , 'सरकार ! आज्ञा हो, तो कुछ कहूँ ।" विमान जल-तट पर पहुँच चुका था ।,"अपना दाँव छोड़ने के लिए उससे कहीं बढ़कर आत्मत्याग की जरूरत थी, जितना मैं कर सकता था ।",विमान जलतट पर पहुँच चुका था । "आखिर यानेदार मीता आदमी है, वह भी तो सन्ध्या-समय घूमने फिरने जाता ही है ।",पाँच बजे की घटना थी ।,आखिर थानेदार भी तो आदमी है; वह भी तो संध्या-समय घूमने-फिरने जाता ही है । उनके प्रेमानुराग की स्मृति उसके हृदय को ऐसा मसोसती थी कि वह विकल होकर तड़पने लगती थी ।,मैंने इसे होश में कभी आत्मज्ञान की ऐसी बातें करते नहीं सुना ।,उनके प्रेमानुराग की स्मृति उसके हृदय को ऐसा मसोसती थी कि वह विकल होकर तड़पने लगती थी । "में शव भी तो उनसे कुछ नहीं माँगती, वह भाप ही मेरे लिए एक-न-एक चीज़ नित्य जाते रहते हैं |","कभी सोचती, शायद यह लोग इसलिए रोते हैं कि कहीं मैं कोई ऐसी चीज न माँग बैठूँ जिसे वह दे न सकें ।","मैं अब भी तो उनसे कुछ नहीं माँगती, वह आप ही मेरे लिए एक न एक चीज नित्य लाते रहते हैं ।" किसी विश्वविद्यालय में पढता था ।,"दूसरे दिन रोमनाफ जब फातिहा पढ़ने आया तो देखा , आइवन सिजदे में सिर झुकाये हुए है और उसकी आत्मा स्वर्ग को प्रयाण कर चुकी है ।",किसी विश्वविद्यालय में पढ़ता था । आप नद्गा-घोकर घोती छाँट रहे हैं और वह दर बैठा तमाशा देख रहा है ।,एक रुपया देकर बाजार भेजूँ तो संध्या तक हिसाब न समझा सके ।,आप नहा-धोकर धोती छाँट रहे हैं और वह दूर बैठा तमाशा देख रहा है । उसकी खूब सेवा करेगा,बहुत हुआ तो तेली के कोल्हू में चले,उसकी खूब सेवा करेगा सोचा-इनका अभिप्राय क्या है ?,"ईश्वर ने मेरे धर्म की रक्षा की, यह व्यथा भी शांत ही हो जाएगी ।",सोचा-इनका अभिप्राय क्या है ? दूसरे घरों मं ता मालकिनें बात भी नहीं पूछुतों |,"आज कुछ खाने को मिल जाए, सरकार ! देवीरानी ने द्वार पर आकर कहा -अभी तो तुम्हें महीना पाये दस दिन भी नहीं हुए ।",दूसरे घरों में तो मालकिनें बात भी नहीं पूछतीं । बीच-बीच में मुख्तार साहब और सिपाहियों के हृदय-विदारक शब्द श्राकाश में गूँज उठते ।,मालूम होता था कि आदमियों में कानाफूसी हो रही है ।,बीच-बीच में मुख्तार साहब और सिपाहियों के हृदय-विदारक शब्द आकाश में गूँज उठते । गोबिन्दी ने सहमते हुए. कहा--ठुम सी तो अभी नहीं सोये ।,सहसा ज्ञानचन्द्र के आने से वह सँभल बैठी ।,गोविंदी ने सहमते हुए कहा -तुम भी तो अभी नहीं सोये । साधा- रणतः युवतियों के हृदय में ऐसे उदार भाव नहीं उठा करते ।,चकित हो जाएँगे ।,साधारणतया युवतियों के हृदय में ऐसे उदार भाव नहीं उठा करते । देवीदीन की आवाज़ भी सुनायी दी ; मगर मोटर रुकी नहीं ।,"वह ऐसी तन्मय हुई कि खिड़की से जीने तक दौड़ी आई, मानो मोटर को रोक लेना चाहती हो, पर इसी एक पल में उसे मालूम हो गया कि मेरे नीचे उतरते-उतरते मोटरें निकल जाएंगी ।","देवीदीन की आवाज़ भी सुनाई दी, मगर मोटर रूकी नहीं ।" "कोई बात बनी-बिगड़ी, जाके सारी कथा सुना देता था ।","कहते थे, बेटा, जो चाहे करो, लेकिन मेरे पंजे में न आना ।","कोई बात बनी-बिगड़ी, जाके सारी कथा सुना देता था ।" सहसा एक मोटर द्वार पर आकर रुकी और रमा ने उतरकर जग्गो से पूछा -- सब कुशल-मंगल है न दादी ! दादा कहाँ गये हैं ?,धीरे-धीरे आठ बज गए और देवी न लौटा ।,"सहसा एक मोटर द्वार पर आकर रूकी और रमा ने उतरकर जग्गो से पूछा, 'सब कुशल-मंगल है न दादी! दादा कहाँ गए हैं ?" हमें इसके उपदेशों की जरूरत नहीं ।,चौथा-यह तो नहीं होता कि आगे बढ़कर ललकारें कि कायरों का रक्त भी खौलने लगे ।,हमें इसके उपदेशों की जरूरत नहीं । "इस अवसर पर मुमे यद्द बहुमूल्य अनुभव हुआ कि जो लोग सेवा-भाव रखते हैं और जो स्वार्थं-सिद्धि को जीवन का लक्ष्य नहीं बनाते, उन्के परिवार को आड़ ""दैलेवार्लों की कमी नहीं रहती ।","अम्माँ ने मेरी बहन के घर तीजा भेजन के लिए जिन सामानों की सूची लिखायी, वह पत्नी जी को घर की स्थिति देखते हुए अधिक मालूम हुई ।","इस अवसर पर मुझे यह बहुमूल्य अनुभव हुआ कि जो लोग सेवा भाव रखते हैं और जो स्वार्थ- सिद्धि को जीवन का लक्ष्यो नहीं बनाते, उनके परिवार को आड़ देनेवालों की कमी नहीं रहती ।" “जब यहाँ से जाने लगू तब आप मुमे अपना एक चित्र दीजिएगा ।,सड़ियल कपड़े पहनकर तो और जी जलेगा ।,"' ' जब यहाँ से जाने लगूँ , तब आप मुझे अपना एक चित्र दीजिएगा ।" नीचे उतर भ्राये ।,विट्ठलदास ऊपर बैठे हुए वह कोतुक देख रहे थे; समझ गए कि अब अभिनय समाप्त हो गया ।,नीचे उतर आए । एकाएक युवक चेनसिंह सामने से आता हुआ दिखाई दिया ।,गरीबी आदमी से जो चाहे करावे ।,एकाएक युवक चैनसिंह सामने से आता हुआ दिखाई दिया । जब ज़रा भीड़ कम हुई तो तुम्हें हू ढ़ने लगो ।,सब आदमी इधर-उधर दौड़ने लगे ।,जरा भीड़ कम हुई तो तुम्हें ढूँढ़ने लगी । "उनके साथ खेला हूँ, नाचा भी हूँ , पर कभी मुँह से ऐसा शब्द न निकलता था, जिसे सुनकर किसी युवती को लज्जा से सिर झुकाना पड़े, और फिर अच्छे और बुरे कहाँ नहीं हैं ?","कामलिप्सा उन देशों के लिए आकर्षण का प्रधान विषय है, जहाँ लोगों की मनोवृत्तियां संकुचित रहती हैं ।","उनके साथ खेला हूँ, नाचा भी हूँ, पर कभी मुँह से ऐसा शब्द न निकलता था, जिसे सुनकर किसी युवती को लज्जा से सिर झुकाना पड़े, और फिर अच्छे और बुरे कहाँ नहीं हैं ?" मैने न समा था कि अपने ब्रत पर स्थिर रहना मेरे छिए इदना 'कठित हो जाग्गा ।,गोपीनाथ दार्शनिक थे पर अभी तक उनके मन के कोमल भाव शिथिल न हुए थे ।,मैंने न समझा था कि अपने व्रत पर स्थिर रहना मेरे लिए इतना कठिन हो जायगा । "इसलिए उसने कहना-सुनना छोड़ दिया था $ पर एक दिन घर जाते समय उसने अप्तरकान्त को खादो का गद्गर लिये ""देख लिया",वह कई बार इस विषय पर उससे झगड़ा कर चुकी थी पर उसके कहने से वह और जिद पकड़ लेता था,इसलिए उसने कहना-सुनना छोड़ दिया था पर एक दिन घर जाते समय उसने अमरकान्त को खादी का गट्ठर लिए देख लिया उसके घर में आज दी लड़का भी होना था,सलीम ने काले खाँ की तरफ देखकर कहा-यह तो आपने बुरी खबर सुनाई,उसके घर में आज ही लड़का भी होना था "पुराना खिलाड़ी मैदान में जाकर जितना नाम करेगा, उतना नया पदुठी नहीं कर सकता ।",उनके जोड़ का इस नगर में दूसरा नहीं है ।,"पुराना खिलाड़ी मैदान में जा कर जितना नाम करेगा, उतना नया पट्ठा नहीं कर सकता ।" उसकी स्वामिनी-कल्पना इन आधातों से और भी स्वस्थ द्ोतो थी ।,दुलारी लड़ने को तैयार होकर आयी थी ।,उसकी स्वामिनी की कल्पना इन आघातों से और भी स्वस्थ होती थी । "एक हमारी. खुदगरज, खुशनुमा कौस है, जिसे इन वातों का एहसास ही नहीं ।",खुशनसीब है वह कौम जिसमें आप जैसे खादिम मोजूद है ।,"एक हमारी खुदगरज, खुशनुमा कोम है जिसे इन बातों का एहसास ही नहीं ।" उसमें मजूरी दूनी कर दी जाती ओर सजुर लोग अपनी सासर्थ्य से दूनी इंटे लेकर चलते ।,उन सीमाओं पर विचार नहीं किया जाता है जिनके अंदर मेम्बरों को काम करना पड़ता है ।,उसमें मजूरी दूनी कर दी जाती और मजूर लोग अपनी सामर्थ्य से दूनी ईंटें ले कर चलते । कुछ देर तक तो सिगार और पत्रों से दिल बहलाता रहा ।,कुछ लोग मन में हरखू को कोसते जरूर थे कि इस बुड्ढ़े को आज ही मरना था; दो-चार दिन बाद मरता ।,कुछ देर तक सिगार और पत्रों से दिल बहलाता रहा । "क्यों राजेश्वरी, तुमने देखा, अगरेज लोग कितने सलन और विनयशील होते हैं ।",मेहता- वाइसराय के नीचे तो सभी हैं ।,"क्यों राजेश्वरी, तुमने देखा, अँगरेज लोग कितने सज्जन और विनयशील होते हैं ।" "देवीदीन बार-बार उसे स्नेह-भरी आँखों से देखता था, मानों उसका पुत्र कहीं परदेश से लौठा हो ।","आख़िर एक दिन उन्होंने दीनदयाल को लिखा, 'आप आकर बहू को कुछ दिनों के लिए ले जाइए ।","देवीदीन बार-बार उसे स्नेह-भरी आंखों से देखता था, मानो उसका पुत्र कहीं परदेश से लौटा हो ।" सहसा एक दक्ष के नीचे दस-बारद ज्री-पुरुष सशक्लित भाव से दबके हुए दिखाईा,सड़क के दाहिने-बाएँ-नीचे ऊख अरहर आदि के खेत खड़े थे,सहसा एक वृक्ष के नीचे दस-बारह स्त्री-पुरुष सशंकित भाव से दुबके हुए दिखाई दिए "ओह ! क्‍या आज़ादी है, क्या दौलत है, क्या जीवन है, क्‍या उत्साह है ! बस मालूम होता है, यही स्वर्ग हैं ।","जब तक स्त्रियों की शिक्षा का काफी प्रचार न होगा, हमारा कभी उद्धार न होगा ।","ओह! क्या आज़ादी है, क्या दौलत है, क्या जीवन है, क्या उत्साह है! बस मालूम होता है, यही स्वर्ग है ।" "वह नित्य पूजा करता, भजन गाता था ।",कुँवर कुछ देर तक खोये हुए-से खड़े रहे ।,"वह नित्य पूजा करता, भजन गाता था ।" २० सुभद्रा को संध्या के समय कंगन की याद झाई ।,प्रातःकाल शर्माजी विट्ठलदास के घर जा पहुँचे ।,२० सुभद्रा को संध्या के समय कंगन की याद आई । तुम-जेसों के लिए यही जवाब है,घर में भोजन का आधार न होता तो मेंबरी भी न मिलती,तुम जैसों के लिए यही जवाब है रमेश --- अजी वह अर्जी देना है कि नहीं तुमको ?,आखिर जब साढ़े नौ बज गए तो उन्होंने उसे जगाया ।,रमेश--अजी वह अर्जी देना है कि नहीं तुमको ? सेर सपाटे करने छा ।,धीरे-धीरे उसका जी सँभल गया ।,सैर-सपाटे करने लगा । धीरे-धीरे उसके रुपये चुका दूँगा ।,"किसी मेहमान से पूछना--'कहिए तो आपके लिए भोजन लाऊँ, कितनी बडी अशिष्टता है ।",धीरे-धीरे उसके रूपये चुका दूँगा । "वह मुझे बुलायंगे, तो सम्भव है, मेड से वचित द्ोना पढे ।","ससुरजी ने लिखा - आशा थी, तुम लोग बुढ़ापे में मेरा पालन करोगे ।","वह मुझे बुलायेंगे, तो सम्भव है, ग्रेड से वंचित होना पड़े ।" उधर हिन्दू-सभा ने सन्नाद 'खीच लिया था |,मुल्लाओं ने मैदान खाली पा कर आस-पास के देहातों में खूब जोर बाँध रखा था ।,उधर हिन्दू-सभा ने सन्नाटा खींच लिया था । "आहार आघा भी नहीं रहा, दरद्म चिन्ता में मग्न रहते है ।","जब ईदू सलाम करके चलने लगा और झिनकू ने अपना डंडा सँभाला तो मुंशी जी ने दोनों हाथ पकड़ लिये और बड़े मृदुल शब्दों में बोले यारो, यों साथ छोड़ना अच्छा नहीं ।","आहार आधा भी नहीं रहा, हरदम चिंता में मग्न रहते हैं ।" "'बलमद्रदास ने आगे बढ़कर कहा--कहिए महाशय, कल मैंने जो पोधे भेजे थे, वह रे लगवा दिए या नहीं ?",रजिस्टर पटक दिया ओर लड़ने पर उतारू हो गए ।,"बलभद्रदास ने आगे बढ़कर कहा -- कहिए महाशय, कल मैंने जो पोधे भेजे थे वे आप ने लगवा दिए या नहीं ?" यही जीवन के सुख हैं,कुछ लोग नाच-मुजरे का विरोध करते हैं,यही जीवन के सुख हैं यह क्या तुमने अपनो गत बता रख्तो है ।,"ईश्वर ने लड़के दिये थे, ईश्वर ही ने छीन लिये ।",यह क्या तुमने अपनी गत बना रखी है ? मनोमालिन्य बढता गया ।,उसकी छाया और उसके फ़ल का भोग करना वह अपना अधिकार समझती थी ।,मनोमालिन्य बढ़ता गया । और अमर उसी वक्त एक मकान को तलाश करने चला,अमर को अब इस कठोर आघात की बिलकुल शंका न रही थी,और अमर उसी वक्त एक मकान की तलाश करने चला एक बार गंगाजली के हाथ से घी की हाँड़ी गिर पड़ी थी ।,"जब गंगाजली जीती थी, तब शांता उसे कटु वाक्यों से बचाने के लिए यज्ञ करती रहती थी, वह अपनी मामी के इशारों पर दौड़ती थी, जिससे वह माता को कुछ कह न बेठे ।",एक बार गंगाजली के हाथ से घी की हाँडी गिर पड़ी थी । "लमाल दिखाब के दिन इमारा दामन पकड़ेगा, तो हम क्‍या जवाब देंगे 2 ?",तू नहीं जानता कि अरब लोग खून कभी माफ नहीं करते ।,जमाल हिसाब के दिन हमारा दामन पकड़ेगा तो हम क्या जवाब देंगे ? दो-एक चीज़ें हमारी दृकान से तो देखिए ।,अब बडे प्रेम से रसोई में जाती ।,दो-एक चीज़ें हमारी दुकान से तो देखिए । द्दी बेटा ऐसा काम नहीं करती जिसमें पीछे से कोई बात पेदा हो,वृध्दा ने कानों पर हाथ रखकर कहा-नहीं बेटा उन्हें आ जाने दो,नहीं बेटा ऐसा काम नहीं करती जिसमें पीछे से कोई बात पैदा हो उसे लौंगी से सच्चा प्रेम था ।,मैं आज ही फैसला कर लेना चाहता हूँ ।,उसे लौंगी से सच्चा प्रेम था । "यही उस अ्रपमान की मूर्तिमान वेदना है, जो इतने दिनों मुझे भोगनी पड़ी |","उसने भगीरथ परिश्रम से कुल-मर्यादा का वृक्ष लगाया था, उसे अपने रक्त से सींचा था, उसको जड़ से उखड़ता देखकर उसके ह्रदय के टुकड़े हुए जाते थे ।","यही वह अपमान की मूर्तिमान वेदना है, जो इतने दिनों मुझे भोगनी पड़ी ।" "सुभद्रा चिढ़कर बोली--तो तुमने गुलामी लिखाई है, गुलामी करो; मेरी चीज कोई उठा ले जाएगा, तो मुभसे चुप न रहा जाएगा ।","मेरा सब कुछ उसका है, वह चाहे माँग कर ले जाए चाहे उठा ले जाए ।","सुभद्रा चिढ़ कर बोली -- तो तुमने गुलामी लिखाई है, गुलामी करो, मेरी चीज कोई उठा ले जाएगा, तो मुझसे चुप न रहा जाएगा ।" उसकी प्रति मु मेंद करने के लिए आये थे ।,उन्होंने अपने व्याख्यानों का एक संग्रह प्रकाशित कराया था ।,उसकी प्रति मुझे भेंट करने के लिए आये थे । वह वहीं राख पर बैठ गया और बिलख-बिलखकर रोने लगा ।,"लोटा मिला, तवा मिला, किंतु पोटली न मिली ।",वह वहीं राख पर बैठ गया और बिलख-बिलखकर रोने लगा । क्या वैद्य क्या डाक्टर किसी की कुछ न चलती थी,गिल्टी का निकलना मानो मृत्यु का संदेश था,क्‍या वेद्य क्या डाक्टर किसी की कुछ न चलती थी इन विपत्तियों पर पत्नोजो का रोना-घोनाो और भी गज़ब था ।,उसी दिन से मिस्टर सिनहा और हिन्दू समाज में खींचतान शुरू हुई ।,इन विपत्तियों पर पत्नीजी का रोना-धोना और भी गजब था । "अब रोज़ डावटर' को बुलाओ, सेवा शुभ्रषा करो, रात-भर सिरद्वाने बेठे पंखा मलते रहो, उस पर यह्द शिकायत भी सुनते रहो कि यहाँ कोई हमारी धात भी नहीं पूछता ! मेरी घड़ो' मद्दीनों से मेरी कलाई पर नहीं आई ।","अधिकांश तो ऐसे हैं, जो शराब के बगैर जिंदा ही नहीं रह सकते ।","अब रोज डाक्टर को बुलाओ, सेवा सुश्रूषा करो, रातभर सिरहाने बैठे पंखा झलते रहो, उस पर यह शिकायत भी सुनते रहो कि यहाँ कोई हमारी बात भी नहीं पूछता ! मेरी घड़ी महीनों से मेरी कलाई पर नहीं आयी ।" "रमेश --- अजी वह दिन गये, जब आप मुझे मात दिया करते थे ।",रमा०--आप तो दो ही मातों में रोने लगते हैं ।,"रमेश--अजी वह दिन गए, जब आप मुझे मात दिया करते थे ।" जियाराम भी वेठा हुआ था।,मेरे दोस्तों में आधे से ज्यादा पुलिस के अफसरों ही के बेटे हैं।,जियाराम भी बेठा हुआ था। मेंने कई बार “इन खादिसों को चरका दिया उप्त वक्त इन खादिमों की सूभ्त देखने ह्वी से ताल्लऊ रखतो है,जिसे देखो चंदे की हाय-हाय,मैंने कई बार इस खादिमों को चरका दिया उस वक्त इन खादिमों की सूरतें देखने ही से ताल्लुक रखती हैं "भादों का महीना आ गया था , मगर पानी की बूंद नहीं ।",मैं दोनों वक्त ठाकुरजी से अम्माँ के लिए प्रार्थना करती हूँ ।,भादों का महीना आ गया था ; मगर पानी की बूँद नहीं । उसे सीर साहब से कुछ सदनुभूति हो गयी थी ।,बेचारे खुद ही शाम-सबेरे उस पर दो-चार हाथ फेर लेते थे ।,उसे मीर साहब से कुछ सहानुभूति हो गयी थी । "वह लाहपुर में पढ़ी हुई था, दौड़ा हुआ आया ।",तुम्हें स्वीकार है ?,"वह लालपुर में पड़ी हुई थी, दौड़ा हुआ आया ।" "श्रीधर बड़े विद्वान, वेदों के ज्ञाता, शास्त्रों को जाननेवाले थे ।",मंदिर एक सुरम्य सागर के तट पर बना हुआ था ।,श्रीधर बड़े विद्वान वेदों के ज्ञाता शास्त्रों के जाननेवाले थे । पृस्वो्िह की स्त्री दुर्पाडुवारि अहुत सुशोला और चतुप्त धी ।,धर्मसिंह अधिकतर जोधपुर में ही रहता था ।,पृथ्वीसिंह की स्त्री दुर्गाकुँवरि बहुत सुशीला और चतुर थी । "स्वामीदयाल ने एक ढक के पत्तल में एक नारियल, सुपारी, चावल, पान आदि वस्तुएँ वर के सामने रखों ।",इतने में खबर हुई कि महाशय स्वामीदयाल आ पहुँचे ।,"स्वामीदयाल ने एक ढाक के पत्ताल पर नारियल, सुपारी, चावल, पान आदि वस्तुएँ वर के सामने रखीं ।" उसका एक भाग किराये पर उठा दिया ।,एक सप्ताह से उसका कहीं पता नहीं है ।,उसका एक भाग किराये पर उठा दिया । "' , सेठजी--आपने विल्कुल सत्य कहा कि ऐसी रचनाओं का पुरस्कार अपनी आत्मा का संतोष है ।",ऐसी रचनाओं के पुरस्कार की कल्पना करना ही उनका अनादर करना है ।,"' सेठजी -'आपने बिलकुल सत्य कहा, कि ऐसी रचनाओं का पुरस्कार अपनी आत्मा का संतोष है ।" यदि किसी दूसरे चपरास ने इससे भी बडा श्रपराघ किया होता तो भी उस पर इतना कठोर चच्न-प्रहार न होता |,उसने देखा अमरनाथ घोड़े पर सवार एक पुल पर चले जाते हैं ।,यदि किसी दूसरे चपरासी ने उससे भी बड़ा अपराध किया होता तो भी उस पर इतना कठोर वज्रप्रहार न होता । यही अनबन का मुख्य कारण था ।,आखिर प्रभु सेवक ने पद-त्याग कर दिया ।,यही अनबन का मुख्य कारण था । आज यह नहीं है आज वह नहीं है यह तो न सुनना पड़ेगा,खाली कर दो मेरा घर आज ही खाली कर दो,आज यह नहीं है आज वह नहीं है यह तो न सुनना पड़ेगा इससे आस-पास के गाँवो और महत्लो में उसका यश फेल गया ।,पुलिस ने बहुत दौड़-धूप की; पर चोरों का पता न चला ।,इससे आस-पास के गाँवो और मुहल्लों में उसका यश फैल गया । "थोड़ी देर और देख लो, फिर खाना उठाकर रख देना ।","सोचा, शायद रतन से कुछ पता चले ।","थोड़ी देर और देख लो, फिर खाना उठाकर रख देना ।" मेरा पहला सवाल यह होगा कि बिलायती चीजों पर दुगुना महसूल लगाया जाय और मोटरों पर चौगुना ।,' एक क्षण के लिए रमा सिटपिटा गया ।,मेरा पहला सवाल यह होगा कि बिलायती चीज़ों पर दुगुना महसूल लगाया जाय और मोटरों पर चौगुना । प्रछाश --मैने आज़ बुढ़िया के साथ बड़ी चटखटी की ।,"उठ बैठा और बोला— अम्माँ, अभी तुम सोयी नहीं ?",प्रकाश— मैंने आज बुढ़िया के साथ बड़ी नटखट की । राष्ट्रीय संदेश सुनने का अवसर उसे कभी न मिला था ।,"आप ही ने उसे निकाला, और अब भी आपको उस पर जरा भी दया नहीं आती ?",राष्ट्रीय संदेश सुनने का अवसर उसे कभी न मिला था । उसको आइचय हुआ ।,"दोनों ही प्रजा के हितैषी थे, दोनों ही उसे सुखी और सम्पन्न देखना चाहते थे ।",उसको आश्चर्य हुआ । "सतल्लाल्न ने प्रसुज्ञ होकर कहय- इतनी दया आप करेंगे, तो क्‍या पूछना ।",नाम भी गुणों के अनुसार ही भीमचन्द और दुर्बलदास ।,"' संतलाल ने प्रसन्न होकर कहा, 'इतनी दया आप करेंगे, तो क्या पूछना ।" "वर्षा के दिन थे, दरिया चढा हुआ था, मेघ मालाएं अन्तर्राष्ट्रीय सेनाओं को भाँति रग-बिरगी वर्दियाँ पहने आकाश में कवायद कर रही थीं ।","उससे बराबर सिनेमा , थियेटर और दरिया की सैर के लिए आग्रह करते रहते ।","‘ वर्षा के दिन थे , दरिया चढ़ा हुआ था , मेघ-मालाएँ अन्तरराष्ट्रीय सेनाओं की भाँति रंग-बिरंगी वर्दियाँ पहने आकाश में कवायद कर रही थीं ।" सब-के-सव मजूर अपराधियों की भाँति सिर झुकाये कुछ दूर तक गाड़ी के पीछे-पीछे चले,मेरा तो जी चाहता है उन्हें खोदकर दफन कर दूँ,सब-के-सब मजूर अपराधियों की भाँति सिर झुकाए कुछ दूर तक गाड़ी के पीछे-पीछे चले सोफिया रानी जाह्नवी की गाड़ी की प्रतीक्षा कर रही थी ।,दिन-भर अवकाश न मिला ।,सोफिया रानी जाह्नवी की गाड़ी की प्रतीक्षा कर रही थी । उनके कर्मचारी सब हमारे भाई-बंद हैं ।,"हम आपके पास से भागे, तो थोड़ी ही दूर पर अपने गोल के कई आदमियों को रियासत के सिपाहियों से लड़ते पाया ।",उनके कर्मचारी सब हमारे भाई-बंद हैं । ( मैने कह्ा--त॒म्दारे हाथ लगता होगा यहाँ तो रोज देखते हैं कभी पैसे से भेंट नहीं होती,उसे यह झमेला बिलकुल नहीं भाता था,मैंने कहा - तुम्हारे हाथ लगता होगा यहाँ तो रोज देखते हैं कभी पैसे से भेंट नहीं होती "आकर मेरे शव को अपने हाथों से नहलाना, अपने हाथ से सोहाग के सिन्द्र लगाना, अपने हाथ से सोहाग को चूढियाँ पहनाना, अपने द्वाथ से मेरे मुँह में गगाजल डालता, दो-चार पग कन्या दे देना, बस मेरी आत्मा सन्तुष्ट हो जायगो और तुम्हे आशीर्वाद देगी ।",कितनी अभिलाषाओं से विहार का आनन्द उठाने चली थी क़ितनी तैयारियों से पर मेरे पहुँचते ही द्वार बन्द हो गया है ।,"आकर मेरे शव को अपने हाथों से नहलाना , अपने हाथ से सोहाग के सिन्दूर लगाना , अपने हाथ से सोहाग की चूड़ियाँ पहनाना , अपने हाथ से मेरे मुँह में गंगाजल डालना , दो-चार पग कन्धा दे देना , बस , मेरी आत्मा सन्तुष्ट हो जायगी और तुम्हें आशीर्वाद देगी ।" शर्मानी का सत्तिष्क कृषि-सम्यन्धी ज्ञान का भण्डार था ।,"राजनीतिज्ञों के कर्तव्य क्या हैं, मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता; लेकिन इतना तो सभी मानते हैं कि पथ्य, औषधि सेवन से अच्छा होता है ।",शर्मा जी का मस्तिष्क कृषि-सम्बन्धी ज्ञान का भंडार था । "सारा दिन दोनों मित्र फाटक की और टकटकी लगाये त्ताकते रहे , पर कोई चारा लेकर आता न दिखाई दिया ।","यहाँ कई भैंसे थीं , कई बकरियां , कई घोड़े , कई गधे , पर किसी के सामने चारा न था , सब जमीन पर मुर्दों की तरह पड़े थे ।","सारा दिन मित्र फाटक की ओर टकटकी लगाए रहते , पर कोई चारा न लेकर आता दिखाई दिया ।" सात वर्ष का प्रोग्राम है ।,मैंने आपत्ति की आखिर यात्रा में तुम दो लाख से ज्यादा तो न खर्च करोगे ?,सात वर्ष का प्रोग्राम है । रमेश बाब्‌ की जीत रही ।,तब निश्चिन्त होकर बैठें ।,रमेश बाबू की जीत रही । "राजजुमारियों मे जब से ब्रजविलोसिनी की रामेडानी पुनी है, उसके साथ वे और मो प्रेम और रहदानुभूति का बर्ताव करते छगी है |",अंत में जब जंगल में रहते-रहते जी उकता गया तो जोधपुर चली आयी ।,राजकुमारियों ने जब से ब्रजविलासिनी की रामकहानी सुनी है उसके साथ वे और भी प्रेम और सहानुभूति का बर्ताव करने लगी हैं । "अगर कोई महीने-भर भी सिखादे, तो मैं उससे अच्छा गाने लगू।","उसके गले में लोच नहीं, मेरी आवाज उससे बहुत अच्छी है ।","अगर कोई महीने- भर भी सिखा दे, तो में उससे अच्छा गाने लगूँ ।" इससे सरल और क्या हो सकता है ?,कोई आगे-पीछे न था ।,इससे सरल और क्या हो सकता है ? कब नये साल से फिर खेती करने लगे थे,जन-रुचि सदैव उग्र की ओर होती है,अब नए साल से फिर खेती करने लगे थे "में ज़मीदारों को बुराई करता, उन्हें हिसक पशु और खूब चूसने- वाली जॉक और वृक्षों की चोटी पर फूलनेबाजा बस्ता कहता ।","ईश्वरी एक बड़े जमींदार का लड़का था और मैं एक गरीब क्लर्क का, जिसके पास मेहनत-मजूरी के सिवा और कोई जायदाद न थी ।","मैं जमींदारी की बुराई करता, उन्हें हिंसक पशु और खून चूसने वाली जोंक और वृक्षों की चोटी पर फूलने वाला बंझा कहता ।" जालपा इसी बीच में गंगाजल लिये पहुँची ।,मैं भी जब्त न कर सकी ।,जालपा इसी बीच में गंगाजल लिये पहुँची । कभी-कभी वह फिटन पर हवा खाने जाया करती ।,पहर रात तक उसके कमर से मधुर गान की ध्वनि आया करती ।,कभी-कभी वह फिटन पर हवा खाने जाया करती । "बस, पश्ुओं की तरद् काम करना और खाबो, यही उसझो ज़िन्दगी के दो काम थे ।",दयानाथ ने अबकी अपने पत्र का प्रचार बढ़ाने के लिए वास्तव में एक आपत्तिजनक लेख लिखा और छः महीने की सजा पायी ।,"बस, पशुओं की तरह काम करना और खाना, यही उसकी जिन्दगी के दो काम थे ।" उनके पिता उन्हें वाल्यावस्था में ही छोड़कर परलोक सिधारे थे |,उनकी यह ह्रदयहीनता इस समय मुझे बहुत बुरी लगी ।,उनके पिता उन्हें बाल्यावस्था में ही छोड़कर परलोक सिधारे थे । "वह देर में सोकर उठती, कई दिन ' घर में भाड़, नहीं देती ।",वह उन्हीं को अपनी इस दशा का उत्तरदाता समझती थी ।,"वह देर से सोकर उठती, कई दिन घर में झाड़ू नहीं देती ।" “एक युढ़िया रख गई है,अमर ने पठानिन के रूमाल दिखाने शुरू किए,एक बुढ़िया रख गई है "मुझे रात-भर चक्की पीसना गो है, उनके पास घड़ी भर बैठना गौ नहीं ।",अरे! तुम्हारे पांवों में यह क्या उजला-उजला लगा हुआ है ?,"मुझे रात-भर चक्की पीसना गौं है, उनके पास घड़ी-भर बैठना गौं नहीं ।" "'बेहयाई है, में परदा नहीं न्यद्वती, पुरुषों की गुलामी नहों चाइतो, लेकिन औरतों में जो गौरवशीलता और सलूजता है, उप्ते नहीं छोड़ना चाइती ।","' 'वेश्या ही सही, पर उसे इतनी बेशर्मी करके स्त्री-समाज को लज्जित करने का क्या अधिकार है ?","मैं परदा नहीं चाहती, पुरुषों की गुलामी नहीं चाहती; लेकिन औरतों में जो गौरवशीलता और सलज्जता है, उसे नहीं छोड़ना चाहती ।" "जब देखने वाला ही न रहा, तो इन्हें रखकर क्या करूँ ?",बेग रखकर फिर आ जाना ।,"जब देखने वाला ही न रहा, तो इन्हें रखकर क्या करूँ ?" सब इस सम्रय इलाहाबाद के एक स्कूल में पढ़ हैं ।,"कोई उसे ऊपर उछाल देता था, यहाँ तक कि अबोध शिशु का कलेजा मुँह को आ जाता था ।",सब इस समय इलाहाबाद के एक स्कूल में पढ़ रही हैं । कहीं उलभ पड़ा तो मुश्किल होगी |,"मालूम नहीं, गजाधर अपने मन में क्या समझे ।",कहीं उलझ पड़ा तो मुश्किल होगी । उस मनप्य ने साठर परिडतजी के चरण छुए ओर बोला--म आपका पुराना शिष्य हूँ |,"दृश्य बहुत मनोरम है, पर जहरीले जानवर बहुत मिलते हैं ।",उस मनुष्य ने सादर पंडितजी के चरण छुए और बोला- मैं आपका पुराना शिष्य हूँ । "मैंने चहत कहा कि पैसे मेरे है, लेकिन कजाकी ने न लिये |","कजाकी को रोज बुलाने के लिए उस वक्त मेरे पास कोहनूर हीरा भी होता, तो उसको भेंट करने में मुझे पसोपेश न होता ।","मैंने बहुत कहा कि पैसे मेरे हैं, लेकिन कजाकी ने न लिए ।" लेला बेपरवाई से बोढी--बड़ी खुशी की बात है ।,मुझे ऐसा मालूम हुआ कि यह कोई आकाश की देवी है ।,लैला बेपरवाही से बोली- बड़ी खुशी की बात है । उसका गौना हुए एक साल हो रहा है ।,प्रार्थना ही अब उसकी आशाओं का आधार है ।,उसका गौना हुए एक साल हो रहा है । "जब वंह घर में आते थे, तो वह कैसी प्रेम-विद्लल होकर उनसे मिलने दौड़ती थी ।","जब पद्मसिंह के कचहरी से आने का समय होता तो सुभद्रा कितनी उललसित हो कर पान के बीड़े लगाती थी, ताजा हलवा पकाती थी ।",जब वह घर में आते थे केसी प्रेम विहवल हो कर उन से मिलने दोड़ती थी । केसा मनोहर जीवन था,तुम्हें इतना न समझ पड़ा कि में केसा वाक्य मुँह से निकाल रही हूँ,कैसा मनोहर जीवन था न में बेन्नी-बाग पड़ता था ।,एक दिन सुमन की कई पड़ोसिनें भी उसके साथ नहाने चलीं ।,मार्ग में बेनी-बाग पड़ता था । "सोचती हो कि आप ही आर्वेगी, वह कोई मेहमान तो नहीं जो उन्हें बुलाऊँ ।",अवश्य ही लोग खा-पीकर चले गए ।,"सोचती हो कि आप ही आवेंगीं, वह कोई मेहमान तो नहीं जो उन्हें बुलाऊँ ।" सदन को यह भय होता कि इनमें कोई चाचा की जान-पहचान का मनुष्य न हो।,सुमन के यहाँ रसिकों का नित्य जमघट रहता है ।,सदन को यह भय होता कि इनमें कोई चाचा की जानपहचान का मनुष्य न हो । शहर में इलवल प्रची हुई थी ।,"दोपहर को जब भूख मालूम होती तो दोनों मित्र किसी नानबाई की दूकान पर जाकर खाना खाते, और एक चिलम हुक्का पीकर फिर संग्राम-क्षेत्र में डट जाते ।",शहर में हलचल मची हुई थी । पिनहा--पाँच हज़ार तो बहुत होते हैं |,"देखते नहीं हो, मर रहा हूँ ?",सिनहा- पाँच हजार तो बहुत होते हैं । सबेरे-सबेरे भंगी का मुह ठेखना पडता था ।,"कावसजी से एक लाख बार यह प्रश्न किया जा चुका था कि जब तुम्हें समाचारपत्र निकालकर अपना जीवन बरबाद करना था , तो तुमने विवाह क्योंकिया ?",सबेरे-सबेरे भंगी का मुँह देखना पड़ता था । "बातें करते समय देखती हूँ, तुम्हारा मन किसी और तरफ़ रहता है ।","वेश्या के पास लोग आनंद उठाने ही जाते हैं, कोई उससे मन की बात कहने नहीं जाता ।","बातें करते समय देखती हूँ, तुम्हारा मन किसी और तरफ रहता है ।" दादा दो दिन पालकी लेकर गये ।,सदन -- आपकी राह लोग दो दिन तक देखते रहे ।,दादा दो दिन पालकी लेकर गए । "किसी ने जाल दिया, किसी ने दाल, किसी ने कुछ ।","दो-चार महीने भी आराम से न रहेगी, तो क्या याद करेगी ।","किसी ने चावल दिया, किसी ने दाल, किसी ने कुछ ।" के तुम्दारा भोजन अलग पका दूँगी,आज मैं खाना नहीं खाऊँगा मुन्नी,मैं तुम्हारा भोजन अलग पका दूँगी "द्वाथ में छट़ो है दी, में सी वह क्रोघोन्मत्त आकृति देखकर पछताने लगती हूँ, कि कहाँ से इनछे शिकायत की ।",लड़का थरथर काँपता हुआ आकर आँगन में खड़ा हो जाता है ।,"हाथ में छड़ी है ही, मैं भी वह क्रोधोन्मत्त आकृति देखकर पछताने लगती हूँ, कि कहाँ से इनसे शिकायत की ?" पति--अब तो अम्माँ को तुम्हारी फज्जुंललर्ची भी बुरी नहों लगती ।,"जिस दिन मैं उनके पाँव दबाने बैठूँगी , वह मुझ पर प्राण देने लगेंगी ।",पति – अब तो अम्माँ को तुम्हारी फजूलखर्ची भी बुरी नहीं लगती । "प्रात.काल मैं उठा, तो क्या देखता हूँ कि कजाकी लाठो टेकता हुआ चला आ रहा है |","जल्दी जाओ, नहीं तो कोई दूसरा आदमी रख लिया जायगा ।","प्रात:काल मैं उठा, तो क्या देखता हूँ कि कजाकी लाठी टेकता हुआ चला आ रहा है ।" "तुम्हें जरूरत हो, आज इन्हें उठा ले जाओ, में खुशी से दे दूँगी ।","मैं तो इसमें सात जीवन काटने को तैयार हूँ, मगर मुझे कोई इतना भी नहीं देता ।","तुम्हें जरूरत हो, आज इन्हें उठा ले जाओ, मैं ख़ुशी से दे दूँगी ।" "एक ने फह्दा-- यह तो कद्दो, बड़ी कुशल हुईं कि बुढ़िया के सिर गईं, चहाँ तो द॑तर माँ-बाप दो में से एक को लेकर तमी शान्त होती है ।","घर की महरी ने महल्ले-भर में यह खबर फैला दी, पड़ोसिनें देखने आयीं तो सारा इलजाम बालिका के सिर गया ।",एक ने कहा- यह तो कहो बड़ी कुशल हुई कि बुढ़िया के सिर गई; नहीं तो तेंतर माँ-बाप दो में से एक को लेकर तभी शांत होती है । "तुम ज़रा मेरा इन्ट्रोडक्शन करा देना, बाक़ी और सब में कर लंगा ।",क्या वकील साहब के यहाँ गए थे ?,"तुम ज़रा मेरा इंट्रोडक्शन करा देना, बाकी और सब मैं कर लूंगा ।" एक क्ुण में धड़ाके की आवाज़ हुई |,"लोग इसे कितनी त्याज्य-वस्तु समझते हैं, इसका अनुभव मुझे आज ही हुआ, नहीं तो एक संन्यासी के जरा-से इशारे पर बरसों के लती पियक्कड़ यों मेरी अवहेलना न करते ।",एक क्षण में धड़ाके की आवाज हुई । "इसी समय एकाठशी का चोद, प्रथ्ची से उस पार, अपनी उज्ल्वल नोका खेता हुआ निकला और व्योम-सागर को पार करने लगा |",एक छोटी-सी नौका किनारे पर लगी हुई थी ।,"इसी समय एकादशी का चॉँद, पृथ्वी से उस पार, अपनी उज्जवल नौका खेता हुआ निकला और व्योम-सागर को पार करने लगा ।" शामियाने मन्त्र ४ पर राष्ट्रीय-ऋरडा लहराने लगा ।,कई जगह थैलियाँ मिलीं ।,शामियाने पर राष्ट्रीय झंडा लहराने लगा । उसका लड़का कहीं फौज में नौकर था ।,"जो कुछ मोटा-झोटा मयस्सर हुआ, खा लिया, चाय और मक्खन, मुरब्बे और मेवों का चस्का न था ।",उसका लड़का कहीं फौज में नौकर था । "उसका कृश शरीर, पीला मुख और सनन्‍्द गति देखकर अनुमाच होता है कि उसका स्वास्थ्य बिगढ़ा हुआ है, और इस भार का वहन करना उसे कश्प्रद है ।","आपने खूब कहा , एक कदम में ५०० सालों की मंजिल पूरी हुई जाती है ।","उसका कृश शरीर , पीला मुख और मन्द गति देखकर अनुमान होता कि उसका स्वास्थ्य बिगड़ा हुआ है और इस भार का वहन करना उसे कष्टप्रद है ।" उसकी छाती वेग से घड़कने लगी ।,मुझे तो अब तुम्हारा ही भरोसा है ।,उसकी छाती वेग से धड़कने लगी । उसने यह ख़बर सुनी तो खुश होकर कह्ा--तुमने बहुत भच्छा किया निकल आये,उसकी अभिलाषा थी कोई अच्छा सरकारी पद पा जाए और चैन से रहे,उसने यह खबर सुनी तो खुश होकर कहा-तुमने बहुत अच्छा किया निकल आए सोफिया-अच्छी बात है ।,तुम वहीं आकर मुझसे मिल लिया करना ।,सोफिया-अच्छी बात है । इसमें बहुत आगा-पीछा की ज़रूरत ही न थी ।,"संशय के भाव से बोला, 'तो मुझे मुख़बिर बनना पड़ेगा और यह कहना पड़ेगा कि मैं भी इन डकैतियों में शरीक था ।",इसमें बहुत आगा-पीछा की जरूरत ही न थी । ' ' इससे आपको कोई बहस नहीं ।,' 'यह आपको मालूम कैसे हुआ ?,' 'इससे आपको कोई बहस नहीं । आज भी . उसने घर आते ही आते कुरता उतार दिया और एक पंखिया लेकर झलने |,छत्तीस देवीदीन ने चाय की दूकान उसी दिन से बंद कर दी थी और दिन-भर उस अदालत की खाक छानता फिरता था जिसमें डकैती का मुकदमा पेश था और रमानाथ की शहादत हो रही थी ।,आज भी उसने घर आते ही आते कुरता उतार दिया और एक पंखिया लेकर झलने लगा । संगत को में बुरा नहीं कहता,खरच दिल खोल कर करेंगे,संगत को मैं बुरा नहीं कहता अभी तो कोई ऐसी जरूरत नहीं है,मेरे लिए यह नया अनुभव है,अभी तो कोई ऐसी जरूरत नहीं है श्वगार चतुरात्रो ने दुलहिन को खूब सेबारा ।,उमा को वह किसी तरह छोड़ती न थी ।,शृंगार चतुराओं ने दुलहिन को खूब सँवारा । आज जवाब आ गये हैँ,सकीना का हाल जानने के लिए हृदय तड़प-तड़पकर रह जाता था,आज जवाब आ गए हैं "खाने में देर हुई, तो मेने सोचा, अब कौन घर जाय |",यहाँ बेचारा चायवाला खड़ा है और कोई उसके पास नहीं फटकता ।,"खाने में देर हुई , तो मैंने सोचा अब कौन घर जाय ।" "चीज़ें वही थीं, जिनका वह बखान करते रहते थे ।",उसकी छाती वेग से धड़कने लगी ।,"चीजें वही थीं, जिनका वह बखान करते रहते थे ।" "रक्षक ने भ्रपमानसूचक भाव से कहा--वह और तुम वराजर ! ु झ्राग पर घी जो कुछ करता है, वह इस वाक्य ने सुमन के हृदय पर किया ।","ज्योंही दोनों वेश्याएँ वहाँ से चली गई, सुमन सिंहनी की भाँति लपककर रक्षक के सम्मुख आ खड़ी हुई ओर क्रोध से काँपती हुई बोली -- क्यों जी, तुमने मुझे तो बेंच पर से उठा दिया; जैसे तुम्हारे बाप ही की है, पर उन दोनों राड़ो से कुछ न बोले ?","रक्षक ने अपमानसूचक भाव से कहा -- वह ओर तुम बराबर! आग पर घी जो करता है, वह इस वाक्य ने सुमन के हृदय पर किया ।" मिसेज सेवक-वही चर्च के विषय में न ?,फायदा ही क्या ?,मिसेज सेवक-वही चर्च के विषय में न ? "छाले पर मक्खन लगाने से एक क्षण के लिए कष्ट कम हो जाता है, किन्तु फिर ताप की वेदना होने लगती है ।",लेकिन उमानाथ अपने बहनोई की कठोर बातें न भूले ।,"छाले पर मक्खन लगाने से एक क्षण के लिए कष्ट कम हो जाता है, किंतु फिर ताप की वेदना होने लगती है ।" उसे यह धड़का समाया हुआ था कि की वह आकर फिर न मसार-री6 शुरू कर दें ।,मैं भी समझ लूँगी कि विधवा हो गयी ।,उसे यह धड़का समाया हुआ था कि कहीं वह आकर फिर न मार-पीट शुरू कर दें । उसके मन में अभिलाषा का उठी थी,गोबर को इससे भी बहुमूल्य वस्तु मिल गई थी,उसके मन में अभिलाषा जाग उठी थी उनके प्राण अब भी सूखे जाते थे हि में कोध के आवेश में कोई पागलपत न कर बहू ।,"कुसुम ने जिस धैर्य और साहस से काम लिया है , वह सराहनीय है ।",उनके प्राण अब भी सूखे जाते थे कि क्रोध के आवेश में कोई पागलपन न कर बैठूँ । "न बतावेगी, तों समभ ले कि आज से तू मेरी कोई नहीं ।","मुझे तू जब तक बता न देगी कि तू सारी रात कहाँ रही, तब तक में तुझे घर में बेठने ने लूँगा ।","न बतावेगी, तो समझ लो कि आज से तू मेरी कोई नहीं ।" उसे ज्यों-त्वो चला रहा थ ।,बहुत दिनों के बाद आज उन्हें यह आननद प्राप्त हुआ था ।,उसे ज्यों-त्यों चला रहा था । "उस पर कमी कानूनगो आ गये, कभी तहसीलदार, कभी डिप्टी साहब का लश्कर श्रा गया |",गिरधारी-नहीं सरकार ! ऐसा न कहिए ।,"उस पर कभी कानूनगों आ गए, कभी तहसीलदार, कभी डिप्टी साहब का लश्कर आ गया ।" "सुमन का रक्त सूख गया, कहीं छिपने की जगह न थी।",अन्धकार में वह बहुत भयंकर देख पड़ते थे ।,"सुमन का रक्त सूख गया, कहीं छिपने की जगह न थी ।" बड़े-वड़े झ्ालिमों को एक बेसिर-पैर की वात की ताईद में जमीं और भ्ासमान के कुलाबे मिलाते देखता हूँ ।,में अभी यही तय नहीं कर सका कि आलमो बेदारी में हूँ या खयाब में ।,बड़े-बड़े आलिमों को एक बेसिर पेर की बात की ताईद में जमीं ओर आसमान के कुलाबे मिलाते देखता हूँ । "मनोरमा का उनके मन पर, उनकी आत्मा पर सम्पूर्ण आधिपत्य था ।",लेकिन निर्मला उदास थी ।,"मनोरमा का उनके मन पर, उनकी आत्मा पर सम्पूर्ण आधिपत्य था ।" अब दोनो ही दिलगीर रहते ।,"अगर आग्रह भी करती, तो क्या उसका आशय यह होता कि वह चोरी करके लावें ?",अब दोनों ही दिलगीर रहते । एक दिन दोनों मिन्न बेठे हुए शतरज की दलदल् में ग्रोते खा रहे थे कि इतने में घोड़े पर सवार एव बादशाददी फ्रोज का अफ़प्तर मीरणहंब का नाम पूछता हुआ आ पहुँचा ।,मीर साहब अपने घर में जा बैठते ।,एक दिन दोनों मित्र बैठे हुए शतरंज की दलदल में गोते खा रहे थे कि इतने में घोड़े पर सवार एक बादशाही फौज का अफसर मीर साहब का नाम पूछता हुआ आ पहुँचा । पति के प्रगाढ़ आलिंगन में वह्द सब कुछ हँसकर छल लेगी ।,"जब तक समाज की यह व्यवस्था कायम है और युवती कन्या का अविवाहित रहना निंदास्पद है, तब तक यह प्रथा मिटने की नहीं ।",पति के प्रगाढ़ आलिंगन में वह सब कुछ हँसकर झेल लेगी । सुखदा या नंगा दोनो ही से कुछ कद्तते उन्हें डर लगता था,जो अपने विचारों को मानते हों वही अपने सगे हैं,सुखदा या नैना दोनों ही से कुछ कहते उन्हें डर लगता था कितनी वात्सल्य से भरो आकाक्षा थो कि जो देखनेवालों में श्रद्धा उत्पन्न कर देती थो ।,"रात को उसने सबको भोजन कराया , खुद भी भोजन किया और बड़ी देर हारमोनियम पर गाती रही ।","कितनी वात्सल्य से भरी आकांक्षा थी, जो कि देखने वालों में श्रद्धा उत्पन्न कर देती थी ।" "यह अहंकार है, इसे मिटाओ, नहीं तो यह जन्म भी नष्ट हो जाएगा ।","सूरदास-नहीं बाबा, अब यह कुन्याव नहीं सहा जाता ।","यह अहंकार है, इसे मिटाओ, नहीं तो यह जन्म भी नष्ट हो जाएगा ।" "समूह ने एक स्वर से पुकारा--गोपीनाथ की जय ! ह एक घण्टा पहले अगर ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हुई होती, तो सेठजी ने बढ़ी निश्चिन्तता से उपद्रवकारियों को पुलिस की गोलियों का निशाना बनने दिया होता , लेकिन गोपीनाथ के उस देवोपम सौजन्य और आत्म-समर्पण ने, जेसे उनके मन.स्थित विकारों का शमन कर दिया था और अब साथारण औपधि भी उन पर रामबाण का- सा चमत्कार दिखाती थी ।",अब हुक्का पीयेंगे और सोयेंगे ।,"समूह ने एक स्वर से पुकारा -- ग़ोपीनाथ की जय ! एक घण्टा पहले अगर ऐसी परिस्थिति उत्पन्न हुई होती, तो सेठजी ने बड़ी निश्चिन्तता से उपद्रवकारियों को पुलिस की गोलियों का निशाना बनने दिया होता; लेकिन गोपीनाथ के उस देवोपम सौजन्य और आत्म-समर्पण ने जैसे उनके मन:स्थित विकारों का शमन कर दिया था और अब साधारण औषधि भी उन पर रामबाण का-सा चमत्कार दिखाती थी ।" "इस वक्तृता ने सिद्ध कर दिया कि भारत के उद्धार का कोई उपाय है तो वह स्वराज्य है, जिसका आशय है->मन और वचन की पूर्ण स्वाधीनता |",पत्र हाथ से छूट कर गिर पड़ा ।,इस वक्तृता ने सिद्ध कर दिया कि भारत के उद्धार का कोई उपाय है तो वह स्वराज्य है जिसका आशय है मन और वचन की पूर्ण स्वाधीनता । सूरदास-तो मुझे क्यों जलाया करती है ?,अब जमीन छूट जाने से क्यों सब-के-सब मेरे दुसमन हो गए हैं ?,सूरदास-तो मुझे क्यों जलाया करती है ? उसका केवल अजुमान किया जा सकता है ।,"उस आवेश में न जाने क्या-क्या लिख गया , अब याद भी नहीं ।",उसका केवल अनुमान किया जा सकता है । भावज- भेंट फ्या दोगी ?,पूरी एक नींद लेता हूँ ।,भावज- भेंट क्या दोगी ? कदाचित्‌ उसने इस सुआमले छो मेरे विवेक पर छोड़ दिया ।,"अगर उसे सुझा दिया जाय कि जमींदार और असामी में कोई मौलिक भेद नहीं है, तो जमींदारी का कहीं पता न लगे ।",कदाचित् उसने इस मुआमले को मेरे विवेक पर छोड़ दिया । "ऐसा विश्ित होतां था, मानों थह ऋदृश्य जीवों वी बस्तो है ।",उनके गरजन की ऐसी गगनभेदी ध्वनि उठी कि ज्ञानसरोवर का जल आंदोलित हो गया और तुरंत घोड़े से खींच कर उसकी छाती पर पंजे रख दिये ।,ऐसा विदित होता था मानो यह अदृश्य जीवों की बस्ती है । युवती का घर से निकलना मुँह से वात का निकलना है ।,"साहसी पुरुष को कोई सहारा नहीं होता तो वह चोरी करता है, कायर पुरुष को कोई सहारा नहीं होता तो वह भीख माँगता है; लेकिन स्त्री को कोई सहारा नहीं होता, तो वह लज्जाहीन हो जाती है ।",युवती का घर से निकलना मुँह से बात का निकलना है । उस छार्तं को पूरा करना आपका काम है ।,अन्त में कहते-सुनते एक शर्त पर राजी हुई ।,उस शर्त को पूरा करना आप का काम है । जब जीवन की अभिलाषाओं का अन्त हो गया तो जीवन के अन्त का वया डर ।,बल्कि मर जाने से जीवन की विपत्तियों का तो अन्त हो जाएगा ।,जब जीवन की अभिलाषाओं का अन्त हो गया तो जीवन के अन्त का क्या डर ? "वह दुर्बल था, सब अपमान सह सकता था, जालपा तो शायद प्राण ही दे देती ।",वह इस मामले को गुप्त ही रखना चाहता था ।,"वह दुर्बल था, सब अपमान सह सकता था, जालपा तो शायद प्राण ही दे देती ।" बाहरी चोर का यह काम नहीं है ।,कोई उन्हें मार रहा है ।,बाहरी चोर का यह काम नहीं है । प्रेम तो विरले ही दिलों में दोता है,अगर सुखदा उनकी स्त्री न होती तब भी तो उसकी तारीफ करते,प्र्रेम तो बिरले ही दिलों में होता है "सवार तो हुआ , पर बोटियाँ कप रहो थीं |",एक गाढ़े की मिर्जई और चमरौधे जूते पहने बाजारों में घूमा करते थे ।,"सवार तो हुआ, पर बोटियाँ काँप रही थीं ।" "मानकी ने कहा --- जब टीके में एक हज़ार दिया, तो इतना हो घर पर भी देना पड़ेगा ।",अपनी हार को छिपाने का उनके पास यही साधन था ।,"मानकी ने कहा--जब टीके में एक हजार दिया, तो इतना ही घर पर भी देना पड़ेगा ।" "वह धीरे-धीरे सिर झुकाये, सज़ा पाये हुए क़ैदी की भाँति जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया ; पर यह भयंकर शब्द बीच-बीच में उसके हृदय में गूज जाता था ।",उस विपत्ति की कल्पना करके उसकी आँखें डबडबा आई ।,"वह धीरे-धीरे सिर झुकाए, सज़ा पाए हुए कैष्दी की भांति जाकर अपनी कुर्सी पर बैठ गया, पर यह भयंकर शब्द बीच-बीच में उसके ह्रदय में गूंज जाता था ।" ऐसा पवित्र आचरण तो मैंने आज तक देखा ही नहीं |,"अगर तुमने विवाह किया, तो हम दोनों तुम्हारे ऊपर जान दे देंगे ।",ऐसा पवित्र आचरण तो मैंने आज तक देखा ही नहीं । "उसने सदन को स्नानग॒ह में जाते देखा था, शंका हुई कि उसी ने हँसी में छिपाकर रखा $ हो, लेकिन उससे पूछने की हम्मत न पड़ी ।",अन्त में निराश हो कर चारपाई पर लेट गई,"उसने सदन को स्नानगृह में जाते देखा था, शंका हुई कि उसी ने हँसी में छिपा कर रखा हो, लेकिन उससे पूछने की हिम्मत न पड़ी ।" साधारण बुद्धि का मनुष्य ऐसी परिस्थितियों में पड़कर घबड़ा उठता हैं; पर बठकबाजों के माथे पर बल तक नहीं पड़ता |,इस अपमान के सामने सरकारी रूपयों की फिक्र भी ग़ायब हो गई ।,"साधारण बुद्धिका मनुष्य ऐसी परिस्थितियों में पड़कर घबरा उठता है, पर बैठकबाजों के माथे पर बल तक नहीं पड़ता ।" "किसी कुवासना से नहीं, केवल अपनी यौवन की छटा दिखाने के लिए, केवल दूसरों के हृदय पर विजय पाने के लिए वह यह खेल खेलती थी |",उसके चंचल हृदय को इस ताक-झाँक में असीम आनन्द प्राप्त होता था ।,"किसी कुवासना से नहीं, केवल अपनी योवन की छटा दिखाने के लिए, केवल दूसरों के हृदय पर विजय पाने के लिए वह यह खेल खेलती थी ।" मुझे स्वय मेरी मातानी ने एच धोदिन के द्वाथ बेच दिया था ।,मेरी रक्षा उसके लिए आवश्यक है ।,मुझे स्वयं मेरी माताजी ने एक धोबिन के हाथ बेच दिया था । डील-डौल भो ऐसा हि अंबेरो रात में उस पर गधे की अम हो जाता ।,भूँकता तो सुननेवाले के कानों के परदे फट जाते ।,डील-डौल भी ऐसा कि अँधेरी रात में उस पर गधे का भ्रम हो जाता । परिइतजी लड़की की परीक्षा ले ही रहे थे कि उनके परम मित्र पश्डित चिम्तामणिजी ने द्वार पर झरवाज दो |,' मोटे.- ' भूल गये ! पंडित के पुत्र हो कर तुम एक नाम भी नहीं याद कर सकते ।,पंडित जी लड़कों की परीक्षा ले ही रहे थे कि उनके परम मित्र पंडित चिंतामणि ने द्वार पर आवाज दी । जालपा के हृदय में गुदगुदी-सी होने लगी ।,"थोड़ी-सी कमी अंग्रेज़ी शिक्षा की थी,उसे भी रमा पूरी किए देता था ।",' जालपा के ह्रदय में गुदगुदी-सी होने लगी । कई मजूर घर लौटने का विचार कर रहे थे ।,"हमें मिल के अन्दर जाना है, चाहे सब मार डाले जायँ ।",कई मजदूर घर लौटने का विचार कर रहे थे । यदि महीने का एक द्नि मी लग जाता तो पुरे महीने का सूद वसल कर लेते ।,झगडू साहु 'लेखा जौ-जौ बखशीश सौ-सौ' के सिद्धांत पर चलते थे ।,यदि एक महीने का एक दिन भी लग जाता तो पूरे महीने का सूद वसूल कर लेते । चिमटे ने भी सभी को मोहित कर लिया ; लेकित अब पेसे किसके पास घरे हैं |,हामिद ने खँजरी की ओर उपेक्षा से देखा- मेरा चिमटा चाहे तो तुम्हारी खँजरी का पेट फाड़ डाले ।,"चिमटे ने सभी को मोहित कर लिया, अब पैसे किसके पास धरे हैं ?" "ं उमानाथ को ऐसी भावना हुईं कि मैंने इस साधु को कहीं देखा है, पर याद नहीं पड़ता कि कहाँ ।",वह भी उस पार जाना चाहता था ।,"उमानाथ को ऐसी भावना हुई कि मैंने इस साधु को कहीं देखा है, पर याद नहीं पड़ता कि कहाँ ?" एक दूसरे को ऐडती हैं और छुश दो कर गले मिछती है ।,राजकुमारियों ने जब सुना कि दोनों वीर वापस आते हैं तो वे फूले अंगों न समायीं ।,एक-दूसरे को छेड़ती हैं और खुश हो कर गले मिलती हैं । "बस, मुझे अधिक बातों की फुसत नहीं है |",आप इस समय हिरासत में हैं ।,"बस, मुझे अधिक बातों की फुर्सत नहीं है ।" क्यों नहीं सिर झुका दिया : देह के भीतर इसीलिए आत्मा रक्खी गयी है कि देह उसकी रक्षा करें ।,"उससे कोई पूछता--तेरे भाई क्या हुए, तो वह बडी सरलता से कहती--बडी दूर खेलने गए हैं ।",क्यों नहीं सिर झुका दिया- देह के भीतर इसीलिए आत्मा रक्खी गई है कि देह उसकी रक्षा करे । वोटिंग के समय चौंक पड़ते ये और नेशनलिस्टों की तरफ़ से वोट देते ये,ऊपर से हैट लगा लेते थे,वोटिंग के समय चौंक पड़ते थे और नेशनलिस्टों की तरफ से वोट देते थे यह हमारी तादाद को घटाने की सरीह कोशिद् है ।,अबुलवफा ने फरमाया -- मगर अब खुदा के फजल से हमको भी अपने नफे-नुकसान का एहसास होने लगा ।,यह हमारी तादाद को घटाने की सरीह कोशिश है । हरजाई नहीं हूँ के सबसे हँसती-बोलती फिलूँ,वह मुझे गधी बनाते हैं मैं उन्हें उल्लू बनाती हूँ,हरजाई नहीं हूँ कि सबसे हँसती-बोलती फिरूँ चिम्मनलाल के जाने के वाद विट्ठलदास ने चन्दे का रजिस्टर उठाया और चन्दा. वसूल करने को उठे ।,"यह सेवा धर्म का पुतला अपने निज के व्यवहार में झूठ ओर चालबाजी से कोसों भागता था, लेकिन जातीय कार्यो में अवसर पड़ने पर उसकी सहायता लेने में संकोच न करता था ।",चिम्मनलाल के जाने के बाद विट्ठलदास ने चन्दे का रजिस्टर उठाया ओर चन्दा वसूल करने को उठे । जी डूबा जाता था ; पर दिल को समभकाकर उठा ।,' दुखी ने फिर कुल्हाड़ी उठाई ।,"जी डूबा जाता था, पर दिल को समझाकर उठा ।" रुआँसा होकर नीचे चला गया और स्थिति पर विचार करने लगा ।,' रमा इतना निस्तेज हो गया कि जालपा पर बिगड़ने की भी शक्ति उसमें न रही ।,रूआंसा होकर नीचे चला गया और स्थिति पर विचार करने लगा । घर में आग लगाने के पहले रुपये निकाल लिए होंगे ।,सूरदास चौंका ।,घर में आग लगाने के पहले रुपये निकाल लिए होंगे । में आज ठुम दोनों जनों की बाते सुन रही थी,उन्हें कम-से-कम इतना संतोष तो दिला दो कि उनके पीछे तुम उनकी कमाई लुटा न दोगे,मैं आज तुम दोनों की बातें सुन रही थी किन्तु मुवक्किलें के हृदय में उसका सम्मात ज्यों-का-त्यों रहा ।,यशवंत दिलोजान से काम करता था और उसके अफसर उससे बहुत प्रसन्न थे ।,किन्तु मुवक्किलों के हृदय में उसका सम्मान ज्यों-का-त्यों रहा । झुखदा मानों धरती में गढ़ गई,इसलिए उसने कहना-सुनना छोड़ दिया था पर एक दिन घर जाते समय उसने अमरकान्त को खादी का गट्ठर लिए देख लिया,सुखदा मानो धरती में गड़ गई घरवालों से भी खेरात या पुरस्कार के खूप में कुछ हेने की बात उसे अपसान-सी लगती थी ।,"पिता या चचा के नाम रुपये आये , तो पाँच हजार से ज्यादा का डौल नहीं , अम्माँ के नाम आये , तो बीस हजार मिल जायेंगे ; लेकिन भाई साहब के नाम आ गये , तो उसके हाथ धोला भी न लगेगा ।",घर वालों से खैरात या पुरस्कार के रूप में कुछ लेने की बात उसे अपमान-सी लगती थी । कौन उसके साथ जायगा ?,"दस बज गये, अब देवी रोने लगी ।",कौन उसके साथ जायगा ? "अब तुमसे क्‍या छिपाऊँ, जब मैं यहाँ आयी तो यद्यपि तुम्हें अपना पति समझती थी , लेकिन कोई बात कहते या करते समय मुझे चिन्ता होती थी कि तुम उसे पसन्द करोगे या नहीं ।","बंधनों से समाज का पैर न बांधिए, उसके गले में कैदी की जंजीर न डालिए ।","अब तुमसे क्या छिपाऊँ, जब मैं यहाँ आई तो यद्यपि तुम्हें अपना पति समझती थी, लेकिन कोई बात कहते या करते समय मुझे चिंता होती थी कि तुम उसे पसंद करोगे या नहीं ।" "मैने एक छोटी सी पाठशाला खोल ली ; एक दक्ष की छाँद में, गाँव के लड़कों को जमा कर कुछ पढ़ाया करता था ।",और एकान्तवास में जीवन के दिन व्यतीत करने का निश्चय करके एक छोटे-से गाँव में जा बसा ।,मैंने एक छोटी-सी पाठशाला खोल ली; एक वृक्ष की छाँह में गाँव के लड़कों को जमा कर कुछ पढ़ाया करता था । अँधेरी कोठरी में जाकर रमा ने मुग्दर की जोड़ी देखी ।,दोनों इस जोड़ी से पांच-पांच सौ हाथ उधरते थे ।,' अंधेरी कोठरी में जाकर रमा ने मुग्दर की जोड़ी देखी । दारोगा ने उन्हें एक-एक चवन्नी मिठाई खाने को देकर फुसला दिया ।,कुल्सूम द्वार पर खड़ी थी ।,दारोगा ने उन्हें एक-एक चवन्नी मिठाई खाने को देकर फुसला दिया । "युवक ने श्राखें निकालकर कहा--मैं ऐ,ी निलंज्जा से विवाह करना अपने लिए अपमान की बात समझता हैँ |",' वृद्ध महाशय का मुँह जरा-सा निकल आया और युवती तुरन्त घूँघट निकालकर पीछे हट गई ।,"युवक ने आँखें निकालकर कहा, 'मैं ऐसी निर्लज्जा से विवाह करना अपने लिए अपमान की बात समझता हूँ ।" गरजवाले आदमी के साथ कठोरता करने में लाभ-ही-लाभ है ।,पशुशाला का फर्श पक्का करा दिया जिसमें कोई कीड़ा-मकोड़ा न छिप सके ।,गरजवाले आदमी के साथ कठोरता करने में लाभ ही लाभ है । "उनकी पूँछ, उनकी गदा, सब्र स्पष्ट दिखलायी दे रही है ।",चारों ओर अंधेरा था ।,"उनकी पूँछ, उनकी गदा, वह स्पष्ट दिखलाई दे रही है ।" "-इमर व्यापारी छोग, अपना बस चलते, किसी कौ चाकरो नहीं करते ।",आप मुझे काँग्रेस का काम करने के लिए नौकर रख लीजिए ।,"हम व्यापारी लोग; अपना बस चलते, किसी की चाकरी नहीं करते ।" बोले-मोटरकार की क्या जरूरत है ?,इनसे ज्यादा चालाक आदमी मिलना मुश्किल है ।,बोले-मोटरकार की क्या जरूरत है ? इस पर दीवानख़ाने में खूब क़हकृदे उड़ते ।,"उनके विचार में अगर कोई काम करने लायक था, तो बस, कचहरी जाना, बहस करना, रुपये जमा करना और भोजन करके सो रहना ।",' इस पर दीवानखाने में खूब कहकहे उड़ते । दे त्तोना हिंस पशुआ की भॉति दवे-पॉव जड्जल को पार करके आये ओर बृत्षों की आढ़ में खड़े होकर सोचने लगे कि व्िन्‍्ता का खेसा कौन सा है ।,"रत्नसिंह अन्य वीरों की भाँति अक्खड़, मुँहफट या घमंडी न था ।",वे तीनों हिंò पशुओं की भाँति दबे-पाँव जंगल को पार करके आये और वृक्षों की आड़ में खड़े हो कर सोचने लगे कि चिंता का खेमा कौन-सा है ? क्या हुआ वैजू पोड़े की डिग्नी का ?,उन्होंने एक थैली से २००) निकाले और दूसरी थैली में रख कर हरनाथ को दे दिये ।,क्या हुआ बैजू पांडे की डिग्री का ? बुद्धि काम नहीं करती ।,आज छह महीने से दरोगाजी इसी चिंता में पड़े ह ैं।,बुद्धि काम नहीं करती । "मासिक वेत्तन तो पूर्णमासी का चांद है, जो एक दिन दिसायी देता है और घदते-बण्ते लुत शो जाता है |",मुंशी वंशीधर भी जुलेखा की विरह-कथा समाप्त करके सीरी और फरहाद के प्रेम-वृत्तांत को नल और नील की लडाई और अमेरिका के आविष्कार से अधिक महत्व की बातें समझते हुए रोजगार की खोज में निकले ।,"मासिक वेतन तो पूर्णमासी का चाँद है, जो एक दिन दिखाई देता है और घटते-घटते लुप्त हो जाता है ।" अभी बारात आने में एक महीने की देर है; लेकिन तैयारियाँ अभी से हो रही हैं।,हर तीन मेहमानों के लिए एक-एक कहार रखने की तजवीज़ हो रही है।,"अभी बारात आने में एक महीने की देर है, लेकिन तैयारियाँ अभी से हो रही हैं।" "हालाँकि मनुष्य को कभी किसी सहगामिनी की ज़रूरत होती हैँ तो वह बुढ़ापे में, जब उसे हरदम किसी अवलम्ब की इच्छा होती है, जब वह ॒परमुखापेक्षी हो जाता हे ।","योरप में अस्सी बरस के बूढ़े युवतियों से ब्याह करते हैं, सत्तर वर्ष की वृद्धाएं युवकों से विवाह करती हैं, कोई कुछ नहीं कहता ।","हालांकि मनुष्य को कभी किसी सहगामिनी की जरूरत होती है तो वह बुढ़ापे में, जब उसे हरदम किसी अवलंब की इच्छा होती है, जब वह परमुखापेक्षी हो जाता है ।" उमानाथ---सुमन कहाँ है ?,गजानंद -- अब उस मायाजाल से मुक्त हो गया ।,उमानाथ -- सुमन कहाँ है ? "राजनीतिज्ञों के कत्तंब्य क्‍या हैं, मैं इस बहस में नहीं पडना चाहता, लेकिन इतना तो सभी सानते हूँ कि पथ्य, श्रौषधि सेवन से अच्छा होता है |","अगर हमारी आय सम्पूर्णतः देश-रक्षा पर समर्पित हो जाय, तो भी आपको आपत्ति न होनी चाहिए ।","राजनीतिज्ञों के कर्तव्य क्या हैं, मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता; लेकिन इतना तो सभी मानते हैं कि पथ्य, औषधि सेवन से अच्छा होता है ।" अब उनको बह की परीक्षा लेनी है,हाँ वह तमाशा चाहे कर लो और यह तमाशा बुरा नहीं रहा,अब उनकी बहू की परीक्षा लेनी है यद कद्ठत हुए उसने एक तदतरी में कुछ नमकौन और मिठाई लाकर मेज़ पर रस दो और अपर का द्वाथ पकड़ कपरे में ले जाकर कुरसी पर बेठा दिया,मीयाद पूरी हो गई,यह कहते हुए उसने एक तश्तरी में कुछ नमकीन और कुछ मिठाई लाकर मेज पर रख दी और अमर का हाथ पकड़ कमरे में ले जाकर कुरसी पर बैठा दिया "जब तक ससार में इस विधान का राज्य है, ओर ज्जी कुलमर्थादा की रक्षक समक्ती जाती है, उस वक्त तक कोई मर्द यह स्वीकार न करेगा कि उसकी पली बुरे आचरण के प्राणियों से किसी प्रकार का ससर्ग रक्खे |","अपने रुपये चाहे अपने घर में रक्खो, चाहे मेरे यहाँ छोड़ जाओ ।","जब तक संसार में इस विधान का राज्य है और स्त्री कुलमर्यादा की रक्षक समझी जाती है, उस वक्त तक कोई मर्द यह स्वीकार न करेगा कि उसकी पत्नी बुरे आचरण के प्राणियों से किसी प्रकार का संसर्ग रक्खे ।" "अ्रन्त में इस अुप्रवृत्ति का वही फल हुआ, जो सदैव हुआ करता है |",इस भांति दिन काटने के बाद ज्योंही शाम होती वह बनठन कर दालमंडी की ओर निकल जाता ।,अन्त में इस कुप्रवृत्ति का वही फल हुआ जो सदेव हुआ करता है । यह मोह-स्वप्न देखते-देखते उसे न जानें कब नींद आ गयी ।,' रमा को आज इसी उधेड़बुन में बडी रात तक नींद न आई ।,यह मोह-स्वप्न देखते-देखते उसे न जाने कब नींद आ गई । "ऋषि मुनि, सब तो ब्राह्मण ही हैं, देवता ब्राह्मण हैं, जो कुछ बने बिगड़ेगी सेमाल लेंगे |","उसी घड़ी तगादा करके ले लिया होता, तो आज मेरे सिर पर इतना बड़ा बोझ क्यों पड़ता ।","ऋषि-मुनि, सब तो ब्राह्मण ही हैं; देवता ब्राह्मण हैं, जो कुछ बने-बिगड़ेगी, सँभाल लेंगे ।" २१ विद्रोहो है फिरने के सिवा मुझे कोई काम नहीं ।,मैं आकर धूईं के पास खड़ी हो गयी ।,अब मारे-मारे फिरने के सिवा मुझे कोई काम नहीं । "बनने की कभी आशा थी , पर आप लोगो ने वह भी तोढ़ दी ।",तारा प्रातः काल विदा हो जायगी ।,"बनने की कभी आशा थी , पर आप लोगों ने वह भी तोड़ दी ।" "गाँव के लोग आग बुर्हने दौढ़े, मगर भाग की लप्टें दठते हुए ताएें की भाँति खेत के एक हिस्से से लह़कर दूसरे पिरे पर जा पहुंचती थीं, घारे उपाय न्यर्थ हुए |",सहसा हवा का एक ऐसा झोंका आया कि जलते हुए पत्ते उड़कर खेत में जा पहुँचे ।,"गाँव के लोग आग बुझाने दौड़े; मगर आग की लपटें टूटते तारों की भाँति एक हिस्से से उड़कर दूसरे सिर पर जा पहुँचती थीं, सारे उपाय व्यर्थ हुए ।" चपरासी लोग स्दय उसका काम कर देते |,थर-थर काँपने लगा ।,चपरासी लोग स्वयं उसका काम कर देते । "वह टूटे हुए तारों का राग था, जिसमें न वह कोच था, न वह जायू, ८ चह अपर ।",रात को उसी पेड़ के नीचे जाकर पड़ रहता ।,"वह टूटे हुए तारों का राग था जिसमें न वह लोच था, न वह जादू, न वह असर ।" उसने पूछा--इमें पकड़ने कौन जायेगा ?,तब तो वकील साहब के पैरों पड़ेंगे ।,उसने पूछा— हमें पकड़ने कौन आयेगा ? इन शब्दों में नेकनीयती झलक रही थी ।,"लेकिन तुम्हारी इच्छा कुछ और हो, तो वही सही ।",इन शब्दों में नेकनीयती झलक रही थी । "ज़म्मीन पथरीली थी, छहीं केची, कहों नौची ।",सहसा उसे अपनी दाहिनी ओर बाग की दीवार कुछ नीची नजर आयी ।,"जमीन पथरीली थी, कहीं ऊँची, कहीं, नीची ।" खाने को मॉगता था ।,"मुन्नू ने उन्हें सलाम किया, बाल्टी उठायी और चलता हुआ ।",खाने को माँगता था । "उसका सारा विराग, सारी उदासीनता, सारी मनोव्यथा मानो छू-मन्तर हो गयी थी ।",द्वारचार के समय उसकी सखियां उसे छत पर खींच ले गई और उसने रमानाथ को देखा ।,"उसका सारा विराग, सारी उदासीनता, सारी मनोव्यथा मानो छू-मंतर हो गई थी ।" चारपाई पर सोना भी छोड़ दिया था ।,वह केवल एक बार बहुत थोड़ा-सा खाती और वह भी रूखा-सूखा ।,चारपाई पर सोना भी छोड़ दिया था । "उसके त्याग और सेवा ,का महत्व भी अब मनहर की निगाहों मे कम होता जाता था ।","जिसने किसी रमणी को प्राप्त कर लिया, उसकी मानो तकदीर खुल गयी ।",उसके त्याग और सेवा का महत्व भी अब मनहर की निगाहों में कम होता जा रहा था । "मारे कमजोरी के पैर काँपने लगते ई, मगर तालाब में घुसकर ये कमल गट्टे तोड़ लाये ।",एक औरत घूँघट निकाले हुए आयी और आँगन में खड़ी हो गयी ।,"मगर न माने ! मारे कमजोरी के पैर काँपने लगते हैं, मगर तालाब में घुस कर ये कमलगट्टे तोड़ लाये ।" "उनमें से कितने ही खुद किसान थे, या हैं ।","अभी तुम्हारा राज नहीं है,तब तो तुम भोग-बिलास पर इतना मरते हो, जब तुम्हारा राज हो जायगा, तब तो तुम ग़रीबों को पीसकर पी जाओगे ।","उनमें से कितने ही ख़ुद किसान थे, या हैं ।" "जो मर्द किसी स्त्री को छेड़ता है, उसे समझ लो कि पल्‍ले सिरे का कायर, नीच और लम्पट है ।",इससे दिल बडा मज़बूत रहता है ।,"जो मर्द किसी स्त्री को छेड़ता है, उसे समझ लो कि पल्ले सिरे का कायर, नीच और लंपट है ।" कई दिन से तर माल न मिले थे ।,लौटने के बाद दूसरे ही दिन से वह वर की खोज में निकले थे।,कई दिन से तर माल न मिले थे। इस तरद एच वर्ष बोत गया ।,संदेशे भेजने लगे; लेकिन जहाँ संदेशिया जाता वहीं जवाब मिलता- हमें मंजूर नहीं ।,इस तरह एक वर्ष बीत गया । "तुमने इस लोकोक्ति को प्रमाणित कर दिया कि 'बनिया मारे जान, चोर मारे अनजान ।","सच पूछिए, तो अब मुझे यही पछतावा हो रहा है कि मैंने इस जमीन को लेने की बात ही क्यों उठाई ।","तुमने इस लोकोक्ति को प्रमाणित कर दिया कि 'बनिया मारे जान, चोर मारे अनजान ।" अमर की इच्छा हुई द्वि सक्रोना को गले लगाकर प्रेम ते छक्र जाय पर सकोना ऊँचे प्रेमादर्श ने उप्ते शान्त कर दिया,मैं अपनी ही तरफ से बेफिक्र नहीं हूँ तुम्हारी तरफ से भी बेफिक्र हूँ,अमर की इच्छा हुई कि सकीना को गले लगाकर प्रेम से छक जाए पर सकीना के ऊँचे प्रेमादर्श ने उसे शांत कर दिया "मे भी स्लो को शद्दिणी, माता और स्वामिवी, सब कुछ मानने को तेयार हू , पर उसे स्वच्छन्द नहीं देख सकता ।",सहसा कावसजी ने पहलू बदला ।,"मैं भी स्त्री को गृहिणी , माता और स्वामिनी , सबकुछ मानने को तैयार हूँ , पर उसे स्वच्छन्द नहीं देख सकता ।" भंग- त्तई के लिए तो बुढ़ापा है ही,मुझे तो यह फुलके दे दिए आप मजेदार रोटियाँ उड़ा रही हैं,भगतई के लिए तो बुढ़ापा है ही पंडित पद्मसिह आज कई वर्षों के विफल उद्योग के बाद स्युनिश्तिपैलिटी के मेम्बर बनने में सफल हुए थे ।,संसार के सभी आदमी उनकी तरह थोड़े ही हो जायेंगे ।,पंडित पद्मसिंह आज कई वर्षो के विफल उद्योग के बाद म्युनिसिपैलिटी के मेम्बर बनने में सफल हुए थे । उन्हें यो बाजी मारते देखकर और लोग भी गरमाये,वह कृपण थे और किसी धर्मकार्य में अग्रसर न होते थे,उन्हें यों बाजी मारते देखकर और लोग भी गरमाए "मुन्नू से बोली--तुम जरा दौंड़कर देखो तो, वाबूजी घर आये कि नहीं ?",रजा -बाबू साहब से तो मुझे चिढ़ हो गयी है ।,"मुन्नू से बोली - तुम जरा दौड़ कर देखो तो, बाबू जी घर आये कि नहीं ?" मुझे देखने के लिए उत्सुक हैं ।,सोफी-मुझे भी लेते चलो ।,मुझे देखने के लिए उत्सुक हैं । रात के दस बजते-वजते यह परिक्रमा पूरी हुई ।,दशहरे के दिन भी उसे खर्च न कर सका ।,रात के दस बजते-बजते यह परिक्रमा पूरी हुई । "कोई अपने धन का जाल विछाता है, कोई भ्रपनी चिकनी-छुपड़ी बातों का ।",यहाँ या तो अंधे आते हैं या बातों के वीर ।,"कोई अपने धनजाल बिछाता है, कोई अपनी चिकनी-चुपड़ी बातों का ।" लालाजी आज्ञा न दे सके ।,"‘ मुनीम ने एक लाख के घाटे की खबर सुनायी होती , तो भी शायद लालाजी को इतना दु:ख न होता , जितना आशा के इन कठोर शब्दों से हुआ ।",लालाजी आज्ञा न दे सके । जानेवाले ठिठक गये,प्रयागवालों का साहस घट गया,जानेवाले ठिठक गये "घर की जो जमा-जथा भौ, वह सब बेचकर सा गया ।","मानो संसार में जितनी दैविक, आधिदैविक, भौतिक, आधिभौतिक बाधाएँ हैं, उनका उत्तरदायी मैं हूँ ।","घर की जो जमा-जथा थी, वह सब बेचकर खा गया ।" "उनका बस चलता तो शहज़ादी का मुँह बन्द कर देतीं, बार-बार उसे चुप रहने का इशारा कर रही थीं ; मगर जालपा को शहज़ादी का यह व्यंग, समवेदना से परिपूर्ण जान पड़ा ।","कृत्रिम सहानुभूति दिखाती हुई बोली--सब न जाने कहाँ के जंगली हैं कि और सब चीजें तो लाए, चन्द्रहार न लाए, जो सब गहनों का राजा है ।","उनका बस चलता तो शहजादी का मुँह बंद कर देतीं, बार-बार उसे चुप रहने का इशारा कर रही थीं, मगर जालपा को शहजादी का यह व्यंग्य, संवेदना से परिपूर्ण जान पड़ा ।" बालक बीमार हुआ कि भूत की पूजा होने लगी,गाँव से थोड़ी दूर पर एक पेड़ है,बालक बीमार हुआ कि भूत की पूजा होने लगी में सब कुछ झेलने को तेयार हूँ ।,"माँ-बाप अब बूढ़े हुए, उनका क्या भरोसा ।",मैं सब कुछ झेलने को तैयार हूँ । "दो साल तद उन्हें जो एक शच्य घेरे रहतौ थी, वह मिट गईं ।",मै आज दरबार करके इन बातों की तसदीक कर दूँगा और तब मैं एक ऐसी तजवीज बताऊँगा जो कई दिन से मेरे जेहन में आ रही है और मुझे उम्मीद है कि तुम उसे मंजूर कर लोगे ।,"दो साल तक उन्हें जो शंका घेरे रहती थी , वह मिट गयी ।" "देवप्रिया ने नाक मिकोड कर कहां--यह छौडा देखने ही को सीधा हैं, हैं जहर का युन्ञात्रा हुआ ! कंता सो कोस से वेंठा हुआ वरछियों से छे३ रहा है ।",परंतु उस समय एक स्त्री को उसके खून की ज़रूरत थी और उसका साहस उसके कानों में कहता था कि एक निर्दोष और सती अबला के लिए अपने शरीर का खून देने में मुँह न मोड़ो ।,देवप्रिया ने नाक सिकोड़ कर कहा-यह लौंडा देखने को सीधा है है जहर का बुझाया हुआ ! कैसा सौ कोस से बैठा हुआ बरछियों से छेद रहा है । जवान आदमी को बीस धंवे होते हैं ।,"दोनों बैल उमंग से भरे दौड़े चले जाते थे, मानों उन्हें स्वयं खेत में पहुँचने की जल्दी थी ।",जवान आदमी को बीस धंधो होते हैं । "वे घव्य यातना नहीं है, जीवे द्वार का साधन है ।",प्रायश्चित्त का अवसर कहाँ मिलता ।,"वैधव्य यातना नहीं है, जीवोध्दार का साधन है ।" ऐसा गधा आदमी कैसे इतना अच्छा लिखता है यह रहस्य है,हम आपका चरण-रज है,ऐसा गधा आदमी कैसे इतना अच्छा लिखता है यह रहस्य है "पूर्व सन्‍्तान के लिए, यश के किए, धर्म के लिए मरता है; पश्चिम अपने लिए ।","कुछ लिखाई कट गई, कुछ नजराना निकल गया, कुछ दलाली में आ गया ।","पूर्व संतान के लिए, यश के लिए, धर्म के लिए मरता है, पश्चिम अपने लिए ।" बेजोड़ बात कभी भली नहीं लगती ।,"दान के अवसर दान होना चाहिए, नाच के अवसर पर नाच ।",बेजोड़ बात कभी भली नहीं लगती । कोट-पतलून से उन्हें घृणा थी,उनकी बातें हास्य से पूर्ण होती थीं,कोट-पतलून से उन्हें घृणा थी ऐसी कहाँ की घड़ो देवियां हैं ।,स्त्री – तुम्हारे मुँह में घी-शक्कर ।,ऐसी कहाँ की बड़ी देवियाँ हैं । चौधरी का मन शका और भय के दुविधे में पढ़ गया |,"दो-तीन हजार का अनाज भर लिया जाए, तो अगहन-पूस तक सवाया हो जायगा ।",चौधरी का मन शंका और भय के दुविधो में पड़ गया । "उसके चले जाने के बाद दो-चार दिन तक तो म्रुर पर नशा रहा; पर जब नशा ठंडा हुआ, तो मुझे वह घर काटने लगा ! मैं फिर उस घर में न गया ।",उसी अत्याचार का अब प्रायश्वित कर रहा हूँ ।,"उसके चले जाने के बाद दो-चार दिन तक तो मुझ पर नशा रहा, पर जब नशा ठंडा हुआ तो मुझे वह घर काटने लगा ! मैं फिर उस घर में न गया ।" हवा तीर के समान उसकी हड्डियों में चुभी जाती थी।,सुमन की देह पर एक फटी हुई रेशमी कुरती थी ।,हवा तीर से समान उसकी हड़ियों में चुभी जाती थी । चौमरी मोटे हो गये हैं और मोटे आदमी घ्वार्थी हो जाते हैं,वह अपनी नीति का समर्थन मुँह से चाहे कर ले हृदय से नहीं कर सकता,चौधरी मोटे हो गए हैं और मोटे आदमी स्वार्थी हो जाते हैं उसकी आत्मा स्वयं अपना न्यायाधीश वन जाती है ।,"उसका चेहरा, उसकी आँखें,उसके आकार-प्रकार, सब जिह्वा बन-बन कर उसके प्रतिकूल साक्षी देते हैं ।",उसकी आत्मा स्वयं अपना न्यायाधीश बन जाती है । अब बह विद्यालय तो जामे लगा था पर जल्सों और सभाओं से जी चुराता रहता था,बाहर आकर मित्रों से और सामने के दूकानदारों से भी उसने यही डींग मारी,अब वह विद्यालय तो जाने लगा था पर जलसों और सभाओं से जी चुराता रहता था इतने में देवीदीन का घर आ गया ।,"यह कहकर वह रो पड़ीं और बोलीं, बहन, मैं खुद मर जाऊँगी, पर उनका अनिष्ट मुझसे न होगा ।",' इतने में देवीदीन का घर आ गया । "लाला भगतराम का काम चिम्मनलाल की श्रार्थिक सहायता से चलता था, इसलिए उतकी सम्मति भी उन्हीं की भ्ोर थी ।","दालमंडी में दीनानाथ के कितने ही मकान थे, ये तीनों महाशय इस प्रस्ताव के विपक्षी थे ।","लाला भगतराम का काम चिम्मनदास की आर्थिक सहायता से चलता था, इसलिए उनकी सम्मति भी उन्हीं की ओर थी ।" ये चकमे किसी और को दोजिएगा ।,सारे रनिवास में मातम-सा छा गया ।,ये चकमे किसी और को दीजिएगा । "हिरिया पर किसी का दावा नहीं है, वह अकेली उन्हीं की लौंडी है ।",किसी दूसरे का उस पर कोई दावा नहीं है ।,"हिरिया पर किसी का दावा नहीं है, वह अकेली उन्हीं की लौंडी है ।" सहिष्णुता तो उसने सीझखी हो न थी ।,मैंने यह रंग देखा तो मुझे चिंता हुई ।,सहिष्णुता तो उसने सीखी ही न थी । तुम्हें इस पर जरा भी दया नहीं आती ?,ऐसे दृश्य देखकर वह शांत न बैठ सकता था ।,तुम्हें इस पर ज़रा भी दया नहीं आती ? "इस समय यदि यमदूत उसके प्राण हरने आता, तो वह आँखों से दौड़कर उसका स्वागत करता ।",कर्ज़ लेने वाले बला के हिम्मती होते हैं ।,"इस समय यदि यमदूत उसके प्राण हरने आता, तो वह आंखों से दौड़कर उसका स्वागत करता ।" उनके नेत्रों में एक प्रकार की चंचलता दीख पड़ती थी ।,"कभी-कभी यह गीत गाते - लकड़ी जल कोयला भई और कोयला जल भई राख, मैं पापिन ऐसी जली कि कोयला भई न राख ।",उनके नेत्रों में एक प्रकार की चंचलता दीख पड़ती थी । बरसों मारे-मारे फिरने के बाद तो यह ठिकाने की नौकरी हाथ आई है ।,मेरा इसमें क्या वश है ?,बरसों मारे-मारे फिरने के बाद तो यह ठिकाने की नौकरी हाथ आई है । "बतलाऊँ , पर क्या फायदा ।",मैं तो एक दिन भी कमरे से नहीं निकली ।,बतलाऊँ ; पर क्या फायदा ? अच्छा तो लो फिर में भी जोर लगाता हैँ ।,किसी की देह में जान नहीं है ।,"अच्छा , तो लो फिर मैं भी जोर लगाता हूँ ।" "प्रभा रूम सें बहुत रूज्जित्,होठी- ।",परन्तु कुछ ऐसी घटनाएँ हुईं कि चम्पतराय को मुगल बादशाह का आश्रित होना पड़ा ।,प्रभा मन में बहुत लज्जित होती । "उन्हें यकीन था कि असहयोग एक हवा है, जब तक चलतो रहे, उप्तमें अपने गोछे कपड़े सुखा ले |",उन्हें अँग्रेजों की भावी शुभकामनाओं पर पूर्णविश्वास था ।,"उन्हें यकीन था कि असहयोग एक हवा है, जब तक चलती रहे उसमें अपने गीले कपड़े सुखा लें ।"